शुक्रवार, 25 अगस्त 2017

👉 मनस्वी लोक सेवक चाहिए (भाग 2)

🔵 यों कर्मठ व्यक्तियों की हर क्षेत्र में आवश्यकता रहती है पर सामाजिक क्रान्ति के गृह-युद्ध में पग-पग पर मोर्चा जमाये अड़े रहने वाले सैनिकों जैसी क्रान्तिकारी भावनाएं जिनके अन्दर विद्यमान हों ऐसे लोगों का अस्तित्व हो आशा का केन्द्र बन सकता हैं। पिछले दिनों स्वाधीनता संग्राम ही राजनैतिक क्रान्ति हो कर चुकी है। उसमें मातृभूमि के लिये एक से एक बढ़ कर उत्सर्ग करने वाले, अहिंसक एवं हिंसात्मक संघर्ष में भाग लेने वाले अगणित क्रान्तिकारियों का तप त्यागपूर्ण व्यक्तित्व ही सफलता का आधार बना था। ठीक वैसी ही आवश्यकता इस सामाजिक क्रान्ति के लिये भी अभीष्ट होगी।

🔴 एक माता की गोद से बच्चा छूट कर नदी की प्रबल धारा में बहने लगा। माता अपने शिशु की प्राण रक्षा के लिये सहायता को चीत्कार कर रही हैं। ‘होशियार’ लोग मौखिक सहानुभूति तो दिखा रहे थे पर करने को कुछ भी तैयार न थे। उसी समय एक नव-युवक उफनती नदी में अपने प्राण हथेली पर रख कर कूदा और बहते बच्चे को पकड़ कर किनारे पर ले आया। इस युवक का नाम था अब्राहम लिंकन जो अपनी ऐसी ही महानताओं के कारण अमेरिका का प्रेसीडेण्ट हुआ।

🔵 आज विवाहों का अपव्यय एक ऐसी उफनती नदी बना हुआ है जिसमें सारे समाज की बालिकाएं बही चली जा रही हैं और प्रत्येक अभिभावक उनको बचाने के लिए चीत्कार कर रहा है। यह दृश्य हम सब देखते सुनते तो हैं। मौखिक विरोध और दुख भी प्रकट करते हैं पर करने की बारी आती है तो ‘अक्लमन्द’ लोगों की तरह पल्ला झाड़ कर अलग खड़े हो जाते हैं। ऐसे कुसमय ये स्वर्गीय अब्राहम की आत्मा देखती है कि उसके जैसे उदार और साहसी लोगों से भारत की भूमि रहित क्यों हो गई?

🔴 कोई प्राण हथेली पर लेकर नदी में कूदने और इन बच्चियों को बचाने के लिए क्यों तैयार नहीं होता? आत्मा के अमर और शरीर को नश्वर मानने वाले, गीता-पाठी लोगों में से मोह और लोभ को छोड़ कर धर्म के लिए कुछ साहस कर सकने वाले लोग क्यों कहीं दृष्टिगोचर नहीं होते? इसका उत्तर युग की आत्मा हम से माँगती हैं और हम क्लीव, निर्जीव की तरह सिर नीचा किये मुरझाये- से खड़े हैं। इस धिक्कार योग्य स्थिति में पड़ी हुई अपनी पीढ़ी की मनोदशा पर आँसू ही बहाये जा सकते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति मार्च1964 पृष्ठ 51
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/March/v1.51

👉 आज का सद्चिंतन 25 Aug 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 Aug 2017


गुरुवार, 24 अगस्त 2017

👉 आज का सद्चिंतन 24 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 Aug 2017


👉 यश की लालसा :-

🔴 एक बार की बात है, राजा भोज दिन भर की व्यस्तता के बाद गहरी नींद में सोए हुए थे। स्वप्न में उन्हें दिव्य पुरुष के दर्शन हुए। उस दिव्य पुरुष के चारों ओर उजला आभामंडल था। भोज ने बड़ी विनम्रता से उनका परिचय पूछा।

🔵 मन्द - मन्द मुस्कुराते हुए वह बोले, "में सत्य हूँ। मैं तुम्हें तथाकथित उपलब्धियों का वास्तविक रूप दिखाने आया हूँ। चलो मेरे साथ।"

🔴 राजा उत्सुकता और खुशी से उनके साथ चल दिये। भोज खुद को बड़ा धर्मात्मा समझते थे। उन्होंने अपने राज्य में कई मंदिर, धर्मशालाएं , नहरें और कुएं आदि बनवाये थे। उनके मन में इन कामों के लिये अहम भी था।

🔵 दिव्य पुरुष भोज को उनके ही एक शानदार बगीचे में ले गए और बोले, "तुम्हें इस बगीचे का बड़ा अभिमान है न?" फ़िर उन्होंने एक पेड़ को छुआ और देखते हो देखते वह ठूंठ हो गया। वह एक - एक करके सभी सुन्दर फ़लों से लदे वृक्षों को छूते गए और वे सब ठूंठ होते चले गए। इसके बाद वह उन्हें भोज के एक स्वर्णजड़ित मंदिर के पास ले गए। भोज को वह मंदिर अति प्रिय था। दिव्य पुरुष ने जैसे ही उसे छुआ वह लोहे की तरह काला हो गया और खंडहर की तरह गिरता चला गया।

🔴 यह देख कर राजा के तो होश उड़ गए। वे दोनों उन सभी स्थानों पर गए जिन्हें राजा भोज ने चाव से बनवाया था।

🔵 दिव्य पुरुष बोले, "राजन! भ्रम में मत पड़ो। भौतिक वस्तुओं के आधार पर महानता नहीं आंकी जाती। एक ग़रीब आदमी द्वारा पिलाये गए एक लौटे जल की कीमत, उसका पुण्य किसी यशलोलुप धनी की करोड़ों मुद्राओं से कहीं अधिक है। "

🔴 इतना कहकर वह अंतर्ध्यान हो गए। राजा भोज ने स्वप्न पर गम्भीरता से विचार किया और फ़िर ऐसे कामों पर लग गये जिन्हें करते हुए उन्हें यश पाने की लालसा बिल्कुल नहीं रही।

👉 Whatever we have, is it less ?

🔴 A person went to a Mahatma and said, “Life is short. What all activities to do in such duration? You don’t have knowledge in childhood, old age is worse. You don’t get proper sleep and the diseases also bother. In the youth, we have to look after the family then how do we get the real knowledge? When do we do social service? Getting time in this life doesn’t seem happening.” Saying this he gets depressed and starts crying.

🔵 Seeing him, the Mahatma also starts crying. The man asked, “Why are you crying?” The Mahatma said, “Son, what to do, I need food grains to eat. But I don’t have the land to grow grains. I am dying of hunger. One part of God is Maya (illusion). One part of Maya has three qualities. One part of the qualities is the sky. Sky has air and the air has fire. One part of the fire has water. One hundredth of water is earth. Mountains cover half of the earth. Then there are so many rivers and forests here and there. God has not even left a small piece of land for me. Different people have already occupied whatever little land was there. Tell me will I not starve then?”

🔴 The person said to him,”In spite of all this you are alive, right? Then why do you cry?” The Mahatma said instantaneously, “You also have time and this invaluable life then why are you complaining that you don’t have enough time and life is getting spent away. From now on don’t complain about lack of time. At least use whatever you have.”

🔵 It doesn’t suit human being, the prince of God’s kingdom, to complain about lack of resources. The desire of converting one’s incompleteness into the complete is only acceptable and desirable if it pertains to the inner spiritual space. But such a complaint is uncalled for when the external resources are in plenty.

🌹 From Pragya Puran Page 4/17

👉 मनस्वी लोक सेवक चाहिए (भाग 1)

🔵 बड़े कार्यों के लिए बड़ी तैयारी करनी पड़ती है और बड़े साधन जुटाने पड़ते हैं। विवाहों में अपव्यय की कुरीति काफी व्यापक है, उसकी जड़ें काफी गहराई तक घुसी हुई हैं। उन्हें उखाड़ने में काफी खोद-बीन और उखाड़-पछाड़ करनी पड़ेगी। लोग आसानी से उस पुरानी रूढ़ि को छोड़ने का साहस न कर सकेंगे। औचित्य को स्वीकार करते हुए भी सामाजिक दबाव, घर वालों और रिश्तेदारों का विरोध, कंजूस या मूर्ख कहलाने का उपहास आदि अनेकों बाधाएं सामने रहेंगी। फिर उपयुक्त लड़की लड़के खोज निकालना और उनके अभिभावकों का वैसा ही विवेकशील एवं साहसी होना भी तो सरल कार्य नहीं है। इन अड़चनों को पार करने के लिए बहुमुखी योजना बनानी पड़ेगी और उसकी पूरी तैयारी करनी पड़ेगी। उथले कार्यक्रमों से काम न चलेगा।

🔴 सामाजिक क्रान्ति की दिशा में यह एक अत्यन्त ही व्यापक एवं महत्वपूर्ण कदम है। यह मोर्चा फतह हो गया तो अन्य रूढ़ियों का शमन-शोधन सर्वथा सरल हो जायगा। जिस कुरीति से सारा समाज दुखी है और जिसका नाश हर विचारशील व्यक्ति चाहता है उसके लिए आवश्यक वातावरण तो तैयार है पर उखाड़ फेंकने की क्रिया फिर भी काफी कष्ट-साध्य रहेगी। इस कठिन कार्य को करने के लिए उन व्यक्तियों की आवश्यकता है जिनमें शौर्य, साहस, तप, त्याग, लगन और उत्साह की समुचित मात्रा विद्यमान हो। ऐसे लोग आज कमजोर जरूर हैं पर उनका सर्वथा अभाव नहीं है। उपयुक्त सैनिकों की ही इस मोर्चे पर अड़ने के लिये सबसे प्रथम आवश्यकता पड़ेगी। प्रयत्न यह करना होगा कि जिनमें साहस हो वे मानवता की इस पुकार की पूर्ति करने के लिये बढ़ कर आगे आवें। हिन्दू-समाज पर लगे हुए इस भारी कलंक को अपने रक्त से धोने की हिम्मत कर सकें।

🔵 प्रगतिशील जातीय सभाओं का संगठन इन्हीं उत्साही और साहसी, प्रतिभाशाली, लोक-सेवकों के कंधों पर खड़ा किया जा सकेगा। नाम के भूखे, आलसी बातूनी और लम्बे-चौड़े सपने देखने वाले ऐसे अनेक व्यक्ति पाये जाते हैं जो घर बैठे ही तीनों लोकों के सुधारने की कल्पना करते और मन-मोदक खाते रहते हैं। ऐसे लोगों की सद्भावना एवं समर्थन मिले तो उसका भी कुछ उपयोग ही है पर उनसे वह प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता जो समाज की गति-विधियों को लौट पलट कर डालने जैसे महान कार्य को सम्पन्न करने के लिये आवश्यक हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति मार्च1964 पृष्ठ 50-51
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/March/v1.50

👉 अपना मूल्य, आप ही न गिरायें (अंतिम भाग)

🔵 संसार में कोई जन्मजात महान अथवा शक्तिवान पैदा नहीं होता। सभी एक जैसी क्षमताओं और विशेषताओं को लेकर पैदा होते हैं। अन्तर केवल यह होता है कि जो अपनी आत्मा में निहित शक्तियों में विश्वास करके आत्म-चिंतन द्वारा उन्हें जगाते और उपयोग में लाते हैं वे आगे बढ़ जाते हैं, और जो अपने प्रति हीन भावना के शिकार बने रहते हैं, वे यथास्थान जीवन का बोझ ढोते रहते हैं।

🔴 संसार में जितने भी वैज्ञानिक, तत्ववेत्ता, विचारक, विद्वान, विजयी, दर्शन-शास्त्री, कलाकार और राजनेता अथवा जन-नेता हुए हैं, उन्होंने अपनी शक्तियों में विश्वास किया, अपने अस्तित्व को पहचाना उसे विकसित किया और उसके आधार पर संसार में बड़े-बड़े काम कर दिखलाये। उन्होंने स्वयं अपना उचित मूल्याँकन किया और संसार से वही मूल्य प्राप्त कर लिया।

🔵 निश्चय ही आप ही महान हैं। आप में भी एक महापुरुष छिपा हुआ है। अपनी हीन भावना त्यागिये, अपनी पैतृक-परम्परा में विश्वास कीजिये। आत्म-चिन्तन द्वारा अपनी महानताओं विशेषताओं और क्षमताओं का द्वार खोलिये और देखिये कि आपके अन्दर सोया महापुरुष जाग पड़ा है। अपने को दीन-हीन और मलीन माने रहना अपनी हत्या करनी है।

🔴 इस पातक से बचिए और परमात्मा की दी हुई शक्तियों का आदर करिए, उन्हें उन्नति और प्रखर बनाइए, आप शीघ्र ही एक उन्नत चरित्र के असाधारण व्यक्ति बन कर समाज में अपना मूल्य और स्थान पा लेंगे। याद रखिए जो मनुष्य अपने को जैसा मानता है, वह वैसा ही बन जाता है और तब समाज उसका उसी मान-दण्ड द्वारा मूल्याँकन करता है। आप भी दूसरों की तरह संसार के महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं, उपाय कीजिए और समाज से अपना पूरा मूल्याँकन कराने में सफल हो जाइये।

🌹 समाप्त
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जुलाई 1968 पृष्ठ 31
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1968/July/v1.31

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 51)

🌹  नर- नारी परस्पर पवित्र दृष्टि रखेंगे।
🔴 यह तो सिनेमा का, गंदे चित्रों का, अश्लील साहित्य का और दुर्बुद्धि का प्रसाद है, जो हमने नारी की परम पुनीत प्रतिमा को ऐसे अश्लील, गंदे और गर्हित रूप में गिरा रखा है। नारी को वासना के उद्देश्य से सोचना या देखना, उसकी महानता का वैसा ही तिरस्कार करना है, जैसे किसी आवश्यकता को पूर्ण करने के उद्देश्य से देखना। यह दृष्टि जितनी निंदनीय और घृणित है, उतनी ही हानिकर और विग्रह उत्पन्न करने वाली भी है। हमें उस स्थिति को अपने भीतर से और सारे समाज से हटाना होगा और नारी को उस स्वरूप में पुनः प्रतिष्ठित करना होगा, जिसकी एक दृष्टि मात्र से मानव प्राणी धन्य होता रहा है।

🔵 उपरोक्त पंक्तियों में नारी का जैसा चित्रण नर की दृष्टि से किया गया है, ठीक वैसा ही चित्रण कुछ शब्दों के हेर- फेर के साथ नारी की दृष्टि से नर के सम्बन्ध में किया जा सकता है। जननेन्द्रिय की बनावट में राई- रत्ती अंतर होते हुए भी मनुष्य की दृष्टि से दोनों ही लगभग समान क्षमता, बुद्धि, भावना एवं स्थिति के बने हुए हैं। यह ठीक है कि दोनों में अपनी- अपनी विशेषताएँ और अपनी- अपनी न्यूनताएँ हैं, उनकी पूर्ति के लिए दोनों एक- दूसरे का आश्रय लेते हैं। यह आश्रय पति- पत्नी के रूप में केवल काम प्रयोजन के रूप में हो, ऐसा किसी भी प्रकार आवश्यक नहीं। नारी के प्रति नर और नर के प्रति नारी पवित्र, पुनीत, कर्तव्य और स्नेह का सात्विक एवं स्वर्गीय संबंध रखते हुए भी माता, पुत्री या बहन के रूप में सखा, सहोदर, स्वजन और आत्मीय के रूप में श्रेष्ठ संबंध रख सकते हैं, वैसा ही रखना भी चाहिए।
 
🔴 पवित्रता में जो अजस्र बल है, वह वासना के नारकीय कीचड़ में कभी भी दृष्टिगोचर नहीं हो सकता। वासना और प्रेम दोनों दृष्टिकोण एक- दूसरे से उतने ही भिन्न हैं, जितनी स्वर्ग से नरक में भिन्नता है। व्याभिचार में द्वेष, ईर्ष्या, आधिपत्य, संकीर्णता, कामुकता, रूप- सौंदर्य शृंगार, कलह, निराशा, कुढ़न, पतन, ह्रास, निंदा आदि अगणित यंत्रणाएँ भरी पड़ी हैं, पर प्रेम इन सबसे सर्वथा मुक्त है। पवित्रता में त्याग, उदारता, शुभकामना, सहृदयता और शांति के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता।

🔵 युग निर्माण सत्संकल्प में, आत्मवत् सर्वभूतेषु की, परद्रव्येषु लोष्ठवत्, परदारेषु मातृवत् की पवित्र भावनाएँ भरी पड़ी हैं, इन्हीं के आधार पर नवयुग का सृजन हो सकता है। इन्हीं का अवलंबन लेकर इस दुनिया को स्वर्ग के रूप में परिणत करने का स्वप्न साकार हो सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.70

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.12

👉 विशिष्ट प्रयोजन के लिये, विशिष्ट आत्माओं की विशिष्ट खोज (भाग 3)

🔵 उपयुक्त प्रतिभाओं से सर्म्पक साधना उन्हें तत्पर तथा सक्षम बनाना एवं कार्य क्षेत्र में उतर सकने की सामर्थ्य से सुसम्पन्न करना ही इन दिनों मिशन की परोक्ष गतिविधियों को मूर्धन्य प्रयास है। प्रत्यक्ष कार्यक्रम तो पूर्ववत् हैं। व्यक्ति, परिवार और समाज के नव निर्माण की जो रचनात्मक प्रवृत्तियाँ चल रही हैं। उनमें हेर-फेर कुछ नहीं करना है। मात्र उनका स्तर एवं विस्तार ही बढ़ना है। प्रत्यक्ष क्रिया-कलापों में इतना अभिवर्धन होगा किन्तु परोक्ष ढूँढ़ खोज के लिए उन प्रयासों पर विशेष ध्यान दिया जायगा जो समर्थ प्रतिभाओं को ढूँढ़ने, और उछालने की सामयिक माँग पूरी कर सकें।

🔴 एक जैसी शकल सूरत और समान परिस्थिति वाले व्यक्तियों के मध्य भी कई बार स्तर की दृष्टि से जमीन आसमान जैसा अन्तर पाया जाता है यह उनकी उस आन्तरिक संरचना का होता है जो जन्म-जन्मान्तरों से संचित संस्कारों से बनती है। यह सम्पदा किस के पास है यह जाँचना, जन-जन की तलाशी लेने के समान है। तलाशी ऐसी भी नहीं जो चारों जमाखोरों के यहाँ पुलिस द्वारा छापा मार कर पकड़ने की तरह सरल हो। वस्तुएँ तो पकड़ी जा सकती हैं, पर अन्तस् की प्रवृत्तियों की जाँच पड़ताल और खोजबीन करना कठिन है। लोग भीतर कुछ होते हैं और बाहर कुछ बनते रहते हैं। दंभ बहुत और तथ्य कम वाले बहरुपियों, अभिनेताओं और बाजीगरों से जनसमाज भरा पड़ा है। इनकी गहराई में कैसे उतरा जाय? खारी जल राशि से भरे समुद्र में गहरी डुबकी मार कर मोतियों को किस तली तलहटी में ढूँढ़ा जाय। उन क्षेत्रों में पाये जाने वाले मगरमच्छों से बचने और जूझने की कुशलता के बिना कोई गोताखोर सफल नहीं हो सकता। इस प्रयास में भी ऐसी ही तैयारी करनी पड़ रही है।

🔵 युग परिवर्तन सृष्टि के इतिहास में अभूत पूर्व अवसर है। पिछले दिनों दुनिया बिखरी थी। स्थानीय समस्याओं के सामयिक समाधान करना ही तत्कालीन महामानवों का छोटा सा उत्तरदायित्व रहता था। रावण, कंस, दुर्योधन आदि के अनाचार सीमित क्षेत्र में थोड़े से व्यक्तियों के द्वारा होते हैं। अधिक होने से उसके समाधान भी लंका युद्ध, महाभारत जैसे उपचारों से निकले और मुट्ठी भर प्रतिभाओं ने वे कार्य सम्पन्न कर दिये। वैसी स्थिति अब नहीं है दुनिया सिकुड़ कर बहुत छोटी हो गई है। हवा का प्रभाव एक छोर से दूसरे छोर तक पहुँचता है। 700 करोड़ मनुष्य अब एक दूसरों को प्रकारान्तर से प्रभावित करते हैं।


🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1980 पृष्ठ 47
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1980/February/v1.47

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 133)

🌹  तपश्चर्या आत्म-शक्ति के उद्भव हेतु अनिवार्य

🔵 यह जीवनचर्या के अद्यावधि भूतकाल का विवरण हुआ। वर्तमान में इसी दिशा में एक बड़ी छलांग लगाने के लिए उस शक्ति ने निर्देश किया है, जिस सूत्रधार के इशारों पर कठपुतली की तरह नाच-नाचते हुए समूचा जीवन गुजर गया। अब हमें तपश्चर्या की एक नवीन उच्चस्तरीय कक्षा में प्रवेश करना पड़ा है। सर्वसाधारण को इतना ही पता है कि एकान्तवास में हैं किसी से मिल जुल नहीं रहे हैं। यह जानकारी सर्वथा अधूरी है। क्योंकि जिस व्यक्ति के रोम-रोम में कर्मठता, पुरुषार्थ परायणता, नियमितता और व्यवस्था भरी पड़ी हो वह इस प्रकार का निरर्थक और निष्क्रिय जीवन जी नहीं सकता जैसा कि समझा जा रहा है। एकांत वास में हमें पहले की अपेक्षा अधिक श्रम करना पड़ा है। अधिक व्यस्त रहना पड़ा है तथा लोगों से न मिलने की विधा अपनाने पर भी इतने ऐसों से संपर्क सूत्र जोड़ना पड़ा है जिनके साथ बैठने में ढेरों समय चला जाता है, पर मन नहीं भरता। फिर एकांत कहाँ हुआ? न मिलने की बात कहाँ बन पड़ी? मात्र कार्यशैली में ही राई रत्ती परिवर्तन हुआ। मिलने-जुलने वालों का वर्ग एवं विषय भर बदला। ऐसी दशा में अकर्मण्य और पलायनवाद का दोष ऊपर कहाँ लदा? तपस्वी सदा ऐसी ही रीति-नीति अपनाते हैं। वे निष्क्रिय दीखते भर हैं, वस्तुतः अत्यधिक व्यस्त रहते हैं। लट्टू जब पूरे वेग से घूमता है, तब स्थिर खड़ा भर दीखता है। उसके घूमने का पता तो तब लगता है, जब चाल धीमी पड़ती है और बैलेंस लड़खड़ाने पर औंधा गिरने लगता है।

🔴 आइन्स्टीन जिन दिनों अत्यधिक महत्त्वपूर्ण अणु अनुसंधान में लगे थे, उन दिनों उनकी जीवनचर्या में विशेष प्रकार का परिवर्तन किया गया था। वे भव्य भवन में एकाकी रहते थे। सभी सुविधाएँ उसमें उपलब्ध थीं, साहित्य, प्रयोग उपकरण एवं सेवक सहायक भी। वे सभी दूर रखे जाते थे ताकि एकांत में एकाग्रतापूर्वक बन पड़ने वाले चिंतन में कोई व्यवधान उत्पन्न न हो। वे जब तक चाहते नितांत एकांत में सर्वथा एकाकी रहते। कोई उनके कार्य में तनिक भी विक्षेप नहीं कर सकता है। जब वे चाहते घंटी बजाकर नौकर बुलाते और इच्छित वस्तु या व्यक्ति प्राप्त कर लेते। मिलने वाले मात्र कार्ड जमा कर जाते और जब कभी उन्हें बुलाया जाता तब जबकि महीनों प्रतीक्षा करते। घनिष्ठता बताकर कोई भी उनके कार्य में विक्षेप नहीं कर सकता था। इतना प्रबंध बन पड़ने पर ही उनके लिए यह सम्भव हुआ कि संसार को आश्चर्य चकित कर सकें। यदि यार वासों से घिरे रहते उथले कार्यों में रस लेकर समय गुजारते तो अन्यान्यों की तरह वे भी बहुमूल्य जीवन का कोई कहने लायक लाभ न उठा पाते। प्राचीनकाल में ऋषि-तपस्वियों की जीवनचर्या ठीक इसी प्रकार की थी। उसमें तन्यमतापूर्वक अपना कार्य कर सकने के लिए वे कोलाहल रहित स्थान निर्धारित करते थे और पूरी तरह तन्मयता के साथ निर्धारित प्रयोजनों में लगे रहते थे।

🔵 अपने सामने भी प्रायः इसी स्तर के नए कार्य करने के लिए रख दिए गए। वे बहुत वजनदार हैं, साथ ही बहुत महत्त्वपूर्ण भी। इनमें एक है-विश्वव्यापी सर्वनाशी विभीषिकाओं को निरस्त कर सकने योग्य आत्मशक्ति उत्पन्न करना। दूसरा है-सृजन शिल्पियों को जिस प्रेरणा और क्षमता के बिना कुछ करते-धरते नहीं बन पड़ रहा है, उसकी पूर्ति करना। तीसरा है नवयुग के लिए जिन सत्प्रवृत्तियों का सूत्र-संचालन होना है, उनका ताना-बाना बुनना और ढाँचा खड़ा करना। यह तीनों ही कार्य ऐसे हैं, जो अकेले स्थूल शरीर से नहीं बन सकते। उसकी सीमा और सामर्थ्य अति न्यून है। इंद्रिय सामर्थ्य थोड़े दायरे में काम कर सकती है और सीमित वजन उठा सकती है, हाड़-माँस के पिण्ड में बोलने, सोचने, चलने-फिरने, करने-कमाने, पचाने की बहुत थोड़ी सामर्थ्य है। उतने भर से सीमित काम हो सकता है। सीमित कार्य से शरीर यात्रा चल सकती है और समीपवर्ती संबद्ध लोगों का यत्किंचित् भला हो सकता है। अधिक व्यापक और अधिक बड़े कामों के लिए सूक्ष्म और कारण शरीरों के विकसित किए जाने की आवश्यकता पड़ती है। तीनों जब समान रूप से सामर्थ्यवान और गतिशील होते हैं तब कहीं इतने बड़े काम बन सकते हैं, जिनके करने की इन दिनों आवश्यकता पड़ गई है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.149

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.19

बुधवार, 23 अगस्त 2017

👉 अपना मूल्य, आप ही न गिरायें (भाग 5)

🔵 दैन्य का रोग दूर करने के लिए अपनी चिन्तन धारा बदलनी पड़ेगी। मनुष्य की आत्मा में अद्भुत शक्तियाँ छिपी पड़ी हैं। उनका चिन्तन करने से वे जाग पड़ती हैं और मनुष्य के चरित्र में समाविष्ट होकर अपना चमत्कार दिखलाने लगती हैं। आत्म-निन्दा के स्थान पर यदि आत्म-प्रशंसापूर्वक अपना चिन्तन किया जाय तो पता चलेगा कि हम एक उदात्त चरित्र और महान शक्तियों वाले व्यक्ति हैं। हम भी उन दैवी गुणों और विभूतियों के भण्डार हैं, जिनका कोई दूसरा है या हो सकता है। इस प्रकार के अनुकूल चिन्तन अभ्यास से निश्चय ही आपका चरित्र चमक उठेगा, आपकी शक्तियाँ विकसित हो उठेंगी और आप संसार में बहुत से उल्लेखनीय कार्य कर सकेंगे।

🔴 आत्म-चिन्तन एक अद्भुत कला है। इससे जहाँ आपको अपने गुणों का आभास होगा वहाँ उन न्यूनताओं का भी पता चलेगा, जो आपको दैन्य की ओर ले जाती हैं। आत्म-चिन्तन करने पर आप जिस किसी समय ऐसी कमी अपने में पायें, जो आपको दीनता अथवा हीनता की ओर ले जाती हों उसे तुरन्त दूर करने का प्रयत्न करिये। यदि आपका धनाभाव आपको दीन बनाता है तो या तो संतोष और सादगी में सुख लीजिए अथवा किसी ऐसे क्षेत्र में उद्योग कीजिए, जिसमें धन प्राप्ति के लिए अवसर हो।

🔵 यदि अज्ञान के कारण आप में हीन भावना घर किए है तो अध्ययन, मनन और सत्संग का क्रम चलाइये। ऐसा पुरुषार्थ करिये जिससे आपको ज्ञान की उपलब्धि हो। यदि आप अपने को निर्बल अनुभव करते हैं तो अपने में साहस स्वास्थ्य और विश्वास की अभिवृद्धि करिए। साहसपूर्ण साहित्य पढ़िए और साहसी वीर और धीर पुरुषों का संग करिए। तात्पर्य यह है कि जो अभाव अथवा त्रुटि आपको दीनता की ओर ढकेलती हो उसे उपायपूर्वक दूर करने में जग जाइये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जुलाई 1968 पृष्ठ 30

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 50)

🌹  नर- नारी परस्पर पवित्र दृष्टि रखेंगे।
🔴 बिच्छू की बनावट कैसी अच्छी है, पर उसके डंक को छूते ही विपत्ति खड़ी हो जाती है। मधुमक्खी कितनी उपकारी है। भौंरा कितना मधुर गूँजता है, काँतर कैसे रंग- बिरंगे पैरों से चलती है, बर्र और ततैया अपने छत्तों में बैठे हुए कैसे सुंदर गुलदस्ते से सजे दीखते हैं, पर इनमें से किसी का भी स्पर्श हमारे लिये विपत्ति का कारण बन जाता है। नारी के कामिनी और रमणी के रूप में जो एक विष की छोटी- सी पोटली छिपी हुई है, उस सुनहरी कटार से हमें बचना ही चाहिए।

🔵 अपने से बड़ी आयु की नारी को माता के रूप में, समान आयु वाली को बहन के रूप में, छोटी को पुत्री के रूप में देखकर, उन्हीं भावनाओं का अधिकाधिक अभिवर्द्धन करके हम उतने ही आह्लादित और प्रमुदित हो सकते हैं, जैसे माता सरस्वती, माता लक्ष्मी, माता दुर्गा के चरणों में बैठकर उनके अनंत- वात्सल्य का अनुभव करते हैं। हम गायत्री उपासक भगवान् की सर्वश्रेष्ठ सजीव रचना को नारी रूप में ही मानते हैं। नारी में भगवान् की करुणा, पवित्रता और सदाशयता का दर्शन करना हमारी भक्तिभावना का दार्शनिक आधार है। उपासना में ही नहीं, व्यावहारिक जीवन में भी हमारा दृष्टिकोण यही रहना चाहिए। नारी मात्र को हम पवित्र दृष्टि से देखें। वासना की दृष्टि से न सोचें, न उसे देखें, न उसे छुए।
 
🔵 दाम्पत्य जीवन में संतानोत्पादन का विशेष प्रयोजन या अवसर आवश्यक हो तो पति- पत्नी कुछ क्षण के लिए वासना की एक हल्की धूप- छाँह अनुभव कर सकते हैं। शास्त्रों में तो इतनी भी छूट नहीं है, उन्होंने तो गर्भाधान संस्कार को भी यज्ञोपवीत या मुण्डन- संस्कार की भाँति एक पवित्र धर्मकृत्य माना है और इसी दृष्टि से उस क्रिया को सम्पन्न करने की आज्ञा दी है, पर मानवीय दुर्बलता को देखते हुए दाम्पत्य जीवन में एक सीमित मर्यादा के अंतर्गत वासना को छूट मिल सकती है। इसके अतिरिक्त दाम्पत्य जीवन भी ऐसा ही पवित्र होना चाहिए जैसा कि दो सहोदर भाइयों का या दो सगी बहनों का होता है। विवाह का उद्देश्य दो शरीरों को एक आत्मा बनाकर जीवन की गाड़ी का भार दो कंधों पर ढोते चलना है, दुष्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करना नहीं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.69
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.12

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 132)

🌹  तपश्चर्या आत्म-शक्ति के उद्भव हेतु अनिवार्य

🔵 तपश्चर्या के मौलिक सिद्धांत है-संयम और सदुपयोग। इंद्रिय संयम से, पेट ठीक रहने से स्वास्थ्य नहीं बिगड़ता। ब्रह्मचर्य पालन से मनोबल का भण्डार चुकने नहीं पाता। अर्थ संयम से, नीति की कमाई से औसत भारतीय स्तर का निर्वाह करना पड़ता है, फलतः न दरिद्रता फटकती है और न बेईमानी की आवश्यकता पड़ती है। समय संयम से व्यस्त दिनचर्या बनाकर चलना पड़ता है। फलतः कुकर्मों के लिए समय ही नहीं बचता है। जो बन पड़ता है, श्रेष्ठ और सार्थक ही होता है। विचार संयम से एकात्मता सधती है। आस्तिकता, आध्यात्मिक और धार्मिकता का दृष्टिकोण विकसित होता है।

🔴 भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग की साधना सहज सधती रहती है। संयम का अर्थ है-बचत। चारों प्रकार का संयम बरतने पर मनुष्य के पास इतनी अधिक सामर्थ्य बच रहती है, जिसे परिवार निर्वाह के अतिरिक्त महान प्रयोजनों में प्रचुर मात्रा में भली प्रकार लगाया जाता रहे। संयमशीलों को वासना, तृष्णा और अहंता की खाईं पाटने में मरना खपना नहीं पड़ता, इसलिए सदुद्देश्यों की दिशा में कदम बढ़ाने की आवश्यकता पड़ने पर व्यस्तता, अभावग्रस्तता, चिंता, समस्या आदि के बहाने नहीं गढ़ने पड़ते। स्वार्थ-परमार्थ साथ-साथ सधते रहते हैं और हँसती-हँसाती, हलकी-फुलकी जिंदगी जीने का अवसर मिल जाता है। इसी मार्ग पर अब से ६० वर्ष पूर्व मार्गदर्शक ने चलना सिखाया था। वह क्रम अनवरत रूप से चलता रहा। जब तब वातावरण में बैटरी चार्ज करने के लिए बुलाया जाता रहा।

🔵 विगत तीस वर्षों में एक-एक वर्ष के लिए एकान्तवास और विशेष साधना उपक्रम के लिए जाना पड़ा है। इसका उद्देश्य एक ही था तपश्चर्या के उत्साह और पुरुषार्थ में, श्रद्धा और विश्वास में कहीं कोई कमी न पड़ने पाए। जहाँ कमी पड़ रही हो उसकी भरपाई होती रहे। भागीरथ शिला-गंगोत्री में की गई साधना से धरती पर ज्ञान गंगा की, प्रज्ञा अभियान की, अवतरण की क्षमता एवं दिशा मिली। इस बार उत्तरकाशी के परशुराम आश्रम में वह कुल्हाड़ा उपलब्ध हुआ जिसके सहारे व्यापक अवांछनीयता के प्रति लोकमानस में विक्षोभ उत्पन्न किया जा सके। पौराणिक परशुराम ने धरती पर से अनेक आततायियों के अनेक बार सिर काटे थे। अपना सिर काटना ‘‘ब्रेन वाशिंग’’ है। विचार क्रांति एवं प्रज्ञा-अभियान में सृजनात्मक ही नहीं सुधारात्मक प्रयोजन भी सम्मिलित हैं। यह दोनों ही उद्देश्य जिस प्रकार जितने व्यापक क्षेत्र में जितनी सफलता के साथ सम्पन्न होते रहे हैं, उनमें न शक्ति कौशल है न साधनों का चमत्कार, न परिस्थितियों का संयोग यह मात्र तपश्चर्या की सामर्थ्य से ही सम्पन्न हो सका।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 विशिष्ट प्रयोजन के लिये, विशिष्ट आत्माओं की विशिष्ट खोज (भाग 2)

🔵 अवतार के समय देवता उसकी सहायता करने आते और देह धारण करते है। सामान्य मनुष्यों की मनःस्थिति नर पशुओं जैसी होती है वे पेट और प्रजनन के लिए मरते खपते हैं तथा लोभ, मोह अहंकार की लिप्साओं से बने कोल्हू में पिलते रहते हैं। यही उनकी प्रवृत्ति और नियति होती है।उनमें थोडा सा उत्साह तो भरा जा सकता है और एक सीमा तक प्रगतिशील भी बनाया जा सकता है किन्तु बहुत प्रयत्न करने पर भी वे देव भूमिका निभा सकने में सफल नहीं हो पाते। इसके लिए संचित संस्कारों की आवश्यकता है। खिलौने बालू के नहीं चिकनी मिट्टी के बनते हैं हथौड़े की चोट जंग लगे लोहे नहीं, फौलादी इस्पात ही सह पाते हैं।

🔴 युग सृजन के आरम्भिक चरण बाल-कक्ष जैसे हैं। उनमें हर स्तर के व्यक्ति के लिए कुछ न कुछ कर सकने योग्य-शत सूत्री कार्यक्रम बनाये गये हैं। जन आन्दोलन इसी प्रकार का होता है। गाँधी जी ने स्वतन्त्रता आन्दोलन को सर्व सुलभ बनाने की दृष्टि से नमन सत्याग्रह विदेशी वस्त्र एवं शराब की दुकानों पर धरना, प्रतिबन्ध उल्लंघन जैसे कार्यक्रम बनाये थे। वे व्यापक भी हुए थे इतने पर भी उस आन्दोलन का सूत्र संचालन कर सकने की क्षमता नेहरु, पटेल, जैसे मुट्ठी भर लोगों में ही थी, स्पष्ट है कि यदि उच्चस्तरीय हस्तियाँ बागडोर न सँभालतीं तो जेल आन्दोलन को उतनी जल्दी और उतनी आर्श्चयजनक सफलता न मिल पाती जैसी कि उसमें मिल सकी। महामानव ही किसी देश, समाज, या युग की वास्तविक सम्पदा होती है। प्रखर व्यक्तित्वों का कुशल नेतृत्व ही उफनती नदी में नाव खेतो और तूफानों से टकराते हुए जहाज को किनारे लगाता है।

🔵 युग सृजन के अनेक महत्वपूर्ण कामों में सबसे प्रमुख है-उस प्रयोजन को पूरा कर सकने में समर्थ क्षमताओं को ढूँढ़ निकालना और उन्हें प्रशिक्षित परिपक्व करना। यह कार्य धीमी गति से तो अभियान के प्रथम दिन से ही चल रहा है, पर अब उसमें अधिक तीव्रता लाने की आवश्यकता पड़ रही है। क्योंकि उत्तरदायित्व क्रमशः अधिक भारी होते चले जा रहे हैं। सामान्य भार वहन सामान्य क्षमता के सहारे भी होता रहता है। जब-जब अधिक उठाना अधिक ढोना एव अधिक दौड़ना हो तो वाहन तथा साधन उसी स्तर के जुटाने होंगे। आरंभिक चरण में जागृत आत्माओं से भी काम चलता रहा है, पर अब अधिक क्षमता सम्पन्नों की आवश्यकता पड़ रही है। अस्तु ढूँढ़ने का प्रयास अधिक सुविस्तृत किया जा रहा है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1980 पृष्ठ 46
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1980/February/v1.46

👉 आज का सद्चिंतन 23 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 Aug 2017


👉 प्रेम की परिभाषा

🔴 एक बार संत राबिया एक धार्मिक पुस्तक पढ़ रही थीं। पुस्तक में एक जगह लिखा था, शैतान से घृणा करो, प्रेम नहीं। राबिया ने वह लाइन काट दी। कुछ दिन बाद उससे मिलने एक संत आए। वह उस पुस्तक को पढ़ने लगे। उन्होंने कटा हुआ वाक्य देख कर सोचा कि किसी नासमझ ने उसे काटा होगा। उसे धर्म का ज्ञान नहीं होगा। उन्होंने राबिया को वह पंक्ति दिखा कर कहा, जिसने यह पंक्ति काटी है वह जरूर नास्तिक होगा।

🔵 राबिया ने कहा- इसे तो मैंने ही काटा है।

🔴 संत ने अधीरता से कहा- तुम इतनी महान संत होकर यह कैसे कह सकती हो कि शैतान से घृणा मत करो। शैतान तो इंसान का दुश्मन होता है।

🔵 इस पर राबिया ने कहा- पहले मैं भी यही सोचती थी कि शैतान से घृणा करो। लेकिन उस समय मैं प्रेम को समझ नहीं सकी थी। लेकिन जब से मैं प्रेम को समझी, तब से बड़ी मुश्किल में पड़ गई हूं कि घृणा किससे करूं। मेरी नजर में घृणा लायक कोई नहीं है।

🔴 संत ने पूछा- “क्या तुम यह कहना चाहती हो कि जो हमसे घृणा करते हैं, हम उनसे प्रेम करें।“


🔵 राबिया बोली- प्रेम किया नहीं जाता। प्रेम तो मन के भीतर अपने आप अंकुरित होने वाली भावना है। प्रेम के अंकुरित होने पर मन के अंदर घृणा के लिए कोई जगह नहीं होगी। हम सबकी एक ही तकलीफ है। हम सोचते हैं कि हमसे कोई प्रेम नहीं करता। यह कोई नहीं सोचता कि प्रेम दूसरों से लेने की चीज नहीं है, यह देने की चीज है। हम प्रेम देते हैं। यदि शैतान से प्रेम करोगे तो वह भी प्रेम का हाथ बढ़ाएगा।

🔴 संत ने कहा- “अब समझा, राबिया! तुमने उस पंक्ति को काट कर ठीक ही किया है। दरअसल हमारे ही मन के अंदर प्रेम करने का अहंकार भरा है। इसलिए हम प्रेम नहीं करते, प्रेम करने का नाटक करते हैं। यही कारण है कि संसार में नफरत और द्वेष फैलता नजर आता।“

🔵 वास्तव में प्रेम की परिभाषा ईश्वर की परिभाषा से अलग नहीं है। दोनो ही देते हैं बदले में बिना कुछ लिये। ईश्वर, माता-पिता, प्रकृति सभी बिना हमसे कुछ पाने की आशा किये हमें देते हैं, और यह इंतजार करते रहते हैं कि; हम कब उनसे और अधिक पाने के योग्य स्वयं को साबित करेंगे और वे हमें और अधिक दे सकेंगे। प्रेम को जानना है तो पेडों और फूलों को देखिये तोडे और काटे जाने की शिकायत तक नहीं बस देने में लगे हैं।

मंगलवार, 22 अगस्त 2017

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 131)

🌹  तपश्चर्या आत्म-शक्ति के उद्भव हेतु अनिवार्य

🔵 भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दिनों महर्षि रमण का मौन तप चलता रहा। इसके अतिरिक्त भी हिमालय में अनेक उच्चस्तरीय तपश्चर्याएँ इसी निमित्त चलीं। राजनेताओं द्वारा संचालित आन्दोलनों को सफल बनाने में इस अदृश्य सूत्र संचालन का कितना बड़ा योगदान रहा इसका स्थूल दृष्टि से अनुमान न लग सकेगा, किन्तु सूक्ष्मदर्शी तथ्यान्वेषी उन रहस्यों पर पूरी तरह विश्वास करते हैं।

🔴 जितना बड़ा कार्य उतना बड़ा उपचार के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए, इस बार विशिष्ट तपश्चर्या वातावरण के प्रवाह को बदलने सुधारने के लिए की गई है। इसलिए उसका स्तर और स्वरूप कठिन है। आरम्भिक दिनों में जो काम कंधे पर आया था वह भी लोकमानस को परिष्कृत करने, जागृत आत्माओं को एक संगठन सूत्र में पिरोने और रचनात्मक गतिविधियों का उत्साह उभारने का था। इतने भर से काम चल जाया करे तो इसकी व्यवस्था सम्पन्न लोग अपनी जेब से अथवा दूसरों से माँग-जाँचकर आसानी से पूर्ण कर लिया करते और अब तक स्थिति को बदलकर कुछ से कुछ बना लिया गया होता। कइयों ने पूरे जोर-शोर से यह प्रयत्न किए भी हैं। प्रचारात्मक साधनों के अम्बार भी जुटाए हैं, पर उनके बलबूते कुछ ऐसा न बन पड़ा जिसका कारगर प्रभाव हो सके। वस्तुस्थिति को समझने वाले निर्देशक ने सर्वप्रथम एक ही काम सौंपा। चौबीस साल की गायत्री महापुरश्चरण साधना शृंखला का पिछले तीस वर्षों में जो कुछ बन पड़ा उसमें श्रेय है। कमाई की वह हुण्डी ही अब तक काम देती रही। अपना, व्यक्ति विशेष का, समाज का, संस्कृति का यदि कुछ भला अपने द्वारा बन पड़ा, तो इस चौबीस वर्ष के संचित भण्डार को खर्च किए जाने की बात ही समझी जा सकती है। उस समय भी मात्र जप संख्या ही पूरी नहीं की गई थी, वरन् साथ ही कितने ही अनुबंध-अनुशासन एवं व्रत पालन भी जुड़े हुए थे।

🔵 जप संख्या तो ज्यों-त्यों करके कोई भी खाली समय वाला पूरी कर सकता है, पर विलासी एवं अस्त-व्यस्त जीवनचर्या अपनाने वाला कोई व्यक्ति उतनी भर चिह्न पूजा से कोई बड़ा काम नहीं कर सकता। साथ में तपश्चर्या के कठोर विधान भी जुड़े रहने चाहिए जो स्थूल शरीर, सूक्ष्म और कारण तीनों ही शरीरों को तपाते और हर दृष्टि से समर्थ बनाते हैं। संचित कषाय-कल्मष भी आत्मिक प्रगति के मार्ग में बहुत बड़े व्यवधान होते हैं। उनका निवारण एवं निराकरण भी इसी भट्ठी में प्रवेश करने से बन पड़ता है। जमीन में से निकलते समय लोहा मिट्टी मिला कच्चा होता है। अन्य धातुएँ भी ऐसी ही अनगढ़ स्थिति में होती है उन्हें भट्ठी में डालकर तपाया और प्रयोग के उपयुक्त बनाया जाता है। रस शास्त्री बहुमूल्य रस भस्में बनाने के लिए कई-कई अग्नि संस्कार करते हैं।

🔴 कुम्हार के पास बर्तन पकाने के लिए उन्हें आँवे में तपाने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। मनुष्यों पर भी यही नियम लागू होते हैं। ऋषि मुनियों की सेवा साधना, धर्म-धारणा तो प्रकट है ही साथ ही वे अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए आवश्यक शक्ति अर्जित करने के लिए तपश्चर्या भी समय-समय पर अपनाते रहते थे। यह प्रक्रिया अपने-अपने ढंग से हर महत्त्वपूर्ण व्यक्ति को सम्पन्न करनी पड़ी है, करनी पड़ेगी। क्योंकि ईश्वर प्रदत्त शक्तियों का उन्नयन, परिपोषण इसके बिना हो नहीं सकता। व्यक्तित्व में पवित्रता, प्रखरता और परिपक्वता न हो तो कहने योग्य-सराहने योग्य सफलताएँ प्राप्त कर सकने का सुयोग ही नहीं बनता। कुचक्र, छद्म और आतंक के बलबूते उपार्जित की गई सफलताएँ जादू तमाशे में हथेली पर सरसों जमाने जैसे चमत्कार दिखाकर तिरोहित हो जाती हैं। बिना जड़ का पेड़ कब टिकेगा और किस प्रकार फूलेगा-फलेगा?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.146

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.19

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 49)

🌹  नर- नारी परस्पर पवित्र दृष्टि रखेंगे।

🔴 नर का नारी के प्रति तथा नारी का नर के प्रति पवित्र दृष्टिकोण होना, आत्मोन्नति सामाजिक प्रगति एवं सुख- शांति के लिए आवश्यक है। ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने वाले, अविवाहित नर- नारियों के लिए व्यवहार एवं चिंतन में एक- दूसरे के प्रति पवित्रता का समावेश अनिवार्य है ही, किन्तु अन्यों को भी उसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। अपवित्र पाशविक दृष्टि रखकर कोई भी वर्ग, दूसरे वर्ग की श्रेष्ठता का न तो मूल्यांकन कर सकता है और न उनका लाभ उठा सकता है। इस हानि से बचने की अत्यधिक उपयोगी प्रेरणा इस वाक्य में दी गई है।

🔵 ‘नारी इस संसार की सर्वोत्कृष्टता पवित्रता है।’ जननी के रूप में वह अगाध वात्सल्य लेकर इस धरती पर अवतीर्ण होती है। पत्नी के रूप में त्याग और बलिदान की, प्रेम और आत्मदान की सजीव प्रतिमा के रूप में प्रतिष्ठित होती है। बहन के रूप में स्नेह, उदारता और ममता की देवी जैसी परिलक्षित होती है। पुत्री के रूप में वह कोमलता, मृदुलता, निश्छलता की प्रतिकृति के रूप में इस नीरस संसार को सरस बनाती रहती है। परमात्मा ने नारी में सत्य, शिव और सुंदर का अनंत भंडार भरा है। उसके नेत्रों में एक अलौकिक ज्योति रहती है, जिसकी कुछ किरणें पड़ने मात्र से निष्ठुर हृदयों की भी मुरझाई हुई कली खिल सकती है। दुर्बल, अपंग मानव को शक्तिमान और सत्ता सम्पन्न बनाने का सबसे बड़ा श्रेय यदि किसी को हो सकता है तो वह नारी का ही है। वह मूर्तिमान प्रेरणा, भावना और स्फूर्ति के रूप में अचेतन को चेतन बनाती है। उसके सान्निध्य में अकिंचन व्यक्ति का भाग्य मुखरित हो उठता है। वह अपने को कृत- कृत्य हुआ अनुभव करता है।
 
🔵 नारी की महत्ता अग्नि के समान है। अग्नि हमारे जीवन का स्रोत है, उसके अभाव में हम निर्जीव और निष्प्राण बनकर ही रह सकते हैं। उसका उपयोगिता की जितनी महिमा गाई जाए, उतनी ही कम है, पर इस अग्नि का दूसरा पहलू भी है, वह स्पर्श करते ही काली नागिन की तरह लपलपाती हुई उठती है और छूते ही छटपटा देने वाली, भारी पीड़ा देने वाली परिस्थिति उत्पन्न कर देती है। नारी में जहाँ अनंत गुण हैं, वहाँ एक दोष ऐसा भी है जिसके स्पर्श करते ही असीम वेदना से छटपटाना पड़ता है। वह रूप है- नारी का रमणी रूप। रमण की आकांक्षा से जब भी उसे देखा, सोचा और छुआ जाएगा तभी वह काली नागिन की तरह अपने विष भरे दंत चुभो देगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.68

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.12

👉 अपना मूल्य, आप ही न गिरायें (भाग 4)

🔵 निश्चय ही यह आपका भ्रम ही है। क्योंकि संसार में कोई भी मनुष्य मूल रूप से न तो निर्बल होता है और न निर्धन। उसका अपना दृष्टिकोण ही उसे वैसा बना देता है। मनुष्य परमात्मा का अमर पुत्र है। वह अपने पिता के दिव्य गुणों से विभूषित है। उसके अन्दर अपरिमित आध्यात्मिक सम्पदायें भरी हुई हैं। उसका दीन-हीन और निर्बल होना सम्भव नहीं। उसका आत्म-विस्मरण ही उसे वैसा बनाये रहता है। अपने सत्य-स्वरूप को पहचानिये, उसका चिन्तन करिये, आपका सारा दैन्य दूर हो जायेगा और आप अपने को संसार में सर्वशक्तिमान परमात्मा का उत्तराधिकारी अनुभव करेंगे।

🔴 आप संसार के सर्वश्रेष्ठ प्राणी हैं। आपकी शक्तियों और सम्पदाओं का पारावार नहीं। आप अखण्ड और अनन्त भौतिक, मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक शक्तियों से सम्पन्न कर संसार में अवतरित किए गये हैं। जैव-विज्ञान का नियम है कि किसी जीव के पिता में जो गुण होते हैं, वही उसकी सन्तान में आते हैं। स्वस्थ पिता की सन्तान स्वस्थ, गुणी पिता की सन्तान गुणी और अयोग्य पिता की सन्तान का अयोग्य होना स्वाभाविक है। तब आप परमात्म की सन्तान होकर दीन-हीन और मलीन किस प्रकार हो सकते हैं? यह भ्रम आपको तभी तक रहता है, जब तक आप अपनी पैतृकता को भूले हुए हैं। अपनी पैतृकता याद कीजिये और आप में सारे ईश्वरीय गुण स्फुरित हो उठेंगे।

🔵 यहाँ पर इतना और स्पष्ट हो जाय कि केवल पैतृकता स्मरण करने से ही काम नहीं चलेगा। उसमें विश्वास करना होगा उसे अपने अन्दर अनुभव भी करना होगा। विश्वास रहित स्थिति नकारात्मक ही होती है। जब तक जो पुत्र अपने पिता की परम्परा में विश्वास नहीं करेगा, वह उसका उत्तराधिकारी किस प्रकार बन सकता है और बिना उत्तराधिकार के उसकी सम्पदाओं का स्वामी भी कैसे बनेगा। आत्म-स्फुरण के लिए अपने में और अपनी पैतृक परम्परा में प्रतीति करना नितान्त आवश्यक है। ऐसा करने पर ही आप अपने मन्तव्य में कृतकृत्य हो सकेंगे अन्यथा नहीं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जुलाई 1968 पृष्ठ 30

👉 आज का सद्चिंतन 22 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 22 Aug 2017


👉 ईर्ष्या या नफ़रत

🔵 एक बार एक महात्मा ने अपने शिष्यों से अनुरोध किया कि वे कल से प्रवचन में आते समय अपने साथ एक थैली में बडे़ आलू साथ लेकर आयें, उन आलुओं पर उस व्यक्ति का नाम लिखा होना चाहिये जिनसे वे ईर्ष्या करते हैं। जो व्यक्ति जितने व्यक्तियों से घृणा करता हो, वह उतने आलू लेकर आये।

🔴 अगले दिन सभी लोग आलू लेकर आये, किसी पास चार आलू थे, किसी के पास छः या आठ और प्रत्येक आलू पर उस व्यक्ति का नाम लिखा था जिससे वे नफ़रत करते थे।

🔵 अब महात्मा जी ने कहा कि, अगले सात दिनों तक ये आलू आप सदैव अपने साथ रखें, जहाँ भी जायें, खाते-पीते, सोते-जागते, ये आलू आप सदैव अपने साथ रखें। शिष्यों को कुछ समझ में नहीं आया कि महात्मा जी क्या चाहते हैं, लेकिन महात्मा के आदेश का पालन उन्होंने अक्षरशः किया। दो-तीन दिनों के बाद ही शिष्यों ने आपस में एक दूसरे से शिकायत करना शुरू किया, जिनके आलू ज्यादा थे, वे बडे कष्ट में थे। जैसे-तैसे उन्होंने सात दिन बिताये, और शिष्यों ने महात्मा की शरण ली। महात्मा ने कहा, अब अपने-अपने आलू की थैलियाँ निकालकर रख दें, शिष्यों ने चैन की साँस ली।

🔴 महात्माजी ने पूछा – विगत सात दिनों का अनुभव कैसा रहा? शिष्यों ने महात्मा से अपनी आपबीती सुनाई, अपने कष्टों का विवरण दिया, आलुओं की बदबू से होने वाली परेशानी के बारे में बताया, सभी ने कहा कि बडा हल्का महसूस हो रहा है… महात्मा ने कहा – यह अनुभव मैने आपको एक शिक्षा देने के लिये किया था…

🔵 जब मात्र सात दिनों में ही आपको ये आलू बोझ लगने लगे, तब सोचिये कि आप जिन व्यक्तियों से ईर्ष्या या नफ़रत करते हैं, उनका कितना बोझ आपके मन पर होता होगा, और वह बोझ आप लोग तमाम जिन्दगी ढोते रहते हैं, सोचिये कि आपके मन और दिमाग की इस ईर्ष्या के बोझ से क्या हालत होती होगी? यह ईर्ष्या तुम्हारे मन पर अनावश्यक बोझ डालती है, उनके कारण तुम्हारे मन में भी बदबू भर जाती है, ठीक उन आलुओं की तरह…. इसलिये अपने मन से इन भावनाओं को निकाल दो।

🔴 यदि किसी से प्यार नहीं कर सकते तो कम से कम नफ़रत मत करो, तभी तुम्हारा मन स्वच्छ, निर्मल और हल्का रहेगा, वरना जीवन भर इनको ढोते-ढोते तुम्हारा मन भी बीमार हो जायेगा

सोमवार, 21 अगस्त 2017

👉 आपसी मतभेद से विनाश :-

🔵 एक बहेलिए ने एक ही तरह के पक्षियों के एक छोटे से झुंड़ को खूब मौज-मस्ती करते देखा तो उन्हें फंसाने की सोची. उसने पास के घने पेड़ के नीचे अपना जाल बिछा दिया. बहेलिया अनुभवी था, उसका अनुमान ठीक निकला. पक्षी पेड़ पर आए और फिर दाना चुगने पेड़ के नीचे उतरे. वे सब आपस में मित्र थे सो भोजन देख समूचा झुंड़ ही एक साथ उतरा. पक्षी ज्यादा तो नहीं थे पर जितने भी थे सब के सब बहेलिये के बिछाए जाल में फंस गए।

🔴 जाल में फंसे पक्षी आपस में राय बात करने लगे कि अब क्या किया जाए. क्या बचने की अभी कोई राह है?  उधर बहेलिया खुश हो गया कि पहली बार में ही कामयाबी मिल गयी। बहेलिया जाल उठाने को चला ही था कि आपस में बातचीत कर सभी पक्षी एकमत हुए. पक्षियों का झुंड़ जाल ले कर उड़ चला।

🔵 बहेलिया हैरान खड़ा रह गया. उसके हाथ में शिकार तो आया नहीं, उलटा जाल भी निकल गया. अचरज में पड़ा बहेलिया अपने जाल को देखता हुआ उन पक्षियों का पीछा करने लगा. आसमान में जाल समेत पक्षी उड़े जा रहे थे और हाथ में लाठी लिए बहेलिया उनके पीछे भागता चला जा रहा था. रास्ते में एक ऋषि का आश्रम था. उन्होंने यह माजरा देखा तो उन्हें हंसी आ गयी. ऋषि ने आवाज देकर बहेलिये को पुकारा. बहेलिया जाना तो न चाहता था पर ऋषि के बुलावे को कैसे टालता. उसने आसमान में अपना जाल लेकर भागते पक्षियों पर टकटकी लगाए रखी और ऋषि के पास पहुंचा।

🔴 ऋषि ने कहा- तुम्हारा दौड़ना व्यर्थ है. पक्षी तो आसमान में हैं. वे उड़ते हुए जाने कहां पहुंचेंगे, कहां रूकेंगे. तुम्हारे हाथ न आयेंगे. बुद्धि से काम लो, यह बेकार की भाग-दौड़ छोड़ दो।

🔵 बहेलिया बोला- ऋषिवर अभी इन सभी पक्षियों में एकता है. क्या पता कब किस बात पर इनमें आपस में झगड़ा हो जाए. मैं उसी समय के इंतज़ार में इनके पीछे दौड़ रहा हूं. लड़-झगड़ कर जब ये जमीन पर आ जाएंगे तो मैं इन्हें पकड़ लूंगा।

🔴 यह कहते हुए बहेलिया ऋषि को प्रणाम कर फिर से आसमान में जाल समेत उड़ती चिड़ियों के पीछे दौड़ा. एक ही दिशा में उड़ते उड़ते कुछ पक्षी थकने लगे थे. कुछ पक्षी अभी और दूर तक उड़ सकते थे।

🔵 थके पक्षियों और मजबूत पक्षियों के बीच एक तरह की होड़ शुरू हो गई. कुछ देर पहले तक संकट में फंसे होने के कारण जो एकता थी वह संकट से आधा-अधूरा निकलते ही छिन्न-भिन्न होने लगी. थके पक्षी जाल को कहीं नजदीक ही उतारना चाहते थे तो दूसरों की राय थी कि अभी उड़ते हुए और दूर जाना चाहिए. थके पक्षियों में आपस में भी इस बात पर बहस होने लगी कि किस स्थान पर सुस्ताने के लिए उतरना चाहिए। जितने मुंह उतनी बात. सब अपनी पसंद के अनुसार आराम करने का सुरक्षित ठिकाना सुझा रहे थे. एक के बताए स्थान के लिए दूसरा राजी न होता। देखते ही देखते उनमें इसी बात पर आपस में ही तू-तू, मैं-मैं हो गई. एकता भंग हो चुकी थी। कोई किधर को उड़ने लगा कोई किधर को. थके कमजोर पक्षियों ने तो चाल ही धीमी कर दी. इन सबके चलते जाल अब और संभल न पाया. नीचे गिरने लगा। अब तो पक्षियों के पंख भी उसमें फंस गए.  दौड़ता बहेलिया यह देखकर और उत्साह से भागने लगा. जल्द ही वे जमीन पर गिरे।

🔴 बहेलिया अपने जाल और उसमें फंसे पक्षियों के पास पहुंच गया. सभी पक्षियों को सावधानी से निकाला और फिर उन्हें बेचने बाजार को चल पड़ा।

🔵 तुलसीदासजी कहते है- जहां सुमति तहां संपत्ति नाना, जहां कुमति तहां विपत्ति निधाना. यानी जहां एक जुटता है वहां कल्याण है. जहां फूट है वहां अंत निश्चित है. महाभारत के उद्योग पर्व की यह कथा बताती कि आपसी मतभेद में किस तरह पूरे समाज का विनाश हो जाता है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 Aug 2017


👉 आज का सद्चिंतन 21 Aug 2017


👉 अपना मूल्य, आप ही न गिरायें (भाग 3)

🔵 इस दीन-हीन मनोवृत्ति के लोग निश्चय ही बड़े दयनीय होते हैं। ऐसे जीवन को यदि आत्म-हत्या मान लिया जाय तब भी अनुचित नहीं। किसी शस्त्र से अपना घात कर लेने अथवा अपने विचारों भावों और कल्पनाओं से अपनी आत्मा का तेज उसकी श्रेष्ठता नष्ट करते रहने में कोई अन्तर नहीं। वह शास्त्रीय हनन है यह वैचारिक आत्म हनन। ऐसे आदमी आदमी मनोरोगी होते हैं। जो भी अपने अन्दर इस दीन-वृत्ति का आभास पाये उन्हें जपता उपचार करने में तत्पर हो जाना चाहिये। अन्यथा उनका सारा जीवन योंही रोते-झींकते, कुढ़ते- कलपते बीत जायेगा और उसका कोई लाभ उन्हें प्राप्त न होगा।

🔴 यह एक निश्चित नियम है कि जिस प्रकार का हम अपने को मानते रहते हैं, यदि वैसे नहीं हैं तो भी वैसे बन जायेंगे। संसार भी उसी के अनुसार हमें मानेगा। संसार में अनेक ऐसे धनवान, बलवान, विद्वान और प्रतिभावान व्यक्ति हैं समाज जिन्हें बड़े ही निम्न दृष्टि से देखता है। न कोई उन्हें महत्व देता है और न किंचित मूल्याँकन करता है। वे स्वयं भी अपने व्यवहारों, बातों और व्यक्तित्व में दीनहीन और मलीन बने रहते हैं। न हृदय में कोई उल्लास होता है, न मुख पर कोई तेज, ओज और न आत्मा में अपनी विशेषताओं का विश्वास।

🔵 बहुत कुछ होकर भी नगण्यतम जीवन का भार ढोते रहते हैं। इसका कारण और कुछ नहीं उनकी अपनी आत्मा-हीनता और अवमूल्यन ही होता है। उनके दीन-मलीन और मिथ्या विचार ही प्रेत की तरह उनकी विशेषताओं का रक्त चूस लेते हैं। हीन व्यक्ति मानव आकार में एक चलते डोलते कंकाल के सिवाय और कुछ नहीं होते। ऐसा धिक्कारपूर्ण जीवन बिताने में क्या सुख और क्या संतोष हो सकता है- नहीं कहा जा सकता है।

🔴 यदि आपका स्वभाव दैन्यपूर्ण है तो उसे बदलिये अन्यथा आपकी सारी शक्तियाँ, सारी विशेषतायें और सारी महानतायें नष्ट हो जायेंगी और तब समाज आपका मूल्य दो कौड़ी का भी लगाने को तैयार न होगा। आप एकांत में शाँत और निष्पक्ष चित्त होकर बैठिए और विचार करिये कि आप क्या हैं और अपने को क्या मानते है? ऐसा करते समय यदि आपकी विचार-धारा दीनता की ओर जाती है और आप यही सोचने लगते हैं कि आप तो बड़े गरीब, कमजोर और अयोग्य हैं तो तुरन्त ही अपनी विचार-धारा पर प्रतिबन्ध लगा दीजिये और सोचिये कि आप वस्तुतः वैसे हैं भी या अपने प्रति वैसा होने का भ्रम ही है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जुलाई 1968 पृष्ठ 29
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1968/July/v1.29

👉 विशिष्ट प्रयोजन के लिये, विशिष्ट आत्माओं की विशिष्ट खोज (भाग 1)

🔵 नवयुग सृजन का बड़ा काम है।उसके लिए सहयोगी तो गीद, गिलहरी भी हो सकते हैं, पर महत्वपूर्ण उत्तरदायित्वों को निभाने के लिए अंगद, हनुमान जैसे वानरों और नल, नील जैसी रीछों की आवश्यकता पड़ती है। गौ चराने, गेंद खेलने और गोवर्धन उठाने में लाठी का सहयोग देने के लिए तो ग्वाल-वाल भी अपनी उपयोगिता सिद्ध कर सके, किन्तु महाभारत जीतने में भीम, अर्जुन से ही काम चला। स्वतन्त्रता संग्राम के जीतने में भी सत्साहसियों की जेल यात्रा को ही सराहा जायगा पर गाँधी पटैल जैसी हस्तियाँ आगे न आतीं तो महान प्रयोजन कदाचित ही पूर्ण हो पाता, महान परिवर्तनों में योगदान तो असंख्यों का रहा है किन्तु उसका सूत्र संचालन महामानव ही करते रहे हैं। छप्पर तो बाँस बल्लियों पर भी खड़े रहते हैं, पर नदी या नाले का पुल बनाने में ऐसे मजबूत पाये लगाने पड़ते हैं जो उस परिवहन का भार सह सकें।

🔴 युग सृजन में सहयोगी कोई भी हो सकता है यह उसका उत्तरदायित्व कंधों पर ओढ़ने वाले सृजन शिल्पियों को नल-नील जैसा प्रबुद्धि एवं परिपक्व होना चाहिए। ऐसी भूमिका निभा सकना हर किसी के बस की बात नहीं है। सिखाने पढ़ाने से थोड़ा सा काम तो चलता है पर प्रखरता मौलिक एवं संस्कारगत होनी चाहिए। लोहे की मजबूती उसकी संरचना में ही सन्निहित है। कारखानों में ढालने, खरादने का काम होता है, कृत्रिम लोहा नहीं बन सकता और न उसका स्थानापन्न किसी अन्य धातु को बनाया जा सकता है।

🔵 प्रशिक्षण, वातावरण, एवं सर्म्पक का प्रभाव तो पड़ता है पर महामानव इतने से ही नहीं बन जाते। उनके लिए संस्कार गत मौलिकता एवं संचित प्रखरता की भी आवश्यकता होती है। विश्वामित्र ने राम लक्ष्मण को आग्रहपूर्वक माँगा था और उन्हें वला अतिवला विद्याएँ सिखा कर महान परिवर्तन के लिए उपयुक्त क्षमता सम्पन्न बनाया था। चाणक्य ने चन्द्रगुप्त-समर्थ रामदास ने शिवाजी, बुद्ध ने आनन्द, महीन्द्रनाथ ने गौरख रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानन्द को बड़ी कठिनाई से ढूँढ़ा था। आगन्तुकों की भारी भीड़ में से इन सभी शक्ति सम्पन्नों को कोई काम का न लगा। बड़ी कठिनाई से ही वे अपने थोड़े से अनुयायी उत्तराधिकारी ढूँढ़ने में सफल हुए। विवेकानन्द ने निवेदिता से कहा था मुझे मात्र तुम्हारे लिये यूरोप की यात्रा करनी पड़ी।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1980 पृष्ठ 46

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1980/February/v1.46

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 48)

🌹  दूसरों के साथ वह व्यवहार न करेंगे, जो हमें अपने लिए पसंद नहीं।

🔴 अपने साथ हम दूसरों से जिस सज्जनतापूर्ण व्यवहार की आशा करते हैं, उसी प्रकार की नीति हमें दूसरों के साथ अपनानी चाहिए। हो सकता है कि कुछ दुष्ट लोग हमारी सज्जनता के बदले में उसके अनुसार व्यवहार न करें। उदारता का लाभ उठाने वाले और स्वयं निष्ठुरता धारण किए रहने वाले नर- पशुओं की इस दुनिया में कमी नहीं है। उदार और उपकारी पर ही घात चलाने वाले हर जगह भरे हैं।

🔵 उनकी दुर्गति का अपने को शिकार न बनना पड़े, इसकी सावधानी तो रखनी चाहिए, पर अपने कर्तव्य और सौजन्य को इसलिए नहीं छोड़ देना चाहिए कि उसके लिए सत्पात्र नहीं मिलते। बादल हर जगह वर्षा करते हैं, सूर्य और चंद्रमा हर जगह अपना प्रकाश फैलाते हैं, पृथ्वी हर किसी का भार और मल- मूत्र उठाती है, फिर हमें भी वैसी ही महानता और उदारता का परिचय क्यों नहीं देना चाहिए?
 
🔴 उदारता प्रकृति के लोग कई बार चालाक लोगों द्वारा ठगे जाते हैं और उससे उन्हें घाटा ही रहता है, पर उनकी सज्जनता से प्रभावित होकर दूसरे लोग जितनी उनकी सहायता करते हैं, उस लाभ के बदले में ठगे जाने का घाटा कम ही रहता है। सब मिलाकर वे लाभ में ही रहते हैं। इसी प्रकार स्वार्थी लोग किसी के काम नहीं आने से अपना कुछ हर्ज या हानि होने का अवसर नहीं आने देते, पर उनकी सहायता नहीं करता तो वे उस लाभ से वंचित भी रहते हैं।

🔵 ऐसी दशा में वह अनुदार चालाक व्यक्ति, उस उदार और भोले व्यक्ति की अपेक्षा घाटे में ही रहता है। दुहरे बाट रखने वाले बेईमान दुकानदारों को कभी फलते- फूलते नहीं देखा गया। स्वयं खुदगर्जी और अशिष्टता बरतने वाले लोग जब दूसरों से सज्जनता और सहायता की आशा करते हैं तो ठीक दुहरे बाट वाले बेईमान दुकानदार का अनुकरण करते हैं। ऐसा व्यवहार कभी किसी के लिए उन्नति और प्रसन्नता का कारण नहीं बन सकता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 130)

🌹  तपश्चर्या आत्म-शक्ति के उद्भव हेतु अनिवार्य

🔵 अरविंद ने विलायत से लौटते ही अंग्रेजों को भगाने के लिए जो उपाय सम्भव थे, वे सभी किए, पर बात बनती न दिखाई पड़ी। राजाओं को संगठित करके, विद्यार्थियों की सेना बनाकर, व पार्टी गठित करके उनने देख लिया कि इतनी सशक्त सरकार के सामने यह छुटपुट प्रयत्न सफल न हो सकेंगे। इसके लिए समान स्तर की सामर्थ्य, टक्कर लेने के लिए चाहिए। गाँधी जी के सत्याग्रह जैसा उन दिनों सम्भव नहीं था। ऐसी दशा में उनने-आत्मशक्ति उत्पन्न करने और उसके द्वारा वातावरण गरम करने का काम हाथ में लिया। अंग्रेजों की पकड़ से अलग हटकर वे पाण्डिचेरी चले गए और एकान्तवास मौन साधना सहित विशिष्ट तप करने लगे।

🔴 लोगों की दृष्टि में वह पलायनवाद भी हो सकता था, पर वस्तुतः वैसा था नहीं। सूक्ष्मदर्शियों के अनुसार उसके द्वारा अदृश्य स्तर की प्रचण्ड ऊर्जा उत्पन्न हुई। वातावरण गरम हुआ और एक ही समय में देश के अन्दर इतने महापुरुष उत्पन्न हुए कि जिसकी इतिहास में अन्यत्र कहीं भी तुलना नहीं मिलती। राजनैतिक नेता कहीं भी उत्पन्न हो सकते हैं और कोई भी हो सकते हैं, किन्तु महापुरुष हर दृष्टि से उच्चस्तरीय होते हैं। जिनका व्यक्तित्व कहीं अधिक ऊँचा होता है, जनमानस को उल्लसित आन्दोलित करने की क्षमता भी उन्हीं में होती है। दो हजार वर्ष की गुलामी में बहुत कुछ गँवा बैठने वाले देश को ऐसे ही कर्णधारों की आवश्यकता थी। वे एक नहीं अनेकों एक ही समय में उत्पन्न हुए। प्रचण्ड ग्रीष्म में उठते चक्रवातों की तरह। फलतः अरविन्द का वह संकल्प कालांतर में ठीक प्रकार सम्पन्न हुआ जिसे वे अन्य उपायों से पूरा कर सकने में समर्थ नहीं हो पा रहे थे।

🔵 अध्यात्म विज्ञान के इतिहास में उच्चस्तरीय उपलब्धियों के लिए तप-साधना एक मात्र विधान उपचार है। वह सुविधा-भरी विलासी रीति-नीति अपनाकर सम्पादित नहीं की जा सकती है। एकाग्रता और एकात्मता सम्पादित करने के लिए बहुमुखी बाह्योपचारों में, प्रचारों प्रयोजनों में भी निरत नहीं रहा जा सकता है। उससे शक्तियाँ बिखरती हैं। फलतः केन्द्रीयकरण का वह प्रयोजन पूरा नहीं होता, जो सूर्य किरणों को आतिशी शीशे पर केन्द्रित करने की तरह अग्नि उत्पादन जैसी प्रचण्डता उत्पन्न कर सके। अठारह पुराण लिखते समय व्यास उत्तराखण्ड की गुफाओं में वसोधारा शिखर के पास चले गए। साथ में लेखन कार्य की सहायता करने के लिए गणेश जी इस शर्त पर रहे कि एक शब्द भी बोले बिना सर्वथा मौन रहेंगे। इतना महत्त्वपूर्ण कार्य इससे कम में सम्भव नहीं हो सकता था।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.145

रविवार, 20 अगस्त 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 47)

🌹  दूसरों के साथ वह व्यवहार न करेंगे, जो हमें अपने लिए पसंद नहीं।

🔴 कोई व्यक्ति अपनी जरूरत के वक्त कुछ उधार हमसे ले जाता है तो हम यही आशा करते हैं कि आड़े वक्त की इस सहायता को सामने वाला व्यक्ति कृतज्ञतापूर्वक याद रखेगा और जल्दी से जल्दी इस उधार को लौटा देगा। यदि वह वापस देते वक्त आँखें बदलता है तो हमें कितना बुरा लगता है। यदि इसी बात को ध्यान में रखा जाए और किसी के उधार को लौटाने की अपनी आकांक्षा के अनुरूप ही ध्यान रखा जाए तो कितना अच्छा हो। हम किसी का उधार आवश्यकता से अधिक एक क्षण भी क्यों रोक कर रखें? हम दूसरों से यह आशा करते हैं कि वे जब भी कुछ कहें या उत्तर दें, नम्र, शिष्ट, मधुर और प्रेम भरी बातों से सहानुभूतिपूर्ण रुख के साथ बोलें।
 
🔵 कोई कटुता, रुखाई, निष्ठुरता, उपेक्षा और अशिष्टता के साथ जबाब देता है तो अपने को बहुत दुःख होता है। यदि यह बात मन में समा जाए, तो फिर हमारी वाणी में सदा शिष्टता और मधुरता ही क्यों न घुली रहेगी? अपने कष्ट के समय हमें दूसरों की सहायता विशेष रूप से अपेक्षित होती है। इस बात को ध्यान में जाए, तो फिर हमारी वाणी में सदा शिष्टता और मधुरता ही क्यों न घुली रहेगी? अपने कष्ट के समय हमें दूसरों की सहायता विशेष रूप से अपेक्षित होती है। इस बात को ध्यान में रखा जाए तो जब दूसरे लोग कष्ट में पड़े हों, उन्हें हमारी सहायता की अपेक्षा हो, तब क्या यही उचित है कि हम निष्ठुरता धारण कर लें? अपने बच्चों से हम यह आशा करते हैं कि बुढ़ापे में हमारी सेवा करेंगे, हमारे किए उपकारों का प्रतिफल कृतज्ञतापूर्वक चुकाएँगे, पर अपने बूढ़े माँ- बाप के प्रति हमारा व्यवहार बहुत ही उपेक्षापूर्ण रहता है। इस दुहरी नीति का क्या कभी कोई सत्परिणाम निकल सकता है?

🔴 हम चाहते हैं कि हमारी बहू- बेटियों की दूसरे लोग इज्जत करें, उन्हें अपनी बहन- बेटी की निगाह से देखें, फिर यह क्यों कर उचित होगा कि हम दूसरों की बहिन- बेटियों को दुष्टता भरी दृष्टि से देखें? अपने दुःख के समान ही दूसरों का जो दुःख समझेगा वह माँस कैसे खा सकेगा? दूसरों पर अन्याय और अत्याचार कैसे कर सकेगा? किसी की बेईमानी करने, किसी को तिरस्कृत, लांछित और जलील करने की बात कैसे सोचेगा? अपनी छोटी- मोटी भूलों के बारे में हम यही आशा करते हैं कि लोग उन पर बहुत ध्यान न देंगे, ‘क्षमा करो और भूल जाओ’ की नीति अपनाएँगे तो फिर हमें भी उतनी ही उदारता मन में क्यों नहीं रखनी चाहिए और कभी किसी से कोई दुर्व्यवहार अपने साथ बन पड़ा है तो उसे क्यों न भुला देना चाहिए?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.65

शनिवार, 19 अगस्त 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 46)

🌹  दूसरों के साथ वह व्यवहार न करेंगे, जो हमें अपने लिए पसंद नहीं।

🔴 हम चाहते हैं कि दूसरे लोग हमारे साथ सज्जनता का उदार और मधुर व्यवहार करें, जो हमारी प्रगति में सहायक हो और ऐसा कार्य न करें, जिससे प्रसन्नता और सुविधा में किसी प्रकार विघ्न उत्पन्न हो। ठीक ऐसी ही आशा दूसरे लोग भी हम से करते हैं। जब हम ऐसा सोचते हैं कि अपने स्वार्थ की पूर्ति में कोई आँच न आने दी जाए और दूसरों से अनुचित लाभ उठा लें, तो वैसी ही आकांक्षा दूसरे भी हम से क्यों न करेंगे? लेने और देने के दो बाट रखने में ही सारी गड़बड़ी पैदा होती है। यदि यही ठीक है कि हम किसी के सहायक न बनें, किसी के काम न आएँ, किसी से उदारता, नम्रता और क्षमा की रीति- नीति न बरतें तो इसके लिए भी तैयार रहना चाहिए कि दूसरे लोग हमारे साथ वैसी ही धृष्टता बरतेंगे तो हम अपने मन में कुछ बुरा न मानेंगे।
 
🔵 जब हम रेल में चढ़ते हैं और दूसरे लोग पैर फैलाए बिस्तर जमाए बैठे होते हैं, तो हमें खड़ा रहना पड़ता है। उन लोगों से पैर समेट लेने और हमें भी बैठ जाने देने के लिए कहते हैं तो वे लड़ने लगते हैं। झंझट से बचने के लिए हम खड़े- खड़े अपनी यात्रा पूरी करते हैं और मन ही मन उन जगह घेरे बैठे लोगों की स्वार्थपरता और अनुदारता को कोसते हैं, पर जब हमें जगह मिल जाती हैं और नए यात्रियों के प्रति ठीक वैसे ही निष्ठुर बन जाते हैं, क्या यह दुहरा दृष्टिकोण उचित है?
    
🔴  हमारी कन्या विवाह योग्य हो जाती है तो हम चाहते हैं कि लड़के वाले बिना दहेज के सज्जनोचित व्यवहार करते हुए विवाह संबंध स्वीकार करें, दहेज माँगने वालों को बहुत कोसते हैं, पर जब अपना लड़का विवाह योग्य हो जाता है तो हम भी ठीक वैसी ही अनुदारता दिखाते हैं जैसी अपनी लड़की के विवाह- अवसर पर दूसरों ने दिखाई थी। कोई हमारी चोरी, बेईमानी कर लेता है, ठग लेता है तो बुरा लगता है, पर प्रकारांतर से वैसी ही नीति अपने कारोबार में हम भी बरतते हैं और तब उस चतुरता पर प्रसन्न होते और गर्व अनुभव करते हैं। यह दुमुँही नीति बरती जाती रही तो मानव- समाज में सुख- शांति कैसे कायम रह सकेगी?
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.64

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.11

👉 अपना मूल्य, आप ही न गिरायें (भाग 2)

🔵 आत्म-अवमूल्यन आत्म-हत्या जैसी किया है। जो लोग आवश्यकता से अधिक दीन-हीन, क्षुद्र और नगण्य बन कर समाज में अपनी विनम्रता और शिष्टता की छाप छोड़ना चाहते और आशा करते हैं कि इस आधार प यश मिलेगा, वे मूर्खों के स्वर्ग में विचरण करते हैं। समाज में किसी को उतना ही मूल्य, उतना ही यश, सम्मान और प्रतिष्ठा मिलती है, जितना वह स्वयं अपने व्यक्तित्व का लगाते और ठीक समझते हैं। आत्म-निर्धारित मूल्य से अधिक किसी को अपने व्यक्तित्व का मूल्य नहीं मिलता।

🔴 नगण्यता के मार्ग से अपने लिये सम्मान अर्जन की विधि एक छल है, विडंबना है और आवश्यकता से अधिक अपने मूल्य का दुराग्रह दम्भ है। यह दोनों बातें गलत हैं। ठीक यह है कि विनम्रता प्रदर्शन के लिए नगण्यता न व्यक्त कीजिये वरन् अपना उचित महत्व प्रकट किया जाये और हमारा जो वास्तविक महत्व है उससे अधिक का दम्भ न किया जाये। इस नीति पर चलने वालों का समाज में सदैव ही उचित मूल्य और महत्व मिलता रहता है।

🔵 इस प्रकार के व्यक्तियों के अतिरिक्त एक प्रकार के व्यक्ति और भी होते हैं। जिन्हें दीन मनोवृत्ति वाला कह सकते हैं। ऐसे व्यक्ति यथार्थ रूप में अपने को दीन-हीन और नगण्य समझते हैं। उनकी दृष्टि में अपना कोई मूल्य महत्व नहीं होता। हर समय इसी क्षोभ में घुला करते हैं कि वे बड़े ही निर्बल, निराश, अयोग्य और सारहीन व्यक्ति हैं। न संसार में कोई उल्लेखनीय काम कर सकते हैं और न समाज में अपना स्थान बना सकते हैं। उनके जीवन का न कोई मूल्य है न महत्व। वे धरती पर एक बोझ के समान जिए चले जा रहे हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जुलाई 1968 पृष्ठ 29
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1968/July/v1.29

👉 आज का सद्चिंतन 19 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 Aug 2017


👉 "आखिर यह भी तो नही रहेगा"

🔵 एक फकीर अरब मे हज के लिए पैदल निकला। रात हो जाने पर एक गांव मे शाकिर नामक व्यक्ति के दरवाजे पर रूका। शाकिर ने फकीर की खूब सेवा किया। दूसरे दिन शाकिर ने बहुत सारे उपहार दे कर बिदा किया। फकीर ने दुआ किया -"खुदा करे तू दिनो दिन बढता ही रहे।"

🔴 सुन कर शाकिर हंस पड़ा और कहा -"अरे फकीर! जो है यह भी नही रहने वाला है"। यह सुनकर फकीर चला गया ।

🔵 दो वर्ष बाद फकीर फिर शाकिर के घर गया और देखा कि शाकिर का सारा वैभव समाप्त हो गया है। पता चला कि शाकिर अब बगल के गांव मे एक जमींदार के वहा नौकरी करता है। फकीर शाकिर से मिलने गया। शाकिर ने अभाव मे भी फकीर का स्वागत किया। झोपड़ी मे फटी चटाई पर बिठाया ।खाने के लिए सूखी रोटी दिया।

🔴 दूसरे दिन जाते समय फकीर की आखो मे आसू थे। फकीर कहने लगा अल्लाह ये तूने क्या क्रिया?

🔵 शाकिर पुनः हस पड़ा  और बोला -"फकीर तू क्यो दुखी हो रहा है? महापुरुषो ने कहा है -"खुदा  इन्सान को जिस हाल मे रखे  खुदा को धन्यावाद दे कर खुश रहना चाहिए।समय सदा बदलता रहता है और सुनो यह भी नही रहने वाला है"।

🔴 फकीर सोचने लगा -"मै तो केवल भेस से फकीर हू सच्चा फकीर तो शाकिर तू ही है।"

🔵 दो वर्ष बाद फकीर फिर यात्रा पर निकला और शाकिर से मिला तो देख कर हैरान रह गया कि शाकिर तो अब जमींदारो का जमींदार बन गया है। मालूम हुआ कि हमदाद जिसके वहा शाकिर नौकरी करता था वह संतान विहीन था मरते समय अपनी सारी जायदाद शाकिर को दे गया।

🔴 फकीर ने शाकिर से कहा - "अच्छा हुआ वो जमाना गुजर गया। अल्लाह करे अब तू ऐसा ही बना रहे।"

🔵 यह सुनकर शाकिर फिर हंस पड़ा  और कहने लगा - "फकीर!  अभी भी तेरी नादानी बनी हुई है"।
🔴 फकीर ने पूछा क्या यह भी नही रहने वाला है? शाकिर ने उत्तर दिया -"या तो यह चला जाएगा या फिर इसको अपना मानने वाला ही चला जाएगा। कुछ भी रहने वाला नही है। और अगर शाश्वत कुछ है तो वह हैं परमात्मा और इसका अंश आत्मा। "फकीर चला गया ।

🔵 डेढ साल बाद लौटता है तो देखता है कि शाकिर का महल तो है किन्तु कबूतर उसमे गुटरगू कर रहे है। शाकिर कब्रिस्तान मे सो रहा है। बेटियां अपने-अपने घर चली गई है।बूढी पत्नी कोने मे पड़ी है ।

"कह रहा है आसमा यह समा कुछ भी नही।
रो रही है शबनमे नौरंगे जहाँ कुछ भी नही।
जिनके महतो मे हजारो रंग के जलते थे फानूस।
झाड उनके कब्र पर बाकी निशा कुछ भी नही।"

🔵 फकीर सोचता है -" अरे इन्सान ! तू किस बात का  अभिमान करता है? क्यो इतराता है? यहा कुछ भी टिकने वाला नही है दुख या सुख कुछ भी सदा नही रहता।

🔴 तू सोचता है - "पडोसी मुसीबत मे है और मै मौज मे हू। लेकिन सुन न मौज रहेगी और न ही मुसीबत। सदा तो उसको जानने वाला ही रहेगा।

"सच्चे इन्सान है वे जो हर हाल मे खुश रहते है।
मिल गया माल तो उस माल मे खुश रहते है।
हो गये बेहाल तो उस हाल मे खुश रहते है।"

🔵 धन्य है शाकिर तेरा सत्संग  और धन्य है तुम्हारे सद्गुरु। मै तो झूठा फकीर हू। असली फकीर तो तेरी जिन्दगी है।

🔴 अब मै तेरी कब्र देखना चाहता हू। कुछ फूल चढा कर दुआ तो माग लू।

🔵 फकीर कब्र पर जाता है तो देखता है कि शाकिर ने अपनी कब्र पर लिखवा रखा है-

🌹 "आखिर यह भी तो नही रहेगा"

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 45)

🌹  मनुष्य के मूल्यांकन की कसौटी उसकी सफलताओं, योग्यताओं एवं विभूतियों को नहीं, उसके सद्विचारों और सत्कर्मों को मानेंगे।

🔴 दूसरों को सन्मार्ग पर चलाने का, कुमार्ग की ओर प्रोत्साहित करने का एक बहुत बड़ा साधन हमारे पास मौजूद है, वह है आदर और अनादर। जिस प्रकार वोट देना एक छोटी घटना मात्र है, पर उसका परिणाम दूरगामी होता है उसी प्रकार आदर के प्रकटीकरण का भी दूरगामी परिणाम संभव है। थोड़े से वोट चुनाव संतुलन को इधर से उधर कर सकते हैं और उस चुने हुए व्यक्ति का व्यक्तित्व किसी महत्त्वपूर्ण स्थान पर पहुँचकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्रों में अप्रत्याशित भूमिका संपन्न कर सकता है। थोड़े से वोट व्यापक क्षेत्र में अपना प्रभाव दिखा सकते हैं और अनहोनी संभावनाएँ साकार बना सकते हैं, उसी प्रकार हमारी आदर बुद्धि यदि विवेकपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करे तो कितने ही कुमार्ग पर बढ़ते हुए कदम रुक सकते हैं और कितने ही सन्मार्ग की ओर चलते हुए झिझकने वाले पथिक प्रेरणा और प्रोत्साहन पाकर उस दिशा में तत्परतापूर्वक अग्रसर हो सकते हैं।
 
🔵 जिन लोगों ने बाधाओं को सहते हुए भी अपने जीवन में कुछ आदर्श उपस्थित किए हैं, उनका सार्वजनिक सम्मान होना चाहिए, उनकी प्रशंसा मुक्तकंठ से की जानी चाहिए और जो लोग निंदनीय मार्गों द्वारा उन्नति कर रहे हैं, उनकी प्रशंसा एवं सहायता किसी भी रूप में नहीं करनी चाहिए। अवांछनीय कार्यों में सम्मिलित होना भी एक प्रकार से उन्हें प्रोत्साहन देना ही है क्योंकि श्रेष्ठ पुरुषों की उपस्थिति मात्र से लोग कार्य में उनका समर्थन मान लेते हैं और फिर स्वयं भी उनका सहयोग करने लगते हैं। इस प्रकार अनुचित कार्यों में हमारा प्रत्यक्ष और परोक्ष समर्थन अंततः उन्हें बढ़ाने वाला ही सिद्ध होता है।   
    
🔴 हमें मनुष्य का मूल्यांकन उसकी सफलताओं एवं विभूतियों से नहीं वरन् उस नीति और गतिविधि के आधार पर करना चाहिए, जिसके आधार पर वह सफलता प्राप्त की गई। बेईमानी से करोड़पति बना व्यक्ति भी हमारी दृष्टि में तिरस्कृत होना चाहिए और वह असफल और गरीब व्यक्ति जिसने विपन्न परिस्थितियों में भी जीवन के उच्च आदर्शों की रक्षा की, उसे प्रशंसा, प्रतिष्ठा, सम्मान और सहयोग सभी कुछ प्रदान किया जाना चाहिए।

🔵 यह याद रखने की बात है कि जब तक जनता का, निंदा- प्रशंसा का, आदर- तिरस्कार का मापदण्ड न बदलेगा, तब तक अपराधी मूँछों पर ताव देकर अपनी सफलता पर गर्व करते हुए दिन- दिन अधिक उच्छृंखलता होते चलेंगे और सदाचार के कारण सीमित सफलता या असफलता प्राप्त करने वाले खिन्न और निराश रहकर सत्पथ से विचलित होने लगेंगे। युग- निर्माण सत्संकल्प में यह प्रबल प्रेरणा प्रस्तुत की गई है कि हम मनुष्य के मूल्यांकन की कसौटी उसकी सफलताओं एवं विभूतियों को नहीं सज्जनता और आदर्शवादिता को ही रखें।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.62

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.10

👉 अपना मूल्य, आप ही न गिरायें (भाग 1)

🔵 अनेक लोगों का स्वभाव होता है कि वे अपने को अकारण ही दीन-हीन और क्षुद्र समझा करते हैं। सदैव ही अपना कम मूल्याँकन किया करते हैं। साथ ही इसे एक आध्यात्मिक गुण मानते हैं। उनका विचार रहता है कि ‘‘अपने को छोटा मानते रहने से, अपना महत्व कम करते रहने से मनुष्य अहंकार के पाप से बच जाता है। उसकी आत्मा में बड़ी शाँति और संतोष रहता है। यह एक विनम्रता है। छोटे बन कर चलने वाले समाज में बड़ा बड़प्पन पाते हैं।

🔴 यह विचार यथार्थ नहीं। मनुष्य को संसार में वही मूल्य और वही महत्व मिलता है, जो वह स्वयं अपने लिए आंकता है। उससे कम तो मिल सकता है लेकिन अधिक नहीं। सीधी-सी बात है कि जब कोई व्यक्ति स्वयं ही अपनी किसी वस्तु का एक पैसा मूल्य आँकता है तो समाज अथवा संसार को क्या गरज पड़ी कि वह उसका दो पैसा मूल्य लगाये। बाजारों में किसी समय भी मूल्याँकन की वह रीति देखी जा सकती है। जो दुकानदार अपनी किसी वस्तु का एक निश्चित मूल्याँकन कर लेता है और यह विश्वास रखता है कि उसकी वस्तु का उचित मूल्य यही है, जो समाज से अवश्य मिलेगा, तो वह उतना पाने में सफल भी हो जाता है।

🔵 यदि कोई उसके बतलाये मूल्य का अवमूल्यन भी करता है तो वह उससे सहमत नहीं होता। इसके विपरीत वह दुकानदार जो कहने-सुनने पर अपने बतलाये मूल्य को कम कर देता है कभी भी ठीक मूल्य नहीं पाता और उसी मूल्य पर संतोष करना पड़ता है जो ग्राहक से मिलता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जुलाई 1968 पृष्ठ 29

👉 आज का सद्चिंतन 18 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 Aug 2017


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...