गुरुवार, 7 जून 2018

👉 गुरुगीता (भाग 126)

👉 सर्वसंकटहारिणी गुरूगीता की मंत्र साधना
🔷 गुरूगीता की मंत्र साधना सर्वसंकट हारिणी है। जिसने भी गुरूगीता का पाठ अनुष्ठान किया, उन सभी के अनुभव आश्चर्यकारी रहे हैं। गुरूगीता की मंत्र माला, गुरूतत्त्व का बोध, शिष्य प्रबोध एवं तत्त्व चर्चा के साथ अनेकों मांत्रिक रहस्य भी हैं। जो इन रहस्यों को जानकर उनका प्रयोग करना सीख जाता है, वह कभी भी दुस्तर संकट के जाल में नहीं उलझता, कु्रर ग्रहों की पीड़ाएँ उसे कभी नहीं सतातीं। दुःख और दुर्भाग्य उसे छू तक नहीं पाते। गुरू चेतना है ही सारे आश्चर्यों ,चमत्कारों व अलौकिक शक्तियों का घनीभूत पुञ्ज। बात बस केवल अनुभव की है। अब तक ये अनुभव अनेकों ने किए हैं और अनगिनत अभी कर सकते हैं। अनुभवी साधकों के मध्य यह बहुत ही सुप्रचलित वाक्य है कि जब गुरूगीता है, तब भला अन्य शास्त्रों व साधनाओं के विस्तार से क्या लाभ?

🔶 गुरूगीता के पिछले क्रम में इस साधना रहस्य के कई गूढ़ संकेत किए गए हैं। इसमें बताया गया है कि समुद्र में जिस तरह से जल, दुग्ध में दुग्ध ,घृत में घृत, घड़े का आकाश घड़े के फूट जाने से घड़े में मिल जाता है, उसी तरह से आत्मा परमात्मा में लीन हो जाता है। गुरूगीता की साधना से जीवात्माएँ जिस एकता का अनुभव करती हैं, वह उन्हें दिन- रात आनन्द में विभोर रखती है और वह जीवन मुक्ति का आनन्द उठाता है। ऐसी महनीय विभूतियों की जो भाव- भक्ति करता है, वह सन्देह रहित होकर सभी आध्यात्मिक -लौकिक सुख प्राप्त करता है, वह सन्देह रहित होकर सभी आध्यात्मिक -लौकिक सुख प्राप्त करता है, उसे भोग एवं मोक्ष मिलते हैं, उसकी जिह्वा पर सरस्वती निवास करती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 190

बुधवार, 6 जून 2018

👉 सोना पाने का अधिकारी

🔶 एक बार तीन व्यक्ति गरीबी से तंग आकर धन कमाने के लिये परदेश को रवाना हुए। बहुत दिनों तक वे इधर-उधर भटकते रहे, किन्तु कोई ऐसा उपाय न मिला जो धन कमाते। हताश होकर वे कुबेर देवता को प्रसन्न करने के लिए तप करने लगे। उनकी उग्र तपस्या से कुबेर देवता प्रसन्न हुए, और उनकी पात्रता के अनुसार फल देने के लिए एक साधु का वेश बनाकर उन व्यक्तियों के पास पहुँचे।

🔷 साधु वेश धारी कुवेर ने उनसे पूछा कि तुम लोग क्यों तप कर रहे हो? उन्होंने कहा-धन के लिये। साधु ने कहा- अच्छा, बेटा, मैं तुम्हें एक ऐसा उपाय बताता हूँ जिससे तुम लोग मनचाहा धन प्राप्त कर सकते हो। सामने जो झरना बह रहा है, वह वरुण देवता का बना हुआ है। इसमें यदि गंगोत्री से लाकर थोड़ा सा गंगा जल डाल दो तो इसका सारा पानी सोने का हो जायेगा। यदि तुम लोग गंगोत्री गंगा जल ले आओ तो आसानी से मन चाहा सोना पा सकते हो।

🔶 वे तीनों व्यक्ति बहुत प्रसन्न हुए, क्योंकि गंगोत्री वहाँ से पास ही थी, शाम तक लौट कर वापिस आया जा सकता था। वे लोग अपने अपने घड़े लेकर गंगाजल लेने के लिए चल दिये। रास्ता न तो बहुत कठिन था और न दूर, कुछ ही घंटों में वे लोग वहाँ पहुँच गये और घड़े भर कर वापिस लौटने लगे।

🔷 उनमें से दो के मन में यह विचार उठने लगे कि मैं पहले पहुँच जाऊं और पहले अपना गंगा जल डाल दूँ, इस प्रकार उस सारे झरने पर मेरा ही अधिकार हो जायेगा। पहला और दूसरा दोनों ही गुप्त रूप से ऐसा सोच रहे थे, इसलिये उन्हें बहुत जल्दी थी- वे बहुत तेजी से चलने लगे। तीसरा व्यक्ति उदार हृदय था-उसके मन में किसी प्रकार की आशंका न थी, वह धीरे-धीरे चल रहा था।

🔶 रास्ते में कई मनुष्य ऐसे मिले जो प्यास के मारे चिल्ला रहे थे। आगे दौड़ने वाले उन दोनों ने प्यासे आदमियों को पुकार तो सुनी, किन्तु उस पर कोई ध्यान न दिया, जल्दी सोना पाने की धुन में उन्हें दूसरों का कुछ ख्याल न था। तीसरा साथी जो पीछे-पीछे आ रहा था। उसने एक प्यास के मारे चिल्लाते हुए वृद्ध मनुष्य को रास्ते में पड़ा पाया, उसने तुरन्त ही अपने घड़े में से उसे पानी पिला दिया। आगे चला तो एक स्त्री अपने बालक को गोद में लिए रास्ते में रोती हुई मिली, पूछने पर उसने बताया कि प्यास के मारे मेरा और मेरे बच्चे का दम निकला जा रहा है, उसने उस स्त्री और उसके बच्चे को भी पानी पिलाया। जब झरना थोड़ी दूर रह गया तो उसने रास्ते में एक कुत्ते को पड़ा देखा तो प्यास से छटपटा रहा था, उसने देखा कि यदि कुछ ही देर और उसे पानी न मिलेगा तो जरूर ही उसके प्राण निकल जायेंगे। उसने बचा हुआ सारा गंगाजल उस कुत्ते को पिला दिया और खाली घड़ा लेकर झरने की तरफ चल दिया।

🔷 वह सोच रहा था कि तेज चलने वाले मेरे दोनों साथी झरने पर पहुँच गये होंगे और झरना सोने का हो चुका होगा। पर जब वह वहाँ पहुँचा तो देखा उसके साथी वहाँ तक नहीं पहुँचे और झरना भी वैसा ही बह रहा है। साथी कहाँ गये इस चिन्ता में वह इधर-उधर घूमने लगा। इतने में वही साधु उस के पास आया और कहने लगा-बेटा, मैं ही कुबेर हूँ। तुम लोगों की परीक्षा लेने आया था। रास्ते में जो वृद्ध पुरुष, स्त्री, कुत्ता मिले थे वे और कोई नहीं थे, मैंने ही अपने रूप बना लिये थे और तुम लोगों का हृदय जाँच रहा था। तुम्हारे दोनों साथी अपनी स्वार्थ बुद्धि के कारण पत्थर हो गये हैं और देखो वहाँ पड़े हुए हैं। तुम अपना घड़ा मुझे दो। उस घड़े में एक दो बूँद जो गंगाजल था वह साधु ने झरने में डाला, वह सारा सोना का हो गया। साधु ने कहा-बेटा जितना चाहिये सोना ले जाओ। तुम्हीं सोना पाने के वास्तविक अधिकारी हो, इसलिए तुम्हें ही वह संपदा मैं दे रहा हूँ। उन स्वार्थ बुद्धियों को अपना फल भोगने दो।
 

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 June 2018


👉 आज का सद्चिंतन 7 June 2018


👉 शान्त विचारों की शक्ति (अन्तिम भाग)

🔶 जिस मनुष्य की इच्छायें जितनी ही अधिक होती हैं उसे भय, चिन्ता, सन्देह और मोह से मनुष्य की आध्यात्मिक शक्ति का ह्रास होता है। अतएव ऐसे व्यक्ति के संकल्प फलित नहीं होते। वह जो काम हाथ में लेता है उसे पूरे मन से नहीं करता। अधूरा काम अथवा आधे मन से किया गया काम कभी सफलता नहीं लाता। आधे मन से किये गये कार्य में मनुष्य का चेतन मन तो कार्य करता है पर अचेतन मन उस की सहायता के लिये अग्रसर नहीं होता। ऐसी अवस्था में मनुष्य के शीघ्रता से थकावट आ जाती है और वह अपने कार्य को अधूरा छोड़ने के लिये बाध्य हो जाता है।

🔷 जिस प्रकार शाँत विचार मनुष्य के स्वभाव को बदल देते हैं और संपर्क में आने वाले व्यक्ति यों को प्रभावित करते हैं, उसी प्रकार दूर रहने वाले व्यक्ति के हृदय को भी प्रभावित करते हैं। एकान्त में हर किसी भी व्यक्ति का चिन्तन करके उसके मन से अपने मन का सम्बन्ध जोड़ सकते हैं। ऐसा करने पर हम उससे वही विचार करवा सकते हैं जो कराना चाहते हैं।

🔶 किसी व्यक्ति के प्रति नित्य प्रति हमारे हृदय में आने वाले विचार उस व्यक्ति को प्रभावित करते हैं वह हमारे विषय में भी वैसा सोचने लगता है जैसे कि हम उसके विषय में सोचते हैं। जितना ही हम इस सिद्धान्त पर विश्वास करते हैं कि रेडियो की लहरों की भाँति विचारों की लहरें दूर−दूर के लोगों को प्रभावित करती हैं उतना ही हम प्रत्यक्ष रूप से अपने विचारों द्वारा दूसरे लोगों को प्रभावित करने में समर्थ होते हैं। दूसरों के कल्याण के विचार जितने बली होते हैं उतने अकल्याण के विचार नहीं होते अतएव कल्याण के सभी विचारों से अवश्य लाभ होता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1955 पृष्ठ 7

👉 Sadhana

🔶 Swami Vivekanand was taking a stroll along the banks of the Ganga near Vellur Matha one evening. Sister Nivedita, Sharatchandra Chakravarti and a few others were also accompanying him. While walking, some of them started discussing about the Divine (India) Culture. Swamiji said, “The  Divine Culture represents a harmonious blend of sadhana (purity and strength of character) and samvedana (loving kindness and compassion).

🔷 Lack of either would strike at the very roots of the structure and aim of our culture. Sadhana without samvedana leads to arrogance. And, samvedana sans sadhana proves to be nothing more than sentimental effervescence. A balanced cultivation of both generates what is essential for the expression of divinity in humanity.

📖 From Pragya Puran 

👉 मृतक भोज के सम्बन्ध में इस प्रकार भी सोचें (भाग 1)

🔶 यह बात नितान्त सत्य है कि किसी मृतक व्यक्ति का सम्बन्धी मृतक भोज खुशी से नहीं देता। वह इस अनुचित एवं अपव्ययी दण्ड को मजबूरन सहन करता है—क्योंकि समाज में इसकी प्रथा चल रही है और वह एक सामाजिक व्यक्ति है, समाज की रीति-नीतियों का उल्लंघन कर सकना उसके वश की बात नहीं है।

🔷 किसी अमीर आदमी की बात तो छोड़ दीजिए। वह अपने मरों के नाम पर कुछ भी खर्च कर सकते हैं, बांट सकते हैं, लुटा सकते हैं। उनमें सामर्थ्य होती है। ‘‘समरथ को नहीं नहीं दोष गुसाईं’’ के अनुसार उन्हें तो कोई भी प्रदर्शन एवं शोन-शेखी जेवा देती है। प्रश्न उन साधारण व्यक्तियों का है जो दोनों छाक अपने बच्चों के लिये भोजन भी कठिनता से जुटा पाते हैं और जिनकी संख्या समाज में अस्सी-नब्बे प्रतिशत से कम नहीं होती। इस प्रकार की आर्थिक आत्म–हत्या का प्रश्न उन्हीं सामान्य लोगों के लिये ही है।
समाज में जब तक मृतक-भोज जैसी विनाश कारी प्रथा प्रचलित ही है तब उसको किस प्रकार रोका जाये—इस पर विचार करने से इसी निष्कर्ष पर पहुंचना पड़ता है कि मृतक-भोज खाने वालों को ही इसका प्रचलन रोकने के लिये उदारतापूर्वक तत्पर होना चाहिये।

🔶 जब किसी का कोई स्वजन मर जाता है तब सामाजिक नियम उसे मृतक भोज देने के लिए तकाजा करता है। इस तकाजे में परोक्ष रूप से उस जातीय बहुमत का दबाव रहता है जो उसके यहां खाने के लिए जाने वाला होता है। यद्यपि यह बहुमत मृतक व्यक्ति के घर जाकर उसके सम्बन्धी से सीधे-साधे भोज की मांग नहीं करता तब भी उसकी यह मांग जातीय बहिष्कार के रूप में नग्न हो उठती है जब कोई आर्थिक कठिनाइयों के कारण मृतक भोज नहीं दे पाता अथवा देने में आना-कानी करता है। इस प्रकार यह दबाव खाने वालों की ओर से ही पड़ा करता है। यदि भोजन का लोभ छोड़ कर जातीय बन्धु थोड़ी उदारतापूर्वक काम लें तो यह समस्या सहज ही हल हो सकती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 82

👉 गुरुगीता (भाग 125)

👉 गुरूगीता के पाठ की महिमा न्यारी
🔶 ऐसा ही अनुभव दक्षिण भारत में कृष्ण नदी के किनारे बसे गाँव त्र्यंगम के निवासी मुरली कृष्णन को हुआ। मुरली कृष्णन जन्म से ब्राह्मण थे। उनकी शिक्षा सामान्य ही हो पायी थी। परिवार में गरीबी थी, उस पर शत्रुओं का आतंक। पिताजी बचपन में ही चल बसे थे। घर में अकेली माँ और दो बहनें थीं, जिन पर गाँव के जमीदार की कुदृष्टि थी। असहाय, अकेलापन, न कोई मार्गदर्शन और न कोई राह बताने वाला। कहाँ जायें, किसके पास जायें। जो राह मिली भी, वे दुष्कर थी। किसी ने उन्हें किसी ज्योतिषी के पास जाने को कहा, किसी ने तांत्रिकों के पते बताए। मुरली कृष्णन की माँ काफी समय तक इधर- उधर भटकती फिरीं। परन्तु मिला कुछ नहीं उलटे घर की हालत और बिगड़ती गई और शत्रुओं का आतंक बढ़ता गया।

🔷 एक दिन शाम के समय मुरली कृष्णन ने अपनी माँ से कहा- माँ भगवान् सद्गुरू हैं, वे सभी का मार्गदर्शन करते हैं- क्यों न हम उन्हीं की शरण में जायें? प्रभु जो चाहेंगे- वही अच्छा होगा। ऐसा निश्चय करके मुरली कृष्णन ने पूर्णिमा की तिथि से गायत्री महामंत्र के जप के साथ गुरूगीता के पाठ का निश्चय किया। नियमित सन्ध्योपासना, अल्पाहार, अस्वादव्रत के साथ मुरली कृष्णन की साधना चलने लेगी। गायत्री महामंत्र के जप की ग्यारह मालाएँ पूरी करने में उसे लगभग एक घण्टे का समय लगता। पूजा के विधान सहित गुरूगीता के पाठ में भी लगातार एक घण्टा लग जाता।

🔶 इस क्रम से प्रातः सायं उसकी साधना चलने लगी। प्रारम्भ में तो कुछ भी फर्क नहीं पड़ा। शत्रु और शत्रुता ज्यों के त्यों बने रहे। लेकिन तीन महीने के बाद गुरूगीता की पाठ- साधना के प्रभाव स्पष्ट दिखने लगी। लोगों की बढ़ती उपेक्षा कम होने लगी। गाँव के कई प्रभावी लोग उनके पक्ष में खड़े हो गए । माँ की मेहनत एवं पुरखों के खेती में आय से घर का सामान्य खर्च चलने लगा। आतंक की छाया, शान्ति की शीतलता में बदलने लगा। अब तक मुरली कृष्णन का मन भी साधना में रमने लगा।

🔷 साधना के तीन वर्ष पूरे होते- होते न केवल स्थितियों में सुखद परिवर्तन हुआ, बल्कि मनः स्थितियों में भी आध्यात्मिक भाव उभरने लगा। अन्तश्चेतना में भगवान् सदाशिव एवं जगदम्बा पार्वती की झलकियाँ मिलने लगी। एक दिन ध्यान की गहनता में उसने स्वयं को भगवान् भोलेनाथ के समीप पाया। उसने अनुभव किया कि प्रभु स्वयं उसे स्वीकार करते हुए कह रहे हैं, वत्स ! मैं ही वह गुरूतत्त्व हूँ जो जगती पर भिन्न- भिन्न नाम रूपों में प्रकट होता है। भगवान् की यह वाणी सुनकर मुरली कृष्णन के अन्तस् से बस यह स्वर निकले- मुझे अपना लें प्रभु ! और उसे लगा- भगवान् कह रहे हैं कि गुरूगीता को जो अपनाता है, उसे मैं स्वभावतः अपना लेता हूँ। प्रभु का यह आश्वासन प्रत्येक साधक के साथ है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 188

👉 विवाहोन्माद प्रतिरोध आन्दोलन (भाग 2)

🔶 हिन्दू समाज में विवाहों का आरम्भ आज जिस ढंग से, जिस विचारधारा के साथ आरम्भ किया जाता है, उसे अत्यन्त निराशाजनक एवं दुर्भाग्यपूर्ण ही कहना चाहिए। उपयुक्त जोड़ी ढूँढ़ने से लेकर दोनों कुटुम्बों में परस्पर अगाध स्नेह सहानुभूति रहने तक जो उल्लासपूर्ण वातावरण रहना चाहिए और दो आत्माओं के आत्मसमर्पण यज्ञ की जो परम पवित्र धार्मिक सद्भावना पूर्ण परिस्थितियाँ रहनी चाहिए, उनका कहीं ढूँढ़े भी दर्शन नहीं होता। सच तो यह है कि सब कुछ इससे विपरीत होता है। छोटे-छोटे अबोध बालकों को गृहस्थ निर्माण का भार वहन करने के लिए विवाह वेदी पर प्रस्तुत कर दिया जाता है।

🔷 युवावस्था आने से पूर्व विवाह करना, अबोध बालकों का बाल विवाह भी भला कोई विवाह है। उसे तो एक श्रेष्ठ परम्परा का थोथा प्रदर्शन मात्र कहा जा सकता है। इसी प्रकार अनमेल विवाह भर्त्सना के योग्य है। अधेड़ एवं बूढ़े आदमी यदि अपनी बेटी, पोतियों की आयु की बच्चियों से विवाह करें तो उसमें क्या तो नैतिकता मानी जायगी और क्या मानवता एवं क्या सामाजिकता? कई-कई बच्चे होते हुए भी पुरुष एक के बाद दूसरे कई-कई विवाह करते चले जायें, पर स्त्री यदि अल्पायु में भी विधवा हो जाय तो उसे उस प्रकार की सुविधा न मिले। इस तरह के पक्षपात एवं अन्याय युक्त कानून जिस समाज में प्रचलित हों और उसके लोग इस अनीति का समर्थन भी करते हों, तो उसे अपने को धर्मवान कहलाने का भला क्या अधिकार हो सकता है?

🔶 आज जिस ढंग से, जिस आडम्बर, अहंकार और तामसी वातावरण में विवाह-शादियाँ होती हैं, उन्हें देखकर किसी भी प्रकार यह नहीं कहा जा सकता कि यह दो आत्माओं के आत्म-समर्पण के लिए आयोजित सर्वमेध यज्ञ का धर्मानुष्ठान है। उन दिनों तमोगुण की ही घटायें छाई रहती हैं। अश्लील गीत, गन्दे नाच, ओछे मखौल, पान, बीड़ी, भाँग शराब की धूम, देखकर उसकी संगति यज्ञ से कैसे बिठाई जाय?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1965 पृष्ठ 44
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/July/v1.44

👉 बुरे विचारों का निवारण

🔷 जीव पूर्व जन्मों में अनेक प्रकार के शुभ अशुभ कार्य कर चुका होता है और भले बुरे दोनों ही प्रकार के संस्कार उसके गुप्त मन पर अंकित रहते हैं, तदनुसार दोनों प्रकार के विचार मन में उठा करते हैं। ऐसे मनुष्य मिलना कठिन है, जिनके मन में कभी बुरे विचार उत्पन्न ही न होते हों। बुरे विचार उठें, तो निराश न होना चाहिए, वरन् उन्हें काबू में करने का प्रयत्न करना चाहिए। यदि विवेक का बल हो, तो बुरे विचारों के अनुसार कार्य नहीं होने पाता और वे मन में उत्पन्न होकर वहीं नष्ट हो जाते हैं। किन्तु यदि विवेक निर्बल हो और इन्द्रियों की लालसा बढ़ी हुई हो, तो उस कुसंग के साथ वे बुरे विचार बढ़ जाते हैं और छोटे से बड़ा रूप धारण कर लेते हैं।

🔶 तरंग स्वयं बहुत छोटी वस्तु है, पर संगति से समुद्र बन जाती है। इसी प्रकार एक छोटा सा बुरा विचार यदि अनियंत्रित होकर कुसंग में पड़ जाय, तो समुद्र हो सकता है और मनुष्य को अपने में डुबा कर नष्ट कर सकता है। बुरे विचारों को बाह्य परिस्थितियाँ भी बड़ा सहारा देती हैं। बुरे स्थान, दृश्य, साहित्य, चित्र और जीव यह सभी कुविचारों को उत्तेजित करने में सहायक होते हैं।

🔷 जो मनुष्य अपने जीवन को ऊंचा उठाना चाहते हैं, उन्हें चाहिए कि सतर्कतापूर्वक ‘आत्मनिरीक्षण’ करते रहें, जब कोई बुरा विचार उत्पन्न हो रहा हो, तो उसे तुरन्त ही यहाँ से हटा कर उसके स्थान पर शुभ संकल्प आरोपित करना चाहिए। जिस प्रकार बिच्छू के कपड़े पर चढ़ते ही उसे हटाने का अविलम्ब प्रयत्न करते हैं, उसी प्रकार बुरे विचार को मन में उत्पन्न होते ही हटा देना चाहिए, तभी हम जीवन लक्ष तक पहुँच सकेंगे।

📖 अखण्ड-ज्योति अक्टूबर 1941 पृष्ठ 20

👉 गुरुगीता (भाग 124)

👉 गुरूगीता के पाठ की महिमा न्यारी

🔷 गुरूगीता के विगत क्रम में कुछ ऐसे ही मांत्रिक महत्त्व की चर्चा की गयी है। इसमें बताया गया है कि गुरूपुत्र सब तरह से वरण के योग्य है गुरूगीता के महामंत्र संसार के मलों को धोकर भवपाशों से छुटकारा दिलाते हैं। जो गुरूगीता के जल से स्न्नान करता है, वह ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ होता है। वह जहाँ भी रहता है, वह स्थान पवित्र हो जाता है। यही नहीं वहाँ पर सभी देवशक्तियाँ निवास करती हैं। गुरूगीता का पाठ करने वाला पवित्र ज्ञानी पुरूष प्रत्येक अवस्था में विशुद्ध होता है, किसी भी अवस्था मे उसका दर्शन कल्याणकारी है।

🔶 इस तत्त्वकथा का विस्तार करते हुए भगवान् भोलेनाथ कहते हैं-

समुद्रे च यथा तोयं क्षीरे क्षीरं घृते घृतम्। भिन्ने कुम्भे यथाकाशः तथात्मा परमात्मनि॥ १६२॥
तथैव ज्ञानी जीवात्मा परमात्मनि लीयते। ऐक्येन रमते ज्ञानी यत्र तत्र दिवानिशम् ॥ १६३॥
एवंविधो महामुक्तः सर्वदा वर्त्तते बुधः। तस्य सर्वप्रयत्नेन भावभक्तिं करोति यः॥१६४॥
सर्वसंदेहरहितो मुक्तो भवति पार्वति। भुक्तिमुक्तिद्वयं तस्य जिह्वाग्रे च सरस्वती॥१६५॥

🔷 समुद्र में जिस तरह से जल ,दुग्ध में दुग्ध ,घृत में घृत, घड़े का आकाश घड़े के फूट जाने से बाह्याकाश में मिल जाता है, उसी तरह से आत्मा परमात्मा में मिल जाती है॥ १६२॥ इसी तरह से ज्ञानी जीवात्माएँ परमात्मा चेतना में लीनता का अनुभव करती हैं। इस एकता के कारण ही ज्ञानी दिन- रात आनन्द में निमज्जित रहता है॥ १६३॥ इस तरह सक ज्ञानी सदा जीवन मुक्त होकर वास करता है, जो साधक प्रयत्नपूर्वक उसकी भावभक्ति करता है, वह सन्देह रहित होकर मुक्त होता है। उसे भोग एवं मोक्ष दोनों ही मिलते हैं, उसकी जिह्वा पर सरस्वती निवास करती है॥ १६४- १६५॥

🔶 भगवान् सदाशिव के इन वचनों में न केवल गुरूगीता के पाठ का महत्त्व है, बल्कि पाठ करने वाले को भी महत्त्वपूर्ण बताया गया है। जो गुरूगीता की शरण में है, उसे किसी अन्य की आवश्यकता नहीं रहती। बस सद्गुरू की मूर्ति, चित्र के सामने पंचोपचार पूजन के पश्चात् पाठ करने की आवश्यकता है। इस पाठ से सभी संकटों का नाश होता है। आपत्तियाँ दूर होती हैं। सद्गुरू की कृपा मिलती है एवं चित्त में आध्यात्मिक ज्ञान का प्रकाश होता है। यह कथन केवल शाब्दिक नहीं है, बल्कि इसमें अर्थ की गहनता समायी है। जो भी गुरूगीता की साधना करते हैं, अथवा करेंगे, उन्हें इसकी अनुभूति होने में कोई सन्देह नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 187

👉 भारत को ईसाई बनाने का षडयन्त्र (अन्तिम भाग)

🔷 इसाइयों से अपने को सुरक्षित समझने वाले बौद्ध, सिक्ख, पारसी, मुसलमान और यहूदी आदि को इस बात पर गहराई से विचार करना चाहिए कि भारत की धर्म-निरपेक्षता तथा हिन्दुओं की उपेक्षापूर्ण धार्मिक सहिष्णुता का अनुचित लाभ उठाते हुए यदि ईसाई मिशनरी इसी तेजी से हिन्दुओं को अपने जाल में फंसाने में सफल होते रहे तो शीघ्र ही उनकी जनसंख्या भारत में बहुत अधिक हो जायगी और तब ऐसी स्थिति में भारत के सारे गैर ईसाई उनकी तुलना में अल्पसंख्यक हो जायेंगे।

🔶 क्या ईसाइयों का यह बहुमत तब शक्ति पाकर सम्पूर्ण भारत को ईसाई देखने के लिए व्यग्र पोप, पादरियों तथा प्रचारकों को अल्पसंख्यक गैर ईसाइयों को अपने में आत्मसात् करने के प्रपंचों के लिए साहस, अवसर तथा प्रोत्साहन नहीं देगा? इसलिए भारत की धर्म-निरपेक्ष नीति, धार्मिक सहिष्णुता तथा राष्ट्रीय स्वरूप को सुरक्षित रखने और लोकतन्त्र की गरिमा बनाये रखने के लिए आवश्यक है कि भारत के सारे गैर ईसाई जन-समुदाय एक साथ होकर ईसाइयों के इस बढ़ते हुए धार्मिक साम्राज्य को रोकने का प्रयत्न करें।

🔷 हिन्दुओं का तो यह धार्मिक कर्तव्य है कि वे ईसाइयों के षडयन्त्र से आत्मरक्षा में अपना तन-मन-धन लगा दें और गैर ईसाई मिशनरियों की अराष्ट्रीय गतिविधियों को रोकने में अपना नैतिक समर्थन देकर हिन्दुओं की हिमायत को आगे बढ़ें और आज जो हिन्दुओं को लपेटती हुई ईसाइयत की लपट परोक्ष रूप से उनकी ओर बढ़ रही है, उसे यहीं पर बुझा दें। ऐसा करने से ही भारत में धर्मनिरपेक्षता, धार्मिक बन्धुत्व तथा सच्चे लोकतन्त्र की रक्षा हो सकेगी, अन्यथा पुनः आजादी को खतरा की सम्भावना हो सकती है।

🔶 यह स्पष्ट है कि पाश्चात्य देशों की सरकारें तथा संस्थायें भारत में मिशनरियों को एजेन्ट रूप में भेज कर ईसाइयत को बढ़ावा दे रही हैं और एक प्रकार से वे धर्म का आधार लेकर उन देशों का साम्राज्य ही भारत में स्थापित करने का प्रयत्न कर ही हैं। विदेशों के इस धर्मधारी साम्राज्यवाद से बचाव हेतु सम्पूर्ण गैर ईसाइयों को एक मंच पर आकर ईसाइयों के मलीन मन्तव्यों को सफल होने से रोकने के लिए भरसक प्रयत्न करना ही चाहिए।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 36

👉 शान्त विचारों की शक्ति (भाग 2)

🔷 हम जो कुछ सोचते हैं उसका स्थायी प्रभाव हमारे ऊपर तथा दूसरों के ऊपर पड़ता है। शान्त विचार धीरे−धीरे हमारे मन को ही बदल देते हैं। जैसी हमारे मन की बनावट होती है वैसे ही हमारे कार्य होते हैं और हमारी सफलता भी उसी प्रकार की होती है। हम अनायास ही उन कार्यों में लग जाते हैं जो हमारी प्रकृति के अनुकूल हैं, और उन कामों से डरते रहते हैं जो हमारी प्रकृति के प्रतिकूल हैं। अपने स्वभाव को बदलना हमारे हाथ में है। यह अपने शान्त विचारों के कारण बदला जा सकता है। स्वभाव के बदल जाने पर मनुष्य को किसी विशेष प्रकार का कार्य करना सरल हो जाता है।

🔶 जिस काम को मनुष्य अपने आन्तरिक मन से नहीं करना चाहता, पर दिखावे के रूप में उसे करने के लिए बाध्य होता है तो उसे अनेक प्रकार की रुकावटें उसे दर्शाती हैं कि तुम्हारा आन्तरिक मन उक्त काम के प्रतिकूल है। शान्त होकर यदि मनुष्य अपनी किसी प्रकार की भूल अथवा कार्य की विफलता पर विचार करे तो वह इसका कारण अपने आप में ही पावेगा। जो काम अनुद्विग्न मन होकर किया जाता है, उससे आत्म विश्वास रहता है और उसमें सफलता अवश्य मिलती है। शान्त मन द्वारा विचार करने से स्मृति तीक्ष्ण हो जाती है और इन्द्रियाँ स्वस्थ हो जाती हैं।

🔷 शान्त विचारों का चेतन मन नहीं होता। शान्त विचार ही आत्मनिर्देश की शक्ति हैं। इन विचारों को प्राप्त करने के लिये वैयक्तिक इच्छाओं का नियंत्रण करना पड़ता है। जिस व्यक्ति की इच्छायें जितनी ही नियंत्रित होती है, जिस मनुष्य में जितनी वैराग्य की अधिकता होती है उसके शान्त विचारों की शक्ति उतना ही अधिक प्रबल होती है। जो मनुष्य अपने भावों के वेगों को रोक लेता है वह उन वेगों की शक्ति को मानसिक शक्ति के रूप में परिणत कर लेता है। इच्छाओं की वृद्धि से इच्छा शक्ति का बल कम होता है और उसके विनाश से उसकी शक्ति बढ़ती है। इच्छाओं की वृद्धि शाँत विचारों का अन्त कर देती है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1955 पृष्ठ 6

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 June 2018

👉 आज का सद्चिंतन 6 June 2018

रविवार, 3 जून 2018

👉 उपदेश का सही मर्म

👉 गुड़-गुड़ कहने से मुंह मीठा नहीं होता।

🔶 सच ही है उपदेश का मर्म वही समझता है जो उसे धारण करना जानता हैं वाणी के साथ आचरण का अंग बन जाने वाला ज्ञान ही सच्चा ज्ञान है और इसे धारण करने वाला ही सच्चा ज्ञानी है। लेकिन आज के समय में तो सिर्फ पढ़ा जाता हैं अमल नहीं किया जाता।

🔷 यह उस समय की बात है जब कौरव और पांडव गुरु द्रोणाचार्य जी के आश्रम में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। एक दिन गुरु द्रोण ने अपने सभी शिष्यों को एक सबक दिया- ‘सत्यम वद‘ मतलब सत्य बोलो। उन्होंने सभी शिष्यों से कहा की इस पाठ को भली भांति याद कर लें, क्योंकि उनसे यह पाठ कल पूछा जाएगा। अध्यापन काल समाप्त होने के बाद सभी शिष्य अपने-अपने कक्षों में जाकर पाठ याद करने लगे।

🔶 अगले दिन पून: जब सभी शिष्य एकत्रित हुए तो गुरु द्रोण ने सबको बारी-बारी से खड़ा कर पाठ सुनाने के लिए कहा। सभी ने गुरु द्रोण के सामने एक दिन पहले दिया गया शब्द दोहरा दिया, लेकिन युधिष्ठर चुप रहे। गुरु के पूछने पर उन्होंने कहा की वे इस पाठ को याद नहीं कर पाये हैं।

🔷 इस प्रकार 15 दिन  बीत गए, लेकिन युधिष्ठर को पाठ याद नहीं हुआ। 16 वें दिन उन्होंने गुरु द्रोण से कहा की उन्हें पाठ याद हो गया हैं और वे उसे सुनाना चाहते हैं। द्रोण की आज्ञा पाकर उन्होंने ‘सत्यम वद‘ बोलकर सुना दिया। गुरु ने कहा-युधिष्ठर, पाठ तो केवल दो शब्दों का था। इसे याद करने में तुम्हें इतने दिन क्यों लगें?

🔶 युधिष्ठर बोले- गुरुदेव, इस पाठ के दो शब्दों को याद करके सुना देना कठिन नहीं था,  लेकिन जब तक में स्वयं आचरण में इसे धारण नहीं करता, तब तक कैसे कहता की मुझे पाठ याद हो गया है।

🔷 मित्रों इसी तरह कितने सारे लोग है, लगभग सभी ने भगवद गीता - कुरान पढ़ी होगी, लेकिन युधिष्ठिर की तरह नहीं केवल ऊपर से पढ़ी होगी, शब्द-शब्द पढ़े होंगे।

🔶 जरा सोचिये अगर आज के लोगों ने सच में गीता - कुरान को पढ़ा होता तो आज जो हमारे मानव समाज की स्थिति हैं क्या ऐसी होती। सभी धर्म में यही हो रहा हैं, सभी लोगों ने धर्म को ऊपर-ऊपर पढ़ा हैं, लेकिन उसे जाना नहीं। और जब तक आप किसी चीज़ को जान नहीं लेते तब तक आपका उसे पढ़ना व्यर्थ हैं।

🔷 आप ही सोचिये गीता-कुरान इन सब में लिखा हुआ होता हैं की इनको पढ़ने पर मोक्ष प्राप्त होता हैं। लेकिन लग भग सभी लोग गीता-कुरान पढ़ते हैं फिर उन्हें मोक्ष क्यों नहीं होता, सीधी सी बात हैं क्यूंकि वो सिर्फ पढ़ते हैं, अमल नहीं करते उन बातों पर, अपने जीवन में नहीं ढालते उन बातों को जो की गीता-कुरान में बताई जाती।

🔶 तो मित्रों हमारा निवेदन हैं की आप जो भी पढ़ें, उसे सिर्फ पढ़ने तक ही सिमित न रहने दें उसे अपने जीवन में उतारें, उसे अमल करें।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 June 2018


👉 आज का सद्चिंतन 4 June 2018


👉 शान्त विचारों की शक्ति (भाग 2)

🔶 गम्भीर परिस्थितियों में मन का शाँत रहना इस बात का प्रतीक है कि व्यक्ति को किसी भारी शक्ति का सहारा मिल गया है। शान्त मन रहने से प्रतिकूल परिस्थितियाँ थोड़े ही काल में अनुकूल परिस्थितियों में परिणत हो जाती हैं। शाँत विचारों की शक्ति का दूसरे लोगों के मन पर स्थायी प्रभाव पड़ता है। वास्तव में हमारी ही शक्ति दूसरे की शक्ति के रूप में प्रकाशित होती है। यदि किसी व्यक्ति का निश्चय इतना दृढ़ हो कि चाहे जो परिस्थितियाँ आवें उसका निश्चय नहीं बदलेगा तो वह अवश्य ही दूसरे व्यक्ति यों के विचारों को प्रभावित करने में समर्थ होगा। जितनी ही किसी व्यक्ति की मानसिक दृढ़ता होती है उसके विचार उतने ही शान्त होते हैं। और उसकी दूसरों को प्रभावित करने की शक्ति उतनी ही प्रबल होती है।

🔷 शान्त विचारों का दूसरों पर और वातावरण पर प्रभाव धीरे−धीरे होता है। उद्वेगपूर्ण विचारों का प्रभाव तुरन्त होता है। हम तुरन्त होने वाले प्रभाव से विस्मित होकर यह सोच बैठते हैं कि शान्त विचार कुछ नहीं करते और उद्वेग पूर्ण विचार ही सब कुछ करते हैं। पर जिस प्रकार किसी बीज को वृक्ष रूप में परिणत होने के लिए शान्त शक्तियों को काम करने की आवश्यकता होती है, इसी प्रकार किसी विचार को फलित होने के लिये शान्त होने की आवश्यकता होती है और दूसरा कार्य दृश्य जगत में होता है।

🔶 शान्त विचारों से शरीर में आश्चर्य जनक परिवर्तन हो जाते हैं। लेखक का एक मित्र 20 वर्ष का युवक हो चुका था। इस समय भी वह ऊँचा और मोटाई में एक चौदह वर्षीय बालक के समान लगता था। उसने किसी शुभचिन्तक के सुझाने पर नियमित रूप से व्यायाम करना प्रारम्भ किया। थोड़े ही दिनों में वह चार इंच बढ़ गया और उसका शरीर भी पुष्ट हो गया। उसकी समझ थी कि व्यायाम ने उसे बढ़ा दिया। इसमें कोई सन्देह नहीं कि व्यायाम से उसे लाभ हुआ, पर उससे भी अधिक लाभ उसके निश्चय से हुआ। इस निश्चय के कारण प्रतिदिन के शान्त विचार उसकी भावना को प्रबल करते गये और इस प्रकार उसके शरीर में मौलिक परिवर्तन होते गये।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1955 पृष्ठ
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👉 THE SUBTLE DETERMINATORS OF HUMAN PERSONALITY

🔶 The dominant influences in the formation of human personality are generally believed to be environment and enterprise. But this belief holds true only to a certain extent. It is a matter of common observation that children born and brought up in similar circumstances develop major mental and emotional differences later. This is primarily on account of the basic life-elements, which go to make the person of an offspring.

🔷 These subtle influences come down over many previous generations from both paternal and maternal sides. They combine to maintain the continuity of hereditary characteristics and also mutate in a strange way to spawn entirely new traits and identities, thereby taking evolution forward.

🔶 Scientists have been able to uncover the fundamental basis of life of not only human beings but of all the life forms belonging to animal and plant worlds. Since the second half of the 20th century, a great amount of research has been made in this direction and almost daily new findings are published. This rapid and profuse work is propelled by advances in electron microscopy and cybernetics in which information from different fields are collated and integrated into a composite whole.

🔷 All living organisms from the simplest amoeba to the most complex human body have been formed by the same life-chemical, the DNA or deoxyribonucleic acid. The DNA contains in chemically coded form - the blueprint of life, i.e., all the information needed to build, control and maintain a living organism. The DNA has extremely tiny spring-like structures, which can be seen through an electron microscope. The defined stretch of DNA is called genes. The genes have memory banks and they continually feed the body cells with instructions about the formation and functioning of body organs. This way co-ordination among the billions of body cells is achieved.

🔶 DNA is found in every living organism except in human RBC and certain types of viruses. An adult human body has 600 billion “energy packets” of DNA. In shape and chemical composition, all of these are similar whether in humans or animals or even in grass blades. The key to all of life’s diversity is hidden in DNA. The particular order of its constituent bases determines whether an organism is a human or a bird, fish, insect or vegetable. An Indian-American scientist Dr. Hargovind Khurana made path-breaking discoveries about the structure of RNA (ribonucleic acid) and was awarded the Nobel Prize in 1968.

📖 From Akhand Jyoti Apr 2002

👉 भारत को ईसाई बनाने का षडयन्त्र (भाग 3)

🔶 ईसाई पादरियों तथा मिशनरियों का ऐसा ज्वलन्त आह्वान और भयानक विचार न केवल भारत के हिन्दुओं अपितु सारी गैर ईसाई जनसंख्या की आंखें खेल देने को एक खुली चुनौती है। अपने धर्म की रक्षा तथा भारतीय राष्ट्र की एकता के लिए क्या यह आवश्यक प्रतीत नहीं होता कि गैर-ईसाई जनता विदेशी मिशनरियों के अनुचित इरादों को असम्भव बना देने के लिए आवाज उठाए। यदि भारत की ईसाई जनसंख्या यों ही विदेशी मिशनरियों की गतिविधियों को उपेक्षा की दृष्टि से देख कर प्रमाद में ही पड़ी ही तो यह असम्भव बात न होगी कि ईसाई ‘ईसाई भारत’ के अपने ध्येय के बहुत कुछ समीप जा पहुंचें और तब तक क्या हिन्दू, क्या मुसलमान और क्या सिक्ख सभी धर्मों के मिट जाने का खतरा पैदा हो सकता है।

🔷 यह बात सही है कि ईसाई मिशनरियों को हिन्दुओं की अपेक्षा अन्य धर्म वालों पर अपना प्रपंच चलाना आसान नहीं पड़ता। वे मुख्यतः हिन्दुओं को ईसाई बनाने में जुटे हुए हैं, इसके दो मुख्य कारण हैं—पहला, अति धर्म-सहिष्णुता, वे धर्म-बन्धुओं के बीच इसी अति के दोष से ईसाइयत का प्रचार सहन करते जा रहे हैं। दूसरा यह कि गैर ईसाई अहिन्दुओं की धार्मिक रूढ़िवादिता के कारण ईसाई मिशनरियों को उनके बीच जाल बिछाने का अधिक अधिक अवसर नहीं मिलता अहिन्दू गैर ईसाइयों की रूढ़िवादिता उन्हें अपने बीच धंसने का साहस नहीं करने देती। किन्तु इसका यह अर्थ लगाना गलत होगा कि अहिन्दू गैर ईसाई ईसाइयों के धार्मिक षडयन्त्र से सुरक्षित है और यदि वे ऐसा सोचते हैं तो गहरी भूल करते हैं। अहिन्दू गैर ईसाइयों को भी इस षडयन्त्र की, जो ईसाइयों के बीच प्रचार-प्रपंच चला रखा है, उपेक्षा नहीं करनी चाहिए और समझ लेना चाहिए कि हिन्दुओं पर किया गया आघात परीक्षा रूप में उन पर भी एक आघात है।

🔶 कैथोलिक ईसाई पत्रों के कथनों से यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि भारत के गैर ईसाई समुदाय से ईसाई मिशनरियों को ईर्ष्या है और वे उनकी विशाल जनसंख्या को फूटी आंखों भी नहीं देख पा रहे हैं। वे सम्पूर्ण भारत के गैर ईसाइयों को ईसाई बनाकर ‘ईसाई-भारत’ का स्वप्न देखते हैं और उसके लिए हर उचित-अनुचित उपाय करते जा रहे हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 35

👉 गुरुगीता (भाग 123)

👉 गुरूगीता के पाठ की महिमा न्यारी

🔶 गुरूगीता के महामंत्रों के मनन से शिष्य का त्राण होता है। इसका विधानपूर्वक पाठ करने से साधक के अस्तित्त्व में मंत्रयोग की सम्पूर्ण प्रक्रियाएँ घटित होती हैं। और फिर प्रारम्भ हो जाती है- अन्तस् के रूपान्तरण की आध्यात्मिक प्रक्रिया। यह सच उनको सहज में समझ आने योग्य है, जो मंत्र के वैज्ञानिक महत्त्व से परिचित हैं। मंत्र में प्रधान महत्त्व शब्दों के गुँथे होने की रीति का है। इसके अर्थ की भावना श्रेयस्कर तो है, पर इसके बिना भी मंत्र अपना चमत्कार दिखाए बिना नहीं रहते। वैसे यदि मंत्र रटन के साथ अर्थ चिन्तन जुड़ जाए, तो सोने में सुगन्ध वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है। हालाँकि ऐसा न होने पर भी अकेली मंत्ररटन अपने चमत्कारों की सुनहरी चमक को बरकरार रखती है।

🔷 मंत्रों को रटने या मन ही मन उच्चारित करने से इसके सूक्ष्म कम्पन न केवल देह, प्राण व स्न्नायुमण्डल की प्रक्रियाओं को प्रभावित करते हैं, बल्कि अस्तित्व की गहनता भी इनसे प्रेरित व परिवर्तित होती है। यह ऐसा अनुभव है, जो उन सभी को प्राप्त होता है, जो मंत्र के साधक हैं। इस साधना की प्रगाढ़ता में चित्त की वृतियाँ मंत्र की चेतना में विलीन होने लगती हैं और फिर क्रमिक रूप से चित्त मंत्र तदाकार होता है। बाद में यह तादात्म्य मंत्र के अधिदेवता से होते हुए मंत्र की सामर्थ्य के अनुसार परमात्म चेतना से हो जाता है। शाबर, डामर आदि क्षुद्र मंत्रों की बात छोड़ दे, तो गायत्री महामंत्र के साथ इस प्रक्रिया को घटित होते हुए अनुभव किया जा सकता है।

🔶 गुरूगीता- माला मंत्र है। माला मंत्रों का पाठ किए जाने की परम्परा है। इस पाठ करने से साधक के अन्तरतम में पहले गुरूतत्व की अनुभूति होती है। जिन्हें अभी तक गुरू की प्राप्ति नहीं हुई है, वे इसकी साधना से अपने सद्गुरू को पहचान सकते हैं, पा सकते हैं। जिन्हें सद्गुरू तो मिले हैं, परन्तु जो अभी अपनी देह में नहीं हैं, गुरूगीता की पाठ साधना उन्हें उनके गुरू से संवाद सुलभ करा सकती है। विधानपूर्वक यदि सहस्त्र पाठ भी हो सके, तो भी ऐसा करने वाले साधक की चेतना सूक्ष्म संकेत अवतरित होने लगती है। साधना सतत बनी रहे ,, तो साधक न केवल गुरूतत्त्व का साक्षाकार करता है, बल्कि उसे गुरूतत्त्व एवं परमात्मतत्त्व की एकरसता का भी बोध होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 186

👉 देवी संपति

🔶 यज्ञ (तन, मन, धन, लोकहित के लिये कार्य करना) तप (यज्ञ कर्म के लिये चित्त और इन्द्रियों को रोकना) दान, सत्संग, धार्मिक ग्रंथों का पठन पाठन, महात्माओं के दर्शन करने की इच्छा रखना, मन में सदैव शुभ और पवित्र विचारों को उठाते रहना, अपने कर्त्तव्य को सच्चाई और ईमानदारी से करना, अनाथ, गरीब, अपाहिजों पर दया करना और उनकी सहायता करना, विद्यादान अतिथि सेवा और मन का प्रसन्न होना आदि सभी उत्तम कर्म ईश्वर प्राप्ति के साधन हैं। गीता के 16वे अध्याय में भगवान ने इन्हीं गुणों को विस्तार के साथ देवी सम्पत्ति के नाम से कहा है और अर्जुन को बताया है कि दैवी सम्पत्ति से मोक्ष मिलता है।

🔷 भक्ति का अर्थ है सेवा। सर्वेश्वर सर्वाधार प्रभु सब प्रकार समर्थ और हमेशा तृप्त हैं, उन्हें किसी प्रकार की सेवा की आवश्यकता नहीं है। फिर उनकी सेवा का क्या मतलब और ढंग होना चाहिए? वास्तव में मन, वाणी और कर्म से प्राणी मात्र की सेवा और विशेष रूप से मनुष्य जाति की सेवा करना ही भगवान की भक्ति है। भक्ति ही मुक्ति का मार्ग है। भक्त की सभी बुरी आदतों में इतनी शीघ्रतापूर्वक परिवर्तन होना शुरू हो जाता है, जिसे देखकर सब आश्चर्यचकित हो जाते हैं। छल, कपट, स्वार्थ, ईर्ष्या आदि दोषों का नाश होकर उनके स्थान में सरलता, निष्कपटता, उदारता, प्रेम आदि शुभ गुण आने लगते हैं। इस प्रकार धीरे-धीरे अन्तःकरण पवित्र होने लगता है, जो एक मात्र प्रभु दर्शन का मन्दिर है।

📖 अखण्ड-ज्योति अक्टूबर 1941 पृष्ठ 20

👉 विवाहोन्माद प्रतिरोध आन्दोलन

🔶 समाज का निर्माण परिवार से होता है और परिवार का विवाह से। हर नया विवाह एक नये समाज की रचना करता है। जिस प्रकार छोटी-छोटी कड़ियों को मिलाकर एक जंजीर बनती है, उसी तरह इन छोटे-छोटे परिवारों का समूह ही समाज कहलाता है। यदि सभ्य, सुविकसित, सुसंस्कृत समाज का निर्माण करना हो तो उसके लिए परिवारों के निर्माण पर ध्यान देना होगा। इस संदर्भ में यह आवश्यक है, कि विवाह का शुभारम्भ श्रीगणेश ऐसे वातावरण में हो, जो अन्त तक मंगलमय परिणाम ही उत्पन्न करता है। कहते है कि अच्छी शुरुआत में सफलता की आधी सम्भावना सन्निहित रहती है। जिसका आरम्भ ही दुर्बुद्धि एवं दुर्भावना के साथ होगा उसका विकास भी असन्तोष और संघर्षों के बीच होगा और यह क्रम अन्ततः उसे असफल ही बना देगा।

🔷 आज के अधिकाँश विवाह आगे चल कर असफल ही सिद्ध होते हैं। ऐसे कम ही जोड़े निकलेंगे जो एक मन दो शरीर बन कर रहते हों। परस्पर द्वेष दुर्भाव भरे हुए वे किसी तरह अपनी गाड़ी तो घसीटते रहते हैं, पर उसमें भीतर ही भीतर असन्तोष एवं अविश्वास की आग सुलगती रहती है। ऐसे असफल गृहस्थों की शृंखला सभ्य समाज की, सुविकसित एवं सुसंस्कृत समाज की रचना में भला क्या सहायक बन सकती है? आज यही विषम परिस्थिति चारों ओर फैली हुई है ।

🔶 समाज निर्माण की आवश्यकता सर्वत्र अनुभव की जा रही है। हर कोई जानता है कि व्यक्ति और समाज का उज्ज्वल भविष्य इसी बात पर निर्भर है कि समाज में श्रेष्ठ परम्पराएं प्रचलित हों। कोई मनस्वी व्यक्ति अपनी प्रतिभा से समाज का वातावरण बदलते हुये भी सफल होते हैं, पर अधिकतर होता यह है कि समाज की जैसी भी स्थिति एवं परम्परा होती है, उसी के अनुरूप व्यक्तियों का बनना और ढलना जारी रहता है। तदनुसार ही उस देश, समाज या जाति का उत्थान एवं पतन होता रहता है। यदि हमें नये समाज का निर्माण वस्तुतः करना हो, तो उसके मूल विवाद पर अत्यधिक ध्यान देना होगा। उसमें जो विषमता विशृंखलता एवं विकृति उत्पन्न हो गई है, उसे सुधारना होगा। इसके बिना समाज निर्माण, मानव प्रगति एवं विश्व शान्ति के सपने साकार न हो सकेंगे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1965 पृष्ठ 43
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/July/v1.43

👉 भारत को ईसाई बनाने का षडयन्त्र (भाग 2)

🔶 भारत में पादरियों का धर्म प्रचार हिन्दू धर्म को मिटाने का खुला षडयन्त्र है जो कि एक लम्बे अरसे से चला आ रहा है, अब उपेक्षावश और तीव्र तथा प्रबल हो गया है। ईसाई पादरियों के इस धर्म प्रचार का क्या उद्देश्य है? यह समय-समय पर किये उनके कथनों, लेखों तथा वक्तव्यों से सहज ही पता लग जाता है।

🔷 ‘‘लाइट आफ लाइफ’ केथोलिक पत्रिका के 1964 के जुलाई अंक में ईसाई नवयुवकों को परामर्श देते हुए निर्देश किया गया—‘‘ईसाई छात्रों तथा स्नातकों का यह कर्तव्य है कि वे ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिये पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखा करें और इस विषय में वे धर्म निरपेक्ष नीति वाली पत्र-पत्रिकाओं का लाभ उठा सकते हैं। किन्तु यह आवश्यक नहीं कि वे शुरू-शुरू में ही अपने लेखों में ईसाइयत का प्रचार करने लगें। अच्छा तो यह होगा कि पहले वे सामान्य लेख लिख कर आगे चल कर के पत्रों में खुलकर ईसाई विचारधारा का प्रचार करें।’’

🔶 यह क्या है? ईसाई नवयुवकों को धर्मनिरपेक्ष पत्र-पत्रिकाओं में घुसने और उनके माध्यम से भारत में ईसाइयत फैलाने के लिए खुला प्रोत्साहन तथा आह्वान है। इसे धर्मनिरपेक्षता का अनुचित लाभ उठाने के लिए एक षडयन्त्र के सिवाय और क्या कहा जायगा? जहां धर्मनिरपेक्षता की नीति भारत के हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई सभी को एक समान तथा सामान्य राष्ट्रीय विचारधारा में लाने का प्रयत्न कर रही है, वहां विदेशी मिशनरी ईसाई नवयुवकों की धार्मिक भावनाओं को भड़का कर उन्हें अपने षडयन्त्र का सहायक अस्त्र बनाने का प्रयत्न कर रहे हैं। क्या भारत के राष्ट्रीय हित में यह सहन करने योग्य बात है?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 34

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 June 2018

👉 आज का सद्चिंतन 3 June 2018


शनिवार, 2 जून 2018

आज के समय के सन्दर्भ में परम पूज्य गुरुदेव ( डॉ चिन्मय पंड्या)



Title

👉 हिन्दू वीर योद्धा “तक्षक”

🔷 सन 711ई. की बात है। अरब के पहले मुस्लिम आक्रमणकारी मुहम्मद बिन कासिम के आतंकवादियों ने मुल्तान विजय के बाद  एक विशेष सम्प्रदाय हिन्दू के ऊपर गांवो शहरों में भीषण रक्तपात मचाया था। हजारों स्त्रियों की छातियाँ नोच डाली गयीं, इस कारण अपनी लाज बचाने के लिए हजारों सनातनी किशोरियां अपनी शील की रक्षा के लिए कुंए तालाब में डूब मरीं।लगभग सभी युवाओं को या तो मार डाला गया या गुलाम बना लिया गया। भारतीय सैनिकों ने ऎसी बर्बरता पहली बार देखी थी।

🔶 एक बालक तक्षक के पिता कासिम की सेना के साथ हुए युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। लुटेरी अरब सेना जब तक्षक के गांव में पहुची तो हाहाकार मच गया। स्त्रियों को घरों से खींच खींच कर उनकी देह लूटी जाने लगी।भय से आक्रांत तक्षक के घर में भी सब चिल्ला उठे। तक्षक और उसकी दो बहनें भय से कांप उठी थीं।
तक्षक की माँ पूरी परिस्थिति समझ चुकी थी, उसने कुछ देर तक अपने बच्चों को देखा और जैसे एक निर्णय पर पहुच गयी। माँ ने अपने तीनों बच्चों को खींच कर छाती में चिपका लिया और रो पड़ी। फिर देखते देखते उस क्षत्राणी ने म्यान से तलवार खीचा और अपनी दोनों बेटियों का सर काट डाला।उसके बाद अरबों द्वारा उनकी काटी जा रही गाय की तरफ और  बेटे की ओर अंतिम दृष्टि डाली, और तलवार को अपनी छाती में उतार लिया।

🔷 आठ वर्ष का बालक तक्षक एकाएक समय को पढ़ना सीख गया था, उसने भूमि पर पड़ी मृत माँ के आँचल से अंतिम बार अपनी आँखे पोंछी, और घर के पिछले द्वार से निकल कर खेतों से होकर जंगल में भाग गया।
                              
🔶 25 वर्ष बीत गए। अब वह बालक बत्तीस वर्ष का पुरुष हो कर कन्नौज  के गुर्जर प्रतिहार वंश के प्रतापी शासक नागभट्ट द्वितीय का मुख्य अंगरक्षक था। वर्षों से किसी ने उसके चेहरे पर भावना का कोई चिन्ह नही देखा था। वह न कभी खुश होता था न कभी दुखी। उसकी आँखे सदैव प्रतिशोध की वजह से अंगारे की तरह लाल रहती थीं। उसके पराक्रम के किस्से पूरी सेना में सुने सुनाये जाते थे। अपनी तलवार के एक वार से हाथी को मार डालने वाला तक्षक सैनिकों के लिए आदर्श था। कन्नौज नरेश नागभट्ट अपने अतुल्य पराक्रम से अरबों के सफल प्रतिरोध के लिए ख्यात थे। सिंध पर शासन कर रहे अरब कई बार कन्नौज पर आक्रमण कर चुके थे,पर हर बार योद्धा गुर्जर प्रतिहार उन्हें खदेड़ देते। युद्ध के सनातन नियमों का पालन करते नागभट्ट कभी उनका पीछा नहीं करते, जिसके कारण मुस्लिम शासक आदत से मजबूर बार बार मजबूत हो कर पुनः आक्रमण करते थे। ऐसा पंद्रह वर्षों से हो रहा था।

🔷 इस बार फिर से सभा बैठी थी, अरब के खलीफा से सहयोग ले कर सिंध की विशाल सेना कन्नौज पर आक्रमण के लिए प्रस्थान कर चुकी है और संभवत: दो से तीन दिन के अंदर यह सेना कन्नौज की सीमा पर होगी। इसी सम्बंध में रणनीति बनाने के लिए महाराज नागभट्ट ने यह सभा बैठाई थी। सारे सेनाध्यक्ष अपनी अपनी राय दे रहे थे...तभी अंगरक्षक तक्षक उठ खड़ा हुआ और बोला---
महाराज, हमे इस बार दुश्मन को उसी की शैली में उत्तर देना होगा।

🔶 महाराज ने ध्यान से देखा अपने इस अंगरक्षक की ओर, बोले- "अपनी बात खुल कर कहो तक्षक, हम कुछ समझ नही पा रहे।"

🔷 "महाराज, अरब सैनिक महाबर्बर हैं, उनके साथ सनातन नियमों के अनुरूप युद्ध कर के हम अपनी प्रजा के साथ घात ही करेंगे। उनको उन्ही की शैली में हराना होगा।"

महाराज के माथे पर लकीरें उभर आयीं, बोले-
"किन्तु हम धर्म और मर्यादा नही छोड़ सकते सैनिक। "

🔶 तक्षक ने कहा- "मर्यादा का निर्वाह उसके साथ किया जाता है जो मर्यादा का अर्थ समझते हों। ये बर्बर धर्मोन्मत्त राक्षस हैं महाराज। इनके लिए हत्या और बलात्कार ही धर्म है।"

"पर यह हमारा धर्म नही हैं बीर"

🔷 "राजा का केवल एक ही धर्म होता है महाराज, और वह है प्रजा की रक्षा। देवल और मुल्तान का युद्ध याद करें महाराज, जब कासिम की सेना ने दाहिर को पराजित करने के पश्चात प्रजा पर कितना अत्याचार किया था। ईश्वर न करे, यदि हम पराजित हुए तो बर्बर अत्याचारी अरब हमारी स्त्रियों, बच्चों और निरीह प्रजा के साथ कैसा व्यवहार करेंगे, यह आप भली भाँति जानते हैं।"

🔶 महाराज ने एक बार पूरी सभा की ओर निहारा, सबका मौन तक्षक के तर्कों से सहमत दिख रहा था। महाराज अपने मुख्य सेनापतियों मंत्रियों और तक्षक के साथ गुप्त सभाकक्ष की ओर बढ़ गए।

🔷 अगले दिवस की संध्या तक कन्नौज की पश्चिम सीमा पर दोनों सेनाओं का पड़ाव हो चूका था, और आशा थी कि अगला प्रभात एक भीषण युद्ध का साक्षी होगा।

🔶 आधी रात्रि बीत चुकी थी। अरब सेना अपने शिविर में निश्चिन्त सो रही थी। अचानक तक्षक के संचालन में कन्नौज की एक चौथाई सेना अरब शिविर पर टूट पड़ी। अरबों को किसी हिन्दू शासक से रात्रि युद्ध की आशा न थी। वे उठते,सावधान होते और हथियार सँभालते इसके पुर्व ही आधे अरब गाजर मूली की तरह काट डाले गए।

🔷 इस भयावह निशा में तक्षक का शौर्य अपनी पराकाष्ठा पर था।वह घोडा दौड़ाते जिधर निकल पड़ता उधर की भूमि शवों से पट जाती थी। आज माँ और बहनों की आत्मा को ठंडक देने का समय था....

🔶 उषा की प्रथम किरण से पुर्व अरबों की दो तिहाई सेना मारी जा चुकी थी। सुबह होते ही बची सेना पीछे भागी, किन्तु आश्चर्य! महाराज नागभट्ट अपनी शेष सेना के साथ उधर तैयार खड़े थे। दोपहर होते होते समूची अरब सेना काट डाली गयी। अपनी बर्बरता के बल पर विश्वविजय का स्वप्न देखने वाले आतंकियों को पहली बार किसी ने ऐसा उत्तर दिया था।

🔷 विजय के बाद महाराज ने अपने सभी सेनानायकों की ओर देखा, उनमे तक्षक का कहीं पता नही था।सैनिकों ने युद्धभूमि में तक्षक की खोज प्रारंभ की तो देखा-लगभग हजार अरब सैनिकों के शव के बीच तक्षक की मृत देह दमक रही थी। उसे शीघ्र उठा कर महाराज के पास लाया गया। कुछ क्षण तक इस अद्भुत योद्धा की ओर चुपचाप देखने के पश्चात महाराज नागभट्ट आगे बढ़े और तक्षक के चरणों में अपनी तलवार रख कर उसकी मृत देह को प्रणाम किया। युद्ध के पश्चात युद्धभूमि में पसरी नीरवता में भारत का वह महान सम्राट गरज उठा-

🔶 "आप आर्यावर्त की वीरता के शिखर थे तक्षक.... भारत ने अबतक मातृभूमि की रक्षा में प्राण न्योछावर करना सीखा था, आप ने मातृभूमि के लिए प्राण लेना सिखा दिया। भारत युगों युगों तक आपका आभारी रहेगा।"

🔷 इतिहास साक्षी है, इस युद्ध के बाद अगले तीन शताब्दियों तक अरबों कीें भारत की तरफ आँख उठा कर देखने की हिम्मत नही हुई।
तक्षक ने सिखाया कि मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राण दिए ही नही, लिए भी जाते है, साथ ही ये भी सिखाया कि दुष्ट सिर्फ दुष्टता की ही भाषा जानता है, इसलिए उसके दुष्टतापूर्ण कुकृत्यों का प्रत्युत्तर उसे उसकी ही भाषा में देना चाहिए अन्यथा वो आपको कमजोर ही समझता रहेगा।

👉 शान्त विचारों की शक्ति

🔷 हमारे मन में दो प्रकार के विचार आते हैं−एक उद्वेग युक्त और दूसरे शान्त। भय, क्रोध, शोक, लोभ आदि मनोवेगों से पूरित विचार उद्वेग युक्त विचार हैं और जिनके विचारों में मानसिक उद्वेगों का अभाव रहता है उन्हें शान्त विचार कहा जाता है। हम साधारणतः विचारों के बल को उससे सम्बन्धित उद्वेगों से ही नापते हैं। जब हम देखते हैं कि कोई व्यक्ति अवश्य ही कुछ कर दिखावेगा। पर क्रोधातुर व्यक्ति से उतना अधिक डरने का कारण नहीं जितना कि शान्त मन के व्यक्ति से डरने का कारण है। भावावेश में आने वाले व्यक्ति यों के निश्चय सदा डावाँडोल रहते हैं। भावों पर विजय प्राप्त करने वाले व्यक्ति के निश्चय स्थिर रहते हैं। वह जिस काम में लग जाता है उसे पूर्ण करके दिखाता है।

🔶 उद्वेग पूर्ण विचार वैयक्तिक होते हैं उनकी मानसिक शक्ति वैयक्तिक होती है, शाँत विचार बृहद् मन के विचार हैं, उनकी शक्ति अपरिमित होती है। मनुष्य जो निश्चय शान्त मन से करता है उसमें परमात्मा का बल रहता है और उसमें अपने आपको फलित होने की शक्ति होती है। अतएव जब कोई व्यक्ति अपने अथवा दूसरे व्यक्ति के कल्याण के लिये कोई निश्चय करता है और अपने निश्चय में अविश्वास नहीं करता तो वह निश्चय अवश्य फलित होता है। शान्त विचार सृजनात्मक और उद्वेगपूर्ण विचार प्रायः विनाशकारी होते हैं। किसी भी प्रकार के विचार में अपने आपको फलित करने की शक्ति होती है। पर यह शक्ति सन्देह के कारण नष्ट हो जाती है। जिन विचारों को हेतु वैयक्तिक होता है उनमें अनेक प्रकार के सन्देह उत्पन्न होते हैं। अतएव उनके विचार की शक्ति नष्ट हो जाती है। जब कोई मनुष्य अपने विचारों में किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं लाता तो विचार स्वतः ही फलित हो जाते हैं। सन्देहों को रोकने के लिये अपनी आध्यात्मिक शक्ति में विश्वास होना आवश्यक है।

🔷 अपने आपकी ही अनुकूलता ईश्वर और प्रकृति की अनुकूलता के विश्वास के रूप में मनुष्य की भावना के समक्ष आती हैं। ये भावनायें अचेतन मन की अनुभूति के प्रतिभास मात्र हैं। मनुष्य अपनी आन्तरिक अनुभूति के अनुसार अनेक प्रकार की कल्पनाओं को रचता है। इन कल्पनाओं की वास्तविकता उसकी अज्ञात वास्तविक प्रेरणा पर निर्भर करती है। कल्पनायें वैसी ही होती हैं जैसी की आन्तरिक प्रेरणा होती है। मनुष्य की कल्पनायें ही उसे आशावादी ओर निराशावादी बनाती है अर्थात् मन का जैसा रुख होता है उसी प्रकार की कल्पनायें मन करने लगता है। ईश्वरवादी विश्वास में लगता है कि ईश्वर उसे आगे ले जा रहा है और जड़वादी विश्वास करने लगता है कि प्रकृति उसे आगे ले जा रही है। प्रगति और अप्रगति के सभी प्रमाण मनुष्य के रुख पर निर्भर करते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1955 पृष्ठ 6

👉 भारत को ईसाई बनाने का षडयन्त्र (भाग 1)

🔷 ‘अति सर्वत्र वर्जयेत’—अर्थात् अति का हर क्षेत्र में निषेध है। बुरी बात तो बुरी बात ही होती है, उसमें अति या अनीति का प्रश्न ही क्या? अच्छी बात भी जब अपनी वांछित मर्यादा का उल्लंघन कर जाती है, तो वह बुराई की कोटि में पहुंच जाती है।

🔶 धार्मिक सहिष्णुता एक महान गुण है। किसी दूसरे के धार्मिक विचारों तथा कार्यों में हस्तक्षेप न करना स्वयं ही एक धार्मिकता है। हिन्दुओं ने इस गुण का जितना व्यापक परिचय दिया है, उसका हजारवां भाग भी संसार की कोई अन्य जाति न दे सकी। बल्कि यह कहने में भी कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि वेद-धर्म के अनुयायियों को छोड़कर संसार की अधिकांश जातियों ने असहिष्णुता का ही परिचय दिया है।

🔷 हिन्दुओं की इस सहिष्णुता से प्रोत्साहित होकर अन्य धर्मावलम्बियों ने क्या-क्या किया और इससे हिन्दू राष्ट्र को कितनी क्षति हुई है? यह बात किसी से छिपी नहीं है। विगत हानियों तथा अत्याचारों की चर्चा करना बेकार है। किन्तु वर्तमान में हिन्दू-जाति पर ईसाइयों का जो आक्रमण हो रहा है, उसकी ओर से आंखें बंद नहीं की जा सकती हैं।

🔶 भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है और भारत सरकार धर्मनिरपेक्षता की संरक्षिका। विधान की इस धारा के अनुसार भारत में सभी धर्मों को फलने-फूलने और विकसित होने का अधिकार है। किन्तु इसका तह आशय कदापि नहीं कि कोई एक धर्म दूसरे किसी धर्म को मिटाकर फूल-फल सकता है। ईसाई पादरी भारतीय विधान की इस धारा का दुरुपयोग करके हिन्दू धर्म को मिटाकर अपने ईसाई धर्म का विस्तार करने में बुरी तरह जुटे हुए हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 33

👉 स्वयं पर विश्वास ही सफलता का पैमाना है

🔷 सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉक्टर जगदीशचंद्र बोस ने यह खोज की थी कि सभी पेड़-पौधों में जीव-जंतु एवं प्राणी की तरह ही प्राण होते हैं, वे दुःख-दर्द का अनुभव करते हैं। यदि पौधों को जहर दे दिया जाए, तो वे भी मर जाते हैं। अपने इस शोध का प्रदर्शन करने के दौरान, इंग्लैंड में उन्होेंने एक इंजेक्शन में जहर भरकर उसे एक पौधे में लगा दिया, लेकिन पौधा मरा नहीं। वहाँ  पर एकत्रित भीड़ उनकी हंसी उड़ाने लगी ।

🔶 चूँकि उन्हें अपनी खोज और उससे कहीं ज्यादा अपने आप पर पूरा भरोसा था, उसी वक्त उन्होंने सोचा कि जब यह पौधा इस जहर से नहीं मर सकता, तो मैं भी इस जहर से कैसे मर सकता हूँ?

🔷 वे उसी जहर का इंजेक्शन स्वयं में भी लगाने को तैयार हुए कि आयोजकों में से एक व्यक्ति ने उनका हाथ रोककर कहा- ‘सर, हमने जहर के स्थान पर इस शीशी में रंगीन पानी भर दिया था।‘

🔶 डॉक्टर बोस ने वह प्रयोग वास्तविक जहर से दोबारा किया और पौधा धीरे-धीरे मुरझा गया।

🔷 उन्होंने अपने प्रयास और स्वयं पर इतना अटूट विश्वास था कि अंत में पूरे विश्व को उनकी इस खोज पर पूर्ण मान्यता देनी पड़ी।

🔶 तो दोस्तों , यह होती है स्वयं पर विश्वास की ताकत | अगर डॉक्टर बोस को अपने ऊपर इतना विश्वास नहीं होता तो वह भी और लोगो की तरह ही अपनी खोज को बेकार मान लेते लेकिन अपनी विश्वास के दम पर उन्होंने पूरे विश्व को झुका दिया।

🔷 अगर हमें अपने आप पर भरोसा है , विश्वास है तो सिर्फ ये सोच लेने से ही “कि मैं इस कार्य को ज़रूर कर लूंगा ” हमारे अंदर इतना आत्मविश्वास आ जाता है कि हम बड़े से बड़ा और मुश्किल से मुश्किल कार्य भी बहुत आसानी से कर देते है और अपने आत्मविश्वास कि बल पर हम दुनिया को झुका सकते है।

🔶 अगर हमें अपने आप पर अटूट विश्वास है तो दूसरे लोग भी हम पर भरोसा करेंगे और ये ही हमारी सफलता का पैमाना है।

http://awgpskj.blogspot.com/2016/07/blog-post_80.html

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 June 2018


👉 आज का सद्चिंतन 2 June 2018

शुक्रवार, 1 जून 2018

B Ram Das, CRPF Commando


Wounded but NEVER defeated !
B Ram Das, #CRPF Commando who lost both his legs
in IED blast by Naxals with his brave Commando wife.
For them country is ABOVE all
Salute to this inspiring patriot couple 🙏

#NationFirst






 

👉 आज का सद्चिंतन 1 June 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 June 2018


👉 गुरु समुद्र हो ओर शिष्य पानी

सद्गुरु ओर शिष्य का रिश्ता कुछ ऎसा हो!!

🔶 शिष्य का पावन चरित्र ही सद्गुरु का अभिमान हो, होता है जैसे सूई का धागे से, वैसे ही दोनों का रिश्ता महान हो!!

सद्गुरु ओर शिष्य का रिश्ता....

🔷 सद्गुरु का आदेश के पहले ही शिष्य  उज्जवल भविष्य के मार्ग पर आगे बढ़ जाए... जलता है जैसे दिये '' बाती ओर तेल के साथ, वैसे ही.. दोनों का मिलना एक मिशाल बन जाए..!!

सद्गुरु ओर शिष्य का रिश्ता......

🔶 गुरु तो देवो के देव स्वंय महादेव हैं..पर शिष्य को बना वीरभद्र अपना... फेले हुए अनाचार को मिटाकर पाप - पतन का नाश करे जिससे आध्यात्मिक भूमि निर्माण हो..!!

सद्गुरु ओर शिष्य का रिश्ता.......

🔷 शिष्यतत्व का समर्पण इतना गहरा हो कि, जैसे रहती है परछाई ...इंसान के साथ... वैसे ही जिंदगी के हर मोड़ पर सद्गुरु  हो अपने शिष्य के साथ...!!
            
सद्गुरु ओर शिष्य का रिश्ता......
   
🔶 सद्गुरु का चिंतन ही शिष्य का चरित्र हो, शिष्य का परिष्कृत जीवन ही '' सद्गुरु की पहचान हो, पहचान की सुगंध ही युगशक्ति का आवाहन हो...!!

सद्गुरु ओर शिष्य का रिश्ता......

🔷 शिष्य ओर गुरु की प्यार की डोर इतनी मजबूत हो... जैसी लोभ मोह की लिप्सओ रूपी जंजीर भी ना हो..ओर सद्गुरु का ज्ञान भंडार ही शिष्य का अध्ययन हो....!!
           
सद्गुरु ओर शिष्य का रिश्ता.......

🔶 हो लाख परेशानियां मे शिष्य  चाहे... गुरु से मन की बात कहने मे शिष्य चाहे कितना भी मगरूर हू... फिर भी अपने शिष्य की हर जरूरत का सद्गुरु अहसास हो....!!

सद्गुरु ओर शिष्य का रिश्ता..........

🔷 श्रद्धा समर्पण ओर लक्ष्‍य प्राप्ति इतनी स्पष्ट हो, कि स्वंय महाकाल का आदेश हो... ओर शिष्य के हाथों ही इक्कीसवी सदी उज्जवल भविष्य हो......!!
     
🔶 सद्गुरु ओर शिष्य का रिश्ता कुछ ऎसा हो....सद्गुरु ओर शिष्य का रिश्ता कुछ ऎसा हो...

🔷 हम सभी का रिश्ता भी कुछ ऎसा हो......अपने सद्गुरु से...   लेखनी जो भी लिखेगी आपकी ही योजना....

👉 भाग्यवान और अभागे

🔶 कौन अभागा है और कौन भाग्यवान् है? इस की एक कसौटी मैं तुम्हें बताये देता हूँ। जो आदमी क्रियाशील है, उत्साही है, आशावान् है वह भाग्यवान है। भाग्य लक्ष्मी उसके घर रास्ता पूछती-पूछती खुद पहुँच जायेगी। सुस्ती, निद्रा, आलस्य प्रमोद, भूल जाना, काम को टालना, यह लक्षण जिनमें हैं समझ लो कि वह अभागे हैं उनके भाग्य की नौका अब तक डूबने ही वाली है। याद रखो आलस्य में दरिद्रता का और परिश्रम में लक्ष्मी का निवास है।

🔷 जिन्हें काम करने से प्रेम है वे सचमुच अमीर हैं। और निठल्ले? वे तो हाथ पाँव वाले मोहताज हैं। पैसा आज है कल चला जायेगा परन्तु क्रियाशीलता वह पारस है जो हर मौके पर लोहे को सोना बना देगी। धन्य है वे मनुष्य जिन्हें काम करना प्रिय है, जो कर्त्तव्य में निरत रहकर ही आनन्द का अनुभव करते हैं। उत्साही पुरुष असफलता से विचलित नहीं होता। हाथी के शरीर में जब तीर घुसते हैं तो वह पीछे नहीं हटता वरन् और अधिक दृढ़ता के साथ अपने कदम जमा जमा कर चलता है। भाग्य साथ न दे और असफल होना पड़े तो इसमें कुछ भी लज्जा की बात नहीं है। शर्म की बात यह है कि मनुष्य अपने कर्त्तव्य की अवहेलना करे और आलस्य में बैठा रहे। अखण्ड उत्साह-बस, शक्ति का यही मूल स्रोत है। जिसमें उत्साह नहीं वह तो चलता पुतला मात्र है।

✍🏻 ऋषि तिरुवल्लुवर
📖 अखण्ड-ज्योति अक्टूबर 1941 पृष्ठ 13

👉 भारतीय संस्कृति के विनाश का संकट (भाग 3)

🔶 हमारी संस्कृति के लिए विदेशियों द्वारा जहां ईसाइयत के प्रवार का खतरा है, उससे कम खतरा अपने स्वयं के पश्चिमी अनुकरण के प्रयास का भी नहीं है। हम लोग अपने रहन-सहन, जीवन-पद्धति, विचारों की प्रेरणा के लिए पश्चिम की ओर देखते हैं। उनका अनुकरण करते हैं। जहां तक अपनी संस्कृति का सवाल है हम उसे भूलते जा रहे हैं। आज हमारी बोली भाषा वस्त्र, रहने का ढंग विदेशी बनता जा रहा है।

🔷 स्वच्छ और सादा ढीले वस्त्र जो हमारी भौगोलिक स्वास्थ्य सम्बन्धी परिस्थितियों के अनुकूल थे उनकी जगह पश्चिम का अनुकरण करके भारी गर्मी में भी कोट पेन्ट पहनते हैं। आज का शिक्षित समाज ‘वस्त्रों की दृष्टि से पूरा पश्चिमी बन गया है। धोती-कुर्ता पहनने में बहुत से लोगों को शर्म और संकोच महसूस होता है। पढ़े-लिखे लोगों में अंग्रेजी बोलना एक फैशन बन गया है। हिन्दी, संस्कृत या अन्य देशी भाषा बोलने में मानो अपना छोटापन मालूम होता है। दिवाली आदि पर्व त्यौहारों पर, किन्हीं सांस्कृतिक मेलों पर, हममें वह उत्साह नहीं रहा, लेकिन ‘फर्स्ट अप्रैल फूल’ ‘बड़ा दिन’ जैसे पश्चिमी त्यौहार मनाने में हम अपना बड़प्पन समझते हैं।

🔶 एक समय था जब विश्व के विचारक, साहित्यकार भारत से प्रेरणा और मार्ग दर्शन प्राप्त करते थे। इसे अपना आदि गुरु मानते थे। इसे सभी विदेशी विद्वानों ने स्वीकार किया है। लेकिन आज हमारे देश में इससे विपरीत हो रहा है। आज हम साहित्यिक विचार साधना के क्षेत्र में पश्चिम का अनुकरण करते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हमें वहां के साहित्य का अध्ययन नहीं करना चाहिए, यह तो किसी भी विचारशील व्यक्ति के लिए आवश्यक है। किन्तु अपने मौलिक सांस्कृतिक तथ्यों, प्रेरणाओं को भुलाकर पश्चिम का अन्धानुकरण करना हमारी संस्कृति के लिए बड़ा खतरा है। इससे वह कमजोर होती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 18

👉 हमारे छोटे से प्रयास से भी बहुत बड़ा फर्क पड़ता है

🔶 एक व्यक्ति रोज़ाना समुद्र तट पर जाता और वहाँ काफी देर तक बैठा रहता। आती-जाती लहरों को लगातार देखता रहता। बीच-बीच में वह कुछ उठाकर समुद्र में फेंकता, फिर आकर अपने स्थान पर बैठ जाता। तट पर आने वाले लोग उसे मंदबुद्धि समझते और प्राय: उसका मजाक उड़ाया करते थे। कोई उसे ताने कसता तो कोई अपशब्द कहता, किंतु वह मौन रहता और अपना यह प्रतिदिन का क्रम नहीं छोड़ता।

🔷 एक दिन वह समुद्र तट पर खड़ा तरंगों को देख रहा था। थोड़ी देर बाद उसने समुद्र में कुछ फेंकना शुरू किया। उसकी इस गतिविधि को एक यात्री ने देखा। पहले तो उसने भी यही समझा कि यह मानसिक रूप से बीमार है, फिर उसके मन में आया कि इससे चलकर पूछें तो। वह व्यक्ति के निकट आकर बोला- भाई ! यह तुम क्या कर रहे हो?

🔶 उस व्यक्ति ने उत्तर दिया- देखते नहीं, समंदर बार-बार अपनी लहरों को आदेश देता है कि वे इन नन्हे शंखों, घोंघों और मछलियों को जमीन पर पटककर मार दें। मैं इन्हें फिर से पानी में डाल देता हूं। यात्री बोला- यह क्रम तो चलता ही रहता है। लहरें उठती हैं, गिरती हैं, ऐसे में कुछ जीव तो बाहर होंगे ही।

🔷 तुम्हारी इस चिंता से क्या फर्क पड़ेगा?

🔶 उस व्यक्ति ने एक मुट्ठी शंख-घोंघों को अपने हाथ में उठाया और पानी में फेंकते हुए कहा – देखा कि नहीं, इनके जीवन में तो फर्क पड़ गया ना? वह यात्री सिर झुकाकर चलता बना और वह व्यक्ति वैसा ही करता रहा।

🔷 मित्रों, हमारी ज़िंदगी में भी ऐसा ही होता है। जैसे बूँद बूँद से घड़ा भरता है वैसे ही छोटे छोटे प्रयासों से हम अपनी और समाज की ज़िंदगी बदल सकते हैं।

🔶 इसलिए किसी भी छोटे कार्य कि महत्ता को कम ना समझे। एक दिन ये छोटे छोटे प्रयास ही बहुत बड़ा परिवर्तन ला देंगें।

बुधवार, 30 मई 2018

👉 बाधाएं हमें मजबूत बनाती हैं।

🔷 किसी गाँव में एक धर्मपरायण किसान रहा करता था। उसकी फसल अक्सर खराब हो जाया करती थी। कभी बाढ़ आ जाया करती थी तो कभी सूखे की वजह से उसकी फसल बर्बाद हो जाया करती । कभी गर्मी बेहद होती तो कभी ठण्ड इतनी होती कि वो बेचारा कभी भी अपनी फसल को पूरी तरह प्राप्त नहीं कर पाया।

🔶 एक दिन किसान दुखी होकर मंदिर में जा पहुंचा और भगवान की मूर्ती के आगे खड़ा हो कर कहने लगा भगवान बेशक आप परमात्मा है लेकिन फिर भी लगता है आपको खेती बाड़ी की जरा भी जानकारी नहीं है। कृपया करके एक बार बस मेरे अनुसार मौसम को होने दीजिये फिर देखिये मैं कैसे अपने अन्न के भंडार को भरता हूँ। इस पर आकाशवाणी हुई कि ” तथास्तु वत्स जैसे तुम चाहोगे आज के बाद वेसा ही मौसम हो जाया करेगा और ये साल मैंने तुमको दिया।” किसान बड़ा ख़ुशी ख़ुशी घर आया । और उसने गेहूं की फसल बो दी।

🔷 क्या होता है कि उस बरस भगवान ने कुछ भी अपने अनुसार नहीं किया और किसान जब चाहता धूप खिल जाया करती और जब वो चाहता तो बारिश हो जाती लेकिन किसान ने कभी भी तूफान को और अंधड़ को नहीं आने दिया। बड़ी अच्छी फसल हुई। पौधे बड़े लहलहा रहे थे। समय के साथ साथ फसल भी बढ़ी और किसान की ख़ुशी भी।

🔶 आखिर फसल काटने का समय आ गया किसान बड़ी ख़ुशी से खेतों की और गया और फसल को काटने के लिए जैसे ही खेत में घुसा बड़ा हैरान हुआ और उसकी ख़ुशी भी काफूर हो गयी क्योंकि उसने देखा कि गेंहू की बालियों में एक भी बीज नहीं था। उसका दिल धक् से रह गया। किसान दुखी होकर परमात्मा से कहने लगा ” हे भगवन ये क्या?”

🔷 तब आकाशवाणी हुए कि ” ये तो होना ही था वत्स तुमने जरा भी तूफ़ान, आंधी, ओलो को नहीं आने दिया जबकि यही वो मुश्किलें है जो किसी बीज को शक्ति देता है और वो तमाम मुश्किलों के बीच भी अपना संघर्ष जारी रखते हुए बढ़ता है और अपने जैसे हजारों बीजो को पैदा करता है जबकि तुमने ये मुश्किले ही नहीं आने दी तो कैसे बढ़ता ये बताओ तुम ?”  भगवान ने कहा बिना किसी चुनौतियों के बढ़ते हुए ये पौधे अंदर से खोखले रह गये। यही होना था।

🔶 यह सुनकर किसान को अपनी गलती का अहसास हुआ।

🔷 दोस्तों, जब तक हमारी ज़िंदगी में बाधाएं नहीं आती, परेशानियाँ नहीं आती हैं तब तक हमें भी अपनी ताकत का अंदाजा नहीं होता है। बाधाएं हमें मजबूत बनाती हैं जिससे हम अपनी ज़िंदगी में कुछ नया और बड़ा कार्य करें।

🔶 बस बाधाओं और मुश्किलों से कभी भी घबराना नहीं चाहिए और उनका सामना करते हुए आगे बढ़ता रहना चाहिए।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 31 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 31 May 2018

👉 Soul - An Eternal Entity

🔷 “Oh Lord! Some people say soul exists, some say this body itself is the soul; while others say that soul does not exist after death. Please tell me – what is the truth? This is my third boon you have promised to grant me”.

🔶 Like Nachiketa, any human being, who has deeply involved himself in Tapa-Sadhana, Yoga or long-term meditation and contemplation practices but has not yet realized his immortal self-identity, remains in this inquisitive state. Does the soul exist or not? It is a question of paramount importance. Those who are not able to solve this riddle go on groping in dark for a convincing answer but for those who have realized their true – self, life becomes a boon and bliss.

🔷 In this regard, the concepts of Hindu philosophy are very clear. Leaving aside a few thinkers like Maharishi Charak, who identified the sense of soul consciousness with the physical body, most of the Indian seers have considered the soul as an eternal entity independent of the body. Complex methods of yoga have been discovered with the help of which it is possible to take the soul out of the body when a person is alive and make it consciously enter the dead body of another person. The following are few instances of such phenomena.

🔶 During a scriptural debate with Bhagvati Bharati, wife of Mandan Misra, Adi Shankaracharya became answerless on a question that required knowledge of sex. The latter requested for some time to be able to give a convincing reply. Coincidentally, during the same time, the king of Mahishmatinagar died. Shankaracharya made his soul enter the king’s dead body. This process is called Parkaya Pravesh. Daily he used to take out the soul from his body, leaving his dead body lying in the jungle and his soul entering the body of king. During the night when Shankaracharya used to reenter his own body, king’s body became dead. The use of two bodies by a single soul amply proves a separate existence of the soul.

🔷 In 1939, an army commandant L.P. Farrel of the Western Command saw with his own eyes near Assam-Burma border a yogi who came out from his old body and entered the dead body of a young man who then became alive. This incident has been published in the May, 1970 issue of Akhand Jyoti (Hindi edition) on pages 29-30.

🔶 Normally, it is believed that life is based on the process of respiration. But saint Haridas took samadhi for one month in the presence of Maharaja Ranjit Singh and several British officers and established that the relation of the body is related to the soul in the same way as the machine is run by the electrical power. Without the soul the body becomes dead.

🔷 These are a few of the hundreds of recorded testimonies of soul’s immortality.

📖 From Akhand Jyoti  Feb- 2002

👉 भारतीय संस्कृति के विनाश का संकट (भाग 2)

🔷 भारतीय संस्कृति के लिए एक सबसे बड़ा खतरा है, वह है—पाश्चात्य संस्कृति का प्रचार अभियान। इसकी शुरूआत तभी से हो गई थी जब से अंग्रेज यहां पर आए थे। अपने शासन काल में उन्होंने सभी प्रकार अपनी संस्कृति के प्रसार की नींव मजबूत कर ली। ईसाई मिशनरियों के द्वारा प्रचार और स्कूल कालेजों में शिक्षा के माध्यम से ईसाइयत का प्रसार भारत में शुरू किया और यह आज के स्वतन्त्र भारत में बढ़ा ही है कम नहीं हुआ है।

🔶 संस्कृति के इस प्रचार अभियान के कारण प्रतिवर्ष लाखों भारतीय ईसाई बन रहे हैं। स्वदेशी रहन-सहन, भाषा, भाव, विचारों का परित्याग करके वे अपने सांस्कृतिक गौरव को भुला रहे हैं। उधर विदेशी लोग अपनी संस्कृति के प्रसार के लिए करोड़ों रुपया पानी की तरह बहा रहे हैं। जन सेवा के लिए चलाए जाने वाले समस्त ईसाई चर्च, स्कूल, अस्पताल सेवा संस्थायें आदि मूल रूप में ईसाइयत के प्रचार संस्थान हैं। ये लोग भारतीयों की आस्थाओं को नष्ट करके, बहका-फुसलाकर, नौकरी, विवाह, शिक्षा तथा अन्य वस्तुओं का लोभ देकर उन्हें अपनी संस्कृति में रंग रहे हैं। आसाम, बम्बई, महाराष्ट्र, बिहार, उड़ीसा, केरल, मद्रास के आदिवासी क्षेत्रों में ईसाई मिशनरी पूरे जोर-शोर के साथ अपना काम कर रहे हैं। इस सम्बन्ध में जांच, पड़ताल करने पर बड़े सनसनी पूर्ण तथ्य मिलते हैं।

🔷 ईसाई स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली बहुत सी पुस्तकों में हमारी संस्कृति के आदर्श नायक राम और कृष्ण के सम्बन्ध में घृणित विचार मिलते हैं। एक पुस्तक के अनुसार वह (श्रीकृष्ण) चोर था, उसने निरपराध धोबी का वध किया। ऐसे देवताओं की पूजा करना मूर्खता है।’’ इस तरह भगवान राम के बारे में—‘‘राम बड़ा पापी था उसने रावण का वध किया।’’ फिर इस तरह हिन्दू-संस्कृति के आधारों के प्रति आस्था नष्ट करके वे ईसा के प्रति भक्ति जगाते हैं। उसे मानव का कल्याणकारी बताकर लोगों को उसकी पूजा करने, ईसाई बनने का कूटनीतिक प्रयत्न इन ईसाई मिशनरियों द्वारा हमारे देश में कम नहीं चल रहा। इससे हमारी संस्कृति की नींव ही खोखली होती जा रही है। भारतीय समाज का एक बहुत बड़ा भाग आज ईसाई बनकर अपनी प्रेरणा और जीवन पद्धति का आधार पश्चिम को मान कर चलता है। ये लोग भारत में इस तरह रहते हैं मानो ये विदेशी हों। कैसी विडम्बना है?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 17

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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