🔶 मनोरोगों में एक वर्ग अवसादजन्यों का और दूसरा आवेश स्तर वालों का है। उदासी, निराशा, भय, चिन्ता, आशंका, अविश्वास जैसों की गणना अवसाद वर्ग में आती है। वे मनुष्य को ठंडा कर देते हैं और लो ब्लड प्रेशर की तरह उस स्थिति में नहीं रहने देते कि कुछ करते-धरते बन सके। इन व्याधियों से आक्रान्त व्यक्ति पक्षाघात पीड़ित अपंगों की तरह दीन हीन बने गई गुजरी स्थिति में पड़े रहते हैं। उन पर अभागे होने का लांछन लगता है, जो अनुकूलता रहते हुए भी सही चिन्तन और सही प्रयास बन पड़ने के कारण ज्यों-त्यों करके दिन काटते हैं। इतने पर भी उन्हें उपद्रवियों की तुलना में भारभूत होते हुए भी किसी प्रकार सहन कर लिया जाता है। लो ब्लड प्रेशर का मरीज खुद तो अशक्त वयोवृद्ध की तरह चारपाई पकड़े रहता है, पर दूसरों से अपना भार उठवाने के अतिरिक्त और किसी प्रकार का त्रास नहीं देते।
🔷 उपद्रवी मनोरोगों में क्रोध, आवेश, सनक, आक्रमण, अपराध जैसे कुकृत्यों की गणना होती है। वस्तुतः यह सभी विकृत अहंकार के बाल-बच्चे हैं। निज की अहमन्यता और दूसरे का असम्मान करने का दुस्साहस ही उस स्तर की विक्षिप्तता को जन्म देते हैं। सामान्य शिष्टाचार और सज्जनोचित सौजन्य की मर्यादा है कि अपनी नम्रता, विनम्रशीलता बनाये रखी जाय और सम्पर्क में आने वालों को सम्मान दिया जाय। जो इतना कर पाते हैं उनकी गणना सभ्य नागरिकों के लिए आवश्यक शिष्टाचार के जानकार में की जाती है, भले मानसों की पंक्ति में बिठाया जाता है।
🔶 किन्तु जो ठीक इसके विपरीत आचरण करते हैं, वे दूसरों का जितना तिरस्कार करते हैं उससे कही अधिक मात्रा में स्तर गिरा लेने के रूप में निज की हानि कर चुके होते हैं। ऐसे ही नागरिक मर्यादाओं से अपरिचित या अनभ्यस्त लोग क्रोधी कहे जाते हैं। वे अपनी ही मान्यता या मर्जी को सब कुछ मानते हैं। दूसरे की सुनते ही नहीं। यह नहीं सोचते कि अपना निर्धारण सही भी है या नहीं। सही हो तो भी यह आवश्यक नहीं कि दूसरे उसे उसी रूप में मानने या कर सकने की स्थिति में भी है या नहीं। जो अपनी ही अपनी चलाते हैं, दूसरों की स्थिति समझने और विचार विनिमय से मतभेद दूर करने की आवश्यकता नहीं समझते, ऐसे ही लोग बात-बात पर आग बबूला होते और क्रोध में लाल-पीले होते देखे गये हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)
🔷 उपद्रवी मनोरोगों में क्रोध, आवेश, सनक, आक्रमण, अपराध जैसे कुकृत्यों की गणना होती है। वस्तुतः यह सभी विकृत अहंकार के बाल-बच्चे हैं। निज की अहमन्यता और दूसरे का असम्मान करने का दुस्साहस ही उस स्तर की विक्षिप्तता को जन्म देते हैं। सामान्य शिष्टाचार और सज्जनोचित सौजन्य की मर्यादा है कि अपनी नम्रता, विनम्रशीलता बनाये रखी जाय और सम्पर्क में आने वालों को सम्मान दिया जाय। जो इतना कर पाते हैं उनकी गणना सभ्य नागरिकों के लिए आवश्यक शिष्टाचार के जानकार में की जाती है, भले मानसों की पंक्ति में बिठाया जाता है।
🔶 किन्तु जो ठीक इसके विपरीत आचरण करते हैं, वे दूसरों का जितना तिरस्कार करते हैं उससे कही अधिक मात्रा में स्तर गिरा लेने के रूप में निज की हानि कर चुके होते हैं। ऐसे ही नागरिक मर्यादाओं से अपरिचित या अनभ्यस्त लोग क्रोधी कहे जाते हैं। वे अपनी ही मान्यता या मर्जी को सब कुछ मानते हैं। दूसरे की सुनते ही नहीं। यह नहीं सोचते कि अपना निर्धारण सही भी है या नहीं। सही हो तो भी यह आवश्यक नहीं कि दूसरे उसे उसी रूप में मानने या कर सकने की स्थिति में भी है या नहीं। जो अपनी ही अपनी चलाते हैं, दूसरों की स्थिति समझने और विचार विनिमय से मतभेद दूर करने की आवश्यकता नहीं समझते, ऐसे ही लोग बात-बात पर आग बबूला होते और क्रोध में लाल-पीले होते देखे गये हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)






































