🔴 परमहंस देव के इहलीला संवरण करने के पश्चात् जब परिव्राजक बनकर उन्होंने देश भ्रमण किया तो मार्ग में अलवर, खेतड़ी, लिम्बडी, मैसूर, रामनद आदि अनेक राज्यों के शासक उनके भक्त बन गये और उन सबने उनसे अपने यहाँ सुख पूर्वक रहकर साधन भजन करने का अनुरोध किया। पर उन्होंने उत्तर में सदैव यही कहा कि “मैं नहीं मानता कि इस प्रकार एकान्त में बैठकर साधन करने से मनुष्य की मुक्ति हो सकती है। इस प्रकार के लाखों साधु संन्यासी लोगों के लिये क्या कर रहे है? तत्वज्ञान का उपदेश? पर यह तो पागलपन या ढोंग है। भगवान रामकृष्ण का यह कथन पूर्णतः सत्य है कि ‘भूखे मरते को धर्म का उपदेश व्यर्थ है। जहाँ लाखों लोगों को खाने को नहीं मिलता। वहाँ वे धार्मिक कैसे बन सकते है? इस लिये सबसे पहले देश वासियों को पेट की समस्या हो हल करने लायक उपयोगी शिक्षा देनी चाहिये।
🔵 इस कार्य के लिये पहले तो कार्यकर्ता चाहिये। इस कार्य के लिये पहले तो कार्यकर्ता चाहिये। फिर धन की आवश्यकता है। यह कार्य मेरे जैसे भिखारी संन्यासी के लिये कठिन अवश्य है, पर गुरू की कृपा से मैं इस कार्य को पूर्ण करके रहूँगा। भारत के एक एक शहर से ऐसे व्यक्ति इकट्ठे होंगे। जिनका हृदय देशबन्धुओं की दशा सुधारने के लिये जल रहा है और जो इस कार्य के लिये जीवन अर्पण करने को तैयार है। पर पैसा! मैं देश भर में रंक से लेकर राजाओं के पास तक घूम चुका हूँ, इस लिये मैं कंगाल हिन्दुस्तान में किसी का सहारा न लेकर समुद्र पार करके पश्चिम के देशों में जाऊँगा, वहाँ से अपनी बुद्धि के प्रभाव से धन प्राप्त करके देशोद्धार की योजना को पूर्ण करूँगा या इसी प्रयत्न में प्राण उत्सर्ग कर दूँगा।”
🔴 यह है एक सच्चे कर्म योगी की भावना। इसका अर्थ यह नहीं कि स्वामी विवेकानन्द को भगवान का ध्यान नहीं था अथवा वे ज्ञान और मुक्ति के मार्ग से अनजान थे। नहीं वे तो पहले ही श्रीरामकृष्ण की कृपा से भगवान का साक्षात्कार प्राप्त कर चुके थे और अब भगवान के आदेश से ही उन्होंने भारतवर्ष की दुर्दशा को मिटाने का प्राण किया था। वे जानते थे कि निस्वार्थ भाव से सेवा करना ही आत्मा को अपने लक्ष तक पहुँचाने का सर्वोत्तम मार्ग है। जो व्यक्ति अन्य प्राणियों को कष्टों और आवश्यकताओं के प्रति उपेक्षा का भाव रखता है, वह अध्यात्मिक मार्ग में कभी उन्नति नहीं कर सकता।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 श्री भारतीय योगी
🌹 अखण्ड ज्योति- जून 1945 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/June/v1.27
🔵 इस कार्य के लिये पहले तो कार्यकर्ता चाहिये। इस कार्य के लिये पहले तो कार्यकर्ता चाहिये। फिर धन की आवश्यकता है। यह कार्य मेरे जैसे भिखारी संन्यासी के लिये कठिन अवश्य है, पर गुरू की कृपा से मैं इस कार्य को पूर्ण करके रहूँगा। भारत के एक एक शहर से ऐसे व्यक्ति इकट्ठे होंगे। जिनका हृदय देशबन्धुओं की दशा सुधारने के लिये जल रहा है और जो इस कार्य के लिये जीवन अर्पण करने को तैयार है। पर पैसा! मैं देश भर में रंक से लेकर राजाओं के पास तक घूम चुका हूँ, इस लिये मैं कंगाल हिन्दुस्तान में किसी का सहारा न लेकर समुद्र पार करके पश्चिम के देशों में जाऊँगा, वहाँ से अपनी बुद्धि के प्रभाव से धन प्राप्त करके देशोद्धार की योजना को पूर्ण करूँगा या इसी प्रयत्न में प्राण उत्सर्ग कर दूँगा।”
🔴 यह है एक सच्चे कर्म योगी की भावना। इसका अर्थ यह नहीं कि स्वामी विवेकानन्द को भगवान का ध्यान नहीं था अथवा वे ज्ञान और मुक्ति के मार्ग से अनजान थे। नहीं वे तो पहले ही श्रीरामकृष्ण की कृपा से भगवान का साक्षात्कार प्राप्त कर चुके थे और अब भगवान के आदेश से ही उन्होंने भारतवर्ष की दुर्दशा को मिटाने का प्राण किया था। वे जानते थे कि निस्वार्थ भाव से सेवा करना ही आत्मा को अपने लक्ष तक पहुँचाने का सर्वोत्तम मार्ग है। जो व्यक्ति अन्य प्राणियों को कष्टों और आवश्यकताओं के प्रति उपेक्षा का भाव रखता है, वह अध्यात्मिक मार्ग में कभी उन्नति नहीं कर सकता।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 श्री भारतीय योगी
🌹 अखण्ड ज्योति- जून 1945 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/June/v1.27













































