👉 एक ही यज्ञ-अहं को भस्म कर देना
🔶 ऐसे ही एक सिद्ध तपस्वी हुए हैं— बाबा माधवदास। गंगा किनारे बसे गाँव वेणुपुर में उन्होंने गहन साधना की। गाँव वाले उनके बारे में बस इतना बता पाते हैं कि बाबा जब गाँव में आए थे, तब उनकी आयु लगभग ४० साल की रही होगी। सामान के नाम पर उनके पास कुछ खास था नहीं। बस आए और गाँव के बाहर पीपल के पेड़ के नीचे जम गए। बाद में गाँव वालों ने उनके लिए कुटिया बना दी। बाबा माधवदास की एक ही साधना थी-गुरुभक्ति। इसी ने उन्हें साधना के शिखर तक पहुँचाया था। जब तक उनके गुरुदेव थे, उन्होंने उनकी सेवा की। उनकी आज्ञा का पालन किया। बाद में उनके शरीर छोड़ने पर उन्हीं की आज्ञा से इस गाँव में चले आए।
🔷 चर्चा में गाँव वालों को उन्होंने बताया कि उनके गुरुदेव कहा करते थे कि साधु पर भी समाज का ऋण होता है। सो उसे चुकाना चाहिए। क्या ही अच्छा हो कि एक-एक साधु एक-एक गाँव में जाकर ज्ञान की अलख जगाए। गाँव के लोगों को शिक्षा और संस्कार दे। उन्हें आध्यात्मिक जीवन दृष्टि प्रदान करे। अपने गुरु के आदेश के अनुसार वे सदा इन्हीं कामों में लगे रहते थे। जब गाँव वाले उनसे पूछते कि वह इतना परिश्रम क्यों करते हैं? तो वे कहा करते कि गुरु का आदेश मानना ही उनकी सच्ची सेवा होती है। बस, मैंने सारे जीवन उनके आदेश के अनुसार ही जीने का संकल्प लिया है।
🔶 बाबा माधवदास वेणुपुर में लोगों से कहा करते थे, श्रद्धा का मतलब है-समर्पण। यानि कि निमित्त मात्र हो जाना। मन में इस अनुभूति को बसा लेना कि मैं नहीं तू। गुरुभक्ति का मतलब है कि हे गुरुदेव अब मैंने स्वयं को समाप्त कर दिया है, अब तुम आओ और मेरे हृदय में विराजमान हो जाओ। अब मैं वैसे ही जीऊँगा, जैसे कि तुम जिलाओगे। अब मेरी कोई मरजी नहीं, तुम्हारी मरजी ही मेरी मरजी है। माधवदास जैसा कहते थे, वैसा ही उनका जीवन भी था। उनका कहना था कि शिष्य जिस दिन अपने आप को शव बना लेता है, उसी दिन उसके गुरुदेव उसमें प्रवेश कर उसे शिव बना देते हैं।
🔷 जिस क्षण शिष्य का अस्तित्व मिट जाता है, उसमें सद्गुरु प्रकट हो जाते हैं। फिर सारी साधनाएँ स्वयं होने लगती हैं। सभी तप स्वयं होने लगते हैं। शिष्य को यह बात हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि सत्कर्म एक ही है, जिसे हमने न किया हो, बल्कि हमारे माध्यम से स्वयं गुरुदेव ने किया हो। जो भक्ति अहंकार को लेकर बहता है, वह कभी पवित्र नहीं हो सकता। उसके प्रवाह के सान्निध्य में कभी तीर्थ नहीं बन सकते। शिष्य के करने लायक एक ही यज्ञ है- अपने अहं को भस्म कर देना। समझने की बात यह है कि धूप में खड़े होना अथवा भूखे मरने का नाम तपस्या नहीं है, यह तो स्वयं को मिटाने का साहस है। यही तपस्या करना है। शिष्य धर्म को निभाने वाले बाबा माधवदास सारे जीवन यही तप करते रहे। इसी महातप से उनका अस्तित्व जन-जन के लिए वरदान बन गया। पर यदि कोई उनसे उनकी उपलब्धियों की बात करते, तो वे हँस पड़ते और कहते और मैं हूँ ही कहाँ, ये तो गुरुदेव हैं, जो इस शरीर को चला रहे हैं और अपने कर्म कर रहे हैं। इस सत्य के नूतन आयामों को अगले मंत्रों में स्पष्ट किया गया है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 115
🔶 ऐसे ही एक सिद्ध तपस्वी हुए हैं— बाबा माधवदास। गंगा किनारे बसे गाँव वेणुपुर में उन्होंने गहन साधना की। गाँव वाले उनके बारे में बस इतना बता पाते हैं कि बाबा जब गाँव में आए थे, तब उनकी आयु लगभग ४० साल की रही होगी। सामान के नाम पर उनके पास कुछ खास था नहीं। बस आए और गाँव के बाहर पीपल के पेड़ के नीचे जम गए। बाद में गाँव वालों ने उनके लिए कुटिया बना दी। बाबा माधवदास की एक ही साधना थी-गुरुभक्ति। इसी ने उन्हें साधना के शिखर तक पहुँचाया था। जब तक उनके गुरुदेव थे, उन्होंने उनकी सेवा की। उनकी आज्ञा का पालन किया। बाद में उनके शरीर छोड़ने पर उन्हीं की आज्ञा से इस गाँव में चले आए।
🔷 चर्चा में गाँव वालों को उन्होंने बताया कि उनके गुरुदेव कहा करते थे कि साधु पर भी समाज का ऋण होता है। सो उसे चुकाना चाहिए। क्या ही अच्छा हो कि एक-एक साधु एक-एक गाँव में जाकर ज्ञान की अलख जगाए। गाँव के लोगों को शिक्षा और संस्कार दे। उन्हें आध्यात्मिक जीवन दृष्टि प्रदान करे। अपने गुरु के आदेश के अनुसार वे सदा इन्हीं कामों में लगे रहते थे। जब गाँव वाले उनसे पूछते कि वह इतना परिश्रम क्यों करते हैं? तो वे कहा करते कि गुरु का आदेश मानना ही उनकी सच्ची सेवा होती है। बस, मैंने सारे जीवन उनके आदेश के अनुसार ही जीने का संकल्प लिया है।
🔶 बाबा माधवदास वेणुपुर में लोगों से कहा करते थे, श्रद्धा का मतलब है-समर्पण। यानि कि निमित्त मात्र हो जाना। मन में इस अनुभूति को बसा लेना कि मैं नहीं तू। गुरुभक्ति का मतलब है कि हे गुरुदेव अब मैंने स्वयं को समाप्त कर दिया है, अब तुम आओ और मेरे हृदय में विराजमान हो जाओ। अब मैं वैसे ही जीऊँगा, जैसे कि तुम जिलाओगे। अब मेरी कोई मरजी नहीं, तुम्हारी मरजी ही मेरी मरजी है। माधवदास जैसा कहते थे, वैसा ही उनका जीवन भी था। उनका कहना था कि शिष्य जिस दिन अपने आप को शव बना लेता है, उसी दिन उसके गुरुदेव उसमें प्रवेश कर उसे शिव बना देते हैं।
🔷 जिस क्षण शिष्य का अस्तित्व मिट जाता है, उसमें सद्गुरु प्रकट हो जाते हैं। फिर सारी साधनाएँ स्वयं होने लगती हैं। सभी तप स्वयं होने लगते हैं। शिष्य को यह बात हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि सत्कर्म एक ही है, जिसे हमने न किया हो, बल्कि हमारे माध्यम से स्वयं गुरुदेव ने किया हो। जो भक्ति अहंकार को लेकर बहता है, वह कभी पवित्र नहीं हो सकता। उसके प्रवाह के सान्निध्य में कभी तीर्थ नहीं बन सकते। शिष्य के करने लायक एक ही यज्ञ है- अपने अहं को भस्म कर देना। समझने की बात यह है कि धूप में खड़े होना अथवा भूखे मरने का नाम तपस्या नहीं है, यह तो स्वयं को मिटाने का साहस है। यही तपस्या करना है। शिष्य धर्म को निभाने वाले बाबा माधवदास सारे जीवन यही तप करते रहे। इसी महातप से उनका अस्तित्व जन-जन के लिए वरदान बन गया। पर यदि कोई उनसे उनकी उपलब्धियों की बात करते, तो वे हँस पड़ते और कहते और मैं हूँ ही कहाँ, ये तो गुरुदेव हैं, जो इस शरीर को चला रहे हैं और अपने कर्म कर रहे हैं। इस सत्य के नूतन आयामों को अगले मंत्रों में स्पष्ट किया गया है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 115













































