सोमवार, 13 फ़रवरी 2023

👉 अपने आपको जानो, समझो और सुधारो

परमात्मा अपनी विशाल दुनिया का मालिक है, पर आत्मा को भी अपने सत्ता क्षेत्र में पूर्ण आधिपत्य प्राप्त है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है। अपनी दुर्बुद्धि से उसे बिगाड़ सकता है और सत्प्रवृत्तियाँ अपनाकर बना भी सकता है। अपने कमरे में सूर्य की धूप एवं पवन देव अपनी मर्जी के बिना प्रवेश नहीं कर सकते। यदि दरवाजे, खिड़कियाँ बन्द कर दिये जाएँ, तो प्रचण्ड धूप एवं तेज हवा का प्रवेश भी भीतर न हो सकेगा। केवल वही स्टेशन अपने रेडियो पर सुना जाता है, जिस पर हम सुई लगाते हैं। अन्य स्टेशनों के ब्राडकास्ट हमारे कानों तक नहीं आ सकते, भले ही वे कितने ही जोरदार प्रसारण चला रहे हों।
    
इतिहास के पृष्ठ ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि आंतरिक प्रखरता के बल पर लोगों ने अभावग्रस्त एवं विपरीत परिस्थितियों को चीरते हुए प्रगति के पथ-प्रशस्त किये हैं और अनेकानेक अवरोधों को पार करते हुए उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँचे हैं। इसके विपरीत हर प्रकार की सुविधाएँ होते हुए भी ऊपर उठने की बात तो दूर उल्टे नीचे ही गिरते चले गये हैं।
    
एक साधक अपनी श्रद्धा के बल पर धातु और  पत्थर से बनी प्रतिमाओं से चमत्कारी प्रतिक्रिया उत्पन्न कर लेता है, दूसरा अपनी अनास्था के कारण जीवन्त देव मानवों के अति समीप रहने पर भी कोई लाभ नहीं ले पाता। एकलव्य ने मिट्टी से बनी द्रोणाचार्य की प्रतिमा से वह अनुदान प्राप्त कर लिया था, जो पाण्डव सचमुच के द्रोणाचार्य से भी प्राप्त नहीं कर सके थे। मीरा के ‘गिरधर गोपाल’ और रामकृष्ण परमहंस की ‘काली’ में जो चमत्कारी शक्ति थी, वह उनके श्रद्धारोपण से ही उत्पन्न हुई थी और उन्हीं के लिए फलप्रद सिद्ध होती रही। उन्हीं प्रतिमाओं से अन्य लोग वैसा लाभ नहीं उठा सकते। यंत्र-तंत्रों की सिद्धि में विधि-विधानों की इतनी भूमिका नहीं होती, जितनी साधक के श्रद्धा, विश्वास की। भूतप्रेतों से लेकर देवी-देवताओं तक के जो परिचय सामने आते हैं, उनमें व्यक्ति के अपने विश्वास ही फलित हुए पाये जाते हैं। अमुक चिकित्सा से लाभ होना अथवा अमुक चिकित्सक का सफल होना अथवा अमुक चिकित्सक का असफल होना बहुत करके रोगी के विश्वास पर निर्भर रहता है।
    
विपुल वर्षा होने पर भी पत्थर की चट्टाने एक बूँद पानी भी नहीं सोख पातीं। इसके विपरीत रेगिस्तानी गर्मी में हरे रहने वाले पेड़-पौधे कहीं से भी अपने निर्वाह के लिए आवश्यक नमी उसी उष्ण वातावरण में से उपलब्ध करते रहते हैं। स्वाति की वर्षा से केवल वे ही सीपें लाभ उठा पाती हैं, जिनके मुँह खुले होते हैं। सरकारी छात्र-वृत्ति उन्हीं को मिलती है, जो परिश्रमपूर्वक पढऩे और अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होते हैं। बाहरी सहायता उपलब्ध होना न होना उतना महत्त्वपूर्ण नहीं, जितना कि व्यक्ति की निजी पात्रता एवं प्रखरता का होना।
    
आत्मबोध का तात्पर्य है, अपने से सन्निहित शक्ति एवं सम्भावना से परिचित होना। आत्मिक प्रगति का अर्थ है- आंतरिक दोष-दुर्गुणों को निरस्त करके सद्ïभावनाओं और सत्प्रवृत्तियों को समुन्नत बनाने के उपक्रम में निरन्तर निरत रहना। इन सत्प्रयत्नों से मानवीय और दैवी दोनों प्रकार की सहायताएँ अनायास ही उपलब्ध होती रहती हैं।
    
ब्रह्म विद्या का सबसे महत्त्वपूर्ण निर्देश यह है कि अपने आपको जानो, अपने को समझो और अपने को सुधारो। ‘आत्मा वाऽरे श्रोतव्य: निदिध्यासितव्य:’ की उक्ति में यही उद्बोधन भरा पड़ा है। गीता कहती है - ‘अपना उद्धार आप करो’ अपने आप को गिराओ मत। ‘उद्धरेत् आत्मनात्मानं नात्मानं अवसादयेत्’ की सूक्ति में यही ब्रह्मïवाक्य गूँजता है। मित्रों को ढूँढऩे और शत्रुओं को भगाने के लिए अन्यत्र कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है, वे अपने ही भीतर डेरा डाले बैठे हैं- ‘आत्मैव आत्मना बन्धु: आत्मैव रिपुरात्मन:’ का गीता कथन अक्षरश: सत्य है। अपने पौरुष- पुरुषार्थ से अपनी विवेकशीलता और दूरदर्शिता से ही प्रगति के द्वार खुलते हैं। अपनी ही अकर्मण्यता, अदूरदर्शिता और अनास्था ही हमें ले डूबती है। अपने उत्थान-परिष्कार की तथा पतन-पराभव की कुंजियाँ अपने ही हाथों में हैं, दोनों में से चाहे जिसका द्वार स्वेच्छापूर्वक खोला जा सकता है। यह तथ्य समझ में आ सके, तो प्रतीत होगा कि अपना आपा ही कल्पवृक्ष है, जिसकी जिस कामना से उपासना की जाय, उसी के अनुरूप वरदान मिलते चले जाएँगे। अन्य किसी देवता की उपासना भले ही निष्फल चली जाए, पर जीवन- देवता की, आत्म-निर्माण साधना निश्चित रूप से अभीष्ट सिद्धि देकर ही रहती है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 ईश्वर कहाँ है?

जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ।
मैं बौरि खोजन गई रही किनारे बैठ॥

ईश्वर को ढूँढ़ने के लिए, उसे प्राप्त करने के लिए हम नाना प्रकार के प्रयत्न करते हैं, पर उसे नहीं पाते, कहते हैं कि वह सर्वत्र है, वह सब जगह हैं, पर फिर भी हमें क्यों नहीं दीखता? उसे प्राप्त करने को धन, वैभव, जीवन तक नष्ट करते हैं, पर पाते नहीं, अन्त में निराश हो कहते हैं कि-ईश्वर नहीं हैं।

भाई ईश्वर हैं! पर उसे खोजने में गलती कर रहे हो, हम उसे धन वैभव से नहीं पा सकते, अगर उसे पाना हैं तो प्रेम करना सीखो प्राणी मात्र से प्रेम करो, जड़ चेतन से प्रेम करो, आत्मा से प्रेम करो। उसे पाने को जंगल में जाने की, धूनी रमाने की, धन वैभव कष्ट करने की, कोई आवश्यकता नहीं हैं। जब वह सर्वत्र है तो आपके पास भी होगा, होगा नहीं-हैं। कहाँ? आपके शरीर में।

जिसे आप आत्मा कहते हैं क्या आपने कभी अपनी आत्मा की आवाज पर ध्यान दिया हैं? नहीं यही कारण है कि आप उसे ढूँढ़ने पर भी नहीं पाते। विचार करो! जब तुम बोलते हों, चलते हों, काम करते हों, सोचते हो या शुभ काम करने की प्रेरणा होती है तो वह कहाँ से और कौन करता या कहता हैं? जब तुम किसी को कष्ट पहुँचाने का विचार कर चलते हो और तुम्हें अन्दर से कोई रोकता हैं कि ऐसा न करो वह कौन हैं? वह अपने अन्दर मौजूद हैं, उसे अपने अन्दर ही प्राप्त किया जा सकता हैं।

📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1944 पृष्ठ 15

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रविवार, 12 फ़रवरी 2023

👉 जो औरों के काम आयें

समय की माँग के अनुरूप दो दबाव इन दिनों निरंतर बढ़ते जा रहे हैं। एक व्यापक अवांछनीयताओं से जूझना और उन्हें परास्त करना, और दूसरा है- नवयुग की सृजन व्यवस्था को कार्यान्वित करने की समर्थता। निजी और छोटे क्षेत्र में भी यह दोनों कार्य अति कठिन पड़ते हैं। फिर जहाँ देश, समाज या विश्व का प्रश्र है, वहाँ तो कठिनाई का अनुपात असाधारण होगा ही।

प्रगति पथ पर अग्रसर होने के लिए तदनुरूप योग्यता एवं कर्मनिष्ठ उत्पन्न करनी पड़ती हे। इनके बिना सामान्य स्थिति में रहते हुए किसी प्रकार दिन काटते ही बन पड़ता है। अनेकों समस्याएँ और कठिनाइयों, आए दिन त्रास और संकट भरी परिस्थितियों बनी रही रहती हैं। जो कठिनाइयों से जूझ सकता हैं और प्रगति की दिशा में बढ़ चलने के साधन जुटा सकता है, उसी को प्रतिभावानन्ï कहते हैं।
  
औचित्य कहाँ है, इसकी विवेचना बुद्धि इनमें नहीं के बराबर होती है। वे साधनों के लिए, मार्गदर्शन के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं, यहाँ तक कि जीवनोपयोगी साधन तक अपनी स्वतंत्र चेतना के बलबूते जुटा नहीं पाते। उनके उत्थान पतन का निमित्त कारण दूसरे ही बने रहते हैं।
  
दूसरा वर्ग वह है जो समझदार होते हुए भी संकीर्ण स्वार्थपरता से घिरा रहता है। योग्यता और तत्परता जैसी विशेषताएँ होते हुए भी वे उन्हें मात्र लोभ, मोह, अहंकार की पूर्ति के लिए ही नियोजित किए रहते हैं।
  
तीसरा वर्ग प्रतिभाशालियों का है। वे भौतिक क्षेत्र में कार्यरत रहते हैं, तो अनेक व्यवस्थाएँ बनाते हैं। अनुशासन में रहते और अनुबंधों से बँधे  रहते हैं। बड़ी योजनाएँ बनाते और चलाते हैं। जिन्होंने महत्त्वपूर्ण सफलताएँ पाईं, प्रतिस्पर्धाएँ  जीतीं, उनमें ऐसी ही मौलिक सूझ-बूझ होती है।
  
सबसे ऊँची श्रेणी देवमानवों की है, जिन्हें महापुरुष भी कहते हैं। वे प्रतिभाशाली होते हैं, पर उसका उपयोग आत्म परिष्कार से लेकर लोकमंगल तक के उच्च स्तरीय प्रयोजनों में ही किया करते हैं। समाज के उत्थान और सामयिक समस्याओं के समाधान का श्रेय उन्हें ही जाता है। किसी देश की सच्ची संपदा वे ही समझ पाते हैं, जो अपने कार्यक्षेत्र को नंदनवन जैसा सुवासित करते हैं।
  
बड़े कामों को बड़े शक्ति केन्द्र ही सम्पन्न कर सकते हैं। दलदल में फँसे हाथी को बलवान्ï हाथी ही खींचकर पार करते हैं। पटरी से उतरे इंजन को समर्थ क्रेन ही उठाकर यथा स्थान रखती है। समाज और संसार की बड़ी समस्याओं को हल करने के लिए ऐसे ही वरिष्ठï प्रतिभावानों की आवश्यकता पड़ती है। प्रतिभाएँ वस्तुत: ऐसी सम्पदाएँ है, जिनसे न केवल प्रतिभाशाली स्वयं भरपूर श्रेय अर्जित करते हैं, वरन्ï अपने क्षेत्र, समुदाय और देश की अति विकट दीखने वाली उलझनों को भी सुलझाने में सफल होते हैं। इसी कारण भावनावश ऐसे लोगों को देवदूत तक कहते हैं।
  
आड़े समय में इन उच्च स्तरीय प्रतिभाओं की ही आवश्यकता होती है। उन्हीं को खोज और उभारा जाता है। मनस्वी, तेजस्वी और ओजस्वी ऐसे कर्मयोग की साधना में ही निरत रहते हैं, जो उनके व्यक्तित्व को प्रामाणिक और कर्तृत्व को ऊर्जा का उद्ïगम स्रोत सिद्ध कर सकें।
  
वर्तमान समय विश्व इतिहास में अद्ïभुत एवं अभूतपूर्व स्तर का है। इसमें एक ओर महाविनाश का प्रलयंकर तूफान अपनी प्रचंडता का परिचय दे रहा है, तो दूसरी ओर सतयुगी नवनिर्माण की उमंगें भी उछल रही हैं। विनाश और विकास एक दूसरे के प्रतिद्वन्द्वी हैं, तो भी उनके एक ही समय में अपनी-अपनी दिशा में चल सकना संभव है। इन दिनों आकाश में सघन तमिस्त्रा का साम्राज्य है, तो दूसरी ओर ब्रह्मïमुहूर्त का आभास भी प्राची में उदीयमान होता दीख पड़ता है। इन दोनों के समन्वय को देखते हुए ही अपना समय युगसंधि का समय माना गया है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 आत्म बल और परमात्मा की प्राप्ति

जिस विचारधारा में मनुष्य परिभ्रमण करता है, वैसा ही स्वयं बनने लगता है, जो आदर्श, सिद्धांत, लक्ष्य, श्रद्धापूर्वक अंत:भूमि में धारण किये जाते हैं, उनका एक साँचा तैयार हो जाता है। इस साँचे में गीली मिट्टी की तरह मनुष्य ढलने लगता है और यदि कुछ समय लगातार, दृढ़ता एवं श्रद्धापूर्वक यह प्रयत्न जारी रहे, तो जीवन पकी हुई प्रतिमूर्ति की तरह ठीक उसी प्रकार का बन जाता है।

चोरी, डकैती, ठगी, व्यभिचार, बेईमानी आदि दुष्कर्म कोई व्यक्ति यकायक नहीं कर बैठता। विचार बहुत पूर्व से उसके मन में चक्कर लगाते हैं, इससे धीरे-धीरे उसकी प्रवृत्ति इस ओर ढलती जाती है और एक दिन सफल बदमाश बन जाता है। यही बात भलाई के मार्ग में होती है। बहुत समय तक स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन करने के उपरान्त उत्तम विचारों के संस्कार दृढ़ होते हैं, तब कहीं प्रत्यक्ष जीवन में वे लक्षण प्रगट होते हैं और वह वैसा बन जाता है।
  
पदार्थ विज्ञान के ज्ञाताओं को विदित है कि समान श्रेणी के पदार्थों की सहायता से सूक्ष्म तत्त्वों का आकर्षण और प्रगटीकरण हो सकता है। गन्धक, फास्फोरस, पुटाश, सरीखे अगिनतत्त्व प्रधान पदार्थों का अमुक प्रक्रिया के साथ संघर्ष करने से विश्वव्यापी सूक्ष्म अगिनतत्त्व चिनगारी के रूप में प्रगट हो जाता है। इसी प्रकार शब्द और विचारों की सहायता से चैतन्य तत्त्वों का आकर्षण और प्रगटीकरण हो सकता है।

एक लेखक या वक्ता एक विशेष अनुभूति के साथ लोगों के सामने अपने विचार इस प्रकार रखता है कि वे विविध भाववेशों में डूबने, उतराने लगते हैं। हँसते को रुला देनाा और रोते को हँसा देना कुशल वक्ता के बायें हाथ का खेल है। इसी प्रकार क्रोध, घृणा, प्रतिहिंसा या दया, क्षमा, उपकार आदि के भावावेश शब्द और विचारों की सहायता से किसी व्यक्ति में पैदा किये जा सकते हैं।
  
भावनाओं का आवागमन, शब्द और विचारों की सहायता से होता है, संगीत, नृत्य, गान, रोदन, हुंकार, गर्जना, गाली, ललकार, विनय, मुस्कराहट, अट्टïहास, तिरस्कार, अहंकार से सने हुए शब्द सुनने वालों के मन में विविध प्रकार के भाव उत्पन्न करते हैं और उन भावों से उत्तेजित होकर मनुष्य बड़े-बड़े दुस्साहसपूर्ण कार्य कर डालते हैं। शब्द और विचार मिलकर एक ऐसा शक्तिशाली माध्यम बन जाते हैं जो सूक्ष्म चैतन्य जगत में से उसी प्रकार के तत्त्वों को खींच लाते हैं और जिस स्थान पर उन्हें पटका गया था वहाँ प्रगट हो जाते हैं। दूसरों के ऊपर ही नहीं-अपने ऊपर भी अमुक प्रकार के चैतन्य तत्त्वों को इसी माध्यम द्वारा भराा जा सकता है। इससे प्रगट है कि परमाणुमय भौतिक जगत की भाँति, संकल्पमय चैतन्य जगत में भी वैसे माध्यम मौजूद हैं जो अदृश्य तत्त्वों और शक्तियों को खींच लाते हैं और उनका प्रत्यक्षीकरण कर देते हैं।
  
गायत्री की शब्दावली एक ऐसा ही माध्यम है। इसकी शब्द शृंखला का गुंथन इस प्रकार हुआ है कि भावना ग्रंथियाँ उत्तेजित होती हैं और यह मंत्रोच्चारण एक ऐसा शक्तिशाली माध्यम सूत्र बन जाता है जिसके द्वारा गायत्री की ब्राह्मी शक्ति सूक्ष्म लोक से खींच-खींच कर मनुष्य के अन्त:करण में जमा होने लगती है और वह दिव्य तत्त्वों से ओत-प्रोत होने लगता है। गायत्री की साधना से सतोगुण की ब्राह्मी भावनाएँ अन्त: प्रदेश में अपना केन्द्र स्थापित करती हैं। उन भावनाओं के अनुरूप आन्तरिक जीवन बन जाता है उसी प्रकार की प्रवृत्तियाँ बाह्यï जीवन में भी दृष्टिïगोचर होती हैं। आत्मा की समीप सत्, चित्त और आनन्दमय तत्त्वों का भण्डार प्रचुर मात्रा में जमा होने लगता है। यह संचय ही आत्मबल कहलाता है। इस प्रकार वेदमाता गायत्री की कृपा के साधक आत्म-बल सम्पन्न बन जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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शनिवार, 11 फ़रवरी 2023

👉 आत्मा की उन्नति

जीवन की वास्तविक सफलता और समृद्घि आत्मभाव में जागृत रहने में है। जब मनुष्य, अपने को आत्मा अनुभव करने लगता है तो उसकी इच्छा, आकांक्षा और अभिरूचि उन्हीं कामों की ओर मुड़ जाती है, जिनसे आध्यात्मिक सुख मिलता है। हम देखते हैं कि चोरी, हिंसा, व्यभिचार, छल एवं अनीति भरे दुष्कर्म करते हुए अन्त:करण में एक प्रकार का कोहराम मच जाता है, पाप करते हुए पाँव काँपते हैं और कलेजा धडक़ता है इसका तात्पर्य है कि इन कामों को आत्मा नापसन्द करता है। यह उसकी रुचि एवं स्वार्थ के विपरीत है । किन्तु जब मनुष्य परोपकार, परमार्थ, सेवा, सहायता, दान, उदारता, त्याग, तप से भरे हुए पुण्य कर्म करता है, तो हृदय के भीतरी कोने में बड़ा ही सन्तोष, हलकापन, आनन्द एवं उल्लास उठता है। इसका अर्थ है कि यह पुण्य कर्म आत्मा के स्वार्थ के अनुकूल है। वह ऐसे ही कार्यों को पसन्द करता है। आत्मा की आवाज सुनने वाले और उसके अनुसार चलने वाले सदा पुण्य कर्म ही करते हैं। पाप की ओर उनकी प्रवृत्ति ही नहीं होती, इसलिए वैसे काम उनसे बन भी नहीं पड़ते।

आत्मा को तात्कालीन सुख सत्कर्मों में आता है। शरीर की मृत्यु होने के उपरान्त जीव की सद्ïगति मिलने में भी हेतु सत्कर्म ही हैं। लोक और परलोक में आत्मिक सुख शान्ति सत्कर्मो के ऊपर ही निर्भर है। इसलिए आत्मा का स्वार्थ पुण्य प्रयोजन में है। शरीर का स्वार्थ इसके विपरीत है। इन्द्रियाँ और मन संसार के भोगों को अधिकाधिक मात्रा में चाहते हैं। इस कार्य प्रणाली को अपनाने से मनुष्य नाशवान शरीर की इच्छाएँ पूर्ण करने में जीवन को खर्च करता है और पापों का भार इकठ्ठा करता रहता है। इससे शरीर और मन का अभिरंजन तो होता है, पर आत्मा को इस लोक और परलोक में कष्ट उठाना पड़ता है। तप, त्याग, संयम, ब्रह्मïचर्य, सेवा, दान आदि के कार्यों से शरीर को कसा जाता है। तब ये सत्कर्म सधते हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि शरीर के स्वार्थ और आत्मा के स्वार्थ आपस में मेल नहीं खाते, एक के सुख में दूसरे का दु:ख होता है। दोनों के स्वार्थ आपस में एक-दूसरे के विरोधी हैं। इन दो विरोधी तत्वों में से हमें एक को चुनना होता है। जो व्यक्ति अपने आपको शरीर समझते हैं, वे आत्मा के सुख की परवाह नहीं करते और शरीर सुख के लिए भौतिक सम्पदायें, भोग सामग्रियाँ एकत्रित करने में ही सारा जीवन व्यतीत करते हैं। ऐसे लोगों का जीवन पशुवत् पाप रूप, निकृष्ट प्रकार का हो जाता है। धर्म, ईश्वर, सदाचार, परलोक, पुण्य, परमार्थ की चर्चा वे भले ही करें, पर यथार्थ में उनका पुण्य परलोक स्वार्थ साधन की ही चारदीवारी के अन्दर होता है। यश के लिए, अपने अहंकार को तृप्त करने के लिए, दूसरों पर अपना सिक्का जमाने के लिए वे धर्म का कभी-कभी आश्रय ले लेते हैं।

वैसे उनकी मन:स्थिति सदैव शरीर से सम्बन्ध रखने वाले स्वार्थ साधनों में ही निमग्न रहती है। परन्तु जब मनुष्य आत्मा के स्वार्थ को स्वीकार कर लेता है, तो उसकी अवस्था विलक्षण एवं विपरीत हो जाती है। भोग और ऐश्वर्य के प्रयत्न उसे बालकों की खिलवाड़ जैसे प्रतीत होते हैं। शरीर जो वास्तव में आत्मा का एक वस्त्र या औजार मात्र है, इतना महत्वपूर्ण उसे दृष्टिगोचर नहीं होता है कि उसी के ऐश-आराम में जीवन जैसे बहुमूल्य तत्व को बर्बाद कर दिया जाय। आत्म भाव में जगा हुआ मनुष्य अपने आपको आत्मा मानता है और आत्मकल्याण के, आत्म सुख के कार्यों में ही अभिरुचि रखता और प्रयत्नशील रहता है। उसे धर्म संचय के कार्यों में अपने समय की एक-एक घड़ी लगाने की लगन लगी रहती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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बुधवार, 8 फ़रवरी 2023

👉 आत्मा, महात्मा और परमात्मा का विकास

महात्मा वह है, जिसके सामान्य शरीर में असामान्य आत्मा निवास करती है। काया की वेशभूषा और चित्र-विचित्र आवरणों का धारण महात्मा होने का न तो आधार है और न लक्षण। सामान्य वेष और सामान्य रहन-सहन के बीच महात्मा के स्तर तक पहुँचा जाना सम्भव है और पहुँचाया जाता भी रहा है।
  
मर्यादाओं से आबद्ध रह कर नागरिक कर्तव्यों का पालन करते रहना उद्धत आचरणों से बचना, शील और सौजन्य को निबाहना यह मनुष्यता का आवश्यक उत्तरदायित्व है। जिन्होंने अपने भीतर आत्मा को समझा है और उसकी गौरव-गरिमा को ध्यान में रखा है। उसे संयम, सदाचार और कर्तव्यनिष्ठïा से जुड़ा हुआ शालीन जीवन जीना ही पड़ेगा।
  
महात्मा की गरिमा इससे अगली मंजिल है। महान का अर्थ है- विशाल व्यापक। जो आत्मा अपने शारीरिक, मानसिक और पारिवारिक कर्तव्यों से आगे बढक़र विश्व मानव के उत्तरदायित्वों को वहन करने के लिए अग्रसर होती है, मानवीय कर्तव्यों से आगे के देव कर्तव्यों को वहन करने के लिए तत्पर होती है वह महात्मा है। महात्मा अपने लिए नहीं सोचता, विराट्ï के लिए सोचता है, अपने लिए नहीं करता, विराट्ï के लिए करता है, अपने लिए जीवित नहीं रहता, विराट्ï के लिए जीता है।
  
अपना शरीर हर छिद्र से मलीनता निष्कासित करता है, पर इसलिए कौन उसे घृणास्पद और त्याज्य ठहरता हैं कि इनमें गन्दगी विद्यमान है। घृणा की आवश्यकता नहीं समझी जाती और शरीर को स्वच्छ करने पर ही ध्यान रहता है। अपनी ही तरह दूसरों की विविध मलीनताओं के रहते जो हेय, घृणास्पद, पतित और त्याज्य नहीं ठहराता वरन्ï अपनी सहज ममता से प्रेरित होकर उसे निर्मल बनाने का श्रम करता है, वह महात्मा है। अपना छोटा बच्चा दिनभर गलती करता रहता है, उसका बहिष्कार नहीं करते और देख-भाल, डाँट-डपट, तोड़-फोड़ के अवसरों की रोकथाम करके जितना सम्भव होता है उस क्षति का बचाव करते हैं। इस पर भी जो हानि होती रहती है उसे सहन करते हैं। छोटे बालकों और अभिभावकों के बीच यह चिर अतीत से चला आ रहा है। दिग्भ्रान्त जन समाज के अनाचरणों के प्रति आक्रोश उत्पन्न किये बिना जो धैर्य और शान्तिपूर्वक विग्रह की रोकथाम पर ध्यान देता है उस उदारमना व्यक्ति को महात्मा कहना चाहिए।
  
हम अपने और अपने प्रियजनों के दु:खों से दु:खी होते हैं। इस क्षेत्र में सुख संवर्धन का प्रयत्न करते हैं। हमें अपना सुख, यश, वैभव, उत्कर्ष प्रिय लगता है और जिन्हें अपना समझते हैं उन्हें भी इसी सुखद स्थिति में रखने के लिए प्रयत्न करते हैं, यह परिधि जब बड़ी हो जाती है और प्यार-दुलार का, ममता-आत्मीयता का क्षेत्र बढ़ जाता है तो वैसी ही अनुभूति हर किसी के साथ जुड़ जाती है। दूसरों का कष्ट अपना कष्टï लगता है; अपने को सुखी बनाने के लिए जिस प्रकार अपना स्वभाव और चिन्तन सक्रिय रहता है वैसी ही सक्रियता यदि जन साधारण के लिए विकसित हो चले तो समझना चाहिए कि आत्मा ने महात्मा का रूप धारण कर लिया। परायों में जब अपनापन प्रतिभासित होने लगे तो समझना चाहिए कि दिव्य नेत्र खुल गए। जिसका अहन्ता ग्रीष्म की हिम बनकर पिघल जाय, जो पवन जैसा सक्रिय और आकाश जैसा शान्त दिखाई पड़े समझना चाहिए यह महात्मा का ही विग्रह है।
  
जब तक स्व, पर ऊहा-पोह चलता रहता है तब तक आत्मा और महात्मा का प्रेम-प्रसंग, आदान-प्रदान, परिहास, मनुहार चल रहा समझा जाना चाहिए। जब द्वैत की समाप्ति हो जाय और केवल एक ही शेष रहे स्व, पर का अन्तर सोचने की गुंजाइश ही न रहे तब समझना चाहिए उसी काय कलेवर में परमात्मा का अवतार हो गया।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 अभ्यास से क्षमताओं का विकास

सतत अभ्यास द्वारा शरीर एवं मन को इच्छानुवर्ती बनाया जा सकता है तथा उन्हें असामान्य कार्यों के कर सकने के लिए भी सहमत किया जा सकता है। प्रतिभा-योग्यता के विकास में बुद्धि आवश्यक तो है, सर्वसमर्थ नहीं। बुद्धिमान होते हुए भी विद्यार्थी यदि पाठ याद न करे, पहलवान व्यायाम को छोड़ दे, संगीतज्ञ, क्रिकेटर अभ्यास करना छोड़ दें, चित्रकार तूलिका का प्रयोग न करे, कवि भाव संवेदनाओं को सँजोना छोड़ बैठे, तो उसे प्राप्त क्षमता भी क्रमश: क्षीण होती जायेगी और अंतत: लुप्त हो जायेगी, जबकि बुद्धि की दृष्टिï से कम पर सतत अभ्यास में मनोयोगपूर्वक लगे, व्यक्ति अपने अन्दर असामान्य क्षमताएँ विकसित कर लेते हैं। निश्चित समय एवं निर्धारित क्रम में किया गया प्रयास मनुष्य को किसी भी प्रतिभा का स्वामी बना सकता है। जबकि अभ्यास के अभाव में प्रतिभाएँ कुंठित हो जाती हैं, उनसे व्यक्ति अथवा समाज को कोई लाभ नहीं मिल पाता।
  
मानव शरीर अनगढ़ है और वृत्तियाँ असंयमित। इन्हें सुगढ़ एवं सुसंयमित करना ही अभ्यास का लक्ष्य है। अनगढ़ काया एवं मन अनभ्यस्त होने के कारण सामान्यतया किसी भी नए कार्य को करने के लिए तैयार नहीं होते। उलटे अवरोध खड़ा करते हैं। उन्हें व्यवस्थित करने के लिए निरंतर अभ्यास की आवश्यकता पड़ती है। अभ्यास से ही आदतें बनती हैं और अंतत: संस्कार का रूप लेती हैं। परोक्ष रूप से अभ्यास की यह प्रक्रिया ही व्यक्तित्व का निर्माण  करती है।
  
कितने ही व्यक्ति किसी भी कार्य को करने में अपने को असमर्थ मानते हैं। उन्हें असंभव जानकर प्रयास नहीं करते हैं। फलस्वरूप कुछ विशेष कार्य नहीं कर पाते, अपनी मान्यताओं के अनुरूप हेय एवं असमर्थ ही बने रहते हैं। जबकि किसी भी कार्य को करने का संकल्प कर लेने एवं आत्मविश्वास जुटा लेने वाले व्यक्ति उसमें अवश्य सफल होते हैं। आत्म विश्वास की कमी एवं प्रयास का अभाव ही मनुष्य को आगे बढऩे से रोकता तथा महत्त्वपूर्ण सफलताओं को पाने से वंचित रहता है।
  
मानवीय काया परमात्मा की विलक्षण संरचना है। सर्वसमर्थता के बीज उसके अन्दर विद्यमान है।  उसे जैसा चाहे ढलाया, बनाया जा सकता है। सामान्यतया लोग कुछ दिनों तक तो बड़े उत्साह के साथ किसी भी कार्य को करने का प्रयास करते हैं, पर अभीष्टï सफलता तुरन्त न मिलने पर प्रयत्न छोड़ देते हैं। फलस्वरूप अपने प्रयत्नों से असफल सिद्ध होते हैं। जबकि धैर्य एवं मनोयोगपूर्वक सतत अभ्यास में लगे व्यक्ति असामान्य क्षमताएँ तक विकसित कर लेते हैं। अभ्यास आदतों का रूप लेने पर चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत करते हैं। अभ्यास की प्रक्रिया द्वारा शारीरिक- मानसिक क्षमताओं का विकास ही नहीं, रोगों का निवारण भी किया जा सकता है।  शरीर एवं मनोभावों की प्रतिक्रियाओं के आधार पर स्वयं को उपयोगी अभ्यासों के लिए सहमत करता है।
  
मानवीय काया एवं मन में शक्ति भण्डार छिपे पड़े हैं। विकास की असीम सम्भावनाएँ हैं। निर्धारित लक्ष्य की ओर प्रयास चल पड़े और उसमें धैर्य एवं क्रमबद्धता का समावेश हो जाय, तो असंभव समझे जाने वाले कार्य भी सम्भव हो सकते हैं। पहलवान, विचारवान, कवि, लेखक, वक्ता, चित्रकार, वैज्ञानिक, अध्यापक कोई अकस्मात नहीं बन जाते, वरन्ï उन्हें उसके लिए सतत प्रयास करना पड़ता है। शरीर एवं मन को निर्धारित लक्ष्य के लिए अभ्यस्त करना होता है। प्रयत्न करने पर कोई भी व्यक्ति अपने अनगढ़ शरीर एवं मन को प्रशिक्षित कर सकता है।  अनगढ़ शरीर एवं मन को सुगढ़ एवं व्यवस्थित करने के लिए पूरे धैर्य के साथ सतत अभ्यास की आवश्यकता होती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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मंगलवार, 7 फ़रवरी 2023

👉 संकल्प शक्ति

संकल्प का अपना विज्ञान है। उसे कर्म का बीजारोपण कह सकते हैं। संकल्प की चरणबद्ध रूपरेखा बनाई जाती है। इसमें सोच विचार कर निश्चय किये जाते हैं। निश्चय को मन में छिपाकर नहीं रखा जाता है, वरन् प्रकट किया जाता है। उसकी क्रमबद्ध योजना बनाई जाती है। तत्परतापूर्वक और तन्मयतापूर्वक मन लगाने के लिए साहस जुटाया जाता है। साधन एवं सहयोग एकत्रित करने का ताना-बाना बुना जाता है और उसके लिए समुचित दौड़-धूप की जाती है। कठिनाइयाँ आ सकती हैं और उनका सामना अथवा समाधान करने के लिए पहले से ही क्या तैयारी रखी जा सकती है, इन सब प्रश्रों पर गंभीरता एवं दूरदर्शिता के साथ विचार किया जाता है। जानकारों के साथ परामर्श किया जाता है। सामयिक परिवर्तनों की गुंजाइश रहती है। ऐसे सुनिश्चित प्रयत्नों को संकल्प कहते हैं।
  
संकल्प और असंकल्प का अन्तर समझने वालों को असफलता से बचने और सफलता के लक्ष्य तक पहुँचने में विशेष कठिनाई नहीं होती। संकल्पवान् हर परिस्थिति का सामना करने के लिए साहस उभारते हैं। आंतरिक और परिस्थितिजन्य अवरोधों से जूझने का पराक्रम करते हैं। फलत: असमंजस हटता है और पुरुषार्थ की गतिशीलता प्रखर होती चली जाती है। लक्ष्य तक पहुँचने का यही राजमार्ग है।
  
श्रेष्ठता की साधना संकल्प से ही संभव होती है। संकल्प को ही व्रत कहते हैं। व्रतधारी ही तपस्वी और मनस्वी कहलाते हैं। लक्ष्य की ओर शब्दवेधी बाण की तरह सनसनाते हुए चल पडऩे की क्षमता उन्हीं में होती है। संकल्प का कार्य है- अमुक कार्य करने का अमुक लक्ष्य तक पहुँचने का दृढ़ निश्चय। दृढ़ निश्चय का अर्थ है- काम करने की सुव्यवस्थित योजना बनाना, उसके लिए समुचित श्रम, साधना और मनोयोग लगाने की प्रतिज्ञा। प्रतिज्ञा का अर्थ है- आत्म गौरव को दाँव पर लगा देना, प्रयास को चरम पुरुषार्थ के साथ पूरा करना। मन:संस्थान की संरचना कर सकना संकल्प का ही काम है। इसी से कहा जाता है कि संकल्प कभी अधूरे नहीं रहते।
  
संकल्प को जड़ और सफलता को तना कहा जा सकता है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए तत्त्ववेत्ताओं ने व्रतशील संकल्प के निर्धारण के कार्य को आधी सफलता माना है। यह मान्यता अक्षरश: सत्य है, जिसे संदेह हो वह इस सच्चाई की परीक्षा स्वयं करके देख सकता है।
  
सृष्टि का प्रादुर्भाव भी प्रजापति ब्रह्म की संकल्पशक्ति के  द्वारा ही हुआ है। जागरूकता पुरुषार्थ का प्रथम संकल्प है। हममें से प्रत्येक को कुछ सृजनात्मक संकल्प करना चाहिए। अब हमें जागरूक होने की आवश्यकता है। मनगढंत हवाई उड़ानें भरते रहने से हम कहीं के न रहेंगे। कहा भी गया है- ख्वाब कभी पूरे नहीं होते, संकल्प कभी अधूरे नहीं रहते।
  
संकल्प शक्ति के प्रचण्ड सामथ्र्यवान-व्रतशील व्यक्ति उच्च आदर्शों को लेकर अपने कार्य क्षेत्र में उतरे और तुच्छ सामथ्र्य के रहते हुए भी महान् कार्य करने में सफल हुए हैं। भगवान् ने मनुष्य को जहाँ अन्य प्राणियों की तुलना में अनेकों शारीरिक-मानसिक विशेषताएँ प्रदान की हैं, वहाँ एक और विलक्षण अनुदान भी दिया है, जिसका नाम है संकल्प बल। इसकी सामथ्र्य का कोई पारावार नहीं है। संकल्प बल ही है, जो सन्मार्ग पर चल पड़े, तो व्यक्तित्व को इतना ऊँचा उठा सकता है, जिस पर देवता भी ईष्र्या करने लगें। नर हो या नारी, बालक हो या वृद्ध, स्वस्थ हो या रुग्ण, धनी हो या निर्धन, परिस्थितियों से कुछ बनता-बिगड़ता नहीं। प्रश्र संकल्प शक्ति का है। मनस्वी व्यक्ति अपने लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ बनाते और सफल होते हैं। समय कितना लगा और श्रम कितना पड़ा, उसमें अंतर हो सकता है, पर आत्म निर्माण के लिए प्रयत्नशील व्यक्ति अपनी आकांक्षा को सक्रियता एवं प्रखरता के अनुरूप देर-सबेर में सफल करके ही रहता है। यदि मनुष्य अपनी साहसिकता को जगा लें, संकल्प शक्ति का सदुद्देश्य के लिए उपयोग करने लगे, तो कोई कारण नहीं कि वह अपनी गौरव- गरिमा का सिक्का जमाने में किसी से पीछे रहे।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 अपने अन्दर के भगवान् को जगाइये

संसार के छोटे कहे जाने वाले प्राणी एक निश्चित प्रकृति लेकर जन्मते हैं और प्राय: अंत तक उसी स्थिति में बने रहते हैं। इतना स्वार्थी मनुष्य ही था, जिसे अपने साधनों से तृप्ति नहीं हुई और उसने दूसरों के स्वत्व का अपहरण करना प्रारंभ किया। न्यायाधीश बनकर आया था; पर स्वयं अन्याय करने लगा। ऐसी स्थिति में परमात्मा के अनुदान भला उसका कब तक साथ देते; क्योंकि परमात्मा ने ही आत्मा को आच्छादित कर रखा है। आत्मा मेें जो भी शक्ति और प्रकाश है, वह सब परमात्मा का ही स्वरूप है। परमात्मा आत्मा से विलग कहाँ?
  
सम्पूर्ण देव शक्तियाँ इसमें समायी हुई हैं। जब अग्रि देव जाग्रत् होते हैं, तो भूख लगती है, वरुण देवता को जल की जरूरत पड़ती है। किसी को निद्रा की, तो किसी को जागृति की। सबकी अपनी दिशा-अपना काम है।
  
इनमें पारस्परिक प्रतिद्वन्द्विता न होती रहे और उनका नियंत्रण बराबर किया जाता रहे। इस दृष्टि से एक जबरदस्त नियामक सत्ता की आवश्यकता जान पड़ी, तो परमात्मा स्वयं उसमें आत्मा के रूप में समा गया। इस तरह इस अद्ïभुत मनुष्य जीवन का प्रादुर्भाव इस सृष्टि में हुआ। तब से लेकर आज तक मनुष्य निरन्तर एक प्रयोग के रूप में चलता आ रहा है। कभी वह गलती करता है, तो उस अपराध के बदले सजा मिलती है और यदि वह अधिक कर्तव्यशील होता है, तो उसे अधिक बड़े ईनाम और अधिकार दिये जाते हैं। गलती का परिणाम दु:ख और भलाई का परिणाम सुख। सुख और दु:ख का यह अंतद्र्वन्द्व आदिकाल से चलता आ रहा है।
  
जब मनुष्य के अन्तर का असुर-भाग बलवान हो जाता है, तो दु:खों में बढोत्तरी होती है। वर्तमान समय इस स्थिति की पराकाष्ठा है, यह कहें तो अतिशयोक्ति न होगी। मनुष्य का यह पतन देखकर विश्वास नहीं होता कि उसके अंदर परमात्मा जैसी महत्त्वपूर्ण शक्ति का विकास हो सकता है। दुर्बल मनुष्य में सर्वशक्तिमान् परमात्मा ओत-प्रोत हो सकता है, इसकी इन दिनों कल्पना भी नहीं की जा सकती।
  
मनुष्य की इस दयनीय दशा का एक ही कारण है और वह यह है कि उसने अपनी मनोभूमि इतनी गंदी बना ली है, जहां परमात्मा का प्रखर प्रकाश पहँुचना सम्भव नहीं है। यदि सचेत रहकर उसने अपनी भलाई की शक्ति को जीवन्त रखा होता, तो वह जिन साधनों को लेकर इस धरती पर आया था, वे अचूक ब्रह्म अस्त्र है। उनकी शक्ति वज्र से भी प्रबल सिद्ध होती है। सृष्टिï का अन्य कोई भी प्राणी उसका सामना करने में समर्थ नहीं हो सकता। वह युवराज बनकर आया था। विजय, सफलतायें, उत्तम सुख, शक्ति, शौर्य-साहस, निर्भयता उसे उत्तराधिकार में मिले थे। इनसे वह चिरकाल तक सुखी रह सकता था। भ्रम, चिन्ता, शंका, संदेह आदि का कोई स्थान उसके जीवन में नहीं, पर अभागे मनुष्य ने अपनी दुरवस्था अपने आप उत्पन्न की। अंत:करण की-ईश्वरीय सत्ता की उपेक्षा करने के कारण ही उसकी यह दु:खद स्थिति बनी। अपने पैरों में कुल्हाड़ी मारने का अपराधी मनुष्य स्वयं है, इसका दोष परमात्मा को नहीं।
  
ईश्वरीय गुणों से पथ-भ्रष्टï मनुष्य की जो दुर्दशा होनी चाहिए थी, वह हुई। दु:ख की खेती उसने स्वयं बोई और उसका फल भी उसे ही चखना पड़ा। परमात्मा हमारे अति समीप रहकर प्रेम का संदेश देता है, पर मनुष्य अपनी वासना से (कुबुद्धि से) उसे कुचल देता है। वह अपनी सादगी, ताजगी और प्राण शक्ति से हमें सदैव अनुप्राणित रखने का प्रयत्न करता है, पर मनुष्य आडम्बर, आलस्य और अकर्मण्यता के द्वारा उस शक्ति को छिन्न-भिन्न कर देता है। कालान्तर में जब आंतरिक प्रकाश की शक्ति क्षीण पड़ जाती है, तो दु:ख और द्वन्द्व के बखेड़े बढ़ जाते हैं। तब मनुष्य को औरों की भलाई करना तो दूर, अपना ही जीवन भार रूप हो जाता है। परमात्मा की अंत:करण से विस्मृति ही कष्टï और क्लेश के बंधन का कारण है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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सोमवार, 6 फ़रवरी 2023

👉 अपनी यथार्थता जानें

मानव जीवन एक प्रकार से देवत्व प्राप्ति का अवसर है। इस अवसर का सदुपयोग कर मानव से महामानव, नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम तक बना जा सकता है। मानव शरीर की संरचना भगवान्ï की श्रेष्ठïतमï कृति है। इस सृष्टिï में मनुष्य से बढक़र अन्य कोई प्राणी उसने इतना अद्ïभुत एवं प्रतिभावान्ï नहीं बनाया। इस मानव जीवन में ही शिक्षा, कला, विज्ञान, आवास के सुंदर-सुंदर भवन, जल, थल एवं नभ में विचरण का अवसर प्राप्त हुआ है। नाना प्रकार के रंग-बिरंगे सपनों को साकार करने का अवसर इसी जीवन में उपलब्ध है। यह सुविधा तो देवयोनि में भी संभव नहीं है।
  
पूर्णता की प्राप्ति की दिशा में अग्रसर होते हुए अनुकरणीय आदर्श एवं पवित्रतम दैवी जीवन यापन किया जाय तथा अपनी उपार्जित शक्ति-सम्पदा का न्यूनतम अपने लिए तथा अधिकतम दूसरों के लिए खर्च किया जाय, इसी को मानव जीवन का श्रेष्ठïतम उपयोग माना गया है। राजा का बड़ा पुत्र राज्य का उत्तराधिकारी बनाया जाता है, किन्तु उसका कत्र्तव्य है कि वह अपने अन्य छोटे भाई-बहिनों की देखरेख व सुरक्षा का समुचित प्रबंध करे। परम पिता का सर्वश्रेष्ठï युवराज होने के नाते मनुष्य का भी उत्तरदायित्व यही है कि अपने से अविकसित, पिछड़े प्राणियों को, जो हमारे छोटे भाई-बहिन के समान हैं, उनको विकसित करने, आगे बढ़ाने में उदारतापूर्वक सहयोग करे। उनको सुरक्षा एवं संरक्षण प्रदान करे।
  
शरीर और मन जीवन रूपी रथ के दो पहियों के समान हैं। इन दोनों का अपना स्वतंत्र कोई अस्तित्व नहीं है। यह अंत:करण की आस्था एवं आकांक्षा के अनुरूप दोनों स्वामिभक्त सेवक के समान सदैव उसकी आज्ञा का पालन मात्र करते रहते हैं। शरीर द्वारा क्रिया मन द्वारा विचारणा उसी ओर घूमती एवं चलती है, जिधर अंतरात्मा की भावना प्रेरित करती है। भावनाएँ ही श्रद्धा, आस्था, निष्ठïा एवं मान्यता आदि नामों से जानी जाती हैं। इन्हीं सबके समन्वय से आकांक्षाएँ उभरती हैं और फिर उन्हीं के अनुरूप मन अपना तर्क, वितर्क, चिंतन एवं क्रिया प्रणाली निर्धारित करता है। तदुपरान्त गुलाम की तरह शारीरिक हलचलें क्रिया रूप में परिवर्तित हो जाती हैं। ऐसे में शरीर और मन दोनों को निर्दोष ही माना जाएगा। भला या बुरा, उत्थान या पतन जिस भी  मार्ग में बढ़ जाता है, उसका सारा दारोमदार अंत:करण पर ही जाता है।
  
आत्मज्ञान, आत्म बोध का अभिप्राय अंतराल के गहन स्तर में यह अनुभूति एवं विश्वास उत्पन्न करते रहना कि हम सत्ï, चित्ï, आनंद स्वरूप परमात्मा के ही अभिन्न अंग हैं। हमें यह भावना भी उत्पन्न करनी चाहिए कि संकीर्ण स्वार्थपरता त्याज्य है। व्यक्तिवादी आपाधापी अंततोगत्वा पतन के ही मार्ग में धकेलती है। अस्तु व्यक्ति से उठकर समष्टिï पर ध्यान दिया जाना चाहिए। भगवान्ï बुद्ध को जब आत्मबोध प्राप्त हुआ था, तब वे संकीर्ण स्वार्थ युक्त राजपाट को त्यागकर समष्टिïगत हित साधना में लग गए थे। स्वयं ही नहीं अपने अबोध बालक एवं पत्नी को भी लोकहित के लिए प्रेरित-प्रोत्साहित किया था। इससे स्पष्टï हो जाता है कि आत्मज्ञान प्राप्त व्यक्ति की क्रिया पद्धति में आदर्शवादिता ही आदर्शवादिता उभरती, उछलती रहती है। ऐसे लोग स्वयं तो कृतकृत्य होते ही हैं, समाज के लाखों-करोड़ों सामान्यजनों के लिए मार्गदर्शन का भी कार्य कर जाते हैं।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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रविवार, 5 फ़रवरी 2023

👉 महानता की प्राप्ति और उसके साधन

महानता की प्राप्ति के लिए हमें महान् आदर्शों एवं महान् सम्बलों का सहारा लेना पड़ता है। सद्गुणों के रूप में महानता का आह्वान करके उसे यदि अपने अन्तःकरण में धारण करें और उन्हीं प्रेरणाओं के अनुरूप अपना जीवन क्रम चलावें तो विकट परिस्थितियों में रहते हुए भी महानता प्राप्त कर सकना सम्भव हो सकता है।

ईश्वर महान् है, इसलिए उसकी उपासना भी हमारी महानता को बढ़ाने में सहायक होती है। आवश्यक है कि जिसे महान बनने की आकाँक्षा हो, वह ईश्वर का प्रकाश एवं अनुग्रह प्राप्त करने का प्रयत्न करे।

ईश्वर प्राप्ति के लिए उत्कृष्ट भावनाओं की आवश्यकता पड़ती है। भावनाओं में प्रेम का स्थान सर्वोपरि है। प्रेम को ही भक्ति कहते हैं। भक्ति से भगवान प्राप्त किया जाता है ऐसा शास्त्रकारों का मत है। भक्ति भावना बढ़ाने का अभ्यास किसी न किसी माध्यम से किया जाता है। माता, पिता, पत्नी, पुत्र या मित्र को माध्यम बनाने में एक कठिनाई यह होती है कि इनके साथ अपना व्यावहारिक सम्बन्ध होने से कभी-कभी प्रतिकूल भावनायें भी उठ पड़ती हैं। इनमें ज्ञान, विद्या, सदाचार, दिव्य दृष्टि सात्विकता तथा निःस्वार्थता की भावनायें भी अल्प मात्रा में होने से वैसे आदर्श अपने जीवन में भी उपस्थित नहीं हो पाते अतएव गुरु-भक्ति या ईश्वर भक्ति के माध्यम से अपनी महानता के विकास का प्रारम्भ करते हैं। इस भक्ति रूपिणी साधना से आध्यात्मिक भावनाओं का तेजी से विकास होने लगता है इसलिए हमारे धर्म और संस्कृति में उपासना को सर्वप्रथम और अनिवार्य धर्म कर्तव्य माना गया है।

उन्नति और उत्थान के लिये दूसरे साधनों में “स्वाध्याय और सत्संग” को अधिक फलदायक और सुविधाजनक मानते हैं। स्वाध्याय भी एक प्रकार से विचारों का सत्संग है, किन्तु महापुरुषों की समीपता का मनुष्य के अन्तःकरण पर तीव्र प्रभाव पड़ता है। सन्तजनों की समीपता शीघ्र फलदायक होती है क्योंकि यह लाभ उनकी वाणी, विचार और व्यवहार से निरन्तर मिलता रहता है अतएव प्रगति भी उतनी ही द्रुतगामिनी होती है। आत्म-संस्कार के लिए सत्संग से बढ़कर कोई दूसरा साधन नहीं। बड़े-बड़े दुष्ट दुराचारी व्यक्ति तक सत्संग के प्रभाव के सुधरकर महान आत्मा बने हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 8

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/January/v1.8

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👉 समग्र अध्यात्म

अध्यात्म की त्रिवेणी प्रेम, ज्ञान और बल इन तीन धाराओं में प्रवाहित होती है। इन तीनों का संतुलित अभिवर्धन करने से ही कोई समग्र आध्यात्मवादी हो सकता है। प्रेम हमारे अन्त:करण का अमृत है। जिस प्रकार हम अपने स्वार्थ, सुख, यश, वैभव और उत्सर्ग को चाहते हैं उसी प्रकार दूसरों के लिए भी चाह उठने लगे, तो उसे प्रेम का प्रकाश कहना चाहिए। अपनापन ही सबसे अधिक प्रिय है। अपने शरीर, मन, यश, सुख की चाहत सभी को रहती है। यह अपना आपा जितना विस्तृत होता जाता है, वह उतना ही प्रिय लगता जाता है और उसे सुखी समुन्नत बनाने की परिधि विस्तृत होती जाती है और अपना ‘प्रिय’ क्षेत्र बढ़ता चला जाता है। उसके लिए सेवा सहायता करने की इच्छा होती है और जो सत्कर्म ही बनते हैं। अपनों के साथ दुष्टता कौन करता है? प्रेम भावना की वृद्धि मन में से सभी दुष्प्रवृत्तियों को हटा देती है और मनुष्य सज्जन और सच्चरित्र एवं सहृदय बनता चला जाता है। प्रेम असंख्य सदगुणों का स्रोत है इसलिए उसे अध्यात्म का प्रथम चरण माना गया है।
  
दूसरा घटक है- ज्ञान। यथार्थ को समझना ही सत्य है। इसी को विवेक कहते हैं। जीवन के लक्ष्य को हम भूल जाते हैं। आत्मकल्याण की बात विस्तृत हो जाती है और कत्र्तव्य धर्म का पालन करने की गरिमा समझ में नहीं आती। इन्द्रियों की वासना और मन की तृष्णा पूरी करने के लिए अहंकार की पूर्ति के लिए निरर्थक कार्य करते हुए जीवन बीत जाता है और पाप की गठरी सिर पर लद जाती है। यह सब अज्ञान का फल है। अपने को शरीर नहीं आत्मा मानकर चलें। आत्मकल्याण की दृष्टिï से जीवन क्रम निर्धारित करें और वासना, तृष्णा को अनियन्त्रित न होने दें। स्कूली शिक्षा या धर्म की पुस्तकें पढ़ लेने का नाम ज्ञान नहीं है। यह तो एक आस्था है जो अन्त:करण में प्रकाशवान होकर हमें सही और गलत का विवेक कराती है। यह ज्ञान जो जितना प्राप्त कर लेता हैं वह उतना ही सफल आत्मवादी कहा जाता है।
  
तीसरा चरण है- बल। निर्बल को न सांसारिक सुख मिलता है न आत्मिक। हमें बलवान बनना चाहिए। मनोबल के आधार पर ही आपत्तियों से निपटना-प्रगति के पथ पर बढ़ चलना सम्भव होता है। लोभ, मोह जैसे शत्रुओं को परास्त करते हुए-प्रलोभनों से बचते हुए आदर्शवादिता के मार्ग पर अपनी प्रवृत्तियों को मोड़ सकना साहसी और पराक्रमी व्यक्ति के लिए ही सम्भव है। जीवन का प्रत्येक क्षेत्र सामथ्र्यवान और सशक्त बनाना पड़ता है। आत्मिक, मानसिक, शारीरिक सभी दुर्बलताएँ दूर करनी पड़ती हैं और आर्थिक क्षेत्र में इतना स्वावलम्बी रहना पड़ता है कि किसी के आगे न हाथ पसारना पड़े।
  
मनुष्य की सत्ता तीन भागों में विभक्त है- अन्त:करण, मस्तिष्क और शरीर। इसी विभाजन को अध्यात्म की भाषा में कारण शरीर और स्थूल शरीर कहते हैं। अन्त:करण का वैभव है-प्रेम। मस्तिष्क का धन है-ज्ञान। शरीर का वर्चस्व है-बल। चूँकि शरीर से ही आर्थिक, पारिवारिक और सामाजिक सम्बन्ध है इसलिए धन, व्यवहार कौशल और संगठन को भी इसी क्षेत्र में गिना जाता है। इन तीनों के समन्वय से ही समग्र अध्यात्म बनता है। एकांगी से काम नहीं चलता। अन्न, जल और वायु के त्रिविध आहार पर जीवन निर्भर है। आध्यात्मिक जीवन की यह तीनों प्रवृत्तियाँ समान रूप से आवश्यक हैं। इनका समन्वय ही त्रिवेणी का संगम है। इस तीर्थराज प्रयाग में स्नान करके ही हम जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...