मंगलवार, 10 अक्टूबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 10 Oct 2023

तर्क की पहुँच विचारों तक है। विचारों से परे अनुभूतियों के कितने ही दिव्य क्षेत्र मौजूद हैं जो उनकी पकड़ में नहीं आते। मानवी श्रद्धा ही उन्हें अनुभव कर सकती है। मनुष्य के पारस्परिक रिश्ते श्रद्धा से ही संचालित होते हैं। जीवन से उसे निकाल दिया जाये तो भाई-भाई के, भाई-बहन के, माता-पिता के, पिता-पुत्र के रिश्तों का कुछ विशेष मूल्य नहीं रह जाता। प्यार एवं स्नेह की बहने वाली निर्झपिणी सूखे तर्क के आतप में सूखकर मरुस्थल का रूप ले लेती है। वे परिवार, परिवार न रहकर सराय बन जाते हैं। जब सामान्य जीवन में श्रद्धा के बिना काम नहीं चलता तो आध्यात्मिक क्षेत्र में कैसे चल सकता है?

किसी सिद्धान्त, किसी आदर्श अथवा किसी लक्ष्य के प्रति श्रद्धा भी तभी उमड़ती है जब ज्ञान द्वारा उनकी गरिमा की बुद्धि सामर्थ्य के समस्त आवेश के साथ आत्मसात् कर लिया जाता है। एक बार पूरे मन से उनको स्वीकार कर लेने पर तर्क नहीं जन्म लेता। दोष देखने वाली प्रवृत्ति नहीं रहती। “दोष दर्शनानुकूल वृत्ति प्रतिबन्धकवृत्तिः”, श्रद्धा की उपज है पर उसमें भी बुद्धि के पक्ष का सर्वथा अभाव नहीं होता। 

श्रद्धाविहीन किसी शंकालु व्यक्ति को साधक की अनुभूति एक कपोल कल्पना या पागलपन प्रतीत हो सकती है पर इससे यथार्थता पर कुछ आँच नहीं आती। ईश्वरीय अनुभूति के उच्च लोक में पहुँचने के बाद व्यक्ति का व्यवहार सामान्य लोगों की दृष्टि में असामान्य तथा असंगत प्रतीत होता है तो इसमें कुछ विशेष आश्चर्य नहीं करना चाहिए। संकीर्णता, चिन्ता, उदासीनता आदि मानसिक व्यतिरेकों के ऊपर उठा हुआ व्यक्ति यदि अपने बन्धनों को तोड़ते हुए आगे बढ़ जाता है तथा ‘वासुदेवः सर्वंमिति’- सभी कुछ ईश्वर है मानकर चलता है तो इसमें अस्वाभाविकता ही क्या है? 

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 ईश्वर या संसार

संसार में लोग सत्य भी बोलते हैं, और झूठ भी। सामान्य रूप से लोग सत्य बोलते हैं। परंतु जब कोई आपत्ति दिखाई दे, कहीं मान अपमान का प्रश्न हो, कहीं कोई स्वार्थ हो, कोई लोभ, कोई क्रोध हो आदि आदि, ऐसे कारण उपस्थित होने पर प्रायः लोग झूठ बोलते हैं। वे समझते हैं कि यदि मैंने इस अवसर पर सत्य बोल दिया, तो मेरा काम बिगड़ जाएगा। सामने वाला व्यक्ति मुझसे नाराज हो जाएगा। उससे मुझे जो लाभ मिल रहा है, वह नष्ट हो जाएगा।

परंतु सब लोग एक जैसे नहीं होते। कुछ लोग यह सोचते हैं, कि हानि लाभ तो जीवन में होता ही रहता है। यह संसार है, इसमें सुख और दुख दोनों आते ही रहते हैं। मैं झूठ बोलकर ईश्वर को नाराज क्यों करूं? ऐसा करने पर ईश्वर मुझे दंड देगा। और जो लाभ मुझे ईश्वर से मिल रहा है, या भविष्य में मिलने वाला है, वह मेरा लाभ नष्ट हो जाएगा।

इसलिए ऐसे लोग ईश्वर को सामने रख कर सत्य ही बोलते हैं। तब जो उन्हें सांसारिक लोगों से हानि होती है, उसे वे सहन कर लेते हैं।

ऐसे अवसर पर उनको सहन करने की शक्ति, ईश्वर ही देता है। अतः संसार के लोग भले ही कुछ नाराज हो जाएँ, आप ईश्वर को नाराज न करें। यदि ईश्वर नाराज हो गया, तो आपको उससे अधिक हानि उठानी पड़ेगी। संसार के लोग आपकी कम हानि कर पाएंगे। ईश्वर तो आगे पशु पक्षी घोड़ा साँप बिच्छू आदि पता नहीं क्या-क्या बना देगा। इसलिए सावधान रहें।

सोमवार, 9 अक्टूबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 9 Oct 2023

एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं। जब तक हृदय मन्दिर में बुरी वासनाओं, पाप और कल्मषों की पूजा हो रही है तब तक धर्म और ईश्वर भक्ति को वहाँ स्थान नहीं मिल सकता है। जब हृदयासन पर परमात्मा को बिठाया जाता है तो दुष्वृत्तियां नहीं ठहर सकतीं।

किसी की निन्दा मत करो। याद रखो इससे तुम्हारी जबान गंदी होगी, तुम्हारी वासना मलिन होगी। जिसकी निंदा करते हो उससे वैर होने की संभावना रहेगी और चित्त में कुसंस्कारों के चित्र अंकित होंगे।

ईश्वर नहीं चाहता कि आदमी शैतानी ताकत के बल पर असुरों जैसा अभिमानी बने। उस महाशक्ति की इच्छा है दुनिया में सत्य, प्रेम और पवित्रता का साम्राज्य रहे। बीसवीं शताब्दी का वैज्ञानिक मनुष्य आसुरी संपदा के अभिमान में डूब गया है फलतः उसके कदम नाश की ओर उठते हुए चले जा रहे हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 दोष तो अपने ही ढूँढ़ें Dosh Darshan

दोष दृष्टि रखने से हमें हर वस्तु दोषयुक्त दीख पड़ती है। उससे डर लगता है, घृणा होती है। जिससे घृणा होती है, उसके प्रति मन सदा शंकाशील रहता है, साथ ही अनुदारता के भाव भी पैदा होते हैं। ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति या वस्तु से न तो प्रेम रह सकता है और न उसके गुणों के प्रति आकर्षण उत्पन्न होना ही सम्भव रहता है।

दोष दृष्टि रखने वाले व्यक्ति को धीरे-धीरे हर वस्तु बुरी, हानिकारक और त्रासदायक दीखने लगती है। उसकी दुनियाँ में सभी विराने, सभी शत्रु और सभी दुष्ट होते है। ऐसे व्यक्ति को कहीं शान्ति नहीं मिलती।

दूसरों की बुराइयों को ढूँढ़ने में, चर्चा करने में जिन्हें प्रसन्नता होती है वे वही लोग होते हैं जिन्हें अपने दोषों का पता नहीं है। अपनी ओर दृष्टिपात किया जाय तो हम स्वयं उनसे अधिक बुरे सिद्ध होंगे, जिनकी बुराइयों की चर्चा करते हुये हमें प्रसन्नता होती है। दूसरों के दोषों को जिस पैनी दृष्टि से देखा जाता है। यदि अपने दोषों का उसी बारीकी से पता लगाया जाय तो लज्जा से अपना सिर झुके बिना न रहेगा और किसी दूसरे का छिद्रान्वेषण करने की हिम्मत न पड़ेगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1961 मई Page 19

रविवार, 8 अक्टूबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 8 Oct 2023

आत्मिक क्षेत्र में सबसे बड़ी शक्ति ‘श्रद्धा’ है। श्रद्धा, अन्धविश्वास, मूढ़ मान्यता या कल्पना लोक की उड़ान या भावुकता नहीं, वरन् एक प्रबल तत्त्व है। भौतिक जगत में विद्युत शक्ति की महत्ता एवं उपयोगिता से अगणित प्रकार के कार्य सम्पन्न होते देखे जाते हैं। यदि बिजली न हो तो वैज्ञानिक उपलब्धियों में से तीन चौथाई निरर्थक हो जायेगी ठीक इसी प्रकार आत्मिक जगत में श्रद्धा की बिजली की महत्ता है। मनोयोग और भावनाओं के सम्मिश्रण से जो सुदृढ़ निश्चय एवं विश्वास विनिर्मित होता है। उसे भौतिक बिजली से कम, नहीं वरन् अधिक ही शक्ति-शाली समझना चाहिए। आत्म निर्माण का विशाल काय भवन उच्च आदर्शों के प्रति अटूट निष्ठा की चट्टान पर ही खड़ा किया जाता है।

समय ही जीवन है। समय ही उत्कर्ष है। समय ही महानता के उच्चतम शिखर तक चढ़ दौड़ने का सोपान है। महाकाल की उपासना का जो स्वरूप समझ सका है उसी को मृत्युंजय बनने का सौभाग्य मिला है और किसी के साथ भी मखौल किया जा सकता है पर महाकाल के साथ नहीं। सिंह के दाँत गिनने की धृष्टता किसी को नहीं करनी चाहिए। समय के दुरुपयोग की भूल अपने भाग्य और भविष्य को ठुकराने, लतियाने की तरह है। जो समय गँवाता है वह प्रकारान्तर से अपने उत्कर्ष और आनन्द का द्वार ही बन्द करता है।

शक्ति के स्रोत मनुष्य के भीतर छिपे पड़े है, पर कोई विरले ही हैं जो उन्हें समझते, अनुभव करते और काम में लातें है। यही है असफलताओं का कारण जिसे अक्सर लोग दूसरों पर थोपना चाहते हैं। आत्म प्रवंचना के रूप में दूसरों को भला बुरा कह कर कोई कुछ जी हलका कर सकता है पर उससे कुछ काम नहीं चलता। अवरोधों की मंजिल पार करते हुए प्रगति की दिशा में चलना और सफलता वरण करना उसी के लिए सम्भव है जो अपने को समझने सुधारने और समर्थ बनाने के लिए कटिबद्ध होता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गलत विश्वास

वैज्ञानिको ने एक प्रयोग में  एक बड़े से टैंक में एक शार्क मछली को रखा। और उसके साथ ही कुछ छोटी मछलियों को भी उसी टैंक में डाल दिया। स्वाभाविक रूपसे शार्कने तुरंत ही उन सारी मछलियों का सफाया कर दिया इसके बाद वैज्ञा निको ने टैंक में एक बहुत ही मजबूत फैबर ग्लास  लगा दिया। और टैंक के दो हिस्से कर दिए। एक हिस्से में शार्क थी। और दुसरे हिस्से में उसने फिर से छोटी मछलियों को डाला। जैसे ही शार्क की नज़र उन पर पड़ी। वो उन्हें खाने के लिए लपकी। पर इस बार बीच में फैबर ग्लास  होने की वजह से शार्क उससे जा टकराई। एक बार टकराने के बाद भी शार्क ने हार नहीं मानी। वो हर कुछ समय के अंतराल के बाद उस दिशा में बढती जहा मछलिया थी,और टकरा के फिर पलट आती। इस दौरान छोटी मछलिया आसानी से और आज़ादी से तैर रही थी। और कुछ एक डेढ़ घंटे के बाद शार्क ने हार मान ली।

ये प्रयोग पुरे हफ़्ते भर में कई बार किया गया। धीरे धीरे शार्क के हमले कम होते गए। और वो ज्यादा जोर भी नहीं लगाती थी। बार बार कोशिश करते रहने से, पर फिर भी मछलियों तक न पहुँचपाने से शार्क ने थक कर हार मान ली। और प्रयास करना छोड़ दिया। कुछ दिनों के बाद वैज्ञानिको ने बिच के फैबर ग्लास को हटा दिया। पर इसके बाद भी शार्क ने कभी हमला नहीं किया। शार्क को पिछले कुछ हफ्तों में विश्वास हो गया था की वो उन मछलियों तक नहीं पहुँच सकती। और दूसरी छोटी मछलिया बिना किसी नुकसान के तैरने लगी। शार्क उन तक पहुँचने के कोशिश भी नहीं करती थी।  पूर्वानुभव के कारण धारणा दृढ़ बन गईऔर पूर्वाग्रह के कारण वस्ताविकता को समझना असंभव बना।

इस प्रसंग की सीख यह है कि जब हम किसी काम के लिए लगातार प्रयास करते हैं और हर बार असफल होते हैं तो हमारी सोच नकारात्मक हो जाती है। धीरे-धीरे प्रयास करना ही बंद कर देते हैं और सफलता हासिल नहीं कर पाते हैं। अगर हम सफल होना चाहते हैं तो हमें लगातार प्रयास करते रहना चाहिए और कोशिश करना नहीं छोड़ना चाहिए, जब तक कि हम सफल नहीं हो जाते हैं।

शनिवार, 7 अक्टूबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 7 Oct 2023

आध्यात्मिक साधना की सफलता के लिए सबसे पहला एवं अनिवार्य कदम “इन्द्रिय निग्रह” है। यों ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच मानी जाती हैं, पर उनमें से दो ही प्रधान हैं पहली- स्वादेन्द्रिय और दूसरी कामेन्द्रिय। इनमें से स्वादेन्द्रिय प्रधान है। उसके वश में आने से कामेन्द्रिय भी वश में आ जाती है। रसना को जिसने जीता, वह विषय वासना पर भी अंकुश रख सकेगा। चटोरा आदमी ब्रह्मचर्य से नहीं रह सकता, उसे सभी इन्द्रियाँ परेशान करती हैं, विशेष रूप से काम वासना तो काबू में आता ही नहीं। इसलिए इन्द्रिय-निग्रह की तपश्चर्या संयम, साधना, स्वाद को, जिव्हा को वश में करके आरंभ की जाती है। चटोरेपन की वेदी पर न केवल आरोग्य और दीर्घ जीवन बलि चढ़ जाता है, वरन् आत्मसंयम की साधना भी मात्र मखौल बनकर रह जाती है।

संयमी और सदाचारी ही प्राणवान, शक्तिवान, स्वस्थ एवं संस्कारी बनते तथा भौतिक और आध्यात्मिक आनन्द की उपलब्धि कर सकते हैं। ओजस्वी, तेजस्वी एवं मनस्वी होने का अर्थ है मन, वचन तथा कर्म से सभी इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना। ब्रह्मचर्य इसे ही कहा जाता है। इसका पालन न तो कठिन है न असंभव। आवश्यकता मात्र ऊर्ध्वरेता बनने और ऊंचा उठने की आकाँक्षा की है। इस संबंध में महात्मा गाँधी का कहना है कि आत्म संयम की साधना करने वाले को सर्वप्रथम अपनी रसना को वश में रखना अनिवार्य है। इसके लिए स्वाद नियंत्रण परमावश्यक है।
                                              
अपनी वासनाओं पर काबू रखना, उन्हें कुमार्ग पर न जाने देना मनुष्य के शौर्य, पराक्रम एवं पुरुषार्थ का प्रधान चिन्ह है। मनः क्षेत्र में कुहराम मचाने वाली उत्तेजनाएँ, आवेश, असंतुलन एवं विकार इन्द्रियों के असंयम के ही परिणाम होते हैं। जब तक स्वाद या चटोरेपन के वशीभूत हो स्वादेन्द्रिय पेट पर अत्याचार करती रहेंगी, तब तक इन विकारों से छुटकारा पाना संभव नहीं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 6 Oct 2023

🔶 जितना जानते हो उससे अधिक जानने को हर घड़ी कोशिश करते रहो, इन्द्रियों के गुलाम मत बनो और न आलस्य को ही अपने पास फटकने दो। काम को देखकर घबराओ मत, उसे पूरा करने के लिए मशीन की तरह जुट जाओ जितना अधिक काम करो उतनी ही अधिक प्रसन्नता का अनुभव करो। काम का तरीका ठीक रखो। ऐसा न हो कि जाना है पूर्व और पश्चिम को दौड़ पड़ो। अपनी बात पर मजबूत रहो, अपने काम पर श्रद्धा और विश्वास रखो, बार-बार विचारों को मत बदलो, यदि अपनी कार्यपद्धति सच्ची मालूम पड़ती है तो उस पर दृढ़ रहो किसी भी कठिनाई के आने पर मत डिगो। यह गुण तुम्हारे अन्दर जैसे जैसे बढ़ते जाएंगे वैसे ही वैसे भाग्य निर्माण होता जायगा।

🔷 जो नियम या कर्तव्य भय अथवा स्वार्थ मूलक हों वह नीति, और जिसमें भय अथवा स्वार्थ का अवकाश न हो किन्तु जिस नियम का केवल कर्तव्य बुद्धि से ही पालन किया जावे वह धर्म कहलाता है। रोज के अपने काम-काज के बीच अगर हम कुछ घंटे ध्यान में भी लगायें और अपने मन को मौन द्वारा ईश्वर की आवाज सुनने के लिये तैयार करें तो क्या ही अच्छा हो! वह तो ऐसा दैवी रेडियो है जो हमेशा गाता रहता है। जरूरत सिर्फ यह है कि हम उसे सुनने के लिये तैयार हों।

🔶 कहावत है कि ‘जहाँ चाह वहाँ राह’ जो जैसा होना चाहता है वैसा बन जाता है। महापुरुषों के जीवन चरित्रों पर नजर डालिए। क्या परिस्थितियों ने ही उन्हें ऊँचा उठा दिया था? नहीं, जिसने अपने को जैसा बनाना चाहा वह वैसा बन गया। अर्जुन, रावण, राम, कृष्ण, हनुमान, अभिमन्यु, प्रताप, शिवाजी जैसे महापुरुषों में वैसे बनने की चाहत नहीं होती, दृढ़ मनोबल नहीं होता तो क्या वे इतने बड़े कार्य कर पाते? महान् तानाशाह हिटलर और मुसोलिनी कभी अपने बहुत ही गरीब पिताओं के घरों में पैदा हुए थे और अपनी आधी उम्र तक इतना पैसा नहीं कमा पाये थे कि अच्छी तरह अपना खर्च चला लें। नैपोलियन बोनापार्ट एक गरीब के घर में पैदा हुआ था, पर उसने वह कर दिखाया जिसे अरबों-खरबों की गिनती रखने वाले और उसकी अपेक्षा चौगुना शारीरिक बल रखने वाले नहीं कर सकते।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 5 अक्टूबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 5 Oct 2023

बन्धन तीन हैं। वासना, तृष्णा, और अहंता। वासनाओं की स्वामिनी जननेन्द्रिय है वह यौनाचार से ही तृप्त नहीं होती वरन् चिन्तन क्षेत्र में भी कामुकता के रूप में समय कुसमय छाई रहती और कल्पना चित्र बनाती रहती है। मनुष्य इसी से बन्धन में बँधता है। विवाह करता है। उसके साथ ही सन्तानोत्पादन का सिलसिला चल पड़ता है। स्त्री बच्चों की जिम्मेदारी साधारण नहीं होती। पूरा जीवन इसी प्रयोजन के लिए खपा देने पर भी उसमें कमी ही रह जाती है और मरते समय तक मनुष्य इन्हीं की चिन्ता करता रहता है। इस पूरे प्रपंच को ऐसा बन्धन समझना चाहिए जिसे बाँधता तो मनुष्य हँसी-खुशी से है पर फिर उसी बोझ से इतना लद जाता है अन्य कोई महत्वपूर्ण काम नहीं कर पाता।                          

अहन्ता से छुटकारा पाने के लिए शिष्टता, नम्रता, विनयशीलता, सज्जनता अपनाने पर तो आत्मसन्तोष और लोग सम्मान का लाभ मिलता है उस पर विचार करना चाहिए। उद्धत आचरणों में दूसरों पर छाप डालने के लिए जितना दम्भ अपनाना पड़ता ह उसका बचकानापन समझा जा सकता सके तो अहंकारी को अपने ऊपर आप हंसी आती है और शालीनता अपनाकर दूसरों को सम्मान देने का मार्ग चना जा सके तो अहंकार का दुर्गुण सहज शान्त हो सकता है। शरीर सत्ता को मलमूत्र की गठरी मानने वाला, मृत्यु के मुख में ग्रास की तरह अटका हुआ तुच्छ प्राणी किस बात का अहंकार करे?                                                         

आत्मा के यथार्थ और पवित्र स्वरूप को समझना ही आत्मज्ञान है। होता यह है कि हम भ्रमवश अपने ‘स्व’ को शरीर में इस कदर घुला लेते हैं कि अनुभव में नहीं आता रहता है कि हम मात्र शरीर हैं। उसी की इच्छाओं को अपनी इच्छा मान लेते हैं और उसी की तुष्टि से प्रसन्नता अनुभव करने लगते हैं। आत्मा की चर्चा तो प्रसंगवश करते हैं पर कभी ऐसा आभास नहीं होता है कि हमारा ‘स्व’ शरीर से पृथक है और उसकी समस्याएँ आवश्यकताएँ शरीर से भिन्न हैं।     

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है

जब तक आप दूसरों पर आश्रित रहते हैं या समझते हैं कि हमारे कष्टों को कोई और दूर करेगा, तब तक बहुत बड़े भ्रम में हैं। जो उलझनें आपके सामने हैं, उनका दु:खदायी रूप अपनी त्रुटियों के कारण है। उन त्रुटियों को दूर करके आप स्वयं ही अपनी उलझनें सुलझा सकते हैं।

संसार में सफलता प्राप्त करने की आकांक्षा के साथ ही अपनी योग्यता में वृद्धि करना भी आरंभ कीजिए। आपका भाग्य किस प्रकार लिखा जाए, इसका निर्णय करते समय विधाता आपकी आतंरिक योग्यताओं की परख करता रहता है। उन्नति करने वाले गुणों को यदि अधिक मात्रा में जमा कर लिया गया है, तो भाग्य में उन्नति का लेखा लिखा जाएगा और यदि उन्नायक गुणों को अविकसित पड़ा रहने दिया गया है, दुर्गुणों को, मूर्खताओं को अंदर भर कर रखा गया है, तो भाग्य की लिपि दूसरी होगी।

विधाता लिख देगा कि `इसे तब तक दु:ख-दुर्भाग्यों में ही पड़ा रहना होगा, जब तक कि योग्यताओं का संपादन न करे।’ अपने भाग्य को जैसा चाहें वैसा लिखाना, अपने हाथ की बात है। यदि आप आत्मनिर्भर हो जाएँ, जैसा होना चाहते हैं उसके अनुरूप अपनी योग्यताएँ बनाने में प्रवृत्त हो जाएँ, तो विधाता को विवश होकर अपनी मनमरजी का भाग्य लिखना पड़ेगा। जब आत्मविश्वास के साथ सुयोग्य मार्ग की तलाश करेंगे, तो वह किसी न किसी प्रकार मिल कर ही रहेगा।

📖 अखण्ड ज्योति -सितम्बर 1943

बुधवार, 4 अक्टूबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 4 Oct 2023

“ईश्वर रूठा हुआ नहीं है कि उसे मनाने की मनुहार करनी पड़े। रूठा तो अपना स्वभाव और कर्म है। मनाना उसी को चाहिए। अपने आपसे ही प्रार्थना करें कि कुचाल छोड़े। मन को मना लिया- आत्मा को उठा लिया तो समझना चाहिए ईश्वर की प्रार्थना सफल हो गई और उसका अनुग्रह उपलब्ध हो गया।”

“गिरे हुओं को उठाना, पिछड़े हुओं को आगे बढ़ाना, भूले को राह बताना और जो अशान्त हो रहा है, उसे शान्तिदायक स्थान पर पहुँचा देना। यह वस्तुतः ईश्वर की सेवा ही है। जब हम दुःख और दरिद्र को देखकर व्यथित होते हैं और मलीनता को स्वच्छता में बदलने के लिए बढ़ते हैं तो समझना चाहिए यह कृत्य ईश्वर के लिए- उसकी प्रसन्नता के लिए ही किये जा रहे हैं। दूसरों की सेवा सहायता अपनी ही सेवा सहायता है।”                  
                                                   
“प्रार्थना उसी की सार्थक है जो आत्मा को परमात्मा में घुला देने के लिए व्याकुलता लिए हुए हो। जो अपने को परमात्मा जैसा महान बनाने के लिए तड़पता है- जो प्रभु को जीवन के कण-कण में घुला लेने के लिए बेचैन है। जो उसी का होकर जीना चाहता है उसी को भक्त कहना चाहिए। दूसरे तो विदूषक हैं। लेने के लिए किया हुआ भजन वस्तुतः प्रभु प्रेम का निर्मम उपहास है। भक्ति में तो आत्म समर्पण के अतिरिक्त और कुछ होता ही नहीं। वहाँ देने की ही बात सूझती है लेने की इच्छा ही कहाँ रहती है?” 

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्वयं को पहचाने

एक बार स्वामी विवेकानंद के आश्रम में एक व्यक्ति आया जो देखने में बहुत दुखी लग रहा था। वह व्यक्ति आते ही स्वामी जी के चरणों में गिर पड़ा और बोला "महाराज! मैं अपने जीवन से बहुत दुखी हूं, मैं अपने दैनिक जीवन में बहुत मेहनत करता हूँ, काफी लगन से भी काम करता हूँ लेकिन कभी भी सफल नहीं हो पाया। भगवान ने मुझे ऐसा नसीब क्यों दिया है कि मैं पढ़ा-लिखा और मेहनती होते हुए भी कभी कामयाब नहीं हो पाया हूँ।"

स्वामी जी उस व्यक्ति की परेशानी को पल भर में ही समझ गए। उन दिनों स्वामी जी के पास एक छोटा-सा पालतू कुत्ता था, उन्होंने उस व्यक्ति से कहा ‘‘तुम कुछ दूर जरा मेरे कुत्ते को सैर करा लाओ फिर मैं तुम्हारे सवाल का जवाब दूँगा।’’

आदमी ने बड़े आश्चर्य से स्वामी जी की ओर देखा और फिर कुत्ते को लेकर कुछ दूर निकल पड़ा। काफी देर तक अच्छी-खासी सैर कराकर जब वह व्यक्ति वापस स्वामी जी के पास पहूँचा तो स्वामी जी ने देखा कि उस व्यक्ति का चेहरा अभी भी चमक रहा था, जबकि कुत्ता हांफ रहा था और बहुत थका हुआ लग रहा था।

स्वामी जी ने व्यक्ति से कहा कि  "यह कुत्ता इतना ज्यादा कैसे थक गया जबकि तुम तो अभी भी साफ-सुथरे और बिना थके दिख रहे हो|"

तो व्यक्ति ने कहा "मैं तो सीधा-साधा अपने रास्ते पर चल रहा था लेकिन यह कुत्ता गली के सारे कुत्तों के पीछे भाग रहा था और लड़कर फिर वापस मेरे पास आ जाता था। हम दोनों ने एक समान रास्ता तय किया है लेकिन फिर भी इस कुत्ते ने मेरे से कहीं ज्यादा दौड़ लगाई है इसलिए यह थक गया है।"

स्वामी जी ने मुस्करा कर कहा  "यही तुम्हारे सभी प्रश्रों का जवाब है, तुम्हारी मंजिल तुम्हारे आसपास ही है वह ज्यादा दूर नहीं है लेकिन तुम मंजिल पर जाने की बजाय दूसरे लोगों के पीछे भागते रहते हो और अपनी मंजिल से दूर होते चले जाते हो।"

यही बात लगभग हम सब पर लागू होती है। प्रायः अधिकांश लोग हमेशा दूसरों की गलतीयों की निंदा-चर्चा करने, दूसरों की सफलता से ईर्ष्या-द्वेष करने, और अपने अल्प ज्ञान को बढ़ाने का प्रयास करने के बजाय अहंकारग्रस्त हो कर दूसरों पर रौब झाड़ने में ही रह जाते हैं।

अंततः इसी सोच की वजह से हम अपना बहुमूल्य समय और क्षमता दोनों खो बैठते हैं, और जीवन एक संघर्ष मात्र बनकर रह जाता है।

दूसरों से होड़ मत कीजिये, और अपनी मंजिल खुद बनाइये।

मंगलवार, 3 अक्टूबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 3 Oct 2023

प्रसन्नता और आनन्द में मौलिक अन्तर है। प्रसन्नता इच्छित भौतिक वस्तुओं की उपलब्धि पर होती है। पर वह देर तक टिकती नहीं। क्योंकि उससे भी बड़ी उपलब्धि की उत्कण्ठा तत्काल आ दबोचती है। सौ रुपये का लाभ हुआ। क्षण भर प्रसन्नता हुई। दूसरे ही क्षण, हजार की लालसा जग पड़ी और वे सौ रुपये अपर्याप्त लगने लगे। असन्तोष उत्पन्न करने लगे। साथ ही उन सौ रुपयों की रखवाली का नया ताना-बाना बुनना पड़ा। इतना ही नहीं जब उनके खर्च का हाथ बढ़ता है तो मुफ्त का या अनीति उपार्जित धन मात्र कुमार्ग में जाने के लिए रास्ता बनाता है। नशा, जुआ, शृंगार, व्यभिचार, ठाट-बाट बनाने जैसी बातें सूझती हैं। क्षण भर की प्रसन्नता कुछ ही क्षणों में नई चिन्ताओं और हैरानियों का बोझ लाद देती है।

सन्तोषी, प्रसन्नचित्त, कर्तव्यपरायण, सज्जन, समझदार, ईमानदार, जिम्मेदार और बहादुर मनुष्य जिसके प्रौढ़ और परिपक्व मन:स्थिति में रहते हैं उसे स्वर्ग कहते हैं। कठिनाइयां उनके सामने भी आती रहती हैं, पर वे उन्हें अपनी परीक्षा मानते हैं कि समाधान खोजने या सहने का पराक्रम या साहस उदय हुआ या नहीं। ऐसी आत्माएं स्वर्गलोक में काम करती हैं। उनकी प्रसन्नता, प्रफुल्लता को कोई छीन नहीं सकता है।                  
                                                     
मुक्ति भव-बन्धनों से छुटकारे को कहते हैं। भव-बन्धनों में हथकड़ी, बेड़ी और गले की तौक की तुलना दी गई है। पर इन्हें क्रूर, दुर्धर्ष अपराधियों को बन्दीगृहों में ही पहनाया जाता है। सामान्य लोग तो खुले हुए भी फिरते हैं। इस बन्धन अलंकार का तात्पर्य लोभ, मोह और अहंकार से है। उन्हें मनुष्य स्वयं ही अपने ऊपर लादता और मकड़ी के जाले की तरह उनमें स्वयं ही फंसता है। वह चाहे तो उस जाल-जंजाल को विवेक दृष्टि अपनाकर आसानी से समेट भी सकता है।       

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 बुद्धिमत्ता और मूर्खता की कसौटी

बुद्धिमत्ता की निशानी यह मानी जाती रही है कि उपार्जन बढ़ाया जाय—अपव्यय रोक जाय और संग्रहित बचत के वैभव से अपने वर्चस्व और आनन्द को बढ़ाया जाय। संसार के हर क्षेत्र में इसी कसौटी पर किसी को बुद्धिमान ठहराया जाता है।

मानव-जीवन की सफलता का लेखा-जोखा लेते हुए भी इसी कसौटी को अपनाया जाना चाहिए। जीवन-व्यवसाय में सद्भावनाओं की—सत्प्रवृत्तियों की पूँजी कितनी मात्रा में संचित की गई? सद्विचारों का, सद्गुणों का, सत्कर्मों का वैभव कितना कमाया गया? इस दृष्टि से अपनी उपलब्धियों को परखा, नापा जाना चाहिए। लगता हो कि व्यक्तित्व को समृद्ध बनाने वाली इन विभूतियों की संपन्नता बढ़ी है तो निश्चय ही बुद्धिमत्ता की एक परीक्षा में अपने को उत्तीर्ण हुआ समझा जाना चाहिए।

समय, श्रम, धन, वर्चस्व, चिन्तन मानव-जीवन की बहुमूल्य सम्पदाऐं हैं। इन्हें साहस और पुरुषार्थ पूर्वक सत्प्रयोजन में लगाने की तत्परता बुद्धिमत्ता की दूसरी कसौटी है। जिनने इन ईश्वर-प्रदत्त बहुमूल्य अनुदानों को पेट-प्रजनन में-विलास और अहंकार में खर्च कर डाला, समझना चाहिए वे बहुमूल्य रत्नों के बदले काँच-पत्थर खरीदने वाले उपहासास्पद मनःस्थिति के बाल-बुद्धि लोग हैं।

वस्तु का सही मूल्यांकन न कर सकने वाले और उपलब्धियों के सदुपयोग में प्रमाद बरतने वाले मूर्ख ही कहे जायेंगे। जीवन-क्षेत्र में हमारी सफलता-असफलता का लेखा-जोखा प्रस्तुत करते समय यह देखना चाहिए कि कहीं दूरदर्शिता के अभाव से हम सौभाग्य को दुर्भाग्य में तो नहीं बदल रहे हैं? जीवन बहुमूल्य सम्पदा है। यह अनुपम और अद्भुत सौभाग्य है। इस सुअवसर का समुचित लाभ उठाने के सम्बन्ध में हम दूरदर्शिता का परिचय दे, इसी में हमारी सच्ची बुद्धिमत्ता मानी जा सकती हैं।

अखण्ड ज्योति फरवरी 1974 पृष्ठ 1

सोमवार, 2 अक्टूबर 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 2 Oct 2023

ध्यान का तात्पर्य है बिखरे हुए विचारों को एक केंद्र पर केंद्रीभूत करना। यह एकाग्रता का अभ्यास, चिन्तन को नुकीला बनाता है। मोटे तार से कपड़ों को नहीं सिया जा सकता। पर जब इसकी पैनी नोंक निकाल दी जाती है तो कपड़े की सिलाई का प्रयोजन भली-भाँति पूरा हो सकता है। बिखराव में शक्तियों की अस्त व्यस्तता रहती है। पर जब उन्हें बटोरकर एक केंद्र के साथ बाँध दिया जाता है तो अच्छी बुहारने वाली झाडू बन जाती है। धागों को इकट्ठा करके कपड़ा बुना जाता है और तिनके रस्सी बन जाते हैं। मेले ठेलों की बिखरी भीड़ गन्दगी फैलाती और समस्या बनती है पर जब उन्हीं मनुष्यों को सैनिक अनुशासन में बाँध दिया जाता है तब ये ही देश की सुरक्षा संभालते हैं, शत्रुओं के दाँत खट्टे करते हैं और बेतुकी भीड़ को नियम मर्यादाओं में रखने का काम करते हैं। बिखरे घास-पात को समेटकर चिड़ियाँ मजबूत घोंसले बना लेती हैं और उनमें बच्चों समेत निवास करती हैं।

विचारों को दिशाबद्ध रखने वाले विद्वान, साहित्यकार, कलाकार, वैज्ञानिक, शिल्पी, विशेषज्ञ, दार्शनिक बन जाते हैं। पर जिनका मन उखड़ा-उखड़ा रहता है वे समस्त सुविधा साधन होते हुए भी आवारागर्दी में जीवन बिता देते हैं। अर्जुन के द्रौपदी स्वयंवर जीतने की कथा प्रसिद्ध है। उसकी समूची एकाग्रता मछली की आँख पर जमाई थी और लक्ष्य वेध लिया था। जब कि दूसरे राजकुमार चित्त के चंचल रहने पर वैसे ही धनुष-बाण रहने पर असफल होकर रह गये थे। निशाने वही ठिकाने पर बैठते हैं जो लक्ष्य के साथ अपनी दृष्टि एकाग्र कर लेते हैं।             
                                                   
अध्यात्म प्रयोजन में कल्पना और भावना का एकीकरण करते हुए किसी उच्च केंद्र पर केंद्रीभूत करने का अभ्यास कराया जाता है इसे ध्यान कहते हैं। ध्यान की क्षमता सर्वविदित है। कामुक चिन्तन में डूबे रहने वालों को स्वप्नदोष होने लगते हैं। टहलने के साथ स्वास्थ्य सुधार की भावना करने वाले तगड़े होते जाते हैं पर दिन भर घूमने वाले पोस्ट मैन या उसी कार्य को भारभूत मानने वाले उस अवसर का कोई लाभ नहीं उठ पाते। पहलवान की भुजायें मजबूत हो जाती हैं किन्तु दिन भर लोहा पीटने वाले लुहार को कोई लाभ नहीं होता। इस अन्तर का एक ही कारण है भावनाओं का सम्मिश्रण होना और दूसरे का वैसा न कर पाना।  
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 यथार्थता को समझें—आग्रह न थोपें

संसार जैसा कुछ है हमें उसे उसी रूप में समझना चाहिए और प्रस्तुत यथार्थता के अनुरूप अपने को ढालना चाहिए। संसार केवल हमारे लिए ही नहीं बना हैं ओर उसके समस्त पदार्थों एवं प्राणियों का हमारी मनमर्जी के अनुरूप बन या बदल जाना सम्भव नहीं है। तालमेल बिठा कर समन्वय की गति पर चलने से ही हम संतोष पूर्वक रह सकते हैं और शान्ति पूर्वक रहने दे सकते हैं।

यहां रात भी होती है और दिन भी रहता हैं। स्वजन परिवार में जन्म भी होते हैं और मरण भी। सदा दिन ही रहे कभी रात न हो। परिवार में जन्म संख्या ही बढ़ती रहे मरण कभी किसी का न हो। ऐसी शुभेच्छा तो उचित हैं पर वैसी इच्छा पूर्ण नहीं हो सकती। रात को रात के ढंग से और दिन को दिन के ढंग से प्रयोग करके हम सुखी रह सकते हैं ओर दोनों स्थितियों के साथ जुड़े हुए लाभों का आनन्द ले सकते हैं। जीवन को अपनी उपयोगिता है और मरण को अपनी। दोनों का संतुलन मिलाकर सोचा जा सकेगा। तो हर्ष एवं उद्वेग के उन्मत्त विक्षिप्त बना देने वाले आवेशों से हम बचे रह सकते हैं।

हर मनुष्य की आकृति भिन्न है, किसी की शकल किसी से नहीं मिलती। इसी प्रकार प्रकृति भी भिन्न हैं। हर मनुष्य का व्यक्तित्व अपने ढंग से विकसित हुआ है। उसमंस सुधार परिवर्तन की एक सीमा तक ही सम्भावना है। जितना सम्भव हो उतना सुधार का प्रयत्न किया जाय पर यह आग्रह न रहे कि दुनिया को वैसा ही बना लेंगे जैसा हम चाहते हैं। तालमेल बिठाकर चलना ही व्यवहार कौशल हैं। उसी को अपना कर सुख से रहना ओर शान्ति से रहने देना सम्भव हो सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति मई 1974 पृष्ठ 1

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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