स्वभाव में कटुता, कर्कशता, उतावली, अधीरता, उत्तेजना की उद्दण्डता भी उतनी ही घातक है जितनी कि दीनता, भीरुता, निराशा, कायरता। यह दोनों ही असन्तुलन भिन्न प्रकार के होते हुए भी हाई ब्लड प्रेशर, लो ब्लड प्रेशर की तरह अपने-अपने ढंग से हानि पहुँचाते हैं। स्वभाव को सहिष्णु, धैर्यवान, गम्भीर, दूरदर्शी, सहनशील बनाने का प्रयत्न यदि निरन्तर जारी रखा जाय तो शिष्टता, सज्जनता के ढाँचे में प्रकृति ढलती जायेगी और हर किसी की दृष्टि में अपना मूल्य बढ़ेगा।
ईमानदारी, सच्चाई, सहकारिता, उदारता, मिल जुलकर रहना, मिल बाँटकर खाना, हँसने-हँसाने की हलकी-फुलकी जिन्दगी जीना जैसी आदतें यदि अपने चरित्र का अंग बन सके तो इसमें घाटा कुछ भी नहीं लाभ ही लाभ है। बेईमान, झूठे, ईर्ष्यालु, स्वार्थान्ध, विद्वेषी, मनहूस प्रकृति के लोग अपनी चतुरता और अहमन्यता का ढिंढोरा भर पीटते हैं। वस्तुतः वे कुछेक चापलूसों और अनाड़ियों को छोड़कर हर समझदार की दृष्टि से ओछे, बचकाने और घिनौने प्रतीत होते हैं। वस्तुतः ऐसे लोग जोकर भर समझे और अप्रामाणिक ठहराये जाते हैं। आमतौर से ऐसे लोग अविश्वस्त और चरित्रहीन समझे जाते हैं। फिजूलखर्ची, बड़प्पन, बेईमानी गरीबी के गर्त में गिरने की पूर्व सूचना है। ऐसी आदतें अपने में थोड़ी मात्रा में भी पनपी हो तो उन्हें छोटी दीखने वाली उस चिनगारी को लात से मसलकर बुझा ही देना चाहिए।
ऐसे-ऐसे और भी अनेकों दोष दुर्गुण हैं जो विभिन्न व्यक्तियों में विभिन्न प्रकार की अनुपयुक्त आदतों के रूप में प्रकट होते हैं। एक सभ्य सुसंस्कारी मनुष्य की प्रतीक प्रतिमा मन में बसानी चाहिए और उसकी तुलना में अपनी जो भी कमियाँ दीखती हों उन्हें संकल्प और साहस के सहारे उलटने का प्रयत्न करना चाहिए। उलटने का तरीका एक ही है कि अनौचित्य के स्थान पर उसका प्रतिपक्षी औचित्य अपनाया जाय। उसे अपने दैनिक जीवनक्रम में सम्मानित रखते हुए धीरे-धीरे स्वभाव को ही उस ढाँचे में ढाल लिया जाय। बुराई कोसते रहते से नहीं मिट जाती, उसकी प्रतिपक्षी भलाई को प्रयोग में लाने की नियमित कार्य पद्धति अपनानी होती है। काँटे को काँटे से निकालते हैं और दुष्प्रवृत्तियों को हटाने के लिए सत्प्रवृत्तियों को उनसे जूझने के लिए मोर्चे पर खड़े करते हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
ईमानदारी, सच्चाई, सहकारिता, उदारता, मिल जुलकर रहना, मिल बाँटकर खाना, हँसने-हँसाने की हलकी-फुलकी जिन्दगी जीना जैसी आदतें यदि अपने चरित्र का अंग बन सके तो इसमें घाटा कुछ भी नहीं लाभ ही लाभ है। बेईमान, झूठे, ईर्ष्यालु, स्वार्थान्ध, विद्वेषी, मनहूस प्रकृति के लोग अपनी चतुरता और अहमन्यता का ढिंढोरा भर पीटते हैं। वस्तुतः वे कुछेक चापलूसों और अनाड़ियों को छोड़कर हर समझदार की दृष्टि से ओछे, बचकाने और घिनौने प्रतीत होते हैं। वस्तुतः ऐसे लोग जोकर भर समझे और अप्रामाणिक ठहराये जाते हैं। आमतौर से ऐसे लोग अविश्वस्त और चरित्रहीन समझे जाते हैं। फिजूलखर्ची, बड़प्पन, बेईमानी गरीबी के गर्त में गिरने की पूर्व सूचना है। ऐसी आदतें अपने में थोड़ी मात्रा में भी पनपी हो तो उन्हें छोटी दीखने वाली उस चिनगारी को लात से मसलकर बुझा ही देना चाहिए।
ऐसे-ऐसे और भी अनेकों दोष दुर्गुण हैं जो विभिन्न व्यक्तियों में विभिन्न प्रकार की अनुपयुक्त आदतों के रूप में प्रकट होते हैं। एक सभ्य सुसंस्कारी मनुष्य की प्रतीक प्रतिमा मन में बसानी चाहिए और उसकी तुलना में अपनी जो भी कमियाँ दीखती हों उन्हें संकल्प और साहस के सहारे उलटने का प्रयत्न करना चाहिए। उलटने का तरीका एक ही है कि अनौचित्य के स्थान पर उसका प्रतिपक्षी औचित्य अपनाया जाय। उसे अपने दैनिक जीवनक्रम में सम्मानित रखते हुए धीरे-धीरे स्वभाव को ही उस ढाँचे में ढाल लिया जाय। बुराई कोसते रहते से नहीं मिट जाती, उसकी प्रतिपक्षी भलाई को प्रयोग में लाने की नियमित कार्य पद्धति अपनानी होती है। काँटे को काँटे से निकालते हैं और दुष्प्रवृत्तियों को हटाने के लिए सत्प्रवृत्तियों को उनसे जूझने के लिए मोर्चे पर खड़े करते हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य







































