बुधवार, 14 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 14 June 2023

यदि मान-सम्मान और पूजा-प्रतिष्ठा, वेशभूषा, शान-शौकत तथा प्रदर्शन के ही अधीन होती तो महात्मा गाँधी, महर्षि अष्टावक्र, मनीषी सुकरात जैसे कुरूपों को संसार का सबसे अधिक अप्रतिष्ठित व्यक्ति और रंग-बिरंगे, छैल-छबीले और फैशनेबुल छोकरों को, रूपवती वेश्याओं को मान-सम्मान का सबसे अधिक अधिकारी पात्र होना चाहिए था। वस्तुतः सच्ची मान-प्रतिष्ठा, शान-शौकत में नहीं, परमार्थ एवं सेवा-परोपकार के अधीन रहा करती है। इसके लिए मनुष्य को बाहर से नहीं, भीतर से सजना-सँवरना पड़ता है।

किसी से बहुत अधिक अपेक्षा रखना, अपने लिए दुःखों के बीज बोना है। सफलता के लक्ष्य से काम करते हुए असफलता के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए। अधिक इच्छाएँ प्रसन्नता की सबसे बड़ी शत्रु हैं। कम से कम इच्छाएँ रखना और अधिक से अधिक संतुष्ट रहना, प्रसन्नता में अभिवृद्धि करना है।

दोषदर्शी का वास्तव में यह बड़ा भारी दुर्भाग्य है कि वह किसी व्यक्ति अथवा वस्तु में गुण देख ही नहीं पाता। यह उसके स्वभाव की एक बड़ी कमी होती है। उसका हृदय इतना कलुषित एवं ईर्ष्यापूर्ण होता है कि वह किसी के वास्तविक गुणों को भी स्वीकार नहीं कर पाता। यदि वह ऐसा करता है तो उसका क्षुद्र हृदय डाह की आग से जलने लगता है। उसे संतोष तो दूसरों की आलोचना, निन्दा तथा टीका-टिप्पणी करने में ही आता है। यही उसका सुख और  शान्ति होती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 अच्छी आदतें कैसे डाली जायं? (भाग 2)

आदत डालने के लिए निष्ठा एवं दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है। निष्ठा और दृढ़ संकल्प के लिए बुद्धि की तैयारी चाहिए। बुद्धि की मन पर अंकुश रखने की तैयारी हो तो संकल्प में भी दृढ़ता आती है और निष्ठा में भी। इसलिए ऐसे कार्यों को छोड़ने के लिए सतर्क रहना चाहिए जो बुद्धि को मन का दास बनाने वाले हों। बुद्धि का दासत्व स्थिरता का दुश्मन है, क्योंकि जब वह चंचल मन की आज्ञाकारिणी या वशवर्तिनि होगी तो निश्चित रूप से वह चंचल हो जायगी।

मन और बुद्धि पर अंकुश रखकर योग्य बनाने के लिए जीवन को प्रयोगावस्था में डालने की आवश्यकता है। इसके लिए मनुष्य को किसी भी निर्णित कार्यक्रम अनुसार चलने का निश्चय करना पड़ता है। कल जो करना है उसके लिए आज ही कार्यक्रम बना लेना चाहिए। साथ ही सोने के पूर्व उस कार्यक्रम पर दृढ़ रहने का निश्चय कर लेना चाहिए।

जो लोग रात को अधिक देर तक जागते रहते है उनके शरीर में आलस्य भरा रहता है इसलिए शरीर का यह आलसीपन कार्यक्रम को पूरा करने में सहायक नहीं होता बल्कि बाधक होता है। इसलिए शरीर का निरालस रहना भी कार्य साधन का एक अंग है। रात में जल्दी सोना और सवेरे जल्दी उठना आलस्य को जमने नहीं देता। साथ ही बुद्धि को सूक्ष्म आहिणी बनाता है जिस बुद्धि पर कि जीवन का सारा दारोमदार है।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- सितम्बर 1948 पृष्ठ 17
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1948/September/v1.17

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मंगलवार, 13 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 13 June 2023

🔷 उन्नति एवं विकास के लिए स्पर्धा तथा प्रतियोगिता की भावना एक प्रेरक तत्त्व है, किन्तु तब, जब उसमें ईर्ष्या अथवा द्वेष का दोष न आने दिया जाये और जीवन मंच पर अभिनेता की भावना रखी जाये। जलन के वशीभूत होकर दूसरों की टांग खींचने के लिए उनके दोष देखना अथवा निन्दा करना छोड़कर अपने से आगे बढ़े हुओं के उन गुणों की खोज करना और उन्हें अपने में विकसित करने का प्रयत्न करना चाहिए, जिनके बल पर अगला व्यक्ति आगे बढ़ा है।

🔶 रोध, अनुरोध एवं प्रतिरोध जैसे हेय शब्द कर्मवीरों के कोश में नहीं, निकम्मों की जीभ पर ही चढ़े होते हैं।  यदि ऐसा होता तो सिकन्दर विश्व विजयी न होता, सीजर रोम साम्राज्य स्थापित न कर पाता, चाणक्य का ध्येय सफल न होता और एक लँगोटीबंद महात्मा गाँधी भारत में ब्रिटिश हुकूमत का तख्ता न उलट देता। ज्ञान के पिपासु फाह्यान एवं ह्वान्सांग का पथ सिन्धु अवश्य रोक लेता और बौद्ध भिक्षुओं को हिमालय आगे न बढ़ने देता, किन्तु अभियानशील को भला कौन कहाँ रोक पाया है।

🔷 जो अकर्मण्य, आलसी हैं वे अपने से पूछें कि बेकार पड़े खाते रहने से उन्हें कोई सुख है? क्या उनकी आत्मा उन्हें अपनी अकर्मण्यता के लिए नहीं धिक्कारती? क्या कभी उन्हें यह विचार नहीं आता-इस बात की ग्लानि नहीं होती कि जब संसार में और लोग परिश्रम कर रहे हैं-पसीना बहा रहे हैं, तब उनका निठल्ले पड़े रहना मूर्खतापूर्ण बेहयाई ही है और बेहयाई की जिन्दगी बिताना मनुष्यता नहीं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 अच्छी आदतें कैसे डाली जायं? (भाग 1)

बिना मनोयोग के कोई काम नहीं होता है। मन के साथ काम का सम्बन्ध होते ही चित्त पर संस्कार पड़ना आरंभ हो जाते हैं और ये संस्कार ही आदत का रूप ग्रहण कर लेते हैं। मन के साथ काम के सम्बन्ध में जितनी शिथिलता होती है, आदतों में भी उतनी ही शिथिलता पाई जाती है। यों शिथिलता स्वयं एक आदत है और मन की शिथिलता का परिचय देती है।

असल में मन चंचल है। इसलिए मानव की आदत में चंचलता का समावेश प्रकृति से ही मिला होता है। लेकिन दृढ़ता पूर्वक प्रयत्न करने पर उसकी चंचलता को स्थिरता में बदला जा सकता है। इसलिए कैसी भी आदत क्यों न डालनी हो, मन की चंचलता के रोक थाम की अत्यन्त आवश्यकता है और इसका मूलभूत उपाय है- निश्चय की दृढ़ता। निश्चय में जितनी दृढ़ता होगी, मन की चंचलता में उतनी ही कमी और यह दृढ़ता ही सफलता की जननी है।

जिस काम को आरम्भ करो, जब तक उसका अन्त न हो जाय उसे करते ही जाओ। कार्य करने की यह पद्धति चंचलता को भगाकर ही रहती है। कुछ समय तक न उकताने वाली पद्धति को अपना लेने पर फिर तो मनोयोग पूर्वक कार्य में लग जाने की आदत हो जाती है। तब मन अपनी आदत को छोड़ देता है अथवा बार बार भिन्न भिन्न चीजों पर वृत्तियाँ जाने की अपेक्षा एक पर ही उसकी प्राप्ति तक दृढ़ रहती है।

मन निरन्तर नवीनता की खोज करता है। यह नवीनता प्रत्येक कार्य में पाई जाती है कार्य की गति जैसे जैसे सफलता की ओर होती है, उसमें से अनेक नवीनताओं के दर्शन होने आरंभ होते हैं। मन की स्थिति उस कार्य पर रहे-उसे छोड़कर दूसरे को ग्रहण करने के लिए नहीं-बल्कि उसी कार्य में अनेक नवीनताओं को देखने के लिए। मन की यह गति जितनी विशाल, जितनी सूक्ष्मदर्शिनी बनेगी, मन की एक काम छोड़कर दूसरे काम को अपनाने की वृत्ति में उतनी ही कमी आवेगी, दृढ़ता उतनी ही अधिक होगी।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- सितम्बर 1948 पृष्ठ 16
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1948/September/v1.16

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👉 स्थायी सफलता का राजमार्ग (अंतिम भाग)

मनुष्य को अपनी कार्य-सिद्धि के लिए जैसा उत्साह होता है वैसा उत्साह उसे कर्म-फल के लिए होता है वैसा ही उत्साह उसे कर्म करने में भी होना चाहिये। लोक-सेवा का स्वाभाविक फल यश की प्राप्ति है। अतएव यदि कोई यश प्राप्त करना चाहता है तो उसे लोक-सेवा में भी वैसी ही रुचि प्रदर्शित करनी चाहिए। यदि कोई दानी कहलाने की उत्कट इच्छा रखता है तो उसे दान देते समय अपना हाथ भी न सिकोड़ना चाहिये। किंतु बहुधा यह देखा जाता है कि मनुष्यों में कर्म-फल-भोग के लिए जो उत्साह देखा जाता है वैसा उत्साह कर्म करने के लिए नहीं। जहाँ कर्मोत्साह नहीं होता और कर्म-फल-भोग की भावना प्रबल होती है, वहाँ मनुष्य भटक जाता है और अधर्म करता है।

सच्ची उद्देश्य-सिद्धि न्याय पूर्ण तरीकों से ही हो सकती है। तभी वह स्थायी भी होती है। न्याय-संगत साधनों के प्रयोग से मनुष्य को न केवल साध्य की ही प्राप्ति होती है बल्कि उसे साधनकाल में अनेकों अन्य वस्तुओं की भी प्राप्ति हो जाती है जिनका कि मूल्य कभी-कभी उद्देश्य से भी कई गुना अधिक होता है। जो व्यक्ति न्यायपूर्ण तरीकों से धनी बनना चाहता है वह धन पाने के अतिरिक्त अध्यवसाय, मितव्ययिता आदि सद्गुण भी प्राप्त कर लेता है। जो विद्यार्थी ईमानदारी से परीक्षा पास होना चाहता है वह न केवल बी.ए., एम.ए. आदि उपाधियाँ ही प्राप्त करता है बल्कि ठोस ज्ञान भी प्राप्त करता है। वह एतर्द्थ ब्रह्मचर्य-धारण करना सीखता है, पूर्ण मनोयोग से कार्य करता है एवं अपने चित्त को विषय-विलासों से विरत रखता है। विद्याभ्यास और ब्रह्मचर्य के ही मिस से वह चित्त-संयम अथवा योग साधन में प्रवृत्त होता है जिसका कि मूल्य परीक्षा पास कर उपाधियाँ पाने और नौकरी पाने से कम नहीं।

जिस वस्तु को हम न्यायपूर्ण तरीकों से कमाते हैं उसकी रक्षा की योग्यता को हम अपने वंशजों को भी दे जाते हैं। यदि हम अन्यायपूर्ण तरीकों से कोई धन-राशि संचित करते हैं तो हममें उसको प्राप्ति के लिए जितने अध्यवसाय और आत्म-संयम की मात्रा होना चाहिए वह न होगी और फिर हमारी संतान में भी इन गुणों के होने की कम सम्भावना है। यदि हमारी संतान में आत्म-संयम का गुण न होगा तो वह उस धनराशि का दुरुपयोग कर उसे नष्ट कर डालेगी। इस तरह हम देखते हैं कि जिसमें किसी वस्तु के न्यायोचित ढंग से प्राप्त करने की योग्यता नहीं होती उसमें तथा उसकी संतान में उसकी रक्षा करने की भी सामर्थ्य नहीं रहती। यही कारण है कि हम बहुधा लक्षाधीशों के पुत्रों को अपने जीवन काल में कंगाल होते देखते हैं और भ्रमवश यह समझते हैं कि लक्ष्मी अकारण ही चंचल है।

अखण्ड ज्योति-मार्च 1949 पृष्ठ 25


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👉 स्थायी सफलता का राजमार्ग (भाग 2)

मनुष्य को अपनी कार्य-सिद्धि के लिए जैसा उत्साह होता है वैसा उत्साह उसे कर्म-फल के लिए होता है वैसा ही उत्साह उसे कर्म करने में भी होना चाहिये। लोक-सेवा का स्वाभाविक फल यश की प्राप्ति है। अतएव यदि कोई यश प्राप्त करना चाहता है तो उसे लोक-सेवा में भी वैसी ही रुचि प्रदर्शित करनी चाहिए। यदि कोई दानी कहलाने की उत्कट इच्छा रखता है तो उसे दान देते समय अपना हाथ भी न सिकोड़ना चाहिये। किंतु बहुधा यह देखा जाता है कि मनुष्यों में कर्म-फल-भोग के लिए जो उत्साह देखा जाता है वैसा उत्साह कर्म करने के लिए नहीं। जहाँ कर्मोत्साह नहीं होता और कर्म-फल-भोग की भावना प्रबल होती है, वहाँ मनुष्य भटक जाता है और अधर्म करता है।

जिस मनुष्य के हृदय में अपने उद्देश्य की सिद्धि के लिए जितनी अधिक बलवती इच्छा होती है वह मनुष्य अपने उद्देश्य की सिद्धि के लिए उतनी ही तीव्रगति से अग्रसर होता है, किंतु यदि उसे अधर्म में प्रवृत्त नहीं होना है तो उसे अपने आपको तीव्रगति से कर्म में नियोजित करना चाहिए। उसे उद्देश्य को “येन केन प्रकारेण” सिद्ध कर लेने की इच्छा को भी अपने वश में रखना होगा। इच्छा की तीव्रता के कारण अन्याय-पूर्वक सफलता पा लेने के लोभ का भी संवरण करना होगा।

जोश के साथ यह होश भी उसे रखना होगा कि कहीं वह अनीति की राह पर न चल पड़े। उसे अपना कार्य भी सिद्ध करना है पर इसके लिए अनीति-पूर्ण, सरल और छोटे मार्ग पर भी नहीं चलना है। उसे अपना इष्ट साधन करना है पर उसमें आसक्त भी नहीं होना है। अतएव उसे अपने उद्देश्य को सिद्ध करने के लिए केवल इसी शर्त पर आगे बढ़ना चाहिए कि वह केवल न्याय-संगत साधनों का पर उद्देश्य के सरलतापूर्वक मिल जाने पर भी उसे अस्वीकार कर देगा।

🌹 अखण्ड ज्योति-मार्च 1949 पृष्ठ 24


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सोमवार, 12 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 12 June 2023

🔶 सहानुभूति देना और पाना प्राणी मात्र का कर्त्तव्य है। हम अपनी वेदना सहानुभूति पाने के लिए दूसरे के सामने व्यक्त करते हैं-बच्चा सहानुभूति पाने के लिए अपनी चोट दिखलाता है। सहानुभूति पाने के लिए ही लोग अपनी हानियों तथा हृदय की पीड़ाओं को दूसरों के सामने खोलकर रखते हैं। ऐसी दशा में यदि हम परस्पर सहानुभूति का आदान-प्रदान नहीं करते, तो सच्चे अर्थों में मनुष्य कहलाने के अधिकारी नहीं।

🔷 मनुष्यों पर ऋषियों का भी ऋण है। ऋषि का अर्थ है-वेद, वेद अर्थात् ज्ञान। आज तक हमारा जो विकास हुआ है, उसका श्रेय ज्ञान को है, ऋषियों को है। जिस तरह हम यह ज्ञान दूसरों से ग्रहण कर विकसित हुए हैं, उसी तरह अपने ज्ञान का लाभ औरों को भी देना चाहिए। यह हर विचारवान् व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि समाज के विकास में अपने ज्ञान का जितना अंश दान कर सकते हों वह अवश्य करना चाहिए।

🔶 किसी संगठन, विचार अथवा उद्देश्य की स्थापना के लिए अनीति का सहारा लेना, स्वयं उद्देश्य की जड़ में विष बोना है। प्रेम, सौहार्द्य, सौजन्य तथा सह-अस्तित्व के आधार पर बनाया हुआ संगठन युग-युग तक न केवल अमर ही रहता है, बल्कि दिनों-दिन बड़े ही उपयोगी तथा मंगलमय फल उत्पन्न करता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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रविवार, 11 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 11 June 2023

🔶 ईर्ष्या एक भयानक आसुरी वृत्ति है। यह अपने साथ द्वेष, निराशा, निरुत्साहिता का असुर परिवार भी रखती है। ईर्ष्या बढ़ती है तो द्वेष भी उठ खड़ा होता है। द्वेष के कारण मनुष्य में दूसरों को हानि पहुँचाने, उनका विरोध करने और अनावश्यक रूप से शत्रुता बाँध लेने का दोष उत्पन्न हो जाता है जिसका परिपाक अपराधों के रूप में होता है और परिणाम राजदण्ड, सामाजिक बहिष्कार, निन्दा और असम्मान के रूप में भोगना पड़ता है।

🔷 समाज में परस्पर सहयोग, सहृदयता एवं संगठन का भाव बढ़ाने के लिए हम सब एक दूसरे के प्रति शिष्ट एवं यथोचित व्यवहार करने के लिए कर्त्तव्यबद्ध हैं। यदि हम कृत्रिम व्यवहार और दिखावटी शिष्टाचार का बर्ताव करते हैं तो निश्चय ही समाज में विघटन, संदेह, संशय एवं शत्रुता के बीज बोते हैं, जिसके विषफल अपने साथ पूरे समाज के हित में घातक होंगे। हमारी सभ्यता, नागरिकता और मानवता इसी में है कि हम सबके साथ यथोचित शिष्टाचार का व्यवहार करें।

🔶 जब तक विचारों में एकता न होगी, आकाँक्षाओं और भावनाओं का प्रवाह एक दिशा में न होगा, तब तक संगठन में मजबूती असंभव है।  जाहिर है कि किसी भी संगठन का प्राण उसके आदर्शों में अटूट निष्ठा ही होती है। आस्थावान् व्यक्ति ही किसी संगठन की  रीढ़ होते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 स्थायी सफलता का राजमार्ग (भाग 1)

जब हम किसी वस्तु की पूरी-पूरी कीमत चुका देते हैं तभी हम उसके पूर्णतया स्वामी होते हैं। उसी तरह जब हमें किसी वस्तु को प्राप्त करने की पूर्ण योग्यता होती है। तभी वह वस्तु हमारे और हमारे अनुगामियों के पास बहुत समय तक टिकती है। ऐसी सफलता को ही हम स्थायी सफलता कह सकते हैं।

संसार के पदार्थों की प्राप्ति के लिए हमें उनके अनुरूप ही पुरुषार्थ प्रकट करना पड़ता है और यह पुरुषार्थ ही हमारी सफलता को स्थिर बनाता है। मान लीजिए किसी परतंत्र राष्ट्र को स्वतन्त्र होना है तो उसे इस कार्य के लिए अपनी अन्तः शक्ति को संगठित करना पड़ेगा, उसे अपनी कमजोरियों को दूर करना पड़ेगा। किन्तु यदि उसे स्वतंत्रता प्राप्ति का यह राजमार्ग स्वीकार न हो और वह बाह्य शक्तियों की सहायता से उसे प्राप्त करना चाहे तो हम कहेंगे कि उस राष्ट्र की वह स्वतंत्रता स्थिर न रहेगी और उस राष्ट्र के पुनः परतंत्र हो जाने की सम्भावना बनी रहेगी।

मनुष्य की उद्देश्य-सिद्धि उसकी कार्य-शक्ति पर निर्भर है। उद्देश्य-सिद्धि उसके जीवन का प्रधान लक्ष्य है किन्तु उसके लिए वह अपनी कार्य-शक्ति का किस तरह प्रयोग करता है वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। उद्देश्य सिद्धि तब ही स्थायी होगी जब कि उसकी कार्य-शक्ति का उचित प्रयोग होगा। साध्य हमें तब ही सुखदायी हो सकता है जब कि साधन भी न्यायसंगत हो। “येन केन प्रकारेण प्रसिद्धो पुरुषो भवेत्” वाली नीति यहाँ कभी स्थायी सफलता न देगी।

अखण्ड ज्योति-मार्च 1949 पृष्ठ 24
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/March/v1.24

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शनिवार, 10 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 10 June 2023

🔷 दुनिया के हर भले आदमी को फिजूलखर्ची से बचना पड़ा है। हमारे लिए भी एक ही रास्ता है कि अपनी हर फिजूलखर्ची को पूरी तरह त्याग दें। अपनी गाढ़ी कमाई के एक-एक पैसे को दस बार सोच-समझकर केवल उपयोगी और आवश्यक कार्यों में ही खर्च करें। जिस दिन हमारा यह दृष्टिकोण बन जाएगा उसी दिन आर्थिक तंगी के बहाने हमें बेईमानी करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और ईमानदारी का जीवनयापन करना सर्वथा सुलभ प्रतीत होगा।

🔶 ओजस्वी ऐसे ही व्यक्ति कहे जाते हैं, जिन्हें पराक्रम प्रदर्शित करने में संतोष और गौरव अनुभव होता है। जिन्हें आलसी रहने में लज्जा का अनुभव होता है। जिन्हें अपाहिज, अकर्मण्यों की तरह सुस्ती में पड़े रहना अत्यन्त कष्टकारक लगता है। सक्रियता अपनाये रहने में, कर्मनिष्ठा के प्रति तत्परता बनाये रहने में जिन्हें आनंद आता है।

🔷 यह विचार सही नहीं है कि जो अमीर होते हैं, वे मौज करते हैं और जो गरीब हैं उन्हीं को श्रम करना पड़ता है। सच्चाई यह है कि जो श्रमशील हैं, वे ही अमीर बनते हैं और जो आरामतलबी के शिकार हैं, वे क्रमशः गरीबी के गर्त में चले जाते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 क्रोध को कैसे जीता जाय? (अन्तिम भाग)

‘क्रोध’ की उत्पत्ति संकीर्ण हृदय में होती है। जिसके विचार इतने संकुचित हैं कि वह अपने दृष्टिकोण को छोड़ कर दूसरों के विचारों के प्रति आदर नहीं रखता, वह पग-पग पर क्रोध करता चलता है। इसी तरह रूढ़िवादिता भी क्रोध की जड़ है। किसी धर्म के प्रति किसी रीति या परम्परा के प्रति आस्था रखना बुरी बात नहीं है, पर किसी अपने से भिन्न विचारों के प्रति, घृणा करना बुरी बात है। बहुत से वृद्ध, नौजवानों से इसीलिए क्रोधित हो जाते हैं कि नये ढंग से कपड़े पहनते हैं, पुराने रीति-रिवाजों को नहीं मानते। यह ठीक है कि बहुत सी बातें आधुनिक जीवन प्रणाली में बुरी भी हैं, पर हमें यह न भूल जाना चाहिए कि समय बदला करता है, जिस संस्कृति के आप पक्षपाती हैं, किसी समय में वह भी इसी तरह नयी रही होगी। मनुष्य को हमेशा प्रगतिशील होना चाहिए। परिवर्तनों और नवीन व्यवस्थाओं से घृणा या क्रोध करके कोई लाभ नहीं होता है। समय बदलता ही है, इस पर ध्यान रखने से क्रोध नहीं आ सकता।

क्रोध पर विजय प्राप्त करने का सबसे उत्तम उपाय है, अपने में न्याय की प्रवृत्ति का पैदा कर लेना। मनुष्य के अनेक कार्य उनमें से किसी की हानि या अपकार या अपराध कर डालने वाले काम उसके खुद के द्वारा नहीं होते। कभी-2 परिस्थितियाँ ऐसी आ जाती हैं कि मनुष्य ऐसे काम करने को मजबूर हो जाता है। ऐसे कामों में आत्म-हत्या, चोरी, व्यभिचार, डाका और कत्ल जैसे जघन्य अपराध भी शामिल हैं। यद्यपि यह ठीक है कि कुछ ऐसे मनुष्य भी हैं जो जान बूझ कर ऐसे अपराध करते हैं परन्तु उनकी संख्या अधिक नहीं है। अधिकतर मनुष्य ऐसे गुरु अपराध भावावेश या परिस्थितियों के कारण कर डालते हैं। अब मनोवैज्ञानिक खोजों के आधार पर यह बात सिद्ध भी हो गई है। 

इसलिए जेलखानों में अपराधियों की मानसिक स्थिति को समझना और उनका सुधार करना राज्य का एक कर्त्तव्य बन गया है। इसी सत्य का पालन हम अपने व्यक्तिगत जीवन में कर सकते हैं यदि किसी मित्र, सम्बन्धी या पास पड़ोसी ने अपमान या अपकार भी कर डाला हो, तो हमें उसके प्रति न्याय करना चाहिए और वह न्याय कैसे हो? यदि हम अपने को अपराधी की परिस्थितियों में रख दें और सोचें कि उन अमुक परिस्थितियों में हम क्या करते? तो यह समझ में आ जायगा कि हमारा भी काम शायद वैसा ही होता जैसा कि अपराधी कर चुका है। बस यह विचार आते ही अपराधी के प्रति क्रोध न आकर इसमें सहानुभूति पैदा हो जाती है और क्षमा भाव जाग्रत हो उठता है।

अखण्ड ज्योति- जून 1949 पृष्ठ 10

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शुक्रवार, 9 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 9 June 2023

🔷 यदि संसार में सुख और शान्ति चाहते हो तो तुम्हारे वश की जो बातें हैं उन्हीं को विकसित करो और जो तुम्हारे वश की बातें नहीं हैं, उन पर व्यर्थ चिन्तन या पश्चाताप छोड़ दो। स्वयं अपने मस्तिष्क के स्वामी बनो। संसार और व्यक्तियों को अपनी राह जाने दो।

🔶 शरीर से सत्कर्म व मन में सद्भावनाओं की धारणा करते हुए जो भी काम मनुष्य करता है, वे सब आत्म-संतोष उत्पन्न करते हैं। सफलता की प्रसन्नता क्षणिक है, पर सन्मार्ग पर चलते हुए कर्त्तव्यपालन का जो आत्म-संतोष है, उसकी सुखानुभूति शाश्व होती है। गरीबी और असफलता के बीच भी सन्मार्गगामी व्यक्ति  गौरव का अनुभव करता है।

🔷 मानव जीवन की सार्थकता इस बात पर निर्भर है कि उसमें कितनी उत्कृष्ट भावनाएँ भरी हुई हैं। भावनाओं की उत्कृष्टता, सजीवता और प्रौढ़ता सत्कर्मों से परखी जाती है। इसलिए सत्कर्मों को लोक और परलोक की सुख-शान्ति का श्रेष्ठ साधन माना गया है। सत्कर्म करते रहने से ही सद्भावनाएँ बलवती एवं परिपुष्ट होती हंै।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 क्रोध को कैसे जीता जाय? (भाग 3)

इसी प्रकार हमारे देश में प्रचलित एक किंवदंती भी है जिसमें बताया गया है कि क्रोध की दवा क्या है? एक मनुष्य को बहुत क्रोध आता था, एक वैध से उसने इसकी दवा पूछी। वैद्य ने खाली पानी एक बोतल में भर कर उसे दे दिया और कहा कि जब क्रोध आये तो यह दवा मुँह में भर लो और भरे रहो, थोड़ी देर में तुम्हारा क्रोध कम हो जायेगा। तात्पर्य यह कि जब क्रोध आ जाय तो अपने को रोक कर किसी काम में लग जाने पर क्रोध कम हो जाता है।

मनुष्य जो कुछ दूसरों का अपराध कर बैठते हैं, वह उनके स्वभाव की निर्बलता है, यह सोचने और इस पर ध्यान देने से क्रोध बिल्कुल आता ही नहीं। अगर मनुष्य यह समझ ले कि अपराधी अज्ञान में अपराध करता है, तो क्रोध आये ही नहीं। महान् पुरुषों ने इसी तत्व को हृदयंगम करके ही क्रोध पर विजय प्राप्त की है। ईसा मसीह को जिन लोगों ने उन्हें सूली पर चढ़ाया, उन पर क्रोध करने की अपेक्षा, उनकी अज्ञानता के प्रति उन्हें दया थी। कृष्ण को जब बहेलिए ने अज्ञान वश बाण से बेध दिया तो अपने हत्यारे को देख कर वे केवल मुस्कराये थे और बोले कि इसमें तुम्हारा क्या दोष, यह तो होनहार ही था। संसार प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर आइजक न्यूटन ने जीवन भर किसी विषय पर बड़े परिश्रम से खोज की थी। उन गवेषणाओं पर टीका-टिप्पणी करके उसने तमाम कागजात एक मेज पर रखे थे।

एक दिन वह अपनी अध्ययनशाला में बैठे पढ़ रहे थे कि उसका कुत्ता डायमंड एकदम उचका और जलते हुए लैम्प को गिरा दिया। पलभर में सारे मूल्यवान कागज जलकर भस्म हो गये। जीवन भर का परिश्रम कुत्ते ने नष्ट कर दिया पर न्यूटन शान्त रहे। क्रोध पर उसकी विजय बेमिसाल विजय थी, उसका हृदय भारी था, उसने कुत्ते के सर पर हाथ फेरते हुए उसने कहा- “डायमंड, डायमंड, तुम क्या जानो, तुमने क्या कर डाला।” उसकी जगह पर शायद कोई दूसरा होता तो क्रोध में अंधा होकर कुत्ते को गोली ही मार देता। इन महान व्यक्तियों ने क्रोध पर इसीलिए विजय पाई थी कि वे अपराधी का अपराध को कारण न मानकर, उसकी अज्ञानता को कारण मानते थे। गाँधी जी कहा करते थे- “अपराध से घृणा करो अपराधी से नहीं।”

अखण्ड ज्योति- जून 1949 पृष्ठ 10

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गुरुवार, 8 जून 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 8 June 2023

🔷 मनुष्य की गरिमा के तीन आधार स्तम्भ हैं-

1) जीवन की पवित्रता,
2) क्रियाकलाप की प्रामाणिकता  और
3) लोकसेवा के प्रति श्रद्धा

जिनके पास यह तीन विभूतियाँ हैं, उनके लिए महामानव बनने का द्वार सदैव खुला पड़ा है।

🔶 आशाजनक विचारों में बड़ी विलक्षण शक्ति भरी हुई है।  हमारी अभिलाषाएँ यदि वे सात्विक और पवित्र हैं तो अवश्य पूर्ण होंगी, हमारे मनोरथ सिद्ध होंगे। हमारे लिए जो कुछ होगा वह अच्छा ही होगा, बुरा कभी न होगा। इस तरह के शुभ, दिव्य और आशामय विचारों का  शारीरिक, मानसिक, सांसारिक एवं आध्यात्मिक उन्नति पर  अनुकूल असर होता है।

🔷 समय को बर्बाद करने वाला और श्रम से जी चुराने वाला अपना शत्रु आप है। उसे बाहरी शत्रुओं की क्या आवश्यकता? अपनी बर्बादी के लिए यह दो दुर्गुण जिसने पाल रखे हैं, उसे शनि और राहु की दशा की प्रतीक्षा न करनी पड़ेगी। उसके ऊपर साढ़ेसाती नहीं, अजर-अमर सत्यानाशी शनि देवता सदा ही चढ़े रहेंगे। राहु का दुर्दिन स्थायी रूप से उसके सिर पर मँडराता रहेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 क्रोध को कैसे जीता जाय? (भाग 2)

अपनी ओर से तो क्रोध पैदा न होने देने का प्रबन्ध मनुष्य उपर्युक्त विधि से चाहे कर ले किन्तु उस स्थिति में क्या होगा जब दूसरे हमारा अपमान करते हैं, या हमें हानि पहुँचाते हैं। मनुष्य सामाजिक प्राणी है, और हमारे आस-पास के जितने आदमी होते हैं वे प्रायः स्वार्थी ही होते हैं। जब एक की हानि होगी तभी दूसरे का लाभ होगा। ऐसी दशा में हानि पहुँचाने वाले के प्रति क्रोध कैसे न होने दिया जाय। इस सम्बन्ध में हमें उदारवृत्ति का अनुगमन करना चाहिए। जब संसार स्वार्थमय है और इसका प्रत्येक व्यक्ति दूसरे से कुछ लेकर या छीन कर ही अपनी स्वार्थ लिप्सा पूरी करता है, तो उस पर क्रोधित होने का कोई कारण नहीं है। दुनिया के इस रवैये को समझ लेने के बाद क्रोध न आना चाहिए। अपना कर्त्तव्य यही है कि हम अपनी हानि को पूरी करें और उससे हमेशा बचते रहें।

लाभ-हानि के क्षेत्र के बाहर भी कुछ काम ऐसे होते हैं जिनसे दूसरे लोग हमें व्यर्थ में हानि पहुँचाते हैं या कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि अनजाने में दूसरों के द्वारा कुछ काम ऐसे हो जाते हैं जिसके कारण हमें क्रोध हो सकता है, जैसे कि आपकी पत्नी या पुत्र से असावधानी के कारण आपका गिलास या कलम टूट जाय। कभी-कभी कोई ऐसे नौकर मिल जाते हैं कि आप कहते हैं कि बाजार से आम ले आओ, वह ले आता है नींबू। इसी तरह मान लीजिये किसी ने आपके बच्चे को मार दिया, आपको क्रोध आ जाता है। इस प्रकार के छोटे-छोटे कारणों से क्रोध आता है। ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए।

महात्मा गाँधी ने बताया है कि जब क्रोध आये तो हमें उस समय कोई काम ही न करना चाहिए। क्रोध की दशा स्थायी नहीं होती। थोड़ी देर तक ही मनुष्य हिताहित ज्ञान शून्य हो सकता है, बाद में विचार शक्ति काम करने लगती है और मनुष्य का क्रोध कम हो जाता है। करीब-करीब इसी सिद्धान्त का अनुसरण अब्राहम लिंकन ने भी अनेक अवसरों पर किया था। एक बार उसकी सेना के एक बड़े उच्च पदाधिकारी ने उसके बताये गये युद्ध सम्बन्धी अनुशासन को नहीं माना, फलतः बड़ी हानि उठानी पड़ी। यह सुनकर उसे बड़ा क्रोध आया। उसने उस पदाधिकारी के नाम एक कड़ा पत्र लिखा, किन्तु लिखने में विचार शक्ति से काम लेना पड़ता है। परिणाम यह हुआ कि उसका क्रोध ठंडा हो गया और वह पत्र भेजा नहीं गया। मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि मानसिक आवेग में लिखना उसकी तीव्रता को कम कर देता है।

अखण्ड ज्योति- जून 1949 पृष्ठ 9

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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