गुरुवार, 15 सितंबर 2022

👉 समर्थ के अवलम्बन से ही आत्मिक प्रगति

भारतीय संस्कृति में अनेकानेक विशषताएँ हैं, किन्तु एक सबसे बड़ी विशेषता है जो हम उसमें पाते हैं वह है-गुरु-शिष्य परम्परा। गुरु माँ की तरह अपनी प्राण-ऊर्जा से शिष्य के अन्तःकरण को ओत-प्रोत कर उसमें नई शक्ति का संचार करता है, उसे नया जीवन देता है। शिष्य का समर्पण और गुरु द्वारा अपना सर्वस्व उसको अर्पण, इसकी मिसाल और कहीं भी देखने को नहीं मिलती। गुरु का सहयोग लिये बिना शिष्य की आत्मिक प्रगति सम्भव नहीं। अज्ञान के अन्धकार में फँसे मानव को बहार निकालने के लिए गुरु अपनी विशिष्ट ज्ञान की शलाका से उसकी आँखों में वो अंजन लगाता है कि उसे जीवन का वास्तविक उद्देश्य और अपनी भावी भूमिका स्पष्ट नजर आने लगती है। जिस किसी के जीवन में गुरु का पदार्पण हुआ है, उसे मानकर चलना चाहिए कि उसके उच्चस्तरीय आत्मोत्थान का पथ प्रशस्त हो गया।

आज के आधुनिक युग में जब आदमी को आदमी पर विश्वास नहीं है तब शिष्य कैसे विश्वास करे-कौन सा गुरु उसके लिए सच्चा है? शास्त्रों का मार्गदर्शन है-धूर्तों-के मायाजाल से बचने के लिए लोभ-लालच में फँसाकर अपना उल्लू साधने वाले तथाकथित बाबाजियों के चंगुल में आने से बचने के लिए शिष्य को अपने अन्दर के नेत्र खुले रखने चाहिए। यह एक समयसाध्य प्रक्रिया है, परन्तु क्रमशः समझ में आने लगता है-कौन सही है? और कौन गलत?

*( अमृतवाणी:- भावी महाभारत पं श्रीराम शर्मा आचार्य Amritvanni:- Bhavi Mahabharat Pt Shriram Sharma Acharya, https://youtu.be/aLv4rXh8cmU )*

*( शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए Shantikunj WhatsApp 8439014110 )*

आत्मिक प्रगति के इच्छुक साधक आज के इस मायाजाल से घिरे संसार में निश्छल स्वभाव वाले, संवेदना से अभिपूरित, तार्किक नहीं, बल्कि वास्तविक ज्ञान से भरेपूरे गुरु को पहचानने में देर नहीं करते। गुरु की पहचान के पश्चात् अपनी आत्मसत्ता का परिपूर्ण समर्पण, अहंकार का निगलन और अपनी इच्छाओं का गुरु की इच्छाओं में विलय-बस इतना ही शेष रह जाता है। समर्पण, यदि सर्वोच्च स्तर का हुआ, तो बदलें में उतना ही मिलता हुआ चला जाता है।

बंशी स्वयं को पोला कर लेती है और मुँह से लगने के पश्चात् वही स्वर बजने देती है जो बजाने वाला चाहता है। शिष्य भी यदि स्वयं को खाली कर दे और अपनी इच्छाएँ गुरु को दे दे, तो गुरुदीक्षा सम्पूर्ण हो जाती है। गुरुसत्ता अपनी प्राण ऊर्जा की कलम शिष्य के व्यक्तित्व में आरोपित कर उसे विशिष्टता से सम्पन्न बना देती है। समर्थ गुरु का अवलम्बन एक सौभाग्य है। जिसे यह मिल गया, मानो उसकी मुक्ति का द्वार खुल गया।

✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 31

मंगलवार, 13 सितंबर 2022

👉 अहंकार के मोह जाल से बचिये। (भाग 1)

यद्यपि सम्पूर्ण भीतरी शत्रुओं- माया, मोह, ईर्ष्या, काम, लोभ, क्रोध इत्यादि का तजना कठिन है, तथापि अनुभव से ज्ञान होता है कि ‘अहंकार’ नामक आन्तरिक शत्रु को मिटाना और भी कष्ट साध्य है। यह वह शत्रु है जो छिप कर हम पर आक्रमण करता है। हमें ज्ञान तक नहीं होता कि हम ‘अहंकार’ के वशीभूत हैं।

अहंकार प्रत्येक मनुष्य में वर्तमान है। धनी मानी, वृद्ध, युवक, बालक विज्ञान किसी न किसी प्रकार के अहंकार में डूबे हैं। ‘अहं’ ही घमंड है। हमें किसी न किसी बात का मिथ्या गर्व बना है। विद्वान को अपनी विद्वत्ता का, धनी को अपने धन का, स्त्री को अपने रूप, यौवन, सौंदर्य का अहंकार है, राजा और जागीरदार अपने ऐश्वर्य के अहंकार में किसी दूसरे की नहीं सोचते, पूँजीपति अपनी पूँजी के गर्व में गरीब मजदूरों के अधिकारों को नहीं देना चाहते। संसार के अनेक संघर्षों का कारण यही है कि किसी के ‘अहं’ को चोट पहुँचती है। अभिमान मनुष्य के पतन का मूल है।

‘अहंकार’ को सूर हाथी मानते हैं। उन्होंने इसे ‘दिग्विजयी गज’ कहकर सम्बोधित किया है। अर्थात् संसार में बहुत कम इस दुर्बलता से मुक्त हैं। आदि काल से मनुष्य इस प्रयत्न में है कि वह अभिमान से मुक्त हो जाये और इसी के लिए प्रयत्न करता रहा है। किंतु शोक! महाशोक!! जीवन पर्यंत हम वृथा के अभिमान में फँसे रहते हैं। अपने बराबर किसी को नहीं मानते। अपनी बुद्धि को सबसे अधिक महत्व प्रदान करते हैं। अपनी चीज, बाल बच्चे, विचार, दृष्टिकोण, घर बार सच पर अभिमान करते हैं। इसी वृथा के अहंकार के कारण हम जीवन में और बड़ी बातें सम्पन्न नहीं कर पाते। जहाँ के तहाँ ही पड़े रह जाते हैं। हमारी उन्नति में रोक पहुँचाने वाला शत्रु अहंकार ही तो है।

मनुष्य अभिमान कर विषयों में फंसा रहता है, विवेक भूलता है। और फिर आयु पर्यन्त पछताता है। सम्पत्ति आती है और एक मामूली से झटके से निकल जाती है। शारीरिक शक्ति बीमारी के एक आक्रमण से नष्ट हो जाती है। पग जरा सी गलती से छूट जाना है और मनुष्य पदच्युत हो जाता है फिर कोई उसे टके को भी नहीं पूछता। धन, सम्पदा, ऐश्वर्य, शक्ति सब निस्सार पदार्थ हैं। मनुष्य इनके अभिमान में अपनी आध्यात्मिक उन्नति को भूल जाता है और पतनोन्मुख होता है।

*( अहंकार नाश ही करता है | Ahankar Nash Hi Karta Hai | Dr Chinmay Pandya, Rishi Chintan, https://youtu.be/vSKChpugH14 )*

अहंकार का अर्थ संकुचितता है। इससे मनुष्य अपने आपको एक संकुचित परिधि में बाँधे रखता है। वह दूसरों से उन्मुक्त भ्रातृभाव से मिल नहीं पाता, अपना हृदय उनके सामने नहीं खोल सकता। मिथ्या गर्व में वह यह सोचा करता है कि दूसरे आये और आकर उसकी मिथ्या प्रशंसा करे। प्रशंसा से वह फूल उठता है। उसकी शठता, मद, अभिमान द्विगुणित हो उठते हैं। धीरे-धीरे उसे दूसरों से तारीफ कराने की आदत बन जाती है। वह अपनी तनिक सी बुराई सुनते ही विह्वल हो उठता है और क्रोध में कुछ का कुछ कर बैठता है। बन्धन ही मृत्यु है, अहंकार का बन्धन सर्वथा त्याज्य है। अहंकार को चोट पहुँचते ही मनुष्य को हजारों बिच्छुओं के काटने के समान दुःख होता है।

आप जन्म से दूसरों के समान हैं। दूसरे भी आप जैसे ही हैं। सब में समानता है। फिर किस बात का वृथा अहंकार आप करते हैं। मिथ्या अभिमान में फँसकर क्यों आप एक नए आन्तरिक दुःख की सृष्टि कर रहे हैं। यदि आप अभिमानी नहीं हैं तो आपका अन्तस्थल शुद्ध निर्मल रहेगा, मानसिक वृत्तियाँ शाँत बनी रहेगी, मधुर निद्रा आवेगी, जनता में प्रत्येक जगह आपका सम्मान होगा। आपके पड़ौसी आपको भली प्रकार समझ सकेंगे। आन्तरिक दृष्टि से सफाई, स्वास्थ्य और सौभाग्य की जननी है। इस मनोविकार के मोहजाल में मुक्त हो जाइये।

अखण्ड ज्योति सितम्बर 1949 पृष्ठ 11

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रविवार, 11 सितंबर 2022

👉 न तो हिम्मत हारे ओर न हार स्वीकार करें

आगत कठिनाइयों को देखकर निठाल हो बैठना और रोते कलपते समय गँवाना, विपत्ति को दूना करने के समान है। हमें यह मानकर ही चलना पड़ेगा कि जीवन आरोह अवरोध के ताने-बाने से बुना गया है। धूप, छाँह की तरह सफलताओं और असफलताओं की उभयपक्षीय हलचलें होती ही रहती है और होती ही रहेगी। सर्वथा सुख-सुविधाओं से भरा जीवन क्रम कदाचित् ही कोई जीता है। ज्वार-भाटों की तरह उठाने और गिराने वाली परिस्थितियाँ अपने ढंग से आती और अपनी राह चली जाती है। वट पर बैठकर उतार-चढ़ाव का आनन्द लेने वाले ही जीवन नाटक के अनुभवी कलाकार कहे जा सकते हैं।

सदा दिन ही बना रहे रात कभी आये ही नहीं भला यह कैसे हो सकता है? जन्मोत्सव ही मनाये जाते रहे, मरण का रुदन सुनने को न मिले यह कैसे सम्भव है। सुख की घड़ियाँ ही सामने रहें, दुःख के दिन कभी न आयें यह मानकर चलना यथार्थता की ओर से आंखें मूँद लेने के समान है। बुद्धिमान वे है जो सुखद परिस्थितियों का समुचित लाभ उठाते हैं और दुःख की घड़ी आने पर उसका सामना करने के लिए आवश्यक धैर्य और साधन इकट्ठा करते रहते हैं।

ऐसे ईर्ष्यालु इस दुनिया में कम नहीं जो किसी का सुख सन्तोष फूटी आँखों नहीं देख सकते। जिनके अन्धेर अनाचार में बाधा पड़ती है वे भी शत्रु बन बैठते हैं। अनुचित लाभ उठाने के उत्सुक भी शोषण एवं आक्रमण से बाज़ कहाँ आते हैं और अनन्त काल तक रहेगा। उनसे बच निकलना कठिन है। हाँ, इतना हो सकता है कि अपना शौर्य साहस इतना विकसित कर लिया जाय कि उन्हें छेड़-छाड़ करने का साहस ही न हो। व्यक्तिगत समर्थता के अतिरिक्त आपने साथी सहकारी बढ़ाकर भी आततायी की गति विधियों पर अंकुश किया जा सकता है। प्रतिरोध और प्रतिकार की शक्ति बढ़ाकर ही आक्रमणकारियों से अपनी आँशिक सुरक्षा हो सकती है। उनका सामना ही न करना पड़े, कुछ अनुचित अवांछनीय सामने आये ही नहीं, ऐसा सोचना आकाश कुसुम पाने जैसी बात-कल्पना है। अवरोधों से जूझने और संघर्षों के बीच अपना रास्ता बनाने के अतिरिक्त यहाँ और कोई रास्ता है ही नहीं।

परिस्थितियों की अनुकूलता और प्रतिकूलताओं से इनकार नहीं किया जा सकता। शारीरिक संकट उठ खड़ा हो कोई अप्रत्याशित रोग घेर ले यह असम्भव नहीं। परिवार के सरल क्रम में से कोई साथी बिछुड़ जाय और शोक संताप के आँसू बहाने पड़े यह भी कोई अनहोनी बात नहीं है। ऐसे दुर्दिन हर परिवार में आते हैं और हर व्यक्ति को कभी न कभी सहन करने पड़ते हैं। मन चाही सफलताएँ किसे मिली है। मनोकामनाओं को सदा पूरी करते रहने वाला कल्पवृक्ष किसके आँगन में उगा है? ऐसे तूफान आते ही रहते हैं जो संजोई हुई साध के घोंसले उड़ाकर कहीं से कहीं फेंक दे और एक-एक तिनका बीन कर बनाये गये उस घरौंदे का अस्तित्व ही आकाश में छितरा दें, ऐसे अवसर पर दुर्बल मनः स्थिति के लोग टूट जाते हैं।

*( हारिए न हिम्मत | Hariye Na Himmat | Pt Shriram Sharma Acharya, https://youtu.be/A2WMS2S3cvY )*

नियति क्रम से हर वस्तु का-हर व्यक्ति का अवसान होता है। मनोरथ और प्रयास भी सर्वदा सफल कहाँ होते हैं। यह सब अपने ढंग से चलता रहे पर मनुष्य भीतर से टूटने न पाये इसी में उसका गौरव है। समुद्र तट पर जमी हुई चट्टानें चिरअतीत से अपने स्थान पर जमी अड़ी बैठी है। हिलोरों ने अपना टकराना बन्द नहीं किया सो ठीक है, पर यह भी कहाँ गलत है कि चट्टान ने हार नहीं मानी।

न हमें टूटना चाहिए और न हार माननी चाहिए। नियति की चुनौती स्वीकार करना और उससे दो-दो हाथ करना ही मानवी गौरव को स्थिर रख सकने वाला आचरण है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1973

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शुक्रवार, 9 सितंबर 2022

👉 भाग्य का निर्माण अपने हाथ में है।

*अनेक बार छोटी-मोटी असफलता मिलने तथा अभाव ग्रस्त होने पर लोग ऐसा कहने लगते हैं-”क्या करें, हमारे भाग्य में ही ऐसा लिखा है, हमें ऐसी ही हीन स्थिति में रहना पड़ेगा।* यदि हमारे भाग्य में सफलता बंधी होती तो अब तक के प्रयत्न असफल क्यों होते?” ऐसे अदूरदर्शी मनुष्य भाग्यवाद के गूढ़ सिद्धान्तों को नहीं समझते और न यह समझते हैं कि *इस प्रकार की मान्यता बना लेने के कारण वे किस प्रकार अपने भविष्य के निर्माण में भारी बाधा उपस्थित कर रहे हैं। ऐसे लोग मार्ग की बाधाओं का मुकाबला नहीं कर सकते।*

*सफलता की देवी का प्रसन्न करने के लिए पुरुषार्थ की भेंट चढ़ानी पड़ती है।* जो मनुष्य पुरुषार्थी नहीं है, प्रयत्न और परिश्रम में दृढ़ता नहीं रखता वह स्थायी सफलता का अधिकारी नहीं हो सकता। यदि अनायास किसी प्रकार कोई सम्पत्ति उसे प्राप्त हो भी जाय तो वह उससे संतोषजनक लाभ नहीं उठा सकता। *वह ऐसे ही अनायास चली जाती है जैसे कि अनायास आई थी।*

*रोटी का स्वाद वह जानता है जिसने परिश्रम करने के पश्चात् क्षुधार्त होकर ग्रास तोड़ा हो। धन का उपयोग वह जानता है जिसने पसीना बहाकर कमाया हो। सफलता का मूल्याँकन वही कर सकता है जिसने अनेकों कठिनाइयों, बाधाओं और असफलताओं से संघर्ष किया हो। जो विपरीत परिस्थितियों और बाधाओं के बीच मुस्कराते रहना और हर असफलता के बाद दूने उत्साह से आगे बढ़ना जानता है। वस्तुतः वही विजयलक्ष्मी का अधिकारी होता है।*

*जो लोग सफलता के मार्ग में होने वाले विलम्ब की धैयपूर्वक प्रतीक्षा नहीं कर सकते, जो लोग अभीष्ट प्राप्ति के पथ में आने वाली बाधाओं से लड़ना नहीं जानते वे अपनी अयोग्यता और ओछेपन को बेचारे भाग्य के ऊपर थोप कर स्वयं निर्दोष बनने का उपहासास्पद प्रयत्न करते हैं। ऐसी आत्म वंचना से लाभ कुछ नहीं हानि अपार है। सबसे बड़ी हानि यह है कि अपने को अभागा मानने वाला मनुष्य आशा के प्रकाश से हाथ धो बैठता है और निराशा के अन्धकार में भटकते रहने के कारण इष्ट प्राप्ति से कोसों पीछे रह जाता है।*

*( अमृतवाणी:- कर्म और सदाचरण ही सम्पूर्ण यज्ञ | Karam Aur Sadacharn | Pt Shriram Sharma Acharya, https://youtu.be/f_l9LG9Mwr4 )*

इतिहास पर दृष्टिपात कीजिए, जिन महापुरुषों ने बड़े-बड़े कार्य किये हैं उन्होंने एक से एक बढ़कर आपत्तियों को झेला है। यदि वे हर एक कठिनाई के समय ऐसा सोचते कि “हमारे भाग्य में यदि सफलता बंधी होती तो यह बाधा क्यों उपस्थित होती, इसलिए जब कोई बात भाग्य में ही नहीं है तो प्रयत्न क्यों करे?” विचार कीजिए कि ऐसी मान्यता यदि उन्होंने रखी होती तो क्या वे इतने महान बने होते?

*बाधाएं, कठिनाइयाँ, आपत्तियाँ और असफलताएं एक प्रकार की कसौटी हैं जिन पर पात्र-कुपात्र की खरे-खोटे की परख होती है। जो इस कसौटी पर खरे उतरते हैं, सफलता के अधिकारी सिद्ध होते हैं उन्हें ही इष्ट की प्राप्ति होती है। जो सस्ती सफलता के फिराक में रहते हैं, बिना अड़चन और स्वल्प प्रयत्न में जो मनमाने मनसूबे पूरे करना चाहते हैं वे न तो प्रकृति के नियमों को समझते हैं न ईश्वरीय विधान को। उन्हें जानना चाहिए कि कायर पुरुष भाग्य की दुहाई देते रहते हैं और उद्योगी पुरुष सिंह विजय लक्ष्मी प्राप्त करते हैं।*

*अखण्ड ज्योति सितम्बर 1949 पृष्ठ 30*

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गुरुवार, 8 सितंबर 2022

👉 भक्तिगाथा (भाग १५५)

*भगवान पर सम्पूर्ण विश्वास है भक्ति*

*वृषपर्वा के मौन में और अन्य सभी के मनन में काफी समय बीत गया। हिमालय के हिमशिखर सजग किन्तु सर्वथा शान्त खड़े थे। सर्वत्र, सर्वदा प्रवाहित रहने वाली वायु में भी इस समय कोई हलचल नहीं थी। हिमपक्षी न जाने क्यों अचानक शान्त हो गए थे।* हिमपशुओं में भी किसी का रव नहीं सुनायी दे रहा था। हिमालय के इस परम पावन व दिव्य क्षेत्र में इस समय न कोई कोलाहल था और न कोई स्पन्दन। निस्पन्दता व नीरवता ही चहुँ ओर बिखरी हुई थी। *कोई किसी से कुछ भी नहीं कह रहा था। हालांकि सबके मनों में भीलकन्या जीवन्ती का व्यक्तित्व अपना प्रकाश बिखेर रहा था।* स्वयं महाराज वृषपर्वा की स्वचेतना भी उसी के आलोक से आलोकित थी।

*इन क्षणों के मौन व मनन का सम्मिलन बड़ा ही जीवन्त लग रहा था। पता नहीं ये पल कब तक यूं ही बने रहते, लेकिन तभी ब्रह्मर्षि पामदेव ने बड़े ही सौम्य व शिष्ट स्वर में अपनी जिज्ञासा प्रकट की- ‘‘महाराज वृषपर्वा! आपके अपने व्यक्तित्व का रूपान्तरण और जीवन्ती के जीवन ने मुझे बहुत ही सुखद अहसास के साथ प्रेरित किया है।* इस बारे में कुछ और अधिक सुनने व जानने के लिए उत्सुक हूँ।’’ महर्षि वामदेव के इस कथन का सभी ने समर्थन किया और समवेत सहमति जतायी। *सचमुच ही जीवन्ती का जीवन व उसकी भक्ति दुर्लभ है। ब्रह्मर्षि पुलह के इस कथन ने महाराज वृषपर्वा को एक अनूठी अनुभूति दी।*

*अपने को इस अनुभूति में लपेटे हुए विनम्र स्वर में उन्होंने कहा- ‘‘आप सभी का आदेश मुझे पूरी तरह से मान्य है किन्तु इसी के साथ मेरा अपना एक अनुरोध भी है।’’ ‘‘अवश्य कहें राजन्!’’ यह स्वर देवर्षि का था।* सम्भवतः वह वृषपर्वा के अन्तर्मन से सुपरिचित हो चले थे। सचमुच ही देवर्षि के कथन ने प्रतापी सम्राट रहे वृषपर्वा को उत्साहित किया। इसी उत्साह में वह बोले- ‘‘मुझे आपके अगले सूत्र के श्रवण की तीव्र प्रतीक्षा है।’’ *‘‘यह प्रतीक्षा तो हम सबको भी है’’-ऋषि पुलह ने वृषपर्वा के साथ अपनी सहमति जतायी। इस सहमति को स्वतः ही सभी का अनुमोदन मिल गया। साथ ही सभी की दृष्टि देवर्षि के मुखमण्डल पर जमी।* इस दृश्य को देखकर देवर्षि नारद मुस्कराए, फिर उन्होंने बड़े ही सुमधुर स्वर में नारायण के पावन नाम का तीन बार उच्चारण किया और तब उन्होंने अपने भक्ति सूत्र का उच्चारण करते हुए कहा-

*( ध्यान:- बुद्धि से हृदय की ओर चलने का ध्यान | Meditation of Heart | Shraddhey Dr. Pranav Pandya, https://youtu.be/pR_U_FiVtdY )*

‘सर्वदा सर्वभावेन निश्चिन्तितैर्भगवानेव भजनीयः’॥ ७९॥
*सब समय, सर्वभाव से निश्चिन्त होकर (केवल) भगवान का ही भजन करना चाहिए।*

.... *क्रमशः जारी*
✍🏻 *डॉ. प्रणव पण्ड्या*
📖 *भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ३०५*

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👉 अपने को आवेशों से बचाइए

🔵 जीवन को समुन्नत देखने की इच्छा करने वालों के लिए यह आवश्यक है कि अपने स्वभाव को गंभीर बनाएँ। उथलेपन लड़कपन, छिछोरापन की जिन्हें आदत पड़ जाती है, वे गहराई के साथ किसी विषय पर विचार नहीं कर सकते। किसी समय मन को गुदगुदाने के लिए बालक्रीड़ा की जा सकती है, पर वैसा स्वभाव न बना लेना चाहिए। आवेशों से बचे रहने की आदत बनानी चाहिए जैसे समुद्र तट पर रहने वाले पर्वत, नित्य टकराते रहने वाले समुद्र की लहरों की परवाह नहीं करते। इसी प्रकार हमको भी उद्वेगों की उपेक्षा करनी चाहिए। खिलाड़ी खेलते हैं, कई बार हारते-हारते जीत जाते हैं, कई बार जीतते-जीतते हार जाते हैं, परंतु कोई खिलाड़ी उसका अत्यधिक असर मन पर नहीं पड़ने देता।

🔴 हारने वालों के होठों पर झेंप भरी मुस्कराहट होती है और जीतने वाले के होठों पर जो मुस्कराहट रहती है, उसमें सफलता की प्रसन्नता मिली होती है। इस थोड़े से स्वाभाविक भेद के अतिरिक्त और कोई विशेष अंतर जीते हुए तथा हारे हुए खिलाड़ी में नहीं दिखाई पड़ता। विश्व के रंगमंच पर हम सब खिलाड़ी हैं। खेलने में रस है, वह रस दोनों दलों को समान रूप से मिलता है। हार-जीत तो उस रस की तुलना में नगण्य चीज है। दु:ख-सुख, हानि-लाभ, जय-पराजय के कारण उत्पन्न होने वाले आवेशों से बचना ही योग की सफलता है। 

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
-अखण्ड ज्योति-मई 1947 पृष्ठ 5 


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मंगलवार, 6 सितंबर 2022

👉 क्षुद्र हम, क्षुद्रतम हमारी इच्छाएँ (अन्तिम भाग )

🔴 अब पछताय होत क्या?
राजा जो था, वह बहुत दुःखी हुआ और बेचारा बैठकर रोने लगा। क्या हुआ? उन्होंने कहा कि राजा के सारे खजाने में जो लाखों रुपया रखा था, दंगाई आये, डकैत आये और लूट खसोट कर ले गये। फिर राजा के मंत्री आये और दूसरे लोग आये। उन्होंने कहा कि यह दंगा कैसे हो गया? बलवा कैसे हो गया? एक एक कमेटी बैठायी गयी और एक आयोग नियुक्त किया गया, जो इस बात की इन्क्वायरी करे कि दंगा होने की वजह क्या थी?

🔵 दंगा होने की वजह जब मालूम की गयी, तो यह मालूम हुआ कि जो दंगा हुआ था, इसलिए हुआ था कि ब्राह्मणों और ठाकुरों में लड़ाई हुई थी। फिर पता चला कि कुत्तों के मारे लड़ाई हो गयी। फिर यह पूछा गया कि कुत्तों की लड़ाई क्यों हुई? तब पता चला कि बिल्ली को पकड़ने के लिए कुत्ते आ गये थे, इसलिए यह हुआ। बिल्लियाँ कहाँ से आयीं? क्योंकि छिपकलियाँ आ गयीं थी और उन्होंने ऐसे गड़बड़ किया कि उन्हें पकड़ने के लिए बिल्ली आ गयी। फिर उन्होंने कहा कि अच्छा। छिपकलियाँ कहाँ से आयीं? उन्होंने कहा कि वहाँ मक्खियाँ भिन−भिना रही थीं और उन मक्खियों के भिनभिनाने की वजह? उन्होंने कहा राजा साहब ने जो शहद खाया था और शहद खाने में गलती कर डाली थी, बस उसी की वजह से यह सारा झगड़ा हो गया।

🔴  सारा ढाँचा विवेकशीलता पर टिका

मित्रो! हमारे जीवन में भी यही होता है। विवेकहीनता के कारण बिलकुल हमारे जीवन में भी यही घटना घटित होती रहती है। राजा बड़ा बेवकूफ और विवेकहीन था, क्योंकि उसने शहद सँभलकर नहीं खाया। शहद को सँभलकर खाया होता, तो मक्खियाँ क्यों आतीं? बिल्ली क्यों आती? छिपकलियाँ क्यों आतीं? कुत्ते क्यों आते? दंगा क्यों होता? और बलवा क्यों होता? और खजाने पर हमला क्यों बोला गया होता? छोटी सी भूल के कारण राजा अपना खजाना खो बैठा और छोटी सी हमारी भूल के कारण राजा अपना खजाना खो बैठा और छोटी सी हमारी भूल हमारे खजाने को खो बैठी। जरा सी बात थी, विवेक की बात थी। यह इशारा भर था कि हमारे जीवन में यह ख्याल बना रहता कि हम इंसान के रूप में जीवन लेकर के इस दुनिया में आये हैं और हमको ब्राह्मण वाले जीवन को ब्राह्मण की तरीके से खर्च करना चाहिए और इसके बदले में बहुमूल्य आनन्द और बहुमूल्य लाभ प्राप्त करना चाहिए।

🔵 इतनी सी रत्ती भर बात अगर हमारे मन में सावधानी के रूप में बनी रहती, तो हमारी ये गतिविधियाँ कुछ अलग तरह की रहतीं और जिस तरह की गतिविधियाँ आज हमारी हैं, उस तरह का गंदा, कमीना जीवन जीने के लिए हमको मजबूर न करतीं। फिर हमारी ख्वाहिशें अलग तरह की होतीं, फिर हमारी इच्छाएँ अलग तरह की होतीं। फिर हमारी कामनाएँ अलग तरह की होतीं, फिर हमारी दिशाएँ अलग तरह की होतीं फिर हमारे सोचने का ढंग अलग तरह का होता। आज यह सब जैसा है, उसमें जमीन- आसमान का फर्क होता। हमारे विचार करने का ढंग, काम करने का ढंग अलग तरह का होता। यह सारे का सारा ढाँचा हमारी विवेकशीलता पर टिका हुआ है। विवेकवान बनकर ही हम अपने जीवन के उद्देश्य को प्राप्त कर सकते हैं।

आज की बात समाप्त।
ॐ शान्तिः
पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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रविवार, 4 सितंबर 2022

👉 संपदा को रोकें नहीं

परमात्मा के अनंत वैभव से विश्व में कभी किसी बात की नहीं। भगवान आपके हैं और उसके राजकुमार के नाते सृष्टि की हर वस्तु पर आपका समग्र अधिकार है। उसमें से जब जिस चीज की जितनी आवश्यकता हो उतनी लें और आवश्यकता निबटते ही अगली बात सोचें। संसार में सुखी और संपन्न रहने का यही तरीका है।

बादल अपने, नदी अपनी, पहाड़ अपने, वन उद्यान अपने। इनमें से जब जिसके साथ रहना हो, रहें। जिसका जितना उपयोग करना हो, करें। कोई रोक-टोक नहीं है। दुःखदायी तो संग्रह है। नदी को रोककर यदि अपनी बनाना चाहेंगे और किसी दूसरे को पास न आने देंगे, उपयोग न करने देंगे तो समस्या उत्पन्न होगी। एक जगह जमा किया हुआ पानी अमर्यादित होकर बाढ़ के रूप में उफनने लगेगा और आपके निजी खेत खलिहानों को ही डुबो देगा।

बहती हुई हवा कितनी सुरभित है पर उसे आप अपने ही पेट में भरना चाहेंगे तो पेट फूलेगा, फटेगा। औचित्य इसी में है कि जितनी जगह फेफड़े में है, उतनी ही सांस लें और बाकी हवा दूसरों के लिए छोड़ दें। मिल-बांटकर खाने की यह नीति ही सुखकर है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति – जनवरी 1985 पृष्ठ 1

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शनिवार, 3 सितंबर 2022

👉 उदारता व्यक्ति को आस्तिक बनाती है

यदि मनुष्य संग्रह करता है एवं उसी के लिए अपना लौकिक जीवन पूरी तरह नियोजित कर देता है तो वह तीन पाप करता है=एक है कल पर अविश्वास, दूसरा ईश्वर पर अश्रद्धा तथा तीसरा भविष्य की अवज्ञा। जब पिछला कल भलीभाँति निकल गया, हमें जीवित रहने के लिए जितना जरूरी था, उतना मिल गया तो कल क्यों नहीं मिलेगा? यदि जीवन सत्य है तो यह भी सत्य है कि जीवनोपयोगी पदार्थ अन्तिम साँस चलने तक मिलते रहेंगे। नियति के द्वारा उसकी श्रेष्ठतम व औचित्य की परिधि में व्यवस्था पहले से ही है। तृष्णा एक ऐसी ही बौद्धिक जड़ता है, जो निर्वाह के लिए आवश्यक साधन उपलब्ध रहने पर भी निरन्तर अतृप्तिजन्य उद्विग्नताओं में जलाती रहती है।

जो ईश्वर पर विश्वास रखते हैं, वे निजी जीवन में उदार बनकर जीते हैं। बादल बरस कर अपना कोष नहीं चुका देते। वे बार-बार खाली होते हैं, फिर भर जाते हैं। नदियाँ उदारतापूर्वक समुद्र को देती हैं वे समुद्र भाप बनाकर उन्हें बादलों को लौटा देता है, इस विश्वास के साथ कि यह प्रवाह चलता रहेगा। वृक्ष प्रसन्नतापूर्वक देते हैं व सोचते हैं कि वे ठूँठ बनकर नहीं रहेंगे। नियति का चक्र उन्हें सतत् हरा-भरा बनाए रखने की व्यवस्था करता ही रहेगा।

हवा की झोली में सौरभ भरने वाले खिलते पुष्पों से तथा दूध के बदले कोई प्रतिदान न माँगने वाली गायों से हम शिक्षण लें एवं उदारता को जीवित रख हँसते-हँसाते जीवन के दिन पूरे करें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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गुरुवार, 1 सितंबर 2022

👉 वर्तमान परिस्थितियाँ हमने स्वयं उत्पन्न की हैं

माना कि हमसे नित्य प्रति भूलें होती हैं। ये हमारे शरीर और मन की भूलें हैं। नित्य दंड पाकर वे इन भूलों की क्षतिपूर्ति भी करते रहते हैं। आत्मा, जो कि हमारी मूल सत्ता है, इन नित्य की भूलों से ऊपर है। वह कभी भूल या पाप में प्रवृत्त नहीं होती। हर बुरा काम करते समय विरोध करना और हर अच्छा काम करते समय संतोष अनुभव करना, यह उसका निश्चित कार्यक्रम है। अपने इस सनातन-स्वभाव को वह कभी नहीं छोड़ सकती। 

उसकी आवाज को चाहे हम कितनी ही मंद कर दें, कितनी ही कुचल दें, कितनी ही अनसुनी कर दें, तो भी वह कुतुबनुमा की सुई की तरह अपना रुख पवित्रता की ओर ही रखेगी, उसकी स्फुरणा सतोगुणी ही रहेगी, इसलिए आत्मा कभी अपवित्र या पापी नहीं हो सकती। चूँकि हम शरीर और मन नहीं वरन् आत्मा हैं, इसलिए हमें अपने को सदैव उच्च, महान्, पवित्र, निष्पाप परमात्मा का पुत्र ही मानना चाहिए। अपने प्रति पवित्रता का भाव रखने से हमारा शरीर और मन भी पवित्रता एवं महानता की ओर द्रुतगति से अग्रसर होता है।


हम स्वयं ही कर्त्ता एवं भोक्ता हैं। कर्म करने की पूरी-पूरी स्वतंत्रता हमें प्राप्त है। जैसे कर्म हम करते हैं, ईश्वरीय विधान के अनुसार वैसा फल भी तुरंत या देर में मिल जाता है। इस प्रकार अपने भाग्य के निर्माण करने वाले भी हम स्वयं ही हैं। परिस्थितियों के जन्मदाता हम स्वयं हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति-जन. 1947 पृष्ठ 8


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मंगलवार, 30 अगस्त 2022

👉 आत्मचिंतन के क्षण 30 Aug 2022

🔸 आत्मा की दृष्टि से संसार के संपूर्ण प्राणी एक समान हैं। शरीर, धन, मान, पद और प्रतिष्ठा की बहुरूपता आत्मगत नहीं होती है। इस दृष्टि से ऊँच, नीच, वर्णभेद, छोटे-बड़े अशक्त, बलवान्, धनी या निर्धन का कोई भेदभाव नहीं उठता। परमात्मा के दरबार में सब एक समान हैं। कोई ऊँच-नीच, बड़ा, राजा या फकीर नहीं है। जो यह समझकर सबके साथ सदैव सद्भावनाएँ रखता है, वही सच्चा अध्यात्मवादी है।

◼️ मानव जीवन की सार्थकता के लिए विचार पवित्रता अनिवार्य है। केवल ज्ञान, भक्ति और पूजा से मनुष्य का विकास एवं उत्थान नहीं हो सकता। जिसके विचार गंदे होते हैं, उससे सभी घृणा करते हैं। शरीर गंदा रहे तो स्वस्थ रहना जिस प्रकार कठिन हो जाता है, उसी प्रकार मानसिक पवित्रता के अभाव में सज्जनता, प्रेम और सद्व्यवहार के भाव नहीं उठ सकते। आचार-विचार की पवित्रता से ही व्यक्ति का सम्मान व प्रतिष्ठा होती है।

🔹 बुराई पहले आदमी से अज्ञानी व्यक्ति के समान मिलती है और हाथ बाँधकर नौकर की तरह उसके सामने खड़ी हो जाती है, फिर मित्र बन जाती है और निकट आ जाती है। इसके बाद मालिक बनती है और आदमी के सिर पर सवार होकर उसे सदा के लिए अपना दास बना लेती है।

🔸 प्रकृति चाहती हे कि हर व्यक्ति सजग और सतर्क रहे,  सावधानी बरते और घात-प्रतिघात से कैसे बचा जाता है इस कला की जानकारी प्राप्त करे। सज्जन होना उचित है, पर मूर्ख होना अक्षम्य है। हम दूसरों की सेवा-सहायता विवेकपूर्वक करें, यह ठीक है, पर कोई मूर्ख अथवा कमजोर समझकर अपनी घात चलाये और ठग ले जाय, यह अनुचित है।

🔹 धोखा किसी को भी नहीं देना चाहिए, पर धोखा खाना कहाँ की बुद्धिमानी है। हमें हर किसी पर पूरा विश्वास करना चाहिए, साथ ही पैनी निगाह से यह देखते रहना चाहिए कि कहीं असावधानी से वह अवसर तो उत्पन्न नहीं हो रहा है, जिसमें दुर्बल मन मनुष्य का अविश्वासी बन जाना संभव है।

◼️ हमें किसी के साथ अनीति नहीं बरतनी चाहिए, पर अन्याय को भी सहन नहीं करना चाहिए। संघर्ष के बिना कोई छुटकारा नहीं। प्रतिरोध में हानि उठानी पड़ सकती है, पर प्रतिरोध न करने में-चुपचाप अनीति सहते रहने में और भी अधिक घाटे में रहना होगा। अनीति बरतने की प्रक्रिया तभी गतिशील रहती है, जब उसका अवरोध न हो। अनीति को हम कदापि सहन न करें, भले ही उसके प्रतिरोध में कितनी ही बड़ी क्षति क्यों न उठानी पड़े।


✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 क्षुद्र हम, क्षुद्रतम हमारी इच्छाएँ (भाग 6)

🔴 गलत मार्ग पर चलने की परिणति 

रामायण में भी यही बात आती है कि आदमी बहुत कमजोर होता है। आदमी का रूहानी बल, उसका चरित्र, उसकी महानता और आत्मा कमजोर हो जाये, तो आदमी बहुत कमजोर हो जाता है। रावण बहुत ही बलवान था। काल को उसने अपनी पाटी से बाँध रखा था। वह इतना जबरदस्त था कि उसने सब देवताओं को पकड़ लिया था। सोने की लंका बनाई। समुद्र पर काबू पाया, लेकिन एक समय रावण बहुत ही कमजोर हो गया और बहुत ही दुबला हो गया। बहुत ही कमजोर हो गया। कब? जब कि वह सीता जी का हरण करने को गया। सीताजी का हरण करने को बेचारे को बहुत ढोंग रचाने पड़े। भिखारी का रूप बनाना पड़ा। रावण भिखारी क्यों बना? रावण के दरवाजे पर तो अनेक भिखारी पड़े रहते थे। उसे क्यों बनना पड़ा और यह भी इधर- उधर देखकर के, कि कोई मुझे देख तो नहीं रहा? इस तरीके से रावण चला। रावण की दशा बहुत ही दयनीय थी। क्यों? क्योंकि उसने गलत रास्ते पर कदम रखने शुरू किये थे-

‘जाकें डर सुर असुर डेराहीं। निसि न नींद दिन अन्न न खाहीं।’
सो दससीस स्वान की नाईं। इत उत चितइ चला भड़िहाईं॥
इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज तन बुधि बल लेसा॥
अर्थात् व्यक्ति यदि गलत रास्ते पर कदम उठाना शुरू कर देता है, तो उसका तेज, बल और बुद्धि- सारे के सारे सद्गुण नष्ट हो जाते हैं- इनका सफाया हो जाता है।

🔵 हम तो लुट गये 

मित्रो! हमारे जीवन की महानतम भूल यही है कि हमको जिस काम के लिए जीवन मिला था, ऐसा उज्ज्वल जीवन जीने के लिए मिला था, उसके बारे में हम बेखबर होते हुए चले गए। हमने वह सारी की सारी चीजें भुला दीं, जिसे भगवान् ने हमको जन्म के समय सौंपी थीं। हम छोटी- छोटी चीजों में उलझ गये और हमारे जीवन का जो महत्त्व और जो लाभ मिलना चाहिए था, वह न मिल सका। हम दुनिया में आकर के लुट गये, बरबाद हो गये। भगवान् के यहाँ से हम कितनी बड़ी दौलत लेकर के आये थे। अपरिमित शक्तियों के भण्डार बनकर के हम आये थे। हमारी आँखों में सूरज, चाँद थे। हमारे सारे शरीर में सारे के सारे देवताओं का निवास था। शक्ति की देवी का हमारे शरीर में निवास है। गणेश जी का निवास हमारे मस्तिष्क में है और सरस्वती का निवास हमारी जिह्वा पर है। हमारे हृदय में चार मुख वाले ब्रह्माजी, नाभि में शंकर भगवान्- इन सारे के सारे देवताओं का निवास हमारे शरीर में है। देवताओं के निवास से भरा हुआ ऐसा शरीर हमको मिला, लेकिन इस देवताओं से भरे हुए शरीर का जो लाभ हमको उठाना चाहिए था, जो फल उसका लेना चाहिए था, हम वह फल लेने से वंचित रह गए। हमारी यह छोटी सी भूल जीवन के उद्देश्य को भूला देने के सम्बन्ध में हुई।

🔴 गलत सोच बैठी रही मन में

जीवन के उद्देश्य के बारे में हमको यही याद बनी रही, जो कि हमारे मुहल्ले वालों और पड़ोसियों ने कहा। उन्होंने कहा कि मनुष्य खाने- पीने के लिए पैदा हुआ है और मनुष्य कुछ चीजें इकट्ठी करने के लिए पैदा हुआ है। मनुष्य इंद्रियों के लाभ और इंद्रियों की सुविधाएँ इकट्ठी करने के लिए पैदा हुआ है और मनुष्य नाम और यश कमाने के लिए पैदा हुआ है। मनुष्य अपना बड़प्पन, अपना गौरव, अपना आतंक दूसरे लोगों के ऊपर जमाने के लिए पैदा हुआ है। मुहल्ले वालों ने हमसे यही कहा, पड़ोसियों ने हमसे यही कहा और रिश्तेदारों ने हमसे यही बात कही। यह बातें हमारे दिमाग के ऊपर हावी होती गयीं और पूरी तरह सवार हो गयीं। हमने उसी बात को सही मान लिया और सारी जिंदगी को उसी ढंग से खर्च करना शुरू कर दिया।

🔵 एक चूक का परिणाम कितना बड़ा 

मित्रो! हमारी इतनी बड़ी भूल जो कि इस चौराहे पर आकर हमको मालूम हुई। हमारी एक भूल- चूक हो गई। ऐसी ही एक भूल कलिंग देश के एक राजा ने की थी। कलिंग देश का एक राजा था। एक बार उसको जलपान के समय- नास्ते के समय मधुपर्क दिया गया अर्थात् दही और शहद दिया गया। दही और शहद को अच्छे तरीके से खाना चाहिए था, तमीज के साथ खाना चाहिये था लेकिन तमीज के साथ उसने शहद नहीं खाया। इधर- उधर देखता रहा, बात करता रहा और शहद खाता रहा। इस तरह शहद खाने से क्या हुआ? आधा शहद प्याले में गया, आधा खा चुका और आधा शहद जमीन पर फैल गया। इसके बाद कलिंग राजा चला गया।

कलिंग राजा जब चला गया तो थोड़ी देर में जो शहद वहाँ फैल गया था वहाँ मक्खियाँ आयीं और आकर के शहद खाने लगीं। वहाँ बहुत सी मक्खियाँ मँडरा रहीं थी। उसी समय एक छिपकली आयी और मक्खियों को खाने का अंदाज लगाने लगी। फिर एक और छिपकली आयी। जब कई छिपकलियाँ इकट्ठी होने लगीं, तो एक बिल्ली आई। बिल्ली ने कहा कि ये छिपकलियाँ बहुत गड़बड़ करती हैं चलो इन्हें खाना चाहिए। इनको खाने में मजा मिलेगा। बस, मक्खियों को खाने के लिए छिपकलियाँ तैयारी करने लगी थीं और छिपकलियों को खाने के लिए बिल्ली। बिल्ली जैसे ही उन्हें खाने के लिए आई वैसे ही कहीं से एक कुत्ता आ गया। उसने कहा कि यह बिल्ली बहुत अच्छी है। इसको मजा चखाना चाहिये। इसकी टाँग पकड़ लेनी चाहिए। बस, कुत्ता आया और उसने बिल्ली की टाँग पकड़ ली। कान पकड़ लिया और बिल्ली के बाल नोचने लगा। जब तक एक और कुत्ता आ गया और उस कुत्ते के ऊपर बिगड़ने लगा। कुत्ते से लड़ने लगा। बिल्ली तो भाग गई और कुत्तों में लड़ाई हो गयी।

🔴 बात बढ़ती चली गयी

कुत्ते जब आपस में बहुत देर तक लड़ते रहे और घायल हो गये, तो उन कुत्तों के मालिक आये। उन्होंने आपस में कहा कि तुम्हारे कुत्ते ने हमारे कुत्ते को काटा। दूसरे ने कहा कि तुम्हारे कुत्ते ने हमारे कुत्ते को काटा। उन्होंने कहा कि तुम्हारा कुसूर है, तुमने अपने कुत्ते को बाँधकर के क्यों नहीं रखा? दूसरे ने भी यही कहा कि तुमने अपने कुत्ते को बाँधकर के क्यों नहीं रखा? दोनों में टेंशन होने लगी और आपस में मारपीट हो गई। झगड़ा हो गया? फिर क्या हुआ? वे ब्राह्मण और ठाकुर थे। ब्राह्मणों को पता चला कि हमारे ब्राह्मण की ठाकुरों ने पिटाई कर दी, तो उन्होंने कहा ब्राह्मणों की बहुत बेइज्जती हो गई, चलो ठाकुरों पर हमला करेंगे। उधर ठाकुरों ने कहा कि चलो, ब्राह्मणों को ठीक करेंगे। उधर ब्राह्मणों ने कहा कि ठाकुरों का मुकाबला करेंगे। जो होगा देखा जायेगा।

फिर दोनों में बहुत जोरदार लड़ाई हुई। मारपीट और दंगा हो गया। दंगा हो गया, तो मुहल्ले में जो चोर और डाकू थे, उन्होंने कहा कि दंगा हो रहा है। इस समय हमें बड़ा बलवा खड़ा कर देना चाहिए और जो भी माल लूट- पाट में मिले, उसे लेकर के भाग जाना चाहिए। बस दंगा होते ही बहुत सारे दंगाई आ गये और सारे शहर में दंगा मचाने लगे और लूटपाट करने लगे। उन्होंने कहा कि इन गाँव वालों के पास क्या रखा है? सारा खजाना तो राजा के पास है। चलो राजा के पास चलें और उसका सारे का सारा खजाना लूटकर ले आयें। बस दंगाइयों ने राजा के खजाने पर धावा बोल दिया और राजा के खजाने में जो माल रखा था, सब चुराकर ले गये। सोना, चाँदी, नगीना आदि सब गायब हो गये।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/guru3/shudrahumshurdtamhum.3


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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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