बुधवार, 22 अगस्त 2018

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 34)

👉 बड़े कामों के लिए वरिष्ठ प्रतिभाएँ

🔷 इन दिनों अनौचित्य की बाढ़ को रोकने और दलदल को मधुवन बनाने जैसी समय की चुनौती सामने है। विनाश के तांडव को रोकना और विकास का उल्लास भरा सरंजाम जुटाना ऐसा ही है, जैसे-खाई को पाटना भर ही नहीं, वरन् उस स्थान पर ऊँची मीनार खड़ी करने जैसा दुहरा पराक्रम। इस प्रवाह को पलटना ही नहीं, उलटे को उलटकर सीधा करना भी कह सकते हैं। यों मनुष्य ही असंभव को संभव कर दिखाते रहे हैं, पर उसके लिए कटिबद्ध होना ही नहीं अपने को क्षमता संपन्न सिद्ध करके दिखाना दुहरे पराक्रम का काम है। युग परिवर्तन की इस विषम वेला में ऐसा ही कुछ बन पड़ने की आवश्यकता है, जैसा कि अंधकार से भरी तमिस्रा का स्वर्णिम आभा वाले अरुणोदय के साथ जुड़ना इति और अथ का समन्वित संधिकाल यदाकदा ही आता है। इसकी प्रतीक्षा युग-युगान्तरों तक करनी पड़ती है, इन दिनों ऐसा ही कुछ होने जा रहा है।
  
🔶 विभीषिकाओं का घटाटोप हर दिशा में गर्जन-तर्जन करता देखा जा सकता है। जो चल रहा है, उससे विपत्तियों का संकेत ही मिलता है। दुर्बुद्धि ने चरम सीमा तक पहुँचकर ऐसी संभावना प्रस्तुत कर दी है, जिसे बुरे किस्म की दुर्गति ही कह सकते हैं। प्रवाह को और अधिक उत्तेजित कर देना सरल है, पर उसे उलटकर सृजन की दिशा में योजनाबद्ध रूप से नियोजित कर सकना ऐसा है, जिसकी आशा विश्वकर्माओं से ही की जा सकती है। उन्हीं के लिए दसों दिशाओं से पुकार उठ रही है। उन्हीं को खोज निकालने या नये सिरे से ढालने के लिए समय मचल रहा है। बड़े काम आखिर बड़ों के बिना कर ही कौन सकेगा?
  
🔷 प्रश्न, क्षेत्र विशेष की परिस्थितियों से निपटने का नहीं है और न समुदाय विशेष से निपटने का। अभावों को दूर करने का भी नहीं है और न साधन जुटाने की अनिवार्यता जैसा। अति कठिन कार्य सामने यह है कि संसार भर के मानव समुदाय पर छाई हुई विचार विकृति का परिशोधन किस प्रकार किया जाय? यह कार्य लेखनी, वाणी एवं प्रचार माध्यमों से भी एक सीमा तक ही हो सकता है, सो भी बड़ी मंदगति से, जबकि आवश्यकता इस बात की है कि लोकचिंतन में गहराई तक घुसी हुई भ्रष्टता से कैसे निपटा जाए और उसके फलस्वरूप जो दुराचरण का सिलसिला चल पड़ा है, उसके उद्गम को बंद कैसे किया जाय?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 44

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