👉 एक ही यज्ञ-अहं को भस्म कर देना
🔶 गुरुगीता के महामंत्रों की साधना से शिष्य के अस्तित्व का सद्गुरु की चेतना में लय होता है। अध्यात्म जगत् में यह अनुभूति बड़ी दुर्लभ है और यह किसी को यूँ ही नहीं मिल जाती। इसके पहले शिष्य को असंख्य-अनगिनत परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। प्रत्येक परीक्षा उसके अहं पर संघातिक प्रहार करती है। इस बज्राघात की पीड़ा जिसने सही है, वही जान सकता है। इस तरह का प्रत्येक आघात शिष्य के समर्पण के समक्ष महाचुनौती खड़ी करता है। ऐसी असंख्य चुनौतियों का सक्षम उत्तर विरले ही दे पाते हैं। अन्यथा बाकी तो बुद्धि के तर्कों एवं मन द्वारा खड़े किए गए उपद्रवों के सामने हथियार डाल देते हैं। उनके हाथ-पाँव अनायास ही फूल जाते हैं और समर्पण पथ से विचलित हो पलायन कर बैठते हैं। आध्यात्मिक साधना की समरभूमि ऐसे अनेकों पलायनवादियों की कायरता की साक्षी रही है।
🔷 समर्पण के भाव बने रहें, शिष्य का अस्तित्व सद्गुरु की चेतना में घुलता रहे, इसके लिए परम पूज्य गुरुदेव के ध्यान का सातत्य हमेशा बना रहना चाहिए। इसी ध्यान के बारे में ऊपर के मंत्रों में शिष्यों ने पढ़ा कि भगवान् शिव माता पार्वती से कहते हैं कि शिष्यत्व की साधना करने वालों को अपने हृदय कमल की कर्णिकाओं के बीच गुरुदेव की दिव्य भावमूर्ति का ध्यान करना चाहिए। भाव यह रहे कि उनकी दिव्य मूर्ति से शुभ्र चाँदनी सा प्रकाश विकीर्ण हो रहा है। ये सद्गुरु देव अपने शिष्यों के लिए वरदायी मुद्रा में आसीन हैं। उनके वामभाग में उनकी लीला सहचरी दिव्य शक्ति माँ विद्यमान हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 113
🔶 गुरुगीता के महामंत्रों की साधना से शिष्य के अस्तित्व का सद्गुरु की चेतना में लय होता है। अध्यात्म जगत् में यह अनुभूति बड़ी दुर्लभ है और यह किसी को यूँ ही नहीं मिल जाती। इसके पहले शिष्य को असंख्य-अनगिनत परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। प्रत्येक परीक्षा उसके अहं पर संघातिक प्रहार करती है। इस बज्राघात की पीड़ा जिसने सही है, वही जान सकता है। इस तरह का प्रत्येक आघात शिष्य के समर्पण के समक्ष महाचुनौती खड़ी करता है। ऐसी असंख्य चुनौतियों का सक्षम उत्तर विरले ही दे पाते हैं। अन्यथा बाकी तो बुद्धि के तर्कों एवं मन द्वारा खड़े किए गए उपद्रवों के सामने हथियार डाल देते हैं। उनके हाथ-पाँव अनायास ही फूल जाते हैं और समर्पण पथ से विचलित हो पलायन कर बैठते हैं। आध्यात्मिक साधना की समरभूमि ऐसे अनेकों पलायनवादियों की कायरता की साक्षी रही है।
🔷 समर्पण के भाव बने रहें, शिष्य का अस्तित्व सद्गुरु की चेतना में घुलता रहे, इसके लिए परम पूज्य गुरुदेव के ध्यान का सातत्य हमेशा बना रहना चाहिए। इसी ध्यान के बारे में ऊपर के मंत्रों में शिष्यों ने पढ़ा कि भगवान् शिव माता पार्वती से कहते हैं कि शिष्यत्व की साधना करने वालों को अपने हृदय कमल की कर्णिकाओं के बीच गुरुदेव की दिव्य भावमूर्ति का ध्यान करना चाहिए। भाव यह रहे कि उनकी दिव्य मूर्ति से शुभ्र चाँदनी सा प्रकाश विकीर्ण हो रहा है। ये सद्गुरु देव अपने शिष्यों के लिए वरदायी मुद्रा में आसीन हैं। उनके वामभाग में उनकी लीला सहचरी दिव्य शक्ति माँ विद्यमान हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 113













































