शनिवार, 4 नवंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 04 Nov 2023

🔶 युग निर्माण के लिए धन की नहीं, समय की-श्रद्धा की-भावना की एवं उत्साह की आवश्यकता पड़ेगी। नोटों के बण्डल वहाँ कूड़े-करकट के समान सिद्ध होंगे। समय का दान ही सबसे बड़ा दान है। धनवान लोग अश्रद्धा और अनिच्छा रहते हुए भी मान, प्रतिफल, दबाव या अन्य किसी कारण से उपेक्षापूर्वक भी कुछ पैसा दान खाते में फेंक सकते हैं, पर समयदान केवल वही कर सकेगा जिसकी उस कार्य में श्रद्धा होगी। इस श्रद्धायुक्त समयदान में गरीब और अमीर समान रूप से भाग ले सकते हैं। युग निर्माण के लिए इसी दान की आवश्यकता पड़ेगी और आशा की जाएगी कि अपने परिवार के लोगों में से कोई इस दिशा में कंजूसी न दिखावेगा।              

🔷 जिन्होंने समय-समय पर ममता भरा प्यार हमें दिया है, हमारी तुच्छता को भुलाकर जो आदर, सम्मान, श्रद्धा, सद्भाव, स्नेह एवं अपनत्व प्रदान किया है, उनके लिए क्या कुछ किया जाए समझ में नहीं आता? इच्छा प्रबल है कि अपना हृदय कोई बादल जैसा बना दे और उसमें प्यार का इतना जल भर दे कि जहाँ से एक बूँद स्नेह की मिली हो वहाँ एक पहर की वर्षा कर सकने का सुअवसर मिल जाए। मालूम नहीं, ऐसा संभव होगा कि नहीं। यदि संभव न हो सके तो हमारी अभिव्यंजना उन सभी तक पहुँचे जिनकी सद्भावना किसी रूप में हमें प्राप्त हुई हो। वे उदार सज्ज्न अनुभव करें कि उनके प्यार को भुलाया  नहीं गया।        

🔶 सत्य रूपी प्रहलाद की रक्षा भगवान् नृसिंह स्वयं करते हैं। नृसिंह मनुष्यों में जो सिंह स्वरूप वीर पुरुष है, वे धर्मवृक्ष को गिरने न देने के लिए अपना पूरा सहयोग देते हैं। गायत्री परिवार के कार्यक्रमों के पीछे, महान् यज्ञानुष्ठान के पीछे सत्य की दैवी शक्ति मौजूद है। इसलिए हममें से किसी को भी विचलित होने की रत्ती भर भी जरूरत नहीं है। फिर भी प्रहलाद की तरह कठिन परीक्षा देने को तैयार रहना ही होगा।     

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अपने को पहचानें

शरीर अनेक सुख-सुविधाओं का माध्यम है, ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा रसास्वादन और कर्मेन्द्रियों के द्वारा उपार्जन करने वाला शरीर ही सांसारिक हर्षोल्लास प्राप्त करता है। इसलिए इसे स्वस्थ, सुन्दर, सुसज्जित एवं समुन्नत स्थिति में रखना चाहिए। इसी दृष्टिï से उत्तम आहार-विहार रखा जाता है, तनिक सा रोग-कष्टï होते ही उपचार कर ली जाती है। शरीर की ज्योति ही मस्तिष्क की उपयोगिता है। आत्मा की चेतना और शरीर की गतिशीलता का भौतिक व आत्मिक समन्वय का प्रतीक है, यह मन मस्तिष्क इसकी अपनी उपयोगिता है। मन की कल्पना, बुद्धि का निर्णय, चित्त की आकांक्षा और अहन्ता की प्रवृत्ति इन चारों से मिलकर अन्त:करण चतुष्टïय बना है।
  
सभ्यता, संस्कृति, शिक्षा, दीक्षा द्वारा मस्तिष्क को विकसित एवं परिष्कृत करने के लिए हमारी चेष्टïा निरन्तर रहती है क्योंकि भौतिक जगत में उच्चस्तरीय विकास एवं आनन्द उसी के माध्यम से सम्भव है। सभ्य, सुसंस्कृत , सुशिक्षित व्यक्ति ही नेता, कलाकार, शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनिरय, वैज्ञानिक, साहित्यकार आदि ही पद प्राप्त कर सकते हैं।
  
शरीर को समुन्नत स्थिति में रखने के लिए पौष्टिïक आहार, व्यायाम, चिकित्सा, विनोद आनन्द आदि की अगणित व्यवस्थाएँ की गई हैं। मस्तिष्कीय उन्नति के लिए स्कूल, कॉलेज, प्रशिक्षण केन्द्र, गोष्ठिïयाँ, सभाएँ विद्यमान हैं। पुस्तिकाएँ, रेडियो, फिल्म आदि का सृजन किया गया है जिससे कि मस्तिष्कीय समर्थता बढ़े।
  
मनुष्य का स्थूल कलेवर शरीर और मन के रूप में ही जाना समझा जा सकता है। सो उन्हीं के लिए सुविधा साधन जुटाने में हर कोई जुटा है। यह उचित भी है। इस जगत के लिए जड़ साधनों और चेतन हलचलों को यदि मानवी सुविधा एवं सन्तोष के लिए नियोजित किया जाता है और उसके लिए उत्साहवर्धक प्रयास जुटाया जाता है तो इसमें अनुचित भी क्या हैै?
  
मनुष्य द्वारा जो कुछ किया जा रहा है, संसार में जो हो रहा है, उसे स्वाभाविक ही कहा जाना चाहिए। यहाँ उसकी निन्दा प्रशंसा नहीं की जा रही है। ध्यान उस तथ्य की ओर आकर्षित किया जा रहा है जो इस सबसे अधिक उत्कृष्टï एवं आवश्यक था उसे एक प्रकार से भुला ही दिया गया। समझ यह लिया गया है कि मनुष्य जो सब कुछ है, वह शरीर और मन तक की सीमित है। इससे आगे, इससे ऊपर और कोई हस्ती नहीं। यदि इससे आगे, इससे ऊपर भी कुछ समझा गया होता तो उसके लिए भी जीवन क्रम में वैसा ही स्थान मिलता, वैसा ही प्रयास होता, जैसा शरीर और मन के लिए होता है, पर हम देखते हैं वह तीसरी सत्ता जो इन दोनों से लाखों, करोड़ों गुनी अधिक महत्त्वपूर्ण है एक प्रकार से उपेक्षित विस्मृत ही पड़ी है और वह लाभ और आनन्द जो अत्यन्त सुखद एवं समर्थ है एक प्रकार से अनुपलब्ध ही रहा है।
  
रोज ही यह कहा और सुना जाता है कि हमारे शरीर और मन से ऊपर आत्मा है। सत्संग और स्वाध्याय के नाम पर यह शब्द प्रतिदिन आये दिन आँखों और कानों के पर्दों पर टकराते हैं, पर वह सब एक ऐसी विडम्बना बन कर रह जाता है जो मानो कहने-सुनने और पढऩे-लिखने के लिए ही खड़ी की गई हो। वास्तविकता से जिसका कोई सीधा सम्बन्ध न हो। यदि ऐसा न होता तो आत्मा को सचमुच ही महत्त्वपूर्ण माना गया होता। कम से कम शरीर, मन जितने स्तर का समझा गया होता, तो उसके लिए उतना श्रम एवं चिन्तन तो नियोजित किया ही गया होता, जितना कायिक, मानसिक उपलब्धियों के लिए किया जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 2 नवंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 02 Nov 2023

जिसका हृदय विशाल है, जिसमें उदारता और परमार्थ की भावना विद्यमान है। समाज, युग, देश, धर्म, संस्कृति के प्रति अपने उत्तरदायित्व की जिसमें कर्तव्य बुद्धि जम गई होगी, हमारी आशा के केन्द्र यही लोग हो सकते हैं और उन्हें ही हमारा सच्चा वात्सल्य भी मिल सकता है। बातों से नहीं काम से ही किसी की निष्ठा परखी जाती है और जो निष्ठावान् हैं, उनको दूसरों का हृदय जीतने में सफलता मिलती है हमारे लिए भी हमारे निष्ठावान् परिजन ही प्राणप्रिय हो सकते हैं।

गाल बजाने वाले पर उपदेश कुशल लोगों द्वारा दिव्य समाज की रचना यदि संभव होता तो वह अब से बहुत पहले ही सम्पन्न हो चुका होता। जरूरत उन लोगों की है, जो आध्यात्मिक आदर्शों की प्राप्ति को जीवन की सबसे बड़ी सफलता अनुभव करें और अपनी आस्था की सच्चाई प्रमाणित करने के लिए बड़ी से बड़ी परीक्षा का उत्साहपूर्ण स्वागत करें।            
                                                  
अपनी इच्छा, बड़प्पन, कामना, स्वाभिमान को गलाने का नाम समर्पण है। अपनी इमेज विनम्र से विनम्र बनाओ। मैनेजर की, इंचार्ज की, बॉस की नहीं, बल्कि स्वयंसेवक की। जो स्वयंसेवक जितना बड़ा है, वह उतना ही विनम्र है, उतना ही महान् बनने के बीजांकुर उसमें हैं। तुम सबमें वे मौजूद हैं। अहं की टकराहट बंद होते ही वे विकसित होना आरम्भ हो जाएंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 1 नवंबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 01 Nov 2023

🔷 अक्सर अनुकूलताओं में सुखी और प्रतिकूलताओं में दुःखी होना हमारा स्वभाव बन गया है। उन्नति के, लाभ के, फल-प्राप्ति के क्षणों में हमें बेहद खुशी होती है तो कुछ न मिलने पर, लाभ न होने पर दुःख भी कम नहीं होता। लेकिन इसका आधार तो स्वार्थ, प्रतिफल, लगाव अधिकार आदि की भावना है। इन्हें हटाकर देखा जाय तो सुख-दुःख का कोई अस्तित्व ही शेष न रहेगा। दोनों ही निःशेष हो जायेंगे।

🔶 सुख-दुःख का सम्बन्ध मनुष्य की भावात्मक स्थिति से मुख्य है। जैसा मनुष्य का भावना स्तर होगा उसी के रूप में सुख-दुःख की अनुभूति होगी। जिनमें उदार दिव्य सद्भावनाओं का समुद्र उमड़ता रहता है, वे हर समय प्रसन्न, सुखी, आनन्दित रहते हैं। स्वयं तथा संसार और इसके पदार्थों को प्रभु का मंगलमय उपवन समझने वाले महात्माओं को पद-पद पर सुख के सिवा कुछ और रहता ही नहीं। काँटों में भी वे फलों की तरह मुस्कुराते हुए सुखी रहते हैं। कठिनाइयों में भी उनका मुँह कभी नहीं कुम्हलाता।        
                                                
🔷 संकीर्णमना हीन भावना वाले, रागद्वेष से प्रेरित स्वभाव वाले व्यक्तियों को यह संसार दुःखों का सागर मालूम पड़ेगा। ऐसे व्यक्ति कभी नहीं कहेंगे कि “हम सुखी हैं।” वे दुःख में ही जीते हैं और दुःख में ही मरते हैं। दुर्भावनायें ही दुःखों की जनक है। इसी तरह वे हैं जिनका पूरा ध्यान अपनेपन पर ही है। उनका भी दुःखी रहना स्वाभाविक है। केवल अपने को सुखी देखने वाले, अपना हित, अपना लाभ चाहने वाले, अपना ही एकमात्र ध्यान रखने वाले संकीर्णमना व्यक्तियों को सदैव मनचाहे परिणाम तो मिलते नहीं। अतः अधिकतर दुःख और रोना-धोना ही इस तरह के लोगों के पल्ले पड़ता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी अतृप्ति और असंतोष का कारण

आवश्यकताओं को मर्यादा से बढ़ा देने का नाम अतृप्ति और दुःख है उन्हें कम कर पूर्ति करने से सुख और सन्तोष प्राप्त होता है। मनुष्य एक ही प्रकार के सुख से तृप्त नहीं रहता। अतः असंतोष सदैव बना रहता है। वह असंतोष निंदनीय है जिसमें किसी वस्तु की प्राप्ति के लिए मनुष्य दिन रात हाय-हाय करता रहे और न पाने पर असंतुष्ट, अतृप्त, और दुःखी रहे।

तृष्णाएं एक के पश्चात् दूसरी बढ़ेगी। एक आवश्यकता की पूर्ति होगी, तो दो नई आवश्यकताएं आकर उपस्थित हो जायेंगी। अतः विवेकशील पुरुष को अपनी आवश्यकताओं पर कड़ा नियंत्रण रखना चाहिए। इस प्रकार आवश्यकताओं को मर्यादा के भीतर बाँधने के लिए एक विशेष शक्ति-मनोनिग्रह की जरूरत है।

एक विचारक का कथन है-“जो मनुष्य अधिकतम संतोष और सुख पाना चाहता है, उसको अपने मन और इन्द्रियों को वश में करना अत्यन्त आवश्यक है। यदि हम अपने आपको तृष्णा और वासना में बहायें, तो हमारे असंतोष की सीमा न रहेगी।”

अनेक प्रलोभन तेजी से हमें वश में कर लेते हैं, हम अपनी आमदनी को भूल कर उनके वशीभूत हो जाते हैं। बाद में रोते चिल्लाते हैं। जिह्वा के आनन्द, मनोरंजन आमोद प्रमोद के मजे हमें अपने वश में रखते हैं। हम सिनेमा का भड़कीला विज्ञापन देखते ही मन को हाथ से खो बैठते हैं और चाहे दिन भर भूखे रहें, अनाप-शनाप व्यय कर डालते हैं। इन सभी में हमें मनोनिग्रह की नितान्त आवश्यकता है। मन पर संयम रखिये। वासनाओं को नियंत्रण में बाँध लीजिये, पॉकेट में पैसा न रखिये। आप देखेंगे कि आप इन्द्रियों को वश में रख सकेंगे।

आर्थिक दृष्टि से मनोनिग्रह और संयम का मूल्य लाख रुपये से भी अधिक है। जो मनुष्य अपना स्वामी है और इन्द्रियों को इच्छानुसार चलाता है, वासना से नहीं हारता, वह सदैव सुखी रहता है।

प्रलोभन एक तेज आँधी के समान है जो मजबूत चरित्र को भी यदि वह सतर्क न रहे, गिराने की शक्ति रखती है। जो व्यक्ति सदैव जागरुक रहता है, वह ही संसार के नाना प्रलोभनों आकर्षणों, मिथ्या दंभ, दिखावा, टीपटाप से मुक्त रह सकता है। यदि एक बार आप प्रलोभन और वासना के शिकार हुए तो वर्षों उसका प्रायश्चित करने में लग जायेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1950 पृष्ठ 8


सोमवार, 30 अक्टूबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 28 Oct 2023

🔶 उत्तरदायित्वों की जो बोझ मानकर उपेक्षा करता है। उस अच्छे परिणामों से वंचित रह जाना पड़ता है। प्रत्येक मानव की आजीविका कमाने में शर्म, संकोच का भाव नहीं रखना चाहिये। आत्म-निर्भरता तो जीवनोत्कर्ष के पथ पर अग्रसर करती है। परिस्थितियों से सामंजस्य बिठाने का अद्भुत गुण मनुष्य में है। इसलिये अपने प्रत्येक कार्य की पूरी शक्ति से करना चाहिये। प्रत्येक कार्य ईश्वर का है, अतः उसे आत्म समर्पित भाव से करना चाहिये। कार्य में सद्भावना का प्रभाव उज्ज्वल चरित्र निर्माण के विकास के लिये होता है। कार्य करने का सौंदर्य, रुचिकर ढंग सफलता की निशानी है। कार्य की श्रेष्ठता में जीवन की श्रेष्ठता निहित है।

🔷 आत्म-विश्वास और परिश्रम के बल पर जीवन को सार्थकता प्रदान की जा सकती है। भाग्य का निर्माणकर्ता मनुष्य स्वयं है। ईश्वर निर्णयकर्ता और नियामक है। मनुष्य परिश्रम से चाहे तो अपने भाग्य की रेखाओं को बना सकता है-परिवर्तित कर सकता है। हैनरी स्ल्यूस्टर कहता है कि-“जिसे हम भाग्य की कृपा समझते हैं, वह और कुछ नहीं। वास्तव में हमारी सूझ-बूझ और कठिन परिश्रम का फल है।” विश्वास रखें परिश्रम और आत्मविश्वास एक दूसरे के बिना अधूरे है। दोनों मिलकर के ही लक्ष्य तक पहुँचने में समर्थ हो पाते हैं। संकल्प करें-बाधाओं को हमेशा हँस-हँस स्वीकार करना है। डर कर मार्ग से हटाना नहीं है। लक्ष्य विहीन नहीं होना है। हमेशा गतिमान रहना हैं-गतिहीन नहीं होना है।       
                                                
🔶 परिश्रम और सफलता की आशा करते हुए हमें लक्ष्य प्राप्ति के बीच आने वाले दुष्परिणामों को भी सामान्य करने का साहस करना चाहिये। “सर्वश्रेष्ठ के लिये प्रयत्न कीजिये मगर निकृष्टतम के लिये तैयार रहिये।” अँग्रेजी की यह कहावत बड़ी सार्थक है। हैनरी फोर्ड से एक व्यक्ति ने उनकी सफलता का रहस्य पूछा, तो उन्होंने कहा, “सफलता का सबसे पहला रहस्य है, हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

 

👉 मन को सुधारा जाय

मनुष्य के अस्तित्व पर गंभीरता पूर्वक विचार किया जाय, तो उसकी एक मात्र विशेषता उसका मनोबल ही दृष्टिगोचर होता है। शरीर की दृष्टि से वह अन्य प्राणियों की तुलना बहुत गया-गुजरा है। मनोबल की विशेषता के कारण ही मनुष्य सृष्टि का मुकुटमणि है। मन वस्तुत: एक बड़ी शक्ति है। अनन्त चेतना के केन्द्र परमात्मा का प्रकाश इस जड़ प्रकृति में जो पड़ता, तो उसका प्रतिबिम्ब मन के रूप में ही सामने आता है। जड़ पदार्थ कितने ही उत्कृष्ट क्यों न हो, चेतना के बिना वे निरर्थक है।

इस पृथ्वी के गर्भ में रत्नों की खान, स्वर्ण-भण्डार और न जाने क्या-क्या बहुमूल्य सम्पदाएँ भरी पड़ी हैं। पर वे तब तक प्रकाश में नहीं आतीं, जब तक कोई चेतना सम्पन्न मनुष्य उनसे सम्पर्क स्थापित नहीं करता है। स्वर्ण और रत्न का मूल्य चेतन प्राणी की चेतना के कारण ही है अन्यथा वे मिट्टी कंकड़ के समान ही पड़े रहते हैं। इस देह को ही लीजिए। कितनी बहुमूल्य, प्रिय एवं उपयोगी लगती है पर यदि चेतना नष्ट हो जाय-मूर्छा उन्माद या मृत्यु की स्थिति आ जाय, तो यह देह किसी काम का नहीं रह जाती। मानव-जीवन में जो कुछ श्रेष्ठता एवं महत्ता है, वह केवल उसकी मानसिक स्थिति-मनोभूमि के कारण ही है।
  
आलसी और उत्साही, कायर और वीर, दीन और समृद्ध, पापी और पुण्यात्मा, अशिक्षित और विद्वान्ï, तुच्छ और महान, तिरस्कृत और प्रतिष्ठित का जो आकाश पाताल जैसा अन्तर मनुष्यों के बीच में दीख पड़ता है, उसका प्रधान कारण उस व्यक्ति की मानसिक स्थिति ही है। परिस्थितियाँ भी एक सीमा तक इन भिन्नताओं में सहायक होती है। पर उनका प्रभाव पाँच प्रतिशत ही होता है, पचानवे प्रतिशत कारण मानसिक। बुरी से बुरी परिस्थितियों पड़ा हुआ मनुष्य भी अपनी कुशलता और मानसिक विशेषताओं के द्वारा उन पर बाधाओं को पार करता हुआ, देर-सबेर में अच्छी स्थिति प्राप्त कर लेगा। अपने सद्गुणों, सद्विचारों एवं सत्प्रयत्नों द्वारा कोई भी मनुष्य बुरी से बुरी परिस्थिति को पार करके ऊँचा उठ सकता है। पर जिसकी मनोभूमि निम्न श्रेणी की है, जो दुर्बुद्धि से, दुर्गुणों से, दुष्प्रवृत्तियों से ग्रसित है, उसके पास यदि कुबेर जैसी सम्पदा और इन्द्र जैसी सुविधा हो, तो भी वह अधिक दिन ठहर न सकेगी, कुछ ही दिन में नष्ट हो जायगी।
  
कर्म जो आँखों से दिखाई देता है, वह अदृश्य विचारों का ही दृश्य रूप है। मनुष्य जैसा सोचता है वैसा करता है। चोरी, बेईमानी, दगाबाजी, शैतानी, बदमाशी कोई आदमी यकायक कभी नहीं कर सकता। उसके मन में उस प्रकार के विचार बहुत दिनों से झूमते रहते हैं। अवसर न मिलने से वे दबे हुए थे, समय पाते ही वे कार्यरूप में परिणित हो जाते हैं। बाहर के लोगों को किसी दुष्कर्म होने की बात सुनकर इसलिए आश्चर्य होता है कि वे उसकी भीतरी स्थिति को नहीं जानते थे। इसी प्रकार कोई अधिक उच्चकोटि का सत्कर्म करने का भी आकस्मिक समाचार भले ही सुनने को मिले पर वस्तुुत: उसकी तैयारी वह मनुष्य भीतर ही भीतर बहुत दिनों से कर रहा होता है। इसी तरह जो व्यक्ति आज उन्नतिशील एवं सफलता सम्पन्न दिखाई पड़ते हैं, वे अचानक ही वैसे नहीं बन गये, वरन् चिरकाल से उनका प्रयत्न उसके लिए चल रहा होता है। भीतरी पुरुषार्थ को उन्होंने बहुत पहले जगा लिया होता है। उन्होंने अपने मन:क्षेत्र में भीतर ही भीतर वह अच्छाइयाँ जमा कर ली होती हैं, जिनके द्वारा बाह्य जगत में दूसरों का सहयोग एवं उन्नति का आधार निर्भर रहता है। बाह्य जीवन हमारे भीतरी जीवन का प्रतिबिम्ब मात्र है। पर्दे के पीछे दीपक जल रहा है, तो कुछ प्रकाश बाहर भी परिलक्षित होता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 29 अक्टूबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 29 Oct 2023

तुम सब हमारी भुजा बन जाओ, हमारे अंग बन जाओ, यह हमारे मन की बात है। अब तुम पर निर्भर है कि तुम कितना हमारे बनते हो? समर्पण का अर्थ है दो का अस्तित्व मिट कर एक हो जाना। तुम भी अपना अस्तित्व मिटाकर हमारे साथ मिला दो व अपनी क्षुद्र महत्त्वाकांक्षा को हमारी अनन्त आध्यात्मिक महत्त्वाकांक्षाओं में विलीन कर दो। जिसका अहं जिन्दा है, वह वेश्या है। जिसका अहं मिट गया वह पवित्र है। देखना है कि हमारी भुजा, आंख, मस्तिष्क बनने के लिए तुम कितना अपने अहं को गला पाते हो?

आज दुनिया में पार्टियां तो बहुत हैं, पर किसी के पास कार्यकर्त्ता नहीं हैं। लेबर सबके पास है, पर समर्पित कार्यकर्त्ता जो सांचा बनता है व कई को बना देता है अपने जैसा, कहीं भी नहीं है। हमारी यह दिली ख्वाहिश है कि हम अपने पीछे कार्यकर्त्ता छोड़ कर जाएं। इन सभी को सही अर्थों में डाई एक सांचा बनना पड़ेगा तथा वही सबसे मुश्किल काम है। रॉ मैटेरियल तो ढेरों कहीं भी मिल सकता है, पर डाई कहीं-कहीं मिल पाती है। श्रेष्ठ कार्यकर्त्ता श्रेष्ठतम डाई बनाता है। तुम सबसे अपेक्षा है कि अपने गुरु की तरह एक श्रेष्ठ सांचा बनोगे।
                                              
अपना मन सभी से मिलाओ। मिल-जुलकर रहो, अपना सुख बांटो-दुःख बंटाओ। यही सही अर्थों में ब्राह्मणत्व की साधना है। साधु तुम अभी बने नहीं हो। मन से ब्राह्मणत्व की साधना करोगे, तो पहले ब्राह्मण बनो तो साधु अपने आप बन जाओगे। सेवा बुद्धि का, दूसरों के प्रति पीड़ा का, भाव सम्वेदना का विकास करना ही साधुता को जगाना है। आशा है, तुम इसे अवश्य पूरा करोगे व हमारी भुजा, आंख व पैर बन जाने का संकल्प लोगे, यही आत्मा की वाणी है, जो तुमसे कुछ कराना चाहती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अपने ऊपर विश्वास रखो

मित्रो ! स्मरण रखिए, रुकावटें और कठिनाइयाँ आपकी हितचिंतक हैं। वे आपकी शक्तियों का ठीक-ठीक उपयोग सिखाने के लिए हैं। वे मार्ग के कंटक हटाने के लिए हैं। वे आपके जीवन को आनंदमय बनाने के लिए हैं। जिनके रास्ते में रुकावटें नहीं पड़ीं, वे जीवन का आनंद ही नहीं जानते। उनको जिंदगी का स्वाद ही नहीं आया। जीवन का रस उन्होंने ही चखा है, जिनके रास्ते में बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ आई हैं। वे ही महान् आत्मा कहलाए हैं, उन्हीं का जीवन, जीवन कहला सकता है।

उठो ! उदासीनता त्यागो। प्रभु की ओर देखो। वे जीवन के पुंज हैं। उन्होंने आपको इस संसार में निरर्थक नहीं भेजा। उन्होंने जो श्रम आपके ऊपर किया है, उसको सार्थक करना आपका काम है। यह संसार तभी तक दु:खमय दीखता है, जब तक कि हम इसमें अपना जीवन होम नहीं करते। बलिदान हुए बीज पर ही वृक्ष का उद्ïभव होता है। फूल और फल उसके जीवन की सार्थकता सिद्घ करते हैं।

सदा प्रसन्न रहो। मुसीबतों का खिले चेहरे से सामना करो। आत्मा सबसे बलवान है, इस सच्चाई पर दृढ़ विश्वास रखो। यह विश्वास ईश्वरीय विश्वास है। इस विश्वास द्वारा आप सभी कठिनाइयों पर विजय पा सकते हैं। कोई कायरता आपके सामने ठहर नहीं सकती। इसी से आपके बल की वृद्धि होगी। यह आपकी आंतरिक शक्तियों का विकास करेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 28 अक्टूबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 28 Oct 2023

आपमें से हर आदमी को हम यह काम सौंपते हैं कि आप हमारे बच्चे के तरीके से हमारे मिशन को चलाइए। बन्द मत होने दीजिए। हम तो अपनी विदाई ले जाएंगे, लेकिन जिम्मेदारी आपके पास आएगी। आप कपूत निकलेंगे तो फिर लोग आपकी बहुत निन्दा करेंगे और हमारी निन्दा करेंगे। कबीर का बच्चा ऐसा हुआ था जो कबीर के रास्ते पर चलता नहीं था तो सारी दुनिया ने उससे यह कहा—‘बूढ़ा वंश कबीर का उपजा पूत कमाल’ आपको कमाल कहा जाएगा और यह कहा जाएगा कि कबीर तो अच्छे आदमी थे, लेकिन उनकी संतानें दो कौड़ी की भी नहीं है।

परिजनो! आप हमारी वंश परम्परा को जानिए। अगर हमको यह मालूम पड़ा कि आपने हमारी परम्परा नहीं निबाही और अपना व्यक्तिगत ताना-बाना बुनना शुरू कर दिया और अपना व्यक्तिगत अहंकार, अपनी व्यक्तिगत यश-कामना और व्यक्तिगत धन-संग्रह करने का सिलसिला शुरू कर दिया, व्यक्तिगत रूप से बड़ा आदमी बनना शुरू कर दिया, तो हमारी आंखों से आंसू टपकेंगे और वह आंसू आपको चैन से नहीं बैठने देंगे। आपको हैरान कर देंगे।
                                              
हमारे विचारों को लोगों को पढ़ने दीजिए। जो हमारे विचार पढ़ लेगा, वही हमारा शिष्य है। हमारे विचार बड़े पैने हैं, तीखे हैं। हमारी सारी शक्ति हमारे विचारों में सीमाबद्ध है। दुनिया को हम पलट देने का जो दावा करते हैं, वह सिद्धियों से नहीं, अपने सशक्त विचारों से करते हैं। आप हमारे विचारों को फैलाने में सहायता कीजिए। अब हमको नई पीढ़ी चाहिए। हमारी विचारधारा उन तक पहुंचाइए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अध्यात्म का सूक्ष्म-विश्लेषण

अध्यात्म क्या है? जीवन का शीर्षासन है। आप क्या इसे बाजीगरी समझते हैं कि यह कर लूँगा, वह कर लूँगा। इसमें ऐसा कुछ नहीं है, वरन इसमें जीवन की दिशा उलटी जाती है, जीवन को पलटा जाता है। दुनिया वाले लोगों के सोचने, करने का जो तरीका है, आकांक्षाओं, इच्छाओं का जो ढंग है, उससे आध्यात्मिक जीवन की प्रक्रियाएं भिन्न हैं, जिन्हें अलग ढंग से करना पड़ता है।

पूजा-उपासना के बारे में, सिद्धि-चमत्कारों के बारे में, देवताओं के दर्शन के बारे में, ऋद्धि-सिद्धि पाने के बारे में जो तरह-तरह के खेल-खिलवाड़ आप करते रहते हैं, उसमें न पड़ें तो अच्छा है, क्योंकि आपके लिए यह वह कठिन पड़ेगा। आप पहली मंजिल पर ही टक्कर खाकर चकनाचूर हो जाएँगे। जब आपसे ब्रह्मचर्य के लिए कहा जायेगा कि शारीरिक ब्रह्मचर्य उतना आवश्यक नहीं जितना कि मानसिक ब्रह्मचर्य आवश्यक है, तब आप दाँत निकाल देंगे और कहेंगे कि शारीरिक ब्रह्मचर्य तो हमसे साधता नहीं, फिर मानसिक ब्रह्मचर्य की बात ही अलग है! चौबीस घंटे हमारा दिमाग और आँखें दुराचार में लगी रहती हैं। जब आपकी सारी शक्ति इसी में खर्च हो जायेगी तब फिर आपका सहस्रार-चक्र (कुण्डलिनी-जागरण की अंतिम अवस्था) कहाँ से जगेगा? सहस्रार-चक्र में लगने वाली सारी शक्ति इसी में लय कर देंगे, तब फिर वह जागेगा कैसे? सहस्रार को जाग्रत करने वाला जो प्रकाश है, वह तो आपकी आँखों के रास्ते तरंगों के जरिये नष्ट हो जायेगा। इसके अन्दर जो गर्मी थी, ऊर्जा थी वह तो आपने ख़त्म कर दी।

इसी तरह आहार के आधार पर जो आपका रक्त बनता है और जिससे बनता है मन; तमोगुणी अन्न, अनीति-बेईमानी का कमाया हुआ अन्न, हराम का कमाया हुआ अन्न खाकर के आपने उसे तमोगुणी बना दिया है। उसे आप अध्यात्म में, भगवान में स्थिर कैसे कर पाएंगे?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 27 Oct 2023

जीवन की महत्ता और सफलता उसकी आत्मिक प्रगति पर निर्भर है, यह विश्वास मन में रखना चाहिए व नित्य सुदृढ़ बनाना चाहिए। भौतिक सफलताएं तो उतनी ही देर आनन्द देती हैं, जब तक कि उनकी प्राप्ति नहीं हो जाती। मिलते ही आनन्द समाप्त हो जाता है व और अधिक के लिए व्याकुलता, बेचैनी आरंभ हो जाती है। जो मानव जीवन का श्रेष्ठतम सदुपयोग कर उस आनन्द की प्राप्ति के इच्छुक हैं, जिसके लिए यह जन्म मिला है, उन्हें आत्मिक प्रगति के लिए तत्पर होना चाहिए और उसके दोनों आधारों उपासना और साधना का अवलम्बन लेना चाहिए।

मनुष्य में जो असीम एवं अपरिमित शक्तियाँ भरी पड़ी हैं उनके अस्तित्व में विश्वास करने और तद्नुरूप उन्हें हस्तगत कर लेने की योग्यता-क्षमता को प्रतिभा के नाम से जाना जाता है। यह न तो जन्मजात उपलब्धि है और न किसी का दिया हुआ वरदान-आशीर्वाद। भाग्यवश मिला हुआ आकस्मिक संयोग-सुयोग भी नहीं कहा जा सकता। वह स्व उपार्जित ऐसी विलक्षण सम्पदा है, जिसके सहारे जीवन की प्रतिकूल दीखने वाली परिस्थितियों को अनुकूल बनाया जा सकता है।
                                              
जिन व्यक्तियों ने अपनी प्रसुप्त प्रतिभा को उपयोगी दिशा में लगाया है, उसके सत्परिणाम उन्हें हाथों हाथ मिलते देखे गये हैं। परिस्थितियाँ कितनी विपन्न और विषम क्यों न बनी रही हों, पर धुन के धनी लोगों ने जीवन की महत्वपूर्ण सफलताएँ अर्जित कर दिखाई हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 बंधनों से मुक्ति

मित्रो ! तुम व्यर्थ में दूसरों के अनर्थकारी संदेशों को ग्रहण कर लेते हो। तुम वह सच मान बैठते हो, जो दूसरे कहते हैं। तुम स्वयं अपने आप को दु:खी करते हो और कहते हो कि दूसरे लोग हमें चैन नहीं लेने देते। तुम स्वयं ही दु:ख का कारण हो, स्वयं ही अपने शत्रु हो। जो किसी ने कुछ बक दिया, तुमने मान लिया यही कारण है कि तुम उद्विग्न रहते हो।

सच्चा मनुष्य एक बार उत्तम संकल्प करने के लिए यह नहीं देखता कि लोग क्या कह रहे हैं। वह अपनी धुन का पक्का होता है। सुकरात के सामने जहर का प्याला रखा गया, पर उसकी राय को कोई न बदल सका। बंदा बैरागी को भेड़ों की खाल पहना कर काले मुँह गली-गली फिराया गया, किंतु उसने दूसरों की राय न मानी।

दूसरे के इशारों पर नाचना, दूसरों के सहारे पर निर्भर रहना, दूसरों की झूठी टीका-टिप्पणी से उद्विग्न होना, मानसिक दुर्बलता है। जब तक मनुष्य स्वयं अपना स्वामी नहीं बन जाता, तब तक उसका संपूर्ण विकास नहीं हो सकता। दूसरों का अनुकरण करने से मनुष्य अपनी मौलिकता से हाथ धो बैठता है।

स्वयं विचार करना सीखो। दूसरों के बहकावे में न आओ। कर्त्तव्य-पथ पर बढ़ते हुए, दूसरे क्या करते हैं, इसकी चिंता न करो। यदि ऐसा करने का साहस तुम में नहीं है, तो जीवन भर दासत्व के बंधनों में जकड़े रहोगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 26 अक्टूबर 2023

👉 श्रद्धा और निष्ठा

बहुत-से व्यक्ति थे जो पहले सिद्धान्तवाद की राह पर चले और भटक कर कहाँ से कहाँ पहुँचे? भस्मासुर का पुराना नाम बताऊँ आपको! मारीचि का पुराना नाम बताऊँ आपको। ये सभी योग्य तपस्वी थे। पहले जब उन्होंने उपासना-साधना शुरू की थी, तब अपने घर से तप करने के लिए हिमालय पर गए थे। तप और पूजा-उपासना के साथ-साथ में कड़े नियम और व्रतों का पालन किया था। तब वे बहुत मेधावी थे, लेकिन समय और परिस्थितियों के भटकाव में वे कहीं के मारे कहीं चले गए। भस्मासुर का क्या हो गया? जिसको प्रलोभन सताते हैं वे भटक जाते हैं और कहीं के मारे कहीं चले जाते हैं।
 
साधु-बाबाजी जिस दिन घर से निकलते हैं, उस दिन यह श्रद्धा लेकर निकलते हैं कि हमको संत बनना है, महात्मा बनना है, ऋषि बनना है, तपस्वी बनना है। लेकिन थोड़े दिनों बाद वह जो उमंग होती है, वह ढीली पड़ जाती है और ढीली पड़ने के बाद में संसार के प्रलोभन उनको खींचते हैं। किसी की बहिन-बेटी की ओर देखते हैं, किसी से पैसा लेते हैं। किसी को चेला-चेली बनाते हैं। किसी की हजामत बनाते हैं। फिर जाने क्या से क्या हो जाता है? पतन का मार्ग यहीं से आरम्भ होता है। ग्रेविटी-गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी की हर चीज को ऊपर से नीचे की ओर खींचती है।
 
संसार भी एक ग्रेविटी है। आप लोगों से सबसे मेरा यह कहना है कि आप ग्रैविटी से खिंचना मत। रोज सबेरे उठकर भगवान के नाम के साथ में यह विचार किया कीजिए कि हमने किन सिद्धान्तों के लिए समर्पण किया था? और पहला कदम जब उठाया था तो किन सिद्धान्तों के आधार पर उठाया था? उन सिद्धान्तों को रोज याद कर लिया कीजिए। रोज याद किया कीजिए कि हमारी उस श्रद्धा में और उस निष्ठा में, उस संकल्प और उस त्यागवृत्ति में कहीं फर्क तो नहीं आ गया। संसार में हमको खींच तो नहीं लिया। कहीं हम कमीने लोगों की नकल तो नहीं करने लगे। आप यह मत करना।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 26 Oct 2023

जो कार्य और उत्तरदायित्व आपके जिम्मे सौंपा गया है वह यह है कि दीपक से दीपक को आप जलाएं। बुझे हुए दीपक से दीपक नहीं जलाया जा सकता। एक दीपक से दूसरा दीपक जलाना हो तो पहले हमको जलना पड़ेगा। इसके बाद में दूसरा दीपक जलाया जा सकेगा। आप स्वयं ज्वलंत दीपक के तरीके से अगर बनने में समर्थ हो सके तो हमारी वह सारी की सारी आकांक्षा पूरी हो जायेगी जिसको लेकर के हम चले हैं और यह मिशन चलाया है। आपका सारा ध्यान यहीं इकट्ठा होना चाहिए कि क्या हम अपने आपको एक मजबूत ठप्पे के रूप में बनाने में समर्थ हो गए?

प्यार-मोहब्बत का व्यवहार आपको बोलना सीखना चाहिए। जहां कहीं भी शाखा में जाना है, कार्यकर्त्ताओं के बीच में जाना है और जनता के बीच में जाना है, उन लोगों के साथ में आपके बातचीत का ढंग ऐसा होना चाहिए कि उसमें प्यार ही प्यार भरा हुआ हो। दूसरों का दिल जीतने के लिए आप दूसरों पर अपनी छाप छोड़ने के लिए इस तरह का आचरण लेकर जाएं, ताकि लोगों को यह कहने का मौका न मिले कि गुरुजी के पसंदीदे नाकाबिल हैं। अब आपकी इज्जत, आपकी इज्जत नहीं, हमारी इज्जत है। जैसे हमारी इज्जत हमारी इज्जत नहीं, हमारे मिशन की इज्जत है। हमारी और मिशन की इज्जत की रक्षा करना अब आपका काम है।

परिजनों! सन्त हमेशा गरीबों जैसा होता है। अमीरों जैसा सन्त नहीं होता। संत कभी भी अमीर होकर नहीं चला है। जो आदमी हाथी पर सवार होकर जाता है, वह कैसे सन्त हो सकता है? संत को पैदल चलना पड़ता है। सन्त को मामूली कपड़े पहनकर चलना पड़ता है। सन्त चांदी की गाड़ी पर कैसे सवारी कर सकता है? आपको अपने पुराने बड़प्पन छोड़ देने चाहिए-पुराने बड़प्पन की बात भूल जानी चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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