🔶 ट्रांजिस्टर रेडियो तो आज के भारतीय नौजवानों का ‘बगल-बच्चा’ बन गया है। जिसे देखो, बैग की तरह लटकाये, झोले की तरह कन्धे पर डाले, पुस्तक की तरह हाथ में लिए अथवा किसी बड़े पूजा-पात्र की तरह दोनों हाथों में संभाले घूम रहा है, जब कि उनके पास उसका कोई उपयोग नहीं है। महज एक फैशन तथा दिखावा भर है। अन्य नागरिकों को तो छोड़ दीजिए न जाने कितने रिक्शे, तांगे वाले, ट्रांजिस्टर सेटों को अपने तांगों तथा रिक्शों में लटकाये दीखते हैं। इस प्रकार के बचकाने फैशन बनाने अथवा प्रदर्शनों में लोग कौन सा सौन्दर्य और कौन-सी विशेषता समझते हैं? उन्हें अपने तथा अपनी इन क्रियाओं के बीच असंगति का भी तो बोध होता नजर नहीं आता। वे यह बात तनिक भी तो अनुभव नहीं कर पाते कि उनका यह मूर्खतापूर्ण प्रदर्शन उनको उपहासास्पद बना देता है।
🔷 पहनावों तथा कपड़ों का फैशन तो आज पराकाष्ठा से भी आगे निकल गया है। कपड़ों की किस्मों की यदि आज सूची बनाई जाये तो वह एक बड़े पुराण से भी मोटा ग्रन्थ बन जायेगा और इससे भी मोटी वस्त्रों की सिलाई के प्रकारों की सूची बनेगी। आज शायद ही कोई ऐसा बदकिस्मत फूल अथवा फिल्म ऐक्टर-ऐक्ट्रैस हो। इतना ही नहीं साधु-सन्तों के रामनामी दुपट्टों की तरह अभिनेताओं के नामांकित कपड़े पहनने में लोग गौरव अनुभव करते हैं। फिल्मों के दृश्य तक आज नौजवानों के वस्त्रों पर अंकित देखे जा सकते हैं। जहां कभी अधिक से अधिक कपड़ों पर फूल-पत्तियां हंस, मयूरों अथवा पेड़ पौधों की छाप हुआ करती थी और जिनको भी भद्र लोग पसन्द नहीं करते थे, वहां आज अश्लील फिल्मों के अश्लील चित्र छपे दिखलाई देते हैं और नौजवान नागरिक उन्हें शौक से पहनते और शान समझते हैं। न जाने क्या हो गया है इस भारत को—भारत के नौजवान वर्ग को?
🔶 आज का भारतीय नौजवान यह क्यों नहीं सोच पाता कि उसका देश गरीब है, आज उसे उसकी फैशनपरस्ती की आवश्यकता नहीं है, उसे जरूरत है उसकी मेहनत, मशक्कत और परिश्रम-परिश्तिस की! उसे इस बात से आत्मग्लानि क्यों नहीं होती कि आज उसका अर्धनंगा भूखा राष्ट्र अन्य राष्ट्रों से अन्न की भीख मांग रहा है और वह इस प्रकार के फिजूलखर्च फैशन प्रदर्शन में अन्धा बना हुआ है! वह यह जानने समझने की कोशिश क्यों नहीं करता कि वह जिस देश का नागरिक है और जिसके उत्थान पतन का कुछ दायित्व उसके कन्धों पर भी है, उसकी औसत आय पांच-छः आना प्रति-दिन से अधिक नहीं है। आज उसके टूटी सड़कों और फूटे मकानों वाले देश में टेरालीन, डेकरौन और नाइलौन जैसे कपड़ों की क्या शोभा है? धूल उड़ाती गलियों और दुर्गन्धित बस्तियों के बीच उसके इन वस्त्रों की क्या संगति है?
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 110
🔷 पहनावों तथा कपड़ों का फैशन तो आज पराकाष्ठा से भी आगे निकल गया है। कपड़ों की किस्मों की यदि आज सूची बनाई जाये तो वह एक बड़े पुराण से भी मोटा ग्रन्थ बन जायेगा और इससे भी मोटी वस्त्रों की सिलाई के प्रकारों की सूची बनेगी। आज शायद ही कोई ऐसा बदकिस्मत फूल अथवा फिल्म ऐक्टर-ऐक्ट्रैस हो। इतना ही नहीं साधु-सन्तों के रामनामी दुपट्टों की तरह अभिनेताओं के नामांकित कपड़े पहनने में लोग गौरव अनुभव करते हैं। फिल्मों के दृश्य तक आज नौजवानों के वस्त्रों पर अंकित देखे जा सकते हैं। जहां कभी अधिक से अधिक कपड़ों पर फूल-पत्तियां हंस, मयूरों अथवा पेड़ पौधों की छाप हुआ करती थी और जिनको भी भद्र लोग पसन्द नहीं करते थे, वहां आज अश्लील फिल्मों के अश्लील चित्र छपे दिखलाई देते हैं और नौजवान नागरिक उन्हें शौक से पहनते और शान समझते हैं। न जाने क्या हो गया है इस भारत को—भारत के नौजवान वर्ग को?
🔶 आज का भारतीय नौजवान यह क्यों नहीं सोच पाता कि उसका देश गरीब है, आज उसे उसकी फैशनपरस्ती की आवश्यकता नहीं है, उसे जरूरत है उसकी मेहनत, मशक्कत और परिश्रम-परिश्तिस की! उसे इस बात से आत्मग्लानि क्यों नहीं होती कि आज उसका अर्धनंगा भूखा राष्ट्र अन्य राष्ट्रों से अन्न की भीख मांग रहा है और वह इस प्रकार के फिजूलखर्च फैशन प्रदर्शन में अन्धा बना हुआ है! वह यह जानने समझने की कोशिश क्यों नहीं करता कि वह जिस देश का नागरिक है और जिसके उत्थान पतन का कुछ दायित्व उसके कन्धों पर भी है, उसकी औसत आय पांच-छः आना प्रति-दिन से अधिक नहीं है। आज उसके टूटी सड़कों और फूटे मकानों वाले देश में टेरालीन, डेकरौन और नाइलौन जैसे कपड़ों की क्या शोभा है? धूल उड़ाती गलियों और दुर्गन्धित बस्तियों के बीच उसके इन वस्त्रों की क्या संगति है?
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 110
















































