गुरुवार, 2 जुलाई 2026

👉 मृत्यु से डर कैसा? (अन्तिम भाग)

मनुष्य जीवन के साथ जुड़े हुए कर्तव्य एवं उत्तरदायित्वों को जीवन काल में ही पूर्ण कर लिया जाए उनके प्रति लापरवाही न बरती जाए, तो ऐसे कर्मनिष्ठ व्यक्ति को मृत्यु का भय क्यों हो? तब महात्मा गाँधी, भगत सिंह, आजाद की तरह हंसते हुए मौत का वरण किया जा सकता है। विवेकानन्द, रामतीर्थ, रामकृष्ण परमहंस की तरह मृत्यु को सुखद बनाया जा सकता है। जो भगवान के दरबार में न्याय की परीक्षा के लिए, जीवन कर्मों का विवरण प्रस्तुत करने के लिए, आत्मा-परमात्मा के प्रिय मिलन के लिए सदैव उद्यत रहते है, उन्हें भय किस बात का? डरता तो वह है जो अपने दायित्वों के प्रति लापरवाही बरतता-उदासीन रहता और कुकर्मों में निरत रहते हुए जीवन को यों ही निरर्थक गंवा देता है।

मौत के इस उज्ज्वल पक्ष के दर्शन की जानकारी प्राप्त कर इसकी तैयारी में जुट पड़ना ही जीवन की सार्थकता है। इसके लिए कितने समय में कितना काम निपटाना है। क्या करना और किन उपायों को अपनाना है। यह सब योजनाबद्ध रूप से ही हो सकता है। हम जीवन की अवधि 75 वर्ष माने और बचपन 15 वर्ष का समझ, तो कार्य करने के लिए 60 वर्ष ही बचते हैं। यह मनुष्य की इच्छा पर निर्भर है कि ऐसे ही निरर्थक कामों में उसे व्यतीत कर दे या ऐसा कुछ करें जिससे आत्म संतोष, लोक सम्मान और दैवी अनुग्रह की उपलब्धि हो सके। पर यह हो तभी सकता है जब निश्चित समय में निश्चित कार्य निपटा लेने का स्मरण रहे। मृत्यु तो अनिवार्य है, उसे याद रखना एक प्राकृतिक चेतावनी अपनाना है, जिसका अर्थ होता है-जीवन का श्रेष्ठतम उपयोग समय रहते कर लिया जाए।

किन्तु जितने लोग है जो ऐसा सोचते और करते है बहुधा लोग मृत्यु से बचने की कपोल कल्पना में ही खोये रहते है अथवा उसे विस्तृत कर देते है, मानों उसे कभी मरना ही न पड़ेगा। मौत को गर्व के साथ वरण करने वाले कुछ ही लोग होते है। इनमें से व्यक्ति सम्मिलित होते है जो अपने आप के प्रति पूर्ण आश्वस्त होते हैं। सृष्टा के विश्व उद्यान को सुन्दर और समुन्नत बनाने के कार्य को निष्ठा के साथ करने वाला व्यक्ति ईश्वर के न्यायालय में अपने सुकृत्यों का विवरण प्रस्तुत करने को उत्साहित रहता है। रणक्षेत्र में विजयी सेनापति विजय पताका लहराता हुआ अपने राजा के पास हर्षोल्लास उपस्थित होता है। उसे अपनी विजय पर गर्व होता है। इसके विपरीत युद्ध क्षेत्र से भागने वाला पराजित सिपाही राजा के सामने उपस्थित

मृत्यु उतनी भयावह नहीं जितना कि लोगों ने इसे समझा है। मृत्यु से डरने की अपेक्षा इसकी सुनियोजित तैयारी करने की आवश्यकता है। इस सत्य को समझकर जीवन व्यवहार में परिष्कार-परिमार्जन प्रारम्भ कर दिया जाए तो कोई कारण नहीं कि मृत्यु का भय बना रहे। अपने चरित्र का आधार लेकर सत्कर्मों में संलग्न व्यक्ति अपने कर्तव्यों को पूर्ण करता रहे। यही जीवन यात्रा का सच्चा मार्ग है। कर्तव्य परायणता में ही वास्तविक सुख और शान्ति सन्निहित है। इन्हें पालन कर मौत से तो नहीं पर उसे भय से निश्चय ही बचा जा सकता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1988

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👉 सच्चिदानन्द की आस्था और अनुभूति (अन्तिम भाग)

चेतना पर माया, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर के जो आवरण पड़े हैं, इनके कारण जीव इस उद्गम स्त्रोत तक पहुँच नहीं पाता। प्यास निरन्तर बनी रहती है। कस्तूरी अपनी नाभि में लिये हिरन जिस प्रकार सुगन्ध की खोज में मारा-मारा फिरता है, उसी प्रकार जीव आनन्द की खोज में विविध योजनाएँ बनाता, कल्पना करता एवं अथक प्रयत्न करता है। यह पुरुषार्थ असफल, असमाधानकारक ही होता है। अन्तःकरण की गहन परतों में छिपे आनन्द के स्त्रोत की खोज बाह्य जगत में चलने के कारण भटकाव, थकान, अशाँति, निराशा के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता।

आनन्द की मिठास और भी गहन है। इसकी विकृति वासना, तृष्णा, अहंता के रूप में बाहर परिलक्षित होती है। आनन्द की प्रतिच्छाया होने के कारण वासना आकर्षक एवं लुभावनी लगती है। विषयों के सेवन में मन लगने लगता है तो व्यक्ति विलासी, प्रमादी, आलसी होता चला जाता है। जिह्वा का असंयम, कामेन्द्रियों का उपभोग, संग्रह का लोभ अनेकानेक मानसिक एवं शारीरिक व्याधियों को जन्म देता है।

विषयों के सेवन में जब इतनी तृप्ति एवं तुष्टि मनुष्य को मिलती है तो उसके मूल स्त्रोत में कितनी मिठास होगी, यह कल्पना मात्र से ही हृदय पुलकित हो उठता है। भगवान रसमय है। इस रस को आत्म-सत्ता के रूप में ईश्वर ने मनुष्य को धरोहर बनाकर दिया है। यह रस भौतिक नहीं आत्मिक है। इसे अन्तःकरण के उल्लास, सन्तोष, शाँति जैसी दिव्य संवेदनाओं के रूप में अनुभव किया जाता है। भक्ति रस की धाराएँ ऐसे ही अन्तःकरण में बहती हैं। ये ही कभी मीरा, कभी चैतन्य एवं कभी रामकृष्ण परमहंस जैसी विभूतियों के रूप में प्रकट होती हैं। सर्वोच्च सत्ता, परब्रह्म से, मिलन संयोग की स्थिति ऐसी ही जागृति पर आती है।

सत् चित् आनन्द की अनुभूति एवं सुनियोजित सद्गति व्यक्ति को कहीं का कहीं पहुँचा देती है। इसी अनुभूति का अभाव भटकाव को जन्म देता है। कारण शरीर की इन तीन धाराओं को, उनके उद्देश्य को एवं विकृति के दुष्परिणामों को जानना आवश्यक है। समस्त व्याधियों के मूल में जो बीज है वह है व्यक्ति की स्वयं के मरण-धर्मा होने की अनुभूति न होना। आदर्शवादी, उत्कृष्टता में विश्वास का अभाव तथा आनन्द की प्राप्ति हेतु बाह्य जगत में भटकाव। मनुष्य आत्मा-गरिमा से यदि परिचित होने का प्रयास करे, तो वह जीवन की सर्वोत्तम उपलब्धि- रसानुभूति का आनन्द ले सकता है। समस्त विकारों से मुक्ति मिल जाती है जब व्यक्ति स्वयं की अजरता, अमरता पर चिंतन करता है। नश्वर शरीर के लिए वह अपनी क्षमताएँ नष्ट नहीं करता, वरन् सत् की खोज, चित् की स्वीकारोक्ति व आनन्द की अनुभूति में अपने जीवन का सदुपयोग कर परम लक्ष्य को प्राप्त करता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1981

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 02 July 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 02 July 2026


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बुधवार, 1 जुलाई 2026

👉 मृत्यु से डर कैसा? (भाग 2)

यात्रा पर निकलने के लिए घर के सदस्यों को त्यागना पड़ता है। उनके मोह को त्यागे बिना यात्रा निकल कर नये व्यक्तियों से परिचय का, नये स्थानों को देखने का आनन्द प्राप्त नहीं किया जा सकता। जीवात्मा नये जीवन का आनन्द प्राप्त नहीं किया जा सकता। जीवात्मा नये जीवन का आनन्द प्राप्त करने की सुख .... आकर्षित करती है। वह जीर्ण आवास से मुक्ति पाक नवजीवन प्राप्त करता है। यही स्थिति मृत्यु है।

पुराना कपड़ा उतारना, पुराना घर छोड़ना और नया धारण करना कितना सुखद और आनंददायक प्रतीत है। सुख और आनन्द लिए प्रयास किया जाना संभव स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। पुराने जीवन को .... जराजीर्ण शरीर को प्रत्यावर्तित कर नव जीवन में .... करने की प्रक्रिया भी इसी तरह सुख है। यह दुखद होती। इसे जीवन यात्रा की अनिवार्य, अत्यन्त उप लाभप्रद तथा आनन्ददायक प्रक्रिया कहा जा सकता है।

अन्धेरे में प्रवेश करते समय भय लगता है रात्रि अंधकार में घर से बाहर जाने पर भी डर लगता अपरिचित व्यक्ति से बातचीत करने में हिचक महसूस होती है। नये स्थान में जाने से पूर्व भय के कारण ही बार उसके सम्बन्ध में विचार किया जाता है, उसका जाना जा जाता है। मौत के वास्तविक स्वरूप की जानकारी अभाव में ही उससे भय लगता है, अन्याय उसे हर्षोल्लास के साथ वरण किया जाता।

कार्य की सफलता में उसकी तैयारी आवश्यक है। इसके लिए कर्ता को अपनी योग्यता क्षमता का अभिवर्धन करना पड़ता है। पूर्व तैयारी के बिन श्रम एवं समय निरर्थक ही नहीं होते, वरन् लक्ष्य की पूर्णता भी संदिग्ध बनी रहती है। लक्ष्य पूर्ति के लिए उपलब्ध अवधि में योजनाबद्ध रूप से तैयारी न कर पाना ही भय क कारण होता है। परीक्षा की तैयारी के लिए लगन के साथ अध्ययन किया जाता है। अध्ययनशील विद्यार्थी को उत्तीर्ण होने की सुखद कल्पना उल्लासित करती रहती है। वह परीक्षा के क्षणों की प्रतीक्षा करता है, किन्तु इसके विपरीत तैयारी न करने वाले के लिए परीक्षा हौवा बन जाती है। उसे परीक्षा नाम से भय लगाता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1988

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👉 सच्चिदानन्द की आस्था और अनुभूति (भाग 2)

अन्तःकरण की दूसरी विशेषता है ‘चित्’। उच्चस्तरीय आस्थाओं, मान्यताओं एवं आदर्शों से युक्त व्यक्ति ‘चित्’ परायण कहलाता है। चित् अर्थात् स्वयं के विषय में उत्कृष्टतापूर्ण मान्यता, अपने लक्ष्य के प्रति चेतनता, सजगता। ये वे निष्ठाएँ हैं जो मनुष्य की जीवनयात्रा की रूपरेखा बनाती हैं। देवत्व में आस्था, आदर्शवादी उत्कृष्टता में अटूट विश्वास, सर्वोच्च सत्ता के प्रति समर्पण भाव ‘चित्’ के परिष्कृत स्वरूप हैं।

ऐसे व्यक्ति लोकसेवी का- समर्पित व्यक्ति का-जीवन जीते हैं। आदर्शों की बलिवेदी पर वे अपने समस्त स्वार्थों को होम देते हैं। उनकी सारी मान्यताएँ चिन्तन का खाका, व्यक्तित्व का ढाँचा इस तरह विनिर्मित होता है कि संपर्क में आया व्यक्ति भी उच्चस्तरीय जीवन की ओर अभिमुख हो जाता है। शहीद, समाज सुधारक, लोकसेवी, सन्त, सामान्य, परजीवट के धनी व्यक्ति इसी श्रेणी में आते हैं। वे जो जीवन जीते हैं, आदर्शों रूपी ईश्वर को समर्पित होता है। अपनी निष्ठाओं के आधार पर वे स्वयं तो उच्च प्रगतिशीलता की भूमिका को प्राप्त होते ही हैं, सहज श्रद्धा व जन-सम्मान के भी पात्र बनते हैं। अध्यात्म उनके भीतर से प्रस्फुटित होता रहता है। क्रियाओं में, विचारणा में, भाव संवेदनाओं में प्रभु स्वयं आदर्शों के रूप में प्रतिभासित होते रहते हैं। ऐसे व्यक्ति अहंकार से कोसों दूर होते हैं। लोकेषणा से दूर वे जनसेवा को ही, उदारता-करुणा विस्तार को ही अपना परम लक्ष्य मानते हैं, इसी को उपासना कहते हैं।

‘चित्’ एक ऐसा गुण है जो परिष्कृत स्वरूप में व्यक्ति को महामानव बना देता है। पर जब यही विकृति की ओर अग्रसर हो जाता है, तो अनेकानेक समस्याओं, मानसिक असन्तुलनों एवं शारीरिक सन्तापों को जन्म देता है। आदर्शवादिता से निष्ठा हटते ही पतन तेजी से होता है। दृष्टि बहिर्मुखी होने के कारण स्वयं के विषय में मान्यताएँ गरिमायुक्त नहीं रहतीं। श्रेष्ठ चिन्तन का अभाव एवं उत्कृष्टता के प्रति अनास्था अन्ततः उद्दंडता को जन्म देती है। विकृत चिन्तन से सद्विचारों की अपेक्षा नहीं की जा सकती। सिद्धान्तों के प्रति-अपनी दिव्यताओं के प्रति अनास्था मनुष्य को एकाँगी, स्वार्थी एवं अहंकारी बना देती है।

सच्चिदानंद का तीसरा व अन्तिम पक्ष है ‘आनन्द’। इसके बिना आत्मा की परिपूर्ण व्याख्या सम्भव नहीं। जीवात्मा का लक्ष्य ही आनन्द है। इसे परिष्कृत भाषा में कहा गया हैं “रसो वै सः” -वह परमात्मा रस से आनन्द से परिपूर्ण है। इस रस को प्राप्त करने के लिए विभिन्न मार्गों से साधक पुरुषार्थ करता है एवं सन्तोष का आनन्द लेता है। इस रस का अन्तरंग पक्ष है- भाव संवेदनाओं से लबालब अन्तःकरण। करुणा, दया, सेवा, भावना, भक्तिभाव रस के परिष्कृत स्वरूप हैं। जब इनका विकास महज स्वाभाविक रूप से होता है, तो ये व्यक्ति को भावनात्मक दृष्टि से ऊँचा उठाते हैं। ऐसे महामानव विश्व मानवता की सेवार्थ अपने जीवन की आहुति दे देते हैं। इन्द्रियों से प्राप्त होने वाला आनन्द क्षणिक है, ऐसी मान्यता रखने वाले ये महापुरुष अपनी क्षमताओं को पूरा उपयोग उच्च उद्देश्यों की ओर नियोजित करने में करते हैं। जमा करने में नहीं, वितरण में विश्वास रखते हैं। परस्पर सौहार्द्र की वृद्धि ही उनका लक्ष्य होता है। उन्हें सद्विचारों, सद्भावनाओं एवं सत्कर्मों में रस आता है। यह अक्षुण्ण आनन्द उन्हें जिस ऊँचाई तक ले जाता है, उसे पाकर भौतिक आकर्षण उन्हें प्रलोभित कर नहीं पाता।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 01 July 2026



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सोमवार, 29 जून 2026

👉 मृत्यु से डर कैसा? (भाग 1)

दिन के प्रकाश का विलुप्त होने और रात्रि को अंधकार के आगमन की घड़ी का आ धमकना सामान्यतः घाटे का सौदा प्रतीत होता है, किन्तु इसके साथ ही सूर्य के कान्ति हीन होने, उसके विश्राम करने और पुनः नयी ज्योत्सना साथ उदय होने की आशा भी रहती है। काल निशा में विश्राम करने के लिए जीव पुराने शरीर का परित्याग कर जाता है। यह प्रयाण काल ही मौत के नाम से जाना जाता है। सृष्टि सुव्यवस्था के संचालन की विभिन्न क्रियाओं में जन्म और मृत्यु का यह परिवर्तन चक्र एक सहज स्वाभाविक एवं अनिवार्य प्रक्रिया है। उससे बच सकना किसी भी प्राणी के लिए संभव नहीं।

थकान के बाद हरी नींद आने नींद पूरी होने के बाद जाग पड़ने की तरह मरने और पुनः जन्म लेने की क्या सम्भावना नहीं? कार्योपरान्त थकान मिटाने के लिए विश्राम आवश्यक है। यह न केवल मनुष्य, वरन् समस्त जीवों के लिए अनिवार्य है। प्रकृति चक्र में भी विश्राम की यह प्रक्रिया किसी न किसी रूप में चलती रहती है। दिन भर की थकान के बाद रात्रि को विश्राम किया जाता है। विश्राम की क्रिया शक्तिसंचय की सृष्टि से विशेष महत्वपूर्ण है। इसी के आधार पर दूसरे दिन नये उल्लास के साथ कार्य किये जाते है।

दिन भर कार्य करने वाले मजदूर रात को विश्राम करते है, पशु-पक्षी भी अपने घोंसले में सोते है। पुराणों की आख्यायिकाओं के अनुसार सूर्य भी रात्रि की गोद में विश्राम करने जाता है। जीव भी अपनी यात्रा पथ में विश्राम करता है। वह मृत्यु शैया में अपने विगत श्रम से मुक्ति पाता है तथा पुनः नये जीवन में प्रवेश करता है। जीव की यात्रा इसी क्रम से अपने कर्मानुसार अनन्त जीवन की ओर चलती रहती है। अतः मृत्यु भी उसके प्रगति-क्रम की एक अनिवार्य सीढ़ी कही जा सकती है। अविनाशी जीवात्मा अपनी यात्रा को मौत रूपी स्टेशनों पर ठहरती हुई पूर्ण करती है, अपने गन्तव्य लक्ष्य तक पहुँचती है। जन्म और मृत्यु का यह गति चक्र न होता तो शायद ही जीवात्मा यात्रा सफल हो पाती।
मोहासिक्त व्यक्ति को ही मृत्यु से डर लगता है। देख भी जाता है कि लोग मौत का नाम सुनते ही काँपने लगते हैं। इसे अशुभ मानते हैं। किसी सगे सम्बन्धी की होने पर रोते चिल्लाते हैं। स्वयं भी मौत के डर से चिन्तित रहते हैं। जबकि मरण की सुनिश्चितता को जानते हुए भी डरना केवल अविवेक ही कहा जा सकता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 सच्चिदानन्द की आस्था और अनुभूति (भाग 1)

परमात्मा को सच्चिदानन्द स्वरूप कहा गया है। उस विराट् का ही एक अंश होने से जीवात्मा भी उन्हीं गुणों से सुशोभित है। सत्, चित्, आनन्द ये तीनों मिलकर कारण शरीर का ढाँचा बनाते हैं। सत् अर्थात् शाश्वत, अजर, अमर और अविनाशी स्वरूप। चित् अर्थात् चेतना- दिव्य गुणों से सुसज्जित, उच्चस्तरीय आदर्शों-आस्थाओं से युक्त। आनन्द अर्थात् भाव संवेदनाओं, सरसता, मृदुलता से सिक्त अन्तःकरण। आशा, उत्साह, संतोष के परस्पर समन्वय पर आधारित जीवन क्रम। आत्मा का सहज स्वभाव है ऊँचा उठना, अपने विराट् स्वरूप की स्वयं को प्रतिमूर्ति बनाने के लिए इन्हीं गुणों से स्वयं को समृद्ध करना तथा अन्ततः समस्त आवरणों को हटाते हुए अपने चरम लक्ष्य को प्राप्त करना। परिष्कृत जीवात्मा इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए आध्यात्मिक पुरुषार्थ करती है एवं जीव-ब्रह्म सम्मिलन से निःसृत परमानन्द की स्थिति को प्राप्त करती है।

इस आत्म गरिमा से अपरिचित मनुष्य भटकता है। यह विस्मृति अनेकानेक समस्याओं को जन्म देती है। इन्हें ही माया के आवरण-मनुष्य के विभ्रम कहा जा सकता है। ये ही रोग-शोकों के रूप में अन्ततः बाहर प्रकट होते हैं।

सच्चिदानंद का पहला चरण है ‘सत्’। ‘सत्’ मनुष्य को जीवन के क्षण भंगुर होने का बोध कराता है। हम अजर, अमर, अविनाशी हैं। पंचतत्वों से बनी इस काया अवयवों के बिखर जाने पर भी हमारी सत्ता बनी ही रहेगी। यह बोध बना रहे तो भटकाव से बचा जा सकता है।

सत् की अनुभूति व्यक्ति को यह विचार करने पर विवश करती है कि यह शरीर मरण-धर्मा है। परन्तु आत्मा कभी नष्ट नहीं होती। वह तो एक सतत् प्रवाह है। आत्मा का स्वास्थ्य ही मानव की समस्त सफलताओं का प्राण है। यह तभी सम्भव है जब मानव अपने वर्तमान जीवन को श्रेष्ठ, उदार तथा उदात्त भावनाओं से युक्त करने का प्रयास करता है। सत् परायण व्यक्ति आशावादी होता है। अपने कर्मों के फल के लिए वह उद्विग्न नहीं होता। स्वार्थ के लिए नहीं, परमार्थ के लिए जीता है।

सत् में आस्था रखने वाला व्यक्ति सृष्टि को चलाने वाली बुद्धिमान, उद्देश्यपूर्ण व्यवस्था में दृढ़ विश्वास रखता है। वह जानता है कि विधि-विधानों, नियमों के अनुरूप चलने वाली इस सृष्टि की व्यवस्था में किसी तरह की अनुशासनहीनता, अनियंत्रण, अदूरदर्शिता का स्थान नहीं है। कर्मफल से पूर्णतः अवगत यह व्यक्ति अपनी समस्त गतिविधियों का निर्धारण सुघढ़तापूर्ण करता है। वह जानता है कि आत्मा कभी नहीं बदलती। बदलता तो यह चोला है। फिर उसके लिए व्यर्थ मोह क्यों करना? अनावश्यक संग्रह एवं उपभोगों में स्वयं को लीन करना इस सृष्टि के मुकुटमणि मानव के लिए कतई शोभनीय नहीं है। ऐसा चिन्तन प्रखर होने पर स्वयं को ऊँचा उठा हुआ पाता है। आत्मिक प्रगति के विभिन्न सोपानों को पार करता हुआ वह अपने लक्ष्य तक जा पहुँचता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 29 June 2026


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रविवार, 28 जून 2026

👉 सादगी और संतोष की जिन्दगी!

वस्तुओं की प्रचुर मात्रा भी मनुष्य को सन्तोष नहीं दे सकती, पर इससे ठीक उल्टी विधि अपनाने से काम बन जाता है। मन को सन्तोष का अभ्यस्त कर लिया जाय तो इच्छा की पूर्ति सहज ही हो जाती है। मनुष्य की आवश्यकताएं स्वल्प हैं। उपभोग भी एक सीमा तक ही हो सकता है। उतना उपार्जन करना और साधन जुटाना सरल है। अतएव इच्छाएं सीमित रखने, उपभोग को औचित्य की मर्यादा में रखने तथा कठिन परिश्रम से उपार्जन में जुटे रहने पर कोई कारण नहीं कि इच्छाओं की पूर्ति न हो सके। अभावग्रस्तता और दरिद्रता का रोना आलसी, अपव्ययी रोते है या फिर जिनकी आकाँक्षाएं असीमित है।

संग्रह और उपभोग पर सीमा बाँन लगना चाहिए। इसके लिए औचित्य की मर्यादा और देख वासी के स्तर की होनी चाहिए। एक परिवार के सदस्य आमतौर से एक ही स्तर का रहन सहन तथा निर्वाह अपनाते है। भले ही उनमें से कोई अधिक खाये, पहने भी, यह भी नहीं हो सकता, इससे असमानता बढ़ेगी, मनोमालिन्य पनपेगा और ऐसी परम्परा चल पड़ेगी, जिसके रहते स्नेह सौजन्य का टिक सकना कठिन है, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए यदि सादगी का जीवन जिया जाए तो कम आजीविका वाले व्यक्ति भी प्रसन्नता भरे गुजार सकते हैं और सन्तोष के साथ रह सकते है।

अपव्यय अपने आप में एक बड़ा दुर्गुण है। कोई व्यक्ति अधिक कमाता है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उस कमाई को फिजूल खर्च में फूँक दिया जाए। इस पैसे से ज्ञान-वृद्धि जैसे स्वार्थ और दूसरों की सहायता करने जैसे परमार्थ साधे जा सकते है। उससे आत्म कल्याण और लोक कल्याण के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है। ठाट-बाट का अहंकारी प्रदर्शन तथा विलासी शौक-मौज के अपव्यय में हाथ खुला छोड़ने पर आदत बिगड़ती है और अधिक खर्च करने की इच्छा होने लगती है। वह बढ़ते बढ़ते नशेबाजों जैसी कुटेब बन जाती है। ऐसे कुटैवग्रस्तों का काम उचित उपार्जन से नहीं चलता, वह कम पड़ता है। इसलिए बढ़ी हुई जरूरतों को पूरा करने के लिए अनुचित मार्ग अपनाने पड़ते हैं। अधिकाँश अपराधियों के मूल रूप में यही देखा जाता है।

यह सोचना सही नहीं है कि जितने ठाट बाट से रहेगा वह उतना ही बड़ा समझा जायेगा। यह बचकाना-चिन्तन समझदारों का नहीं होता। बड़प्पन सज्जनता है और उसकी पहचान सादगी से होती है। सादगी का अर्थ है-नम्रता, निरहंकारिता। अपने को जन-साधारण स्तर का समझने वाला खर्चीला रहन-सहन नहीं अपना सकता, क्योंकि उसमें क्षुद्रता और अहमन्यता की स्पष्ट गंध आती है। जो समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का अनुभव नहीं करते, वे ही संग्रही, विलासी और अहंकारी की भूमिका निभा सकते हैं। ऐसे लोगों से स्वार्थ साधने वाले ही चाटुकारी भरी मुँह सामने प्रशंसा कर सकते हैं। पीछे पीछे भी उनके मुँह से यथार्थता निकलती है। स्वार्थी, संकीर्ण और निष्ठुर प्रकृति के व्यक्ति ही प्रायः महत्वाकाँक्षी होते हैं। उदारचेता अधिक कमाने पर भी सीमित साधनों से सादगी का निर्वाह करते हैं और उन महत्वकाँक्षाओं से दूर रहते है। ऐसा न करने पर समय और श्रम का अधिकाँश भाग खप जाता है। इस संदर्भ में कटौती करने पर व्यक्तिपरक कार्यों में संलग्न हो सकता है, जो सद्गुणों की अभिवृद्धि कर सके और सर्वत्र सुख-शान्ति का वातावरण बना सके।

लोग अच्छी बातों की नकल कम और बुरी बातों की अधिक करते हैं। एक अपव्ययी अनेकों को उस का आदि बना देता है। फलतः दोष रोष और असन्तोष तीनों ही बढ़ते और वातावरण को विषाक्त करते हैं। वस्तु इच्छाओं को सन्तोष तथा सादगी की जिन्दगी जीना ही श्रेयस्कर है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1988

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