मंगलवार, 11 जुलाई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 11 July 2023

शास्त्र, समाज, धर्म और व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि वह समानता की समान सुविधाएँ उत्पन्न करें। हर व्यक्ति अपनी योग्यता और सामर्थ्य का पूरा-पूरा लाभ देने के लिए बाध्य रहे। यह कर्त्तव्य निष्ठा भले ही भावनात्मक स्तर पर अध्यात्म द्वारा उत्पन्न की जाय, भले ही शासन उसके लिए कठोर प्रतिबंध लगाये। तरीका जो भी हो, हर मानव प्राणी को पूरा श्रम करने और उपलब्ध साधनों के उपभोग करने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।

अपने नैतिक और सामाजिक कर्त्तव्यों की गहरी अनुभूति तभी हो सकती है, जब आत्म-निर्माण और लोक-निर्माण की दिशा में कुछ व्यावहारिक कदम उठाये जाएँ, कुछ कष्ट सहा जाय, कुछ त्याग किया जाय और कुछ ऐसा शौर्य, साहस प्रदर्शित किया जाय जिससे विकृत मान्यताओं को उखाड़ने और परिष्कृत आस्थाओं की जड़ जमाने का अवसर मिले। इसी प्रयोजन के लिए रचनात्मक कार्य पद्धति युग निर्माण योजना बना हुआ है।

वस्तुतः पारिश्रमिक लेकर तो किसी से कुछ भी कराया जा सकता है, लेकिन सेवा वृत्ति का विकास तब होता है, जब उसी प्रकार के कार्य निःस्वार्थ भावना से किये जायें। रचनात्मक कार्य पद्धति इसी का नाम है। जिसके अनुसार विभिन्न स्तर के व्यक्तियों को सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन के लिए समय, श्रम, बुद्धि, प्रतिभा या साधनों का अनुदान देने के लिए बाध्य होना पड़ता हो।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 दाम्पत्य-जीवन को सफल बनाने वाले कुछ स्वर्ण-सूत्र (भाग 1)

पति-पत्नी में कभी झगड़ा नहीं होना चाहिये। यह शोभनीय भी नहीं है और कल्याणकारी भी नहीं है। पति-पत्नी के झगड़े का मतलब है पूरे परिवार का नाश और उनके प्रगाढ़ प्रेम का अर्थ है, सुन्दर परिवार, सुखदायी गृहस्थ। पति-पत्नी के पारिवारिक लड़ाई-झगड़े के कुछ बाह्य और कुछ मनोवैज्ञानिक कारण होते हैं। उनमें से अकर्तव्यशीलता भी एक विशेष कारण है। यदि पति-पत्नी परस्पर अपने बाह्य और मनोवैज्ञानिक कर्तव्यों को सावधानीपूर्वक पूरा करते रहें तो उन दोनों में कभी कोई लड़ाई-झगड़ा न हो।

बाह्य कर्तव्यों में पति का सबसे पहला कर्तव्य है कि वह पत्नी के स्वास्थ्य का अपनी ओर से पूरा ध्यान रखे। बहुत स्वार्थी पति अपनी सेवा लेने के साथ-साथ पत्नी को हर समय किसी न किसी काम में लगाये रखते हैं। उनका विचार रहता है कि पत्नी से जितना ज्यादा से ज्यादा काम लिया जा सके, लिया जाना चाहिये। वह तो काम करने और सेवा करने के लिये आई ही है। जगह पर पानी, जगह पर खाना, यहां तक कि कपड़े-लत्ते और किताब, कागज, स्याही, दवात, तक जगह पर ही लेते हैं।

किसी वस्तु अथवा किसी काम के लिए जगह से उठना जानते ही नहीं। यहाँ तक कि कलम पेंसिल तक उसी से बनवाते और फाउंटेनपेन में रोशनाई तक उससे हीं भरवाया करते हैं। इतना ही नहीं इन तुच्छ कामों के लिए भी उन्हें आराम करती हुई अथवा कोई और आवश्यक काम करती हुई पत्नी को उठा देने में जरा भी दया या संकोच नहीं करते। बहुत से बाबू साहबों को तो पत्नी ही कोट-पतलून और टाई-जूते पहनाती है और हर रोज जूते पर पालिश किया करती है।

रसोई और नाश्ते के सम्बन्ध में तो उसे जितना हैरान किया जा सकता है किया जाता है। और यह मुसीबत छुट्टी के दिन तो और भी बढ़ जाती है। जरा यह बनाना, थोड़ा वह भी बना लेना, आज सुबह इसकी चाय है, शाम को उसका भोजन है, बहुत दिन से यह नहीं बना, वह चीज खाये तो कई दिन हो गये- की ऐसी रेल लग जाती है कि बेचारी पत्नी को दिन भर दम मारने और चूल्हें, अंगीठी के पास से उठने की फुरसत नहीं मिलती। आप तो कोच, कुरसी या चारपाई पर पड़ गये और मिनट-मिनट पर तरह-तरह की फरमाइशें चलाने लगे। अपनी इस नवाबी में उन्हें इस बात का जरा भी ध्यान नहीं रहता है कि उनकी इस फैल-सूफी से बेचारी पत्नी की हड्डी-हड्डी टूट जाती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1968 पृष्ठ 26

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सोमवार, 10 जुलाई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 10 July 2023

सज्जनोचित परम्परा यही रही है कि यदि किसी के पास अतिरिक्त आय के स्रोत हैं तो उसमें से उपयोग, उपभोग उतना ही करे जितना कि उस समाज के औसत आदमी को उपलब्ध है। शेष को दान के रूप में समाज को वापिस लौटा देना चाहिए। यह प्रथा जब से बंद हुई, लोग लालचवश अधिक संग्रह करने और उसका विलासिता में अधिक उपयोग करने लगे तो समाज अनेक प्रकार के विप्लव, उपद्रव खड़े हो गये।

चाहे साम्यवादी पद्धति से मनुष्य को बलात् विवश किया जाय कि वह आवश्यकतानुसार लेने और सामर्थ्यानुसार काम करने की सर्वोपयोगी विधि व्यवस्था का पालन करे, चाहे आध्यात्मवादी अपरिग्रही आदर्श स्वेच्छा पूर्वक अपनाने की सादगी का देश के सामान्य नागरिक स्तर का निर्वाह करते हुए जो बचे उसे बिना किसी अहंकार या विज्ञापन के विशुद्ध कर्त्तव्य बुद्धि से समाज को दान रूप में लौटा दे-पद्धति कोई भी क्यों न हो दोनों का निष्कर्ष एक है।

ब्राह्मण-ब्राह्मण के बीच ऊँच-नीच है और अछूट-अछूत के के बीच छूआछात है। आदमी-आदमी के बीच छोटाई-बड़ाई हो सकती है, पर उसका आधार गुण, कर्म, स्वभाव, सेवा, सदाचार, परमार्थ जैसी उत्कृष्टताएँ होनी चाहिए। किसी को नीच तो माना जा सकता है, पर उसका कारण उसकी दुष्टता, दुबुर्दि ही होनी चाहिए। जन्म, जाति, वंश के रूप में सभी ब्रह्माजी के पुत्र, मनु की संतान हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 सहयोग और सहिष्णुता (अन्तिम भाग)

यह आवश्यक नहीं कि हमारे सभी विचार ठीक ही हों, हमारी मान्यता, धारणा, एवं आकांक्षा हमारे लिए ठीक हो सकती है पर यह आवश्यक नहीं कि दूसरों को भी उन्हें मानने के लिए बाध्य किया जाय। अनेक दार्शनिक, धार्मिक, सामाजिक एवं राजनैतिक मतभेद प्रायः ऐसे होते हैं जिनमें दोनों ही पथ भ्रान्त पाये जाते है। इनके सम्बन्ध में हमें अधिक सहिष्णुता का परिचय देना चाहिए। कुछ विरोध ऐसे हैं जिन्हें अपराध कहते हैं, जिनके लिए राजदंड की व्यवस्था है। चोरी, हत्या, लूट, छल, दुराचार आदि अनैतिक कर्मों के लिए अवश्य ही प्रबल विरोध किया जाना चाहिए, उसमें जरा भी सहिष्णुता की जरूरत नहीं है परन्तु स्मरण रहे वह ‘प्रबल विरोध’ ऐसा नहीं जो उलटे हमें ही अपराधी बना दे। दण्ड देने योग्य विवेक हर एक में नहीं होता, खास तौर से जिसका अपराध किया है उसमें तो बिलकुल ही नहीं होता, इसलिए दण्ड के लिए उदार, विवेकवान न्यायप्रिय एवं निष्पक्ष व्यक्ति को ही पंच चुनना चाहिए। न्यायालयों और न्यायाधीशों की स्थापना इसी आधार पर हुई है।

संसार में कोई भी दो मनुष्य एक सी आकृति के नहीं मिलते। प्रभु की रचना ऐसी ही है कि हर मनुष्य की आकृति में कुछ न कुछ अन्तर रखा गया है। आकृति की भाँति विचारों, विश्वासों और स्वभावों में भी अन्तर होता है। जैसे विभिन्न आकृतियों के मनुष्य एक साथ प्रेमपूर्वक रह सकते हैं वैसे ही विभिन्न मनोभूमियों के मनुष्यों को भी एक साथ रहने में, प्रेम पूर्वक सुसम्बन्ध बनाये रहने में कोई अड़चन न होनी चाहिए। समाज की सुख-शान्ति, एकता और उन्नति इसी सहिष्णुता पर निर्भर है। असहिष्णुता लोगों का समाज, सदा कलह और संघर्षों से जर्जर होता रहता है वह किसी भी दृष्टि से कोई उन्नति नहीं कर पाता।

गायत्री माता की गोद में चढ़ना, उसका प्रिय पुत्र बनना निश्चय ही हमारे लिए अतीव आनन्ददायक एवं कल्याणकारक सिद्ध होता है। माता उन्हीं लोगों को अपना स्नेह भाजन बनाती है जो उसकी आज्ञा मानते है उसकी व्यवस्था पर आस्था रखते हैं। गायत्री की जो 24 आज्ञाएँ हमारे लिए निर्धारित हैं वे इस महामन्त्र के 24 अक्षरों में सन्निहित है। ‘गो’ शब्द द्वारा माता की आज्ञा यह है कि हम छल की कायरता का परित्याग करें और सहिष्णुता एवं उदारता के साथ जनसमाज में मधुर सम्बन्ध स्थापित करते हुए शान्तिमय जीवन का निर्माण करें।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसम्बर 1952 पृष्ठ 3


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शनिवार, 8 जुलाई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 8 July 2023

युग निर्माण परिवार के हर सदस्य को अपनी उदारता का स्तर और आगे बढ़ाना चाहिए। दस पैसा रोज और एक घंआ समय आरंभिक प्रतीक पूजा थी। अभ्यास के रूप में इतना छोटा ही श्रीगणेश कराया गया था, वह अंतिम नहीं न्यूनतम था। गुजारा भर कर पाने वालों को भी महीने में एक दिन की कमाई देनी चाहिए, ताकि उनके बदले में एक कार्यकर्त्ता उसकी रोटी खोकर सर्वग्राही असुरता से लड़ने के लिए खड़ा रह सके।

वर्ग भेद उत्पन्न करने वाली हर प्रवृत्ति को निरुत्साहित किया जाना चाहिए। जाति, वर्ण, भाषा, देश, धर्म, संस्कृति आदि के नाम पर इतने विभेद पिछले दिनों खड़े कर दिये गये हैं कि उनने न केवल आदमी-आदमी के बीच खाई खोदी है, वरन् परस्पर एक दूसरे को बिराना, अपरिचित, विरोधी और शत्रु भी बना दिया है। जब तक यह दीवारें गिराई नहीं जायेंगी, प्रथकतावादी संकीर्णता के रक्त-रंजित पंजे मनुष्य की छाती में गढ़े ही रहेंगे।

यदि हमें मानवी एकता का लक्ष्य प्राप्त करना है और ज्ञान की परिधि को विश्वव्यापी बनाना है, तो एक विश्व-भाषा बनाये बिना काम चल ही नहीं सकता। आरंभ में एक क्षेत्रीय भाषा इस प्रकार से भी  रह सकती है पर उन दोनों को ही सीखना अनिवार्य होना चाहिए। पीछे क्षेत्रीय भाषाओं का झंझट मिटाया जा सकता है और दुहरा वजन ढोने से इनकार भी किया जा सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 सहयोग और सहिष्णुता (भाग 3)

विवाह के समय देवता और पंचों को साक्षी देकर लोग यह धर्म प्रतिज्ञा करते हैं कि हम इस नारी के जीवन का सारा उत्तरदायित्व अपने ऊपर लेते हैं। जैसे बालक का सारा उत्तरदायित्व उसकी माता पर होता है, माता अपने बच्चे से काम लेती है, डाँटती-फटकारती भी हैं परन्तु उससे भी पहले उसके हृदय में अनन्त करुणा, आत्मीयता, ममता और क्षमा का समुद्र लहराता होता है। जिस माता के हृदय में वात्सल्य, क्षमा, ममता और करुणा की भावना न हो केवल बच्चे से अपना फायदा उठाने की, उसे गुलाम की तरह वशवर्ती रखने की वृत्ति हो वह माता शब्द को अलंकित ही करेगी। इसी प्रकार जो लोग देवताओं और मन्त्रों की साक्षी में अपनी धर्मपत्नी को माता, पिता, भाई बहिन सबसे छुड़ाकर उनके स्नेह एवं उत्तरदायित्वों की पूर्ति अपने ऊपर लेते हैं उन्हें उचित है कि जीवन भर उस विवाह की प्रतिज्ञा को निबाहें, परन्तु देखा जाता है कि स्त्री को थोड़ी सी नासमझी का उसे इतना भारी दण्ड दिया जाता है जिसे देखकर न्याय की आत्मा भी काँप जाती है। पतियों द्वारा पत्नी की हत्या या परित्याग में प्रायः ऐसा ही कायर विश्वासघात भरा होता है।

वासना और धन का लोभी मनुष्य न्याय मार्ग से जब अपनी लोलुपता को पूरा नहीं कर पाता तो अनेक अनैतिक, छल पूर्ण मार्ग अपना कर अपना स्वार्थ साधन करता है। गायत्री माता इस कुमार्ग पर चलने से अपने प्रिय पुत्रों को रोकती है। ‘गो’ अक्षर का संदेश है कि हम विश्वासघाती न बनें। अपने धर्म, कर्तव्य और उत्तरदायित्व को निबाहें। सचाई के मार्ग पर चलने से यदि कुछ असुविधाएं भी सहनी पड़ें तो उन्हें प्रसन्नतापूर्वक सहना चाहिए। इस प्रकार जो सत्य के मार्ग पर चलने में असुविधाओं का स्वागत करने को भी तैयार रहते हैं वे ही गायत्री माता के सच्चे प्रेम पात्र बन सकते हैं।

‘गो’ शब्द के अंतर्गत गायत्री माता की दूसरी शिक्षा यह है कि—हम सहिष्णु बनें। किसी की जरा सी गलती पर आग बबूला हो जाना या किसी से थोड़ा सा मतभेद होने पर उसे जानी दुश्मन मान लेना बहुत संकुचित विचार है। संसार में कोई भी पूर्णतया निर्दोष, या निष्पाप नहीं है, हर मनुष्य अपूर्ण है उसमें कुछ न कुछ दोष बुराई या कमी अवश्य रहती है। थोड़ी सी कमी के लिए उसे पूर्ण त्याज्य समझ लेना ठीक नहीं। दूसरों ही अच्छाइयों का समुचित उपयोग करना चाहिए, उन्हें बढ़ाना चाहिए, त्रुटियों को सुधारने या घटाने का प्रयत्न करना चाहिए, परन्तु इसके लिए अधीर नहीं होना चाहिए। सहिष्णुता और धैर्यपूर्वक कामचलाऊ सहयोग का मार्ग निकाल लेना चाहिए और आततायी रीति से नहीं वरन् मधुर, सुव्यवस्थित एवं न्यायोचित मार्ग से प्रतिकूलता को अनुकूल बनाने का प्रयत्न करना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसम्बर 1952 पृष्ठ 3


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शुक्रवार, 7 जुलाई 2023

👉 सहयोग और सहिष्णुता (भाग 2)

संसार में सभी प्रकार के मनुष्य हैं। मूर्ख-विद्वान, रोगी-स्वस्थ, पापी-पुण्यात्मा, कायर-वीर, कटुवादी नम्र, चोर-ईमानदार, निन्दनीय-आदरास्पद, स्वधर्मी-विधर्मी, दया पात्र-दंडनीय, शुष्क-सरस, भोगी-त्यागी आदि परस्पर विरोधी स्थितियों के मनुष्य भरे पड़े हैं। उनकी स्थिति को देखकर तदनुसार उनसे भाषण, व्यवहार एवं सहयोग करें। उनकी स्थिति के आधार पर ही उन के साथ अपना सम्बन्ध स्थापित करें।

कपट और असहिष्णुता यह दो बहुत बड़े पातक हैं। इन दोनों से बचने के लिए गायत्री के ‘गो’ अक्षर में निर्देश किया गया है। धोखा, विश्वासघात, छल, ढोंग, पाखण्ड यह मनुष्यता को कलंकित करने वाली सबसे निकृष्ट कोटि की कायरता एवं कमजोरी है। जिसको हम बुरा समझते हैं उससे लड़ाई रखें तो इतना हर्ज नहीं, परन्तु मित्र बनकर, मिले रहकर, मीठी-मीठी बातों से धोखे में रखकर उसका अनर्थ कर डालने में जो पाप है वह निष्कृष्ट कोटि का है। अनेक व्यक्ति ऊपर से मिले रहते हैं, हितैषी बनते हैं और भीतर ही भीतर छुरी चलाते हैं। बाहर से मित्र बनते हैं भीतर से शत्रु का काम करते हैं। विश्वास देते हैं कि हम तुम्हारे प्रति इस प्रकार का व्यवहार करेंगे परन्तु पीछे अपने वचन को भंग करके उसके विपरीत कार्य कर डालते हैं।

आजकल मनुष्य बड़ा कायर हो गया है। उसकी दुष्टता अब मैदानी लड़ाई में दृष्टिगोचर नहीं होती। प्राचीन काल में लोग जिनसे द्वेष करते थे, जिसका अहित करना चाहते थे, उसे पूर्व चेतावनी देकर मैदान में लड़ते निपटते थे। पर आज तो वीरता का दर्शन दुर्लभ हो रहा है। विश्वास दिलाकर, मित्र बनकर, बहका-फुसलाकर, किसी को अपने चंगुल में फँसा लेना और अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए उसके प्राणों तक का ग्राहक बन जाना, आज का एक व्यापक रिवाज हो गया है। जिधर दृष्टि उठाकर देखिए उधर ही छल, कपट, धोखा, विश्वासघात का बोल बाला दीखता है। गायत्री कहती है कि यह आत्मिक कायरता, मनुष्यता के पतन का निकृष्टतम चिन्ह है। इससे ऊपर उठे बिना कोई व्यक्ति ‘सच्चा मनुष्य’ नहीं कहला सकता।

किसी की धरोहर मार लेना, विष खिला देना, पहले से कोई वचन देकर समय पर उसे तोड़ देना, असली बताकर नकली चीज देना, मित्र बनकर शत्रुता के काम करना, यह बातें मनुष्यता के नाम पर कलंक हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसम्बर 1952 पृष्ठ 2


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👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 7 July 2023

सही को अपनाने और गलत को छोड़ देने का साहस ही युग निर्माण परिवार के परिजनों की वह पूँजी है, जिसके आधार पर वे युग साधना की वेला में ईश्वर प्रदत्त उत्तरदायित्व का सही रीति से निर्वाह कर सकेंगे। ऐसी क्षमता पैदा करना हमारे लिए उचित भी है और आवश्यक भी।

युग परिवर्तन का अर्थ है- व्यक्ति परिवर्तन और यह महान् प्रक्रिया अपने से आरंभ होकर दूसरों पर प्रतिध्वनित होती है। यह तथ्य हमें हजार बार मान लेना चाहिए और उसे कूट-कूट कर नस-नस में भर लेना चाहिए कि दुनिया को पलटना जिस उपकरण के माध्यम से किया जा सकता है, वह अपना परिष्कृत व्यक्तित्व ही है।

युग निर्माण परिवार के प्रत्येक परिजन को निरन्तर आत्म-निरीक्षण करना चाहिए और देखना चाहिए कि भारत के औसत नागरिक के स्तर से वह अपने ऊपर अधिक खर्च तो नहीं करता? यदि करता है तो आत्मा की, न्याय की, कर्त्तव्य की पुकार सुननी चाहिए और उस अतिरिक्त खर्च को तुरन्त घटना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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गुरुवार, 6 जुलाई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 6 July 2023

यदि हम दूसरे तथाकथित समाजसेवियों की तरह बाहरी दौड़-धूप तो बहुत करें, पर आत्म-चिंतन, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास की आवश्यकता पूरी न करें तो हमारी सामर्थ्य स्वल्प रहेगी और कुछ कहने लायक परिणाम न निकलेगा। लोक-निर्माण व्यक्ति पर अवलम्बित है और व्यक्ति निर्माण का पहला कदम हमें अपने निर्माणों के रूप में ही उठाना होगा।

युग परिवर्तन की अग्रिम पंक्ति में जिन्हें घसीटा या धकेला गया है उन्हें अपने को आत्मा का, परमात्मा का प्रिय भक्त ही अनुभव करना चाहिए और शान्त चित्त से धैर्यपूर्वक उस पथ पर चलने की सुनिश्चित तैयारी करनी चाहिए। यदि आत्मा की पुकार अनसुनी करके वे लोभ-मोह के पुराने ढर्रे पर चलते रहें तो आत्म-धिक्कार की इतनी विकट मार पड़ेगी कि झंझट से बच निकलने और लोभ-मोह को न छोड़ने की चतुरता बहुत मँहगी पड़ेगी।

अपनी यह आस्था चट्टान की तरह अडिग होनी चाहिए कि युग बदल रहा है, पुराने सड़े-गले मूल्याँकन नष्ट होने जा रहे हैं। दुनिया आज जिस लोभ-मोह और स्वार्थ, अनाचार से सर्वनाशी पथ पर दौड़ रही है, उसे वापिस लौटना पड़ेगा। अंध-परम्पराओं और मूढ़ मान्यताओं का अंत होकर रहेगा। अगले दिनों न्याय, सत्य और विवेक की ही विजय-वैजयन्ती फहरायेगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 सहयोग और सहिष्णुता (भाग 1)

गोप्याः स्वायाँ मनोवृत्तीर्नासहिष्णुर्नरो भवेत्।
स्थिति मज्यस्य वै वीक्ष्य तदनुरुप माचरेत्॥

अर्थ— अपने मनोभावों को छिपाना नहीं चाहिए। मनुष्य को असहिष्णु नहीं होना चाहिए। दूसरों की परिस्थिति का भी ध्यान रखना चाहिए।

अपने मनोभाव और मनोवृत्ति को छिपाना ही छल, कपट और पाप है। जैसा भाव भीतर है वैसा ही बाहर प्रकट कर दिया जाय तो वह पाप निवृत्ति का सबसे बड़ा राजमार्ग है। स्पष्ट और खरी कहने वाले, पेट में जैसा है वैसा ही मुँह से कह देने वाले लोग चाहे किसी को कितने ही बुरे लगें पर वे ईश्वर और आत्मा के आगे अपराधी नहीं ठहरते।

जो आत्मा पर असत्य का आवरण चढ़ाते रहते हैं, वे एक प्रकार के आत्म हत्यारे हैं। कोई व्यक्ति यदि अधिक रहस्यवादी हो, अधिक अपराधी कार्य करता हो तो भी उसके अपने कुछ ऐसे विश्वासी मित्र अवश्य होने चाहिए जिसके आगे अपने सब रहस्य प्रकट करके मन को हलका कर लिया करे। और उनकी सलाह से अपनी बुराइयों का निवारण कर सके।

प्रत्येक मनुष्य का दृष्टिकोण, विचार, अनुभव अभ्यास, ज्ञान, स्वार्थ, रुचि एवं संस्कार अलग-अलग होते हैं। इसलिए सबका सोचना एक प्रकार से नहीं हो सकता। इस तथ्य को समझते हुए हर व्यक्ति को दूसरों के प्रति सहिष्णु एवं उदार होना चाहिए। अपने से किसी भी अंश में मतभेद रखने वाले को मूर्ख, अज्ञानी, दुराग्रही, दुष्ट या विरोधी मान लेना उचित नहीं। ऐसी असहिष्णुता ही बहुधा झगड़ों की जड़ होती है। एक दूसरे के दृष्टिकोण के अन्तर को समझते हुए यथासंभव समझौते का मार्ग निकालना चाहिए। फिर जो मतभेद रह जायँ, उन्हें पीछे धीरे-धीरे सुलझाते रहने के लिए छोड़ देना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसम्बर 1952 पृष्ठ 2


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बुधवार, 5 जुलाई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 5 July 2023

दूसरों को न तो खींच सकता है और न दबा सकता है। बाहरी दबाव क्षणिक होता है। बदलतो तो मनुष्य अपने आप है, अन्यथा रोज उपदेश-प्रवचन सुनकर भी इस कान से उस कान निकाल दिये जाते हैं। दबाव पड़ने पर बाहर से कुछ दिखा दिया जाता है, भीतर कुछ बना रहता है। इन विडम्बनाओं से क्या बनना है। बनेगा तो अंतःकरण के बदलने से और इसके लिए आत्म-प्रेरणा की आवश्यकता है। क्रान्ति अपने से ही आरंभ होगी।

हम आत्म-निर्माण में प्रवृत्त होकर ही समाज निर्माण का लक्ष्य पूरा कर सकेंगे। युग निर्माण परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपनी स्थिति अनुभव करना चाहिए। उसे विश्वास करना चाहिए कि उसने दैवी प्रयोजन के लिए यह जन्म लिया है। इस युगसंधि वेला में उस विशेष उद्देश्य के लिए भेजा गया है। उसे शिश्नोदर परायण नर-कीटकों की पंक्ति में अपने को नहीं बिठाना है। उसे लोभ-मोह के लिए नहीं सड़ना-मरना है।

यह समय ऐसा है जैसा किसी-किसी सौभाग्यशाली के ही जीवन में आता है। कितने व्यक्ति किन्हीं महत्त्वपूर्ण अवसरों की तलाश में रहते हैं। उन्हें उच्च-स्तरीय प्रयोजनों में असाधारण भूमिका संपादित करने का सौभाग्य मिले और वे अपना जीवन धन्य बनावें। यह अवसर युग निर्माण परिवार के सदस्यों के सामने मौजूद है। उन्हें इसका समुचित सदुपयोग करना चाहिए। इस समय की उपेक्षा उन्हें चिरकाल तक पश्चाताप की आग में जलाती रहेगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 परिस्थितियों के अनुकूल बनिये। (भाग 2)

यदि आपके पास कीमती फाउन्टेन पेन नहीं है, बढ़िया कागज और फर्नीचर नहीं है, तो क्या आप कुछ न लिखेंगे? यदि उत्तम वस्त्र नहीं हैं, तो क्या उन्नति नहीं करेंगे? यदि घर में बच्चों ने चीजें अस्त-व्यस्त कर दी हैं, या झाडू नहीं लगा है, तो क्या आप क्रोध में अपनी शक्तियों का अपव्यय करेंगे? यदि आपकी पत्नी के पास उत्तम आभूषण नहीं हैं, तो क्या वे असुन्दर कहलायेंगी या घरेलू शान्ति भंग करेंगी? यदि आपके घर के इर्द-गिर्द शोर होता है, तो क्या आप कुछ भी न करेंगे? यदि सब्जी, भोजन, दूध इत्यादि ऊंचे स्टैन्डर्ड का नहीं बना है, तो क्या आप बच्चों की तरह आवेश में भर जायेंगे? नहीं, आपको ऐसा कदापि न करना चाहिए।
 
परिस्थितियाँ मनुष्य के अपने हाथ की बात है। मन के सामर्थ्य एवं आन्तरिक स्वावलम्बन द्वारा हम उन्हें विनिर्मित करने वाले हैं। हम जैसा चाहें जब चाहें सदैव कर सकते हैं। कोई भी अड़चन हमारे मार्ग में नहीं आ सकती। मन की आन्तरिक सामर्थ्य के सम्मुख प्रतिकूलता बाधक नहीं हो सकती।

सदा जीतने वाला पुरुषार्थी वह है जो सामर्थ्य के अनुसार परिस्थितियों को बदलता है। किन्तु यदि वे बदलती नहीं, तो स्वयं अपने आपको उन्हीं के अनुसार बदल लेता है। कठिन से कठिन परिस्थितियों में उसकी मनः शान्ति और संतुलन स्थिर रहता है। विषम परिस्थितियों के साथ वह अपने आपको फिट करता चलता है।

निराश न होइए यदि आपके पास बढ़िया मकान, उत्तम वस्त्र, टीपटाप, ऐश्वर्य इत्यादि वस्तुएँ नहीं हैं। ये आपकी उन्नति में बाधक नहीं हैं। उन्नति की मूल वस्तु-महत्वाकाँक्षा है। न जाने मन के किस अतल गह्वर में यह अमूल्य सम्पदा लिपटी पड़ी हो किन्तु आप गह्वर में है अवश्य। आत्म-परीक्षा कीजिये और इसे खोजकर निकालिये।

प्रतिकूल परिस्थितियों से परेशान न होकर उनके अनुकूल बनिये और फिर धीरे-2 उन्हें बदल डालिये।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति मई 1949 पृष्ठ 16
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/May/v1.17

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मंगलवार, 4 जुलाई 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 4 July 2023

युग निर्माण परिवार के सदस्यों की दृष्टि अनौचित्य के प्रति अत्यन्त कड़ी रहनी चाहिए। जहाँ भी वह पनपे, सिर उठाये वहीं उसके असहयोग एवं विरोध प्रदर्शन से लेकर दबाव देने तक की प्रतिक्रिया उठ खड़ी होनी चाहिए। अनौचित्य के प्रति हममें से प्रत्येक में प्रचण्ड रोष एवं आक्रोश भरा रहना चाहिए। इतनी जागरूकता के बिना दुष्प्रवृत्तियाँ रूक नहीं सकेंगी। छिपाने, समझौता कर लेने से सामयिक निन्दा से तो बचा जा सकता है, पर इससे सड़न का विष भीतर ही भीतर पनपता रहेगा और पूरे अंग को गलाकर नष्ट कर देगा।

हमारा युग निर्माण परिवार बढ़ेगा। उसमें अवांछनीय घटनाएँ भी होती रहेंगी, इतने बड़े समुदाय में एक भी अपूर्ण, अपवित्र व्यक्ति न तो पैदा होगा और न प्रवेश कर सकेगा इसकी अपेक्षा नहीं की जा सकती, पर वह दृष्टि जीवन्त रहनी चाहिए कि श्रद्धा के साथ विवेक कायम रखा जाय। औचित्य का समर्थन करते हुए अनौचित्य की संभावना को नजरअंदाज न किया जाय। अति श्रद्धा और अति विश्वास भी इस जमाने में जोखिम भरा है। इसलिए नीति समर्थक और अनीति निरोधक दृष्टि सदा पैनी रखी जाय और सड़न पनपने से पहले  उसकी रोकथाम कर दी जाय।

सैनिकों द्वारा लड़े जाने वाले गोला-बारूद वाले युद्ध को हम रोकना चाहते हैं, पर इस प्रकार के विश्वव्यापी युद्ध के पक्ष में हैं, जो जन-जन द्वारा पग-पग पर अज्ञान और अनाचार के-कुत्साओं और कुंठाओं के विरुद्ध अतीव शौर्य और साहस के साथ लड़ा जाये। हमारा विश्वास है कि यही संसार का अंतिम युद्ध होगा। तब जिओ और जीने दो और सादा जीवन-उच्च विचार जैसे उच्च आदर्शों के अनुरूप नई दुनिया का नवनिर्माण संभव हो सकेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 परिस्थितियों के अनुकूल बनिये। (भाग 1)

हमारे एक मित्र की ऐसी आदत है कि जब तक सब कुछ चीजें यथास्थान न हो, सफाई, शान्ति, और उचित वातावरण न हो, तब तक वे कुछ भी नहीं कर पाते। घर पर आते ही चीजों को इधर-उधर यथा स्थान न पाकर वे बिगड़ उठते हैं, उनकी मानसिक शान्ति विचलित हो उठती है।
 
इस प्रकार के आदर्शवादी संसार में कम नहीं हैं। वे चाहते हैं कि संसार में उच्चता, पवित्रता, स्वच्छता, शुद्धता एवं शान्ति प्राप्त हो। इनके अभाव में प्रायः क्रुद्ध हुए रहते हैं। उनका मन क्रोध से भरा रहता है। वे परिस्थितियों को दोष देते हैं। कहते हैं “क्या करें, हमें तो अवकाश ही नहीं मिलता। कार्य करें, तो किस प्रकार करें। कभी कुछ हमें उलझाये ही रहता है।” परिस्थितियों की अनुकूलता की ही प्रतीक्षा में से व्यक्ति दिन सप्ताह और वर्ष बरबाद कर रहे हैं।

परिस्थितियों की अनुकूलता की प्रतिज्ञा करते-2 मूल उद्देश्य दूर पड़ा रह जाता है। हमें जीवन में जो कष्ट है, जो हमारा लक्ष्य है, उसे हम परिस्थिति के प्रपंच में पड़ कर विस्मृत कर रहे हैं।

हमने अपनी मनः स्थिति ऐसी संवेदनशील बना ली है कि सूक्ष्म सी बात से ही हम विचलित हो उठते हैं। आदर्श परिस्थितियाँ इस व्यस्त संसार में दुष्प्राय हैं। कुछ न कुछ कमी, कुछ अड़चन, मामूली बीमारियाँ, मौसम का परिवर्तन, भाग्य की करवटें सदा चलती रहेंगी। समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती जायेंगी। संभव है वे आपके विपक्ष में हों या आपको प्रतीत हो कि महान संकट आने वाला है, फिर भी हमें अपने मूल उद्देश्य को दृष्टि से दूर नहीं करना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मई 1949 पृष्ठ 16

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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रविवार, 2 जुलाई 2023

👉 गुरु पूर्णिमा-प्रेरणा

पूर्णिमा पर पूर्ण-गुरु की वंदना कर लीजिये। ‘पूर्ण’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥1॥

पूर्ण के प्रतिनिधि ‘गुरु’ हैं, बताती गुरुपूर्णिमा। सृजन पोषण और रक्षण में, निरत तप-साधना

‘गुरु’ ब्रह्मा, विष्णु, शिव हैं अर्चना कर लीजिये। ‘पूर्ण’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥2॥

शिष्य-अनगढ़ को बनाती सुगढ़, उनकी साधना। स्नेह का अमृत पिलाती, भव्य उनकी भावना॥

अमंगल के शत्रु-शिव की साधना कर लीजिये। ‘पूर्ण’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥3॥

काटते अज्ञान-तम को, ज्ञान-गुरुता से सदा-ज्ञान-किरणें प्रस्फुटित हैं, देव-सविता से सदा॥

ज्योति के चिरपुँज की आराधना की लीजिये। ‘पूर्ण’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥4॥

ग्रसित हो अज्ञान-तम से, भटकती है मनुजता। दाँव ऐसे में लगाती है मनुज पर, दनुजता॥

मनुजता की मुक्ति की संवेदना कर लीजिये। ‘पूर्ण’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥5॥

प्रज्वलित कर प्राण-दीपक ज्योति को चिरपुँज से। शाँति का संदेश लेकर, शाँति के गुरु-कुँज से॥

अमावस्या को पतन की, पूर्णिमा कर लीजिये॥ ‘पूर्णिमा’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥6॥

ज्ञानमय की ले मशालें, सँवारें उज्ज्वल-भविष्य-लोक मंगल-यज्ञ में गुरुदक्षिणा में दे हविष्य।

गुरुकृपा से ‘स्वर्ग’ की अवतरण कर लीजिये। ‘पूर्ण’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥7॥

- मंगल विजय ‘विजय वर्गीय’

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...