🔷 इन जलते राष्ट्रीय सत्यों को भारतीय नौजवान वर्ग नहीं समझ पा रहा और न वह तब तक समझ ही पायेगा जब तक प्रयत्नपूर्वक उसके मस्तिष्क में यह विचार नहीं भरे जायेंगे कि फैशनपरस्ती मानसिक न्यूनता का द्योतक है, आन्तरिक दरिद्रता का विज्ञापन है। उसका यह विचार कि बनाव-शृंगार अथवा प्रदर्शनपूर्ण, वेश-विन्यास से वह अपने व्यक्तित्व को ऊंचा कर रहा है—भ्रमपूर्ण है। बाहरी आडम्बरों से विरचित व्यक्तित्व स्वयं इसका गवाह है कि व्यक्ति व्यक्तित्वहीन है, ओछा और बालवृत्ति वाला है। मनुष्य का व्यक्तित्व आत्मा की उच्चता है जो चेहरे पर आकर्षण बन कर बोलती है वस्त्रों की तड़क-भड़क व्यक्तित्व की छटा नहीं है और न उससे किसी के हीन व्यक्तित्व में महानता का समावेश ही होता है। उसे यह भ्रान्त धारणा हृदय से निकाल देनी चाहिए कि वेशविन्यास की विलक्षणता उसे विलक्षण सिद्ध कर सकेगी।
🔶 मनुष्य के व्यक्तित्व का विकास, विद्या, बुद्धि तथा आत्मा की उत्कृष्टता का अनुगामी है। व्यक्तित्व विकास के लिये कपड़ों लत्तों का सहारा लेना एक घातक फिजूलखर्ची है। इस प्रकार के सार्थक विचार विश्वास से ही नवयुवक वर्ग कुछ सोचने समझने में समर्थ हो सकेगा नहीं तो आधुनिकता के अपनाने में वह प्रदर्शन की मरु-मरीचिका में ही भटकता रहेगा।
🔷 आज किसी भी देश के नागरिकों के लिए किसी भी देश के द्वार बन्द नहीं हैं। सब जगह जा सकते हैं। किसी देश की कोई भी बात किसी से छिपी नहीं है। संसार के उन्नतिशील देशों के नागरिक जब भारत के निरक्षर लोगों को सूट, पैंट पहने और टाई, चश्मा लगाये देखते होंगे तो उनकी बालबुद्धि पर हंसते हुए क्या यह न कहते होंगे कि आज के सभ्य युग में भी भारतीय कितने असभ्य हैं कि वे पहनने ओढ़ने की आवश्यकता तथा चीजों के उपयोग का भी ज्ञान नहीं रखते। जब किसी प्रगतिशील देश वाले यहां के लोगों को फटी चप्पल, सिकुड़ी पेन्ट पहनने और हाथ में ट्रांजिस्टर लटका देखते होंगे तो क्या मन ही यह उपहास से न मान जाते होंगे कि भारतीय अत्यधिक महत्वपूर्ण उपयोग की चीज को भी खिलौना समझते हैं और कोई आवश्यकता न होने पर भी उसे बचकाने मोह के साथ हाथ में लिए घूमते हैं। वे यह भी नहीं जानते कि किसी चीज का अपना एक मूल्य, महत्व तथा समय होता है उसका अपना एक स्थान होता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 111
🔶 मनुष्य के व्यक्तित्व का विकास, विद्या, बुद्धि तथा आत्मा की उत्कृष्टता का अनुगामी है। व्यक्तित्व विकास के लिये कपड़ों लत्तों का सहारा लेना एक घातक फिजूलखर्ची है। इस प्रकार के सार्थक विचार विश्वास से ही नवयुवक वर्ग कुछ सोचने समझने में समर्थ हो सकेगा नहीं तो आधुनिकता के अपनाने में वह प्रदर्शन की मरु-मरीचिका में ही भटकता रहेगा।
🔷 आज किसी भी देश के नागरिकों के लिए किसी भी देश के द्वार बन्द नहीं हैं। सब जगह जा सकते हैं। किसी देश की कोई भी बात किसी से छिपी नहीं है। संसार के उन्नतिशील देशों के नागरिक जब भारत के निरक्षर लोगों को सूट, पैंट पहने और टाई, चश्मा लगाये देखते होंगे तो उनकी बालबुद्धि पर हंसते हुए क्या यह न कहते होंगे कि आज के सभ्य युग में भी भारतीय कितने असभ्य हैं कि वे पहनने ओढ़ने की आवश्यकता तथा चीजों के उपयोग का भी ज्ञान नहीं रखते। जब किसी प्रगतिशील देश वाले यहां के लोगों को फटी चप्पल, सिकुड़ी पेन्ट पहनने और हाथ में ट्रांजिस्टर लटका देखते होंगे तो क्या मन ही यह उपहास से न मान जाते होंगे कि भारतीय अत्यधिक महत्वपूर्ण उपयोग की चीज को भी खिलौना समझते हैं और कोई आवश्यकता न होने पर भी उसे बचकाने मोह के साथ हाथ में लिए घूमते हैं। वे यह भी नहीं जानते कि किसी चीज का अपना एक मूल्य, महत्व तथा समय होता है उसका अपना एक स्थान होता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 111

















































