👉 कष्टों में भी प्रसन्न रखती है- गुरूभक्ति
🔶 यह कथा पंजाब प्रान्त के सन्त बाबा लाल के बारे में है। बाबा लाल बड़े पहुँचे हुए फकीर थे। उनकी अलौकिक शक्तियों एवं यौगिक विभूतियों के कारण न केवल सामान्य जन, बल्कि पीर- फकीर एवं शाहजादे, बादशाह भी अभिभूत रहते थे। शाहजहाँ का बड़ा बेटा दाराशिकोह भी उनका भक्त था। इस बात से कम लोग वाकिफ हैं कि वह अपने पीर- मुर्शीद सूफी सरमद से मिलने के पहले से वह बाबा लाल जी से मिला था। वह इन्हें लालपीर जी कहा करता था।
🔷 शाहजादा दाराशिकोह का मन सूफियाना था। उसे परमात्मा से सच्ची लगन थी। बाबा लाल से मिलकर उसने अपनी ख्वाहिश बयान की कि आप मुझे शिष्य के रूप में स्वीकार कर लीजिए। बाबा लाल जी ने उसकी ओर देखा और बोले -दारा! तुझे तेरे मुर्शीद मिलेंगे। इसके लिए गुरूगीता का पाठ किया कर। दाराशिकोह उन दिनों उपनिषदों का फारसी में अनुवाद कर रहे थे। उन्होंने बाबा लाल की बात मान कर गुरूगीता का पाठ प्रारम्भ किया। इसके प्रभाव से उन्हें अपने पीर- मुर्शीद सूफी सरमद से मुलाकात हुई। दारा एवं सरमद जैसे एक- दूसरे के लिए बने थे। हालाँकि सरमद से मिलने के बाद भी दारा ने बाबा लाल की भक्ति नहीं छोड़ी। ऐतिहासिक तथ्य कहते हैं कि दाराशिकोह ने बाबा लाल से सात बार मुलाकातें कीं। इन मुलाकातों में उन्होंने बाबा लाल से अनेकों सवाल किये। दाराशिकोह द्वारा किये गये प्रश्न एवं बाबा लाल द्वारा दिये गये जवाब वास्तव में आध्यात्मिकता का खजाना है। जिन्हें शाहजहान में वजीर राय मुंशी चन्द्रभान विरहमनज् ने फारसी में लिपिबद्ध करने का महान् कार्य किया। जो इसरारे मार्फत या इसरारे गुलजार या नादिरूलनुकात के नाम से प्रसिद्ध है।
🔶 इतिहास इस बात की गवाही देता है कि औरंगजेब ने अपने बड़े भाई दारा के साथ बड़ा ही बर्बर एवं अमानवीय बर्ताव किया। और अंत में उन्हें और उनके बेटे का कत्ल करा दिया। यहाँ तक कि उसने सूफी फकीर सरमद को भी मरवा दिया। इसके बाद वह अपने अहं एवं अकड़ के साथ बाबा लाल जी से मिलने गया। बाबा लाल जी उसे देखकर मुस्कराये। औरंगजेब ने उन्हें व्यंग्यपूर्वक प्रणाम् किया और पूछा- महराज वैसे तो आप कई सिद्धियों के मालिक हैं, फकीर सरमद के बारे में लोग कुछ ऐसा ही कहा करते थे। परन्तु किसी ने दाराशिकोह की मदद नहीं की। आपकी कोई सिद्धि और साधना उसके काम नहीं आयी। बेचारा बेमौत मारा गया!
🔷 बाबा लाल जी औरंगजेब की बात सुनकर हँसे और बोले- औरंगजेब तू मगरूर है और अंधा भी। तेरा भाई दारा दरवेश था, उसे किसी भी राज्य की कोई इच्छा नहीं थी। वह तो बस अपने पिता की रक्षा करना चाहता था। तूने जो उसके साथ बर्बरता का व्यवहार किया है, उसकी सजा तो तू उम्र भर भोगेगा। जिस तरह साँप अपनी केंचुली को छोड़कर यह नहीं सोचता कि उसकी केंचुली का क्या किया जायेगा, उसी प्रकार सच्चा दरवेश अपने बाहरी जीवन की चिंता नहीं किया करते। दारा ने भी अनेक कष्ट एवं यातना सहकर महातप किया और आज वह खुद की रहमतों फरिश्तों का बादशाह है। तू देखना चाहता है तो देख- ऐसा कहते हुए बाबा लाल ने औरंगजेब को स्पर्श किया। इस स्पर्श के साथ औरंगजेब रूहानी दुनिया में पहुँच गया और उसने दारा के आध्यात्मिक वैभव को देखा। उसे अपने किये पर बड़ी शर्म आई। आँख खुलने पर उसने बाबा लाल जी से माफी माँगी। लेकिन प्रत्युत्तर में बाबा ने कुछ नहीं कहा। क्रूर औरंगजेब को अपने मन के कोने में कहीं इसका अहसास जरूर हुआ होगा कि गुरूभक्ति एवं साधना कर्म निरर्थक नहीं होती।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 175
🔶 यह कथा पंजाब प्रान्त के सन्त बाबा लाल के बारे में है। बाबा लाल बड़े पहुँचे हुए फकीर थे। उनकी अलौकिक शक्तियों एवं यौगिक विभूतियों के कारण न केवल सामान्य जन, बल्कि पीर- फकीर एवं शाहजादे, बादशाह भी अभिभूत रहते थे। शाहजहाँ का बड़ा बेटा दाराशिकोह भी उनका भक्त था। इस बात से कम लोग वाकिफ हैं कि वह अपने पीर- मुर्शीद सूफी सरमद से मिलने के पहले से वह बाबा लाल जी से मिला था। वह इन्हें लालपीर जी कहा करता था।
🔷 शाहजादा दाराशिकोह का मन सूफियाना था। उसे परमात्मा से सच्ची लगन थी। बाबा लाल से मिलकर उसने अपनी ख्वाहिश बयान की कि आप मुझे शिष्य के रूप में स्वीकार कर लीजिए। बाबा लाल जी ने उसकी ओर देखा और बोले -दारा! तुझे तेरे मुर्शीद मिलेंगे। इसके लिए गुरूगीता का पाठ किया कर। दाराशिकोह उन दिनों उपनिषदों का फारसी में अनुवाद कर रहे थे। उन्होंने बाबा लाल की बात मान कर गुरूगीता का पाठ प्रारम्भ किया। इसके प्रभाव से उन्हें अपने पीर- मुर्शीद सूफी सरमद से मुलाकात हुई। दारा एवं सरमद जैसे एक- दूसरे के लिए बने थे। हालाँकि सरमद से मिलने के बाद भी दारा ने बाबा लाल की भक्ति नहीं छोड़ी। ऐतिहासिक तथ्य कहते हैं कि दाराशिकोह ने बाबा लाल से सात बार मुलाकातें कीं। इन मुलाकातों में उन्होंने बाबा लाल से अनेकों सवाल किये। दाराशिकोह द्वारा किये गये प्रश्न एवं बाबा लाल द्वारा दिये गये जवाब वास्तव में आध्यात्मिकता का खजाना है। जिन्हें शाहजहान में वजीर राय मुंशी चन्द्रभान विरहमनज् ने फारसी में लिपिबद्ध करने का महान् कार्य किया। जो इसरारे मार्फत या इसरारे गुलजार या नादिरूलनुकात के नाम से प्रसिद्ध है।
🔶 इतिहास इस बात की गवाही देता है कि औरंगजेब ने अपने बड़े भाई दारा के साथ बड़ा ही बर्बर एवं अमानवीय बर्ताव किया। और अंत में उन्हें और उनके बेटे का कत्ल करा दिया। यहाँ तक कि उसने सूफी फकीर सरमद को भी मरवा दिया। इसके बाद वह अपने अहं एवं अकड़ के साथ बाबा लाल जी से मिलने गया। बाबा लाल जी उसे देखकर मुस्कराये। औरंगजेब ने उन्हें व्यंग्यपूर्वक प्रणाम् किया और पूछा- महराज वैसे तो आप कई सिद्धियों के मालिक हैं, फकीर सरमद के बारे में लोग कुछ ऐसा ही कहा करते थे। परन्तु किसी ने दाराशिकोह की मदद नहीं की। आपकी कोई सिद्धि और साधना उसके काम नहीं आयी। बेचारा बेमौत मारा गया!
🔷 बाबा लाल जी औरंगजेब की बात सुनकर हँसे और बोले- औरंगजेब तू मगरूर है और अंधा भी। तेरा भाई दारा दरवेश था, उसे किसी भी राज्य की कोई इच्छा नहीं थी। वह तो बस अपने पिता की रक्षा करना चाहता था। तूने जो उसके साथ बर्बरता का व्यवहार किया है, उसकी सजा तो तू उम्र भर भोगेगा। जिस तरह साँप अपनी केंचुली को छोड़कर यह नहीं सोचता कि उसकी केंचुली का क्या किया जायेगा, उसी प्रकार सच्चा दरवेश अपने बाहरी जीवन की चिंता नहीं किया करते। दारा ने भी अनेक कष्ट एवं यातना सहकर महातप किया और आज वह खुद की रहमतों फरिश्तों का बादशाह है। तू देखना चाहता है तो देख- ऐसा कहते हुए बाबा लाल ने औरंगजेब को स्पर्श किया। इस स्पर्श के साथ औरंगजेब रूहानी दुनिया में पहुँच गया और उसने दारा के आध्यात्मिक वैभव को देखा। उसे अपने किये पर बड़ी शर्म आई। आँख खुलने पर उसने बाबा लाल जी से माफी माँगी। लेकिन प्रत्युत्तर में बाबा ने कुछ नहीं कहा। क्रूर औरंगजेब को अपने मन के कोने में कहीं इसका अहसास जरूर हुआ होगा कि गुरूभक्ति एवं साधना कर्म निरर्थक नहीं होती।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 175













































