गुरुवार, 19 जनवरी 2023

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 19 Jan 2023




👉 कर्म ही ईश्वर-उपासना

उपासना प्रतिदिन करनी चाहिये। जिसने सूरज, चाँद बनाये, फूल-फल और पौधे उगायें, कई वर्ण, कई जाति के प्राणी बनाये उसके समीप बैठेंगे नहीं तो विश्व की यथार्थता का पता कैसे चलेगा? शुद्ध हृदय से कीर्तन-भजन प्रवचन में भाग लेना प्रभु की स्तुति है उससे अपने देह, मन और बुद्धि के वह सूक्ष्म संस्थान जागृत होते है, जो मनुष्य को सफल, सद्गुणी और दूरदर्शी बनाते हैं, उपासना का जीवन के विकास से अद्वितीय सम्बन्ध है।

किन्तु केवल प्रार्थना ही प्रभु का स्तवन नहीं है। हम कर्म से भी भगवान् की उपासना करती हैं। भगवान् कोई मनुष्य नहीं हैं, वह तो सर्वव्यापक एवं सर्वशक्तिमान् क्रियाशील है, इसलिये उपासना का अभाव रहने पर भी उसके कर्म करने वाला मनुष्य उसे बहुत शीघ्र आत्मज्ञान कर लेता है। लकड़ी काटना, सड़क के पत्थर फोड़ना, मकान की सफाई, सजावट और खलिहान में अन्न निकालना, वर्तन धोना और भोजन पकाना यह भी भगवान् की ही स्तुति हैं यदि हम यह सारे कर्म इस आशय से करें कि उससे विश्वात्मा का कल्याण हो। कर्त्तव्य भावना से किये गये कर्म परोपकार से भगवान् उतना ही प्रसन्न होता है जितना कीर्तन और भजन से। स्वार्थ के लिये नहीं आत्म-सन्तोष के लिये किये गये कर्म से बढ़कर फलदायक ईश्वर की भक्ति और उपासना पद्धति और कोई दूसरी नहीं हो सकती।

पूजा करते समय हम कहते है-हे प्रभु! तू मुझे ऊपर उठा, मेरा कल्याण कर, मेरी शक्तियों को ऊर्ध्वगामी बना दे और कर्म करते समय हमारी भावना यह कहती रहे, हे प्रभु! तूने मुझे इतनी शक्ति दी, इतना ज्ञान दिया, वैभव और वर्चस्व दिया, वह कम विकसित व्यक्तियों की सेवा में काम आये। मैं जो करता हूँ, उसका लाभ सारे संसार को मिले।”

इन भावनाओं में कहीं अधिक शक्ति और आत्म-कल्याण की सुनिश्चितता है। इसलिये भजन की अपेक्षा ईश्वरीय आदेशों का पालन करना ही सच्ची उपासना है।

~ मैनली हाप्किन्स
📖 अखण्ड ज्योति 1969 जून पृष्ठ 1


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👉 विश्वात्मा ही परमात्मा

वैज्ञानिक और योगी- दो भाइयों ने सत्य की खोज का निर्णय किया। वैज्ञानिक ने विज्ञान और योगी ने मनोबल के विकास का मार्ग अपनाया। एक का क्षेत्र विराट का अनुसंधान था और दूसरे का अंतर्जगत्। दोनों ही पुरुषार्थ थे, अपने-अपने प्रयत्नों में परिश्रमपूर्वक जुट गये।

वैज्ञानिक ने पदार्थ को कौतूहल की दृष्टि से देखा और यह जानने में तन्मय हो गया कि संसार में फँसे हुये यह पदार्थ कहाँ से निकले है। योगी ने देह को आश्चर्य से देखा और यह विचार, संकल्प और भावनायें कहाँ से आती है? उसकी शोध में दत्तचित्त संलग्न हो गया।

वैज्ञानिक और योगी बढ़ते गये, बढ़ते गये। रुकने का एक ने भी नाम नहीं लिये। पर हुआ यह कि वैज्ञानिक विराट् के वन में भटक गया और योगी शरीर के अंतरजाल में। दोनों की विविधता, बहुलता और विलक्षणता के अतिरिक्त कुछ दिखाई न दिया।

हाँ अब वे एक ऐसे स्थान पर अवश्य जा पहुँचे जहाँ विश्वात्मा अपने प्रकाश रूप में निवास करती थीं। गोद से भटके हुये दोनों बालको को जगत्जननी जगदम्बा ने अपने आँचल में भर लिया। वैज्ञानिक ने कहा- माँ! तुम ज्योतिर्मयी हो और योगी ने उसे दोहराया माँ। तुम दिव्य प्रकाश हो!

माँ ने कहा- ’तात्! मैं अन्तिम सत्य नहीं हूँ। मैं भी उन्हीं तत्वों से बनी हूँ, जिनसे तुम दोनों बने हो। मैं प्रकाश धारण करती हूँ, प्रकाश नहीं हूँ। मैं स्वर चक्षु और घ्राण वाहिका हूँ पर स्वर, दृश्य और घ्राण नहीं हूँ। तुम्हारी तरह मैं भी उस चिर प्रकाश की प्रतीक्षा में खड़ी हूँ, जो परम प्रकाश है, परम सत्य हैं पर मैंने उसे प्राप्त करने का प्रयत्न नहीं किया। मैं तो इस प्रयत्न में हूँ कि उस सत्य के जो भी बीज सृष्टि में बिखरे पड़े हैं, वह मुरझाने न पायें। अपने पुत्रों की इसी सेवा सुश्रूषा में अपने सत्य को भूल गई हूँ। मुझे तो एक ही विश्वास है कि वह इन्हीं बीजों में बीज रूप से छुपा हुआ है, इनकी सेवा करते-करते किसी दिन उसे पा लूँगी तो मैं भी अपने को धन्य समझूँगी।” विश्वात्मा को प्राप्त कर वैज्ञानिक और योगी दोनों ही आनन्द मग्न हो गये। और स्वयं भी उसी की सेवा में जुट गये।

~ जाबालि
📖 अखण्ड ज्योति 1969 जून पृष्ठ 1

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बुधवार, 18 जनवरी 2023

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 18 jan 2023


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👉 मुक्ति के लिए प्रयत्न

कुछ लोग धनी बनने की वासना रूपी अग्नि में अपनी समस्त शक्ति, समय, बुद्धि, शरीर यहाँ तक कि अपना सर्वस्व स्वाहा कर देते हैं। यह तुमने भी देखा होगा। उन्हें खाने-पीने तक की भी फुरसत नहीं मिलती। प्रातःकाल पक्षी चहकते और मुक्त जीवन का आनन्द लेते हैं तब वे काम में लग जाते हैं। इसी प्रकार उनमें से नब्बे प्रतिशत लोग काल के कराल गाल में प्रविष्ट हो जाते हैं। शेष को पैसा मिलता है पर वे उसका उपभोग नहीं कर पाते। कैसी विलक्षणता। धनवान् बनने के लिए प्रयत्न करना बुरा नहीं। इससे ज्ञात होता है कि हम मुक्ति के लिए उतना ही प्रयत्न कर सकते हैं, उतनी ही शक्ति लगा सकते हैं, जितना एक व्यक्ति धनोपार्जन के लिये।

मरने के बाद हमें सभी कुछ छोड़ जाना पड़ेगा, तिस पर भी देखो हम इनके लिए कितनी शक्ति व्यय कर देते हैं। अतः उन्हीं व्यक्तियों को, उस वस्तु की प्राप्ति के लिये जिसका कभी नाश नहीं होता, जो चिरकाल तक हमारे साथ रहती है, क्या सहस्त्रगुनी अधिक शक्ति नहीं लगानी चाहिए? क्योंकि हमारे अपने शुभ कर्म, अपनी आध्यात्मिक अनुभूतियाँ- यही सब हमारे साथी हैं, जो हमारी देह नाश के बाद भी साथ जाते हैं। शेष सब कुछ तो यही पड़ा रह जाता है।

यह आत्म-बोध ही हमारे जीवन का लक्ष्य है। जब उस अवस्था की उपलब्धि हो जाती है, तब यही मानव- देव-मानव बन जाता है और तब हम जन्म और मृत्यु की इस घाटी से उस ‘एक’ की ओर प्रयाण करते हैं जहाँ जन्म और मृत्यु- किसी का आस्तित्व नहीं है। तब हम सत्य को जान लेते हैं और सत्यस्वरूप बन जाते हैं।

~ स्वामी विवेकानन्द
📖 अखण्ड ज्योति 1968 जून पृष्ठ 1

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👉 आत्म-त्याग ही सर्वोच्च धर्म

जीवन का एक लक्ष्य है ज्ञान और द्वितीय सुख। ज्ञान और सुख के समन्वय का ही नाम मुक्ति है। आत्म-चिन्तन के द्वारा माया बन्धनों और साँसारिक अज्ञान को काट लेते हैं और विषय वस्यता से छूट जाते हैं तो हम मुक्त हो जाते हैं किन्तु ऐसी मुक्ति तब तक नहीं मिल सकती, जब तक सृष्टि के शेष प्राणी बन्धन में पड़े हैं।

जब तुम किसी को क्षति पहुँचाते हो तो तुम अपने आपको क्षति पहुँचाते हो। तुम में और तुम्हारे भाई में कोई अन्तर नहीं है। जिस तरह छोटे-छोटे अवयवों से मिलकर शरीर बना है, उसी प्रकार छोटे-छोटे प्राणियों से मिलकर संसार बना है। कान को दुःख होता है तो आँख रोती है, उसी तरह समाज के किसी भी व्यक्ति का दुःख तुम्हारे पास पहुँचता है, इसलिये केवल अपने सुख से मुक्ति की कल्पना नहीं की जा सकती।

इस कसौटी पर जब लोगों को अपने लिये बढ़-चढ़कर अधिकार माँगते देखता हूँ तो ऐसे आदमी से मुझे बड़ी घृणा होती है। अधिकार व्यक्ति को स्वार्थी और संकीर्ण बनाते हैं। विश्व में जो कुछ अशुभ है, उसका उत्तरदायित्व प्रत्येक व्यक्ति पर है। अपने भाई से अपने को कोई पृथक् नहीं कर सकता। सब अनन्त के अंश हैं। सब एक दूसरे के रक्षक और सहयोगी हैं। वास्तव में वही सच्चा योगी है जो अपने में संपूर्ण विश्व को और सम्पूर्ण विश्व में अपने को देखता है। अपने लिये अधिकारों की माँग करना पुण्य नहीं है, पुण्य तो यह है कि हम छोटे-से-छोटे जीव के प्रति अपने कर्त्तव्य का पालन कर सकते हैं या नहीं। इसके लिये अपने अधिकार छोड़ने पड़ते हैं। इस लोक में यही सबसे बड़ा पुण्य है। आत्म-त्याग ही इस संसार का सर्वोच्च धर्म है।

~ स्वामी विवेकानन्द
📖 अखण्ड ज्योति 1968 अगस्त पृष्ठ 1
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मंगलवार, 17 जनवरी 2023

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 17 Jan 2023


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👉 धर्म न तो अवैज्ञानिक है और न अनुपयोगी

धर्म की आधार-शिला अति सुदृढ़ है। उसे नृतत्व विज्ञान की समस्त दिशा को ध्यान में रखकर तत्व-दर्शियों ने इस प्रकार बनाया है कि उसकी उपयोगिता में कहीं त्रुटि न हो जाय। व्यक्तिगत सुख-शाँति, प्रगति और समृद्धि का आधार धर्म है। समाज की सुव्यवस्था भी व्यक्तियों से धर्म-परायण कर्त्तव्य बुद्धि पर निर्भर है। धार्मिकता का अवलम्बन लेकर कोई घाटे में नहीं रहता, वरन् अपनी सर्वांगीण प्रगति का पथ ही प्रशस्त करता है।

धार्मिक मान्यतायें न तो अवैज्ञानिक हैं और न काल्पनिक। किन्हीं साम्प्रदायिक रीति-रिवाजों अथवा कथा किम्वदन्तियों को धर्म का परिवर्तनशील कलेवर कहा जा सकता है। उसमें सुधार और परिष्कार होता रहता है। धर्म की मूल आत्मा-द्वारा उच्च मानवीय सद्गुणों का प्रतिपादन होना-सनातन एवं शाश्वत है। न तो उसकी उपयोगिता से इनकार किया जा सकता है और न उसे अदूरदर्शितापूर्ण ठहराया जा सकता है। सच तो यह है कि मनुष्य की सामाजिकता धर्म सिद्धान्तों पर ही टिकी हुई है।

धर्म का तात्पर्य है- सदाचरण, सज्जनता, संयम, न्याय, करुणा और सेवा। मानव प्रकृति में इन सत् तत्वों को समाविष्ट बनाये रहने के लिये धर्म मान्यताओं को मजबूती से पकड़े रहना पड़ता है। मनुष्य जाति की प्रगति उसकी इसी प्रवृत्ति के कारण सम्भव हो सकी है। यदि व्यक्ति अधार्मिक, अनैतिक एवं उद्धत मान्यतायें अपनाले तो अपना ही नहीं समस्त समाज का अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा।

स्वामी विवेकानन्द
📖 अखण्ड ज्योति 1968 अगस्त पृष्ठ 1

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सोमवार, 16 जनवरी 2023

👉 परमात्मा का निराकार स्वरूप

शिवा का प्रश्न- ‘परमात्मा की सबसे उपासना कौन सी है, मुझे बहुत प्यारा लगा। यह बात सबके जानने की है। जो दूसरों की भलाई में निरत रहता है, वह भगवान को ही भक्ति करता है। परोपकार से बढ़कर और कोई उपासना नहीं वह सरल भी है,उत्तम भी है और सुखदायक भी। परोपकार करने में आत्मा की प्रसन्नता इतनी बढ़ जाती है कि रोमांच हो आता तो फिर उनका फल तो और भी स्वर्गीय सुखों से भरा हुआ होगा। भलाई साक्षात परमात्मा का निराकार स्वरूप है।

लोग यह मानते कि शिवाजी मेरी भक्ति करता है, इसलिये वह मुझे बहुत प्रिय है। मुझे सचमुच शिवाजी अच्छा लगता है, किन्तु शरीर से नहीं काम से। उसके गुण और उसका चरित्र बहुत ऊँचे दर्जे के है। उसने लोगों की भलाई के लिये अपने जीवन को सौंपा था, मैंने उसे एक रास्ता बता दिया। अब वह निष्काम भावना से सब काम करता है, उस काम को नहीं करता, जिससे मानवता का गर्हित होता हो, इसलिये वह भगवान का सच्चा भक्त है। मैं चाहता हूँ कि भारतवर्ष के सब बच्चे मेरे प्रिय शिष्य शिवा की तरह बन जाये। भलाई के रास्ते में प्रिय-अप्रिय जो कुछ भी आये, वीरतापूर्ण सहन करने वाले बन जाये। उससे भगवान की यह दुनिया बहुत अच्छी बनेगी। भगवान का प्यार और आशीर्वाद भी मिलेगा।

कोई कल्प-वृक्ष है तो उसका बीज परोपकार। परोपकारी सबका हृदय जीत लेता है। सभी का सहयोग उसे मिलता है। शिवा ने थोड़ी ताकत से ज्यादा विजय पाई है, क्योंकि उसे भगवान का आशीर्वाद मिला है और मनुष्यों का प्यार व सहयोग। यदि संसार के सारे मनुष्य परोपकार में तत्पर हो जायें, तो संसार कितना सुन्दर और सुखपूर्वक बन जाये।

समर्थ गुरु रामदास
📖 अखण्ड ज्योति 1969 जनवरी पृष्ठ 1

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👉 प्रार्थना ही नहीं पवित्रता भी

मनुष्य प्रार्थना करते हैं, पशु नहीं। क्योंकि मनुष्य ने पिता को पहचाना है, पशु ने नहीं। जो मनुष्य परमपिता की प्रार्थना नहीं करता वह सभी मनुष्य नहीं है। ऊपर से वह मनुष्य अवश्य है, लेकिन अन्दर से पशुओं की तरह जड़ और अज्ञान ही है, यदि कोई परमात्मा की प्रार्थना नहीं करता वह उसके दिये अनन्त अनुदानों की अवज्ञा करता है। प्रार्थना से हमारे हृदय के कलुष ही दूर नहीं होते हैं, परमात्मा के प्यार का असीम आनन्द मिलता है। वह तो उसके अतिरिक्त है, प्रार्थना उद्देश्य नहीं कर्तव्य है।

और हाँ, यदि प्रार्थना करने के लिये खड़े होते समय मन में किसी के लिये विरोध आये, किसी का अपराध स्मरण हो तो उसे प्रार्थना करने से पूर्व क्षमा कर देना चाहिये। अगर तुम ऐसा नहीं करते तो मन का विरोध और आत्मा का द्वेष, प्रार्थना के शब्द दूषित कर देंगे। संसार के जितने भी प्राणी हैं, वह तुम्हारी तरह ही परमात्मा के पुत्र हैं, तुम जिस तरह अपने दो पुत्रों को लड़ते-झगड़ते और परस्पर ईर्ष्या-द्वेष करते रहते देखकर दुःख पाते हो उसी प्रकार परमात्मा भी तुम्हारी भावना और कर्तव्य रहित प्रार्थना से प्रसन्न नहीं होगा।

सब के दोष-दुर्गुण भूल कर सब की सेवा और उन्नति करना भी प्रार्थना है। यह प्रार्थना उन सब प्रार्थनाओं से अच्छी है, जिसमें भगवान् का नाम तो रहे पर अन्तःकरण की पवित्रता न रहे। प्रार्थना का बीज पवित्रता की ही भूमि पर अच्छी तरह अंकुरित, पुष्पित और पल्लवित होता है। उसी में अच्छे फल लगते है, उसी से मनुष्य को प्रार्थना का आनन्द मिलता है।

सन्त तिलुवल्लुवर
📖 अखण्ड ज्योति 1969 मार्च पृष्ठ 1

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👉 आत्म निर्माण की ओर (भाग 1)

🔵 छोटी छोटी साधारण बातें बड़ी महत्त्वपूर्ण होती हैं- उनमें तत्त्वज्ञान और बड़े बड़े सत्य सिद्धान्त मिलते हैं। तुममें जितना ज्ञान है उसका उपयोग करते रहो जिससे वह नित्य नवीन बना चमकता रहेगा। केवल पुस्तकें पढ़ कर संसार की व्यावहारिक प्रथाओं में डूब जाने से ज्ञान होने से क्या लाभ जबकि अज्ञानियों के समान ही आचरण किया जाय। ज्ञानियों ने प्रथाओं की व्यवस्था मूर्खों के निर्देश के लिए ही हैं, ज्ञानी तो स्वतंत्र है और ज्ञान द्वारा विवेकबुद्धि से आचरण करने में समर्थ है यद्यपि मूर्ख लोग प्रथाबद्ध होकर ज्ञानी को धिक्कारते हैं कि उल्टा आचरण करते हो? ज्ञानी जानता है कि तत्व सत्य क्या है अतः वह मुक्त है। अज्ञानी अभाव के कारण प्रथाओं और परम्परा को ही सत्य मान उसमें लिप्त बद्ध है। उसमें बुद्धि नहीं कि स्वतंत्र रूप से प्रथा और परम्परा से बाहर निकल कर कुछ सोच सके और कर सके। यदि तुम ज्ञानी होकर भी मूर्खों के बीच तथा और परम्परा के अनुसार आचरण करो तो तुममें और मूर्खों में क्या अन्तर रहा?

🔴 अपने ज्ञान को स्वाध्याय और छोटे छोटे व्यवहार द्वारा नित्य परिमार्जित करते रहो। यदि कहीं ज्ञान चर्चा होती हो और उसके कुछ शब्द सुनकर तुम्हें मालूम पड़े तो यह कहकर वहाँ से मत खिसक जाओ कि यह सब तो मैंने पढ़ लिया है मैं जानता हूँ। संभव है उसके अन्दर कोई नवीन बात निकल आवे जो तुम्हारे लिए उपयोगी हो, तुम्हारे जीवन में महान् परिवर्तन उपस्थित कर दे।

🔵 अपनी बातचीत में सदैव सतर्क रहो। किसी के विषय में आलोचना या निन्दा मत करो और अपने विषय में किसी प्रकार की हीनता मत प्रकट करो। संसार में सभी प्राणी- परमात्मा की कला द्वारा रचित उसकी प्रतिमूर्ति हैं दिव्य हैं, तुम भी उसकी प्रतिमूर्ति और दिव्य हो। आवश्यकता है केवल आत्म विकास की, जिससे तुम दूसरों का और अपना सत्य स्वरूप समझ सको।

🔴 रात को सोते समय अन्वेषण करो कि दिन भर की बातचीत में तुमने किसी से कैसी कैसी बातें की। निश्चय करो कि अगले दिन बातचीत में कोई असत्य, हीन बात न निकले। तुम्हारे शब्द ठोस, रचनात्मक, दिव्य, प्रसन्न और चेतन हों जिससे दूसरों पर ऐसा प्रभाव पड़े जैसे एक चुम्बक दूसरे लोहे को खींचता है, और बिजली द्वारा मुर्दा ‘बैटरी चार्ज’ हो जाती है। ऐसा ही तुम्हारे शब्दों का प्रभाव हो कि सुनने वाला निराश निरुत्साही व्यक्ति चेतन हो जाय और असत्य भाषी का दिल हिल जाय और दुबारा असत्य बोलने का साहस न रह जाय।

🌹 अखण्ड ज्योति -अगस्त 1948 पृष्ठ 23

http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1948/August.23

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👉 आत्म निर्माण की ओर (भाग 2)

🔵 यदि तुम्हें इस प्रकार प्रयत्न करने में प्रथम दिन सफलता न मिले तो हताश होकर छोड़ मत दो, प्रयत्न करते रहो। बहाना मत करो कि इतनी बारीकी से व्यवहार हमसे नहीं होता, कहाँ तक किस किसके साथ हरेक शब्द का खयाल रखें। एक एक व्यक्ति के सुधार से दुनिया धीरे धीरे सुधर जायगी, जल्दी नहीं होता। संसार का विकास क्रम सूक्ष्म गति से हो रहा है।

🔴 किसी रोज सन्ध्या समय विश्लेषण करने में जब मालूम हो जाय कि आज दिन भर हमने किसी की निन्दा नहीं की, कोई हीन बात नहीं बोले, किसी का तिरस्कार नहीं किया, चुगली नहीं की, तो समझ लो कि उस दिन तुम्हारा आध्यात्मिक विकास का बीजारोपण हो गया। शब्दों पर अधिकार रखकर अब तुम आगे उन्नति कर सकोगे। 

🔵 यदि तुम किसी व्यक्ति द्वारा अन्य व्यक्ति की आलोचना, चुगली या तिरस्कार सुनो तो उस पर ध्यान मत दो, उसे मत मानो। वह निन्दक अपनी ही आत्महीनता का परिचय दे रहा है- उसमें स्वयं कितनी बुराइयाँ हैं उसे वह नहीं देखता और नहीं दूर करता। वह दूसरों के छिद्र देखता है- उसकी बात सुनकर उससे कहो, “मुझे आलोचना या चुगली मत सुनाओ। इससे तुम्हें या मुझे क्या लाभ ? मुझे यह बताओ कि उस व्यक्ति में अच्छे गुण क्या हैं, और वे अच्छे गुण तुम में हैं या नहीं ? तथा उसकी अपेक्षा तुम कितना अच्छा काम कर सकते हो यह सिद्ध करो।” तुम्हारी ऐसी बातें सुनकर उसकी दुबारा चुगली करने की हिम्मत नहीं होगी।

🔴 तुम भी यदि चुगली या वार्ता सुनो, दूसरों की चर्चा सुनो तो उसे दूसरों को मत सुनाओ- इससे व्यर्थ बकवाद बढ़ता है, व्यर्थ के विचार फैलते हैं, जूठा खाकर उसे उगलना कोई अच्छी बात नहीं है- यह तो कुत्तों से भी बुरा काम है। उस बात को छोड़ दो विचार करो कि क्या वह व्यक्ति सत्य कह रहा है? क्या ऐसा कह देना आवश्यक है? यदि मैं यह बात अमुक व्यक्ति को कह दूँ तो इसका क्या नतीजा होगा? इससे किसको लाभ होगा और न कह देने से किसको हानि? इन बातों में प्रेम कितना है? घृणा कितनी है? इत्यादि बातों पर विचार कर लो तब कोई सुनी हुई बात अपनी ओठों पर से दूसरे के कान में डालो फिर इसका क्या परिणाम होता है- तुम्हें पश्चाताप न होगा और दोष नहीं लगेगा, गवाही नहीं देनी होगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति -अगस्त 1948 पृष्ठ 24

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👉 आत्म निर्माण की ओर (भाग 3)

🔵 यदि तुम्हें किसी व्यक्ति का व्यवहार संकीर्ण मालूम पड़े और तुम उसका तिरस्कार करना चाहो तो पहले विचार कर लो- तुममें उसका तिरस्कार करने की प्रेरणा क्यों हो रही है? उसमें जो संकीर्णता और बुराई है, क्या वह हममें नहीं है? यदि हममें भी वही बात है तो पहले स्वयं आत्मशुद्धि की आवश्यकता है तभी दूसरे पर दोष लगाने का अधिकार होगा। जब तक तुममें वही बुराई है तब तक तुम दोनों बराबरी की श्रेणी में हो। यदि तुममें वह संकीर्णता और बुराई नहीं है तो तुम शुद्ध हो परन्तु उसका तिरस्कार करने से तुममें हीनता आ जायगी। उसको शुद्ध करो। फूल मिट्टी में पड़ कर उसे भी सुगंधित कर देता है। उसे मत कहो, “तुम निकृष्ट और नीच हो, दुष्ट बेईमान हो।” वरन् उसे इन शब्दों की कल्पना ही न होने दो। उससे महानता और ईमानदारी की बात करो।

🔴 “अमुक व्यक्ति ने ऐसा नहीं किया”, “अमुक बात अब तक नहीं हुई”, “अमुक कार्य हो जाय तब हम दूसरा काम करें”, “ऐसा हो जाता हो हम भी ऐसा करते”, इत्यादि बातें आलसी व्यक्ति किया करते हैं। जो कुछ तुम्हें करना है उसके लिए दूसरी भूमिकाओं पर ठहरने की क्या आवश्यकता? भूतकाल की अपूर्णताओं पर कुढ़ते रहने की अपेक्षा वर्तमान को पूर्ण कर भविष्य का निर्माण किया जा सकता है। भूतकाल की घटना तो  मुर्दा हो गयी, उसकी कब्र खोदकर हड्डियाँ निकालने से क्या लाभ? चेतन तत्व का आविष्कार करो जिससे तुम्हारा और संसार का निर्माण हो।

🔵 जब तुम किसी व्यक्ति के व्यवहार में संकीर्णता पाओ, किसी से किसी की चुगली सुनो तो उसके अनुसार कोई काम मत कर डालो और न वह बात लोगों में जाहिर करो। इससे तो वह दुर्गुण फैलता है- दुर्गंध की भाँति और सब सुनने देखने वालों के मन को दूषित करता है। इसके बदले उस दुर्गुण को कम करो। दुर्गुण की चर्चा करने से दिन दूना रात चौगुना बढ़ता है। रोग तो औषधि से शान्त होता है, गरम लोहे को ठण्डा लोहा काटता है। आग पानी से बुझती है। क्रोध नम्रता से शान्त होता है। अतः दुर्गुण से दुर्गुण उसी प्रकार बढ़ता है जैसे क्रोधी व्यक्ति से क्रोधपूर्ण बर्ताव करने से और आग में आग डालने के समान होता है। अतएव दुर्गुण की औषधि है सद्गुण।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति -अगस्त 1948 पृष्ठ 24

http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1948/August.24

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👉 आत्म निर्माण की ओर (अंतिम भाग)

🔵 यदि तुम्हारे बच्चे से, तुम्हारी स्त्री से, तुम्हारे नौकर से अमुक काम नहीं बनता, वरन् इन्होंने कोई काम बिगाड़ दिया और नुकसान हो गया हो तो क्रोध करने, तिरस्कार और निकृष्ट आलोचना करने से सबके मन में हीनता और पश्चाताप के भाव पैदा होगा। काम बिगड़ जाने से उन्हें पश्चाताप तो है ही, परन्तु तुम्हारे शब्दों से उन्हें बहुत ही चोट पहुँचेगी, इससे वे भयभीत और संकुचित होंगे, आगे वैसा कोई काम करने की उन्हें हिम्मत न होगी-कह देंगे- हमसे न होगा - बिगड़ जायगा, टूट जायगा- इत्यादि।

🔴 उनका छिद्रान्वेषण करने, उनका तिरस्कार करने, हीन, निर्बुद्धि और निकृष्ट बनाने में तुम्हारे मन में भी संताप से कितना विष उत्पन्न होकर रक्त को विषाक्त करेगा - इसकी कल्पना तुम्हें नहीं है। अस्तु, दूसरों का तिरस्कार करने की अपेक्षा उक्त घटना को यह समझ कर क्षमा कर देना चाहिए कि क्रोध और तिरस्कार से कुछ तो बनेगा नहीं, भविष्य में सुधार के लिए उन्हें शिक्षा दे देनी चाहिए। हंसकर उन्हें अमुक काम ठीक प्रकार से करना सिखला दो तो वे तुम्हें महान समझेंगे, तुमसे प्रेम करेंगे और सावधानी तथा प्रेमपूर्वक हरेक काम करेंगे।

🔵 दूसरे लोग जैसा सोचते हैं जो बोलते या करते हैं-उसकी जिम्मेदारी उन पर है, तुम्हें क्या चिन्ता? परन्तु तुम जैसा सोचते हो, जो बोलते या करते हो उसकी जिम्मेदारी तुम पर है-उसकी चिन्ता तुम्हें होनी चाहिए।

🔴 किसी घटना से उतनी हानि नहीं होती, वरन् उस घटना से हम स्वयं अपने विचारों द्वारा अपनी हानि अधिक कर लेते हैं। कोई विपत्ति आने और घटना होने पर कोई रोता बिलखता है, दूसरा व्यक्ति उसे छोड़कर निर्माण में लग जाता है। हुआ सो हुआ, अब आगे सुधारो। इन दोनों व्यक्तियों में कितना अन्तर है?

🔵 तुम किसी योजना में लगे हो, तो धैर्यपूर्वक प्रयत्नशील रहो, यह मत सोचो, और मत कहो अरे इतने दिन तो हो गये, न जाने कब यह पूरा होगा। वरन् ऐसा विचार करो-प्रतिदिन यह धीरे-धीरे अब पूरा हो रहा है।

🔴 तुम दूसरों को कैसा समझते हो दूसरे लोग तुम्हें क्या समझते हैं- यह अपनी-2 मनोवृत्ति विकास और दृष्टिकोण का प्रतिबिम्ब है। परन्तु तुम वास्तव में क्या हो, इसका विचार करो अपना सुधार और निर्माण करते रहो, संसार के लोग कुछ भी कहें।

🌹 समाप्त
🌹 अखण्ड ज्योति -अगस्त 1948 पृष्ठ 24

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रविवार, 15 जनवरी 2023

👉 आप का मन

मन की शरीर पर क्रिया एवं शरीर की मन पर प्रतिक्रिया निरंतर होती रहती है। जैसा आप का मन, वैसा ही आप का शरीर, जैसा शरीर, वैसा ही मन का स्वरूप। यदि शरीर में किसी प्रकार की पीड़ा है, तो मन भी क्लांत, अस्वस्थ एवं पीड़ित हो जाता है। वेदांत में यह स्पष्ट किया गया है कि समस्त संसार की गतिविधि का निर्माण मन द्वारा ही हुआ है।

जैसा हमारी भावनाएँ, इच्छाएँ, वासनाएँ अथवा कल्पनाएँ हैं, तदनुसार ही हमें शरीर और अंग-प्रत्यंग की बनावट प्राप्त हुई है। मनुष्य के माता-पिता, परिस्थितियाँ, जन्मस्थान, आयु, स्वास्थ्य, विशेष प्रकार के भिन्न शरीर प्राप्त करना, स्वयं हमारे व्यक्तिगत मानसिक संस्कारों पर निर्भर है। हमारा बाह्य जगत हमारे प्रसुप्त संस्कारों की प्रतिच्छाया मात्र है।

संगम अपने आप में न निकृष्ट है, न उत्तम। सूक्ष्म दृष्टि से अवलोकन के पश्चात् हमें प्रतीत होता है कि यह वैसा ही है, जैसी प्रतिकृति हमारे अंतर्जगत में विद्यमान है। हमारी दुनियाँ वैसी ही है, जैसा हमारा अंत:करण का स्वरूप।

भलाई, बुराई, उत्तमता, निकृष्टता, भव्यता, कुरूपता, मन की ऊँची नीची भूमिकाएँ मात्र हैं। हमारे अपने हाथ में है कि हम चाहे ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ की भट्टी में भस्म होते रहें और अपना जीवन शूलमय बनाएँ अथवा सद्गुणों का समावेश कर अपने अंत:करण में शांति स्थापित करें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति-फरवरी 1946 पृष्ठ 4


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