मंगलवार, 8 मई 2018

👉 एक दृश्य-एक तथ्य

🔶 संध्या का समय था। सूर्य अस्ताचल को ओढ़कर अपना मुँह ढाँकने का प्रयत्न कर रहा था। मन्द-मन्द हवा बह रही थी और उसी के साथ भगवती भागीरथी का जल-कल कर बह रहा था। तट पर, एक शिला पर बैठे स्वामी दयानन्द आत्म-चिन्तन में निरत थे- परमात्मा की यह सृष्टि कितनी सुन्दर है और सर्वेश्वर की कृति आनन्दप्रद। पक्षी दिन भर के श्रम से थक कर आये अपने घोंसलों में विश्राम से पूर्व चहक रहे थे। लगता था वे अपने बच्चों के साथ बैठ कर सन्ध्या गीत गा रहे हो।

🔷 हे अनन्त के सृष्टा और आनन्द के दाता तुझे कोटिशः प्रणाम-महर्षि प्रणत भाव से बुदबुदा उठे। प्रकृति भी सन्ध्या की मन्द शीतल पवन के हिलोरों से मुदित होकर शयन की तैयारी कर रही थी। चारों ओर एकान्त था। ध्वनियाँ थी तो केवल पक्षियों की चोंच से निकले स्वर व सरिता के बहते हुए नीर की, जैसे आनन्द का संगीत बज रहा हो और ऋषि के हृदय में भी उसी आनन्द की वीणा बज रही थी। वे प्राणायाम करते, दीर्घश्वास सोच्छवास छोड़ते पुनः प्राण ग्रहण करते और समाधिस्थ हो जाते।

🔶 ध्यान टूटा तो पास हो कहीं से आती हुई सिसकियों से। लगता था कोई किसी से सदा के लिए बिछुड़ रहा हो और सिसकने वाला जाने वाले को भगवती जाह्नवी को सौंप कर अन्तिम विदा दे रहा हो।

🔷 ऋषि ने उस ओर देखा जिस ओर से कि सिसकी आ रही थी। न अधिक दूर और न अधिक समीप। एक दीन-हीन जीर्ण वस्त्र पहने कंगाल मात्र नारी देह अपने शिशु का शव जल समाधि देने के जिए झुकी।

🔶 शिशिर की शीत समीर के मन्द झोंके और जाह्नवी के शीतल जल की ठण्डक ने माँ को जैसे कंपकंपा कर रख दिया! उससे भी अधिक पुत्र विछोह ने कँपा कर रख दिया होगा। वह अबला इन्हीं शीतल झोंकों के कारण पानी में लुढ़कते-लुढ़कते बची थी। उसकी एकमात्र ओढ़नी जिसका उपयोग उसने कफ़न के लिए भी किया था भीग चुका था और पुत्र के तैरते हुए शव को किनारे पर बैठी वह फटी-फटी आँखों से निहार रही थी। शव जब आँखों से ओझल हो गया तो दुःख, विलाप ओर विवशता की त्रिवेणी में डूबती हुई वह माँ लौटने लगी।

🔷 ऋषि ने समीप जाकर पूछा- देवी क्या इस शिशु का पिता साथ नहीं आया।’

🔶 फूट पड़ी वह। बड़ी कठिनता से बोली- वृद्ध पति अभी दो माह पूर्व ही मुझे अकेली छोड़कर चले गये हैं तथा अब वह यह पुत्र भी।’

🔷 आयु में तो वह अभी युवती ही दिखाई दे रही थी और अपने पति के साथ वृद्ध का सम्बोधन अनायास ही लगाकर ऋषि हृदय को झकझोर दिया था, अपनी स्थिति का कारण बताकर।

🔶 ‘हे सर्वेश्वर! अब तू मुझे माताओं का इस रूप में दर्शन करा रहा है- ऋषि के ओष्ठ फड़फड़ाये। वे भाव मग्न से हो गये थे ओर स्त्री जा चुकी थी।

🔷 पर ऋषि को एक नयी दृष्टि देकर।

🔶 अब वे चैन से नहीं बैठ सके। उन्होंने संकल्प लिया कि- माताओं की यह दुर्दशा करने वाली परिस्थितियों को बदल कर रहूँगा। अकेले अपना कल्याण कर लिया तो मुझ सा स्वार्थी ओर कौन होगा? जिसने माँ का दूध पिया, उसके आँचल की छाया में रहा यह मात्र स्वार्थ ही नहीं कृतघ्नता भी है।

🔷 और अतीत बताता है। पहली बार अब से शताधिक वर्ष अनमेल विवाह जैसी कुरीतियों को चुनौती दी तथा उन्हें हटाने के लिए आजीवन संघर्षरत रहे, एक हम हैं जो आये दिन अपनी आँखों से बुराइयाँ देखते हैं, पर उनसे जूझने से कतराते ही रहते हैं।

📖 अखंड ज्योति जनवरी 1977

👉 आज का सद्चिंतन 8 May 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 May 2018


👉 सत्य की शोध कीजिए (भाग 2)

🔶 साँप्रदायिकता की उद्धत भावना को जो कि बहुधा सक्रिय अथवा निष्क्रिय उत्तेजनापूर्ण अथवा विनम्र पीड़ा पहुँचाने वाले ढंगों से बहुत ही कम अथवा बिना क्रोध युक्त उत्तेजना के काम में आती हैं तथा तथ्य का स्मरण दिलाने की जरूरत है कि कविता के ही समान धर्म केवल विचार नहीं है वरन् विचारों का प्रकटीकरण है।

🔷 ईश्वर का आत्म-प्रकटी-करण सृष्टि की विभिन्नता में है और असीम के प्रकटी-करण में हमारी भावना में भी व्यक्तिगत रूप की ऐसी विभिन्नता होनी चाहिए जो अविरल और अनन्त हो। जब किसी धर्म में समस्त मानव-जाति पर अपने ही मत को लादने की महत्वाकाँक्षा उत्पन्न हो जाती है। तब उसका पतन हो जाता है और वह अत्याचार करने लगता है तथा साम्राज्यवाद का एक रूप बन जाता है। यही कारण है कि जिससे हम मार्मिक मामलों में फैजिज्म के एक विवेकशून्य को संसार के अधिकाँश भागों में फैलते हुए तथा मनुष्य की आत्मशक्ति के विस्तार को अपने अनुभव ज्ञान विहीन तलुवों से खूब कुचलते हुए करते हैं।

🔶 अपने ही एक धर्म को सभी देशों और सभी दलों में प्रधान बना देने का प्रयत्न ऐसे ही लोगों में देखा जाता है जिन्हें साँप्रदायिकता का व्यसन जाता है।

🔷 यह कहना उनको बुरा मालूम होता है। प्रेम के वितरण करने में ईश्वर उदार है तथा मनुष्यों के साथ आदान-प्रदान करने के उसके साधन एक ऐसी गली में परिमित नहीं हैं जो इतिहास के एक संकीर्ण स्थान पर जाकर अकस्मात् समाप्त हो जाती है।

✍🏻 विश्व कवि श्री रवीन्द्रनाथ जी टैगोर
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1950 पृष्ठ 8

👉 Amrit Chintan 8 May

🔶 We have found the solution of all the problems of the present era. The problems are due to lack of use of true wisdom of life and short sightedness. The solution will be based on scientific facts and evidences. Real step will be to free our self from superstitious traditions and by adopting good virtues and values of life. Strong will and courage will achieve the great revolution for a golden era.

🔷 Self introspection and self development is the only process in life for cultural development. But to attain the ideality in life one will have to do something more – that is that we will have to work to develop the new generation to adopt ideality in life. That process will add feathers to the society you are living in.

🔶 Devotees of Gayatri are “Pragya Putra” i.e. volunteers in action. The duties assigned to them is a collective effort similar to that when Rishis collected their blood (put their collective efforts) which was represented by appearance of Sita in box found by King Janak while ploughing to raise grain for food in famine. Finally this effort results in destroying the power of evil represented by king Raven of Lanka.

🔷 Similar circumstances have appeared in the mass which needs the awakened people to understand their role to establish harmony and peace in life of human beings Pragya Putra devotion will be measured on that scale.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 साहसी आगे आये

🔶 जिनमें साहस हो, आगे आवें। हमारा निज का कुछ भी कार्य या प्रयोजन नहीं है। मानवता का पुनरुत्थान होने जा रहा है। ईश्वर उसे पूरा करने ही वाले हैं। दिव्य आत्माएँ उस दिशा में कार्य कर भी रही हैं। उज्ज्वल भविष्य की आत्मा उदय हो रही है, पुण्य प्रभात का उदय होना सुनिश्चित है। हम चाहें तो उसका श्रेय ले सकते हैं और अपने आप को यशस्वी बना सकते हैं।

🔷 देश को स्वाधीनता मिली, उसमें योगदान देने वाले अमर हो गए। यदि वे नहीं भी आगे आते तो भी स्वराज्य तो आता ही, पर वे बेचारे और अभागे मात्र बनकर रह जाते। ठीक वैसा ही अवसर अब है। बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक क्रांति अवश्यंभावी है। उसका मोर्चा राजनीतिक लोग नहीं धार्मिक कार्यकर्त्ता सँभालेंगे। यह प्रक्रिया युग निर्माण योजना के रूप में आरंभ हुई है। हम चाहते हैं इसके संचालन का भार मजबूत हाथों में चला जाए। ऐसे लोग अपने परिवार में जितने भी हों, जो भी हों, जहाँ भी हों, एकत्रित हो जाएँ और अपना काम सँभाल लें। उत्तरदायित्व सौंपने को प्रतिनिधि नियुक्त करने की योजना के पीछे हमारा यही उद्देश्य है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, जनवरी 1965 पृष्ठ 52  

👉 गुरुगीता (भाग 103)

👉 गुरूगीता का प्रत्येक अक्षर मंत्रराज है

🔶 गुरूगीता परम दिव्य शास्त्र है। इसका अर्थ एवं इसके शब्द दोनों ही दिव्य हैं। इसके अर्थ में परम गम्भीर एवं गूढ़ तत्त्वज्ञान की झाँकी है। आध्यात्मिक साधना के शिखर अनुभवों की झलक है। इतना ही नहीं, गुरूगीता के अर्थ में ज्ञान, कर्म व भक्ति तथा हठ एवं राजयोग की दुर्लभ साधनाएँ प्रकाशित होती हैं। इनमें से किसी एक साधना विधि का साधन करने वाला आध्यात्मिक जीवन की दुर्लभ, दुर्लभतर एवं दुर्लभतम विभूतियों को पा सकता है। ऐसा कहने का आधार लेखकीय कल्पना नहीं, वरन् शास्त्रों व सन्त जीवन चरित का स्वाध्याय व अध्यात्म पुरूषों के सत्संग का अनुभव है। यह सत्य इतना प्रामाणिक है, जिसे कोई साधक अपने स्वयं के अनुभव में बदल सकता है। कतिपय भाग्यशाली ऐसा कर भी रहे है।

🔷 अर्थ जितनी ही दिव्यता- गुरूगीता के शब्दों और अक्षरों में है। हालाँकि यह सत्यबुद्धि एवं सभी तर्कों से परे है। सच तो यही है कि गुरूगीता के अक्षरों व शब्दों के महत्त्व को जानना, समझना, इसके अर्थ को समझने से ज्यादा दुष्कर व दुरूह है। क्योंकि अर्थ में तो तर्क, दर्शन एवं ज्ञान का संयोजन है। इसे बुद्धि एवं अन्तर्प्रज्ञा से जाना जा सकता है। परन्तु अक्षरों व शब्दों के संयोजन में छुपी हुई दिव्यता को पहचानना केवल श्रद्धासिक्त हृदय से ही सम्भव है। इसी बलबूते पर गुरूगीता की यह मांत्रिक सामर्थ्य प्रकट होती है। गुरूगीता का सम्पूर्ण ग्रन्थ अपने आप में मंत्रशास्त्र है। इसके कई दुर्लभ प्रयोग हैं, जो अलग -अलग ढ़ंग से सिद्ध एवं सम्पन्न किए जाते हैं। इस क्रम में महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि इसे जानने वाले भी विरल एवं दुर्लभ हैं। साधकों एवं सिद्धों के समुदाय में विरल जन ही ऐसे हैं, जो मंत्रमयी गुरूगीता के मंत्रों का प्रयोग करने की सामर्थ्य रखते हैं।

🔶 हालाँकि गुरूगीता में इसके पर्याप्त संकेत मिलते हैं। गुरूगीता के पिछले क्रम में भी कुछ ऐसे ही गूढ़ निर्देशों की चर्चा की गयी है। इसमें भगवान् सदाशिव ने जगन्माता भवानी को बताया है कि हे देवि! गुरूगीता द्वारा उपदेशित मार्ग ही मुक्तिदायक है। लेकिन इन सभी साधनाओं का उपयोग साधक को लोक कल्याण के लिए करना चाहिए, न कि लौकिक कामनाओं को पूरा करने के लिए। जो ज्ञानहीन लोग इन महत्त्वपूर्ण ,दुर्लभ एवं गोपनीय साधनाओं का उपयोग सांसारिक कामों के लिए करते हैं, उन्हें बार- बार भवसागर में गिरना पड़ता है। परन्तु जो ज्ञानी अपनी निष्कामता क साथ इन साधनाओं का उपयोग करते हैं, वे सभी कर्म बन्धनों से मुक्त रहते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 157

सोमवार, 7 मई 2018

👉 आज का सद्चिंतन 7 May 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 May 2018


👉 सत्य की शोध कीजिए (भाग 1)

🔶 यदि आप सचमुच सत्य के प्रेमी हैं, तो उसके समस्त असीम सौंदर्य और महत्व के साथ पूर्ण रूप में उसे खोजने का साहस कीजिए। किंतु रूढ़ियों की पत्थर की दीवालों के भीतर कंजूसों के समान एकान्त स्थान में उसके (सत्य के) व्यर्थ के संकेत चिन्हों का संग्रह करके ही संतोष न कर लीजिए। महात्माओं की आध्यात्मिक उच्चता के कारण जोकि उन सबसे समान रूप से पाई जाती है, हमें विनम्रतापूर्ण सादगी के साथ उनका आदर करना चाहिए।

🔷 यह आध्यात्मिक उच्चता उन में उस समय देखी जाती है जब वे अपनी विश्वजनीन उच्च विचारों के साथ मनुष्य की आत्मा को स्वयं उसके व्यक्तिगत उसकी जाति और उसके धर्म के अहं भाव के बन्धन से छुड़ाने के लिए एकत्रित होते हैं। किंतु परंपराओं की एक नीची भूमि में जहाँ धर्म एक दूसरे के दासों और अन्धविश्वासों को चुनौती देकर ललकारते हैं और उनका खण्डन करते हैं वहाँ पर एक बुद्धिमान मनुष्य निश्चय ही संदेह ओर आश्चर्य के साथ उनके पास से चला जायेगा।

🔶 मेरा मतलब इस बात का समर्थन करने का नहीं है कि समस्त मानव जाति के लिए कोई एक ही प्रकार का प्रार्थनागृह रखा जाय अथवा कोई एक ऐसा विश्वजनीन नमूना रखा जाए जिसका अनुकरण सभी पूजा के और सद्भावना के कार्यों के द्वारा किया जाय।

✍🏻 विश्व कवि श्री रवीन्द्रनाथ जी टैगोर
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1950 पृष्ठ 8

👉 Indian Culture

🔶 The publication of Sri Aurobindo’s renowned work “The foundation of Indian Culture” had sparked a new wave of interest in the multiple aspects of Indian Culture. His disciples and other residents of his Ashram also used to have prolonged discussion on the elements of this great legacy of the Vedic Age.

🔷 Once a disciple raised a query as to why the Indian Culture is reffered to as the “Divine Culture” while the cultures of all the other nations are known after their names only. He put this question to Nalinda, who was the seniormost sadhak in the Ashram and was considered very close to the master. Nalinda could not find a satisfactory answer to the query and said that he would approach Sri Aurobindo himself for a reply.One day, while discussing some related topic, Nalinda put the same query before Sri Aurobindo.

🔶 The latter replied-“ The principle objective of the Indian Culture is the awakening and expression of Divinity in human life. The Vedic Rishis, the founders of the Indian Culture, had developed the grand structure of this culture around this very central search. Because of the incorporation of divine values and elements in its genesis and expansion, the Indian Culture is also synonymous with Divine Culture.”

📖 From Pragya Puran

👉 चाहिए साहसी, जिम्मेदार

🔶 युग निर्माण योजना, शतसूत्री कार्यक्रमों में बँटी हुई है। वे यथास्थान, यथास्थिति, यथासंभव कार्यान्वित भी किए जा रहे हैं, पर एक कार्यक्रम अनिवार्य है और वह यह कि इस विचारधारा को जन-मानस में अधिकाधिक गहराई तक प्रविष्ट कराने, उसे अधिकाधिक व्यापक बनाने का कार्यक्रम पूरी तत्परता के साथ जारी रखा जाए। हम थोड़े व्यक्ति युग को बदल डालने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। धीरे-धीरे समस्त मानव समाज को सद्भावना सम्पन्न एवं सन्मार्ग मार्गी बनाना होगा और यह तभी संभव है जब यह विचारधारा गइराई तक जन-मानस में प्रविष्ट कराई जा सके। इसलिए अपने आस-पास के क्षेत्र में इस प्रकाश को व्यापक बनाए रखने का कार्य तो परिवार के प्रत्येक प्रबुद्ध व्यक्ति को करते ही रहना होगा।

🔷 अन्य कोई कार्यक्रम कहीं चले या न चले, पर यह कार्य तो अनिवार्य है कि इस विचारधारा से अधिकाधिक लोगों को प्रभावित करने के लिए निरंतर समय, श्रम, तन एवं मन लगाया जाता रहे। जो ऐसा कर सकते हैं, जिनमें ऐसा करने की प्रवृत्ति उत्पन्न हो गई है, उन्हें हम अपना उत्तराधिकारी कह सकते हैं। धन नहीं, लक्ष्य हमारे हाथ में है, उसे पूरा करने का उत्तरदायित्व भी हमारे उत्तराधिकार में किसी को मिल सकता है। उसे लेने वाले भी कोई बिरले ही होंगे। इसलिए उनकी खोज तलाश आरंभ करनी पड़ रही है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, दिसम्बर 1964 पृष्ठ 49-50   

👉 धर्म का तत्त्व

🔶 धर्म के विस्तार एवं विविधता की खोज अनावश्यक है। आवश्यक है धर्म के तत्त्व की खोज, इसकी अनेकता में एकता की खोज, इसके परम सार की खोज। यह खोज जितनी अनिवार्य एवं पवित्र है, इसकी विधि उतनी ही रहस्यमय और आश्चर्यपूर्ण है। इसे न समझने वाले जीवन की भँवरों की भटकन में भटकते रहते हैं। धर्म को खोजते हुए स्वयं को खो देते हैं। क्योंकि वे धर्म के तत्त्व को नहीं उसके विस्तार एवं विविधता को खोजते हैं।
  
🔷 धर्म के तत्त्व की खोज तो स्वयं की खोज में पूरी होती है। स्वयं का सत्य मिलने पर धर्म अपने-आप ही मिल जाता है। यह तत्त्व शास्त्रों में नहीं है। शास्त्रों में तो जो है, वह केवल संकेत है। धर्म-ग्रन्थों में जो लिखा है, वह तो बस चन्द्रमा की ओर इशारा करती हुई अंगुली भर है। जो इस अंगुली को चन्द्रमा समझने की भूल करता है, वह अंगुली को तो थाम लेता है, पर चन्द्रमा को हमेशा के लिए खो देता है।
  
🔶 शास्त्रों की ही भाँति सम्प्रदाय भी है। धर्म का तत्त्व इन सम्प्रदायों में भी नहीं है। सम्प्रदाय तो संगठन है। ये सुव्यवस्थित रीति से केवल अपने मत का प्रचार करते हैं। बहुत हुआ तो धर्म की ओर रुचि पैदा करते हैं। अधिक से अधिक उसकी ओर उन्मुख कर देते हैं। धर्म का तत्त्व तो निज की अत्यन्त निजता में है। उसके लिए स्वयं के बाहर नहीं, भीतर चलना आवश्यक है।
  
🔷 धर्म का तत्त्व तो स्वयं की श्वास-श्वास में है। बस उसे उघाड़ने की दृष्टि नहीं है। धर्म का तत्त्व स्वयं के रक्त की प्रत्येक बूंद में है। बस उसे खोजने का साहस और संकल्प नहीं है। धर्म का तत्त्व तो सूर्य की भांति स्पष्ट है, लेकिन उसे देखने के लिए आँख खोलने की हिम्मत तो जुटानी ही होगी।
  
🔶 धर्म का यही तत्त्व तो अपना सच्चा जीवन है। लेकिन इसकी अनुभूति तभी हो सकेगी, जब हम देह की कब्रों से बाहर निकल सकेंगे। दैहिक आसक्ति एवं भोग-विलास के आकर्षण से छुटकारा पा सकेंगे। यह परम सत्य है कि धर्म की यथार्थता जड़ता में नहीं चैतन्यता में है। इसलिए सोओ नहीं, जागो और चलो। परन्तु चलने की दिशा बाहर की ओर नहीं, अन्दर की ओर हो। अन्तर्गमन ही धर्म के तत्त्व को खोजने और पाने का राजमार्ग है।

✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 106

👉 गुरुगीता (भाग 102)

👉 सच्चे शिष्य का एक ही स्वर- निष्काम कर्म

🔶 बात अनूठी है, सद्गुरू एवं सद्गुरू द्वारा प्रदर्शित मार्ग की उपयोगिता क्या है? संसार पाने के लिए अथवा संसार से मुक्त होने के लिए। इस सत्य पर शिष्य को बार- बार विचार करना चाहिए। यह विचार न करने पर शिष्य के लिए सद्गुरू मिलन व्यर्थ और अर्थहीन हो जाता है। क्योंकि वह सद्गुरू प्राप्ति को भी संसार से जोड़कर देखता है और इसी मापदण्ड पर सद्गुरू की सत्यता का मापन करता है। ऐसा व्यक्ति बार- बार इसी को सोचता है कि सद्गुरू से मिलने के बाद उसे कितनी सांसारिक सफलताएँ या विफलताएँ हासिल हुई। जबकि सोचा यह जाना चाहिए कि सद्गुरू प्राप्ति के बाद अपना अन्तःकरण कितना अनासक्त एवं निष्काम हुआ।

🔷 कथा महाभारत की है और जगविदित है, परन्तु फिर भी एक बार पुनः मनन करने योग्य है। माता कुन्ती भगवान् कृष्ण की सगी बुआ थी। श्रीकृष्ण को उन्होंने भगवान् के रूप में जाना भी था। उसके बाद भी उनके ऊपर सम्पूर्ण जीवन भर एक के बाद एक नये कष्ट आते रहे। उनके विवाह के बाद राजा पाण्डु को शाप मिला और वे अपने पति के वियोग, सखी एवं बहन जैसी माद्री के वियोग की कथा से उनके जीवन कार्यों का प्रारम्भ हुआ। बहुत दिनों तक वे पाँचो पाण्डवों के साथ वन का दुःख झेलती रही। अन्त में महात्मा भीष्म के बुलाने पर उनका हस्तिनापुर आना हुआ।

🔶 और यहीं से आरम्भ हुई कौरवों के कुचक्रों की शुरूआत। साथ ही जगद्गुरू कृष्ण का साहचर्य भी रहा। लाक्षागृह- वरणावत का अग्रिकाण्ड फिर उससे बच निकलना। बाद में पाण्डवों का द्रोपदी से विवाह, परन्तु साथ ही राज्य के बँटवारे में पुनः छल और पाण्डवों को खाण्डवप्रस्थ का बीहड़ वन दिया जाना, जिसे उन्होंने अपने बल और कौशल से इन्द्रप्रस्थ के रूप में सँवारा। पुनः कौरवों की ईर्ष्या और जुए के कुटिल खेल का प्रारम्भ। इसमें द्रोपदी का अपमान और पाण्डवों का पुनः वनवास।

🔷 वन में बाहर वर्षों तक निरन्तर कष्टों को सहन करना, फिर एक साल के अज्ञातवास में छिपे रहना। इसके बाद प्रारम्भ हुआ महाभारत का महासंग्राम। और इसके बाद कुन्ती का पुनः वनगमन और वहाँ उनकी मृत्यु। इतनी दुःसह व्यथा सहने वाली कुन्ती से जब श्रीकृष्ण ने पूछा- बुआ तुम्हें क्या वरदान चाहिए, तो उन्होंने बड़ी भक्ति से कहा- हे केशव! मैं दुःखों का वरदान चाहती हूँ।

🔶 चकित कृष्ण ने उनसे जानना चाहा -- इतने दुःखों की चाहत क्यूँ है? तो वे बोली- हे केशव! जीवन के दुःखों में तुम्हारी याद बहुत आती है। और हे भक्तवत्सल प्रभु! मैं तुम्हें कभी नहीं भूलना चाहती। सो हे जनार्दन! वे दुःख बहुत अच्छे लगते हैं, जो मुझे तुम्हारी याद दिलाते हैं। बस यही सच्चे शिष्य का स्वर है, जो वह गुरू से कहता है, उनसे माँगता है। जो इस तत्त्व को, सत्य को जानता है- वही शिष्य है और उसी ने गुरूगीता के मर्म को जाना है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 155

शनिवार, 5 मई 2018

👉 भगवान बुद्ध

🔷 भगवान् बुद्ध अनाथ पिण्डक के जैतवन में ग्रामवासियों को उपदेश कर रहे थे। शिष्य अनाथ पिण्डक भी समीप ही बैठा, धर्म चर्चा का लाभ ले रहा था।

🔶 तभी सामने से महाकाश्यप मौद्गल्यायन, सारिपुत्र, चुन्द और देवदत्त आदि आते हुए दिखाई दिये। उन्हें देखते ही बुद्ध ने कहा-वत्स! उठो, यह ब्राह्मण मण्डली आ रही है, उसके लिये योग्य आसन का प्रबन्ध करो।

🔷 अनाथ पिण्डक ने आयुष्मानों की ओर दृष्टि दौड़ाई, फिर साश्चर्य कहा- भगवन्! आप सम्भवतः इन्हें जानते नहीं। ब्राह्मण तो इनमें कोई एक ही है, शेष कोई क्षत्रिय, कोई वैश्य और कोई अस्पृश्य भी हैं।

🔶 गौतम बुद्ध अनाथ पिण्डक के वचन सुनकर हंसे और बोले- तात! जाति-जन्म से नहीं, गुण, कर्म और स्वभाव से पहचानी जाती है। श्रेष्ठ, रागरहित, धर्मपरायण, संयमी और सेवाभावी होने के कारण ही इन्हें मैंने ब्राह्मण कहा है। ऐसे पुरुष को तू निश्चय ही ब्राह्मण मान जन्म से तो सभी जीव शूद्र होते हैं।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1970

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 6 May 2018


👉 Humanity: Our Precious Heritage – Part 2

🔷 There was an era during which ennobling feelings of helping others reigned. A person used to think, “How could I be of help to others? Whom should I offer my services to so as to uplift his condition?” This was considered a measure of superiority. People did not yearn as much for riches, glory, etc as they did for sacrificing themselves in the interest of the society and the world. They considered it honourable to give up life for ideals and whosoever got this opportunity considered it God’s grace bestowed upon them.

🔶 History contains several examples of sacrifices of highest stature. Pannadai sacrificed her son for the security of the royal throne. Sukanya had accidentally damaged the eyes of Rishi Chyavan. In repentance, she married him and shared all his hardships. Is such sacrifice less than ideal? Gandhari’s husband Dhritrashtra was blind; she could not bear the difficulties he was going through due to his blindness. Hence she voluntarily chose blindness by covering her eyes with a strip of cloth. Can anyone forget this piece of history? Such glorious examples of unbelievable sacrifices have been the backbone of the Hindu culture. It is the reason why India’s fame radiates even today like a brilliant constellation in the sky.

📖 Akhand Jyoti Jan 2001

👉 साँचे बनें, सम्पर्क करें

🔷 प्रज्ञा परिवार  सृजन का संकल्प लेकर चला है। उसके सदस्यों, सैनिकों का स्तर ऊँचा होना चाहिए। ऐसा ऊँचा इतना अनुशासित कि उसके कृ र्तृत्व को देखकर अनेक की चेतना जाग पड़े और पीछे चलने वालों की कमी न रहे। बढ़िया साँचों में ही बढ़िया आभूषण, पुर्जे या खिलौने ढलते हैं। यदि साँचे ही आड़े-तिरछे हों तो उनके संपर्क क्षेत्र में आने वाले भी वैसे ही घटिया—वैसे ही फूहड़ होंगे। इसी प्रयास को संपन्न करने के लिए कहा गया है। इसी को उच्चस्तरीय आत्म परिष्कार कहा गया है। यही महाभारत जीतना है। जन-नेतृत्व करने वालों को आग पर भी, कसौटी पर भी खरा उतरना चाहिए। लोभ, मोह और अंहकार पर जितना अंकुश लगाया जा सके लगाना चाहिए। तभी वर्तमान प्रज्ञा परिजनों से यह आशा की जा सकेगी कि वे अपनी प्रतिभा से अपने क्षेत्र को आलोकित कर सकें गे और सृजन का वातावरण बना सकेंगे।

🔶 दूसरा कार्य यह है कि नवयुग के संदेश को और भी व्यापक बनाया जाए। इसके लिए जन-जन से संपर्क  साधा जाए। घर-घर अलख जगाया जाए। मिशन की पृष्ठभूमि से अपने समूचे संपर्क क्षेत्र को अवगत कराया जाए। पढ़ाकर भी और सुनाकर भी। इन अवगत होने वालों में से जो भी उत्साहित होते दिखाई पड़ें उन्हें कुछ छोटे-छोटे काम सौंपे जाएँ। भले ही वे जन्मदिन मनाने जैसे अति सुगम और अति साधारण ही क्यों न हों। पर उनमें कुछ श्रम करना, कुछ सोचना और कुछ कहना पड़ता है। तभी वह व्यवस्था जुटती है। ऐसे छोटे आयोजन संपन्न कर लेने पर मनुष्य की झिझक छूटती है, हिम्मत बढ़ती है और वह क्षमता उदय होती है, जिसके माध्यम से नव सृजन प्रयोजन के लिए जिन बड़े-बड़े कार्यों की आवश्यकता है, उन्हें पूरा किया जा सके।
  
🔷 जो कार्य अगले दिनों करने हैं, वे पुल खड़े करने, बाँध बाँधने, बिजली घर तैयार करने जैसे विशालकाय होंगे। इसके लिए इंजीनियर नहीं होंगे, और न ऊँचे वेतन पर उनकी क्षमता को खरीदा जा सकेगा। वे अपने ही रीछ वानरों में से होंगे। समुद्र पर पुल बाँधने जैसे कार्य में नल-नील जैसे प्रतिभावान भावनाशील ही चाहिए। इसके लिए बुद्ध, गाँधी, विनोबा जैसे चरित्र भी चाहिए और प्रयास भी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, अगस्त 1985 पृष्ठ 65   

👉 सद्विचारों द्वारा जीवन लक्ष्य की प्राप्ति (भाग 2)

🔷 अज्ञान, आसक्ति, अहंकार वासना एवं संकीर्णता के बंधनों से छुटकारा पाने को ही मुक्ति कहते हैं। आत्मा-परमात्मा का अंश होने के कारण स्वभावतः युक्त है, उसे यह कुप्रवृत्तियाँ ही अपने बंधन में बाँधकर मायाबद्ध जीव बना लेती है। इन बंधनों से छुटकारा मिलते ही आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है और जीवन मुक्ति का अनिर्वचनीय उपलब्ध करने लगता है।

🔶 अपनी भूल आप समझ में नहीं आती, यदि समझ में आ जाय तो उसे तुरन्त सुधार लें। रोगी यह नहीं समझता कि मैं कुपथ्य कर रहा हूँ यदि उसे ऐसा पता होता तो कुपथ्य करके प्राणों को संकट में क्यों डालता? यों तो कहने सुनने को हर एक भूल करने वाला और कुमवृध करने वाला यह जानता है कि जो कर रहे हैं वह ठीक नहीं पर ऐसा केवल बाहरी रूप से ही सोचा जाता है, यदि अन्तःकरण के गहन अन्तराल को सच्चे हृदय से या कुपंथ की बुराई मालूम हो जाय तो उसे छोड़ते हुए देर न लगे।

🔷 बात माया बन्धन के बारे में है। स्वार्थ, वासना के निकृष्ट सुख में लोग वैसे ही अनुभव करते रहते हैं जैसे कुत्ता सूखी हड्डी चबा कर मसूड़े छिलने से निकलने वाले ही रक्त को ही चाटता है और रक्तपान का अनुभव करता है। यदि मानव मन को अनुभूति अंतःकरण के गहरे अन्तराल में होना कि माया बन्धन के कटघरे में जो सुख है क्रमवश सुख लगता है वस्तुतः वह भारी घाटे विपत्ति का कारण है तो उसे अपने बन्धनों को तोड़ने में निश्चय ही तत्परता हो जाएगी।

🔶 इस अनुभूति के लिए ही आध्यात्मवाद समस्त शिक्षा और साधना है। इस श्रेय मार्ग पर चलने वाला सत् का महत्व समझ जाता वह सद्विचारों को अपनाता है, जिससे सुदूर और सत्कार्यों में उसकी प्रवृत्ति होती है और धीरे-धीरे वह सत्पुरुष बनता हुआ सन्मार्ग चलता हुआ जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1950 पृष्ठ 15

👉 गुरुगीता (भाग 102)

👉 सच्चे शिष्य का एक ही स्वर- निष्काम कर्म

🔷 गुरूगीता के पिछले क्रम में भगवान् भोलेनाथ ने जगन्माता से ऐसे सिद्ध साधक के विषय में कहा था कि ऐसा मुक्त पुरूष स्वयं सर्वमय होकर परम तत्त्व को देखता है। वह इस सत्य का अनुभव करता है कि आत्म तत्त्व ही श्रेष्ठ है। श्री गुरूकृपा से इस परम तत्त्व का अवलोकन करने के बाद वह शिष्य ,साधक सभी आसक्तियों से रहित, एकाकी, निःस्पृह, शान्त और स्थिर हो जाता है। उसे अभीष्ट मिले या फिर न मिले, उसे ज्यादा मिले या कम मिले, इस चिन्ता को छोड़कर वह सभी कामनाओं से
रहित, संतुष्ट चित्त होकर जीवन यापन करता है। उसे यह सब मिलता है- गुरू द्वारा प्रदर्शित मार्ग का अनुसरण करने से।

🔶 इस गुरू मार्ग की महिमा को बताते हुए भगवान् शिव माता पार्वती से कहते हैं-

उपदेशः तथा देवि गुरूमार्गेण मुक्तिदः। गुरूभक्तिस्तथा ध्यानं सकलं तव कीर्तितम्॥ १२८॥
अनेन यदभवेत् कार्य तद्वदामि महामते। लोकोपकारकं देवि लौकिकं तु न भावयेत् ॥ १२९॥
लौकिकात्कर्मणो यान्ति ज्ञानहीना भवार्णवम्। ज्ञानी तू भावयेत्सर्वं कर्म निष्कर्म यत्कृतम्॥ १३०॥

🔷 हे देवि! उपदेशित गुरू मार्ग मुक्ति दायक है। गुरू की भक्ति, गुरू का ध्यान और वह सब जो आपसे कहा गया है॥ १२८॥ इस सबका उपयोग साधक को लोक कल्याण के लिए करना चाहिए न कि लौकिक कामनाओं को पूरा करने के लिए॥ १२९॥ जो ज्ञानहीन लोग इन सबका लौकिक कामनाओं के लिए उपयोग करते हैं, उन्हें बार- बार भवसागर में गिरना पड़ता है, परन्तु जो ज्ञानी अपने कर्म का निष्काम भाव से प्रतिपादन करते हैं, वे सभी कर्म बन्धनों से मुक्त रहते हैं॥ १३०॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 155

शुक्रवार, 4 मई 2018

👉 इंसान और भगवान

🔶 एक बार एक गरीब किसान एक अमीर साहूकार के पास आया, और उससे बोला कि आप अपना एक खेत एक साल के लिए मुझे उधार दे दीजिये। मैं उसमें मेहनत से काम करुँगा, और अपने खाने के लिए अन्न उगाऊंगा।

🔷 अमीर साहूकार बहुत ही दयालु व्यक्ति था। उसने किसान को अपना एक खेत दे दिया, और उसकी मदद के लिए 5 व्यक्ति भी दिए। साहूकार ने किसान से कहा कि मैं तुम्हारी सहायता के लिए ये 5 व्यक्ति दे रहा हूँ, तुम इनकी सहायता लेकर खेती करोगे तो तुम्हे खेती करने में आसानी होगी।

🔶 साहूकार की बात सुनकर किसान उन 5 लोगों को अपने साथ लेकर चला गया, और उन्हें ले जाकर खेत पर काम पर लगा दिया। किसान ने सोचा कि ये 5 लोग खेत में काम कर तो रहे हैं, फिर मैं क्यों करू? अब तो किसान दिन रात बस सपने ही देखता रहता, कि खेत में जो अन्न उगेगा उससे क्या क्या करेगा, और उधर वे पाँचो व्यक्ति अपनी मर्जी से खेत में काम करते। जब मन करता फसल को पानी देते, और अगर उनका मन नहीं करता, तो कई दिनों तक फसल सुखी खड़ी रहती।

🔷 जब फसल काटने का समय आया, तो किसान ने देखा कि खेत में खड़ी फसल बहुत ही ख़राब है, जितनी लागत उसने खेत में पानी और खाद डालने में लगा दी खेत में उतनी फसल भी खेत में नहीं उगी। किसान यह देखकर बहुत दुखी हुआ।

🔶 एक साल बाद साहूकार अपना खेत किसान से वापिस माँगने आया, तब किसान उसके सामने रोने लगा और बोला आपने मुझे जो 5 व्यक्ति दिए थे मैं उनसे सही तरीके से काम नहीं करवा पाया और मेरी सारी फसल बर्बाद हो गयी। आप मुझे एक साल का समय और दे दीजिये मैं इस बार अच्छे से काम करूँगा और आपका खेत आपको लौटा दूँगा।

🔷 किसान की बात सुनकर साहूकार ने कहा- बेटा यह मौका बार बार नहीं मिलता, मैं अब तुम्हें अपना खेत नहीं दे सकता। यह कहकर साहूकार वहाँ से चला गया, और किसान रोता ही रह गया।

🔶 मित्रो अब आप यहाँ ध्यान दीजिये

🔷 वह दयालु साहूकार “भगवान” हैं। गरीब किसान “हम सभी व्यक्ति” हैं। साहूकार से किसान ने जो खेत उधार लिया था, वह हमारा “शरीर” है।

🔶 साहूकार ने किसान की मदद के लिए जो पांच किसान दिए थे, वो है हमारी पाँचो इन्द्रियां “आँख, कान, नाक, जीभ और मन”

🔷 भगवान ने हमें यह शरीर अच्छे कर्मो को करने के लिए दिया है, और इसके लिए उन्होंने हमें 5 इन्द्रियां “आँख, कान, नाक, जीभ और मन” दी है। इन इन्द्रियों को अपने वश में रखकर ही हम अच्छे काम कर सकते हैं ताकि जब भगवान हमसे अपना दिया शरीर वापिस मांगने आये तो हमें रोना ना आये।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 5 May 2018


👉 सद्विचारों द्वारा जीवन लक्ष्य की प्राप्ति

🔶 प्रत्येक मनुष्य अपने विचारों द्वारा ही अपना आत्म निर्माण करता है। क्योंकि विचार का बीज ही समयानुसार फलित होकर गुणों का रूप धारण करता है और वे गुण, मनुष्य के दैनिक जीवन में कार्य बनकर प्रकट होते रहते हैं। विचार ही वह तत्व है जो गुण, कर्म, स्वभाव के रूप में, दृष्टिगोचर होता है। मन, कर्म, वचन में विचारों का ही प्रतिबिम्ब सदा परिलक्षित होता रहता है।

🔷 मानव मनोभूमि में सत् और असत् दो प्रकार के संकल्प काम करते रहते हैं। भलाई और बुराई दोनों ही ओर मन चलता रहता है। इस द्विधा में जिधर रुचि अधिक हुई, उधर ही प्रकृतियां बढ़ जाती है। यदि असत मार्ग पर चला गया तो अपयश, द्वेष, चिन्ता, दैवी प्रकोप, शारीरिक और मानसिक अस्वस्थता दरिद्रता एवं अप्रतिष्ठा प्राप्त होती है। और यदि सत मार्ग का अनुगमन किया गया तो प्रशंसा, प्रतिष्ठा, प्रेम, सहयोग, संतोष, दीर्घ जीवन, शारीरिक और आत्मिक बलिष्ठता एवं सदा आनन्द ही आनन्द का रसास्वादन होता है। दो प्रकार के विचार ही मनुष्य समाज को दो भागों में बाँटते हैं। सुखी-दुखी, रोगी-निरोगी, दरिद्र-सम्पन्न, दृष्ट-सज्जन, पापी-पुण्यात्मा, निन्दित-पूज्य, प्रसन्न-चिन्तित आदि द्विविधि श्रेणियाँ केवल मात्र द्विविधि विचारों द्वारा ही विनिर्मित होती हैं।

🔶 अधिक संख्या में जनसमुदाय का मानसिक धरातल परिमार्जित नहीं होता, उसमें पाश्विक वृत्तियों की प्रधानता रहती हैं। अविवेक, अज्ञान, अदूरदर्शिता, संकुचित स्वार्थपरायणता, लोभ विषय विकारों में आसक्ति एवं निकृष्ट कोटि के मनोरंजन की अभिलाषाओं से मनः दोष भरा रहता है। जिससे उसके सोचने, कार्य करने और आनंद लाभ करने की परिधि ऐसी सीमित हो जाती है जिसमें बुराई, तामसिकता एवं अशान्ति ही उत्पन्न हो सकती है। इसी कटघरे में अधिकाँश लोग बंद रहते हैं माया का यह घेरा मनुष्य को बुरी तरह जकड़े रहता है। वह जकड़ा हुआ प्राणी पराधीनता जन्म नाना प्रकार के दुखों को प्राप्त करता रहता है। यही भव बन्धन है।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1950 पृष्ठ 15

👉 Humanity: Our Precious Heritage

🔶 When the whole world was following the policy of selfishness, whereby a person would accumulate in excess and deprive others, saints in India mused, what was the uniqueness of man in practising this dictum? Everybody is desirous of indulging in pleasures. Everyone is willing to commit unethical deeds for earning money. The society is tormented by people’s habit of loafing around in idleness. Who does not crave to eat the best food and wear best clothes? All these are the features of an ordinary man.

🔷 Many of these tendencies are found in animals too, and if man also wallows in them, what is his speciality? Such an attitude does not make the right use of his knowledge, intellect and wisdom. In spite of being the possessor of extraordinary strength and abilities, if man leads a contemptible life, then where does lie the meaningfulness of the human life? Superior possessions should be used for superior deeds – only Indians have apprehended this fact. For this very reason alone our authority and eminence have subsisted in the world.

🔶 The problem of bread and butter could not be more acute for man than the need to understand the aim of life. Even an atheist will accept that human life is a rare opportunity. It would be unwise to waste it like ordinary people do. Going in an opposite direction of the routine, the purpose of human life can be ascertained. The outcome of living life casually, pain and suffering, is evident to us all. Therefore the saints asked: why not go in an opposite direction and discover some new facts? With this ideology a new philosophy emerged in India. It inspired the birth of sadhana. The achievements (siddhis) of sadhana were majestic and great.

🔷 The dispersal of even a fraction of these achievements resulted in heavenly happiness in the world. The name of these achievements was “humanity”, meaning practising the dictum “I do not want it, you take it. Nothing belongs to me; everything belongs to the Almighty God” (i.e. selflessness and sacrifice). After thorough sadhanas and the resulting experiences, saints concluded that everyone is entitled to God’s gifts, so they should be distributed to all. By pursuing this guideline, the development of happiness can take place and the world can be kept secure. Save this, there is no other way to establish peace in man’s life.

📖 From Akhand Jyoti Jan 2001

👉 लोक सेवा इन दिनों क्या होनी चाहिए?

🔶 लोक सेवा इन दिनों क्या होनी चाहिए, इसकी जानकारी दूरदर्शी विवेकवानों को समय-समय पर कराई जाती रही है और कहा जाता रहा है कि दुर्मति ही दुर्गति का कारण है। चिन्तन का भटकाव ही असंख्य समस्याओं का मूल है। सड़े कीचड़ में से दुर्गन्धित कृमि कीट उपजते हैं और रक्त के विषाक्त होने पर अनेकानेक चर्म रोगों का उद्भव होता है। प्रज्ञा युग के अवतरण के लिए हमें घर-घर युग चेतना का अलख जगाना और जन-जन के मन-मन में युग संदेश का आलोक पहुँचाना है।

🔷 युग समस्याओं को प्राथमिकता देते हुए हम कुछ समय के लिए धर्मशाला, मन्दिर, कूप, तालाब, औषधालय, प्याऊ, सदावर्त आदि ख्याति प्रदान करने वाले निर्माणों से हाथ खींच सकते हैं, और सर्वप्रथम सर्वोत्तम एवं सामयिक प्रज्ञा प्रसार को अग्रगामी बनाने के लिए प्रयत्नरत हो सकते हैं। इसके लिए जैसे-जैसे लोभ, मोह के बन्धन शिथिल होते जाँय, समय एवं साधन दान को आज की परम आवश्यकता मानते हुए हर परिजन को युग धर्म के निर्वाह में जुट जाना चाहिए।

🔶 पतन निवारण की इस सेवा के निमित्त दो ही उपाय हैं- (1) स्वाध्याय (2) सत्संग।  इन्हीं दो के सहारे सद्ज्ञान का विस्तार हो सकता है और युग तमिस्रा से छुटकारा मिल सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1985 62  

👉 गुरुगीता (भाग 101)

👉 सच्चे शिष्य का एक ही स्वर- निष्काम कर्म

🔶 गुरूगीता के महामंत्रों की साधना से सद्गुरू का सामीप्य एवं सद्गुरू की कृपा दोनों ही सम्भव है। कई बार नवीन साधक के मन में जिज्ञासा होती है कि कहाँ ढुँढे अपने सद्गुरू को? कैसे मिले सद्गुरू? किसके चरणों में करें अपने समर्पण की साधना? कुछ अक्षरों में गुँथे इन प्रश्नों का उत्तर ढूँढना आसान नहीं लगता, क्योंकि व्यावहारिक अनुभव यही कहता है कि सद्गुरू की प्राप्ति आसान नहीं होती। प्रायः यही होता हैं कि सद्गुरू मिलते ही नहीं और यदि किसी संयोगवश मिल भी गये, तो उनकी सद्गुरू के रूप में पहचान आसान नहीं होती। यह एक ऐसी जटिल पहेली है, जिसे हल करने में लोग अपना सम्पूर्ण जीवन गँवा देते हैं, फिर भी समस्या ज्यों की त्यों रहती है।

🔷 इस समस्या के समाधान में एक अनुभव कथा कहने का मन है। यह कथा एक किशोरवय के साधक की है, जो अपने सद्गुरू को ढूँढ रहा था। अपनी इस खोज को उसने अपनी साधना बना लिया। उसकी इस साधना के तीन पहलू रहे- पहला का आस्थापूर्वक पाठ। दूसरा- गुरू रूप में भगवान् शिव का वरण एवं तीसरा- गुरूमंत्र के रूप में गायत्री मंत्र का जप। जो सतत साधना करते हैं, जिनका शास्त्र ग्रन्थों का सम्यक् अध्ययन है- वे इस सत्य को भलीभाँति जानते हैं कि भगवान् शिव अपने दक्षिणामूर्ति स्वरूप में सभी प्राणियों के गुरू हैं। दस रूप में वे सभी को सद्गुरू प्राप्ति का वरदान देते हैं।

🔶 कोई भी साधक यदि उपरोक्त साधना ठीक से करता रहे, तो एक दिन भगवान् शिव ही उसे उसके सद्गुरू का परिचय देते हैं और उनकी प्राप्ति कराते हैं। अनुभूति कथा के इस किशोर साधक को भी अपनी यह साधना निरन्तर आठ वर्षों तक करनी पड़ी। अन्त में एक दिन स्वयं भगवान् सदाशिव ने उसके स्वप्न में आकर कहा- देख, मुझे पहचान मैं हूँ तेरा सद्गुरू। और इस स्वप्न में ही भगवान् शिव का दिव्य कलेवर उसके सद्गुरू के रूप में बदल गया। हाँ यह बात अलग है, इस स्वप्न परिचय को साकार होने में उसे दो वर्षों की साधना और करनी पड़ी। इन दो वर्षों में परिस्थिति चक्र में आश्चर्यजनक मोड़ आये, उसे उसके सद्गुरू का सान्निध्य भी मिला और कृपा भी। यह सत्य कथा किसी भी साधक के जीवन का सच बन सकती है। बस, प्रयास हो भावभरे मन से साधना की। साधना बनी रहे, तो सिद्धि मिलते, सिद्ध बनते देर नहीं लगती।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 154

गुरुवार, 3 मई 2018

👉 जो सहेगा वह चलेगा और लगातार वही चलेगा

🔷 एक नगर मे नन्दु नाम का साधक रहता था साधना करता था पर बाधायें रुकने का नाम नही लेती थी अक्सर वो किसी सन्त के दरबार मे जाया करता था एक बार वो बहुत हताशा और निराशा मे डुबा हुआ आश्रम के बाहर बैठा था तो अन्दर से महात्मा जी बाहर आये!

🔶 महात्मा - बेटा नन्दु लो ये दो टुकडे इनको नगर मे सुनार की दुकान पे ले जाना और कहना की इनका एक कड़ा बना दो और उस कड़े को मैं तुम्हे पहना दूँगा ताकि तुम्हारी समस्या का समाधान हो जायें!

🔷 नन्दु गया वापस आया और कहा हॆ देव दुकानदार ने एक टुकडे को तो फेंक दिया और दुसरे टुकडे को ले लिया!

🔶 महात्मा - पर उन्होंने ऐसा क्यों किया तुमने पुछा नही?

🔷 नन्दु - पुछा देव उन्होंने कहा की इसमे एक सोने का टुकड़ा है और दुसरा लोहे का उन्होने लोहे के टुकडे को फेंक दिया!

🔶 महात्मा - फिर क्या किया वत्स?

🔷 नन्दु - फिर उन्होंने सोने के टुकडे को छिनी और हथोडी से छोटे छोटे टुकडे किये फिर उसे आग मे रखकर पिगलाया फिर हथोडे से उसकी खुब पिटाई की बारबार आग मे तपाये और पिटाई करे बहुत लम्बी प्रक्रिया के बाद ये कड़ा बनकर तैयार हुआ!

🔶 महात्मा - यही तो मैं तुमसे कह रहा हुं वत्स की परीक्षा सोने को ही देनी पड़ती है और आग मे तपना पड़ता है और बहुत लम्बी प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद वो गहना बनकर तैयार होता है!

🔷 हॆ वत्स इस कड़े को अपने हाथ मे पहन लो ताकि तुम्हे हमेशा याद रहे की मुझे इस जीवन को ऐसा बनाना है की मेरे सद्गुरु मुझे अपने हाथों मे ले ले! हॆ वत्स एक बात हमेशा याद रखना की जब साधना के मार्ग पर बाधा पे बाधा आये तो समझ लेना की तुम्हारी साधना मे दम है और ऐसे समय मे घबराना मत सद्गुरु का आशीर्वाद लेकर और तेजी से आगे बढ़ना!

🔶 एक बात हमेशा ध्यान रखना की सोने को आग मे तपना पड़ता है गहना बनने के लिये असंख्य चोटें सहनी पड़ती है! हॆ मेरे सत्य के अतिप्रिय साधक चोटों से घबराकर हार कभी मत मानना लड़ते रहना और निरन्तर प्रकाश की ओर बढ़ते रहना! और सहन तो करना पड़ेगा वत्स यदि यहाँ नही तो फिर वहाँ सहन करना पड़ेगा और अच्छा होगा की यही सहन कर ले क्योंकि यहाँ सहन करेंगे तो आगे तरेगे और यदि यहाँ सहन करने से भागेंगे तो आगे की सारी यात्रा मे इधर उधर मारे मारे फिरेंगे!

🔷 हॆ वत्स ये हमेशा याद रखना की भागना जीवन नही है जागना जीवन है और जब जग जाओ तो फिर चलना और सहनशील बनना और सहना क्योंकि जो सहेगा वह चलेगा और लगातार वही चलेगा जो सहेगा ये कभी न भुलना की जो सहेगा वही बनेगा!

👉 आज का सद्चिंतन 4 May 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 May 2018


👉 इन तीन का ध्यान रखिए (अन्तिम भाग)

🔷 इन तीनों को स्मरण रखो- आरोग्य, सुमित्र और संतोष वृत्ति। ये तीनों ही आड़े समय काम में आने और रक्षा करने वाले है।

🔶 चाहे अन्य बातों में आप पीछे रहें, किन्तु इन स्वास्थ्य और आरोग्य सम्पादकों को प्राप्त करते रहिये। सच्चा मित्र जीवन का सब से बड़ा हितैषी और सहायता है। संतोषवृत्ति मनः शक्ति को परिपुष्ट करने, आन्तरिक समस्वरता को प्रदान करने वाली परमौषधि है।

🔷 इन तीनों का प्राप्त करो-(1) अच्छी पुस्तक (2) अच्छी सोबत और (3) अच्छी आदतें। अच्छे, उपयोगी, चरित्र का परिष्कार एवं आत्म सुधार करने वाले सद्ग्रन्थ जिस व्यक्ति के पास है, उसे अकेलापन, नीरसता, शुष्कता कभी न प्रतीत होगी। पुस्तकें सदा सर्वदा चौबीसों घंटे का आत्मसुधार करने को प्रस्तुत हैं, आपकी सद्शिक्षाएँ देने को मौजूद रहती हैं। इनके सत्संग से अनेक साधारण व्यक्ति महत्ता प्राप्त कर सकते हैं। सत्साहित्य से समाज के ज्ञान का संवर्द्धन चरित्र का संशोधन होता है। उच्च कोटि के साहित्य से ही घर की शोभा है।

🔶 महात्मा गाँधी जी ने कहा है, “अच्छी पुस्तकों के पास रहने से हमें अपने भले मित्रों के साथ न रहने की कमी नहीं खटकती। जितना ही मैं उत्तम पुस्तकों का अध्ययन करता गया, उतना ही मुझे उनकी विशेषताएं मालूम होती गईं। जिसे पुस्तकें पढ़ने का शौक है, वह सब जगह सुखी रह सकता है।” लोकमान्य तिलक के अनुसार, “मैं नर्क में भी उत्तम पुस्तकों का स्वागत करूंगा, क्योंकि इनमें वह शक्ति है कि वे जहाँ होंगी, वहाँ आप ही स्वर्ग बन जायेगा।” अच्छी पुस्तकें ही अच्छी सोहबत और अच्छी आदतें प्रदान कर सकती हैं।

.... समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 14

👉 Yajna – The Root of Vedic Culture (Last Part)

🔶 Yajóa is also supposed to be performed during the programme of katha-kirtan (the recital of a story along with devotional songs), religious celebrations and the occasions of special festivals. For example, Holi, which is celebrated these days as a colour festival was originally a festival of yajóa to celebrate the harvesting of new crop every year. A handful of new grains is supposed to be sacrificed in the “holi- yajóa” as a mark of expressing gratitude to God’s grace. The spirit of purifying the grain before using it in food preparation is also associated with this yajóa.  

🔷 Yajóa is also performed along with religious functions like Satya Narayan Katha, Bhagvat Katha, Ramayan Parayan, etc. Specific yajóas are also invariably linked with the Vedic as well as the tantrika sadhana anusthanas. Gayatri Sadhana is regarded incomplete without yajóa. The number of ahutis offered in the havans or yajóas organized to mark the end of Gayatri anusthana or mahapurashcharanas should at least equal the tenth or hundredth fraction of the number of japas completed everyday in these sadhanas.  Worshiping different manifestations of God is also supposed to be carried out with specific kinds of yajóa, as described in the holy scriptures.  

🔶 The prominence of tirthas, the places of pilgrimage, is also associated with yajóa since the Vedic Age. The places where grand yajóas were organized and conducted by the rishis became tirthas and are still revered as holy destinations of pilgrimage in India.

📖 From Akhand Jyoti Jan 2001

👉 गुरुगीता (भाग 100)

👉 गुरूकृपा गृहस्थ को भी विदेह बना देती है

🔶 गुरूगीता के इन मंत्रों में मुक्त पुरूष का व्यवहार बताया गया है। यह अतिदुर्लभ अवस्था जिसे जहाँ प्राप्त है, वह व्यक्ति तो कृतार्थ है ही। वह भूमि भी धन्य हो जाती है, जहाँ ऐसे लोग रहा करते हैं। ऐसे व्यक्ति संन्यासी हों या गृहस्थ, श्वेताम्बर हो या काषायाम्बर अथवा फिर दिगम्बर सर्वत्र पूजनीय हैं। इन्हें वेष से नहीं, अवस्था से पहचाना जाता है। ये जनक की भाँति राजा भी हो सकते हैं और महामुनि शुकदेव की भाँति सर्वत्यागी भी। परन्तु इनकी अन्तर्चेतना सदा विराट् में विलीन रहती है। हाँ, उन्हें समझ पाना अति कठिन हो पाता है, केवल ज्ञानी जन ही इन्हें जान पाते हैं।

🔷 पुराण कथा के अनुसार राजा जनक को अपने गुरूदेव अष्टावक्र की कृपा से ज्ञान हुआ था। महर्षि अष्टावक्र की कृपा से ही उन्हें सिद्धि मिली थी। साधना से सिद्धि की यात्रा कर लेने के बावजूद वे गुरू आदेश से अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करते रहे। उनके लिए सभी कुछ समान था। परन्तु मूढ़ जन इस रहस्य को समझ न पाये और उन्हें साधारण गृहस्थ समझने की भूल करते रहे। इन्हीं दिनों ब्रहर्षि विश्वामित्र ने वेदान्त विदों का एक शिविर मिथिला नगरी में लगाया। इस शिविर में देशभर के ऋषि- मुनि, त्यागी वेश एवं कमण्डलुधारी, संन्यासी सभी पधारे। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र, योगी याज्ञवल्क्य, महर्षि अष्टावक्र सरीखें पारदर्शी ज्ञानी वहाँ रोज प्रवचन देते।

🔶 इस प्रवचन कक्षा में राजर्षि जनक भी शामिल होते। परन्तु आडम्बर में घिरे कई वेशधारी संन्यासी उन्हें उपेक्षा की नजर से देखते। यहाँ तक कि उन्हें समझ में ही नहीं आता था कि वे महर्षि जन इस राजा को इतना सम्मान क्यों देते हैं? ब्रह्मर्षि विश्वामित्र से यह सच्चाई छुपी न रही। उन्होनें इन आडम्बर धारियों की समस्या का निराकरण करने के लिए शिविर स्थल में अपने तपोबल से आग लगा दी। आग लगते ही सबकी झोपड़ियाँ जलने लगी। जिस समय आग लगी, उस समय वेदान्त का प्रवचन चल रहा था। आत्मज्ञान की चर्चा के समय आग लगने से सभी संन्यासी घबरा गये। उन्हें अपनी लंगोटी व कमण्डलु की चिन्ता होने लगी। ये सभी प्रवचन को छोड़कर अपना सामान बचाने के लिए भागे। इस सारे खेल में ब्रहर्षि विश्वामित्र हंस रहे थे।

🔷 यह आग बढ़ती गयी। राजा जनक भी वहीं बैठे थे। परन्तु उनके चित्त में स्थिरता थी। वह बिना किसी परेशानी के वेदान्त चर्चा में भाग ले रहे थे। ब्रहर्षि विश्वामित्र ने उन्हें चेताया- महाराज महाराज! आग लगी है। आप तो राजा हैं। आपका राज्य एवं महल जल रहा है। क्या आपको चिंता नहीं हों रही है? महर्षि के प्रश्न पर राजा जनक स्थिर चित्त से बोले- ऋषियों! आप चिंता न करें। सद्गुरू की कृपा से मैंने सत्य जान लिया है- मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे दहति किंचन  केवल मिथिला नगरी जल रही है, मेरा कुछ नहीं जल रहा है। जनक के इस कथन के साथ ही आग बुझ गयी। महर्षि ने अपना खेल समेट लिया। ज्ञान और आसक्ति का भेद स्पष्ट हो गया। सचमुच सद्गुरू की कृपा से क्या नहीं हो सकता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 152

बुधवार, 2 मई 2018

👉 कमजोर लड़की

🔶 ऋतु का व्हाट्स एप्प पे कई लड़को से दोस्ती और चैटिंग पढ़कर राज का चेहरा लाल हो गया। गुस्से से आँखों से अंगारे निकलने लगे, मुट्ठियां भींच गई। क्रोध से पूरा शरीर काँपने लगा। दिमाग मे ऐसा लगा जैसे कोई हथौड़ा चला रहा हो। यद्यपि सारी चैटिंग नार्मल थी। अच्छे और मजाकिया चुटकुले और बातें थी जो फ्रेंड्स में होती है। कुछ दोस्तों ने ऋतु की खूबसूरती और उसके डीपी की तारीफ की थी इस बात पे राज और भी जल भुन गया था।

🔷 दोनों की शादी के अभी सात दिन ही हुए थे। "ऋतु!! ऋतु !! "पूरी ताकत और गुस्से से राज चिल्लाया।"क्या हुआ?" ऋतु घबराई सी कमरे में पहुँची तब तक उसके सास ससुर और ननद भी कमरे में आ गए थे।

🔶 राज ने सबके सामने चिल्लाना और अपमान करना शुरू किया। "माँ ये देखो इस लडक़ी के व्हाट्स एप्प पे कई लड़कों से दोस्ती हैं ये सही लड़की नही है?"

🔷 सासु माँ ससुर और ननद भी जलती नेत्रों से ऋतु को देखने लगे। ऋतु को अपनी गलती नही समझ आयी वो हतप्रभ खड़ी थी जो राज रात दिन उसके प्यार का दम्भ भरता था, उसकी खूबसूरती के कसीदे पढ़ता था, उसके लिए आसमान से तारे तोड़ लाने की बातें करता था उसके इस रूप की ऋतु ने कल्पना भी न की थी।

🔶 "राज मैंने भी तुम्हारा व्हाट्स एप्प देखा तुम्हारी भी कई लड़कियों से दोस्ती है। तुम्हारी बहन रानी के भी कई लड़के अच्छे दोस्त होंगें इसमें गलत क्या है?" ऋतु के बोलते ही "चुप! जबान लडाती है" सास की जोरदार आवाज़ गूँजी।

🔷 चटाक!!!! राज का जोरदार तेज थप्पड़ ऋतु के गाल पर पड़ा। गाल पे लाल लाल उँगलियो के निशान पड़ गए। आँखे पनिया गई।

🔶 चटाक!!!!!!! पहले से भी अधिक जोरदार और तेज थप्पड़ की कमरे में आवाज़ हुई। इस बार सबके सामने ऋतु का जोरदार थप्पड़ राज को पड़ा। ऐसा थप्पड़ कि राज को दिन में ही चाँद तारे ग्रह उपग्रह सब दिख गए।

🔷 "मुझे कमजोर लड़की न समझना मैं पढ़ी लिखी और अपने हक़ और अधिकार जानने वाली भारतीय आर्मी के मेजर की बेटी हूँ। किसी भी हाल में चरित्र उज्ज्वल रखना और गलत सहन नहीं करना दो बातें पापा ने सिखाई हैं। इसके बाद किसी ने मुझे किसी भी तरह से परेशान करने की कोशिश की तो फिजिकल, मेन्टल टॉर्चर और डोमेस्टिक वॉइलेन्स का केस डाल दूँगी। सासु माँ आपने बेटे को खूब पढ़ा लिखा कर बड़ा ऑफिसर तो बना दिया काश थोड़ा लड़कियों से बात करने की तमीज और उनकी इज़्ज़त करना भी सिखा देतीं।"

🔶 इसके बाद कुछ दिनों तक घर का माहौल काफी तनावपूर्ण रहने लगा। दीवारों में कान होने के कारण पड़ोसियों में भी इस नई बहू के बिगड़े तेवर की चर्चा होने लगी और पड़ोसियों की खुसर फुसर ने हवन में घी का काम किया। एक दिन पहले की आदर्श बहु अब बहुत बुरी बहु बन गयी थी।

🔷 इस घटना के कुछ दिन बाद राज अपने काम के सिलसिले में दो दिन के लिए दूसरे शहर गया हुआ था। उसके पिता जी भी गाँव के किसी रिश्तेदार की बीमारी की खबर सुनकर गाँव गए हुए थे। घर पर सिर्फ राज की माँ बहन रानी और ऋतु थीं।

🔶 माँ छत पर कपड़ा सूखने डालकर आ रही थीं कि अचानक पैर फिसलने से वह ऊपर की सीढ़ियों से लुढकते लुढकते नीचे आ गिरी। जोर से चिल्लाकर बेहोश हो गयी। सर फट गया और तेजी से खून बहने लगा। पैर फ्रैक्चर होकर थोड़ा मुड़ सा गया। रानी और ऋतु चीख सुनते हो दौड़ पड़े। रानी माँ को ऐसे हाल में देखकर नरवस हो गयी वो जोर जोर से रोने लगी।

🔷 ऋतु ने संयम रखते हुए एकपल भी देर न करते हुए सबसे पहले एक साफ कपड़े से सर पे पट्टी बंधी इससे थोड़ा खून बहना कम हो गया फिर माँ को गोद में उठाकर कार की पिछली सीट पर लिटाया और रानी को बिठाकर सीधे हॉस्पिटल ले गयी।

🔶 हॉस्पिटल में तुरंत इमरजेंसी के सारे कागजात तैयार कर माँ को ICU में भर्ती कराया और तुरंत माँ के लिए अपना ब्लड डोनेट भी की चोटें काफी गंभीर लगीं थी और ऋतु अकेले ही बहु की तरह नहीं बल्कि बेटे की तरह खाना पीना सोना जागना भूलकर सब काम कर रही थी।

🔷 रानी को माँ के पास बिठाकर कभी डॉक्टर से बात करती कभी दवाइया लाती कभी रिपोर्ट पढ़ती। राज और उसके पापा को खबर कर दी गयी थी फिर भी उनलोगों के आने में नौ दस घंटे का समय लग गया था। इन नौ घंटो में ऐसा लग रहा था जैसे ऋतु खुद यमराज से टक्कर लेने को तैयार थी।

🔶 सुबह हॉस्पिटल में जब माँ की आँख खुली तो देखा पैरों में प्लास्टर है सर पे पट्टी बंधी है सामने राज ऋतु को गले लगाए है रानी और उसके पापा की आँखों में आँसू हैं और डॉक्टर बोल रहा है थैंक्स मेरा नहीं इनका कीजिये जिन्होंने टाइम रहते हॉस्पिटल ले आये वरना हमारे हाथ भी कुछ संभव न था।

🔷 कल तक जिन आँखों मे ऋतु के लिए नफरत था आज उन्ही आँखों में कृतज्ञता के भाव थे और सवकी आँखों से आँसू निकल रहे थे।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 3 May 2018

👉 इन तीन का ध्यान रखिए (भाग 6)

🔶 इन तीनों का आनन्द प्राप्त करो- (1) खुला दिल (2) स्वतन्त्रता (3) सौंदर्य- ये तीनों आपके आनन्द की अभिवृद्धि करने वाले तत्व हैं।

🔷 खुला दिल सबसे उत्तम वस्तुएँ ग्रहण करने को प्रस्तुत रहता है, संकुचित हृदय वाला व्यक्तिगत वैमनस्य के कारण दूसरे के सद्गुणों को कभी प्राप्त करने की चेष्टा नहीं करता। स्वतन्त्रता का आनन्द वही साधक जानता है जो रूढ़िवादिता, अंधविश्वास, एवं क्षणिक आवेशों से मुक्त है।

🔶 स्वतंत्रता का अर्थ अत्यन्त विस्तृत है। सोचने, बोलने, लिखने, प्रकट करने की स्वतन्त्रता प्राप्त करनी चाहिए। जो व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र है, वह अनेक झगड़ों से मुक्त है। सौंदर्य-आत्मिक और चारित्रिक-दोनों ही उन्नति और प्रगति की ओर ले जाने वाले हैं। यदि सौंदर्य के साथ कुरुचि और वासना मिश्रित हो जायेंगी, तो वह अपना वास्तविक अभिप्राय नष्ट कर देगा।

🔷 सौंदर्य के साथ सुरुचि का समावेश होना चाहिए। आप सौंदर्य की जिस रूप में पूजा करें, यह स्मरण रखिये वह आप में शुभ भावनाएं प्रेरित करने वाला, सद्प्रेरणाओं को उत्पन्न करने वाला हो।

🔶 इन तीन के लिये लड़ो-इज्जत, देश, और मित्र। इनकी प्रतिष्ठा आपकी अपनी इज्जत है। यदि आप में स्वाभिमान है, तो आपको इन तीनों की रक्षा अपनी सम्पूर्ण शक्ति से करनी चाहिए। इन तीन की चाह करो-निर्मलपन, भलापन, आनन्दी स्वभाव। आन्तरिक शान्ति के लिये तीनों आवश्यक है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 14

👉 Gold coins

🔶 A saint used to administer a small gurukul. One day he brought a person walking by and asked him before his scholars, “What will you do if you get a packet of three gold coins on the way?”
  
🔷 “I will locate its owner and return to him at once or submit them in the king’s treasure,” replied the man. The saint laughed, sent back the passer by and told his scholars that the man was unwise. The  scholars wondered about what the saint said. All of them were taught not to keep the others’ belongings.
  
🔶 After sometimes another man passed by, and the saint repeated the same question to him. He replied, “Do you think I am a stupid that I will go to search for the owner of the gold coins if hapen to find them on the way?” The saint told that man was a devil.
  
🔷 Now the saint brought inside a third man and put before him the same question. The man modestly replied, “It is difficult to say anything right now. Who can say of mind that deceives in a second? If there be God’s grace and intellect reigns, I will return the coins.” The saint inferred this man as rightful as he had entrusted his everything to God. Such people are never a failure.  

👉 चिन्ता पीडित व्यक्ति

🔶 मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु रोग- क्षय से पीडित रोगियों में सबसे अधिक संख्या उनकी है जिन्होंने रात दिन दुश्चिन्ताएँ करके अपने शत्रु को बुलाया है। चिन्ता पीडित व्यक्ति के लक्षण:-

🔷 (1) चिन्तित व्यक्ति हमेशा दुःखी बना रहता है। उसके पेट में और सिर में प्राय: दर्द बना रहता है। स्वास्थ्य के मुख्य आधारभूत अंग पेट और सिर ही है और यह दोनों ही दुश्चिन्ता करने से भारी बने रहते हैं।

🔶 (2) दुश्चिन्ता करने वाला व्यक्ति कायर हो जाता है और कायरता की यह प्रवृत्ति विशेष रूप से उन मौकों पर परिलक्षित होती है जब उसे बाह्य संसार की वास्तविकता का सामना करना पड़ता है। उसे सदैव भयंकर हानि का खतरा अनुभव हुआ करता है। कभी कभी तो वह अकारण ही भयभीत हो जाया करता है।

🔷 (3) चिन्ताशील व्यक्ति में आत्मविश्वास की कमी होती है। दूसरों के प्रति उस के मन में संदेह बना ही रहता है। चाहे जितना उसका उत्साहवर्धन किया जाय, उसे असफलता ही नजर आती है।

🔶 (4) उसमें आवश्यकता से अधिक झुझलाने की आदत पैदा हो जाती है। कभी कभी उसके साथ अन्य लोगों का उठना- बैठना भी कठिन हो जाता है। वह अपनी अस्थिरता को छिपाने की चेष्टा करता है पर उसकी चेष्टा बेकार सिद्ध होती है। जरा- जरा सी बात पर उसका खून खौल उठता है।

🔷 (5) वह अत्यन्त अनुभूतिशील और आवश्यकता से अधिक सम्मान प्रिय होता है। इसलिये समाज के प्रति उसका दृष्टिकोण गलत और अतिरंजित होता है। वह अपने ही मित्रों, प्रियजनों, परिजनों और परिवारजनों के कार्यों और कथन का उल्टा अर्थ लगाता है, कभी हर बात में वह अपना ही दोष समझता है। इस प्रकार वह अपना जीवन बहुत दु:खी बना लेता है।

🔶 (6) वह प्राय: नैराश्यपूर्ण भावों से ओत- प्रोत रहता है। कुछ मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि उसे निराशा में ही आनन्द आता है, अन्यथा वह उन तामसिक भावों से इतना लीन क्यों रहता? पर चिन्ता पीडि़त व्यक्ति उन भावों से छुटकारा पाना चाहता है, वह उनसे पीछा छुड़ाने में बिल्कुल असमर्थ हो जाता है।

🔷 (7) चिन्ता करने से बड़ी जल्दी थकावट आ जाती है। ऐसा जान पड़ता है कि शरीर और मन दोनों थक गये हों। ऐसी थकावट हर समय बनी रहती है। जहाँ चिन्ता है वहाँ थकावट अवश्य होगी।  

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति से

👉 गुरुगीता (भाग 99)

👉 गुरूकृपा गृहस्थ को भी विदेह बना देती है  

🔶 इसके स्वरूप को और भी अधिक स्पष्ट करते हुए भगवान् सदाशिव माँ भगवती से कहते हैं-

स्वयं सर्वमयो भूत्वा परं तत्त्वं विलोकयेत्। परात्परतरं नान्यत् सर्वमेतन्निरालयम्॥ १२३॥
तस्यावलोकनं प्राप्य सर्वसंगविवर्जितः। एकाकी निःस्पृहः शान्तः तिष्ठासेत् तत्प्रसादतः॥१२४॥
लब्धं वाऽथ न लब्धं वा स्वल्पं वा बहुलं तथा। निष्कामेनैव भोक्तव्यं सदा संतुष्टचेतसा ॥ १२५॥
सर्वज्ञपदमित्याहुर्देही सर्वमयो बुधाः। सदानन्दः सदाशान्तो रमते यत्र- कुत्रचित्॥ १२६॥
यत्रैव तिष्ठते सोऽपि स देशः पुण्यभाजनम्। मुक्तस्य लक्षणं देवि तवाग्रे कथितं मया॥ १२७॥

🔷 ऐसा मुक्त पुरूष स्वयं सर्वमय होकर परम तत्व को देखता है। वह इस सत्य को अनुभव करता है कि न तो कोई दूसरा है और न ही इस आत्मतत्त्व से बढ़कर कोई श्रेष्ठता है। ऐसा अनुभव करते हुए वह सम्पूर्ण निराश्रय होकर जीता है॥ १२३॥ श्री गुरूकृपा से इस परम तत्त्व का अवलोकन करने के बाद शिष्य -साधक सभी आसक्तियों से रहित , एकाकी, निस्पृह, शान्त और स्थिर हो जाता है॥ १२४॥ उसे अभीष्ट मिले या न मिले, उसे ज्यादा मिले अथवा थोड़ा मिले, इस चिंता को छोड़कर वह सभी कामनाओं से रहित संतुष्ट चित्त होकर जीवन यापन करता है॥ १२५॥

🔶 ज्ञानी जन इस अवस्था को ही सर्वज्ञ पद कहते हैं। इसे प्राप्त करके देहधारी सर्वात्म हो जाता है। इस अवस्था को पाने वाला साधक सदा शान्त, हमेशा ही आनन्दित एवं यत्र- तत्र रमने वाला होता है॥१२६॥ भगवान् सदाशिव कहते हैं, हे देवि! इस तरह से मैंने आपको मुक्त पुरूष के लक्षण सुनाएँ। ऐसा मुक्त पुरूष जहाँ कहीं भी निवास करता है, वह देश पुण्यभूमि हो जाता है॥ १२७॥ ऐसे व्यक्ति का दर्शन, सान्निध्य सभी कुछ दुर्लभ है। परन्तु इसे अनुभव वही कर पाता है, जो सच्चे साधक हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 151

👉 Yajna – The Root of Vedic Culture (Part 5)

🔷 Types of Yajnas
A variety of Yajnas are described in scriptures. The seva Yajna, meaning service to the society, is a noble example of Yajna.  The jnana Yajna corresponds to the service of people by enlightening their lives with the glow of knowledge and education. The prana Yajna implies the selfless service of saving the lives of people from sufferings and agonies and inspiring liveliness and respect for life in them.    

🔶 Modern times and ignorance towards a great tradition
In the tides of time we lost and forgot the original purpose, relevance and importance of Yajna in our life. It won’t be an exaggeration to conclude that this negligence and aberration has been a major cause of our fallen and miserable state today. Nevertheless, there is a hope of reviving the Yajna in its original form, as we have somehow continued the tradition of Yajna as a holy custom and occasionally perform it, in some form at least, as a symbolic ritual.

🔷 Although lifeless and deformed, the feeble and hazy image of this ancient tradition is still with us. All important ceremonies, including the sodas sanskaras (sixteen rituals that are performed at various stages of life from birth till death), are conducted with Yajna. For instance, the Vedic mode of the wedding ceremony (vivaha sanskara) takes place in the presence of the sacred flames of Yajna.

🔶 As the melting heat of the fire welds and binds two metal pieces, the pious glow and the spiritual warmth of the yagyagni (the fire of Yajna) conjugate the soul of the bride and the groom through the sacred knot of marriage. The funeral process  ( daha or anityesti sanskara) is also a Yajna. The significance of Yajna in the thread ceremony (upanayana sanskara) is self-evident, as the sacred thread donned to symbolize the initiation of an enlightened life is called “yajóopavita”. This thread is always worn in the auspicious vicinity of yajnagni.

📖 From Akhand Jyoti Jan 2001

👉 इन तीन का ध्यान रखिए (भाग 5)

🔷 इन तीन को हासिल कीजिए- सत्यनिष्ठा, परिश्रम और अनवरतता

🔶 (1) सत्यनिष्ठ व्यक्ति की आत्मा विशालतर बनती है। रागद्वेष हीन श्रद्धा एवं निष्पक्ष बुद्धि उसमें सदैव जागृत रहती है। वह व्यक्ति वाणी, कर्म, एवं धारणा प्रत्येक स्थान पर परमेश्वर को दृष्टि में रख कर कार्य करता है। जो वाणी, कर्तव्य रूप होने पर हमारे ज्ञान या जानकारी को सही सही प्रकट करती है और उसमें ऐसी कमीवेशी करने का यत्न नहीं करती है कि जिससे अन्यथा अभिप्राय भासित हो, वह सत्यवाणी है। विचार में जो सत्य प्रतीत हो, उसके विवेकपूर्ण आचरण का नाम ही सत्य कर्म है।

🔷 (2) परिश्रम एक ऐसी पूजा है, जिसके द्वारा कर्म पथ के सब पथिक अपने पथ को, जीवन और प्राण को ऊँचा उठा सकते हैं। कार्लाइल का कथन है कि परिश्रम द्वारा कोई भी बड़े से बड़ा कार्य, उद्देश्य या योजना सफल हो सकती है।

🔶 (3) अनवरतता अर्थात् लगातार अपने उद्योग में लगे रहना मनुष्य को सफलता के द्वारा पर लाकर खड़ा कर देता है। पुनःपुनः अपने कर्तव्य एवं योजनाओं को परिवर्तित करने वाला कभी सफलता लाभ नहीं कर सकता।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 14

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 2 May 2018


👉 बेपरवाह

🔷 यदि आप पुरी तरह से बेपरवाह बन जाओगे तो वो दिन दुर नही की एक दिन संसार मे आपकी परवाह करने वाला कोई न होगा!

🔶 एक नगर मे दो भाई थे जो सहपाठी भी थे दोनो के नाम थे जगजीत और ओमनारायण! जगजीत बड़े परिवार से था तो ओमनारायण साधारण परिवार से था और जगजीत पढ़ने मे बड़ा होशियार था तो ओमनारायण साधारण बुद्धी का प्राणी था!

🔷 दोनो वर्षों तक साथ पढ़े और एक दिन जगजीत बहुत ऊँचे ओहदे पर पहुँच गया और ओमनारायण बड़ी मुश्किल से चपरासी की नौकरी तक पहुँच पाया! पर जहाँ ओमनारायण को हर कोई चाहता था पुरा गाँव उसकी परवाह करता था तो जगजीत की कोई परवाह नही करते थे!

🔶 जगजीत के जीवन की सबसे बड़ी कमी यही थी की वो किसी की भी परवाह नही करता था और ओमनारायण हर एक की परवाह करता था जहाँ जगजीत बहुत ऊँचे ओहदे पर और पूर्ण समर्थ होने के बावजुद वो जगह न बना पाया जो ओमनारायण ने अपनी संवेदना से बना ली!

🔷 मित्रों एक बात हमेशा याद रखना की यदि हम किसी की परवाह नहीं करेंगे तो एक दिन वो आयेगा की संसार मे कोई हमारी परवाह नही करेगा! जो परवाह के योग्य है उनकी परवाह करना समाज, साथी, परिवार, माँ-बाप, सद्गुरु, संत, सत्य और अन्तरात्मा इन सबकी परवाह करनी चाहिये क्योंकि यदि हम किसी के प्रति सम्वेदनशील रहेंगे तो प्रकृति भी हमारे प्रति सम्वेदनशील रहेगी और जीवन का चहुमुखि विकास तभी सम्भव है जब हम अधिकतम की परवाह करेंगे!

🔶 वैसे नीति तो यही कहती है की मानव को चींटी तक की परवाह करनी चाहिये क्योंकि यदि हम उसकी रक्षा करेंगे तो भगवान हमारी परवाह करेंगे और यदि हम उसकी रक्षा न करके राक्षसी प्रवर्ति दर्शायेँगे तो फिर भगवान भी हमारी परवाह नही करेंगे!

👉 जैसे यदि तुम समय की परवाह नही करोगे तो एक दिन समय भी तुम्हारी परवाह नही करेगा इसलिये परवाह करना!

मंगलवार, 1 मई 2018

👉 यौवन की जिम्मेदारी

🔶 युवावस्था जीवन का वह अंश है, जिसमें उत्साह, स्फूर्ति, उमंग, उन्माद और क्रिया शीलता का तरंगें प्रचण्ड वेग के साथ बहती रहती है। अब तक जितने भी महत्वपूर्ण कार्य हुए हैं, उसकी नींव यौवन की सुदृढ़ भूमि पर ही रखी गई हैं। बालकों और वृद्धों की शक्ति सीमित होने  के कारण उनसे किसी महान् कार्य की आशा बहुत ही स्वल्प मात्रा में की जा सकती है।

🔷 वृक्ष बसन्त ऋतु में पल्लव, पुष्प और फलों से सुशोभित होते हैं। मनुष्य अपने यौवन काल में पूर्ण आया के साथ विकसित होता है। वृक्षों को कई बसन्त बार-बार प्राप्त होते हैं, पर मनुष्य का यौवन बसन्त केवल एक बार ही आता है, इसके बाद असमर्थता और निराशा से भरी वृद्धावस्था तत्पश्चात् मृत्यु! जिसने यौवन का सदुपयोग नहीं कर पाया, उसको हाथ मल-मल कर पक्ष ताना ही शेष रह जाता है।

🔶 यौवन सब से बड़ी जिम्मेदारी है। यह ईश्वर की दी हुई सब से बड़ी अमानत है, जिसका समय रहते उसमें से उत्तम उपयोग करना चाहिए। किसी भी देश और जाति का भाग्य उसके नव-युवकों के हाथ रहता है। जिस समाज के युवक जागरुक परायण और देश भक्त हैं, वहीं सामूहिक उन्न्ति हो सकती है। जहाँ के युवकों आलस्य, अकर्मण्यता, स्वार्थ परता और दुर्गुणों की भरमार होगी, वह देश जाति कदापि उन्नति के पथ पर अवसर नहीं हो सकती।

🔷 एक समय जो संसार का मुकुट मणि था, वह भारत आज सब प्रकार दीन-हीन, पतित-पराधीन बना हुआ है। पद-दलित भारत माता अपने सपूतों की ओर सजल नेत्रों से देख रही है और चाहती है, कि उसके ननिहाल अपने तुच्छ स्वार्थों को छोड़कर आगे बढ़ें और अज्ञान, दरिद्र, दुष्ट दुराचार रूपी असुरों को इस पुण्य भूमि से मार भगावें। भारतीय नवयुवक यौवन की जिम्मेदारी को अनुभव करते हुए तुच्छ स्वार्थों को छोड़कर देश सेवा के पथ पर अग्रसर हो इसकी आज ही सबसे बड़ी आवश्यकता है।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1943 पृष्ठ 30

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 1 May 2018


👉 मायावी ज्ञान

🔶 एक गांव में सप्ताह के एक दिन प्रवचन का आयोजन होता था। इसकी व्यवस्था गांव के कुछ प्रबुद्ध लोगों ने करवाई थी ताकि भोले-भाले ग्रामीणों को धर्म का कुछ ज्ञान हो सके। इसके लिए एक दिन एक ज्ञानी पुरुष को बुलाया गया। गांव वाले समय से पहुंच गए। ज्ञानी पुरुष ने पूछा – क्या आपको मालूम है कि मैं क्या कहने जा रहा हूं? गांव वालों ने कहा – नहीं तो…। ज्ञानी पुरुष गुस्से में भरकर बोले – जब आपको पता ही नहीं कि मैं क्या कहने जा रहा हूं तो फिर क्या कहूं। वह नाराज होकर चले गए।

🔷 गांव के सरपंच उनके पास दौड़े हुए पहुंचे और क्षमायाचना करके कहा कि गांव के लोग तो अनपढ़ हैं, वे क्या जानें कि क्या बोलना है। किसी तरह उन्होंने ज्ञानी पुरुष को फिर आने के लिए मना लिया। अगले दिन आकर उन्होंने फिर वही सवाल किया - क्या आपको पता है कि मैं क्या कहने जा रहा हूं? इस बार गांव वाले सतर्क थे। उन्होंने छूटते ही कहा – हां, हमें पता है कि आप क्या कहेंगे। ज्ञानी पुरुष भड़क गए। उन्होंने कहा -जब आपको पता ही है कि मैं क्या कहने वाला हूं तो इसका अर्थ हुआ कि आप सब मुझसे ज्यादा ज्ञानी हैं। फिर मेरी क्या आवश्यकता है? यह कहकर वह चल पड़े।

🔶 गांव वाले दुविधा में पड़ गए कि आखिर उस सज्जन से किस तरह पेश आएं, क्या कहें। उन्हें फिर समझा-बुझाकर लाया गया। इस बार जब उन्होंने वही सवाल किया तो गांव वाले उठकर जाने लगे। ज्ञानी पुरुष ने क्रोध में कहा – अरे, मैं कुछ कहने आया हूं तो आप लोग जा रहे हैं। इस पर कुछ गांव वालों ने हाथ जोड़कर कहा – देखिए, आप परम ज्ञानी हैं। हम गांव वाले मूढ़ और अज्ञानी हैं। हमें आपकी बातें समझ में नहीं आतीं। कृपया अपने अनमोल वचन हम पर व्यर्थ न करें। ज्ञानी पुरुष अकेले खड़े रह गए। उनका घमंड चूर-चूर हो गया।

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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