🔷 मित्रो ! साधना का प्रयोजन अपने भीतर की महानता को विकसित करना ही है। बाहर व्यापक क्षेत्र में भी देव शक्तियाँ विद्यमान हैं। पर उनके लिए समष्टि विश्व की देखभाल का विस्तृत कार्य क्षेत्र नियत रहता है। व्यक्ति की भूमिका के अनुरूप प्रतिक्रिया उत्पन्न करने-सफलता और वरदान देने का कार्य उनके वे अंश ही पूरा करते हैं जो बीज रूप में हर व्यक्ति के भीतर विद्यमान है। सूर्य का अंश आँख में मौजूद है। यदि आँखें सही हों तो ही विराट् सूर्य के प्रकाश से लाभ उठाया जा सकता है। अपने कान ठीक हों तो ही बाहर के ध्वनि प्रवाह की कुछ उपयोगिता है। इसी प्रकार अपने भीतर के हेय बीज यदि विकसित परिष्कृत हों तो उनके माध्यम से विश्वव्यापी देवतत्वों के साथ सम्बन्ध जोडऩा आकर्षित करना और उनका सहयोग अनुग्रह प्राप्त कर सकना सम्भव हो सकता है।
🔶 मित्रो! इक्कीसवीं सदी रूपी गंगावतरण को उन भगीरथों की आवश्यकता है, जो सूखे पड़े विशाल क्षेत्र की प्यास बुझाने के लिए राजपाट का व्यामोह छोड़कर तप-साधना का मार्ग अपनाने का असाधारण साहस दिखा सकें।
🔷 जिनका साहस उभरे, उन्हें करना इतना भर है कि अपनी पहुँच से प्रज्ञा पुत्रों को महाकाल की चुनौती से अवगत कराएँ और युग धर्म के परिपालन में वरिष्ठों को क्या करने के लिए बाधित होना पड़ता है, इसका स्वरूप समझाते हुए उन्हें नए सिरे से नई उमंगों का धनी बना सकने की स्थिति उत्पन्न करें। अपना परिवार इतना बड़ा, इतना समर्थ और इतना प्रबुद्ध है कि उस परिवार के लोग ही नव सृजन में जुट सकें, तो असंख्य-अनेक को अपना सहयोगी बनाने में निश्चित रूप से सफल हो सकते हैं। उतने भर से वह गति चक्र घूमने लगेगा जो नया इन्सान बनाने, नया संसार बसाने की युग चेतना को समुचित सहयोग दे सकें।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🔶 मित्रो! इक्कीसवीं सदी रूपी गंगावतरण को उन भगीरथों की आवश्यकता है, जो सूखे पड़े विशाल क्षेत्र की प्यास बुझाने के लिए राजपाट का व्यामोह छोड़कर तप-साधना का मार्ग अपनाने का असाधारण साहस दिखा सकें।
🔷 जिनका साहस उभरे, उन्हें करना इतना भर है कि अपनी पहुँच से प्रज्ञा पुत्रों को महाकाल की चुनौती से अवगत कराएँ और युग धर्म के परिपालन में वरिष्ठों को क्या करने के लिए बाधित होना पड़ता है, इसका स्वरूप समझाते हुए उन्हें नए सिरे से नई उमंगों का धनी बना सकने की स्थिति उत्पन्न करें। अपना परिवार इतना बड़ा, इतना समर्थ और इतना प्रबुद्ध है कि उस परिवार के लोग ही नव सृजन में जुट सकें, तो असंख्य-अनेक को अपना सहयोगी बनाने में निश्चित रूप से सफल हो सकते हैं। उतने भर से वह गति चक्र घूमने लगेगा जो नया इन्सान बनाने, नया संसार बसाने की युग चेतना को समुचित सहयोग दे सकें।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

















































