मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

👉 साधना से साहस

🔷 मित्रो ! साधना का प्रयोजन अपने भीतर की महानता को विकसित करना ही है। बाहर व्यापक क्षेत्र में भी देव शक्तियाँ विद्यमान हैं। पर उनके लिए समष्टि विश्व की देखभाल का विस्तृत कार्य क्षेत्र नियत रहता है। व्यक्ति की भूमिका के अनुरूप प्रतिक्रिया उत्पन्न करने-सफलता और वरदान देने का कार्य उनके वे अंश ही पूरा करते हैं जो बीज रूप में हर व्यक्ति के भीतर विद्यमान है। सूर्य का अंश आँख में मौजूद है। यदि आँखें सही हों तो ही विराट् सूर्य के प्रकाश से लाभ उठाया जा सकता है। अपने कान ठीक हों तो ही बाहर के ध्वनि प्रवाह की कुछ उपयोगिता है। इसी प्रकार अपने भीतर के हेय बीज यदि विकसित परिष्कृत हों तो उनके माध्यम से विश्वव्यापी देवतत्वों के साथ सम्बन्ध जोडऩा आकर्षित करना और उनका सहयोग अनुग्रह प्राप्त कर सकना सम्भव हो सकता है।

🔶 मित्रो! इक्कीसवीं सदी रूपी गंगावतरण को उन भगीरथों की आवश्यकता है, जो सूखे पड़े विशाल क्षेत्र की प्यास बुझाने के लिए राजपाट का व्यामोह छोड़कर तप-साधना का मार्ग अपनाने का असाधारण साहस दिखा सकें।

🔷 जिनका साहस उभरे, उन्हें करना इतना भर है कि अपनी पहुँच से प्रज्ञा पुत्रों को महाकाल की चुनौती से अवगत कराएँ और युग धर्म के परिपालन में वरिष्ठों को क्या करने के लिए बाधित होना पड़ता है, इसका स्वरूप समझाते हुए उन्हें नए सिरे से नई उमंगों का धनी बना सकने की स्थिति उत्पन्न करें। अपना परिवार इतना बड़ा, इतना समर्थ और इतना प्रबुद्ध है कि उस परिवार के लोग ही नव सृजन में जुट सकें, तो असंख्य-अनेक को अपना सहयोगी बनाने में निश्चित रूप से सफल हो सकते हैं। उतने भर से वह गति चक्र घूमने लगेगा जो नया इन्सान बनाने, नया संसार बसाने की युग चेतना को समुचित सहयोग दे सकें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 King Nripendra

🔷 The glory of king Nripendra of Mahismati had spread far and wide like the scattered luminescence of the full moon. The treasury, army, power and beauty-everything was in plentiful abundance. King Nripendra was just and benevolent towards his subjects  who, in turn, held him in great adoration.

🔶 Time passed. Strengths declined. Old age began to creep over and with this gradually increased the king’s inner disquiet and dissatisfaction. He withdrew into a shell of silence and stopped seeing anybody . Restless and sad, the king was always  seen immersed in brooding.

🔷 One day, very early in the morning, the king strolled over the palace garden. Sitting on a quartz rock, and facing east, he was engrossed for long in an inward search for something. Slowly the sun rose over the horizon. Its vibrant rays fell upon the pond and stirred the ‘thousand petalled’ lotus. The flower was soon in full bloom and began spreading its beauty and fragrance all over.

🔶 The divine inner voice spoke: “Can you still not grasp the mystery of the sun’s splendour? From where does its brilliance come? Is not the radiating light the sun’s own inner pulsation? The fragrance of the lotus comes from within. This whole flux of life you see everywhere has sprouted forth from within the cosmic spirit. The source of delight is hidden inside you. You will have to awaken it. For this, you have to orient yourself inward and do jivana sadhana

📖 From Akhand Jyoti

👉 गुरुगीता (भाग 94)

👉 सद्गुरु को तत्त्व से जान लेने का मर्म

🔷 ध्यान से तत्त्वज्ञान के क्रम में माँ भवानी भगवान् सदाशिव से जिज्ञासा करती हैं-
श्री पार्वत्युवाच-

🔶 पिण्डं किंतु महादेव पदं कि समुदाहृतम्। रूपातीतं च रूपं किं एतद् आख्याहि शंकर॥ १२०॥

🔷 श्री पार्वती कहती हैं- पिण्ड क्या है? पद किसे कहते हैं? हे शंकर रूप क्या है और रूपातीत क्या है? यह आप हमें बताएँ।
  
🔶 जगन्माता भवानी की ये जिज्ञासाएँ जीव को तत्त्व बोध कराने वाली हैं। सन्तान की सबसे अधिक चिन्ता माता को होती है। माँ के सिवा अपनी सन्तान की कल्याण कामना भला और कौन करेगा? इसी कल्याण कामना से प्रेरित होकर माता ने जगदीश्वर से ये जिज्ञासाएँ कीं। इन जिज्ञासाओं की गहनता एवं व्यापकता अति विस्तार लिए हुए है। इन कुछ प्रश्नों में अध्यात्म का मूल मर्म है। अध्यात्मज्ञान के जो भी मौलिक सवाल हैं- वे सभी इनमें समाए हुए हैं। इनके हल होने से जीवन की सभी गुत्थियाँ स्वयं ही सुलझ जाती हैं। हालाँकि इनको सही ढंग से समझने के लिए इन सभी प्रश्नों पर एक-एक करके विचार करने की जरूरत है।
  
🔷 इनमें से सबसे पहला सवाल है पिण्ड क्या है? सामान्यतया यह सभी जानते हैं कि पिण्ड देह को कहते हैं। देह की अनुभूति सभी को होती है। विशेषज्ञ इसकी रचना, क्रिया, विकृतियों एवं इसके समाधान को जानते हैं। चिकित्सा विशेषज्ञ वर्षों तक लगातार इसे पढ़ते हैं-इसके बारे में अनुसन्धान करते हैं। हालाँकि इस अथक परिश्रम के बावजूद कबूल करते हैं कि उनके शोध प्रयास अभी अधूरे हैं। इस देह ज्ञान से अलग पिण्ड का तत्त्वज्ञान अलग है। पिण्ड चिकित्सा विज्ञान का शब्द न होकर योग विज्ञान का शब्द है। इसे योग की दृष्टि से ही सोचा और जाना जाना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 142

👉 आज का सद्चिंतन 24 April 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 April 2018

👉 बाँस का पेड़

🔶 एक संत अपने शिष्य के साथ जंगल में जा रहे थे। ढलान पर से गुजरते अचानक शिष्य का पैर फिसला और वह तेजी से नीचे की ओर लुढ़कने लगा। वह खाई में गिरने ही वाला था कि तभी उसके हाथ में बांस का एक पौधा आ गया। उसने बांस के पौधे को मजबूती से पकड़ लिया और वह खाई में गिरने से बच गया।

🔷 बांस धनुष की तरह मुड़ गया लेकिन न तो वह जमीन से उखड़ा और न ही टूटा. वह बांस को मजबूती से पकड़कर लटका रहा। थोड़ी देर बाद उसके गुरू पहुंचे।उन्होंने हाथ का सहारा देकर शिष्य को ऊपर खींच लिया। दोनों अपने रास्ते पर आगे बढ़ चले।

🔶 राह में संत ने शिष्य से कहा- जान बचाने वाले बांस ने तुमसे कुछ कहा, तुमने सुना क्या?  शिष्य ने कहा- नहीं गुरुजी, शायद प्राण संकट में थे इसलिए मैंने ध्यान नहीं दिया और मुझे तो पेड-पौधों की भाषा भी नहीं आती. आप ही बता दीजिए उसका संदेश।

🔷 गुरु मुस्कुराए- खाई में गिरते समय तुमने जिस बांस को पकड़ लिया था, वह पूरी तरह मुड़ गया था।फिर भी उसने तुम्हें सहारा दिया और जान बची ली। संत ने बात आगे बढ़ाई- बांस ने तुम्हारे लिए जो संदेश दिया वह मैं तुम्हें दिखाता हूं।

🔶 गुरू ने रास्ते में खड़े बांस के एक पौधे को खींचा औऱ फिर छोड़ दिया। बांस लचककर अपनी जगह पर वापस लौट गया।

🔷 हमें बांस की इसी लचीलेपन की खूबी को अपनाना चाहिए। तेज हवाएं बांसों के झुरमुट को झकझोर कर उखाड़ने की कोशिश करती हैं लेकिन वह आगे-पीछे डोलता मजबूती से धरती में जमा रहता है।

🔶 बांस ने तुम्हारे लिए यही संदेश भेजा है कि जीवन में जब भी मुश्किल दौर आए तो थोड़ा झुककर विनम्र बन जाना लेकिन टूटना नहीं क्योंकि बुरा दौर निकलते ही पुन: अपनी स्थिति में दोबारा पहुंच सकते हो।

🔷 शिष्य बड़े गौर से सुनता रहा। गुरु ने आगे कहा- बांस न केवल हर तनाव को झेल जाता है बल्कि यह उस तनाव को अपनी शक्ति बना लेता है और दुगनी गति से ऊपर उठता है। बांस ने कहा कि तुम अपने जीवन में इसी तरह लचीले बने रहना।

🔶 गुरू ने शिष्य को कहा- पुत्र पेड़-पौधों की भाषा मुझे भी नहीं आती।

🔷 बेजुबान प्राणी हमें अपने आचरण से बहुत कुछ सिखाते हैं। जरा सोचिए कितनी बड़ी बात है। हमें सीखने के सबसे ज्यादा अवसर उनसे मिलते हैं जो अपने प्रवचन से नहीं बल्कि कर्म से हमें लाख टके की बात सिखाते हैं।

👉 हम नहीं पहचान पाते, तो यह कमी हमारी है।

👉 आदर्शवादिता का पुट घोले रहने की आदत

🔶 हमें अपने आपको एक प्रकाश यंत्र के रूप में, प्रचार तंत्र के रूप में विकसित करना चाहिए। भले ही लेख लिखना, भाषण देना न आये पर सामान्य वार्तालाप में आदर्शवादिता का पुट घोले रहने की आदत डाले रह सकते हैं और इस प्रकार अपने सम्पर्क क्षेत्र में नवनिर्माण विचारधारा के लिए गहरा स्थान बना सकने में सफल हो सकते हैं  इसके लिए न अलग से समय निकालने की आवश्यकता  है, न अतिरिक्त कार्यक्रम बनाने की। साधारण दैनिक वार्तालाप में आदर्शवादी परामर्श एवं प्रेरणा देते रहने की अपनी आदत बनानी पड़ती है और यह परमार्थ प्रयोजन सहज ही, अनायास ही स्वसंचालित रीति से अपना काम करता है।

🔷 यहाँ एक बात ध्यान रखने की है कि किसी व्यक्ति को उसकी गलती सुनना मंजूर नहीं। गलती बताने वाले को अपना अपमानकर्ता समझता है और अपने पूर्वाग्रह को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर उसी का समर्थन करने में अपनी मान रक्षा समझता है। इसलिए जनमानस की अति दु:खद दुर्बलता को हमें ध्यान में रखना होगा और जो बात कहनी है, सीधे आदेश देने या सीधी गलती बताने की अपेक्षा उसे घुमाकर कहना चाहिए। यदि इतनी कुशलता सीख ली गई तो फिर बिना विरोध का सामना किए अपना तीर निशाने पर लगा रहेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (१.५४)

👉 Everything with a little bit of idealism

🔶 We should develop ourselves into devices that illuminate and into systems that disseminate. We may not know how to write articles, we may not be orators. We can, however, infuse our sincere ideals into our day to day conversations, making every interaction a tiny and solid step in the direction of spreading the tenets of our thought revolution movement. No special provisions need to be made for this effort, it is a brilliant yet natural way to be consistently at work via honest, sincere, and inspiring social interactions.

🔷 It is of utmost importance to remember that we do like to be criticized. We are prone to view the criticism as an assault that only propels us into the self-defending pattern of sticking strongly to our position. The best way to get our point across, therefore, is to be mindful that criticism is not an effective vehicle of communicating ideals. The way to successful dissemination of ideals is communication that is compassionate, respectful, and positive.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojna - philosophy, format and program -66 (1.54)

👉 गुरुगीता (भाग 93)

👉 सद्गुरु को तत्त्व से जान लेने का मर्म
🔶 गुरुगीता के महामन्त्रों में भक्ति रहस्य के साथ तत्त्व रहस्य भी समाया है। दृष्टि में यथार्थता आ सके, तो अनुभव होता है कि भक्ति एवं तत्त्व ज्ञान दोनों आपस में गुँथे हैं। साधक के अन्तःकरण में गुरुभक्ति का उदय उसमें आध्यात्मिक प्रकाश की पहली किरण की तरह होता है। गुरुभक्ति की प्रगाढ़ता के साथ साधक की अन्तर्चेतना सूक्ष्म होती जाती है। इसी के साथ उसके अनुभवों की सीमाएँ व्यापक हो जाती हैं। इनके स्तर एवं स्थिति में भी बदलाव आता है। इस प्रक्रिया के क्रमिक रूप में साधक की सत्य एवं तत्त्व की झलक मिलती है। हालाँकि यह सम्पूर्ण आयोजन दीर्घकालीन है; परन्तु भक्ति से तत्त्वज्ञान के परिणाम सुनिश्चित हैं। जो शिष्य-साधक इस डगर पर संकल्पित होकर चल देते हैं- उन्हें अपने जीवन का लक्ष्य मिलना निश्चित हो जाता है।

🔷 गुरुगीता की भक्तिकथा में इस सत्य के कई आयाम प्रकट हो चुके हैं। पिछले मंत्र में ध्यान की नयी प्रक्रिया सुझायी गयी है। इसमें भगवान् सदाशिव के कथन को उजागर करते हुए बताया गया है कि हृदय में चिन्मय आत्मज्योति के अंगुष्ठ मात्र स्वरूप का ध्यान करना चाहिए। इस ध्यान की गहनता एवं प्रगाढ़ता में साधक को अगम-अगोचर ब्रह्मतत्त्व की अनुभूति होती है। जिस तरह से सुगन्धित पदार्थों में स्वाभाविक रूप से सुगन्ध व्याप्त है, उसी तरह से परमात्मा सर्वव्यापी है। अपनी आत्मचेतना में ध्यान करते रहने से कीट-भ्रमर न्याय की भाँति यह जीवात्मा आत्मतत्त्व का अनुभव करते हुए ब्रह्मतत्त्व में विलीन हो जाता है। ध्यान के इस शिखर में साधक को यह अनुभव होता है कि अपने सद्गुरु निराकार स्वरूप ही ब्राह्मी चेतना हैं। जो सद्गुरु को तत्त्व से जान लेता है, वह सही मायने में तत्त्ववेत्ता हो जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 140

👉 Chanakaya

🔶 From the very beginning, Chanakaya constantly strived to make his country, religion and its culture more and more glorious. When Alexender attacked India, he was teaching in Takshashila. He advised Chandragupta, a student of his, to enroll himself in the army of Alexender so as to learn the foreign art of artillery and fighting techniques.
  
🔷 On the other hand Padmanand, the then rules of Magadha was callous and used to torture the hoi polloi. Therefore, Chanakya diplomatically managed to make Chandragupta the King of Magadha. Though Chanakya was a great scholar, he lived in a hut throught his life and remained a celibate. In fact, the whole kingdom was ruled  as per his instructions and guidance. But he never craved for money or formal position. The life of Chanakya was an epitome of discipline and true scholarship.

📖 From Akhand Jyoti

👉 बाद में पछताना नहीं पड़े

🔶 मित्रो ! इन दिनों जागृत आत्माओं की पीठ पर उदबोधनों के चाबुक इसीलिए जमाए जा रहे हैं कि अवसर को टालने के लिए वे वास्तविक,अवास्तविक बहानों की आड़ न लें। समय किसी की प्रतीक्षा करने वाला नहीं है। अवसर चूकने वाले यों सदा ही पछताते हैं, पर यह अलभ्य अवसर ऐसा है जिससे मात्र जागृतात्माओं को ही पछताना पड़ेगा। अनगढ़, प्रसुप्त, अबोध, असमर्थ, अपंग, असहाय तो करुणा के पात्र होने के कारण क्षम्य भी समझे जाते हैं, किंतु समर्थ और प्रखर व्यक्ति जब आपत्तिकाल आने पर भी मुँह छिपाते दुम दबाते हैं तो स्थिति दूसरी ही होती है। युग धर्म के निर्वाह में हर किसी को बाधित नहीं किया जा सकता किंतु जागृत आत्माएँ तो एक प्रकार से अनिवार्य बाधित हैं।
  
🔷 भीतर के महान को जगाना चाहिए और अपने विवेक के सहारे अपने पैरों पर चलने के लिए कटिबद्ध हो जाना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖  सेवा ही पुरुषार्थ पृष्ठ नं-२१

सोमवार, 23 अप्रैल 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 April 2018


👉 आज का सद्चिंतन 23 April 2018


👉 शरीर भगवान का मन्दिर

🔷 मन्दिर को सजाने-सँवारने में भगवान को भुला देना निरी है । किन्तु देवालयों को गन्दा, तिरस्कृत, जीर्ण-शीर्ण रखना भी पाप माना जाता है । इसी प्रकार शरीर को नश्वर कहकर उसकी उपेक्षा करना अथवा उसे ही सजाने-सॅंवारने में सारी शक्ति खर्च कर देना, दोनों ही ढंग अकल्याणकारी हैं हमें सन्तुलन का मार्ग अपनाना चाहिए । शारीरिक आरोग्य के मुख्य आधार आत्म-संयम एवं नियमितता ही हैं, इनकी उपेक्षा करके मात्र औषधियों के सहारे आरोग्य लाभ का प्रयास मृगमरीचिका के अतिरिक्त और कुछ नहीं है ।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (५.५)

👉 The Body – A Temple of God

🔷 In efforts of decorating the temple, neglecting God himself is a gross mistake, and at the same time, keeping temples neglected and shabby is considered a sin. Similarly, neglecting this human body, thinking it as transient, or over indulgence in adorning it - both the approaches are harmful. We have to strike a balance between the two. The basic foundation of sound physical health is self-control and discipline only, hence neglecting them and desiring better health with medicines and tonics is nothing but an illusion, a mirage.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana – The Vision, Structure and the Program – 66 (5.5)

👉 बहुमूल्य जीवन

🔷 मित्रो ! अभागों की दुनियाँ अलग है और सौभाग्यवानों की अलग। अभागे जिस-तिस प्रकार लालच को पोषते, अविवेकी प्रजनन में निरत रहकर कमर तोडऩे वाला बोझ लादते, व्यामोह में तथाकथित अपनों को कुसंस्कारी बनाते, अपव्ययी, असंयमी रहकर दुव्र्यसनों के शिकार बनते, अहंता के परिपोषण में समय बिताते हैं। रोते-कलपते, खीजते-खिजाते, डरते-डराते, छेड़ते-पीटते लोगों के ठट्ठ के ठट्ठ हर गली चौराहों पर खड़े देखे जा सकते हैं। इन्हीं दुर्दशाग्रस्तों की भीड़ में जा घुसना समझदारी कहाँ है?
  
🔶 भगवान किसी को उच्च शिक्षा से वंचित भले ही रखे पर इतनी समझ तो दे कि हित-अनहित में अंतर करना आए। भले ही शूर-वीर योद्धा बनने का श्रेय किसी को न मिले पर इतनी सूझ-बूझ तो रहे कि मनुष्य जीवन बहुमूल्य है और उसे सार्थक बनाने के लिए भीड़ के साथ न चलने और अपना रास्ता आप चुनने जितना विवेक तो चाहिए ही।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग धर्म पृष्ठ नं-८

👉 Lord Jagannath

🔷 It was the time of aarti. The temple of Lord Jagannath was reverberating with the elevating sounds of conch-blowing and bell-ringing. Standing by the side of Garuda-pillar, Mahaprabhu Chaitanya was immersed in singing the glory of God. The gathering of devotees inside was swelling by the moment.

🔶 Fresh arrivals were finding it difficult to get a darshan (view) of the Lord’s image. An oriya woman, having exhausted all the attempts at darshan, climbed the Guruda pillar, planted one leg on the Mahaprabhu could not stand this audacity of the woman and started rebuking her. But the Mahaprabhu stopped him and said: “Why interfere? Let her continue with her darshan. Alas! Had I too possessed  her intense thirst for darshan, I would have been blessed.”

🔷 As soon as Mahaprabhu had spoken these words, the women jumped down and fell at his  feet begging forgiveness. Mahaprabhu withdrew his feet and consoled her: “Arey! What are you doing? It is  I who should bow at your jeet so that I, too, may be filled with the devout longing for the Lord as you are”.

📖 From Akhand Jyoti

👉 गुरुगीता (भाग 92)

👉 सत् चित् आनन्दमयी सद्गुरु की सत्ता

🔷 इस सम्बन्ध में एक अनुभूत कथा है। यह कथा सन्त हरिहर बाबा के एक शिष्य जगतराम की है। यह जगतराम बनारस के पास एक गाँव का अनपढ़-गँवार लड़का था। अपने गाँव में गाय-भैंस आदि जानवर चराया करता था। न जाने किस प्रेरणा से बाबा के पास आ गया। उसके पास इतनी बुद्धि नहीं थी कि उसे कुछ विशेष समझाया जा सके, लेकिन फिर भी उसे भगवान् की भक्ति करने की लगन थी, पर भगवान् को तो वह जानता नहीं था। सो उसने अपने गुरुदेव हरिहर बाबा को ही भगवान् मान लिया था। बस, उसे बाबा की एक बात समझ में न जाने कैसे आ गई थी कि इंसान जो सोचता है, एक दिन वही बन जाता है। इसलिए जो तुम चाहते हो, सो सोचा करो। बड़ी आसान और सहज बात थी, यह मन में जम गई। सरल चित्त जगतराम को तो अपने गुरु में भगवान् को पाना था। उसे गुरुभक्ति में भगवद्भक्ति करनी थी।
  
🔶 बस, इसी लगन के साथ वह अपनी सोच में तल्लीन हो गया। उसे आसन, बन्ध, मुद्राएँ, प्राणायाम एवं ध्यान आदि क्रियाएँ तो आती न थीं। शास्त्र को न तो उसने पढ़ा था और न सुना था। कठिन-कठिन बातें उसे समझ में न आती थीं। बस, एक बात मन में थी, जो चाहिए उसे सोचो। जो सोचोगे, वैसा अपने आप मिलेगा। हरिहर बाबा के इस कथन को उसने अपने जीवन का महामंत्र मान लिया। उसे जब भी समय मिलता, गंगा किनारे बैठकर हरिहर बाबा की छवि का ध्यान करते हुए मन ही मन उनकी पूजा किया करता। मंदिर में पूजा होती उसने देखी थी, बस, वह अपने गुरु की वैसी ही पूजा करता। धूप, दीप, नैवेद्य, आरती सब कुछ मंदिर की भाँति वह मन ही मन करता, लेकिन प्रत्यक्ष में उसके पास न तो कोई साधन होता और न सामान। अपने इस काम में उसे न तो दिन दीखता और न रात।
  
🔷 चिलचिलाती धूप हो या फिर कड़ाके की ठण्ड, सुबह का उजाला हो या शाम का अँधेरा या फिर घनी काली रात, उसे तो बस अपने गुरु की भावपूजा भाती थी। इस पूजा में वह अपने सारे भाव उड़ेल देता। ऐसी पूजा करते हुए कई बरस बीत गये। एक रात जब वह भावपूजा में लीन था, तो उसे ऐसा लगा, जैसे कि हरिहर बाबा सचमुच ही उसके पास आ खड़े हुए हों। बस, इस आ खड़े होने में फरक यह था कि यह उनका प्रकाश शरीर था। उसे ऐसा लग रहा था, जैसे हरिहर बाबा के शरीर के सारे अंग प्रकाश के बने हों। बड़ी भक्ति से वह मन ही मन अपने गुरुदेव को निहारता रहा। इस प्रक्रिया में उसे कितना समय बीता याद नहीं। याद तो उसे तब आई, जब उसे अनुभव हुआ कि गुरुदेव का सम्पूर्ण प्रकाश शरीर एकाएक बिखर कर उसके रोम-रोम में समा गया।
  
🔶 सम्पूर्ण प्रकाश न केवल उसमें लीन हुआ, बल्कि लीन होकर उसके ही अन्दर घनीभूत होने लगा। हृदय स्थल पर वह सम्पूर्ण प्रकाशज्योति के रूप में घनीभूत हो गया। यह सारा वाकया कुछ ही समय में घटित हो गया। हृदय मध्य में अंगुष्ठज्योति प्रकाशित हो उठी और साथ ही सुनाई दी हरिहर बाबा की चिर-परिचित वाणी-‘बेटा जगत! अब से तू ज्योति के बारे में सोचा कर। इसी को निहार, इसी को देख, इसी की भक्ति कर।’ जो आज्ञा बाबा! कहते हुए जगतराम ने अपने कार्यक्रम में थोड़ा फेरबदल कर लिया। स्थिति वही रही, बस सोचने का केन्द्रबिन्दु बदल गया। इस अंगुष्ठज्योति को निहारने में दिन-रात बीतने लगे। सालोंसाल यही क्रिया चलती रही। जाड़ा-गरमी, धूप-छाँव पहले की ही भाँति गुजर गये। उसे होश तब आया, जब फिर से एक रात्रि को दृश्य बदला।
  
🔷 अब की बार उसने अनुभव किया कि उसकी वही हृदयज्योति अचानक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त हो गई। सृष्टि का कण-कण उसी से प्रकाशित है। इस प्रकाश की धाराएँ उसे न जाने कब से कब तक नहलाती रहीं। वह अनूठी भावसमाधि में बेसुध बना रहा। उसके तन, मन, प्राण, भाव, बुद्धि सब प्रकाशित हो गये। जब उसे होश आया, तब उसने देखा कि उसके गुरु हरिहर बाबा खड़े हैं, जो उसे बड़े प्यार से निहार रहे हैं। उनकी आँखों में अपूर्व वात्सल्य था। इसी वात्सल्य से सने स्वरों में वे उससे बोले- ‘बेटा! जो गुरु है—वही आत्मा है, जो आत्मा है—वही परमात्मा है।’ जो इन तीनों को एक मानता है, वही सचमुच का ज्ञानी है। उनकी यह वाणी शिष्यों की धरोहर बन गई।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 138

शनिवार, 21 अप्रैल 2018

👉 टकराव के तीन सिद्धांत

🔶 टकराव का लक्ष्य अन्य व्यक्ति को नीचा दिखाना अथवा व्याकुल करना नहीं है।

🔷 किसी का सामना करना कठिन होता है, क्योंकि कई बार इस का परिणाम यह होता है कि व्यक्ति संताप में डूब जाता है। आप जिस से टकराव कर रहे हैं वह व्यक्ति असहमति प्रकट कर सकता है, विरोध कर सकता है, अथवा यदि वह ईमानदार हो तो क्षमा भी मांग सकता है। परंतु यह संवाद कभी भी इतना सरल एवं सुखद नहीं होता। यह संवाद दो दलों या सरकारों के बीच हो सकता है, या फिर पती-पत्नी, माता-पिता और संतान, दो मित्र या एक प्रबंधक एवं कार्यकर्ता के बीच हो सकता है। कभी कभी सकारात्मक एवं रचनात्मक रूप से आमना सामना करना ही असहमति को दूर करने का एक मात्र मार्ग होता है। किसी से टकराव करना एक प्रकार का संवाद है – एक अवांछनीय संवाद जिस से व्यक्ति अपने को दोषी, लज्जित एवं क्रोधित महसूस कर सकता है। तो लीजिए मैं आप के सामने प्रस्तुत करता हूँ टकराव के तीन अमूल्य सिद्धांत।

🔶 ऊँचे स्वर में बात न करें

🔷 यदि आप किसी भी सकारात्मक परिणाम की आशा कर रहे हैं तो यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि आप चिल्लायें नहीं। इस विषय पर विचार करें – हम किसी का सामना इसलिए करते हैं क्योंकि हम चाहते हैं कि वह हमारी बात सुने तथा अपनी लापरवाही को स्वीकार करे अथवा यह स्वीकार करे कि उस के कारण हमे पीड़ा पहुँची है। इस का एक मात्र मार्ग है कि आप ऊँचे स्वर में बात न करें। क्यों? मानव मन सुखद वार्तालाप करने के लिए स्वाभाविक रूप से उत्सुक है। जब आप धीमे स्वर में बात करेंगे तो हो सकता है कि वे आप से सहमत ना हों, परंतु उनका मस्तिष्क उन्हें आप की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देगा। वार्तालाप करने और विवाद करने में प्राथमिक अंतर स्वर की ध्वनि एवं प्रबलता है। वार्तालाप एवं विवाद दोनों करते समय असहमति हो सकती है परंतु बहस के समय दोनों व्यक्ति केवल स्वयं बात करने में मग्न रहते हैं, दूसरों की सुन ने में नहीं। जब आप किसी पर चिल्लाते हैं, वे तुरंत ही मानसिक रूप से स्वयं को आप से दूर कर देते हैं। उनका मन वार्तालाप को छोड़ विषय से दूर हट जाता है अथवा आत्मरक्षात्मक हो जाता है। परंतु यदि आप सामान्य स्वर में बात करें, हो सकता है कि आप को लगे वे स्थिति की गंभीरता को समझ नहीं पा रहे हैं, किंतु अवश्य ही आप के शब्द उन के मन में घुस जाएंगे। हाँ इस का यह अर्थ नहीं कि वे अपना व्यवहार अवश्य ही बदल देंगे।

🔶 आक्रामक रूप से बात न करें


🔷 याद रखें कि किसी का सामना करने का लक्ष्य यह है कि वह व्यक्ति आप के दृष्टिकोण को समझ सके तथा वह अपना व्यवहार बदले। आक्रामक रूप से बात कर के या उनकी निंदा कर के आप इस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। उन्हें प्रायश्चित करने का अवसर दें। आप यह मान कर चलें कि उन से एक भूल हो गई। फिर वार्तालाप को इस विषय पर केंद्रित रखें कि कैसे उनका व्यवहार आप को या आप दोनों के रिश्ते को हानी पहुँचा रहा है अथवा कैसे यह उनके हित में नहीं है। ऐसा करने पर वह आप की बात और ध्यान से सुनेंगे। किंतु यदि हम उनकी आक्रामक रूप की आलोचना करें, उन्हें दोषी ठहरायें तब हम स्वतः दोनों के बीच एक विशाल बाधा खड़ा कर देते हैं। वे आत्मरक्षात्मक हो जाते हैं तथा अपनी सुरक्षा के लिए प्रत्याक्रमण करते हैं। इस कारण दोनों व्यक्तियों में दूरी और बढ़ जाती है, वे क्रोधित हो जाते हैं और टकराव करने के उद्देश्य की पूर्ती ही नहीं हो पाती।

🔶 विषय से न भटकें

🔷 तीनों सिद्धांतों में यही सबसे कठिन है। कई बार जब हम किसी से टकराव करते हैं वे उस विषय को टालना या उस से दूर रहना चाहते हैं। किसी प्रकार के स्पष्टीकरण, क्षमा याचना या परिणामों से बचने के लिए, वास्तविक मुद्दे से भटकने की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। यदि दोनों व्यक्ति भावनात्मक हो कर विषय से भटकने लगें तो वार्तालाप में किसी प्रकार की संवेदनशीलता बनाए रखना असंभव हो जाता है। शीघ्र ही ऐसा वार्तालाप एक बहस अथवा एक कटुतापूर्ण असहमति बन जाएगा। जब अन्य व्यक्ति विषय से भटकने लगते हैं, तो आप सम रहकर उन्हें बात पूरी कर लेने दें, फिर विनम्रता से वार्तालाप को प्राथमिक विषय पर ले आएं। यदि आप भी विषय से भटकते हैं तो यह केवल एक व्यर्थ वाद विवाद बन कर रह जाएगी जिसका कोई सफल परिणाम नहीं होगा। यह अति आवश्यक है कि आप केवल मुद्दे पर ही केंद्रित रहें तथा संक्षिप्त रूप से बात करें। उदाहरण के लिए, यदि आप किसी से उन के देर से आने के विषय में बात करना चाहते हैं, तो केवल वर्तमान उदाहरण के विषय में ही बात करें। यह ना कहें कि वे सदैव देर से आते हैं, या वे कुशल या सक्षम नहीं हैं।

🔶 याद रखें कि किसी से टकराव करने का उद्देश्य यह है कि आप उस व्यक्ति को यह अहसास दिला सकें कि आप उसके कुछ कार्यों से असहमत हैं तथा उन कार्यों को नापसंद करते हैं। उद्देश्य उन को नीचा दिखाना नहीं है। इसलिए परिणाम इस पर निर्भर है कि आप किन शब्दों का प्रयोग करते हैं, किस स्वर में बात करते हैं, ठीक किस समय बात करते हैं तथा आप के शरीर के हाव-भाव कैसे हैं। किंतु यदि आप को बार बार एक ही विषय पर किसी का सामना करना पड़े, फिर तो उन में परिवर्तन लाने की आशा बहुत कम है, क्योंकि बुद्धिमान के लिए तो संकेत ही पर्याप्त है। यदि वह व्यक्ति स्वयं की भूल को स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं, तो किसी भी प्रकार के संवाद का कोई परिणाम नहीं निकल सकता।

🔷 मुल्ला नसरुद्दीन से उसका गधा उधार लेने के लिए उस का एक मित्र उस के पास आया। “मेरा गधा तो कल रात को ही भाग गया। और अब मुझे वह मिल नहीं रहा है”, मुल्ला ने कहा। संशयपूर्ण ढंग से उसके मित्र ने उसे देखा। मुल्ला ने अविचलित एवं शांत चेहरा बनाए रखा। तभी उसका गधा चिल्लाने लगा। “मुल्ला! तुम्हारे घर से मुझे तुम्हारे गधे की आवाज़ सुनाई दे रही है। तुमने मुझसे झूठ बोला! मैं समझता था कि तुम मेरे सच्चे मित्र हो।” “निस्संदेह! क्या तुम्हे अपने मित्र के शब्दों से अधिक एक गधे की आवाज़ पर विश्वास है।”

🔶 जीवन रंगीन एवं आकर्षक इसलिए है क्योंकि इस में विभिन्न रंग हैं; सभी रंग केवल श्वेत नहीं हो सकते, ना ही केवल लाल या केवल काला। उसी प्रकार सभी संवाद सुखद नहीं हो सकते हैं। व्यावसायिक एवं व्यक्तिगत रिश्तों में सफलता इस पर निर्भर है कि आप अप्रिय संवाद तथा मतभेद से कैसे निपटते हैं।

👉 आज का सद्चिंतन 21 April 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 April 2018


👉 An unhealthy mind

🔶 Mental health or the lack of it can not be observed with the naked eye, we are often quite unaware of it as a result. On a careful and deeper look, though, we will find that our minds are more unhealthy than our bodies. Mental illnesses such as insomnia, memory issues, headaches, mental fogginess and delirium are on a rapid rise. Our lives are getting pushed into a downward spiral due to mental disorders like excessive worrying, fear, despondency, and apathy.

🔷 Emotional disturbances are depriving us of human qualities of joy, happiness, grit, courage, generosity, kindness and compassion. As a result of this deprivation, our human soul is reduced to a subhuman existence, unable to exploit the God-given human possibilities. If only we could cultivate the generous and grand human emotions, we could live an extraordinary life filled with happiness and joy paralleling that of the great souls, even within ordinary circumstances.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana: Darsana, swarupa va karyakrama 66:1.33

👉 मानसिक अस्वस्थता

🔶 मानसिक अस्वस्थता ऑंखों से दिखाई नहीं पड़ती, इसलिए लोग उसके संबंध में प्राय: बेखबर रहते हैं। पर यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए तो शरीर से भी कहीं अधिक रुग्ण एवं दुर्बल मन पाए जायेंगे। अनिद्रा, सिरदर्द, स्मरण शक्ति की कमी, मूढ़ता, उन्माद जैसे मस्तिष्कीय रोगों की तो बाढ़ ही आ रही है। चिंता, भय, निराशा, आवेश, निरुत्साह जैसे मनोविकार अधिकतर लोगों को अपना शिकार बनाए हुए अनेक व्यक्तिगत जीवनों को पतनोन्मुख बनाए हुए हैं।

🔷 भावनात्मक अस्वस्थता के कारण अधिकांश लोग प्रफुल्लता, उल्लास, साहस, पुरुषार्थ, उदारता, वीरता, सहृ्दयता, सज्जनता जैसे मानवोचित गुणों से वंचित हो रहे हैं। फलस्वरूप मनुष्य के शरीर में रहते हुए भी उनकी जीवात्मा पाशविक स्तर का जीवनयापन कर रही है। ईश्वर प्रदत्त महान महत्ताओं से वह तनिक भी लाभ नहीं उठा पाती है। काश, मनुष्य की भावनाएँ उद्दात्त एवं उत्कृष्ट रही होतीं तो सामान्य परिस्थितियों और सामान्य साधनों के रहते हुए भी उसने महापूरुषों जैसा, नर-रत्नों जैसा प्रकाश एवं आनंदमय जीवन जिया होता।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (३.१६)

👉 Poet Kalidas

🔶 In the course of their stroll in the royal gardens, king Vikramaditya suddenly remarked to the great poet Kalidas: “How creative and talented  you are! You are a litterateur par excellence. I wish God had given you a matching and handsome body”. The satire was not lost on the wise Kalidas. He did not say anything at that time. On return to the palace, he ordered for two pots, one of clay and the other of gold. Both were filled with water.

🔷 After some time, Kalidas asked the king. “Now tell us, which of the two waters is cooler”? “That of the clay pot”, replied Vikramaditya. A smiling Kalidas then said: “Just as coolness does not depend on the pot’s outer shell; even so, talent too is unrelated to the physical appearance of the body. O King! One should look at the inner qualities, not the external beauty. It is the beauty of the soul that is supreme. Learning and greatness are linked with the soul, not the body.

🔶 Happiness always looks small while you hold it in your hands, but let it go, and you learn at once how big and precious it is.

📖 From Akhand Jyoti

👉 गुरुगीता (भाग 91)

👉 सत् चित् आनन्दमयी सद्गुरु की सत्ता

🔶 ध्यान की यह अवधि एवं प्रक्रिया क्या हो, भगवान् महेश्वर अगले प्रकरण में स्पष्ट करते हैं-

अंगुष्ठमात्रपुरुषं ध्यायतश्चिन्मयं हृदि। तत्र स्फुरति भावो यः शृणु तं कथयाम्यहम्॥ ११५
अगोचरं तथाऽगम्यं नामरूपविवर्जितम्। निःशब्दं तद्विजानीयात् स्वभावं ब्रह्म पार्वति॥ ११६॥
यथा गंधः स्वभावेन कर्पूरकुसुमादिषु। शीतोष्णादिस्वभावेन तथा ब्रह्म च शाश्वतम्॥ ११७॥
स्वयं तथाविधो भूत्वा स्थातव्यं यत्र कुत्रचित्। कीटभ्रमरवत् तत्र ध्यानं भवति तादृशम्॥ ११८॥
गुरुध्यानं तथा कृत्वा स्वयं ब्रह्ममयो भवेत्। पिण्डे पदे तथा रूपे मुक्तोऽसौ नात्र संशयः॥ ११९॥

🔷 हृदय में चिन्मय आत्मज्योति के अंगुष्ठ मात्र स्वरूप का ध्यान करना चाहिए। इस ध्यान की गहनता, सघनता व प्रगाढ़ता से जो भाव स्फुरित होते हैं, उन्हें सुनो॥ ११५॥ भगवान् शिव कहते हैं-हे पार्वती! इन्द्रियों से परे, सब भाँति अगम्य, नाम-रूप आदि विशेषताओं से परे, शब्द से रहित ब्रह्म का अनुभव अपने ही स्वरूप में होता है॥ ११६॥ जिस तरह से कर्पूर एवं पुष्प आदि सुगन्धित पदार्थों में स्वाभाविक ही सुगन्ध व्याप्त है। जिस भाँति सर्दी एवं गर्मी स्वाभाविक है, उसी भाँति ब्रह्म शाश्वत है॥ ११७॥ अपनी आत्मचेतना में ध्यान करते रहने से कीट-भ्रमर सान्निध्य की भाँति यह जीवात्मा ब्रह्म के ध्यान से स्वयं ब्रह्म हो जाता है॥ ११८॥ यह ब्रह्म का ध्यान यथार्थ में गुरु का ध्यान ही है। शिष्य अपने चित्त में गुरु का ध्यान करने से, गुरु की निराकार ज्योति का ध्यान करते रहने से सर्वथा मुक्त एवं ब्रह्ममय हो जाता है॥ ११९॥

🔶 गुरुगीता में बताई ध्यान की विधियों में यह विधि अनूठी है। इसमें कहा गया है कि सद्गुरु का ध्यान हृदय में करो और उसे अंगुष्ठ मात्र चिन्मयज्योति के रूप में अनुभव करो। ऐसा करने से स्वयं ही ब्रह्मानुभूति हो जायेगी। ध्यान के इस उपदेश में एक विलक्षणता है और वह विलक्षणता यह है कि हृदय में भावमय भगवान् के सगुण रूप का ध्यान करते हैं। निराकार यह ज्योतिर्ध्यान आज्ञाचक्र या भू्र-मध्य में किया जाता है; परन्तु यहाँ अंगुष्ठ मात्र ज्योति पुरुष का ध्यान हृदय में करने का निर्देश है। इस निर्देश में कई संकेत निहित हैं। इन संकेतों पर ध्यान दें, तो पता चलता है कि जीवात्मा-परमात्मा एवं सद्गुुरु की चेतना तात्विक रूप से एक ही है। यदि कोई साधक हृदयस्थल में इस अंगुष्ठ मात्र ज्योति का ध्यान करता है, तो स्वयं ही सद्गुरु की भगवत्ता की उपलब्धि कर लेता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 137

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2018

👉 हमेशा अच्छा करो

🔷 एक औरत अपने परिवार के सदस्यों के लिए रोज़ाना भोजन पकाती थी और एक रोटी वह वहाँ से गुजरने वाले किसी भी भूखे के लिए पकाती थी..। वह उस रोटी को खिड़की के सहारे रख दिया करती थी, जिसे कोई भी ले सकता था..।

🔶 एक कुबड़ा व्यक्ति रोज़ उस रोटी को ले जाता और बजाय धन्यवाद देने के अपने रस्ते पर चलता हुआ वह कुछ इस तरह बड़बड़ाता- "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा..।"

🔷 दिन गुजरते गए और ये सिलसिला चलता रहा.. वो कुबड़ा रोज रोटी लेके जाता रहा और इन्ही शब्दों को बड़बड़ाता - "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा.।"

🔶 वह औरत उसकी इस हरकत से तंग आ गयी और मन ही मन खुद से कहने लगी की-"कितना अजीब व्यक्ति है,एक शब्द धन्यवाद का तो देता नहीं है, और न जाने क्या-क्या बड़बड़ाता रहता है, मतलब क्या है इसका.।"

🔷 एक दिन क्रोधित होकर उसने एक निर्णय लिया और बोली-"मैं इस कुबड़े से निजात पाकर रहूंगी।"

🔶 और उसने क्या किया कि उसने उस रोटी में ज़हर मिला दिया जो वो रोज़ उसके लिए बनाती थी, और जैसे ही उसने रोटी को को खिड़की पर रखने कि कोशिश की, कि अचानक उसके हाथ कांपने लगे और रुक गये और वह बोली- "हे भगवन, मैं ये क्या करने जा रही थी.?" और उसने तुरंत उस रोटी को चूल्हे कि आँच में जला दिया..। एक ताज़ा रोटी बनायीं और खिड़की के सहारे रख दी..।

🔷 हर रोज़ कि तरह वह कुबड़ा आया और रोटी ले के: "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा, और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा" बड़बड़ाता हुआ चला गया..। इस बात से बिलकुल बेख़बर कि उस महिला के दिमाग में क्या चल रहा है..।

🔶 हर रोज़ जब वह महिला खिड़की पर रोटी रखती थी तो वह भगवान से अपने पुत्र कि सलामती और अच्छी सेहत और घर वापसी के लिए प्रार्थना करती थी, जो कि अपने सुन्दर भविष्य के निर्माण के लिए कहीं बाहर गया हुआ था..। महीनों से उसकी कोई ख़बर नहीं थी..।

🔷 ठीक उसी शाम को उसके दरवाज़े पर एक दस्तक होती है.. वह दरवाजा खोलती है और भोंचक्की रह जाती है.. अपने बेटे को अपने सामने खड़ा देखती है..। वह पतला और दुबला हो गया था.. उसके कपडे फटे हुए थे और वह भूखा भी था, भूख से वह कमज़ोर हो गया था..।

🔶 जैसे ही उसने अपनी माँ को देखा, उसने कहा- "माँ, यह एक चमत्कार है कि मैं यहाँ हूँ.. आज जब मैं घर से एक मील दूर था, मैं इतना भूखा था कि मैं गिर गया.. मैं मर गया होता..।

🔷 लेकिन तभी एक कुबड़ा वहां से गुज़र रहा था.. उसकी नज़र मुझ पर पड़ी और उसने मुझे अपनी गोद में उठा लिया.. भूख के मरे मेरे प्राण निकल रहे थे.. मैंने उससे खाने को कुछ माँगा.. उसने नि:संकोच अपनी रोटी मुझे यह कह कर दे दी कि- "मैं हर रोज़ यही खाता हूँ, लेकिन आज मुझसे ज़्यादा जरुरत इसकी तुम्हें है.. सो ये लो और अपनी भूख को तृप्त करो.।"

🔶 जैसे ही माँ ने उसकी बात सुनी, माँ का चेहरा पीला पड़ गया और अपने आप को सँभालने के लिए उसने दरवाज़े का सहारा लीया..। उसके मस्तिष्क में वह बात घुमने लगी कि कैसे उसने सुबह रोटी में जहर मिलाया था, अगर उसने वह रोटी आग में जला के नष्ट नहीं की होती तो उसका बेटा उस रोटी को खा लेता और अंजाम होता उसकी मौत..?

🔷 और इसके बाद उसे उन शब्दों का मतलब बिलकुल स्पष्ट हो चूका था-
जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा,और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा।।

" निष्कर्ष "
🔶 हमेशा अच्छा करो और अच्छा करने से अपने आप को कभी मत रोको, फिर चाहे उसके लिए उस समय आपकी सराहना या प्रशंसा हो या ना हो..।

👉 आज का सद्चिंतन 20 April 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 April 2018


👉 सृजन के लिए साहस

🔷 मित्रो ! इमारतों का सृजन सीधा-सादा सा होता है। पुल, सड़कों बाँधों का निर्माण निर्धारित नक्शे के आधार पर चलता रहता है। पर युगों के नव सृजन में अनेकानेक पेचीदगियाँ और कठिनाइयाँ आ उड़ेली हैं। कार्य का स्वरूप ही ऐसा है, जिसमें प्रवाह के उलटने के प्रयास, जूझने की विद्या ही प्रमुख बन जाती है। विचारक्रांति, युग परिवर्तन, जनमानस का परिष्कार ऐसे संकल्प हैं, जिनकी पूर्ति में प्राय:उन सभी से टकराना पड़ता है, जो अब तक स्वजन, संबंधी, हितैषी, निकटर्वी एवं अपने प्रभाव क्षेत्र के अंतर्गत माने जाते थे। इसमें मार-काट न होने पर भी इसे भूतकाल में संपन्न हुए महाभारत के समतुल्य माना जा सकता है, भले ही उस टकराहट को दृश्य रूप में न देखा जा सकता हो।
  
🔶 आज अभिमन्यु जैसा साहस उन्हें भी अर्जित करना पड़ेगा, जो अवांछनीयता, मूढ़-मान्यता, लोभ-लिप्सा, संकीर्ण स्वार्थपरता और निकृष्ठता के व्यामोह को चीरकर नवसृजन का मार्ग बनाना चाहें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Trained camel

🔷 There was a well trained camel. At the time of a festival, the camelman used to load the kettledrum on camel’s back and moved forward playing it. On becoming older and thus worthless, the camel was left free. Since he belonged to king, nobody used to beat him.   

🔶 One day the camel started eating the drying grains of an old who tried to dispel him by the sound of a winnowing basket. The camel said, “For the whole life I have been hearing the clatter of a kettledrum. I can not be horrified by a winnowing basket.”

🔷 The values learnt in ones life don’t fade away in old  age too. A changeover can be attained only by thinking of rising beyond these.

📖 From Akhand Jyoti

👉 हमारी भुजा बन जाओ

🔷 मित्रो ! हमारी एक ही महत्त्वाकांक्षा है कि हम सहस्रभुजा वाले सहस्रशीर्षा पुरुष बनना चाहते हैं। तुम सब हमारी भुजा बन जाओ, हमारे अंग बन जाओ, यह हमारी मन की बात है। गुरु- शिष्य एक- दूसरे से अपने मन की बात कहकर हल्के हो जाते हैं। हमने अपने मन की बात तुमसे कह दी। अब तुम पर निर्भर है कि तुम कितना हमारे बनते हो? पति- पत्नी की तरह, गुरु व शिष्य की आत्मा में भी परस्पर ब्याह होता है, दोनों एक- दूसरे से घुल- मिलकर एक हो जाते हैं। समर्पण का अर्थ है- दो का अस्तित्व मिटाकर एक हो जाना।

🔶 तुम भी अपना अस्तित्व मिटाकर हमारे साथ मिला दो व अपनी क्षुद्र महत्त्वाकांक्षाओं को हमारी अनन्त आध्यात्मिक महत्त्वाकांक्षाओं  में विलीन कर दो। जिसका अहं जिन्दा है, वह वेश्या है। जिसका अहं मिट गया, वह पवित्रता है। देखना है कि हमारी भुजा, आँख, मस्तिष्क बनने के लिए तुम कितना अपने अहं को गला पाते हो? इसके लिए निरहंकारी बनो। स्वाभिमानी तो होना चाहिए, पर निरहंकारी बनकर। निरहंकारी का प्रथम चिह्न है वाणी की मिठास।

🔷 वाणी व्यक्तित्व का हथियार है। सामने वाले पर वार करना हो तो तलवार नहीं, कलाई नहीं, हिम्मत की पूछ होती है। हिम्मत न हो तो हाथ में तलवार भी हो, तो बेकार है। यदि वाणी सही है तो तुम्हारा व्यक्तित्व जीवन्त हो जाएगा, बोलने लगेगा व सामने वाले को अपना बना लेगा। अपनी विनम्रता, दूसरों का सम्मान व बोलने में मिठास, यही व्यक्तित्व के प्रमुख हथियार हैं। इनका सही उपयोग करोगे तो व्यक्तित्व वजनदार बनेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 वाङमय- नं 68 पेज 1.14

👉 गुरुगीता (भाग 90)

👉 सत् चित् आनन्दमयी सद्गुरु की सत्ता

🔶 गुरुगीता के महामंत्रों की साधना से सद्गुरु की चेतना शिष्य में अवतरित होती है। इस आध्यात्मिक अवतरण से शिष्य का जीवन परिष्कृत, परिमार्जित, परिवर्तित एवं रूपान्तरित हो जाता है। यह कुछ ऐसा है, जिसे महान् चमत्कार से कम न तो कुछ कहा जा सकता है और न आँका जा सकता है; लेकिन इसके लिए जरूरी है उस प्रक्रिया से गुजरना, जिसे गुरुगीता के महामंत्र कहते हैं, बताते हैं। जो उपदेश, जो भाव, जो सत्य और जो क्रियाएँ इन महिमामय मंत्रों में निहित हैं, शिष्य को ऐसा ही करना चाहिए। जो शिष्य अपने अंतस् को सद्गुरु के चरणों में समर्पित करता है, उसे अपने आप ही सभी आध्यात्मिक तत्त्वों की उपलब्धि हो जाती है। गुरुदेव ही जड़-पदार्थ हैं और वही परात्पर चेतना। यह उन सभी को अनुभव होता है, जो उन्हें ध्याते हैं।
  
🔷 गुरुगीता की पिछली पंक्तियों में इस सच्चाई के कई सूक्ष्म आयाम प्रकट किये जा चुके हैं। इसमें भगवान् भोलेनाथ बताते हैं कि ब्रह्मा से लेकर सामान्य तिनके तक सभी जड़-चेतन में परमात्मा-व्याप्त है। सद्गुरु परमात्मामय होने के कारण ‘सर्वव्यापी’ हैं। शिष्य को चाहिए कि वह अपने सद्गुरु को सत्-चित्-आनन्दमय जाने। इस अनुभूति के रूप में वह नित्य, पूर्ण, निराकार, निर्गुण व आत्मस्थित गुरुतत्त्व की वन्दना करे। श्री गुरुदेव के शुद्ध स्वरूप का हृदयाकाश के मध्य में ध्यान करे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 136

👉 Good nature doesn’t cost anything

🔶 Selfless and generous individuals are often tricked by cunning people and as a result, they may usually seem to be at disadvantage. On the other hand, many people—influenced by their generosity—offer them so much help and support that the disadvantage of being tricked by cunning people more or less gets eclipsed by the advantage of reaping help and support from many people. All in all, selfless and generous individuals are always at advantage.

🔷 In the same way, selfish people may not bother to help others and in doing so, they may avoid losing anything. However, their selfish nature discourages other people from offering help, thus depriving them of that crucial advantage. To put in a nutshell, mean and selfish individuals would generally suffer greater loss than generous and good-natured individuals.

🔶 Corrupt traders who follow double-standards are never seen prospering. Selfish, egoistical and bad-mannered people who expect others to be good to them and help them are actually behaving in the same way as the corrupt traders having double-standards. Such behavior can never ever lead to progress and happiness in life.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana: Darshan, swaroop va karyakram 66:5.17

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

👉 भगवान का जवाब

🔶 ये कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है जो एक Busniss man था लेकिन उसका business डूब गया और वो पूरी तरह hopeless हो गया। अपनी life से बुरी तरह थक चुका था। अपनी life से frustrate होकर वो suicide करना चाहता था।

🔷 एक दिन परेशान होकर वो जंगल में गया और जंगल में काफी देर अकेले बैठा रहा। कुछ सोचकर भगवान से बोला – मैं हार चुका हूँ, मुझे कोई एक वजह बताइये कि मैं क्यों ना हताश होऊं, मेरा सब कुछ खत्म हो चुका है। मैं क्यों ना frustrate होऊं? Please help me God……………………..

🔶 भगवान का जवाब तुम जंगल में इस घास और बांस के पेड़ को देखो- जब मैंने घास और इस बांस के बीज को लगाया। मैंने इन दोनों की ही बहुत अच्छे से देखभाल की। इनको बराबर पानी दिया, बराबर Light दी।

🔷 घास बहुत जल्दी बड़ी होने लगी और इसने धरती को हरा भरा कर दिया लेकिन बांस का बीज बड़ा नहीं हुआ। लेकिन मैंने बांस के लिए अपनी हिम्मत नहीं हारी।

🔶 दूसरी साल, घास और घनी हो गयी उसपर झाड़ियाँ भी आने लगी लेकिन बांस के बीज में कोई growth नहीं हुई। लेकिन मैंने फिर भी बांस के बीज के लिए हिम्मत नहीं हारी।
तीसरी साल भी बांस के बीज में कोई वृद्धि नहीं हुई, लेकिन मित्र मैंने फिर भी हिम्मत नहीं हारी।

🔷 चौथे साल भी बांस के बीज में कोई growth नहीं हुई लेकिन मैं फिर भी लगा रहा। पांच साल बाद, उस बांस के बीज से एक छोटा सा पौधा अंकुरित हुआ……….. घास की तुलना में ये बहुत छोटा था और कमजोर था लेकिन केवल 6 महीने बाद ये छोटा सा पौधा 100 फ़ीट लम्बा हो गया।

🔶 मैंने इस बांस की जड़ को grow करने के लिए पांच साल का समय लगाया। इन पांच सालों में इसकी जड़ इतनी मजबूत हो गयी कि 100 फिट से ऊँचे बांस को संभाल सके। जब भी तुम्हें life में struggle करना पड़े तो समझिए कि आपकी जड़ मजबूत हो रही है। आपका संघर्ष आपको मजबूत बना रहा है जिससे कि आप आने कल को सबसे बेहतरीन बना सको।

🔷 मैंने बांस पर हार नहीं मानी, मैंने तुम पर भी हार नहीं मानूंगा, किसी दूसरे से अपनी तुलना(comparison) मत करो घास और बांस दोनों के बड़े होने का time अलग अलग है दोनों का उद्देश्य अलग अलग है।

🔶 तुम्हारा भी समय आएगा। तुम भी एक दिन बांस के पेड़ की तरह आसमान छुओगे। मैंने हिम्मत नहीं हारी, तुम भी मत हारो……………………..

🔷 Dear friends, अपनी life में struggle से मत घबराओ, यही संघर्ष हमारी सफलता की जड़ों को मजबूत करेगा। लगे रहिये, आज नहीं तो कल आपका भी दिन आएगा। यही इस कहानी की शिक्षा है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 April 2018


👉 आज का सद्चिंतन 19 April 2018


👉 आस्तिकता

🔶 मित्रो ! आस्तिकता सच्ची शक्ति, सच्चा जीवन तथा सच्चा धर्म है। रामायण में श्रद्घा को भवानी और शिव को विश्वास की उपमा दी है और कहा है कि इन दोनों के बिना हृदय में विराजमान होते हुए भी इष्ट देव का दर्शन, अनुग्रह नहीं होता। इससे प्रकट है कि जितनी किसी देवता या मंत्र में शक्ति है उसकी तुलना में सघन श्रद्घा किसी प्रकार कम नहीं पड़ती। किसी कार्य की गरिमा के प्रति श्रद्घा रखते हुए सच्चे मन और पूरे परिश्रम के साथ जुट जाना सफलता का सुनिश्चित पथ प्रशस्त करना है।

🔷 शरीर में सत्कर्म, मन में सद्विचार और अन्त:करण में सदभाव की प्रेरक शक्ति को गायत्री कह सकते हैं। कुंडलिनी आद्यशक्ति है। कुशल गुरु के मार्गदर्शन में संभव हुए उसके उत्थान से ईश्वर दर्शन, आत्मबल जैसी जिज्ञासाएँ तो शांत होती ही हैं; शरीर, मन, प्राण और भावनाओं में ऐसे उच्चस्तरीय परिवर्तन होते हैं कि व्यक्ति साधारण न रहकर असाधारण स्तर का बन जाता है। वह नाना प्रकार की सिद्घियों और विभूतियों का स्वामी हो जाता है। उसकी बात लोग ध्यान से सुनते हैं। उसकी वाड़ी में ओज और चेहरे पर तेज आ जाता है। उसके हर कार्य में सुन्दरता और सुव्यवस्था झलकने लगती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Refinement of human nature and feelings

🔷 A feeling of togetherness and a sense of being close and connected to each other (as if belonging to the same family) will make individuals think about and help each other in every possible way. These days, my mind (is in a similar mood and) is passionately yearning to shape the character of all my spiritual kith and kin in such a glorious way that anyone who happens to see that character makeover will really get amazed and also get convinced that the Yug Nirman Yojana (i.e. Gayatri Pariwar’s mega-plan of creating a new era of bright future for all) is not a flight of fancy but a very simple and totally workable method which is neither difficult nor impossible to adopt and apply far and wide.

🔶 There is a widespread popular belief that the nature of every individual is firmly established right from birth and cannot be changed or remodeled afterwards. I wish to prove this wrong. I wish to transform the nature of my kith and kin. I’m about to start that process of extraordinary transformation in my spiritual laboratory. Physical science is bringing about so many amazing transformations in the material world. Knowledge too can definitely be hoped to bring about promising transformation in man’s inner world, i.e. his nature!

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana: Darshan, swaroop va karyakram 66:3.46

👉 Diksha

🔶 Impressed by the renunciation of a saint, a king, too, recieved diksha (spiritual initiation) from him. Many thousands had already been initiated by the saint. Seeing their king, too, among the initiates, the subjects went to him and said: “ Great king, now you are our Gurubhai; so do not damand tax from us”. Caught on the horns of a dilemma, the king remitted their tax dues. Consequently, the trasury began to deplete fast. The whole system went into disorder. People stopped doing any work and started living off the stored money.The king was very  perturbed at this situation and sought his guru’s adivice.
 
🔷 The guru after hearing the full details said: “If the spirit of diksa is not implemented in actual conduct, it remains meaningless. Besides being an initiated disciple, you should also be a pragmatic king. Those whom you consider your gurubhais are all lazy shirkers. You must run your administration in accordance with the rules and regulations of your regime, otherwise you, too, will be a sinner like them and also be guilty of the impending anarchy”. The king began to rule sternly. The new order with well oiled coordination  soon put the wheels of administration back on the rails.

📖 From Akhand Jyoti

👉 गुरुगीता (भाग 89)

👉 गुरुभक्ति ही साधना, वही है सिद्धि

🔷 इस प्रसंग में एक बड़ी प्यारी कथा है। यह कथा उत्तर भारत के सुविख्यात सन्त बाबा नीम करौरी व उनके विदेशी शिष्य रिचर्ड के बारे में है। इन रिचर्ड को बाबा ने अपने शिष्य के रूप में अपनाया था और नाम दिया था रामदास। इन रामदास में अपने गुरु के प्रति भक्ति तो थी, किन्तु साथ कहीं सिद्धि-शक्ति की आकाक्षा भी छुपी थी। एक बार वह एक स्वामी जी के साथ दक्षिण भारत की यात्रा कर रहे थे। बातों ही बातों में उन्होंने अपनी सिद्धि-शक्ति की चाहत के बारे में स्वामी जी को बताया। स्वामी जी ने उन्हें एक शक्तिशाली शिव मंत्र की दीक्षा दी और बताया कि इस मंत्र का जाप करने से वह अपार सम्पत्ति व शक्ति का स्वामी हो जायेगा। रामदास को शक्ति लोभ तो था ही सो वह लगातार कई हफ्ते तक मंत्र का जाप करते रहे। इस मंत्र जाप के प्रभाव से शरीर के बाहर होने व सूक्ष्म शरीर से भ्रमण करने की शक्ति मिल गयी।
  
🔶 बस फिर क्या था रामदास का कौतुकी मन जाग उठा और सूक्ष्म शरीर से निकल कर भ्रमण करने लगे। इसमें उन्हें आनन्द आने लगा। इस क्रम में उनकी यात्रा अन्य सूक्ष्म लोक-लोकान्तरों में भी होने लगी। एक बार जब वह अपनी इस प्रक्रिया के दौरान किसी अन्य लोक में पहुँचे, तो वहाँ उन्हें अपने सद्गुरु बाबा नीम करौरी दिखाई दिये। रामदास को अचरज भी हुआ और हर्ष भी। वे हर्षोन्माद में बाबा नीम करौरी की ओर दौड़ पड़े। बाबा उस समय अपने तख्त पर एक कम्बल ओढ़े बैठे थे। उनके आने पर उन्होंने कम्बल से अपना मुँह ढक लिया और तीन बार ऐसी फूँक मारी जैसे कि कोई मोमबत्ती बुझा रहे हों। उनकी इस फूँक से रामदास को महसूस हुआ कि जैसे हर फूँक के साथ उनका शरीर फूलता जा रहा है, मानो उनकी किसी आन्तरिक नली में हवा भरी जा रही हो। तीसरी बार की फूँक के बाद रामदास ने स्वयं को अपने स्थूल शरीर में पाया और वह अपने उसी स्थान पर थे, जहाँ उनकी नियमित साधना हो रही थी। लेकिन इस समूची प्रक्रिया में एक अचरज घटित हुआ कि दक्षिण भारत की यात्रा में स्वामी जी ने उन्हें जो मंत्र दिया था, उसकी शक्ति समाप्त हो गयी थी। यही नहीं उनके मन में उस मंत्र के जपने की इच्छा भी मर गयी थी।
  
🔷 इस .... तमाशे से उनके मन में थोड़ी उलझन भी पैदा हुई और वह इस उलझन को सुलझाने के लिए अपने गुरुदेव बाबा नीम करौरी के पास गये। उन्हें आते हुए देखकर बाबा हँस पड़े और बोले-चल बता कैसी चल रही है तेरी साधना और कैसा है तू? उनके पूछने से कुछ ऐसा लग रहा था, जैसे वे कुछ भी जानते ही न हों। हालाँकि रामदास को मालूम था कि अन्तर्यामी गुरुदेव को सब कुछ ज्ञात है। फिर भी उन्होंने स्वामी जी के मंत्र की कथा, अपनी साधना और सूक्ष्म भ्रमण के अपने अनुभव के बारे में उन्हें ब्योरेवार बताया। साथ ही यह भी बताया कि किस तरह गुरुदेव बाबा नीम करौरी ने उनकी सारी शक्ति समाप्त कर दी।
  
🔶 रामदास के इस कथन पर बाबा बोले-बेटा! शिष्य तो बच्चा होता है, उसकी अनेकों चाहतें भी होती हैं और  ये जो चाहते हैं—वह कभी ठीक होती हैं, तो कभी निरी बचकानी। गुरु को इन सब पर ध्यान रखना पड़ता है कि कहीं उसका शिष्य भटक न जाये। कहीं उसे कोई नुकसान न हो। तुम्हारे साथ जो हुआ, वह तुम्हें नुकसान से बचाने के लिए हुआ। तुम्हारी साधना अभी कच्ची है। तुम्हारे सूक्ष्म शरीर में भी अभी पर्याप्त ऊर्जा नहीं है। ऐसी स्थिति में सूक्ष्म शरीर से भ्रमण करने पर अन्य लोकों के निवासी तुम्हें नुकसान पहुँचा सकते हैं। यहाँ तक कि तुम्हें अपने यहाँ कैदकर सकते हैं। ऐसी स्थिति आने पर तुम्हारे सूक्ष्म शरीर का सम्बन्ध स्थूल शरीर से टूट जायेगा और न केवल तुम्हारी मृत्यु हो जायेगी, बल्कि तुम्हारी तप-साधना भी अधूरी रह जायेगी। तुम्हारे साथ मैंने जो कुछ भी किया, वह तुम्हें इसी अप्रत्याशित स्थिति से बचाने के लिए किया। अपने सद्गुरु की इस कृपा को अनुभूत करके रामदास की आँखें छलक आयीं। सचमुच ही सद्गुरु के बिना भला और कौन सहारा है। इसलिए गुरुगीता के प्रत्येक  मंत्र का सार यही है कि शिष्य को सतत अपने गुरुदेव का ध्यान व स्मरण करते रहना चाहिए। इस क्रम में ध्यान की अन्य विधियाँ भी हैं, जिसकी चर्चा अगले मंत्र में की गई है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 134

मंगलवार, 17 अप्रैल 2018

👉 उसे देख लिया

🔷 रज्‍जब मुसलमान थे। पठान थे। किसी युवती के प्रेम में थे। विवाह का दिन आ गया। बारात सजी। बारात चली। रज्‍जब घोड़े पर सवार। मौर बाँधा हुआ सिर पर। बाराती साथ है, बैंड बाजा है इत्र का छिड़काव है, फूलों की मालाएँ है। और बीच बाजार में अपनी ससुराल के करीब पहुंचने को ही थे। दस पाँच कदम शेष‍ रह गये थे। प्रेयसी से मिलने जा रहे था। प्रेम तो तैयार था, जरा सा रूख बदलने भर की बात थी।

🔶 यह मौका ठीका मौका है। लोहा जब गर्म हो तब चोट करनी चाहिए। एक तरह से देखो तो यह मौका एक दम ठीक था कि अचानक घोड़े के पास एक आदमी आया उसका पहनाव बड़ा अजीब था। कोई फक्‍कड़ दिखाई दे रहा था। बारात के सामने आ कर खड़ा हो गया। और उसने गौर से रज्‍जब को देखा। आँख से आँख मिली। वे चार आंखें संयुक्‍त हो गयी। उस क्षण में क्रांति घटी।

🔷 वह आदमी रज्‍जब के होने वाला गुरु थे—-- और जो कहा दादू दयाल जी ने वे शब्‍द बड़े अद्भुत है। उन छोटे से शब्‍दों में सारी क्रांति छिपी है।

🔶 दादू दयाल ने भर आँख रज्‍जब की तरफ देखा, आँख मिली ओर दादू जी ने कहा—

रज्‍जब तैं गज्‍जब किया, सिर पर बांधा मौर।
आया था हरी भजन कुं, करे नरक की ठौर

🔷 बस इतनी सी बात। देर न लगी, रज्‍जब घोड़े से नीचे कूद पड़ा, मौर उतार कर फेंक दिया, दादू के पैर पकड़ लिए। और कहा कि चेता दिया समय पर चेता दिया....और सदा के लिए दादू के हो गये छाया की तरह दादू दयाल के साथ रहे रज्‍जब, उनकी सेवा में !!वे चरण उसके लिए सब कुछ हो गये। उन चरणों में उसने सब पा लिया। अद्भुत प्रेमी रज्‍जब। जब दादू दयाल अंतर्धान हो गये।

🔶 जब उन्‍होंने शरीर छोड़ा, तो तुम चकित हो जाओगे…..शिष्‍य हो तो ऐसा हो। रज्‍जब ने आँख बंद कर लीं। तो फिर कभी आँख नहीं खोली।

🔷 कई वर्षों तक रज्‍जब जिंदा रहे , दादू दयाल के मरने के बाद। लेकिन कभी आँख नहीं खोली। लोगों ने लाख समझाया ये बात ठीक नहीं है। लोग कहते कि आंखे क्‍यों नहीं खोलते??? तो रज्जब कहते देखने योग्‍य जो था उसे देख लिया, अब देखने को क्‍या है? जो दर्शनीय था, उसका दर्शन कर लिया। उन आंखें में पूर्णता का सौंदर्य देख लिया। अब देखने योग्‍य क्‍या है इस संसार में अब आँख का काम खत्‍म हो गया। क्‍या करना खोल कर, क्‍या देखना है।

🔶 रज्‍जब तो कोहिनूर थे। जब बूंद सागर में गिरती है तो सागर हो जाती है।

👉 आज का सद्चिंतन 18 April 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 April 2018

👉 The first and foremost pillar of dharma and its foundation

🔷 The first or most important pillar of dharma is having faith in God. Its foundation or basis lies in believing that the God is present everywhere, even-handed and always imparts fair justice. Such belief is fully capable of restraining the evil tendencies of people. Our actions, thoughts and feelings, whether seen or unseen, can never ever remain concealed from the Omnipresent God. It may be possible to fool society or police but not the God pervading everything and everywhere.

🔶 The good or bad action definitely yields its consequences sooner or later in form of a reward or a punishment. This belief keeps inducing everyone to abide by principles and obey duties in personal and social life. If someone doesn’t get any praise, recognition or success for doing something good, the God will surely reward him/her in future. This belief would not let anything dampen individual’s spirits and keep him/her following the path of righteousness even in event of being unsuccessful. Likewise, anyone doing bad things too can never remain free from the fear of its bad consequences.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana: Darshan, swaroop va karyakram 66:6.10

👉 Amrit Chintan 18 April

🔷 The human life is the finest gift of the creator, if we use it properly and sincerely. One can attain all successes and not only that but also can achieve realization in one life. Self restrain and high human values can make any one to attend that stage in his own life.

🔶 If this realization that every man on this earth is a part of the infinite super-consciousness is attained, he will develop true love for all animates and inanimate on this earth. Then he can not remain selfish and will love everyone. The compassion for others – is true bliss in life. Divinity is other name of soul consciousness.

🔷 Temples are not important because there is an Idol of God or goddesses. They represent God in some kind of shape. It is simply a way to put your concentration on some figure. Real thing is to grow in self through the figure is to develop high emotions and service to humanity. Temple is to meet with the worshipers and find ways for self development.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 युग परिवर्तन में भूमिका

🔷 मित्रो! आत्मपरिवर्तन के साथ- साथ यही जाग्रत आत्माएँ विश्व परिवर्तन की भूमिका प्रस्तुत करेंगी। प्रकाशवान ही प्रकाश दे सकता है। आग से आग उत्पन्न होती है। जागा हुआ ही दूसरों को जगा सकता है। जागरण की भूमिका जाग्रत आत्माएँ ही निभाएँगी। आत्मपरिवर्तन की चिनगारियाँ ही युग परिवर्तन के प्रचण्ड दावानल का रूप धारण करेंगी। यही सब तो इन दिनों हो रहा है। जाग्रत आत्माओं में एक असाधारण हलचल इन दिनों उठ रही है।

🔶 उनकी अन्तरात्मा उन्हें पग- पग पर बेचैन कर रही है, ढर्रे का पशु जीवन नहीं जिएँगे, पेट और प्रजनन के लिए- वासना और तृष्णा के लिए जिन्दगी के दिन पूरे करने वाले नरकीटों की पंक्ति में नहीं खड़े रहेंगे, ईश्वर के अरमान और उद्देश्य को निरर्थक नहीं बनने देंगे, लोगों का अनुकरण नहीं करेंगे, उनके लिए स्वतः अनुकरणीय आदर्श बनकर खड़े होंगे। यह आन्तरिक समुद्र मन्थन इन  दिनों हर जीवित और जाग्रत आत्मा के अन्दर इतनी तेजी से चल रहा है कि वे सोच नहीं पा रहे कि आखिर यह हो क्या रहा है वे पुराने ही हैं पर भीतर कौन घुस पड़ा जो उन्हें ऊँचा सोचने के लिए ही नहीं, ऊँचा करने के लिए भी विवश, बेचैन कर रहा है। निश्चित रूप से यह ईश्वरीय प्रेरणा का अवतरण है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना दर्शन,स्वरूप व कार्य पृष्ठ- २.१४

👉 गुरुगीता (भाग 88)

👉 गुरुभक्ति ही साधना, वही है सिद्धि

🔷 भगवान् नीलकण्ठ इस भक्ति कथा के अगले प्रकरण में कहते हैं-

आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं परमात्मस्वरूपकम्। स्थावरं जंगमं चैव प्रणमामि जगन्मयम्॥ १११॥
वन्देऽहं सच्चिदानन्दं भेदातीतं सदा गुरुम्। नित्यं पूर्णं निराकारं निर्गुणं स्वात्मसंस्थितम्॥ ११२॥

परात्परं सदा ध्येयं नित्यमानन्दकारकम्। हृदयाकाशमध्यस्थं शुद्धस्फटिकसन्निभम्॥ ११३॥
स्फटिकप्रतिमारूपं दृश्यते दर्पणे यथा। तथात्मनि चिदाकारं आनन्दं सोऽहमित्युत॥ ११४॥

🔶 ब्रह्मा से लेकर तिनके तक सभी जड़-चेतन परमात्मा का स्वरूप है और सद्गुरु परमात्ममय है। इसीलिए यह सम्पूर्ण जगत् उन्हीं का रूप है। ऐसा जानकर मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ। शिष्य ऐसा भाव रखे॥ १११॥ शिष्य को चाहिए कि वह सच्चिदानन्द सभी भेद से परे गुरुतत्त्व को अनुभव करे और नित्य, पूर्ण, निराकार, निर्गुण और आत्मस्थित गुरुतत्त्व की वन्दना करे॥ ११२॥ श्री गुरुदेव आनन्द प्रदायक, नित्य एवं परात्पर हैं, उनके इसी शुद्ध स्फटिक स्वरूप का हृदयाकाश मध्य में ध्यान करना चाहिए॥ ११३॥ जिस तरह से दर्पण में स्फटिक की प्रतिमा दिखाई देती है, उसी तरह से आत्मा में चिदाकार आनन्दमय सद्गुरु का दर्शन होता है॥ ११४॥

🔷 गुरुगीता के साधना प्रकरण में सद्गुरु ध्यान की अनेक विधियाँ बतायी गयी हैं। इनमें से प्रत्येक विधि का अपना महत्त्व है। बस विधि का प्रयोग करने वाले में गहरी आस्था और दृढ़ गुरुभक्ति होनी चाहिए। शिष्य को हर पल इस सत्य का ध्यान रखना चाहिए कि सच्चे शिष्य व साधक के लिए गुरुभक्ति ही साधना है और यही सिद्धि है। जब कोई शिष्य इस सत्य को भूल जाता है, तो उसकी साधना में भटकाव के दौर आते हैं। कभी यह भटकाव किन्हीं सिद्धियों को पाने की लालसा में होता है, तो कभी अन्य किसी सांसारिक आकांक्षाओं के कारण। लेकिन कृपालु सद्गुरु अपने शिष्य को इस भटकाव से चेताते हैं, बचाते हैं और उबारते-उद्धार करते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 133

👉 शिक्षा बढ़ रही है पर मूढ़ता जहाँ की तहाँ हैं

🔶 नशेबाजी, माँसाहार, व्यभिचार, जुआ, चोरी जैसे दुर्व्यसन घट नहीं बढ़ रहे हैं । शिक्षा बढ़ रही है पर मूढ़ता जहाँ की तहाँ हैं । पढ़े-लिखे लोग भी दहेज के लिए जिद करें तो समझना चाहिए शिक्षा के नाम पर उन्हें कागज चरना ही सिखाया गया है ।

🔷 धर्म जैसी चरित्र निर्मात्री शक्ति आज केवल कुछ व्यवसाइयों के लिए भोले लोगों को फँसाने का जाल-जंजाल भर रह गई है । इन परिस्थितियों को मूक दर्शक की तरह देखते नहीं रहा जा सकता, इनके विरुद्ध जूझना ही एकमात्र उपाय है । अर्जुन की तरह हमें इस धर्म-युद्ध के लिए गाण्डीव उठाना ही पड़ेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (३.६१)

👉 Education is improving yet foolishness lingers on

🔶 Evil practices such as addiction, non-vegetarianism, adultery,gambling, theft, etc. have been increasing rather than decreasing.Education is improving yet foolishness lingers on. If educated people too insist on dowry, it must be assumed that they have only flipped through the books in the name of education but in reality, learned nothing worthwhile!

🔷 Religion is actually a power capable of building people’s worthy character but it has become reduced to a mere tool employed by a few commercially interested crafty people to trick innocent citizens. We cannot be just silent viewers of these pathetic situations. There is only one option remaining and that is to tackle them head-on. This is the battle of righteousness in which we must forge ahead and do our duty in the same way as Arjuna had done in the great battle of Mahabharata.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojna - philosophy, format and program -66 (3.61)

👉 Amrit Chintan 17 April

🔶 Man is a master of his destiny. By developing own virtues and abilities, one can progress to any extent. If any one can achieve that progress – why you cannot. The human body is the finest gift of the creator, the only thing we need is to make good use of that body and mind.

🔷 At present the only social service is to change the thinking of people. Which have become totally materialist and sensual? If we can bring changes in thinking pattern of masses - the change of the entire world from hell to heaven will automatically appear on this earth. It is the sincere service in the society which will bring this change in every field.

🔶 To my scholars,
To develop our character we need to adopt good thoughts in our mind. Our believes and habits must develop in that direction which should achieve high aim, and earn honor in life. The need of the time is to practice those good thoughts in practice also. The bright future is 21st century can only manifest its glory when we practice in our life – the high character and values of life.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...