मंगलवार, 8 मई 2018

👉 गुरुगीता (भाग 103)

👉 गुरूगीता का प्रत्येक अक्षर मंत्रराज है

🔶 गुरूगीता परम दिव्य शास्त्र है। इसका अर्थ एवं इसके शब्द दोनों ही दिव्य हैं। इसके अर्थ में परम गम्भीर एवं गूढ़ तत्त्वज्ञान की झाँकी है। आध्यात्मिक साधना के शिखर अनुभवों की झलक है। इतना ही नहीं, गुरूगीता के अर्थ में ज्ञान, कर्म व भक्ति तथा हठ एवं राजयोग की दुर्लभ साधनाएँ प्रकाशित होती हैं। इनमें से किसी एक साधना विधि का साधन करने वाला आध्यात्मिक जीवन की दुर्लभ, दुर्लभतर एवं दुर्लभतम विभूतियों को पा सकता है। ऐसा कहने का आधार लेखकीय कल्पना नहीं, वरन् शास्त्रों व सन्त जीवन चरित का स्वाध्याय व अध्यात्म पुरूषों के सत्संग का अनुभव है। यह सत्य इतना प्रामाणिक है, जिसे कोई साधक अपने स्वयं के अनुभव में बदल सकता है। कतिपय भाग्यशाली ऐसा कर भी रहे है।

🔷 अर्थ जितनी ही दिव्यता- गुरूगीता के शब्दों और अक्षरों में है। हालाँकि यह सत्यबुद्धि एवं सभी तर्कों से परे है। सच तो यही है कि गुरूगीता के अक्षरों व शब्दों के महत्त्व को जानना, समझना, इसके अर्थ को समझने से ज्यादा दुष्कर व दुरूह है। क्योंकि अर्थ में तो तर्क, दर्शन एवं ज्ञान का संयोजन है। इसे बुद्धि एवं अन्तर्प्रज्ञा से जाना जा सकता है। परन्तु अक्षरों व शब्दों के संयोजन में छुपी हुई दिव्यता को पहचानना केवल श्रद्धासिक्त हृदय से ही सम्भव है। इसी बलबूते पर गुरूगीता की यह मांत्रिक सामर्थ्य प्रकट होती है। गुरूगीता का सम्पूर्ण ग्रन्थ अपने आप में मंत्रशास्त्र है। इसके कई दुर्लभ प्रयोग हैं, जो अलग -अलग ढ़ंग से सिद्ध एवं सम्पन्न किए जाते हैं। इस क्रम में महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि इसे जानने वाले भी विरल एवं दुर्लभ हैं। साधकों एवं सिद्धों के समुदाय में विरल जन ही ऐसे हैं, जो मंत्रमयी गुरूगीता के मंत्रों का प्रयोग करने की सामर्थ्य रखते हैं।

🔶 हालाँकि गुरूगीता में इसके पर्याप्त संकेत मिलते हैं। गुरूगीता के पिछले क्रम में भी कुछ ऐसे ही गूढ़ निर्देशों की चर्चा की गयी है। इसमें भगवान् सदाशिव ने जगन्माता भवानी को बताया है कि हे देवि! गुरूगीता द्वारा उपदेशित मार्ग ही मुक्तिदायक है। लेकिन इन सभी साधनाओं का उपयोग साधक को लोक कल्याण के लिए करना चाहिए, न कि लौकिक कामनाओं को पूरा करने के लिए। जो ज्ञानहीन लोग इन महत्त्वपूर्ण ,दुर्लभ एवं गोपनीय साधनाओं का उपयोग सांसारिक कामों के लिए करते हैं, उन्हें बार- बार भवसागर में गिरना पड़ता है। परन्तु जो ज्ञानी अपनी निष्कामता क साथ इन साधनाओं का उपयोग करते हैं, वे सभी कर्म बन्धनों से मुक्त रहते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 157

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