बुधवार, 23 मई 2018

👉 गुरुगीता (भाग 117)

👉 कष्टों में भी प्रसन्न रखती है- गुरूभक्ति

🔶 यह कथा पंजाब प्रान्त के सन्त बाबा लाल के बारे में है। बाबा लाल बड़े पहुँचे हुए फकीर थे। उनकी अलौकिक शक्तियों एवं यौगिक विभूतियों के कारण न केवल सामान्य जन, बल्कि पीर- फकीर एवं शाहजादे, बादशाह भी अभिभूत रहते थे। शाहजहाँ का बड़ा बेटा दाराशिकोह भी उनका भक्त था। इस बात से कम लोग वाकिफ हैं कि वह अपने पीर- मुर्शीद सूफी सरमद से मिलने के पहले से वह बाबा लाल जी से मिला था। वह इन्हें लालपीर जी कहा करता था।

🔷 शाहजादा दाराशिकोह का मन सूफियाना था। उसे परमात्मा से सच्ची लगन थी। बाबा लाल से मिलकर उसने अपनी ख्वाहिश बयान की कि आप मुझे शिष्य के रूप में स्वीकार कर लीजिए। बाबा लाल जी ने उसकी ओर देखा और बोले -दारा! तुझे तेरे मुर्शीद मिलेंगे। इसके लिए गुरूगीता का पाठ किया कर। दाराशिकोह उन दिनों उपनिषदों का फारसी में अनुवाद कर रहे थे। उन्होंने बाबा लाल की बात मान कर गुरूगीता का पाठ प्रारम्भ किया। इसके प्रभाव से उन्हें अपने पीर- मुर्शीद सूफी सरमद से मुलाकात हुई। दारा एवं सरमद जैसे एक- दूसरे के लिए बने थे। हालाँकि सरमद से मिलने के बाद भी दारा ने बाबा लाल की भक्ति नहीं छोड़ी। ऐतिहासिक तथ्य कहते हैं कि दाराशिकोह ने बाबा लाल से सात बार मुलाकातें कीं। इन मुलाकातों में उन्होंने बाबा लाल से अनेकों सवाल किये। दाराशिकोह द्वारा किये गये प्रश्न एवं बाबा लाल द्वारा दिये गये जवाब वास्तव में आध्यात्मिकता का खजाना है। जिन्हें शाहजहान में वजीर राय मुंशी चन्द्रभान विरहमनज् ने फारसी में लिपिबद्ध करने का महान् कार्य किया। जो इसरारे मार्फत या इसरारे गुलजार या नादिरूलनुकात के नाम से प्रसिद्ध है।

🔶 इतिहास इस बात की गवाही देता है कि औरंगजेब ने अपने बड़े भाई दारा के साथ बड़ा ही बर्बर एवं अमानवीय बर्ताव किया। और अंत में उन्हें और उनके बेटे का कत्ल करा दिया। यहाँ तक कि उसने सूफी फकीर सरमद को भी मरवा दिया। इसके बाद वह अपने अहं एवं अकड़ के साथ बाबा लाल जी से मिलने गया। बाबा लाल जी उसे देखकर मुस्कराये। औरंगजेब ने उन्हें व्यंग्यपूर्वक प्रणाम् किया और पूछा- महराज वैसे तो आप कई सिद्धियों के मालिक हैं, फकीर सरमद के बारे में लोग कुछ ऐसा ही कहा करते थे। परन्तु किसी ने दाराशिकोह की मदद नहीं की। आपकी कोई सिद्धि और साधना उसके काम नहीं आयी। बेचारा बेमौत मारा गया!

🔷 बाबा लाल जी औरंगजेब की बात सुनकर हँसे और बोले- औरंगजेब तू मगरूर है और अंधा भी। तेरा भाई दारा दरवेश था, उसे किसी भी राज्य की कोई इच्छा नहीं थी। वह तो बस अपने पिता की रक्षा करना चाहता था। तूने जो उसके साथ बर्बरता का व्यवहार किया है, उसकी सजा तो तू उम्र भर भोगेगा। जिस तरह साँप अपनी केंचुली को छोड़कर यह नहीं सोचता कि उसकी केंचुली का क्या किया जायेगा, उसी प्रकार सच्चा दरवेश अपने बाहरी जीवन की चिंता नहीं किया करते। दारा ने भी अनेक कष्ट एवं यातना सहकर महातप किया और आज वह खुद की रहमतों फरिश्तों का बादशाह है। तू देखना चाहता है तो देख- ऐसा कहते हुए बाबा लाल ने औरंगजेब को स्पर्श किया। इस स्पर्श के साथ औरंगजेब रूहानी दुनिया में पहुँच गया और उसने दारा के आध्यात्मिक वैभव को देखा। उसे अपने किये पर बड़ी शर्म आई। आँख खुलने पर उसने बाबा लाल जी से माफी माँगी। लेकिन प्रत्युत्तर में बाबा ने कुछ नहीं कहा। क्रूर औरंगजेब को अपने मन के कोने में कहीं इसका अहसास जरूर हुआ होगा कि गुरूभक्ति एवं साधना कर्म निरर्थक नहीं होती।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 175

मंगलवार, 22 मई 2018

👉 आज का सद्चिंतन 22 May 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 22 May 2018


👉 कृपा कर क्रोध मत कीजिए (अन्तिम भाग)

🔷 समाज में दो प्रकार के व्यक्ति होते हैं—एक वे जो क्षण भर भी अकेले नहीं रह सकते। यदि उन्हें अकेला रहना पड़ जाय तो वह पागल हो जावें, और दूसरे वे जो समाज में आने से डरते हैं। जब तक समाज में रहते हैं सतर्क रहते हैं, सदा उससे भागने की चेष्टा में रहते हैं और जब वे उससे अलग हो जाते हैं तो अपने−आपको सुखी पाते हैं। पहले प्रकार के व्यक्ति बहिर्मुखी कहलाते हैं और दूसरे प्रकार के अन्तर्मुखी। पहले प्रकार के लोग प्रसन्न चित्त दिखाई देते हैं। दूसरे प्रकार के लोग दुखी दिखाई देते हैं पर होते हैं शान्त। पहले प्रकार के लोगों का क्रोध अति प्रबल होता है। वे सभी से अपने प्रसन्न रखे जाने की आशा करते हैं। पर जब यह आशा पूरी नहीं होती तो उनका क्रोध अपरिमित हो जाता है। जब इस क्रोध का प्रदर्शन किसी दूसरे व्यक्ति पर नहीं होता, तो वह निराशा में परिणत हो जाता है।

🔶 इस तरह समाज में अधिक रहने कि इच्छा क्रोध और निराशा मूलक होती है। यह इच्छा मनुष्य को परावलंबी बनाती है तथा स्वावलंबन को कम करती है। ऐसी ही अवस्था में क्रोध हमें अपने आवेश में उड़ा लेता है। जिस प्रक्रिया से हम स्वावलम्बी बनते हैं उसी से हम क्रोध पर विजय पाते हैं। अंतर्मुखी होना स्वार्थी बनना नहीं है। जो दूसरों की सेवा से बचना चाहते हैं, वे वास्तविक अन्तर्मुखी नहीं हैं वे स्वार्थी हैं। अन्तर्मुखी दूसरों की सेवा करने में सब से आगे और दूसरों से सेवा ग्रहण करने में सब से पीछे रहता है।

🔷 प्रत्येक भाव के संस्कार हमारे अदृश्य मन में रहते हैं और इन संस्कारों के अनुसार हमारा आचरण बनता जाता है। जो व्यक्ति अपने मन के कुसंस्कारों को तुरंत मिटा देता है वह बड़ा बुद्धिमान है। क्रोध के संस्कार प्रेम से मिटते हैं। जिसे व्यक्ति के प्रति क्रोध कि या जाय उसके प्रति शीघ्रातिशीघ्र प्रेम प्रदर्शित करना चाहिए। कभी भी अपनी भूल को स्वीकार करना बुरा नहीं है। भूल स्वीकार करने से मन बलवान होता है तथा उसकी भूल करने की प्रवृत्ति जाती रहती है। यहाँ यह सोचना उचित नहीं कि क्रोध जिस व्यक्ति पर किया गया वह तुच्छ है अथवा उससे हमारा कोई प्रयोजन आगे न होगा। हमें दूसरों से कुछ प्रयोजन भले ही न हो अपने आप से तो अवश्य प्रयोजन है।

🔶 दूसरों के प्रति क्रोध करके हम अपने आपके प्रति अन्याय करते हैं इस अन्याय का प्रतिकार हमें तुरंत करना चाहिए। यदि ऐसा न किया जाय तो अन्याय की प्रवृत्ति प्रतिक्षण बढ़ती जाती है जिसका आगे चलकर भयंकर परिणाम होता है। अन्याय का प्रायश्चित पश्चात्ताप में नहीं है, न्याय में है। दूसरों के प्रति किए अनर्थ का पाप उनकी सेवा करने से दूर होता है। क्रोध का प्रतिकार प्रेम है न कि आत्मग्लानि, वह उसका स्वाभाविक परिणाम है। प्रेम, क्रोध और उसके सभी परिणामों को नष्ट करता है।

📖 अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1955 पृष्ठ 7
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1955/April/v1.7

👉 Awakening Divinity in Man (Part 8)

🔷 Friends! When God is pleased, He does not give you the petty worldly things you hanker after. Rather, He bestows on you godlike qualities which elevate your soul. The lives of world’s really great personage demonstrate this fact. None among them was such who did not receive God’s grace, guidance and cooperation of the masses they served.  Give me one name of a great personality who was not endowed with any godly qualities of compassion, love, faith and service and who did not elicit spontaneous and loving cooperation from those who followed him.

🔶 The noble values and principles of morality, ethics and spontaneity when adopted in conduct, help in enhancements of talents and resources. Saints adhere to great ideals of god like lives. They are never poor; required resources arrive at their doorstep. But they do not accumulate them; they generously share them with the needy.

🔷 When our minds are cleansed of all impurities and perversions, our material and inner resources are augmented. How many examples should I mention? The life of everyone who followed the ideal path of love-in-action and selfless service exemplifies this fact. They are true devotees in my view. I consider the worship and devotion of only those as true and worthwhile who could attract divine energies of their deity by the nobility of their character, by the magnetism of their virtues and by their single-minded determination at self refinement and self effacement When deities are happy with your worship, they bless you with the attributes of a divine being: enlightened wisdom, compassion and selfless service.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गुरुगीता (भाग 116)

👉 कष्टों में भी प्रसन्न रखती है- गुरूभक्ति

🔷 इस प्रकरण को विस्तार देते हुए भगवान् भोलेनाथ पराम्बा माँ भगवती से कहते हैं-

आयुरारोग्यमैयश्वर्यपुत्रपौत्रप्रवर्धनम्। अकामतः स्त्री विधवा जपान्मोक्षमवान्पुयात् ॥ १४६॥
अवैधव्यं सकामा तु लभते चान्यजन्मनि। सर्वदुःखभयं विध्नं नाशयेच्छापहारकम्॥ १४७॥
सर्वबाधाप्रशमनं धर्मार्थकाममोक्षदम्। यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्॥ १४८॥
कामितस्य कामधेनुः कल्पनाकल्पपादपः। चिन्तामणिः चिंतितस्य सर्वमङ्गलकारकम्॥१४९॥
मोक्षहेतुर्जपेत् नित्यं मोक्षश्रियमवाप्नुयात्। भोगकामो जपेद्यो वै तस्य कामफलप्रदम्॥१५०॥

🔶 गुरूगीता के विधिपूर्वक अनुष्ठान से आयु आरोग्य ऐश्वर्य एवं पुत्र- पौत्रों की वृद्धि होती है। विधवा स्त्री यदि निष्काम भाव से इसका पाठ करे, तो उन्हें मोक्ष मिलता है॥१४६॥ यदि वे सकाम भाव से पाठ करें, तो उन्हें अगले जन्म में अचल सौभाग्य की प्राप्ति होती है। गुरूगीता के पाठ से सभी दुःख, भय, विध्न एवं शापों का नाश होता है॥ १४७॥ इसकी साधना सभी बाधाओं का शमन करके धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष देने वाली है। यहाँ तक कि साधक जो- जो भी इच्छा करता है, वे सभी इच्छाएँ इससे निश्चित ही पूरी होती है।। १४८॥ यह गुरूगीता का पाठ कामना पूर्ति के लिए कामधेनु है। कल्पनाओं को साकार करने वाला कल्पतरू है। यह चिुंताओं को दूर करने वाली चिंतामणि है। इससे सभी का सब तरह से मंगल होता है॥१४९॥ मोक्ष की इच्छा से जो इसका पाठ करता है, उसे मोक्ष लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। भोग की इच्छा से पाठ करने वाले को मनवांछित भोग मिलते हैं॥१५०॥

🔷 भगवान् शिव के इन वचनों में गहरी सार्थकता एवं रहस्यमयता है। कई बार सामान्य जन इसकी रहस्यमयता के कारण गुरूगीता की साधना की सार्थकता नहीं समझ पाते। उन्हें लगता है, जो साधना में तत्पर है, उन्हें भला इतने कष्ट क्यों मिलते हैं। गुरूभक्त शिष्यों पर इतनी अधिक विपत्तियाँ क्यों आती हैं? सत्पथ पर चलते हुए उन्हें इतने ज्यादा संकटों का सामना क्यों करना पड़ता है? जबकि दुर्गुणी -दुराचारी लोगों को उनकी तुलना में ज्यादा सुख- भोग उठाते देखा जाता है। इन बातों के अटपटे रहस्यों का भेद करने में इन साधारण लोगों की बुद्धि हतप्रभ रह जाती है। उन्हें इस आध्यात्मिक उलटबासी में न कोई सार्थकता नजर आती है और न कोई यथार्थता। ऐसे लोग सदा- सदा अपने बौद्धिक प्रपंचों में उलझे रहकर साधना, तपस्या एवं सत्कर्मों से दूरी बनाये रखते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 174

रविवार, 20 मई 2018

👉 स्वर्ग का मार्ग:-

🔶 महात्मा बुद्ध के समय की बात है। उन दिनों मृत्यु के पश्चात आत्मा को स्वर्ग में प्रवेश कराने के लिए कुछ विशेष कर्मकांड कराये जाते थे। होता ये था कि एक घड़े में कुछ छोटे-छोटे पत्थर डाल दिए जाते और पूजा-हवन इत्यादि करने के बाद उस पर किसी धातु से चोट की जाती, अगर घड़ा फूट जाता और पत्थर निकल जाते तो उसे इस बात का संकेत समझा जाता कि आत्मा अपने पाप से मुक्त हो गयी है और उसे स्वर्ग में स्थान मिल गया है।

🔷 चूँकि घड़ा मिटटी का होता था इसलिए इस प्रक्रिया में हमेशा ही घड़ा फूट जाता और आत्मा स्वर्ग को प्राप्त हो जाती और ऐसा कराने के बदले में पंडित खूब दान-दक्षिणा लेते।

🔶 अपने पिता की मृत्यु के बाद एक युवक ने सोचा क्यों न आत्मा-शुद्धि के लिए महात्मा बुद्ध की मदद ली जाए, वे अवश्य ही आत्मा को स्वर्ग दिलाने का कोई और बेहतर और निश्चित रास्ता जानते होंगे। इसी सोच के साथ वो महात्मा बुद्ध के समक्ष पहुंचा।

🔷 उसने कहा, “हे महात्मन! मेरे पिता जी नहीं रहे, कृपया आप कोई ऐसा उपाय बताएं कि यह सुनिश्चित हो सके कि उनकी आत्मा को स्वर्ग में ही स्थान मिले।”

🔶 बुद्ध बोले, “ठीक है, जैसा मैं कहता हूँ वैसा करना…तुम उन पंडितों से दो घड़े लेकर आना। एक में पत्थर और दूसरे में घी भर देना। दोनों घड़ों को नदी पर लेकर जाना और उन्हें इतना डुबोना कि बस उनका उपारी भाग ही दिखे। उसके बाद पंडितों ने जो मन्त्र तुम्हे सिखाये हैं उन्हें जोर-जोर से बोलना और अंत में धातु से बनी हथौड़ी से उनपर नीचे से चोट करना। और ये सब करने के बाद मुझे बताना कि क्या देखा?”

🔷 युवक बहुत खुश था उसे लगा कि बुद्ध द्वारा बताई गयी इस प्रक्रिया से निश्चित ही उसके पिता के सब पाप काट जायेंगे और उनकी आत्मा को स्वर्ग की प्राप्ति होगी।

🔶 अगले दिन युवक ने ठीक वैसा ही किया और सब करने के बाद वह बुद्ध के समक्ष उपस्थित हुआ।

🔷 बुद्ध ने पूछा , “आओ पुत्र, बताओ तुमने क्या देखा?”

🔶 युवक बोला, “मैंने आपके कहे अनुसार पत्थर और घी से भरे घड़ों को पानी में डाल कर चोट की। जैसे ही मैंने पत्थर वाले घड़े पर प्रहार किया घड़ा टूट गया और पत्थर पानी में डूब गए। उसके बाद मैंने घी वाले घड़े पर वार किया, वह घड़ा भी तत्काल फूट गया और घी नदी के बहाव की दिशा में बहने लगा।”

🔷 बुद्ध बोले, “ठीक है! अब जाओ और उन पंडितों से कहो कि कोई ऐसी पूजा, यज्ञ, इत्यादि करें कि वे पत्थर पानी के ऊपर तैरने लगें और घी नदी की सतह पर जाकर बैठ जाए।”

🔶 युवक हैरान होते हुए बोला, “ आप कैसी बात करते हैं? पंडित चाहे कितनी भी पूजा करे लें पत्थर कभी पानी पे नहीं तैर सकता और घी कभी नदी की सतह पर जाकर नहीं बैठ सकता!”

🔷 बुद्ध बोले, “ बिलकुल सही, और ठीक ऐसा ही तुम्हारे पिताजी के साथ है। उन्होंने अपने जीवन में जो भी अच्छे कर्म किये हैं वो उन्हें स्वर्ग की तरफ उठाएंगे और जो भी बुरे कर्म किये हैं वे उन्हें नरक की और खीचेंगे। और तुम चाहे जितनी भी पूजा करा लो, कर्मकाण्ड करा लो, तुम उनके कर्मफल को रत्ती भर भी नहीं बदल सकते।”

🔶 युवक बुद्ध की बात समझ चुका था कि मृत्यु के पश्चात स्वर्ग जाने का सिर्फ एक ही मार्ग है और वो है जीवित रहते हुए अच्छे कर्म करना।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 21 May 2018


👉 सफलता की कुँजी

🔶 डरो मत। श्रद्धा करो। दुःख और आपत्ति की छाया से घिरने पर भी मत डरो। तुम अविनाशी परमात्मा के पुत्र हो। वह दिव्य अखंड ज्योति तुम्हारे अंधकार को नष्ट कर देगी। धीर बनो। तुम्हारे भीतर वह शक्ति है जो तुम्हें प्रत्येक परिस्थिति का मालिक बना देगी। उच्च विचारों का आवाहन करो। हृदय को वीर, हाथ को बलवान और इच्छा को अचल बनाओ। सत् चित् और आनंद की प्राप्ति के लिए अपनी शक्ति में श्रद्धा करो। सब में जीवन और स्फूर्ति का संचार करो। धैर्य आशा और दृढ़ निश्चय को धारण करो। जिम्मेदारियों को सिर पर लोगे, बल और साहस दिखाओगे तो निश्चय ही तुम्हें सफलता प्राप्त होगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1940 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1940/August/v1

👉 कृपा कर क्रोध मत कीजिए (भाग 2)

🔶 क्रोध का स्वभाव है कि यदि वह क्षणभर के लिए रोक दिया जाय, तो वह सब समय के लिए रुक जाता है। विलियम जेम्स का कथन है कि क्रोध आने पर दस तक गिनती कहो तो क्रोध विलीन हो जाता है। क्रोध की अवस्था में हम कभी−कभी बालक जैसा व्यवहार करने लगते हैं−पीछे ऐसे व्यवहार पर ही आत्म ग्लानि होने लगती है, अथवा उन पर हँसी आती है। ऐसा एक बार होने पर कई बार ऐसा ही हम करते रहते हैं। यही जीवन का भारी रहस्य है। बड़े−बड़े विद्वान् जब क्रुद्ध होते हैं, तब अपना सिर आप ही फोड़ने लगते हैं। अपना ही नुकसान करने से उन्हें सन्तोष होता है। इस प्रकार बराबर क्रोध प्रदर्शन करने से उनका स्वास्थ्य नष्ट हो जाता है, तो कितने ही लोग समय से पूर्व ही काल−कवलित हो जाते हैं। इन सब बातों को जान कर भी क्रोध रोके नहीं रुकता। फिर रोकने का उपाय क्या है?

🔷 अभिमान की कमी और प्रेम की वृद्धि क्रोध को रोकती है। जिन्हें बातों से अभिमान की वृद्धि होती है, उन्हें त्यागना चाहिए। चापलूसी की बातें सुनने से अभिमान की वृद्धि होती है। अभिमान की वृद्धि मानसिक शक्ति के ह्रास का सूचक है। जिस प्रकार विद्युत−शक्ति के रखने के लिए इन्स्यूलेटर की जरूरत पड़ती है उसी प्रकार मानसिक शक्ति को कायम रखने के लिये इन्स्यूलेटर की जरूरत है। अतएव जिस व्यक्ति को अपनी मानसिक शक्ति कायम रखना है, उसे जान बूझकर प्रतिदिन अपने साथियों से थोड़ी देर के लिए अलग हो जाना चाहिए। उसे सब समय समाज में न रहना चाहिए।

🔶 समाज के लोगों में उनकी सेवा करने के लिए तथा अपने प्रेम−प्रदर्शन भर के लिए आना चाहिए, पीछे उसे अपने आप में चला जाना चाहिए। जो मनुष्य किसी भारी विचार में लगा रहता है वह सामाजिक कार्यों में उतना ही भाग लेता है, जितना कि अति आवश्यक है। ऐसा करने से वह अपनी मानसिक शक्ति का ह्रास नहीं होने देता। उसके ध्वंसात्मक संवेग पहल से ही निर्बल हो जाते हैं, और अगर वे किसी समय उत्तेजित भी हुए तो वह उन्हें सरलता से काबू में कर लेता है।
📖 अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1955 पृष्ठ 6
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1955/April/v1.6

👉 Awakening Divinity in Man (Part 7)

Meaning and Purpose of Worship
🔶 Why do we worship the divine?  To condition and remind our minds of our divine origin. True worship of God means only one thing –the cultivation of nobility in thoughts, motives, speech and action. If you think that by worshiping a particular God you will gain material success or fulfill a specific desire–– then it is a wrong delusion. Worshiping God with sincerity results in enhancement of virtues like generosity, compassion and warmth in your psyche.

🔷 It brings about a positive change in the attitude of the devotee towards life. If you have not performed worship in its true sense, then you are likely to be lost in a maze of lifeless mechanical rituals. You should worship in such a way that you also get the gifts of grace bestowed on true devotees present and past. Your virtues, character, actions, behavior, thoughts and sentiments must improve as a result of worship. This is what shows the activation of divinity in life. If you attain this state, great opportunities will knock at your door.

🔶 Glance through the cultural history of India –– all the great names in it are of those who served the noble cause for the good of all and not of those who earned scholastic laurels. Have you heard of Mahamana Malviyaji? He was an ordinary person who became a great personage through sincere worship of divinity as he conceived it.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 भगवान कैसे दिखाई देंगे? (अन्तिम भाग)

🔶 भगवान श्रीकृष्ण का सच्चा भक्त अपने कृष्ण को समस्त संसार में देखता है जिस ओर उसकी दृष्टि जाती है, उधर ही उसे कृष्ण दिखाई देते हैं। उसे दिव्य योग के चक्षु और योग की दृष्टि प्राप्त हो गई है।

🔷 ऐसा सोचना कि तुम दुनिया से पृथक हो, भारी मूर्खता है। तुम दुनिया में हो और दुनिया तुम में है दुनिया के किसी प्राणी को कष्ट पहुँचाना तुम्हें अपने को ही कष्ट पहुँचाने के बराबर है। विश्व रंजन का हानि लाभ तुम्हारा ही हानि लाभ है। चन्द्रशेखर को प्रेम करना अपने को ही प्रेम करना है। दुई का भाव निकाल दो। दुई में मृत्यु है और एकत्व में असली जीवन है।

🔶 मित्रो! भगवान के दर्शन पाना बहुत कठिन नहीं है। उन प्रभु को प्रसन्न करना उतना अधिक कठिन नहीं है। वे सर्वव्यापी और घट-घट वासी हैं। वे तुम्हारे हृदय में निवास करते हैं। उन्हीं का सदैव चिन्तन करो। उनके साकार और सगुण रूप का ही ध्यान करो। नित्य ऐसी प्रार्थना करो-हे भगवान! मुझ पर दया करो। मेरी अन्तः दृष्टि खोल दो। मुझे दिव्य चक्षु प्रदान करो। मुझ पर ऐसी अनन्त दृष्टि कृपा कर दो कि मैं विश्व रूप दर्शन कर सकूँ। भक्त गण आपको पतित-पावन कह कर आपके गुणों का गान करते हैं। भक्तवत्सल! दीनदयाल!! मुझ पर भी दया करो। हे दयासागर! जिस प्रकार पक्षी अपने बालकों को अपने पंखों के भीतर छुपा कर रक्षा करते हैं, उसी प्रकार तुम भी मुझे अपनी चिर-शान्तिदायिनी शरण में लेकर मेरा उद्गार करो।

🔷 ऐसी प्रार्थना सच्चे हृदय से, प्रेम और निष्ठा से नित्य करने पर अवश्य ही तुम्हें भगवान के दर्शन होंगे। तब तुम सा भाग्यवान फिर कौन होगा?

✍🏻 श्री स्वामी शिवानन्दजी सरस्वती
📖 अखण्ड-ज्योति 1946 नवम्बर पृष्ठ 6
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1946/November/v1.6

👉 गुरुगीता (भाग 115)

👉 कष्टों में भी प्रसन्न रखती है- गुरूभक्ति

🔶 गुरूगीता के गायन से शिष्यों को मन चाहे वरदान मिलते हैं। लेकिन जो शिष्य है, उसके मन में केवल एक चाहत जगती है- अपने सद्गुरू से मिलन की चाहत। जिसे सांसारिक कामनाएँ ,वासनाएँ एवं लालसाएँ छूती हैं, समझो वह अभी शिष्य नहीं ।। हाँ, इतना जरूर है कि इस पाप पंक में फँसे हुए लोगों पर भी गुरू भक्त शिष्यों का दया आती है। दयावश वे इनकी मदद भी करते हैं। परन्तु सांसारिक कामनाओं के कीचड़ में वे कभी भी फँसना- उलझना नहीं चाहते हैं। यही वजह है कि कई बार ऐसे सांसारिक लोग इन सच्चे गुरूभक्तों को असफल मान लेते हैं। वे इनकी आध्यात्मिक विभूतियों को समझ ही नहीं पाते। उन्हें अनुमान ही नहीं हो पाता कि गुरूगीता का गायन करने वाले इन गुरूभक्त शिष्यों के आध्यात्मिक रहस्य क्या है और कितने हैं? यदि उनके जीवन में साधनाओं के साथ परेशानियाँ भी हैं तो इनके कारण क्या हैं?

🔷 गुरूगीता गाथा के पिछले क्रम में इस सत्य का सांकेतिक उल्लेख किया गया है। इसमें बताया गया है कि गुरूगीता की साधना सभी प्राणियों का सम्मोहन करने वाली है। इससे सभी प्राणियों को छुटकारा मिलता है। इससे सभी शत्रुओं एवं दुर्गुणों का स्तम्भन होता है, गुणों में बढ़ोत्तरी होती है। गुरूगीता की यह साधना दुरूकर्मों का नाश करके सत्कर्मों की सिद्धि देती है। इस साधना से सभी असाध्य कार्य साध्य होते हैं एवं नवग्रहों की पीड़ा दूर होती है। दुःस्वप्नों का फल नष्ट होता है, बन्ध्या स्त्री भी इस साधना से पुत्रवती बनती है। इस साधना के द्वारा स्त्रियाँ अपने सौभाग्य को चिरस्थायी बनाती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 173

शनिवार, 19 मई 2018

👉 कृपा कर क्रोध मत कीजिए (भाग 1)

🔷 क्रोध शक्ति की कमी का परिचायक है। मानसिक शक्ति की कमी हो जाने पर क्रोध का वेग विवेक से रुकता नहीं। जब क्रोध आता है तब विवेक दूर भाग जाता है जैसे कि उन्मत्त हाथी जब जंजीर तोड़ लेता है, तो महावत दूर भाग जाता है। क्रोध के द्वारा मानसिक शक्ति का ह्रास भी होता है। कारण और कार्य एक ही वस्तु के दो पहलू हैं। मानसिक शक्ति की कमी से क्रोध आता है और क्रोध से मानसिक शक्ति की कमी भी होती है। साधारणतया क्रोध दूसरे पर प्रकाशित होता है। उसका लक्ष्य दूसरों की हानि करना होता है।

🔶 जब वह अपने लक्ष्य में सफल होता है, तो मानसिक शक्ति के ह्रास का शीघ्र पता नहीं चलता किन्तु जिस समय वह अपने लक्ष्य में सफल नहीं होता, वह अपने प्रति ही झीखने लगता है। इस स्थिति में मनुष्य अपने आप को कोसने लगता है। अपनी कमजोरी को बड़ी तीव्रता से अनुभूति करने लगता है। यह अनुभूति आत्म निर्देश बन जाती है जिसके कारण मनुष्य वास्तव में कमजोर और निराशावादी बन जाता है।

🔷 क्रोध का आवेश एक बार आने पर साधारण चतुराई के विचारों से वह नियन्त्रित नहीं होता। क्रोध की अवस्था में मनुष्य विक्षिप्त मन हो जाता है, उसकी चतुराई उसके काम नहीं आती। चतुराई साँसारिक दृष्टि का नाम है। क्रोध इससे अधिक प्रबल होता है। क्रोध के रोकने के लिये विशेष दृष्टि की आवश्यकता है। क्रोध उसके रोकने अथवा निराकरण के पूर्व अभ्यास से रुकता है। क्रोध का निराकरण विरक्ति और प्रेम से होता है। यदि संसार के प्रति अमोह का व्यवहार तथा उसके प्राणियों के प्रति मैत्री भावना का अभ्यास मनुष्य ने पहले किया है तो वह अभ्यास क्रोध आने की अवस्था में उसे अविवेकयुक्त काम करने से रोक देता है।

📖 अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1955 पृष्ठ 6

👉 दया की देवी

🔷 सन् 1813 में इंग्लैंड के जेलखानों की बड़ी बुरी दशा थी। एक एक कोठे में 300 तक अधनंगी औरतें बन्द कर दी जाती थीं। उनके पास न ओढ़ने बिछाने को होता था, और न पहनने को कपड़े। युवा एवं वृद्ध स्त्रियाँ तथा छोटी उम्र की बालिकाएं घास और कूड़े के ढेर पर चिथड़े में लिपट कर सो जाती थीं। उनकी सुधि लेने वाला कोई न था। अधिकारी उन्हें सिर्फ इतना भोजन देते थे, जिससे वे किसी प्रकार जीवित रह सकें।

🔶 यह दशा एलिजाबेथ फ्राय नामक एक देवी ने देखी तो उसकी आंखें भर आई। फ्राय लिखी- पढ़ी थीं, और उनके पास आनंद और ऐश्वर्य की जिन्दगी बिताने योग्य बुद्धि थी। परन्तु जीवन के मधुर फल को चुपचाप खुद ही कुतर-कुतर कर खाते रहना उन्हें पसन्द न आया। सामने फुलवारी पर दृष्टि गई तो देखा कि पुष्प अपने सुन्दर जीवन को दूसरों के सुख के लिये अर्पित करता हुआ मुस्करा रहा था। फ्राय ने अपना जीवन इन दुखियों के निमित्त दे दिया। उन्होंने बन्दी ग्रह की पीड़ित बहिनों के उद्धार का व्रत लिया।

🔷 सरकार की सहायता से उन्होंने जेल में शिक्षा का प्रचार करना आरंभ किया। बन्दी ग्रह की नारकीय यंत्रणा भोगने वाली स्त्रियों को पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ कि कोई उनके परित्राण करने के लिये भी प्रयत्न करेगा। परन्तु जब पाप और अज्ञान में डूबी हुई, मूर्तियों को फ्राय ने प्रेम पूर्वक अपने गले लगाया और उन्हें शिक्षा देना आरंभ किया तो उनकी जीवन दिशाएं ही बदल गईं। कुछ ही मास के प्रयत्न ने उन नारकीय पशुओं को शान्त, निर्दोष और पवित्र बना दिया। सुधार का विस्तार हुआ। सरकार उनके कार्य को देखकर प्रभावित हुई, और उसने इस प्रकार की शिक्षा कानून द्वारा जेलखानों में जारी कर दी।

🔶 आज श्रीमती फ्राय इस संसार में नहीं हैं। परन्तु उनके पवित्र प्रेम का पौधा अतृप्त और दुःखी प्राणियों को शीतलता प्रदान करने के लिये जीवित है। उनकी योजना इस समय समस्त सभ्य संसार में काम में लाई जा रही है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 20 May 2018


👉 Awakening Divinity in Man (Part 6)

What do the deities do?
🔷 Deities keep doing one thing. What do they keep doing? They keep showering flowers. Look at the scriptures. The holy Ramayana for instance describes at fifty odd places that deities showered sacred flowers from heaven. What are these flowers? They symbolize goodwill, cooperation, guidance, respect and support. What attracts these virtues? Divinity, which is still present in the world. It alone had survived (in the past) and will alone survive (in the future); it can never be wiped out. If the demons (evils) do not die then why should God (the highest symbol of divinity) die? Like-minded people are attracted towards each other. A deity is attracted by deity-like humans and ideals are attracted by ideals; this results in the acquisition of benevolence, opportunities and co-operation from all directions. This is what has been happening, is happening and will continue to happen.

🔶 I am admiring deities. Where do they live? They are present in the integrity of the human character and the inner self. They inspire the motivation and zeal that clears all illusions and breaks and destroys the web of complications, infirmities, ignorance and worries. Divine inspiration even compels one to follow the righteous path. This is the true blessing of a deity. Anything lesser or lower than this can’t be a blessing of a divine power. The doors of eminence, success and achievements open as soon as your qualities, deeds and nature are illuminated by the spark of divinity.

🔷 Whosoever has gained immortal, glorious progress or notable success in any field in the world to date has accomplished it through his virtuous personality. A deity’s blessing is the supremacy of qualities, talents and thoughts. The life history of every great personality demonstrates it. Almost all of them were born in ordinary or underprivileged families and circumstances. But they reached greater and greater heights and accomplished brighter and brighter goals! Look at our late Prime Minister Lal Bahadur Shastry’s life for example.  He was blessed by God’s grace. How? In the form of two qualities – responsibility and wisdom. These great virtues persist in the linkage between God and the devotee and also strengthen it further. This is the only way to communicate with the Omniscient.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 भगवान कैसे दिखाई देंगे? (भाग 3)

🔷 वह व्यक्ति जो सदैव सत्य बोलता हो, जो दयावान हो, उदार हो, जो क्षमाशील और शान्त हो, जो हर प्रकार के भय से निर्भय हो, जिसने क्रोध और लालच को जीत लिया हो, जो परम पवित्र और प्रेमी हो, वही वास्तव में ब्रह्म है वही सच्चा ब्राह्मण है। जिसमें उपरोक्त गुण न हों, वे तो वास्तव में शुद्र ही हैं।

🔶 जब तक तुम अपने को बिना शर्त, बिना किसी स्वार्थ और निष्काम भाव से अपने को प्रभु की शरण में अर्पण नहीं कर देते, तब तक तुम उनकी कृपा के अधिकारी कैसे हो सकते हो? भगवान तुमसे कहीं अच्छी तरह यह बात जानते हैं कि तुम्हारा हित-अहित क्या है? पूर्ण रूप से अपना समस्त अपनत्व उन्हीं भगवान के पावन पाद-पदों में समर्पण करना मन्दिरों में जाकर दर्शन करने, घंटा घड़ियाल बजा कर पूजा करने और अन्य प्रकार की भगवत्सेवाओं से कहीं बढ़-चढ़ कर है।

🔷 भगवान तुम्हारा ऊपरी दिखावा नहीं चाहते। वे तो तुम्हारा हृदय चाहते हैं। एक बार प्रेम से ऐसा कह दो-प्रभु! तेरी इच्छा पूरी करूंगा, मैं तेरा हूँ, मेरे पास जो कुछ भी है सभी तो तेरा ही है। किन्तु यह बात हृदय की अन्तरात्मा से निकले। सचाई और निष्ठा के साथ। शुद्ध प्रेम में मतवाले बन कर रुदन करो एकान्त में उनके लिए विलाप करो ऐसे ढंग से रोओ कि तुम्हारे सब वस्त्र तुम्हारी अश्रु-धारा से भीग कर सराबोर हो जाय।

🔶 अपनी आँखों को बन्द करो। दुनिया, शरीर और समस्त वासनाओं को नष्ट करो। सब और से मन को खींच लो। केवल एक प्रभु में लीन हो जाओ। तब असली अमरत्व के अमृत का पान करो।

✍🏻 श्री स्वामी शिवानन्दजी सरस्वती
📖 अखण्ड-ज्योति 1946 नवम्बर पृष्ठ 5

👉 गुरुगीता (भाग 114)

👉 गुरू भक्ति की सिद्धि सर्वोपरि, सबसे बड़ी

🔷 एक बड़ी ही प्यारी अनुभूति कथा है। समर्थ गुरू रामदास के शिष्य स्वामी कल्याण गोदावरी नदी से कुछ कोस दूर एक गाँव में ठहरे हुए थे। अपने सद्गुरू के नाम की अलख जगाते हुए सत्प्रवृत्तियों का प्रसार करना उनका व्रत था। जय- जय रघुवीर समर्थ, को उच्चस्वर से पुकारते हुए जब वह ग्राम वीथियों से गुजरते ,तो लोग बरबस उन्हें घेर लेते। उनके पास आश्चर्यजनक सिद्धियाँ तो नहीं थीं, पर गुरूकृपा का बल था। अपने गुरू पर उनका सम्पूर्ण विश्वास ही उनकी सबसे बड़ी पूँजी थी। उनकी भक्तिपूर्ण बातें लोगों में चेतना की नयी लहरें पैदा करती।

🔶 ग्रामवासी स्वामी कल्याण के वचनों से आह्लादित थे। उन्हें जीवन की नयी दिशा मिल रही थी। परन्तु रूढ़िवादी साधु और कई तांत्रिक उनकी इन बातों से प्रसन्न नहीं थे, क्योंकि कल्याण स्वामी के वचनों ने जन जीवन में इतनी जागृति पैदा कर दी थी कि इन सभी का व्यवसाय बन्द होने लगा था। कर्म के सिद्धान्त पर विश्वास करने लगा जन- जीवन सत्कार्यों में प्रवृत्त होने लगा था। चमत्कारों की ओछी बाजीगरी से उसे उकताहट होने लगी थी। जन मानस की यह स्थिति अपने को सिद्ध कहने वाले तांत्रिकों को रास नहीं आयी। उन्होंने कल्याण स्वामी के प्रति अनेकों षड्यंत्र रचने शुरू कर दिये। वे सब मिलकर किसी भी तरह जन- जीवन की नजर में उन्हें अप्रमाणिक एवं अयोग्य साबित करना चाहते थे।

🔷 जब उनके सामान्य उपक्रम असफल साबित हुए, तो उन्होंने अपनी चमत्कारी सिद्धियों का सहारा लिया। इन सिद्धियों के बल पर उन्होंने गाँव के तालाबों, कुआँ, बावड़ियों का जल सुखा दिया। इस तांत्रिक अत्याचार से सामान्य जनता पानी के लिए तरसने लगी। मनुष्य एवं पशुओं का जीवन बिना पानी के विपन्न हो गया। बिलखते बच्चे ,परेशान गृहणियों की जिन्दगी दूभर हो गयी। परेशान गाँववासी कल्याण स्वामी के यहाँ गये। पर वे करते भी क्या? उनके पास ऐसी कोई सिद्धि नहीं थी, जिससे समस्या का हल हो सके। इधर इन कु्रर तांत्रिकों ने उनका और उनके गुरू का अपमान करना प्रारम्भ कर दिया। गाँव वालों को जितना सम्भव था।

🔶 कल्याण स्वामी के लिए स्वयं के अपमान का तो कोई मोल नहीं था, पर गुरू का अपमान उनसे बर्दाश्त नहीं हुआ। ग्रामीण जनों की दुर्दशा भी उनसे देखी न गयी। आखिर में उन्होंने गुरूगीता एवं गुरूमंत्र का आश्रय लेने की सोची। ग्रामवासियों के कल्याण के लिए उन्होंने कठिन उपवास करते हुए गायत्री महामंत्र से सम्पुटित करके गुरूगीता का अनुष्ठान प्रारम्भ किया। प्रगाढ़ तप में उनके दिन बीतते ।। प्रार्थना में उनकी रातें व्यतीत होतीं। यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा। एक रात प्रार्थना करते समय उनकी भाव चेतना समर्थ सद्गुरू के चरणों में विलीन होने लगी। उनके हृदय में बस एक ही आर्त पुकार थी, हे सद्गुरू! इन निर्दोष ग्रामीण जनों की रक्षा करो।

🔷 भक्त की पुकार गुरूदेव अनसुनी न कर सके। उनकी परावाणी कल्याण स्वामी की अंतर्चेतना में गूँज उठी, चिंता न कर, माँ गोदावरी से प्रार्थना कर, उनको मेरा संदेश देना, उन्हें कहना मेरे गुरू ने आपको ग्रामीण जनों के कल्याण के लिए आमंत्रित किया है। समर्थ गुरू का यह विचित्र सा संदेश कल्याण स्वामी को ठीक से समझ नहीं आया। फिर भी वे अपने गुरूभक्ति की धुन में माँ गोदावरी के पास गये और उन्होंने गुरू का संदेश सुनाते हुए ग्रामवासियों का जल संकट दूर करने के लिए प्रार्थना की। इतना ही नहीं गोदावरी से एक लकीर खींचते हुए गाँव में आ गये।

🔶 उनके उस कार्य का तांत्रिकों ने बड़ा मजाक उड़ाया। लेकिन सबको आश्चर्य तो तब हुआ, जब उन्होंने देखा कि पानी से खाली गाँव कुएँ, तालाब, बावड़िया फिर से पानी से भर गये हैं। माँ गोदावरी प्रत्यक्ष रूप से तो नहीं बहती रही, किन्तु उनकी अंतर्धारा ने गाँव आकर सबका कष्ट दूर कर दिया। गाँव वालों ने गुरूभक्ति का यह प्रत्यक्ष चमत्कार देखा और उन सबने स्वीकार किया, किसी भी मांत्रिक- तांत्रिक सिद्धि से गुरूभक्ति की सिद्धि बड़ी है। गुरूभक्ति से बड़कर न तो कोई सिद्धि और न शक्ति।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 171

शुक्रवार, 18 मई 2018

👉 बुद्ध और उनकी प्रव्रज्या

🔶 बुद्ध को आत्मबोध हुआ। कठोर तपश्चर्या के बाद प्राप्त इस उपलब्धि से वे निर्वाण- मोक्ष की ओर भी बढ़ सकते थे। पर उनका लक्ष्य था-  अनाचार, कुरीति से भरे समाज का परिशोधन तथा विवेक रूपी अस्त्र द्वारा जन- मानस का परिष्कार। आत्मबोधजन्य ईश्वरीय सन्देश को व्यापक बनाने वे निकल पड़े और जन- जन तक पहुँचकर विचार- क्रांति कर सकने में सफल हुए।

🔷 परिव्रज्या बौद्ध धर्म का प्रधान अंग मानी जाती थी। भिक्षुक गण सतत चलते रहते थे व बुद्ध के साथ 'संघं, धर्म शरणम् गच्छामि' का नारा लगते। फलत: भारतवर्ष ही नहीं, सारे विश्व भर में उनका सन्देश पहुँचाने का लक्ष्य पूरा कर सके। सिद्धार्थ के अन्दर विश्व कल्याण की कामना रूप में जो बीज पला वह गौतम बुद्ध के रूप में विकसित, पल्लवित होकर सारी मानवता को धन्य कर गया।

📖 प्रज्ञा पुराण से

👉 नौरोज का मेला

🔶 अकबर की महानता का गुणगान तो कई इतिहासकारों ने किया है लेकिन अकबर की औछी हरकतों का वर्णन बहुत कम इतिहासकारों ने किया है........!

🔷 अकबर अपने गंदे इरादों से प्रतिवर्ष दिल्ली में नौरोज का मेला आयोजित करवाता था जिसमें पुरुषों का प्रवेश निषेध था अकबर इस मेले में महिला की वेष-भूषा में जाता था और जो महिला उसे मंत्र मुग्ध कर देती उसे दासियाँ छल कपट से अकबर के सम्मुख ले जाती थी .........!

🔶 एक दिन नौरोज के मेले में महाराणा प्रताप सिंह की भतीजी, छोटे भाई महाराज शक्तिसिंह की पुत्री, मेले की सजावट देखने के लिए आई जिनका नाम बाईसा किरण देवी था जिनका विवाह बीकानेर के पृथ्वीराज जी से हुआ। बाईसा किरण देवी की सुंदरता को देखकर अकबर अपने आप पर काबू नही रख पाया और उसने बिना सोचे समझे दासियों के माध्यम से धोखे से जनाना महल में बुला लिया.......!

🔷 जैसे ही अकबर ने बाईसा किरण देवी को स्पर्श करने की कोशिश की किरणदेवी ने कमर से कटार निकाली और अकबर को ऩीचे पटकर छाती पर पैर रखकर कटार गर्दन पर लगा दी और कहा नींच....नराधम तुझे पता नहीं मैं उन महाराणा प्रताप की भतीजी हुं........ जिनके नाम से तुझे नींद नहीं आती है...... बोल तेरी आखिरी इच्छा क्या है.............?

🔶 अकबर का खुन सुख गया कभी सोचा नहीं होगा कि सम्राट अकबर आज एक राजपूत बाईसा के चरणों में होगा .........!

🔷 अकबर बोला मुझे पहचानने में भूल हो गई मुझे माफ कर दो देवी.......!

🔶 तो किरण देवी ने कहा कि आज के बाद दिल्ली में नौरोज का मेला नहीं लगेगा और किसी भी नारी को परेशान नहीं करेगा अकबर ने हाथ जोड़कर कहा आज के बाद कभी मेला नहीं लगेगा उस दिन के बाद कभी मेला नहीं लगा.........!

🔷 इस घटना का वर्णन गिरधर आसिया द्वारा रचित सगत रासो मे 632 पृष्ठ संख्या पर दिया गया है।

🔶 बीकानेर संग्रहालय में लगी एक पेटिंग मे भी इस घटना को एक दोहे के माध्यम से बताया गया है।

किरण सिंहणी सी चढी... उर पर खींच कटार..!
भीख मांगता प्राण की....अकबर हाथ पसार...!!

🔷 अकबर की छाती पर पैर रखकर खड़ी वीर बाला किरन का चित्र आज भी जयपुर के संग्रहालय मे सुरक्षित है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 19 May 2018


👉 कष्टों का निवारण (अन्तिम भाग)

🔶 बीमारी से ग्रसित हो जाने या किसी अन्य संकट में फंस जाने पर उससे मुक्त होने के लिए भी अपना आन्तरिक बल चाहिए। सदाशा और शुभ भविष्य का दृढ़ विश्वास कठिनाई से निकाल सकते हैं। आत्म विश्वास की जितनी मदद, बीस मित्र मिलकर भी नहीं कर सकते। आत्म निर्भरता वह संजीवनी बूटी है जिसे पीकर मुर्दे जी पड़ते हैं और बुड्ढे जवान हो जाते हैं इसके मुकाबले का और कोई ‘टानिक’ विश्व भर में अविष्कृत नहीं हो सका है।

🔷 तात्पर्य यह है कि बाहर की जो कुछ भी भली बुरी परिस्थितियाँ तुम्हें घेरे हुए हैं वह तो फूल पत्तियाँ हैं इनकी जड़ आन्तरिक जीवन में है। उन्हें बदलना चाहते हो, अपने जीवन में परिवर्तन करना चाहते हो, कष्टों से छुटकारा पाना चाहते हो, आगे का जीवन सुखी बनाना चाहते हो तो केवल बाहरी दौड़ धूप करके संतुष्ट मत हो जाओ, इससे तुम्हें स्थायी शाँति नहीं मिल सकेगी। आत्यंतिक निवृत्ति तो तभी होगी जब उसके मूल स्त्रोत का उपचार किया जाएगा।

🔶 यदि तुम अपने वर्तमान जीवन से असंतुष्ट हो, उन्नति और विकास की आकाँक्षा करते हो तो अपना आन्तरिक जीवन टटोल डालो। उसमें से बुरी आदतों, नीच वासनाओं, दुष्ट वृत्तियों को निकाल डालो। इससे तुम्हारा मार्ग साफ हो जाएगा और उसकी सारी कठिनाईयाँ दूर हो जायेंगी। आत्म बल, दृढ़ता और तीव्र इच्छा शक्ति को बढ़ाओं अपने अंदर शुभ वृत्तियों और सद्गुण को आने दो इन्हीं के आधार पर उन्नति के पथ पर सरपट दौड़ते चले जाओ

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1940 जुलाई पृष्ठ 3

👉 Awakening Divinity in Man (Part 5)

🔶 When one is attracted by the soothing wave of ideals and is immersed in it, then his magnetism, his charm, his voice, his overall personality and his authenticity are so empowered that everyone is impressed by him, attracted towards him and wants to cooperate with him. Vivekanand got abundant honour and support from all parts of the world. Who showered them? The Goddess Kali. If gurus like Ramkrishna are alive somewhere or are reborn, they will always grant blessings that will develop virtuous personality of their disciples.

🔷 If your personality is refined and evolved in the righteous direction, then help and harmonius association will be showered upon you from all directions according to your wishes. You won’t have to ask for them. You will receive them effortlessly. When divinity is expressed in your personality, benevolence and respect begin to fall upon you. So many examples are available before you. Look at revered Baba Amte! He donated everything and engaged his whole life for the service of the socially discarded leprosy patients.

🔶 This is a principle of greatness, an ideal of humanity, a boon of divinity. Blessings (of deities) cannot be expected in sacrifices of any lesser magnitude (than that of people like Baba Amte). And there is nothing greater to be blessed by… Begging has never brought anything useful to anyone and will never be able to bring anything better in future either.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 भगवान कैसे दिखाई देंगे? (भाग 2)

🔶 स्वार्थान्धता को दूर करो। इच्छाओं का दमन करो। वहम या शंकाओं को हटाओ, हृदय को पवित्र करो। अपने विचारों पर मनन करो। अपने सिद्धान्तों पर विचार करो। जो गन्दगी या कूड़ा-करकट हो, उसे साफ करो और इस प्रकार भगवान् को प्राप्त करो। यही हर युग के सन्त-महात्माओं के उपदेशों का सार है। बुद्ध, ईसा, मुहम्मद शिन्टो, चैतन्यदेव, शंकर आदि के उपदेश को पढ़ो। तुम्हें साधना का यही सार मालूम होगा। यही भगवत्प्राप्ति का मार्ग है। भगवत्प्राप्ति ही तुम्हारा मुख्य-कर्त्तव्य है।

🔷 जिस प्रकार एक गाड़ी को कुशल हाँकने वाला अपनी गाड़ी में जुते चंचल घोड़ों की रास या लगाम के द्वारा रोक-थाम करता है, उसी तरह तुम भी अपनी चंचल-इन्द्रिय-रूपी घोड़ों को विवेक और वैराग्य की लगामों के द्वारा रोक-थाम करो। तभी तुम्हारी उस परब्रह्म भगवान या सुमधुर आत्मा तक पहुँचने की यात्रा सकुशल पूरी होगी और तुम्हें वास्तविक सुख-शान्ति प्राप्त होगी।

🔶 सदैव सत्य बोलो सत्य के पथ से कभी विचलित मन हो वो। यह ध्यान रक्खो कि सत्य का अभ्यास करने और पवित्र-जीवन बिताने के लिये ही तुम पैदा हुए हो। नेकी में ही सत्य का निवास है। सीधे खड़े हो, सुदृढ़ बनो, निर्भाव हो वो, सत्यवादी बनो और सत्य का अभ्यास करो। हर जगह सत्य का ही प्रचार करो।

✍🏻 श्री स्वामी शिवानन्दजी सरस्वती
📖 अखण्ड-ज्योति 1946 नवम्बर पृष्ठ 5

👉 गुरुगीता (भाग 113)

👉 गुरू भक्ति की सिद्धि सर्वोपरि, सबसे बड़ी

🔶 इस प्रकरण को आगे बढ़ाते हुए भगवान् शिव माँ भगवती से कहते हैं-

🔷 मोहनं सर्वभूतानां बंधमोक्षकरं भवेत्। देवराजप्रियकरं सर्वलोकवशं भवेत्॥ १४२॥
सर्वेषां स्तम्भनकरं गुणानां च विवर्धनम्। दुष्कर्मनाशनं चैव सुकर्मसिद्धिदं भवेत्॥१४३॥
असिद्धं साधयेत्कार्यं नवग्रहभयावहम्। दुःस्वप्रनाशनं चैव सुस्वन्पफलदायकम्॥ १४४॥
सर्वशान्तिकरं नित्यं तथा वंध्यासुपुत्रदम्। अवैधव्यकरं स्त्रीणां सौभाग्यदायकं सदा॥१४५॥

🔶 गुरूगीता की साधना सभी प्राणियों का सम्मोहन करने वाली है। इससे सभी बन्धनों से छुटकारा मिलता है इससे देवराज की प्रीति मिलती है और सभी लोकों के प्राणी वश में होते हैं॥१४२॥ इससे सभी शत्रुओं एवं दुर्गुणों का स्तम्भन होता है। गुणों की अभिवृद्धि होती है। गुरूगीता की यह साधना दुष्कर्मों का नाश करके सत्कर्मों की सिद्धि देती है॥ १४३॥ इस साधना से असाध्यकार्य साध्य होते हैं एवं नवग्रहों की पीड़ा दूर होती है। दुःस्वन्पों का फल नष्ट होता है, सुस्वप्नों का सुफल मिलता है॥ १४४॥ इस साधना से नित्य सभी प्रकार की शान्ति होती है, वन्ध्या स्त्री इस साधना के द्वारा पुत्रवती बनती है। स्त्री इस साधना द्वारा अपने वैधव्य का निवारण करके सौभाग्य को चिरस्थायी बनाती है॥ १४५॥

🔷 भगवान् शिव के ये वचन संसार के असह्य कष्टों से संतप्त जनों के लिए गुरू उपदेश के समान है। इनके अनुसरण से मनुष्य न केवल स्वयं विपत्तियों से छूट सकता है, बल्कि औरों की भी सार्थक सहायता कर सकता है। बस गुरूगीता की सुखद् छाँव में आश्रय लेने भर की बात है। 

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 170

गुरुवार, 17 मई 2018

👉 त्याग करो-और मिलेगा

🔷 सारपत नगर में एक विधवा स्त्री रहती थी। उसके केवल एक ही पुत्र था। एक बार उस नगर में भारी दुर्भिक्ष पड़ा। गाँव के गाँव उजड़ने लगे। भूख के मारे लोग काल के गाल में समा रहे थे।

🔶 एक दिन इलियाह नामक एक धर्मी पुरुष परमेश्वर की ओर से इस स्त्री के पास भेजा गया। इलियाह ने जाकर उससे रोटी माँगी। स्त्री ने उत्तर दिया कि उसके पास घड़े में केवल एक मुट्ठी आटा तथा कुप्पी में थोड़ा सा तेल है जिससे रोटी बनाकर एक ही बार भोजन करके वे दोनों माता-पुत्र मर जायेंगे, क्योंकि दूसरी बार के लिये एक दाना तक शेष नहीं है। इलियाह ने कहा- “जैसा मैं कहता हूँ, वैसा ही कर”, क्योंकि परमेश्वर कहता है कि “न तेरे घड़े का आटा और न तेरी कुप्पी में का तेल चुकेगा।” इसलिये परमेश्वर पर विश्वास करके अपनी चिन्ता उसी पर डाल और पहिले मुझे भोजन बनाकर खिला।

🔷 यह बड़ा ही टेढ़ा सवाल था। स्त्री ने सोचा कि यहाँ तो खुद भूखे मरने की नौबत है, अब क्या करूं। इतने ही में उसके हृदय से आवाज आई कि त्याग का प्रतिफल अवश्य ही मिलता है। उसने तुरन्त ही भोजन बनाया और उसे खिला दिया।

🔶 आश्चर्य की बात है कि वह जितना आटा निकालती थी उतना ही बढ़ता जाता था। उस दिन से उस स्त्री को मालूम हो गया कि भगवान हमारी कठिन से कठिन परिस्थिति में भी हमारा विश्वास बढ़ाता है। क्या हम भी इस विधवा स्त्री के सदृश्य त्याग करते हैं? और परमेश्वर पर विश्वास रखते हैं?

📖 अखण्ड ज्योति, अक्टूबर 1943 पृष्ठ 14
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/October/v1.14

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 18 May 2018


👉 कष्टों का निवारण (भाग 2)

🔷 सामयिक परिस्थितियों में भी अधिकाँश का कारण अपना स्वभाव ही होता है। मुहल्ले वाले तुम्हें बुरा बताते हैं, झगड़े लगाते हैं और दुर्व्यवहार करते हैं। उन सब से अलग-अलग लड़ोगे तो भी शायद इच्छित शाँति को प्राप्त न कर सकोगे। सोचना चाहिए कि मेरे अंदर वास्तव में वे दुर्गुण कौन से हैं जो इतने लोगों को मेरा विरोधी बनाये हुए है। तुम्हारे अंदर यदि कड़ुआ बोलने, अनुचित हस्तक्षेप करने, लोक विरोधी काम करने की आदतें हैं तो उन्हें सुधारो, बस, सारे शत्रु मिट जायेंगे। तुम्हें कोई नौकर नहीं रखता। तो मालिकों को मत कोसो। अपने अंदर वह योग्यता प्राप्त करो जिसके होने पर हर जगह से आमंत्रण मिलता है।

🔶 सद्गुण मनुष्य की वह सम्पत्ति हैं जिनके होने पर उसका हर जगह आदर होना चाहिए। हर किसी का प्रेम और सहानुभूति प्राप्त होनी चाहिए। जब साधु स्वभाव काले पुरुष भी तुम्हारा विरोध कर रहे हों तो देखो कि हमारे अंदर कौन-कौन से दुर्गुण आ छिपे हैं। कई लोगों में यह कमी होती है कि जन साधारण में फैले हुए झूठे भ्रम को दूर नहीं कर सकते और अकारण लोगों के कोप का भाजन बनते हैं। उन्हें चाहिए कि सत्य बात को लोगों के सामने प्रकट करके अपनी निर्दोषिता साबित करें।

🔷 भय करने डरने और घबरा जाने के दुर्गुण ऐसे हैं जो दूसरों को अपने ऊपर अत्याचार करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं जिनका स्वभाव निर्भय रहने का, हर प्रकार की कठिनाइयों का मुकाबला करने का होता है उन पर ज्यादती करने वाले झिझकते हैं। कहते हैं कि हिम्मत के सामने तलवार की धार भी मुड़ जाती है। धनाभाव के बारे में भी यही बात है जिसका पूरा ध्यान और मनोयोग धन संचय के साधनों में लगा हुआ नहीं है वह धनपति नहीं हो सकता। स्वास्थ्य को बढ़ाने की जिसकी प्रबल मनोकामना नहीं है वह पहलवान कैसे बन सकेगा?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1940 जुलाई पृष्ठ 2

👉 Awakening Divinity in Man (Part 4)

Our folly!
🔷 Man is an intelligent being but at times displays his foolishness more than his intelligence. Don’t know from where he has developed the notion that Gods fulfil all desires; they bestow the boons of wealth, son, job, victory… and what not. Unfortunately, this misconception has entered in the field of spirituality too. This single illusion has caused so great a loss and harm that the enormous benefits and bright possibilities of spirituality that would have beatified man with unlimited joy have been ruined completely.

🔶 Deities have given only one thing in the ancient times and will give only one thing in the future too. As long as deities survive, devotion (to God) is sustained and the regularity of worship is maintained, one thing will be granted – divine virtues. If you are endowed with the virtues of divinity, then you will acquire hundreds and thousands times more glorious success than what you dream and desire now.

🔷 What do you want from the blessings of a deity or a great saint or from the power of a mantra? A job of few thousand rupees in lieu of the invaluable treasure of divinity? If any deity bestows divinity upon you, then it will raise the worth of your job so much that you will be grateful forever. Vivekanand had gone to Swami Ramkrishna to ask for a job but he got what a great soul like him indeed deserved –divinity, true devotion (bhakti), strength (ïakti) and peace (ï³nti). What are these? These are divine virtues. When saints bless their kindness upon you, they inspire unique enthusiasm and optimism in your inner self, which pulls you towards enlightened values of morality.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 भगवान कैसे दिखाई देंगे? (भाग 1)

🔷 भगवान की व्यक्तिगत सूरतों को ईश्वर, अल्लाह, हरि, जेंहोवाह, स्वर्गीय-पिता, विष्णु, शिव आदि कहा जाता है।

🔶 वेदान्ती- लोग उन्हें ब्रह्म कहते हैं। हर्वट-स्पेन्सर उन्हें “जो न जाना जा सके” ऐसा कहते हैं। सकोपेन हेनर उन्हें ‘इच्छा’ के नाम से पुकारते हैं। ‘पूर्ण’, ‘पुरुषोत्तम’ आदि नामों से भी कुछ लोग उन्हें पुकारते हैं और स्पिनोजा उन्हें ‘तत्व’ कहकर सम्बोधन करते हैं।

🔷 भगवान को पहचानने में, धर्म में, विश्वास और उनकी पूजा में निष्ठा होनी चाहिये। यह विषय किसी गोष्ठी या क्लब में बैठ कर बहस करने का नहीं है। यह तो सत्य-आत्म की प्राप्ति का विषय है। यह मानव की सबसे गहरी आवश्यकता की पूर्ति है।

🔶 अतः अपने जीवन को उच्च बनाने के लिये धर्म की शरण लो। उसकी प्राप्ति के लिये प्रति-क्षण उद्योग करो और प्रत्येक पल धार्मिक बनने के लिये जीवित रहो। बिना धर्म के जीवन से मृत्यु बहुत अच्छी है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्री स्वामी शिवानन्दजी सरस्वती
📖 अखण्ड-ज्योति 1946 नवम्बर पृष्ठ 5

👉 गुरुगीता (भाग 112)

👉 गुरू भक्ति की सिद्धि सर्वोपरि, सबसे बड़ी

🔷 गुरूगीता गुरूभक्त शिष्यों के लिए कल्पतरू है। इसकी छाँव तले सांसारिक सुख- सम्पदाएँ, आध्यात्मिक ऐश्वर्य, मोक्ष सभी कुछ मिलता है। गुरूगीता के सविधि अनुष्ठान से बड़े से बड़े दुस्तर संकट कटते हैं। असहनीय पीड़ाओं से छुटकारा मिलता है। श्रद्धा हो, शिष्यत्व हो, सद्गुरू का आश्रय हो, तो गुरूगीता से असम्भव- सम्भव बन पड़ते हैं। विन्घ- बाधाएँ सांसारिक हों या आध्यात्मिक गुरूगीता से सभी का निराकरण ,समाधान सम्भव है। इसी कारण सभी महासिद्धों, सत्पुरूषों ने इसे चमत्कारों का सारभूत पुंज कहा है। जो इसका आश्रय लेते हैं, उनके जीवन में निराशाएँ हटती हैं एवं आशाओं की किरणें झिलमिलाती हैं।

🔶 गुरूगीता के पिछले क्रम में इसी सत्य की सार प्रस्तुति की गयी है। भगवान् सदाशिव ने गुरूगीता के मर्म को बताने के साथ भगवती जगदम्बा को अनुष्ठान में आसन की महिमा से अवगत कराया है। शिव वचनों के अनुसार वस्त्रासन पर साधना करने से दरिद्रता आती है। पत्थर पर साधना करने से रोग होते हैं। धरती पर बैठकर साधना करने से दुःख होते हैं, काष्ठासन पर की गयी साधना निष्फल होती है। जबकि काले हरिण के चर्म पर साधना करने से ज्ञान मिलता है, व्याघ्र चर्म पर की गयी साधना मोक्षदायक है। कुश का आसन ज्ञान को सिद्ध करता है, जबकि कम्बल पर बैठकर साधना करने से सर्वसिद्धियाँ मिलती हैं। इस कथन के साथ ही भगवान् भोलेनाथ का उपदेश यह है- अपना कल्याण चाहने वाले साधक को गुरूगीता का अनुष्ठान कुश, दूर्वा अथवा श्वेत कम्बल के आसन पर बैठकर करना उचित है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 169

👉 कष्टों का निवारण (भाग 1)

🔶 ‘अखंड ज्योति’ के पाठकों में से अनेकों को कई प्रकार के शारीरिक तथा मानसिक कष्ट होंगे। बाहरी परिस्थितियाँ विपरीत होने या दूसरों के आक्रमण से चिन्तित होंगे। कइयों को भाग्य और ईश्वर से शिकायत होगी। कुछ घर वालों, मित्रों और अफसरों के व्यवहार से असंतुष्ट होंगे। वे यथा साध्य इन कठिनाइयों को दूर करने के लिए प्रयत्न किया करते हैं। परन्तु फल कोई संतोषजनक नहीं होता। कठिनाइयाँ ज्यों की त्यों बनी रहती हैं।

🔷 इस समस्या पर विचार करने के लिए कुछ गहरा उतरना होगा। गहरा अन्वेषण करने पर पता चलता है कि बाह्य परिस्थितियों की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। वे आन्तरिक परिस्थितियों की छाया मात्र हैं। मनुष्य का बीज रूप वास्तविक जीवन, उसका आन्तरिक जीवन है। जैसा बीज होगा वैसा पौधा उगेगा, जैसी इच्छा होगी वैसा फल मिलेगा। विचार बीज है और परिस्थितियाँ उनके फल। पत्ते-पत्ते को सींचने पर भी जिस प्रकार सूखा हुआ पेड़ हरा नहीं होता उसी प्रकार बाहरी दुख शोकों को दूर करने के तात्कालिक उपाय करने पर भी उनकी जड़ नहीं कटती। तात्कालिक सहायता के बल पर क्षणिक शाँति मिल सकती है परन्तु जो रोग की पूरी चिकित्सा चाहते हैं उन्हें मूल कारण को तलाश करना पड़ेगा। मुरझाये हुए वृक्ष को हरा करने के लिए उसकी जड़ों का निरीक्षण करना होगा और खाद पानी द्वारा वहीं सिंचन करना पड़ेगा।

🔶 मानस तत्व वेत्ता जानते है कि कर्म भोग को छोड़ कर परिस्थितियाँ अपने आप नहीं आती वरन् वे जान-बूझ कर बुलाई जाती हैं। इसमें आश्चर्य की कुछ भी बात नहीं है। आप के कपड़ों पर गंदगी लगी होगी तो मक्खियाँ भिनभिनाएंगी, साफ होंगे तो वे पास भी नहीं फटकेंगी। नाली में यदि कीचड़ सड़ेगी तो कीड़े पैदा होंगे अन्यथा कुछ भी खराबी न होगी। मन की इच्छाओं की जब पूर्ति नहीं होती तभी दुख होता है। यदि जरूरतें ही कम रखी जायें तो दुख किस बात का? मन बहुत-सी चीजें माँगता है और वह नहीं मिल पातीं तो क्षोभ उत्पन्न होता है। उस अभाव की पूर्ति के लिए पाप कर्म किये जाते हैं। और पापों का निश्चित परिणाम दुख है। दूसरी बात यह भी है कि विचार अपने अनुकूल परिस्थितियों को ही आकर्षित करते हैं। जो भिखारी दो सेर आटा पाने की ही अन्तिम इच्छा करता है वह राजा नहीं हो सकता। महत्वाकाँक्षी ही महत्व को प्राप्त करते हैं। सेनापति होने का स्वप्न देखने वाला नेपोलियन ही एक महान विजेता हो सका था।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1940 जुलाई पृष्ठ 2

👉 Awakening Divinity in Man (Part 3)

🔶 The cultivation of these noble qualities has allowed great people to accomplish what sounds impossible for a normal human being. With the growth of divinity in personality, anybody can reach great heights of glory in the worldly as well as spiritual domains. It is only the adept usage of your virtues that is important; it does not matter whether they are used in the spiritual or material field. Your qualities, deeds and nature are sources of power in themselves. Where and how use them depends entirely upon your will.

🔷 Success is earned by determined courage. Courageous temper is a spiritual quality. A yogi accomplishes devout endeavours with its support; tantriks and great personalities also achieve grand successes because of their extraordinary courage. Everyone needs it for attempting and succeeding in something (significant), even if he is a dacoit or a terrorist. If you are a yogi, you will be able to perform difficult yoga practices with the backing of your inner valour. If you are a leader, a reformer, then also you will progress as per your courageous zeal. It is a divine quality by origin.

🔶 You may use it the way you want, it is up to you. What is noteworthy or specific in a person is the effect of his inner qualities. If deities bestow something upon someone, it will always be the wealth of virtuous qualities, virtuous potentials. Goddess Gayatri, whom you pray and worship through anusthanas , will also endow you with divine qualities. What will happen with the virtues (you acquire)? Well, virtuous qualities and potentials can bring you all that you want. Whether materialistic or spiritual, whenever someone has gained success it has been based on his virtuous potentials and talents only. Without the qualities of character and efficiency one cannot gain anything worthwhile – neither worldly nor spiritual.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 शक्ति संचय के पथ पर (अन्तिम भाग)

🔶 क्षमा वीरों का धर्म है, अशक्तों का नहीं। जो पूर्ण स्वस्थ है उसके लिए खीर, पुआ मोहनभोग, घी, रबड़ी का सेवन लाभदायक है पर जो रोग से चारपाई पे रहा है, उठकर खड़े होने की शक्ति जिसमें नहीं, उसके लिए वे पौष्टिक पदार्थ लाभदायक नहीं है, उसके लिए तो वे अहित कर परिणाम ही उपस्थित करेंगे। वे निर्बल जो अपने न्यायोचित अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकते, अपनी आत्म रक्षा में सफल नहीं होते, यदि शान्ति और क्षमा की रट लगाते हैं तो समझना चाहिए कि अपनी निर्बलता और कायरता छिपाने का एक थोथा बहाना ढूँढ़ते हैं। मुकाबला करने को धर्म ग्रन्थों और राजकीय कानूनों का समर्थन प्राप्त है।

🔷 हमें अपनी दुर्गति को रोकना है तो बकरी की स्थिति से ऊँचा उठना होगा। किसी पर आक्रमण करने का किसी को सताने का उद्देश्य कदापि न रखते हुए भी आत्मरक्षा के लिए हमें शक्ति सम्पन्न बनना चाहिए आतताइयों के आक्रमण का मुँह तोड़ उत्तर देने की क्षमता हमारे अन्दर जैसे उत्पन्न होती जायगी वैसे ही वैसे अकारण सिर के ऊपर टूटते रहने वाले अनर्थों से छुटकारा मिलने लगेगा।

🔶 अंग्रेजी की एक कहावत है कि शक्ति का प्रदर्शन, शक्ति के प्रयोग को रोकता है। जिसके पास शक्ति होती है उसको उसका प्रयोग बहुत कम करना पड़ता है उसका परिचय पाकर ही दुष्ट लोग दहल जाते हैं और दुष्टता का दुस्साहस करने की हिम्मत नहीं पड़ती। पर जहाँ वह निधड़क होते हैं कि न तो हमारे आक्रमण का मुकाबला किया जायगा और न पीछे कोई दण्ड मिलेंगे वहाँ उनकी दुष्टता नंगे रूप में नाचने लगती है। ऐसी विषम स्थिति से बचने का एक मात्र उपाय शक्ति का परिचय देना ही है। बकरे की माँ कब तक दुआ माँगती रहेगी निर्बल की रक्षा बातूनी जमा खर्च से नहीं हो सकती।

🔷 धन कमाने और धर्म चर्चा करने की ओर आज हमारे समाज की प्रवृत्तियाँ विशेष रूप से हैं पर यह दोनों कार्य भी तब तक ठीक प्रकार नहीं हो सकते, जब तक अमन चैन का वातावरण न हो। अशान्त वातावरण का कारण शक्ति सन्तुलन का बिगड़ जाना है। इसे ठीक किये बिना जीवन की कोई दिशा स्थिर नहीं रह सकती, आज समय का तकाजा है कि हम अपनी निर्बलता और कायरता को निकाल फेंके। संगठन करें, शारीरिक बल बढ़ावें, आत्मरक्षा के लिए लाठी आदि की शिक्षा प्राप्त करें और मुसीबत के समय एक दूसरे की सहायता करते हुए आततायियों के आक्रमण को विफल बनाने की तैयारी करें। हम आत्मरक्षा के साधनों से जब सुसज्जित हो जायेंगे तभी बकरी की स्थिति से छुटकारा पा सकेंगे। बाहर से और भीतर से होने वाले आक्रमण से बचने के लिए शक्ति संचय के पथ पर अग्रसर होना चाहिए। शक्ति से ही शान्ति स्थापित होती है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड-ज्योति 1946 नवम्बर पृष्ठ 4
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1946/November/v1.4

👉 गुरुगीता (भाग 111)

👉 साधना से सिद्धि में आसन व दिशा का भी महत्त्व

🔶 गुरूगीता के इन मंत्रों की रहस्य वाणी उनके लिए अति उपयोगी है, जो साधना विज्ञान पर विशेष अनुसंधान के उत्सुक हैं। इसकी वैज्ञानिकता को वे अपने प्रयोगों से चरितार्थ कर सकते हैं। इस संदर्भ में महाराष्ट्र के संत वामन पण्डित का प्रसंग बड़ा ही मर्मस्पर्शी है। वामन पण्डित समर्थ रामदास के समकालीन थे। इनका जन्म बीजापुर में हुआ था एवं विद्याध्ययन काशी में। काशी में रहते ही भगवान् विश्वनाथ की कृपा से इनकी साधना रूचि तीव्र हुई। परन्तु साधना की तीव्र इच्छा के बावजूद इनका संकल्प बार- बार टूट जाता था। मन भी सदा अशान्त रहता। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें? कई बार तो ये अपनी स्थिति से इतना खिन्न हो जाते कि अंतस् हताशा से भर जाता। मन सोचता कि जो जीवन उद्देश्य प्राप्ति में निरर्थक है, उसे रखकर ही क्या करें। इस निराशा के कुहासे में कोई मार्ग न सूझता था। जप तो करते, पर मन न लगता, साधना बार- बार भंग हो जाती। लिए गये संकल्प दीर्धकाल न चल पाते। एक- दो दिन में ही इनकी इतिश्री हो जाती। कुछ प्रारब्ध भी विपरीत था और कुछ निराशा का असर इनका शरीर भी रोगी रहने लगा। आखिर एक दिन इनका धैर्य विचलित हो गया और इन्होंने सोचा कि आज अपने आपको माँ गंगा में समर्पित कर देंगे।

🔷 इस निश्चय के साथ ही वे गंगा के मणिकर्णिका घाट पर आ विराजे। बस, अंधकार की प्रतीक्षा थी कि अँधेरा हो और चुपके से देह का विसर्जन कर दें। अपने इन चिंतन में डूबे वे भगवान् से प्रार्थना कर रहे थे- हे प्रभो! मैं चाहकर भी इस देह से तप न कर सका। हे प्रभु ! अगले जन्म में ऐसा शरीर देने की कृपा करना, जो साधना करने में समर्थ हो। ऐसा मन देना हे मेरे स्वामी ! जिसकी वृत्तियाँ तप में विध्नकारी न हों। श्री वामन पण्डित अपनी प्रार्थना के इन्हीं भावों में लीन थे। उनकी आँखों से निरन्तर अश्रुपात हो रहा था। सूर्यास्त कब अँधेरे में बदल गया, उन्हें पता ही न चला। उनकी चेत तो तब आया, जब एक वृद्ध संन्यासी ने उन्हें सचेत किया।

🔶 उन संन्यासी महाराज के चेताने से इनकी आँखें खुलीं। आँखें खुलने पर इन्होंने देखा कि उन वयोवृद्ध संन्यासी का दाया हाथ इनके सिर पर था और वे कह रहे थे कि धैर्य रखो वत्स ! साधना में बाधाएँ आना स्वाभाविक है, पर तुम्हें परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। मैं तुम्हें बीजमंत्र का उपदेश देता हूँ। इसका नियमित जप करो। परन्तु यह जप तुम्हें कुश के आसन पर बैठकर उत्तर दिशा की ओर मुख करके करना होगा। इस तरह से जप करने से न केवल तुम्हें शान्ति मिलेगी, बल्कि ज्ञान की प्राप्ति भी होगी। श्री वामन पण्डित ने उन संन्यासी महाराज के निर्देश के अनुसार साधना प्रारम्भ की। शीघ्र ही उनकी साधना सिद्धि में बदल गयी। उन्होंने अध्यात्म तत्त्व पर अनेक ग्रंथों का सृजन किया। अंतस् के सभी विक्षेप स्वतः ही गहन शान्ति में बदल गये। उन्हें साधना के उपचार की महत्ता के साथ गुरू के महत्त्व का बोध हो गया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 167

बुधवार, 16 मई 2018

👉 जैसा बीज वैसा फल

🔶 अफ्रीका के दयार नोवा नगर में जगत प्रसिद्ध हकीम लुकमान का जन्म हुआ था। हब्शी परिवार में जन्म होने के कारण उन्हें गुलामों की तरह जीवन बिताने के लिए बाध्य होना पड़ा। मिश्र देश के एक अमीर ने तीस रुपयों में अपनी गुलामी करने के लिए लुकमान को खरीद लिया ओर उनसे खेती बाड़ी का काम लेने लगा।

🔷 यह अमीर बड़ा क्रूर और निर्दयी था वह जरा सी बात पर अपने गुलामों को बहुत सताता था। किन्तु बाहर से उसने धर्म का बड़ा आडम्बर रच रखा था। दिखाने के लिए वह ईश्वर की रट लगाता और खूब धर्म शास्त्र सुनता ताकि लोग उसे बड़ा धर्मात्मा समझें। अमीर का ख्याल था कि धार्मिक कर्मकाण्डों को करके ही मैं स्वर्ग का अधिकारी हो जाऊंगा।

🔶 एक बार मालिक ने हुक्म किया कि अमुक खेत में जाकर जौ बो आओ लुकमान उस खेत में गये और चने बो आये जब खेत उगा और मालिक ने चने के पौधे खड़े देखे तो वह बहुत नाराज हुआ और लुकमान से पूछा कि मैंने तो तुझे जौ बोने के लिये कहा था। तूने चने क्यों बो दिये लुकमान ने शिर झुकाकर नम्रता से कहा मालिक मैंने यह समझ कर चने बोये थे कि इसके बदले जौ उपजेंगे।

🔷 मालिक का पारा बहुत गरम हो गया। उसने गरज कर कहा- ‘मूर्ख कहीं दुनिया भर में आज तक ऐसा हुआ है कि चने बोये जायं और जौ उपजें?’

🔶 लुकमान और नम्र हो गये उन्होंने मन्द स्वर में कहा- ‘मालिक मेरा कसूर माफ हो। मैं देखता हूँ कि आप दया के खेत में हमेशा पाप के बीज बोते हैं और सोचते हैं कि ईश्वर मुझे अच्छे फल देगा। इसलिए मैंने भी सोचा कि जब ईश्वर के खेतों में पाप बोने पर भी पुण्य फल मिल सकते हैं, तो मेरे चने बोने पर जौ भी पैदा हो सकते हैं।”

🔷 अमीर के दिल में लुकमान की बात तीर की तरह गई उसने निश्चय किया कि अब मैं अपना आचरण करूंगा और शुभ कर्म करने में दत्त चित्त रहूँगा, क्योंकि बिना पुण्य फल प्राप्त नहीं हो सकता। अमीर को धन के उपदेश से बहुत शिक्षा मिली उसने उन्हें पूर्वक गुलामी से मुक्त कर दिया।

📖 अखण्ड ज्योति से

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 17 May 2018

मंगलवार, 15 मई 2018

👉 सरलता और सान्त्वना चाहिए।

🔷 दुखियों को तुम्हारी सान्त्वना भी आवश्यकता है। परेशान और पीड़ित मनुष्य दूसरों से यह आशा करता है कि उसके कष्ट में कमी करने के लिए कोई सहायक व्यक्ति उससे साधनों से न सही कम से कम वचन और भावना द्वारा उसे आश्वासन प्रदान करेंगे।

🔶 जिन भूलों के कारण उसे दुःख उठाना पड़ा, इनको व्यंग भरे छेदने वाले शब्दों से कहना, ताना देना, उपहास उड़ाना असज्जनता भरा अमानवीय कार्य है। दुःख देने के लिए उसकी परिस्थितियाँ ही पर्याप्त है, कटु शब्दों के डंक मार कर उसकी व्यथा और बढ़ाकर हम उसका क्या उपकार करते है?

🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 कर्तव्य की जिम्मेदारी

🔷 प्राचीन समय में रात्रि के समय समुद्री जहाजों के पथ-प्रदर्शन करने के लिए छोटे-छोटे टापुओं पर प्रकाश-स्तम्भ खड़े किये जाते हैं। उन पर रोशनी ठीक रखने के लिए चौकीदार नियुक्त किये जाते थे। इन चौकीदारों का कर्तव्य बड़ा कठोर होता था। यदि किसी कारणवश रोशनी न हो तो पानी के जहाज टापू से टकरा कर उलट सकते थे और सैकड़ों आदमियों की जानें जा सकती थीं।

🔶 अमेरिका के एक टापू में ऐसा ही प्रकाश-स्तंभ था, एक दिन रोशनी करने वाला चौकीदार हृदय की गति रुक जाने से अचानक संध्या-समय मर गया। स्त्री को बड़ा दुःख हुआ। उस टापू पर वहाँ यह तीन व्यक्ति थे, चौकीदार,उसकी स्त्री और दो वर्ष का बालक। स्त्री विपत्ति और वियोग के दुःख से आर्त्त होकर रोने लगी।

🔷 दस मिनट भी न हो पाये थे कि स्त्री को अपने महान कर्तव्य का ध्यान आया। आँखों से बहते हुए पानी को उसने रोका, पति की लाश को एक कोठरी में बन्द किया और उसी में अपने छोटे बच्चे को सुलाकर बाहर से किवाड़ बन्द कर दिये। स्त्री प्रकाश-दीपक के पास स्तंभ पर चढ़कर पहुँची और उसे जलाने लगी। दीपक तो उसने जला दिया, पर काँच की चिमनी यथा-स्थान न लगा सकी। उसे इसका कुछ अनुभव थोड़े ही था।

🔶 स्त्री ने सोचा चिमनी ठीक न लगने पर हवा से दीपक बुझ जाएगा। इसलिए उसने निश्चय किया कि हाथ से चिमनी पकड़े हुए रात भर वहीं खड़ी रहेगी। कर्तव्य का उत्तरदायित्व जो उसे पूरा करना था। वह फौजी कप्तान की तरह अपने कर्तव्य के मोर्चे पर डटी रही। रात को इतनी अधिक सर्दी पड़ी और ऐसा बर्फीला तूफान आया कि सवेरा होते-होते वह स्त्री भी ठंड के मारे गिरकर मर गई।

🔷 दूसरे दिन प्रातः काल एक जहाज उधर से निकला। उसने देखा कि प्रकाश स्तम्भ सुनसान पड़ा हुआ है। नाविक उतर कर वहाँ गया। स्त्री की लाश चिमनी हाथ में लिये हुए पड़ी थी। कोठरी खोली गई तो चौकीदार का मृत शरीर रखा हुआ था। कोठरी में बन्द हुआ बच्चा रो-रो कर अम्मा को पुकार रहा था।

🔶 जहाज के अधिकारियों को सारी घटना समझने में देर न लगी। उनने बालक को गोदी में उठा लिया और पुचकारते हुए उससे कहा—बच्चे, तुम भूलते हो, वह तुम्हारी ही अम्मा नहीं थी, वह तो अनेक स्त्री-पुरुषों की माता थी, जिनकी जानों को उसने अपनी जान देकर बचाया।”

📖 अखण्ड ज्योति से

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 16 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...