गुरुवार, 23 अगस्त 2018

👉 Scientific Basis of Gayatri Mantra Japa (Part 2)

🔶 The extrasensory components like the sat cakras, upatyikas and the marvellous nerve network hidden in it are found to be like nuclei and canals of cosmic energy. Having the model of the limitless cosmos in its small structure makes the human body the supreme creation in the physical manifestation of Nature. Japa-sadhana is a scientific method devised by the Rishis to activate the extrasensory energy centers within to facilitate the sublime flow of vital spiritual currents in this majestic living system.

🔷 The japa of Divine Name or Mantras has been an integral part of all modes of worship or prayer in every religion be it Hindu, Sikh, Islam, Buddhist, Christian, Tao, Bahai, etc. As the specific pattern of controlled wind-flow through the holes of a flute produces specific sonorous tune, likewise, the vibrations induced by the repeated rhythmic chanting of a specific mantra generate specific pulsation of prana and stimulate the extrasensory energy nuclei in the body accordingly.

🔶 The japa- sadhana of mantras is therefore practiced to educe supernatural talents and potentials. The preeminence of the japa of Gayatri Mantra lies in its unique intellectual, emotional and spiritual effects in addition to other soul-elevating effects of mantra-japa. This mantra contains the essence of divine knowledge and wisdom. Even its literal translation implies a prayer for the refinement and illumination of our mind and intellect and for well-being of the world. This is why the Vedic Rishis revered Gayatri as  Vedmata, Devamata and Vishwamata (the origin of the Vedas, the Mother of godly-beings and the Mother of the whole world respectively). Not only the Hindu religion, but also the follower of other religions and paths of spiritual seeking revere this sacred mantra.

📖 Akhand Jyoti, Mar Apr 2003

👉 वर्तमान दुर्दशा क्यों? (अन्तिम भाग)

🔶 वर्तमान समय की चतुर्मुखी दुर्दशा का एक ही कारण “नैतिकता का पतन हो जाना है”। मन की वृत्तियों का स्वार्थ प्रधान हो जाना ही पाप है। यह पाप पिछली एक शताब्दी से तो बहुत अधिक मात्रा में बढ़ गया है। सच्चे धर्म का, हृदय की विशालता का, लोप हो रहा है उसके स्थान पर ‘मजहबी कर्म काण्डों’ को धर्म कहा जाने लगा है। नदी नालों में गोता लगाकर, तस्वीर खिलौनों के दर्शन करके, किसी पुस्तक के पन्ने रट देने, तिलक छाप लगा लेने, शिर मुड़ा लेने, दाढ़ी रखा लेने, खड़ाऊ पहनने, सात बार आचमन कर लेने, तेरह बार हाथ माँज लेने या ऐसे ही किसी अन्य कर्मकाण्ड को करने वाले लोग धर्मध्वजी समझे जाते हैं, चाहे उनके आचरण और विचार कैसे ही क्यों न हों।

🔷 वेशभूषा और साम्प्रदायिक कर्मकाण्डों के आधार पर धर्म की विवेचना होना इस बात का द्योतक है कि सच्चे धर्म की तो जानकारी भी लोगों को नहीं रही, धर्म के स्थान पर पाखंड विराजमान हो गया, ईश्वर के स्थान पर शैतान की पूजा होने लगी। आज जो मनुष्य जितना धर्मात्मा बनने का ढोंग रचता है परीक्षा करने पर उसका हृदय उतनी ही मात्रा में अनुदारता, निर्दयता, कपट, असत्य, घमंड और स्वार्थ रूपी पापों से भरा पूरा मिलता है। ढोंग के लिए करोड़ों रुपये पानी की तरह बहते दिखाई देते हैं पर सच्चे धर्म के लिए कोई कौड़ियाँ भी लगाने को तत्पर नहीं होता। यह सब परिस्थितियाँ बताती हैं कि मानव जाति से धर्म का लोप बहुत बड़ी मात्रा में हो गया है। पाखंड की आड़ में अधर्म का साम्राज्य छाया हुआ है ऐसी दशा में पाप की दुर्गन्ध से अदृश्य लोकों का गंदा होना और उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप इन कष्ट क्लेशों का आना कुछ आश्चर्य की बात नहीं है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 महायोगी अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति, जनवरी 1943 पृष्ठ 6
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1.6

👉 परिशोधन प्रगति का प्रथम चरण

🔶 पत्थर का कोयला एक विशेष स्तर पर पहुँचकर हीरे की उपमा पा लेता है। यों उसका अनगढ़ प्रयोग करने वाले अँगीठी में जलाकर भी कमरे में रख लेते हैं और भोर होने से पूर्व ही विषैली गैस के कारण मर चुके होते हैैं। जबकि हीरा उपलब्ध करने वाले सुसम्पन्न भाग्यवान बनते हैं। लोहा, रांगा, सीसा, अभ्रक जैसे सामान्य खनिजों काबजारू मूल्य तुच्छ होता है, पर उन्हें जब भस्म रासायन बनाकर ग्रहण किया जाता है, तो वे संजीवनी बूटी का काम करते और मंहगे मूल्य पर बिकते हैं। पीने का पानी भाप बनाकर जब डिस्टिल्ड वाटर बना लिया जाता है, तब उसकी गणना औषधियों में होती है, उसे कई रासायनिक क्रियाओं एवं सम्मिश्रणों में प्रयुक्त किया जाता है।

🔷 मानव समुदाय पर भी यही बात लागू होती है। वे भी यों तो गलीकूचों में भीड़ लगाते और गंदगी फैलाते देखे जाते हैं, पर उन्हें सुसंस्कारिता की साधना द्वारा महान् बना लिया जाता है, तो फिर वे ऋषि- देवता कहाते और अपनी नाव पर चढ़ाकर असंख्यों को पार करते हैं। यह स्तर को निखारने और ऊँचा उठाने की महत्ता है कि निरुपयोगी धूलि भी इस विशेष प्रक्रिया से गुजरने के उपरान्त अणु शक्ति बनती और अपनी प्रचण्ड क्षमता का परिचय देती है।

🔶 हर व्यक्ति जन्मता तो साधारण मनुष्य के रूप में ही है। कालान्तर में उसकी जीवन साधना ही उसे वह श्रेय दिलाती है, जिसे मानवी गरिमा के अनुरूप माना जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जन्म- जन्मान्तरों के संस्कारों की  अपनी महत्ता है। वे प्रसुप्त बीजांकुरों के रूप में विद्यमान तो रहते हैं,पर जो उन्हें कुरेदता- उभारता है, वह निश्चित ही अपनी स्थिति से ऊंचा उठते हुए महामानव का पद पाता है। अपना परिशोधन, तप- प्रक्रिया द्वारा संस्कारीकरण तथा साधना उत्पादनों के माध्यम से भाव संस्थान का उदात्तीकरण ही वे सोपान हैं, जिन्हें पार करते हुए यह पद प्राप्त होता है। किसी समझौते की इसमें कोई गुंजायश नहीं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 22 अगस्त 2018

👉 मनुष्य की पहचान

🔷 स्वामी विवेकानन्द जब अमेरिका की एक सड़क पर से गुजर रहे थे तो उनकी विचित्र वेशभूषा को देखकर लोग उन्हें मूर्ख समझने और मजाक बनाने लगे। अपने पीछे आती हुई भीड़ के सम्मुख स्वामी जी रुके और उनने पीछे मुड़कर कहा-सज्जनों मेरी वेषभूषा को देखकर आश्चर्य मत करो। आपके देश में सभ्यता की कसौटी पोशाक है। पर मैं जिस देश से आया हूँ वहाँ कपड़ों से नहीं मनुष्य की पहचान उसके चरित्र से होती है।

👉 लोकसेवा का आदर्श

🔷 कुछ पत्रकारों को डा० श्यामाप्रसाद मुखर्जी से भेंट करनी थी। स्टेशन पर पहुँचे। जब उन्होंने डाक्टर साहब को तीसरी श्रेणी के डिब्बे में यात्रा करते देखा, तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। एक पत्रकार तो उस विस्मय को छिपा नहीं सका और डा० मुखर्जी से पूछ ही बैठा- ''आप संभवत: जीवन में पहली बार तीसरी श्रेणी में यात्रा कर रहे है ?"

🔶 ''नहीं, मैं अक्सर इसी में यात्रा करता हूँ ''-डा० मुखर्जी ने उत्तर दिया-''आप जानते हैं कि हमारी संस्था निर्धन है। इस बचत से संस्था को अन्य आवश्यक काम चलाने में सहायता मिलती है।'' पत्रकार मुखर्जी की इस सहज सादगी से बड़े प्रभावित हुए। इस घटना में ही लोक-सेवक का सच्चा आदर्श, सच्चा मर्म छुपा पड़ा है। भक्त आराध्य भगवान से कभी ऊपर नहीं बैठता। तो फिर जनता को जनार्दन मानकर उसकी सेवा-साधना में निरत साधक को ही क्यों स्वयं  को जनता से अलग और पृथक वर्ग मानना चाहिए।

📖 प्रज्ञा पुराण से

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 22 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन 22 Aug 2018

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 34)

👉 बड़े कामों के लिए वरिष्ठ प्रतिभाएँ

🔷 इन दिनों अनौचित्य की बाढ़ को रोकने और दलदल को मधुवन बनाने जैसी समय की चुनौती सामने है। विनाश के तांडव को रोकना और विकास का उल्लास भरा सरंजाम जुटाना ऐसा ही है, जैसे-खाई को पाटना भर ही नहीं, वरन् उस स्थान पर ऊँची मीनार खड़ी करने जैसा दुहरा पराक्रम। इस प्रवाह को पलटना ही नहीं, उलटे को उलटकर सीधा करना भी कह सकते हैं। यों मनुष्य ही असंभव को संभव कर दिखाते रहे हैं, पर उसके लिए कटिबद्ध होना ही नहीं अपने को क्षमता संपन्न सिद्ध करके दिखाना दुहरे पराक्रम का काम है। युग परिवर्तन की इस विषम वेला में ऐसा ही कुछ बन पड़ने की आवश्यकता है, जैसा कि अंधकार से भरी तमिस्रा का स्वर्णिम आभा वाले अरुणोदय के साथ जुड़ना इति और अथ का समन्वित संधिकाल यदाकदा ही आता है। इसकी प्रतीक्षा युग-युगान्तरों तक करनी पड़ती है, इन दिनों ऐसा ही कुछ होने जा रहा है।
  
🔶 विभीषिकाओं का घटाटोप हर दिशा में गर्जन-तर्जन करता देखा जा सकता है। जो चल रहा है, उससे विपत्तियों का संकेत ही मिलता है। दुर्बुद्धि ने चरम सीमा तक पहुँचकर ऐसी संभावना प्रस्तुत कर दी है, जिसे बुरे किस्म की दुर्गति ही कह सकते हैं। प्रवाह को और अधिक उत्तेजित कर देना सरल है, पर उसे उलटकर सृजन की दिशा में योजनाबद्ध रूप से नियोजित कर सकना ऐसा है, जिसकी आशा विश्वकर्माओं से ही की जा सकती है। उन्हीं के लिए दसों दिशाओं से पुकार उठ रही है। उन्हीं को खोज निकालने या नये सिरे से ढालने के लिए समय मचल रहा है। बड़े काम आखिर बड़ों के बिना कर ही कौन सकेगा?
  
🔷 प्रश्न, क्षेत्र विशेष की परिस्थितियों से निपटने का नहीं है और न समुदाय विशेष से निपटने का। अभावों को दूर करने का भी नहीं है और न साधन जुटाने की अनिवार्यता जैसा। अति कठिन कार्य सामने यह है कि संसार भर के मानव समुदाय पर छाई हुई विचार विकृति का परिशोधन किस प्रकार किया जाय? यह कार्य लेखनी, वाणी एवं प्रचार माध्यमों से भी एक सीमा तक ही हो सकता है, सो भी बड़ी मंदगति से, जबकि आवश्यकता इस बात की है कि लोकचिंतन में गहराई तक घुसी हुई भ्रष्टता से कैसे निपटा जाए और उसके फलस्वरूप जो दुराचरण का सिलसिला चल पड़ा है, उसके उद्गम को बंद कैसे किया जाय?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 44

👉 Scientific Basis of Gayatri Mantra Japa

🔷 The entire Vedic Literature and the sages and savants of the shastric scriptures have given paramount importance to the Gayatri Mantra and have discussed in detail the methods of the japa and sadhana of this great mantra. There is no scripture, which does not sing paeans of the preeminent benefits and supramental effects of this mantra that encompass the personal, global and the cosmic realms of existence. It is said that even if one performs the japa and dhyan (meditation) of this mantra with fervent faith without going through all the prescribed ascetic disciplines of higher-level sadhanas, he attains all the blessings and boons of this mantra.

🔶 Not only the immanent inspirations and the marvellous configuration of specific syllables and sonic patterns, the psychological and spiritual core of this Vedic Mantra is also so sound that it appears to be founded on profound scientific basis. Let us look at some of these aspects to understand the impact of its japa. The amazing structure, functions and complexity of the human body has been the center of deep attention for thousands of scientists, biologists, anatomists and physiologists since long.

🔷 Still a lot remains unknown, especially the body is fine network of nerves, molecular functions, endocrine system and the brain. In comparison, what has been experienced and known about the human body and brain by rigorous yoga-sadhanas seems to be more thorough and significant. In the deep state of trance through devout yoga sadhanas, the Rishis, the yogis of the Vedic times, had found this body a miniature reflection of the entire cosmos, as mentioned in the quote - "Yat Brahmande Tat Pinde".

📖 Akhand Jyoti, Mar Apr 2003

👉 वर्तमान दुर्दशा क्यों? (भाग 4)

🔷 भारतीय शास्त्र चिल्ला चिल्ला कर बताते हैं कि आपत्तियों का कारण अधर्म है। हम देखते हैं कि पिछली शताब्दियों में नैतिकता का स्तर जितना नीचा घटा है उतना सृष्टि के आदि से लेकर पहले कभी नहीं घटा था। इन दिनों बुद्धिबल से, यान्त्रिक शक्ति से, छल प्रबन्ध से, स्वार्थ साधना का ही विशेष ध्यान रखा गया। लूट खसोट की प्रधानता रही। पहले शत्रु के लिए भी उसके चरित्र को नष्ट करने के षड़यंत्र नहीं रचे जाते थे पर इस युग में निर्बल शक्ति वालों को नैतिकता से भी गिरा देने का बुद्धिमान लोगों ने प्रयत्न किया, ताकि वे लोग असत् आचरण के कारण द्वेष, कलह, अशान्ति एवं कुविचारों में उलझे रहें और हमें लूट खसोट का अच्छा अवसर हाथ लगता रहे।

🔶 जब मनुष्यों के मन में सद्वृत्तियाँ रहती हैं तो उनकी सुगंध से दिव्यलोक भरापूरा रहता है और जैसे यज्ञ की सुगंधि से अच्छी वर्षा, अच्छी अन्नोत्पत्ति होती है वैसे ही जनता की सत् भावनाओं के फलस्वरूप ईश्वरी कृपा की- सुख शान्ति की वर्षा होती है। यदि लोगों के हृदय कपट, पाखंड, द्वेष, छल आदि दुर्भावों से भरे रहें तो उससे अदृश्य लोक एक प्रकार की आध्यात्मिक दुर्गन्ध से भर जाते हैं जैसे वायु के दूषित, दुर्गन्धित होने से हैजा आदि बीमारियाँ फैलती हैं वैसे ही पाप वृत्तियों के कारण सूक्ष्म लोकों का वातावरण गंदा हो जाने से युद्ध, महामारी, दारिद्र, अर्थ संकट, दैवी प्रकोप आदि उपद्रवों का आविर्भाव होता है।

🔷 संसार की सुख शान्ति इस बात के ऊपर निर्भर है कि प्रेम, दया, सहानुभूति, उदारता और न्याय का व्यवहार अन्य लोगों के साथ किया जावे, जब इस प्रकार के विचार और व्यवहार की अधिकता होती है तो संसार में ईश्वरीय कृपा के सुन्दर आनन्ददायक परिणाम दिखाई पड़ते हैं सब लोग सुख शान्ति के साथ प्रफुल्लता मय जीवन बिताते हैं, किन्तु जब स्वार्थ लिप्सा में अन्धे होकर मनुष्य एक दूसरे को नीचा दिखाने के प्रयत्न करते हैं तो उसके दुर्गन्धित धुँए से सबका दम घुटने लगता हैं विपत्ति, आपदा और कष्टों के पहाड़ चारों ओर से टूटने लगते हैं। दुख दारिद्र का नंगा नाच होने लगता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 महायोगी अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति, जनवरी 1943 पृष्ठ 5
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1.5

👉 हमारी चेतावनी को अनदेखा न करें

🔷 भले ही लोग सफल नहीं हो पा रहे हैं पर सोच और कर यही रहे हैं कि वे किसी प्रकार अपनी वर्तमान सम्पत्ति को जितना अधिक बढ़ा सकें, दिखा सकें उसकी उधेड़ बुन में जुटे रहें। यह मार्ग निरर्थक है। आज की सबसे बड़ी बुद्धिमानी यह है कि किसी प्रकार गुजारे की बात सोची जाए। परिवार के भरण-पोषण भर के साधन जुटाये जायें और जो जमा पूँजी पास है उसे लोकोपयोगी कार्य में लगा दिया जाए। जिनके पास नहीं है वे इस तरह की निरर्थक मूर्खता में अपनी शक्ति नष्ट न करें। जिनके पास गुजारे भर के लिए पैतृक साधन मौजूद हैं, जो उसी पूँजी के बल पर अपने वर्तमान परिवार को जीवित रख सकते हैं वे वैसी व्यवस्था बना कर निश्चित हो जायें और अपना मस्तिष्क तथा समय उस कार्य में लगायें, जिसमें संलग्न होना परमात्मा को सबसे अधिक प्रिय लग सकता है।

🔶 जो जितना समय बचा सकता है वह उसका अधिकाधिक भाग नव-निर्माण जैसे इस समय के सर्वोपरि पुण्य परमार्थ में लगाने के लिये तैयार हो जाए। समय ही मनुष्य की व्यक्तिगत पूँजी है, श्रम ही उसका सच्चा धर्म है। इसी धन को परमार्थ में लगाने से मनुष्य के अन्तःकरण में उत्कृष्टता के संस्कार परिपक्व होते हैं। धन वस्तुतः समाज एवं राष्ट्र की सम्पत्ति है। उसे व्यक्तिगत समझना एक पाप एवं अपराध है। जमा पूँजी में से जितना अधिक दान किया जाए वह तो प्रायश्चित मात्र है। सौ रुपये की चोरी करके कोई पाँच रुपये दान कर दें तो वह तो एक हल्का सा प्रायश्चित ही हुआ। मनुष्य को अपरिग्रही होना चाहिए। इधर कमाता और उधर अच्छे कर्मों में खर्च करता रहे यही भलमनसाहत का तरीका है। जिसने जमा कर लिया उसने बच्चों को दुर्गुणी बनाने का पथ प्रशस्त किया और अपने को लोभ-मोह के माया बंधनों में बाँधा। इस भूल का जो जितना प्रायश्चित कर ले, जमा पूँजी को सत्कार्य में लगा दे उतना उत्तम है। प्रायश्चित से पाप का कुछ तो भार हल्का होता ही है। पुण्य परमार्थ तो निजी पूँजी से होता है। वह निजी पूँजी है- समय और श्रम। जिसका व्यक्तिगत श्रम और समय परमार्थ कार्यों में लगा समझना चाहिए कि उसने उतना ही अपना अन्तरात्मा निर्मल एवं सशक्त बनाने का लाभ ले लिया।

🔷 परमार्थ प्रयोजनों के लिये समय का अभाव केवल एक ही कारण से रहता है कि मनुष्य तुच्छ स्वार्थों को सर्वोत्तम समझता है और उन्हीं की पूर्ति को प्रमुखता देता है। जो कार्य बेकार लगेगा उसी के लिये समय न बचेगा। परमार्थ को बेकार की बात माना जायेगा तो उसके लिये समय कहाँ से बचेगा? भगवान की युग की पुकार को उपेक्षणीय माना जायेगा तो उसके लिए श्रम या धन खर्च करने की सुविधा कहाँ रह जायेगी? अपनी आत्मा को मिथ्या प्रवंचनाओं से नहीं ठगना चाहिए। समय,श्रम या धन न बचने का बहाना नहीं बनाना चाहिए। प्रबुद्ध, विवेकशील एवं जागृत आत्माओं से परमेश्वर कुछ बड़ी आशा करता है। उसी के अनुरूप हमें अपनी गतिविधियों को मोड़ना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च 1967 पृष्ठ 34, 35
http://literature.awgp.org/hindi/akhandjyoti/1967/March/v1.34

मंगलवार, 21 अगस्त 2018

👉 सुखी कैसे हो

🔶 “स्वार्थी और धनी आदमियों की समझ में न आने वाली एक सबसे रहस्यमयी गुत्थी यह है कि जहाँ उन्होंने सुख पाने की आशा की थी, वहाँ उन्हें सुख क्यों नहीं मिला? धन-दौलत पैदा कर लेने वाले लोगों के सामने जो सबसे बड़ी निराशा आई हैं, वह यह है कि अपनी दौलत से उन्हें जिस सुख की आशा थी, वह या उससे मिलती -जुलती चीज भी उन्हें नहीं मिली। वे देखते है कि भौतिक वस्तुओं से भावनाओं की संतुष्टि नहीं होती, और बड़ी से बड़ी सुख सामग्री के बीच भी हृदय भूखा रहता है। वे देखते है कि धन बहुत से कार्य कर सकता है, पर हृदय की लालसा और हृदय की भूख को तृप्त करने की इसमें कुछ भी शक्ति नहीं हैं। मैं अपनी मेहनत से ऊँचे उठे हुए एक आदमी को जानता हूँ जिसने बड़ी दौलत कमाई थी। उसने मुझे बताया कि मेरे जीवन की सबसे बड़ी पहेली और निराश यह है कि यद्यपि मैंने लाखों कमाये, पर मैं सुखी नहीं हूँ। वास्तव में कोई भी स्वार्थी जीवन कभी सुखी नहीं हो सकता।”

~ स्वेट मार्डन

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 33)

👉 बड़े कामों के लिए वरिष्ठ प्रतिभाएँ

🔶 मजबूत किलों को बिस्मार करने के लिए अष्टधातु की तोपों की गोलाबारी ही काम आती है। पहाड़ों को समतल बनाने के लिए डायनामाइट की सुरंगों का प्रयोग करना पड़ता है। रेल के डिब्बे पटरी से उतर जाने पर उन्हें उठाने के लिए बड़ी ताकत वाली क्रेन ही अभीष्ट उद्देश्य पूरा कर सकती है। कठिन मोरचे जीतने के लिए प्रवीण-पारंगत दुस्साहसी सेनापति ही विजय वरण करते हैं। ऐसे बड़े कामों के लिए छिटपुट साधनों का उपयोग तो निरर्थक ही होता है।
  
🔷 तलवार का वार सहने के लिए गैंडे की खाल वाली ढाल चाहिए। सहस्रों टन भार लाद ले जाने वाले जलयान जो काम करते हैं, वह छोटी डोंगियों से नहीं लिया जा सकता। भयंकर अग्निकांड से निपटने के लिए, बड़े आकार वाले फायर ब्रिगेड चाहिए। उबड़-खाबड़ क्षेत्रों को समतल बनाने के लिए बुलडोजरों से कम में काम नहीं चलता। दलदल में फँसे हाथी को उससे भी बड़े आकार वाला गजराज ही खींचकर किनारे पर लगाता है। नये नगरों और बड़े बाँधों के नक्शे, सूझ-बूझ वाले वरिष्ठ इंजीनियर ही बनाकर देते हैं।
  
🔶 बड़े कामों का दायित्व उठाने और उन्हें करने की जिम्मेदारी असाधारण क्षमता संपन्नों को ही सौंपी जाती है। यों महत्त्व तो टट्टुओं और बकरों का भी है, पर उनकी पीठ पर हाथी बाली अंबारी नहीं रखी जा सकती। सौ खरगोश मिलकर भी एक चीते से दौड़ में आगे नहीं निकल सकते। बड़े कामों के लिए बड़ों की तलाश करनी पड़ती है।

🔷 इन दिनों बड़ी उथल-पुथल होने जा रही है। शताब्दियों से संचित सड़ाँध भरे कचरे को हटाया और ठिकाने लगाया जाना है। कँटीली झाड़ियों वाले जंगल के स्थान पर सुरम्य उद्यान खड़े करना सहज काम नहीं है। धूल भरे, लावे जैसे जलते रेगिस्तान को भी लोगों ने लहलहाती हरियाली से सुरम्य बनाया है, पर इसके लिए पैनी सूझ-बूझ का परिचय देने और विपुल साधन जुटाने की आवश्यकता पड़ती है। समुद्र को छलांगने और संजीवनी बूटी वाला पर्वत उखाड़कर लाने का चमत्कार हनुमान् ही प्रस्तुत कर सके थे। हर वानर ऐसा दुस्साहस कर दिखाने की हिम्मत नहीं कर सकता। असुरता का व्यापक साम्राज्य ध्वस्त करने और उसके स्थान पर सतयुगी रामराज्य का वातावरण बनाने के लिए बड़ों की बड़ी योजना और उपयुक्त साधन जुटाने की क्षमता ही उद्देश्य पूरा कर सकी थी। ऐसी आशा साधारण जन से नहीं की जा सकती। समुद्र सोखने की चुनौती अगस्त्य ही स्वीकार कर सकते थे। 

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 43

👉 Freedom of choice - A basic human characteristic

🔶 Human being is endowed with basic freedom of choice. Nature provides him with a variety of options to choose from. It is up to him to exercise this God-given gift either positively or negatively. Thus, he is the maker of his own destiny. This fundamental freedom is a great boon to the human race. However, if used negatively, it can also turn into a bane. It is sad to say that for the vast majority, this freedom proves to be a bane, because they choose to misuse this freedom for destructive rather than constructive purposes. Destruction is far more easier than creation.

🔷 What can be easier than ruining oneself? In fact, doing nothing in the direction of self-upliftment in itself amounts to self-destruction. One who is not consciously progressing in soul-growth, is knowingly or unknowingly sliding down the scale of consciousness into the dungeon of darkness. Once a point was raised in the Satsang-Sabh of Maharshi Raman.

🔶 Some people were saying that a human being is superior most amongst all the creatures, while some others were arguing that a human being is worse than the animals, because sometimes conduct of animals appears to be far nobler than that of humans. Both the sides requested the Maharshi to elucidate. Maharshi said -"The truth is that a human being is a combination of mortal body and immortal consciousness. The one who follows the body and its cravings goes on groping in the darkness and the one who investigates the inner realms of consciousness, ultimately realizes the Supreme Consciousness and thus his real self." This is the Eternal Truth.

📖 Akhand Jyoti, Mar Apr 2003

👉 वर्तमान दुर्दशा क्यों? (भाग 3)

🔶 यह एक तथ्य है कि किसी व्यक्ति द्वारा किये हुए भले या बुरे कर्म का कुछ भाग उस परिवार के अन्य व्यक्तियों को भी मिलता है। घर का एक व्यक्ति कोई भला काम करे तो उस परिवार के सब लोग अभिमान अनुभव करते हैं और आदर पाते हैं। यदि घर का एक व्यक्ति बुरा काम करता है तो सारे कुटुम्ब को लज्जित होना पड़ता है। एक समय ब्राह्मण लोगों ने बड़े उत्तम ज्ञान का प्रसार करके जनता की सेवा की थी। उनकी सैंकड़ों पीढ़ी के बाद भी आज ब्राह्मणों के गुणों से हीन होने पर भी उनका आदर होता है और वे अभिमानपूर्वक ऋषि मुनियों की संतान कह कर अपना गौरव प्रकट करते हैं।

🔷 ऋषियों का शरीर छूटे हजारों वर्ष हो गये तो भी उनकी संतान उन पूर्वजों के पुण्य का फल, दान दक्षिणा के रूप में अब तक भोग रही हैं। बुरे कर्म करने वालों के कुटुम्बियों और वंशजों को भी इसी प्रकार लज्जित होना पड़ता है। भारत में कुछ कौमें “जरायम पेशा” लिखी जाती हैं। इन कौमों के लोग चोरी आदि अपराध करते हैं। उनमें से जो अपराध नहीं करते वे भी ‘जरायम पेशा” समझे जाते हैं और पुलिस की निगरानी उन पर भी रहती है। सम्मिलित रहने वालों की सम्मिलित जिम्मेदारी भी होती है। वे आपस में एक दूसरे के पाप पुण्य के भागीदार भी होते हैं।

🔶 आजकल समस्त संसार पर जो चतुर्मुखी आपत्तियाँ आई हुई हैं उसका कारण भी यही सम्मिलित जिम्मेदारी है। पूर्वकाल में परिवारों के दायरे छोटे थे इसलिए वहाँ विपत्तियाँ भी थोड़े ही पैमाने पर आती थी। अब सारी दुनिया एक सूत्र में बँधी है तो उसका यह कर्तव्य भी बढ़ गया है कि समस्त देशों में धर्म की वृद्धि और अधर्म का निवारण करने का प्रयत्न करें।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 महायोगी अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति, जनवरी 1943 पृष्ठ 5
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1.5

👉 हमारे विचारों और अद्भुत प्रभाव (अन्तिम भाग)

🔶 इसके विपरीत हम जितना अधिक स्वार्थ त्याग और पर उपकार के विचारों का केन्द्र अपने अन्दर बनाते जायेंगे, उतना ही अधिक हम आनन्द और शाँति को प्राप्त होंगे। जो लोग हमसे किसी प्रकार का फायदा उठाते हैं वह ही गुप्त और प्रकट रूप से हमारा कल्याण करने वाले होते हैं। हमें ऐसी तैयारी कर लेनी चाहिये कि हम मन, कर्म, वचन से हर समय दूसरों का भला ही सोचते रहें-ऐसा करने से निश्चय हमारे बुरा चाहने वालों की संख्या कम होकर हमारा भला चाहने वालों की संख्या अधिक हो जाएगी और हम अपने चारों ओर सुखद और शान्तिपूर्ण वातावरण बना सकेंगे। जब मनुष्य का मन क्रोध ईर्ष्यादि बुरे विचारों से रहित हो जाता है तो वह असीम दैवी शक्ति को धारण कर लेता है- उस समय अनेक शत्रु होने पर भी वे उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते।

🔷 इस प्रकार का अद्भुत शान्तिपूर्ण जीवन बनाने में हमें उन घड़ियों में विशेष सतर्कता पूर्वक धैर्य से काम लेने की जरूरत है। जब कि किसी प्राणी द्वारा हमें हानि पहुँचाई जा रही हो। आध्यात्मिक जीवन में यह समय ही-परीक्षा का समय होता है। भरपूर साहस और दृढ़ता से हमें-ऐसे विचारों को हटाने में असीम शक्ति से काम लेना चाहिये जो उस समय में दूसरों का अकल्याण चाहने को हमारे मन में आते हैं। ऐसे समय में हम मन से उनका अकल्याण न चाहें, पर हाँ! कर्तव्य द्वारा उसका उत्तर देना कोई बुरा नहीं है।

🔶 वास्तव में निष्कपट और सरल हृदय वाले व्यक्ति उत्तम लौकिक और पारलौकिक सुखों के स्वामी होते हैं। दगा फरेब, झूठ, ईर्ष्यादि बुरे विचारों से काम चलाने वाले अल्पकालीन तुच्छ सुखों को प्राप्त होते हैं।

🔷 अतएव मन, कार्य, वाणी से सदैव दूसरों का हित ही विचारना और करना चाहिये और प्रातःकाल बिस्तर त्यागते समय प्रभु का नाम स्मरण करने के बाद इस मन्त्र को भी एक बार अवश्य उच्चारण कीजिये कि- “हे प्रभु! संसार के सभी प्राणियों का कल्याण हो।”

.... समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1943 पृष्ठ 8
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/February/v1.8

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन 21 Aug 2018


👉 अहंकार सत्कर्म का भी बुरा।

🔶 एक बार एक स्त्री पहाड़ पर धान काट रही थी। इतने में एक दुष्ट मनुष्य उधर आया और उसके साथ दुष्टता करने पर उतारू हो गया। पहले तो स्त्री ने आत्मा रक्षा के लिए लड़ाई झगड़ा किया पर शरीर से दुर्बल होने के कारण जब उसे विपत्ति आती दिखी तो पहाड़ से नीचे कूद पड़ी। ईश्वर ने उसकी रक्षा की। उसे जरा भी चोट न लगी और प्रसन्नता पूर्वक घर चली गई।

🔷 अब उसे अपने पतिव्रत का अभिमान हो गया। हर किसी से शेखी मारती कि मैं ऐसी सतवन्ती हूँ कि पहाड़ से गिरने पर भी मेरे चोट नहीं लगती। पड़ोसी इस बात पर अविश्वास करने लगे और कहा ऐसा ही है तो चल हमें आँखों के सामने पहाड़ पर से कूद कर दिखा। दूसरे दिन उस स्त्री ने सारे नगर में मुनादी करा दी कि आज मैं पहाड़ पर से कूदकर अपने सतवन्ती होने को परिचय दूँगी। सभी गाँव इकट्ठा हो गया और उसके साथ चल पड़ा। वह पहाड़ पर से कूदी तो उसकी एक टाँग टूट गई। मरते मरते मुश्किल से बची।

🔵 उस असफलता पर उसे बड़ा दुःख हुआ। और दिन रात खिन्न रहने लगी। उधर से एक ज्ञानी पुरुष निकले तो स्त्री ने अपनी इस असफलता का कारण पूछा। उन्होंने बताया कि पहली बार तू धर्म की रक्षा के लिए कूदी थी, इसलिए धर्म ने तेरी रक्षा की। दूसरी बार तू अपनी प्रशंसा दिखाने और अभिमान प्रकट करने के उद्देश्य से कूदी तो उस यश कामना और अभिमान ने तेरा पैर तोड़ दिया।

🔶 स्त्री की अपनी भूल मालूम हुई और उसने पश्चाताप करके अपनी मानसिक दुर्बलता को छोड़ दिया।

📖 अखण्ड ज्योति मई 1961 पृष्ठ 25
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/May/v1.25

सोमवार, 20 अगस्त 2018

👉 आत्म निरीक्षण

🔷 “परमात्मा ने हमें बुद्धि दी है सोचने के लिये; इन्द्रियाँ दी है निरीक्षण के लिये। हमें भली प्रकार निरीक्षण कर वस्तुओं के गुण-दोष समझकर तर्क द्वारा ही सच्चाई की खोज करनी चाहिये। यही हमारा ब्रह्मास्त्र है। देशकाल के अनुसार परिस्थितियाँ बदल जाती है, नई बातें पुरानी हो जाती है। कोई बात नई या पुरानी होने से लाभदायक नहीं होती, बुद्धि से सिद्ध किया हुआ उसका उपयोग ही उसे व्यवहार के योग्य बनाता है।”

सन्त सुकरात

👉 देने वाला कौन?

🔷 एक लकड़हारा रात-दिन लकड़ियां काटता, मगर कठोर परिश्रम के बावजूद उसे आधा पेट भोजन ही मिल पाता था। एक दिन उसकी मुलाकात एक साधु से हुई। लकड़हारे ने साधु से कहा कि जब भी आपकी प्रभु से मुलाकात हो जाए, मेरी एक फरियाद उनके सामने रखना और मेरे कष्ट का कारण पूछना।

🔶 कुछ दिनों बाद उसे वह साधु फिर मिला। लकड़हारे ने उसे अपनी फरियाद की याद दिलाई तो साधु ने कहा कि- प्रभु ने बताया हैं कि लकड़हारे की आयु 60 वर्ष हैं और उसके भाग्य में पूरे जीवन के लिए सिर्फ पाँच बोरी अनाज हैं, इसलिए प्रभु उसे थोड़ा अनाज ही देते हैं ताकि वह 60 वर्ष तक जीवित रह सके।

🔷 समय बीता। साधु उस लकड़हारे को फिर मिला तो लकड़हारे ने कहा---ऋषिवर...!! अब जब भी आपकी प्रभु से बात हो तो मेरी यह फरियाद उन तक पहुँचा देना कि वह मेरे जीवन का सारा अनाज एक साथ दे दें, ताकि कम से कम एक दिन तो मैं भरपेट भोजन कर सकूं।

🔶 अगले दिन साधु ने कुछ ऐसा किया कि लकड़हारे के घर ढ़ेर सारा अनाज पहुँच गया। लकड़हारे ने समझा कि प्रभु ने उसकी फरियाद कबूल कर उसे उसका सारा हिस्सा भेज दिया हैं। उसने बिना कल की चिंता किए, सारे अनाज का भोजन बनाकर फकीरों और भूखों को खिला दिया और खुद भी भरपेट खाया।

🔷 लेकिन अगली सुबह उठने पर उसने देखा कि उतना ही अनाज उसके घर फिर पहुंच गया हैं। उसने फिर गरीबों को खिला दिया। फिर उसका भंडार भर गया। यह सिलसिला रोज-रोज चल पड़ा और लकड़हारा लकड़ियां काटने की जगह गरीबों को खाना खिलाने में व्यस्त रहने लगा।

🔶 कुछ दिन बाद वह साधु फिर लकड़हारे को मिला तो लकड़हारे ने कहा---ऋषिवर ! आप तो कहते थे कि मेरे जीवन में सिर्फ पाँच बोरी अनाज हैं, लेकिन अब तो हर दिन मेरे घर पाँच बोरी अनाज आ जाता हैं।

🔷 साधु ने समझाया, तुमने अपने जीवन की परवाह ना करते हुए अपने हिस्से का अनाज गरीब व भूखों को खिला दिया, इसीलिए प्रभु अब उन गरीबों के हिस्से का अनाज तुम्हें दे रहे हैं।

🔶 कथासार- किसी को भी कुछ भी देने की शक्ति हम में है ही नहीं, हम देते वक्त ये सोचते हैं, की जिसको कुछ दिया तो ये मैंने दिया!

🔷 दान, वस्तु, ज्ञान, यहाँ तक की अपने बच्चों को भी कुछ देते दिलाते हैं तो कहते हैं मैंने दिलाया। वास्तविकता ये है कि वो उनका अपना है आप को सिर्फ परमात्मा ने निहित मात्र बनाया हैं उन तक उनकी जरूरतों तक पहुचाने के लिये तो निहित होने का घमंड कैसा ??

🔶 दान किए से जाए दुःख, दूर होएं सब पाप, प्रभु आकर द्वार पे, दूर करें संताप!!

👉 आज का सद्चिंतन 20 Aug 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 August 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 32)

👉 प्रतिभा के बीजांकुर हर किसी में विद्यमान हैं

🔷 अर्जुन ने पाताल से गंगा उभारकर भीष्म को ताजा जल पिलाया था। भीष्म भी कुछ कम न थे। शर शैया पर पड़े हुए असह्य वेदना सहते हुए भी उन्होंने मौत से कह दिया था कि अभी मरने की फुरसत नहीं है। वह लौट गई और तब आई जब उत्तरायण सूर्य में उन्होंने चलने का मुहूर्त निश्चित किया था। मनस्वी के आगे नियति भी पानी भरती है। सावित्री ने यमराज के हाथों से अपने मृत पति को जीवित करा, वापस लौटा लिया था। दमयंती के नेत्र तेज से व्याध का जल जाना प्रसिद्ध है।

🔶 गौतम ऋषि के शाप से सगर पुत्रों की क्या दुर्गति हुई थी, यह भी इतिहास प्रसिद्ध है। राणा सांगा अस्सी गहरे घावों से आहत हुए भी मृत्युपर्यंत शत्रु से लड़ते रहे थे। वाल्टेयर ने अस्पताल की चारपाई पर पड़े-पड़े ही इतने महत्त्वपूर्ण ग्रंथ लिखे थे कि उनके पुरुषार्थ को देखते हुए आश्चर्यचकित हुए बिना रहा नहीं जाता। संसार के इतिहास में ऐसे अनेकों करोड़पतियों का उल्लेख है, जिनकी निजी योग्यता और पूँजी नहीं के बराबर थी फिर नियति ने उन्हें अदम्य उत्साह, सूझ-बूझ के सहारे धन कुबेर बनने का अवसर प्रदान किया। बाटा से लेकर टाटा एवं हेनरी फोर्ड, रॉकफेलर तक की बड़ी नामावली इसी पंक्ति में खड़ी दीख पड़ती हैं।
  
🔷 सरदार पटेल द्वारा बागी रियासतों को भी भारत में विलय के लिए सहमत कर लिया जाना ऐसा कार्य है, जिसमें उनके महान व्यक्तित्व की झलक झाँकी मिलती है। बारडोली सत्याग्रह में भी वे अपना कमाल दिखा चुके थे। जापान के गाँधी कागबा ने एक गंदे मुहल्ले में सेवा कार्य आरंभ करते हुए अंतत: जापान के पतितोद्धारक के रूप में अद्भुत प्रतिष्ठा अर्जित की थी। बिहार का हजारी किसान अपनी लगन के बल पर उस क्षेत्र में हजार आम्र उद्यान लगाने में सफल हुआ था।
  
🔶 ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है। वे भूतकाल में भी असंख्य थे और अब भी जहाँ-तहाँ एक-से-एक बढ़ी-चढ़ी सफलताएँ अर्जित कर रहे हैं। इसमें व्यक्ति विशेष का नहीं, वरन् उसकी परिष्कृत प्रतिभा का ही चमत्कार दृष्टिगोचर होता है। यह हर किसी के लिए संभव है। आवश्यकता इतनी भर है कि लगन सच्ची हो और उसके लिए योजनाबद्ध रूप से पुरुषार्थ करने में कुछ उठा न रखा जाए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 41

👉 Vedmurti Taponishtha Pandit Shriram Sharma Acharya

🔷 It is indeed rare in the history of mankind that great souls like Bhagirath and Dadhichi graced the Earth with the nectar of the holy Ganges and nurtured the roots of divinity by their tapa and self-sacrifice. Pandit Sriram Sharma Acharya undoubtedly belongs to this category of divine rishis. His life and work represent a marvellous synthesis of the noble thoughts and deeds of great personalities like Swami Vivekanand, Sri Aurobindo, Mahatma Gandhi, Socrates and Confucius. Rev. Pt. Sriram Sharma was a rishi of the present age whose heart pulsated with compassion for all beings.

🔶 Every moment of his life was devoted to the welfare of people and the refinement of the moral and cultural environment. He also pioneered the revival of spirituality and creative integration of the modern and ancient sciences and religion relevant in the challenging circumstances of the present times. His personality was a harmonious blend of a saint, spiritual scientist, yogi, philosopher, psychologist, writer, reformer, freedom fighter, researcher, eminent scholar and visionary. It would require several volumes to record the attainmens of his life. Here we are only giving a glimpse of his superhuman personality. Acharya Sriram Sharma (revered as "Gurudev" by his disciples) was a great devotee of Goddess Gayatri and had attained perfection in realising its utmost potential.

🔷 He successfully practised and mastered the highest kinds of sadhanas described in Hinduism. He also deciphered the hidden science of Tantras. He attained the supreme knowledge of the philosophy and science of the Gayatri Mantra and yoga. In essence, he perfected a vast range of spiritual disciplines. He pioneered experiments on simple sadhanas, which could be easily pursued by the common masses. He initiated programmes of spiritual and intellectual refinement of millions of people without any discrimination of religion, caste, creed, sex, or social status. He propagated this knowledge for the enlightenment of people across the globe.

🔶 The early years: Sriram Sharma was born on the 20th September 1911 as the son of Pt. Roopkishor Sharma and Mata Dankunvari Devi in Anvalkheda (Dist. Agra, India). That his saintly heart was concerned for the welfare of common masses was clearly expressed since his childhood when, as a small boy, he took a brave step of nursing an old "untouchable" woman suffering from leprosy against the strong disapproval and displeasure of his family.

🔷 The eminent patriot, scholar and founder of the Banaras Hindu University Pt. Madan Mohan Malaviya initiated Sriram in the worship of Gayatri mantra when he was nine years old. On the auspicious day of Vasant Panchami festival, January 18, 1926, a guru by the name of Swami Sarveshvaranandji "a great Himalayan yogi" appeared before him in astral body from the flame of the dipaka (lamp)1 during his Gayatri worship. This sparked the revelation of the divine origin and purpose of his life and bestowed upon him with the grace and guidance of his guru...

📖 Akhand Jyoti, Jan Feb 2003

👉 वर्तमान दुर्दशा क्यों? (भाग 2)

🔷 आये दिन जो अज्ञात विपत्तियाँ सामने आती रहती हैं, उनकी भयंकरता भी कम नहीं। राजनैतिक संघर्षों के कारण जनता के कष्टों में वृद्धि होती है, कोई उपद्रव करता है दण्ड किसी को सहना पड़ता है। निर्दोष व्यक्ति का भी कलेजा काँपता रहता है कि कही अकारण ही कोई चपेट मुझे न लग जाये। देवी प्रकोप का भी पूरा जोर है। इस साल नदियों में बड़ी भारी बाढ़ें आईं, जिससे हजारों गाँव का नुकसान हुआ लाखों बीघा कृषि नष्ट हो गई, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूचाल, तूफान, अंधड़ के कारण बहुत भारी क्षति उठानी पड़ी। गुँडे बदमाशों का जोर बढ़ने से आये दिन अपराध बढ़ते रहते हैं। आज का दिन किसी प्रकार कट गया हो कल के लिए आशंका बनी रहती है कि कही कोई नई विपत्ति न टूट पड़े। शान्ति, स्थिरता, संतोष में कमी होती जाती है और बेचैनी बढ़ती जाती है।

🔶 यदि सब कठिनाइयों, कष्टों, व आपत्तियों को आशंकाओं को मिलाकर देखा जाय तो लगता है मनुष्य जाति अपने को बड़ा दुखी और व्यथित प्रभु कर रही है। किन्हीं-किन्हीं प्रदेशों पर कभी-कभी कुछ आपत्तियाँ आते रहने के उदाहरण इतिहास में प्राप्त हो गये हैं परन्तु ऐसे अवसर बहुत ही कम आये हैं जब समस्त संसार पर एक बारगी इतनी बड़ी चतुर्मुखी विपत्ति आई हो। आज तो युद्ध में लगे हुए और बिना लगे हुए, सभी देशों की जनता को ‘विविध प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। समस्त विश्व में एक साथ ऐसी विपत्ति क्यों आई? आइए, इसके सम्बन्ध में कुछ विचार विनिमय करें -

🔷 वर्तमान कष्टों के कारणों की विवेचना करते हुए हम देखते हैं कि भौतिक विज्ञान की उन्नति ने रेल, तार, रेडियो, गैस, जलयान, वायुयान आदि की सहायता से समस्त संसार को एक सूत्र में बाँध दिया है। इन साधनों की सहायता से सारी मनुष्य जाति आपस में बहुत अधिक सम्बन्धित हो गई है। व्यापारिक दृष्टि से एक देश दूसरे देश पर बहुत कुछ निर्भर करता है। अब शारीरिक और मानसिक खुराकें प्राप्त करने के लिए अन्य देशवासियों के सहयोग की भी आवश्यकता अपेक्षित होती है। अब सेनाओं को केवल देश की आन्तरिक समस्याओं को ही हल नहीं करना पड़ता वरन् अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को भी उतना ही महत्व देना पड़ता है।

🔶 इस प्रकार मानव परिवार का दायरा अधिक विस्तृत हो गया है और साथ ही एक देश की जनता के भले बुरे आचरण की जिम्मेदारी दूसरे देशों पर भी आ गई है! अक्सर अमेरिका के बुद्धिमान लोग ऐसा कहा करते हैं कि भारत की समस्या मित्र राष्ट्रों की समस्या है। भारत की अवनति का दोष इंग्लैण्ड को दिया जाया करता है। धुरी राष्ट्रों द्वारा पराधीन बनाये गये देशों की स्वतन्त्रता दिखाने का आश्वासन मित्र राष्ट्र दे रहे हैं। यह सब उदाहरण यह बताते हैं कि अब कोई देश केवल अपनी ही सीमा तक कर्तव्य बद्ध नहीं हैं वरन् उसकी जिम्मेदारी का दायरा बढ़कर अन्तर्राष्ट्रीय हो गया है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 महायोगी अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति, जनवरी 1943 पृष्ठ 4

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1.4

👉 हमारे विचारों और अद्भुत प्रभाव (भाग 1)

🔷 जीवन है? और उसको धारण करने का क्या प्रयोजन है? एक परिपूर्ण सफल जीवन क्या होता हैं? उसके क्या साधन हो सकते हैं? इस प्रकार के अन्य और बहुत से विचार कुछ स्वभावतः ही मनुष्य के मन में उठा करते हैं।

🔶 वास्तव में मनुष्य जीवन का जो मुख्य उद्देश्य है वह तो एक ही है केवल ईश्वर प्राप्ति परन्तु यह तो सर्व श्रेष्ठ और घोर अन्तिम श्रेणी की बात है। जहाँ पर पहुँचने का सौभाग्य, महान् पुण्यात्मा योगी जनों को ही प्राप्त होता है।

🔷 सर्व साधारण हम आप जैसे मनुष्यों का तो जीवन उद्देश्य कर्त्तव्य पालन ही है-अर्थात् कुशलता, निष्कपटता एवं सरलता पूर्वक सहज स्वभाव से अपना-2 कार्य करना और परिणाम स्वरूप संसार से जाते समय अधिक से अधिक खुशी का भण्डार संसार में छोड़ते हुए विशेष आनन्द और शान्ति को साथ ले जाना। यह है साँसारिक साधारण जीवन की सफल झाँकी।

🔶 हमें ऐसा कर्त्तव्यनिष्ठ सरल जीवन बनाने का सतत प्रयत्न करते रहना चाहिये। इस प्रकार के जीवन का मूलाधार हमारे विचार ही होते हैं। एक आदर्श जीवन विचारों का ही तो संग्रह होता है।

🔷 दूसरों की उन्नति अथवा पतन देखकर जब हम अशुद्ध मन से ईर्ष्या आदि बुरे भावों के शिकार होते हैं तो इस प्रकार दूसरों के कल्याण चाहने वाले बुरे विचारों का संग्रह होकर हमारा मन घोर कलुषित हो जाता है जिस कारण हम स्वयमेव दुःख सागर में डुबकियाँ लेने लगते हैं इस प्रकार हमारा आध्यात्मिक पतन होना शुरू हो जाता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1943 पृष्ठ 8

रविवार, 19 अगस्त 2018

👉 पति और पत्नी कैसे रहने चाहिए---

🔶 कबीर जी रोज सत्संग किया करते थे, लोग आते और चले जाते। एक आदमी सत्संग खत्म हो गया फिर भी बैठा रहा। कबीर जी बोले क्या बात है वो इन्सान बोला मैं तो काफी दूर से आया हूँ मुझे आपसे कुछ पूछना है। क्या पूछना है? कबीर बोले।

🔷 वो कहने लगा मैं गृहस्थी हूँ मेरा घर में झगड़ा होता रहता है। उसके बारे में जानना चाहता हूँ की झगड़ा कैसे दूर हो तो कबीर जी चुप रहे थोड़ी देर में कबीर जी ने अपनी पत्नी से कहा लालटेन जला के लाओ। कबीर की पत्नी लालटेन जला कर ले आई। कबीर जी के पास रख दी वो आदमी भी वही बैठा था सोच रहा था इतनी दोपहर है और लालटेन माँगा ली। खैर! मुझे इससे क्या।

🔶 फिर कबीर जी बोले कुछ मीठा दे जाना। तों उनकी स्त्री नमकीन देकर चली गयी। उस आदमी ने फिर सोचा यह तो शायद पागलो का घर है मीठे के बदले नमकीन, दिन में लालटेन, वो आदमी बोला कबीर जी मैं चलता हूँ। मन में सोचने लगा कहाँ फँस गया।

🔷 कबीर जी समझ गए बोले आपको आपके झगड़े का हल मिला की नहीं। वो बोला क्या मिला? कुछ नहीं। कबीर जी ने कहा जैसे मैंने लालटेन मंगवाई घर वाली कह सकती थी की तुम क्या सठीया गए हो इतनी दोपहर में क्या करोगे।

🔶 उसने सोचा होगा किसी काम के लिये लालटेन मंगवाई होगी । मीठा मंगवाया तों नमकीन देकर चली गयी, हो सकता है घर में न हो पर में भी चुप रहा। इसमे तकरार क्या?

🔷 तुम भी समझो, तकरार करना छोड़ो। एक-दुसरे की बात को समझो। आपसी विश्वास बनाओ। वो आदमी हैरान था यह सब इन्होंने मेरे लिये किया। उसको समझ आने लगी गृहस्थी हो या दोस्ती में तालमेल आपसी विश्वास बहुत जरुरी है।

🔶 किसी से वैर व तकरार न रखो..... आवश्यक होने पर एक दूसरे की सहमति में इज़हार करो ।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन 19 August 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 31)

👉 प्रतिभा के बीजांकुर हर किसी में विद्यमान हैं

🔶 उच्चस्तरीय प्रतिभा ही ब्रह्मतेजस् है। उसी को ब्रह्मवर्चस भी कहते हैं। उसे जिसने भी पर्याप्त मात्रा में अर्जित कर लिया है, वह शरीर से सामान्य होते हुए भी अपनी चेतनात्मक प्रखरता के सहारे ऐसे पुण्य प्रयोजन संपन्न कराने में समर्थ रहा है कि उसे अनुकरणीय भी माना जाए और अभिनंदनीय भी। भगवान बुद्ध का उदाहरण प्रत्यक्ष है। उन्होंने अपने जीवनकाल में एक लाख भिक्षु-भिक्षुणी परिव्राजक बनाकर विश्व के कोने-कोने में धर्म-चक्र-प्रवर्तन के लिए भेजे थे और वे सभी एक-से-एक बढ़ी-चढ़ी उपलब्धियाँ पाने में सफल हुए थे। अशोक और हर्षवर्धन ने उनके प्रतिपादन से प्रभावित होकर अपना विपुल-वैभव उनके आदेशों पर निछावर कर दिया था। आम्बपाली और अंगुलिमाल जैसों ने निकृष्टता का परित्याग कर, उत्कृष्ट स्तर का अपना कायाकल्प कर लिया था।
  
🔷 चाणक्य की एकाकी योजना ने भारत पर आक्रमण करते रहने वाले आक्रांताओं, आतंकवादियों को उनके बिलों में वापस लौटने के लिए बाधित कर दिया था। अनेक अनुभवी उनके सहायक बने थे। नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना करने से लेकर उसके संचालन तक की जिम्मेदारी का निर्वाह उनकी प्रतिभा ही करती रही थी। चुंबक अपने समकक्षों को खींचता, जुटाता तो अनायास ही रहता है।
  
🔶 महामना मालवीय जी आरंभ में सामान्य वकील और संपादक थे, पर जब उन्होंने हिंदू विश्वविद्यालय के निर्माण का संकल्प लिया तो प्राय: पचास करोड़ की संपत्ति उन लोगों से जुटाई, जिनके साथ उनकी कोई पूर्व की जान-पहचान तक न थी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 40

👉 Materialism and Spirituality: Two ways of Living (Last Part)

🔶 The mind is different from the rest of the senses in that it is always unsatisfied and ambitious. New hopes and ambitions arise once the old ones are fulfilled. Suppose a person desires to buy a house. He would remain preoccupied with that thought because there is an attraction in it. Once a house is bought, the attraction fades. If a person does not have children, he would yearn for them; once he has children, they appear burdensome. A similar principle applies to other things, such as household items, clothes, etc and to attachment towards people. Therefore greed and attachment are attractive only until they are fulfilled. Egoism also follows a similar principle.

🔷 A secretary in a company feels his job status is low and aims for a higher status so that he can elevate his standing in the society. It is possible that several persons within the company may be trying for the same position. Therefore he becomes an enemy for them, since now he is an extra competitor in the race. In case he does succeed in fulfilling his egoistic desire in progressing towards his dream position, mental peace would elude him because there would be several people scheming to dislodge him. His ego thus becomes his own dangerous adversary. The worth and importance of a well-mannered, disciplined person is obviously more than that of an egoistic person.

🔶 No circumstances or individuals can challenge a gentleman, whereas examples of egoistic people suffering ruin can be seen all around us. A gentleman is respected while an egoistic person is ignored....

📖 Akhand Jyoti, Jan Feb 2003

👉 वर्तमान दुर्दशा क्यों? (भाग 1)

🔶 आज हम चारों ओर भयंकर दावानल सुलगती हुई देखते हैं। महायुद्ध का दानव लाखों मनुष्यों को अपनी कराल दाढ़ों के नीचे कुचल कुचल कर चबाते जा रहा है। खून से पृथ्वी लाल हो रही है। आकाश से ऐसी अग्नि वर्षा हो रही है जिससे सहस्रों निरपराध प्राणी अकारण ही चबाने की तरह जल-भुन रहे हैं। कराह और चीत्कारों से सारा आकाश मण्डल गुँजित हो उठा है। नन्हें नन्हें बालक अपने माता पिताओं के लिए बिलख रहे हैं। माताएं अपने पुत्रों के लिए और पत्नियाँ अपने पतियों के लिए, अश्रुपात कर रहीं हैं। कितने घरों में, किस प्रकार करुण क्रन्दन हो रहें हैं, इन मर्म कथाओं को यदि प्रत्यक्ष रूप से प्रकट किया जाये तो वज्र का भी कलेजा फटने लगेगा।

🔷 अकेला युद्ध ही क्यों महामारियों का प्रचंड प्रकोप आप देखिए। अनेक प्रकार के नये-नये अश्रुत पूर्व रोग उठ खड़े हुए हैं। चिकित्सा करने वाले परेशान हैं, उपचार हतवीर्य साबित होते हैं, अर्धमृत या मृत लाशों के ढेर घर एवं मरघटों में आसानी से देखे जा सकते हैं। रोगी और उनकी परिचर्या करने वाले सभी की बेचैनी बढ़ती चली जा रही है। जीवन भर बने हुए हैं, जो साँसें बीत रही हैं वह भारी और कष्टकर प्रतीत होती हैं। दवा के लिए पैसा नहीं, पथ्य के लिए पैसा नहीं, असहायवस्था में पड़े हुए लोग बेबसी आँसू घूँट रहे हैं।

🔶 महंगी का तो कुछ कहना ही नहीं, हर चीज पर चौगुने आठ गुने दाम बढ़ते जा रहे हैं। पैसा खर्च करने पर भी वस्तुएं प्राप्त होती नहीं। अच्छा अब नसीब नहीं, खाद्य पदार्थों का लोप होता जाता है। व्यापार चौपट हो रहे हैं, उद्योग धंधे बढ़ते नहीं, बेकारी में कमी नहीं होती खर्च बढ़ रहे हैं पर आमदनी नहीं बढ़ती आधे पेट खाने वालों और आधे अंग ढकने वालो की संख्या बढ़ती जा रही है। जी तोड़ परिश्रम करने पर भी भोजन वस्त्र की आवश्यकताएं पूरी नहीं हो पाती। कुछ अमीरों या युद्ध सम्बन्धी कोई व्यवसाय प्राप्त कर लेने वाले भाग्यवानों की बात अलग है, किन्तु साधारण जनता की जीवन निर्वाह समस्या दिन-दिन गिरती चली जा रही है, तिल तिल करके अभावों की ज्वाला में लोगों को झुलसना पड़ रहा है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 महायोगी अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति, जनवरी 1943 पृष्ठ 4
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1.4

👉 स्वार्थी जीवन मृत्यु से बुरा है।

🔶 यूनान के संत सुकरात कहा कहते थे कि “यह पेड़ और आरण्य मुझे कुछ नहीं सिखा सकते, असली शिक्षा तो मुझे सड़कों पर मिलती है।” उनका तात्पर्य यह था कि दुनिया से अलग होकर एकान्त जीवन बिताने से न तो परमात्मा को प्राप्त किया जा सकता है और न आत्मोन्नति हो सकती है। अपनी और दूसरों की भलाई के लिए संत पुरुषों को समाज में भरे बुरे लोगों के बीच में अपना कार्य जारी रखना चाहिये।

🔷 संत सुकरात जीवन भर ऐसी ही तपस्या करते रहे। वे गलियों में, चौराहों पर, हाट बाजारों में, दुकानों और उत्सवों में बिना बुलाये पहुँच जाते और बिना पूछे भीड़ को संबोधित करके अपना व्याख्यान शुरू कर देते। उनका प्रचार तत्कालीन सामाजिक कुरीतियों और अनीतिपूर्ण शासन के विरुद्ध होता, उनके अन्तःकरण में सत्य था। सत्य में बड़ी प्रभावशाली शक्ति होती है। उससे अनायास ही लोग प्रभावित होते हैं।

🔶 उस देश के नवयुवकों पर सुकरात का असाधारण असर पड़ा, जिससे प्राचीन पंथियों और अनीतिपोषक शासकों के दिल हिलने लगे, क्योंकि उनके चलते हुए व्यापार में बाधा आने की संभावना थी। सुकरात को पकड़ लिया गया, उन पर मुकदमा चला जिसमें दो इल्जाम लगाये गए।
1. प्राचीन प्रथाओं का खंडन करना,
2. नवयुवकों को बरगलाना। इन दोनों अपराधों में विचार करने के लिये न्याय सभा बैठी, सभासदों में से 220 की राय छोड़ देने की थी और 281 की राय मृत्यु दंड देने की हुई। इस प्रकार बहुमत से मृत्यु का फैसला हुआ। साथ ही यह भी कहा गया कि यदि वह देश छोड़ कर बाहर चले जायँ या व्याख्यान देना, विरोध करना बन्द कर दे तो मृत्यु की आज्ञा रद्द कर दी जायेगी।

🔷 सुकरात ने मुकदमे की सफाई देते हुए कहा- ”कानून मुझे दोषी ठहराता है। तो भी मैं अपने अन्तरात्मा के सामने निर्दोष हूँ। दोनों अपराध जो मेरे ऊपर लगाये गये हैं, मैं स्वीकार करता हूँ कि वे दोनों ही मैंने किये हैं और आगे भी करूंगा। एकान्त सेवन करके मुर्दे जैसा बन जाने का निन्दित कार्य कोई भी सच्चा संत नहीं कर सकता। यदि मैं घोर स्वार्थी या अकर्मण्य बन कर अपने को समाज से पृथक कर लूँ और संसार की भलाई की तीव्र भावनाएँ जो मेरे हृदय में उठ रही हैं, उन्हें कुचल डालूँ तो मैं ब्रह्म हत्यारा कहा जाऊंगा और नरक में भी मुझे स्थान न मिलेगा। मैं एकान्तवासी, अकर्मण्य और लोक सेवा से विमुख अनुदार जीवन को बिताना मृत्यु से भी अधिक कष्टदायक समझूंगा। मैं लोक सेवा का कार्य बन्द नहीं कर सकता, न्याय सभा के सामने मैं मृत्यु को अपनाने के लिये निर्भयतापूर्वक खड़ा हुआ हूँ।”

🔷 संसार का उज्ज्वल रत्न, महान दार्शनिक संत सुकरात को विष का प्याला पीना पड़ा। उसने खुशी से विष को होठों से लगाया और कहा- ”स्वार्थी एवं अनुपयोगी जीवन बिताने की अपेक्षा यह प्याला मेरे लिये कम दुखदायी है।” आज उस महात्मा का शरीर इस लोक में नहीं है, पर लोक सेवा वर्ग का महान् उपदेश उसकी आत्मा सर्वत्र गुँजित कर रही है।

📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1942 पृष्ठ 8
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1942/September/v1.8

शनिवार, 18 अगस्त 2018

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 30)

👉 प्रतिभा के बीजांकुर हर किसी में विद्यमान हैं

🔷 गरमी संघर्ष से उत्पन्न होती है। हलचल और प्रगति भी उसी के सहारे बन पड़ती है। प्रतिभा परिष्कार के लिए भी वही करना पड़ता है। अखाड़े में कड़ी मेहनत किए बिना कोई पहलवान कैसे बने? सैनिकों को अनेक प्रकार के कठिन अभ्यास आए दिन करने पड़ते हैं। नदियों का प्रवाह अनेक चट्टानों को उलटना हुआ आगे बढ़ता है। मोरचा जीतने के लिए रणक्षेत्र में अपने कौशल का परिचय देना होता है। भँवरों वाली तेजधार को चीरते हुए नाव को पार ले जाने वाले साहस का परिचय ही किसी नाविक को विशिष्टता का गौरव प्रदान करता है।
  
🔶 प्रतिभा परिष्कार की आरंभिक शर्त है— अपने आपसे जूझना, इस हेतु आलस्य और प्रमाद से सर्वप्रथम लड़ना पड़ता है। उसके स्थान पर चुस्त-दुरुस्त रहने की जागरूकता को धारण करना पड़ता है। निराशा, अनुत्साह, चिंता, खिन्नता जैसे मानसिक दुर्गुणों के साथ तब तक संघर्ष करना पड़ता है, जब तक कि उनके स्थान पर आशा, प्रसन्नता, उमंग, निश्चिंतता, निर्भयता और शिष्टता जैसी सत्प्रवृत्तियाँ अपने आपको प्रतिष्ठित न कर लें। यह नित्य ध्यान रखने और निरंतर अभ्यास करने का विषय है, जिसे बिना रुके, बिना हारे, अनवरत रूप से क्रियान्वित ही किए रखना चाहिए।
  
🔷 प्रतिभा त्रिवेणी की तरह है, जिसमें शारीरिक ओजस्, मानसिक तेजस् और अंतराल में सन्निहित वर्चस् को जगाना, उभारना और प्रखरता संपन्न बनाने के स्तर तक उठाना पड़ता है। संयम सध सके तो स्वस्थ रहने की गारंटी मिल जाती है। उपयुक्त काम का चुनाव करके, उसमें अभिरुचि, एकाग्रता और तत्परता का नियोजन किए रखा जाए, तो साधारण काम-काज भी इस अभ्यास के सहारे अधिकाधिक बुद्धिमत्ता और कुशलता प्रदान करते चलते हैं। इसी आधार पर शारीरिक ओजस् और मानसिक तेजस् की उतनी मात्रा उपलब्ध हो सकती है, जिस पर संतोष और गर्व अनुभव किया जा सके। सदाशयता पर सघन श्रद्धा के होने का नाम ही वर्चस् है। आदर्शवादिता इसी अवलंबन को अपनाती है और उत्कृष्टता को इससे कम में चैन नहीं पड़ता। वर्चस् जिसके भी अंतराल में उभरता है उसमें शालीनता की, सदाशयता की, सज्जनता की कमी नहीं रहती। इस दिव्यता का जितना अंश जिसके हाथ लग जाता है, वह उतने ही अंशों में धन्य हो जाता है। 

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 39

👉 अहंकार का तो उन्मूलन ही किया जाय (अन्तिम भाग)

🔷 सात्विक अहंकार वाला साधक अपनी बुद्धि के अनुसार किसी एक तरफ झुक पड़ता है। वह किसी एक निर्दिष्ट साधन पद्धति को अंगीकार करके उसकी सिद्धि में तन्मय हो जाता है। दया या परोपकार आदि किसी एक सिद्धि के मार्ग को ग्रहण करके अपने चित्त की प्रवृत्ति के अनुसार उसकी साधना में जो संतोष उसे मिलता है उसी से वह संतुष्ट रहने लगता है। साधक का सात्विक-अहंकार जिसे श्रेयस्कर बतलाता है उसी को वह ग्रहण करता है और दूसरी तरफ निगाह उठाकर भी नहीं देखता।

🔶 हमको सदा यह बात मन में समझते रहना चाहिये कि साधन का अभिप्राय अपने व्यक्तिगत जीवन को लाभ पहुँचाना नहीं है। ये वस्तुएँ यद्यपि सिद्धि के अंग है, तथापि से पूर्ण सिद्धि नहीं है। पूर्ण योग का साधक पहले से ही अपने मन में यह निश्चय कर लेता है कि मैं किसी वस्तु के लिये भगवान से प्रार्थना नहीं करूँगा जो कुछ वह देगा उसे ही हृदय में बिना किसी प्रकार का दुर्भाव लाये स्वीकार कर लूँगा। यदि आप आनन्द की बात पूछे, तो मैं कहता हूँ कि इससे बढ़कर आनन्ददायक बात और कौन सी हो सकती है कि हमने अपना सर्वस्व भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया है। जब हम इस बात को स्वीकार करते है कि भगवान की प्रत्येक लीला आनन्दयुक्त है, तो हमको आधार बनाकर वह जो लीला करता है उसी में हमें आनन्द मानना चाहिये।

🔷 सात्विक अहंकार के रहते हुए भी साधना पूर्ण नहीं हो सकती। इसलिये योगों को पूर्णता प्राप्त करने के निमित्त उसका भी परित्याग करना होगा। सब धर्मों में मुक्ति, निर्वाण आदि को साधना का अन्तिम लक्ष्य बतलाया है, पर पूर्ण योग के साधक को इस लक्ष्य को भी त्याग देना होगा। साधक को बिना किसी भी भली बुरी अभिलाषा के केवल भगवान के रूप और उसकी लीला का ही ध्यान करना होगा इसी से वह सच्चे आनन्द का अधिकारी बन सकता है।

.... समाप्त
✍🏻 महायोगी अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति, जून 1961 पृष्ठ 10

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन 18 August 2018


👉 चालाक बगुला और केकड़ा

🔷 एक बार समुन्द्री जीव जब सुबह की धूप सेकने किनारे पर आए तो अपने शत्रु बगुले को एक टांग पर खड़े प्रार्थना करते देखा। आज उसने उन पर आक्रमण भी नहीं किया था।

🔶 सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ कि इस बगुले को क्या हुआ। कुछ साहसी मछलियां, कछुए और केकड़े इकट्टे होकर उसके पास पहुंचे और पूछा- ”क्या बात है बगुले दादा। आज किस चिंता में हो?“

🔷 ”भाई लोगो! मैंने आज से भगताई शुरू कर दी है। कल ही मुझे स्वप्न आया कि दुनिया खत्म होने वाली है, इसलिए क्यों न भगवान का नाम लिया जाए और सुनो, यह तालाब भी सूखने वाला है। तुम लोग जल्दी ही किसी दूसरी जगह चले जाओ।“

🔶 ”क्या तुम सच कह रहे हो।“ ”हां भाई! मैं भला झूठ क्यों बोलूंगा। तुम देख ही रहे हो कि अब मैं तुम लोगों का शिकार भी नहीं कर रहा हूं क्योंकि मैंने मांस खाना भी छोड़ दिया है। राम…राम…राम….।“

🔷 बगुले का साधुपन देखकर सबको भरोसा आ गया कि बगुला भगत जो कह रहे हैं, सच है। ”बगुला भगत जी! अगर यह तालाब सूख गया तो हमारे बाल बच्चे तो तड़प-तड़पकर मर जाएंगे।“ मेंढक ने कहा- ”कोई उपाय करो।“

🔶 ”भाई मैं आज रात ईश्वर से बात करता हूं, फिर जैसा वह कहेंगे तुम्हें बता दूंगा। मानना न मानना तुम्हारी मर्जी।“ सभी लोग बगुला भगत के पांव छूकर चले गए। दूसरे दिन बगुला भगत ने बताया कि भगवान ने कहा है कि अगर आप सब बगल वाले जंगल के तालाब में चले जाओ तो बच जाओगे।

🔷 ”मगर हम वहां जाएंगे कैसे?“ सबने चिन्ता जाहिर की। ”यदि यहां से वहां तक एक सुरंग खोद ली जाए तो…।“ एक कछुआ बोला। ”अरे भाई ये क्या आसान काम है?“ केकड़ा बोला- ”और फिर इतनी लम्बी सुरंग कौन खोदेगा।“

🔶 तभी एक मछली बोली- ”एक और भी उपाय है। बगुला भगत जी हमें अपनी पीठ पर बैठाकर वहां छोड़ आएं।“ यह सुनते ही बगुला भगत बोला- ”मैं तो अब बूढ़ा हो गया हूं। इतना बोझा भला….।“

🔷 ”भगत जी! आप हमें एक-एक करके वहां ले जाओ। आप तो अब साधु हो गए हैं और साधु का काम है दूसरों की रक्षा करना।“ सबने गुहार लगाई। ”अब जब आप इतना कह रहे हैं तो ठीक है। आओ, ये शुभ काम मैं आज से ही शुरू कर दूं। आओ, तुममें से एक मछली मेरी पीठ पर बैठ जाए।“

🔶 एक चतुर मछली फौरन उछलकर उसकी पीठ पर बैठ गई। बगुला भगत उसे लेकर फौरन उड़ गया।

🔷 इसी प्रकार कई दिन गुजर गए। बगुला रोज दो-तीन मछलियों, मेंढकों, कछुओं आदि को ले जाता रहा। एक दिन केकड़े की बारी आई। केकड़ा उसकी पीठ पर सवार था। बगुला भगत सोच रहा था, आज तो मजा आ जाएगा। केकड़े का बढि़या मांस खाने को मिलेगा।

🔶 उधर, एक पहाड़ी पर से गुजरते हुए केकड़े को ढेर सारी मछलियों की हडिृयां, कछुओं के खोल और मेंढकों के पिंजर पड़े दिखाई दिए तो वह बगुले भगत की सारी चालाकी समझ गया और बिना एक पल गंवाए उसने बगुले की गरदन दबोच ली।

🔷 ”अरे केकड़े भाई, क्या करते हो?“ बगुला चिल्लाया। ”पाखण्डी बगुले। फौरन मुझे मेरे तालाब पर वापस लेकर चल वरना बेमौत मारा जाएगा। मैं तेरी सारी चालाकी समझ गया। अब चूंकि तू बूढ़ा हो चुका है, इसलिए तुझसे शिकार नहीं होता। इसीलिए तूने यह चाल चली और भोली-भाली मछलियों को यहां लाकर खा गया। अब अगर जिंदगी चाहता है तो वापस चल वरना तेरी कब्र भी यहीं बन जाएगी।“

🔶 बगुला मरता क्या न करता। वह वापस पलटा और उसी तालाब पर आ गया। उसका ख्याल था कि केकड़ा उसे छोड़ देगा, मगर केकड़े ने उसे छोड़ा नहीं। उसने उसकी गरदन काट दी और तालाब में जाकर सबको उसकी हकीकत बता दी।

🔷 मौत के मुंह से बच गए सभी जीव केकड़े का धन्यवाद करने लगे।

शिक्षा – जिसका स्वभाव धूर्तता का हो, उस पर भरोसा करने से धोखा ही मिलेगा।

शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

👉 अलविदा युगपुरुष अटल बिहारी

वह अटल अजातशत्रु वह राजनीति का वैभव जा रहा है
हवाओं रास्ता दो
मेरा भारत रत्न मेरा जननायक जा रहा है
वो जब बोलता था तब लोग मंत्रमुग्ध होकर सुनते थे।

साथ उसके वाणी का सम्मोहक जा रहा है।
पोखरण में जिसकी धमक को दुनिया ने देखा
वो जिसने खींची राष्ट्र में स्वर्णिम चतुर्भुज की रेखा
हवाओं रास्ता दो
मेरा राष्ट्र रत्न मेरा देश नायक जा रहा है।

राजनीति की काली कोठरी में जो सदा बेदाग रहा
सत्य को सदा सत्य कहने वाला अपने विचारों पर अटल रहने वाला
कवि ह्रदय विचारक जा रहा है।
हवाओं रास्ता दो
मेरा राष्ट्र भक्त मेरा राष्ट्र नायक जा रहा है।

कृतज्ञ राष्ट्र,कृतज्ञ राजनीति, कृतज्ञ जनमानस निःशब्द खड़े देखते हैं।
हम इंसानों के बीच से वह देवतुल्य महामानव जा रहा है
हवाओं रास्ता दो
मेरा विश्व रत्न मेरा गणनायक जा रहा है।

अलविदा युगपुरुष

👉 कल्पना द्वारा नकारात्मक को सकारात्मक में बदलना:

🔶 सुबह उठते ही पहली बात, कल्पना करें कि तुम बहुत प्रसन्न हो। बिस्तर से प्रसन्न-चित्त उठें-- आभा-मंडित, प्रफुल्लित, आशा-पूर्ण-- जैसे कुछ समग्र, अनंत बहुमूल्य होने जा रहा हो। अपने बिस्तर से बहुत विधायक व आशा-पूर्ण चित्त से, कुछ ऐसे भाव से कि आज का यह दिन सामान्य दिन नहीं होगा-- कि आज कुछ अनूठा, कुछ अद्वितीय तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है; वह तुम्हारे करीब है। इसे दिन-भर बार-बार स्मरण रखने की कोशिश करें। सात दिनों के भीतर तुम पाओगे कि तुम्हारा पूरा वर्तुल, पूरा ढंग, पूरी तरंगें बदल गई हैं।

🔷 जब रात को तुम सोते हो तो कल्पना करो कि तुम दिव्य के हाथों में जा रहे हो…जैसे अस्तित्व तुम्हें सहारा दे रहा हो , तुम उसकी गोद में सोने जा रहे हो। बस एक बात पर निरंतर ध्यान रखना है कि नींद के आने तक तुम्हें कल्पना करते जाना है ताकि कल्पना नींद में प्रवेश कर जाए, वे दोनों एक दूसरे में घुलमिल जाएं।

🔶 किसी नकारात्मक बात की कल्पना मत करें, क्योंकि जिन व्यक्तियों में निषेधात्मक कल्पना करने की क्षमता होती है, अगर वे ऐसी कल्पना करते हैं तो वह वास्तविकता में बदल जाती है। अगर तुम कल्पना करते हो कि तुम बीमार पड़ोगे तो तुम बीमार पड़ जाते हो। अगर तुम सोचते हो कि कोई तुमसे कठोरता से बात करेगा तो वह करेगा ही। तुम्हारी कल्पना उसे साकार कर देगी।

🔷 तो जब भी कोई नकारात्मक विचार आए तो उसे एकदम सकारात्मक सोच में बदल दें। उसे नकार दें, छोड़ दें उसे,फेंक दें उसे।

🔶 एक सप्ताह के भीतर तुम्हें अनुभव होने लगेगा कि तुम बिना किसी कारण के प्रसन्न रहने लगे हो— बिना किसी कारण के।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 29)

👉 प्रतिभा के बीजांकुर हर किसी में विद्यमान हैं

🔶 जिन्हें पेट-प्रजनन की ही गरज है, जो लोभ, मोह और अहंकार से ऊँचे उठ सकने की आवश्यकता ही नहीं समझते, उनके संबंध में तो कहा ही क्या जाए? किंतु जिन्हें कोई महत्त्वपूर्ण लक्ष्य प्राप्त करना है, उनके लिए एक ही उपाय है कि प्रसुप्त शक्तियों को जाग्रत करके, उन्हें उस स्तर का अभ्यास कराए, जिसके बलबूते बड़े काम किए जाते हैं-बड़े लाभ अर्जित किए जाते हैं। दूसरों की सहायता पाने की बात को अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिए। अपना पुरुषार्थ जगे, तो यह स्वाभाविक है कि खिले हुए फूल को देखकर उस पर तितलियाँ मँडराते और भौंरे यश गीत गाने की झड़ी लगाएँ।
  
🔷 अध्यात्म दर्शन का सार निष्कर्ष इतना भर है कि अपने को जानों, ‘आत्मानं विद्धि’। अपने को विकसित करो और ऐसी राह पर चलो जो कहीं ऊँचे लक्ष्य तक पहुँचाती हो। यह शिक्षा अपने आपके लिए है। इसे स्वीकार-अंगीकार करने के उपरांत ही वह प्रयोजन सधता है, जिसमें दूसरों से कुछ समर्थन, सहायता, अनुदान पाने की आशा की जाए। देवता भी तपस्वियों को ही वरदान देते हैं, बाकी तो फूल प्रसाद के दोने लिए, देव स्थानों के इर्द-गिर्द चक्कर लगाते रहते हैं। भिखारी कितना कुछ कमा पाते हैं, इसे सभी जानते हैं। उन्हें जीवन भर अभावों की, उपेक्षा की शिकायत ही बनी रहती है।
  
🔶 वस्तुस्थिति समझने के उपरांत उसी निमित्त उन्मुख होना चाहिए कि अपने को अधिक प्रामाणिक और अधिक प्रखर बनाने में जुट पड़ा जाए। मनौती मानते रहने की अपेक्षा यही अवलंबन सही और सच्चा है। इस हेतु कुछ कदम बढ़ाने से पूर्व यह अनुमान लगा लेना चाहिए कि अपने भीतर सामर्थ्य का अजस्र भंडार भरा पड़ा है। स्रष्टा ने मनुष्य को असाधारण सफलताएँ उपलब्ध कर सकने की संभावनाओं से भरा-पूरा बनाया है। आवश्यकता मात्र इतनी है कि अवरोध की झीनी दीवार को गिराने के लिये साहस जुटाया जाये। अंडों में जब चूजा समर्थ हो जाता है तो भीतर से जोर लगाता है और छिलके को तोड़कर बाहर आता है। इसके बाद तो उसकी माता ही सहायता करने लगती है। प्रसव वेदना का कारण एक ही है कि गर्भस्थ बालक बाहर निकलने के लिए अपनी शक्ति प्रयोग करता है। यदि भ्रूण अति दुर्बल और मृत-मूर्च्छित हो, तो प्रसव की संभावना अतीव दुष्कर हो जाती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 38

👉 Materialism and Spirituality: Two ways of Living ( Part 1)

🔶 There are two aspects of human life: one that relates to the physical body materialism; and the other that relates to the inner self (the soul) spirituality. Materialism means an inclination towards acquiring material possessions and comforts; in short, it is a tendency to lead a life in which pleasures of the body are given preference above anything else. Spirituality means, centred and established on the soul, that is, activities in life are decided keeping in mind the awakening of the soul. Normally a persons needs are fulfilled with limited materials such as food to satisfy hunger, few clothes to cover the body, a bed for rest, a house for shelter, etc.; anything over and above the basic needs either remains unused or is misused.

🔷 For example, if a person who can eat four chapattis for lunch were given eight chapattis, it would be beyond his capacity to eat the extra four chapattis. A single bed is enough for a person to sleep on; any more bed space would remain unused. Considering this, a few hours work is sufficient to satisfy bodys requirements. The same is true for senses also. There are five physical senses: touch, smell, taste, hearing and vision. No matter how beautiful a view may be, the eyes will tire of seeing it after a few minutes. The ears will not be able to listen to melodious music indefinitely.

🔶 A person will be able to eat only a certain quantity of food of his liking. Thus the senses have limited requirements, beyond which they become saturated. But senses are never satisfied they always crave for more. The mind is considered to be the sixth sense. Its attributes are greed, attachment (moha) towards worldly objects and people, and egoism. The mind experiences joy when these three attributes are attended to. Man generally engages his time and effort in satisfying the requirements of the body and the mind. The mind propels him to fulfill the three attributes and also employs the body in its schemes. This is not surprising, since satisfaction of the senses is a bodily requirement, and the mind is one of the senses.

📖 Akhand Jyoti, Jan Feb 2003

👉 प्रत्यक्ष ही नहीं, परोक्ष भी प्रदूषित

🔶 मनुष्य का चिन्तन, चरित्र और व्यवहार व्यक्ति और समाज को तो प्रभावित करता ही है, सूक्ष्म जगत भी उससे अछूता नहीं रह पाता है। विकृत चिन्तन और भ्रष्टचरित्र, सूक्ष्म जगत के अदृश्य वातावरण को प्रदूषण से भर देते हैं। प्रकृति की सरल स्वाभाविकता बदल जाती है और वह रुष्ट होकर दैवी आपत्तियाँ बरसाने लगती है। इन दिनों अतिवृष्टि, अनावृष्टि, बाढ़ दुष्काल, भूकम्प जैसी विपत्तियां बढ़े क्षेत्रों को प्रभावित कर रही है। शारीरिक ही नहीं, मानसिक रोगों में भी भारी बढ़ोतरी हो रही है। मानवी सद्भावना में, व्यक्तित्व के स्तरों में बुरी तरह गिरावट आ रही है। इन सब के कारण वर्तमान जटिल और भविष्य धूमिल बनता जा रहा है। अनेक विसंगतियाँ जड़ें जमा रही है। जो लोग इन परिस्थितियों में सुधार करने की स्थिति में हैं, उनमें भी इन कर्त्तव्यों के प्रति आवश्यक उत्साह नहीं हैं। सदुपयोग से वही शक्तियाँ सुख सुविधा सम्पन्न स्वर्गीय वातावरण बना सकती हैं। दुरुपयोग तो नरक के अलावा और कुछ बना ही नहीं सकता।

🔷 प्रवाह यदि उल्टा न गया तो स्थिति ऐसी भी आ सकती है जिसे प्रलय कि समतुल्य कहा जा सकता है। अंतरिक्ष का बढ़ता हुआ तापमान ध्रुव प्रदेशों की बर्फ गलाकर जल प्रलय जैसी स्थिति बना सकता है। असंतुलन के दूसरे पक्ष के कारण हिम प्रलय की संभावनाएँ विज्ञजनों द्वारा व्यक्त की जा रही है। धरती कि अंतरिक्ष कवच -ओजोन की पर्त क्षीण होकर फट गयी तो ब्रह्मांडीय किरणें धरती के जीवन को भूतकाल का विषय बना सकती है। यह सब और कुछ नहीं, मनुष्य की उन करतूतों की प्रक्रिया है, जो पिछली दो शताब्दियों में उन्मादी उपक्रम अपनाकर महाविनाश को आमन्त्रण दे रही है।

🔶 परन्तु सृष्टा ऐसा होने नहीं देगा। उसने इस बरती को, उसकी प्रकृति सम्पदा को, मानवी सत्ता को अलग मनोयोग पूर्वक सँजोया है। सृष्टि के आदि से लेकर अब तक अनेक बार, अनेकों की विकट परिस्थितियाँ आयी है। उन्हें टालने वाले ने समय रहते टाला है और उलटी दिशा में बहते प्रवाह को उलट कर सीधा किया है। “यदा यदा हि धर्मस्य” वाला वचन समय समय पर पूरा होता रहा है। अब भी वह पूरा होकर रहेगा। वही होने की आवश्यकता में सन्देह नहीं, पर बरतते हुए भी निराश होने कर आवश्यकता नहीं है। विनाश की विभीषिकाओं में सन्देह नहीं है वर यह भी निश्चित है कि समय चक्र पूर्व स्थिति की ओर घूम गया है। पुरातन सतयुगी वातावरण का पुनर्निर्माण होकर रहेगा। इसके लिए उपयुक्त समय यही है।

🔷 रात्रि जब समाप्त है, तो एक बार सघन अंधियारा छाता हैं। बुझते दीपक की लौ तेज हो जाती है। संव्याप्त असुरता भी यदि अपने विनाश की वेला आश्चर्य नहीं। प्राचीन काल में असुरों को जब अपनी दुष्टता का समापन होता दिखा तो उन्होंने देवत्व पर सारी शक्ति झोंक कर आक्रमण किया। हारा जुआरी एक बार साहस बटोर कर सब कुछ दाँव पर लगा देता है। भले ही उसे वह सब गँवाना पड़ें। युगसंधि में ऐसा ही हो तो आश्चर्य।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
📖 अखण्ड ज्योति, नवम्बर 1988 पृष्ठ 60

http://awgpskj.blogspot.com/2016/07/blog-post_40.html

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन 17 August 2018

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