🔶 तो क्या करें महाराज जी? आप अपने ब्राह्मणत्व को जगा दीजिये, साधु को जगा दीजिये ताकि आप अपनी नाव स्वयं पार कर सकें, अन्यथा हम यही कहेंगे कि शायद हमारा तप कम है नहीं तो कहीं न कहीं हमें ब्राह्मण, साधु मिल ही जाते। आपके पास धन नहीं तो अपनी भावना, विचार, श्रद्धा तो समाज में बिखेर ही सकते हैं। वही बिखेरिए, सन्त बनकर अपना परिचय दीजिये। सन्त दानी होता है, सन्त उदार होता है।
🔷 हमारा मन था कि अपने बचे हुए शेष दिनों में ब्राह्मण तथा सन्त का काम अधिक से अधिक कर सकूँ। लोगों की मध्यमा वाणी से, परावाणी से अधिक से अधिक सेवा कर सकूँ। यह हमारा मन है, मैं आप को एक ही बात कह सकता हूँ कि आप अपने को निचोड़िये-निचोड़िये बचत कीजिये। आपके श्रम, समय, धन और विचारणा-भावना की समाज को जरूरत है, संस्कृति को जरूरत है। इसे विलासिता में खर्च मत कीजिये। अगर किसी में ब्राह्मणत्व एवं सन्त जिन्दा है तो उसे निचोड़िये। उसे आप बिखेर दीजिये। हमने प्रार्थना की है कि यदि आप लोगों में कहीं भी किसी भी कोने में यदि ब्राह्मणत्व या सन्त जिन्दा हो तो वह जग जाये। उपासना-साधना के नाम पर आप जादूगरी बन्द कीजिये। देवता को गुमराह करने वाली, मनोकामना सिद्ध करने वाली पूजा बन्द कीजिए।
🔶 साधना किसे कहते हैं आपको मालूम नहीं? आप हनुमान जी की पूजा करते हैं, सन्तोषी माता की पूजा करते हैं। यह मन्त्र है, न यन्त्र है, न पूजा है। आप हनुमान जी या सन्तोषी माता को साधते हैं। अरे पहले अपने आपको तो साधिये न, पर यह जो जादूगरी आप करते हैं, वह बदमाशी के सिवा कुछ नहीं है। अगर आप पूजा-उपासना करते हैं, तो ठीक, यह आपकी मर्जी है, पर यह न तो कोई मन्त्र जप है, न भजन है, यह मात्र धूर्तगीरी है। पूजा के नाम पर यदि आप ऐसी बदमाशी करते हैं तो आपकी मर्जी, पर इससे कुछ होने वाला नहीं है। पहले आप समर्पण करना सीखिये, यह मोटी-मोटी बातें थीं जो हमने किसी तरह से आपसे कह दीं।
🔷 हमारे गुरुजी की यही मर्जी है कि हम आपमें से-हर आदमी में से ब्राह्मण तथा सन्त को जिन्दा करें और हम यही चाहते हैं कि अगर हमारे अन्दर बल हो तथा आपके अन्दर ब्राह्मणत्व तथा साधु हो तो वह जिन्दा हो जाए। इस विदाई के अवसर पर यही कहकर हम आप लोगों को विदा कर रहे हैं। मित्रों, गुरुजी ने हमेशा दिया है, आगे भी देते रहेंगे, शर्त एक ही है कि आप अपनी ब्राह्मण तथा सन्त की प्रवृत्ति जिन्दा करें। आप जाइये एवं अपने-अपने कामों में जुट जाइये।
🌹 समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)
🔷 हमारा मन था कि अपने बचे हुए शेष दिनों में ब्राह्मण तथा सन्त का काम अधिक से अधिक कर सकूँ। लोगों की मध्यमा वाणी से, परावाणी से अधिक से अधिक सेवा कर सकूँ। यह हमारा मन है, मैं आप को एक ही बात कह सकता हूँ कि आप अपने को निचोड़िये-निचोड़िये बचत कीजिये। आपके श्रम, समय, धन और विचारणा-भावना की समाज को जरूरत है, संस्कृति को जरूरत है। इसे विलासिता में खर्च मत कीजिये। अगर किसी में ब्राह्मणत्व एवं सन्त जिन्दा है तो उसे निचोड़िये। उसे आप बिखेर दीजिये। हमने प्रार्थना की है कि यदि आप लोगों में कहीं भी किसी भी कोने में यदि ब्राह्मणत्व या सन्त जिन्दा हो तो वह जग जाये। उपासना-साधना के नाम पर आप जादूगरी बन्द कीजिये। देवता को गुमराह करने वाली, मनोकामना सिद्ध करने वाली पूजा बन्द कीजिए।
🔶 साधना किसे कहते हैं आपको मालूम नहीं? आप हनुमान जी की पूजा करते हैं, सन्तोषी माता की पूजा करते हैं। यह मन्त्र है, न यन्त्र है, न पूजा है। आप हनुमान जी या सन्तोषी माता को साधते हैं। अरे पहले अपने आपको तो साधिये न, पर यह जो जादूगरी आप करते हैं, वह बदमाशी के सिवा कुछ नहीं है। अगर आप पूजा-उपासना करते हैं, तो ठीक, यह आपकी मर्जी है, पर यह न तो कोई मन्त्र जप है, न भजन है, यह मात्र धूर्तगीरी है। पूजा के नाम पर यदि आप ऐसी बदमाशी करते हैं तो आपकी मर्जी, पर इससे कुछ होने वाला नहीं है। पहले आप समर्पण करना सीखिये, यह मोटी-मोटी बातें थीं जो हमने किसी तरह से आपसे कह दीं।
🔷 हमारे गुरुजी की यही मर्जी है कि हम आपमें से-हर आदमी में से ब्राह्मण तथा सन्त को जिन्दा करें और हम यही चाहते हैं कि अगर हमारे अन्दर बल हो तथा आपके अन्दर ब्राह्मणत्व तथा साधु हो तो वह जिन्दा हो जाए। इस विदाई के अवसर पर यही कहकर हम आप लोगों को विदा कर रहे हैं। मित्रों, गुरुजी ने हमेशा दिया है, आगे भी देते रहेंगे, शर्त एक ही है कि आप अपनी ब्राह्मण तथा सन्त की प्रवृत्ति जिन्दा करें। आप जाइये एवं अपने-अपने कामों में जुट जाइये।
🌹 समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)












































