मंगलवार, 8 मार्च 2022

👉 बुढ़ापा

"मम्मा ये बताओ, दादा दादी आपको बहुत परेशान करते हैं ना.."
"हाँ बेटा पर क्या कर सकते हैं.. अब हैं यहाँ तो झेलना ही पड़ेगा |"
"पर क्यूँ मम्मा... क्यूँ झेलना पड़ेगा"

"तुम नही समझोगे रहने दो"

"एक काम करते हैं मम्मा, इन दोनो को चाचा चाची के घर भेज देते हैं"
"वो वहाँ दो दिन भी नही रह पायेंगे बेटा.. चाची तो दादी को देखते ही तुनक जाती है और चाचा तो तुम्हारे चाची के पल्ले से ऐसे बँधे हैं कि वो उतना ही सुनते हैं जितना चाची कहती है | वहाँ इनका कोई गुज़ारा नही होने वाला | "

"तो बुआ को बोल दो ना ये उनके भी तो माँ पापा हैं ना , वो ही ले जायें कुछ दिनों के लिए इन दोनो को| "

"तुम भी ना बड़े भोले हो बेटा.. वहाँ नही जायेंगे दादा दादी.. ढकोसला करेंगे कि हम तो बेटी के घर का पानी भी नही पी सकते तो वहाँ जा कर रहेंगे कैसे और अगर रहने को तैयार हो भी गये तो तुम्हारी बुआ के पचासों बहाने निकल आयेंगे | वो कम थोड़े ना है, वो भी तो अपनी माँ पर ही गयी है | "

"क्या मम्मा मतलब कोई इन्हे अपने साथ नही रखना चाहता | एक काम करो मम्मा इन्हे वहाँ पहुँचा दो... वो मैने टीवी पर देखा था कुछ ओल्ड ऐज होम टाइप से है.. अरे वो जो उस दिन मूवी में आ रहा था | "

"वृद्धाआश्रम कहते हैं उसे ... मैं भी थक जाती हूँ काम कर के.. सुबह उठने से सोने तक इनके नखरे झेलना... तौबा तौबा... कब तक आखिर .. मैं भी कुछ दिन और देख रही हूँ..नहीं तो तुम्हारे पापा से बात करूँगी कि वो इन दोनो को वहीं छोड़ आये |"

"हाँ यही ठीक रहेगा.. दादी दिन भर टोकती रहती है.. टीवी मत देखो, मोबाइल मत खेलो..... मैं बच्चा थोड़े ना हूँ.. बड़ा हो रहा हूँ मैं... समझदार हो रहा हूँ.. ये भी कोई बात हुयी भला. .. हुँ...ह |"

"अरे मेरा राजा बेटा...इतना गुस्सा.... दस साल के ही हो अभी.. मेरी आँखो के तारे हो तुम.... इतनी जल्दी बड़े हो जाओगे कभी सोचा ही नही था | अब देखो तुम बड़े होते जाओगे और हम बूढ़े होते जाएँगे | फिर तुम्हारी शादी करेंगे.. प्यारी सी दुल्हनियाँ लायेंगे | "

"नहीं मम्मा प्लीज़.... मैं तो बड़ा हो रहा हूँ पर आप लोग प्लीज़ बूढ़े मत होना |"
"हा हा हा क्यूँ बेटा.. बूढ़ा तो सबको ही होना है एक दिन "

"पर मम्मा आप लोग बूढ़े हो जाओगे और मेरी वाइफ आयेगी तो उसे भी ऐसे ही परेशान होना पड़ेगा ना.. वो भी तरह तरह के आईडिया सोचेगी कि कैसे आप लोगों को यहाँ से हटाया जाये..  नो मम्मा प्लीज़ नो..आप भी दादी की तरह हो जाओगी और मेरी वाइफ को परेशान करोगी .... . मैं ऐसा नही होने दूँगा... एक काम करूँगा.. मैं मेरी शादी होते ही आप दोनों के लिए ओल्ड ऐज होम बुक करवा दूँगा जहाँ आप लोग रह सकोगे और मैं और मेरी वाइफ भी चैन से रह लेंगे |"

"हुँ...ह.. हमारा घर है हमारे पास... तुम रहना अपने घर में अपनी वाइफ को लेकर | यही करोगे तुम... पाल पोस कर बड़ा कर रहे हैं और तुम हमें वृद्धा आश्रम भेजने की तैयारी कर रहे हो | वाह बेटा वाह... | "

"मम्मा.. मैं कहाँ कुछ गलत कह रहा हूँ | दादा दादी ने भी तो पापा बुआ को पाला पोसा ही होगा ना...सभी माँ बाप पालते हैं अपने बच्चों को, उसमें क्या नया है... . पर अब जब सब बड़े हो गये हैं तो कोई बूढ़े लोगों को अपने पास नही रखना चाहता तो भला मैं क्यूँ रखूँगा, परेशानी बढ़ाते हैं ये बूढ़े लोग | मैं भी नही रखूँगा और साइंटिस्ट बन कर कोई ऐसी दवा बनाऊँगा जिससे कि मैं कभी बूढ़ा ही ना हो पाऊँ और मेरे बच्चों को कोई ओल्ड ऐज होम ना ढूँढना पड़े |"

अपने बेटे की बातें सुन माँ के शरीर में सिहरन सी दौड़ गयी और जिन आँखो में कुछ देर पहले परेशानी, व्यथा, गुस्सा दिख रहा था उन्ही आँखो में अब शर्म पानी का रूप ले चुका थी |

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 8 March 2022


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 8 March 2022


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👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: ८

अपने आपकी समालोचना करो

जो कुछ हो, होने दो। तुम्हारे बारे में जो कहा जाए उसे कहने दो। तुम्हें ये सब बातें मृगतृष्णा के जल के समान असार लगनी चाहिए। यदि तुमने संसार का सच्चा त्याग किया है तो इन बातों से तुम्हें कैसे कष्ट पहुँच सकता है। अपने आपकी समालोचना में कुछ भी कसर मत रखना तभी वास्तविक उन्नति होगी।

प्रत्येक क्षण और अवसर का लाभ उठाओ। मार्ग लंबा है। समय वेग से निकला जा रहा है। अपने संपूर्ण आत्मबल के साथ कार्य में लग जाओ, लक्ष्य तक पहुँचोगे।

किसी बात के लिए भी अपने को क्षुब्ध न करो। मनुष्य में नहीं, ईश्वर में विश्वास करो। वह तुम्हें रास्ता दिखाएगा और सन्मार्ग सुझाएगा।

~ पं श्रीराम शर्मा आचार्य


👉 Lose Not Your Heart Day 8
Introspect


Whatever happens, let it happen. Whatever is said about you, let it be said. You should consider these things as illusory as a mirage. If you have really detached yourself from the world, then why should such things affect you? Focus on inspecting yourself thoroughly for weaknesses. Only then can you begin the process of growth.

Take advantage of every moment and every opportunity. Your path is very long, and time is very short. Concentrate your inner strength on reaching your goal.

Do not despair in any situation. Have faith not in the capacity of man, but in the capacity of God. God will show you the right path.

~ Pt. Shriram Sharma Acharya

सोमवार, 7 मार्च 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग १२

त्याग और सेवा द्वारा सच्चे प्रेम का प्रमाण दीजिए।

निःसंदेह आत्मा प्रेममय है। उसे सुख अपने विषय में ही प्राप्त होता है। मछली को पानी में आनंद है, इसके अतिरिक्त और कहीं चैन नहीं। प्राणी का मन तब तक शांति लाभ नहीं कर सकता जब तक कि वह प्रेम में निमग्न न हो जाए। जब तक प्यास नहीं बुझती तब तक हम इधर-उधर भटकते हैं और जब मधुर शीतल जल भर पेट पीने को मिल जाता है तो चित्त ठिकाने आ जाता है, संतोष लाभ करके एक स्थान पर बैठ जाते हैं। सर्प का जब पेट भर जाता है तो वह अपने बिल में प्रवेश कर जाता है, बाहर की उसे कुछ जरूरत नहीं रहती। सीप समुद्र के ऊपर उतराती फिरती है, पर जब स्वाति की बूँद उसमें पड़ जाती है तो मोती को प्राप्त करके समुद्र की तली में बैठ जाती है। आत्मा प्रेम का आनंद लूटने इस भूमण्डल पर आई है, अपनी प्रिय वस्तु को ढूँढने के इधर-उधर भटकती फिरती है। जिस दिन उसे इच्छित वस्तुएँ प्राप्त हो जाएँगी उसी दिन तृप्ति लाभ करके अपने परमधाम को लौट जाएँगी। भव भ्रमण और मुक्ति का यही धर्म है।

हमें बार-बार जन्म इसलिए धारण करना पड़ता है कि प्रेम की प्यास बुझा नहीं पाते। मोह-ममता की मृगतृष्णा में मारे-मारे फिरते हैं भव-बंधनों में उलझते फिरते हैं। जिस दिन हमें सद्गुरु की कृपा से यह समझ आ जाएगा कि जीवन का सार प्रेम है, उस दिन हम शाश्वत प्रेम को अपने अंतःकरण में से ढूँढ निकालेंगे।
 
अंतःकरण में जिस दिन प्रेम भक्ति का अविरल  स्त्रोत फूट निकलेगा, जिस दिन प्रेम गंगा में आत्मा स्नान कर लेगी, जिस दिन प्रेम का सागर हमारे चारों ओर लहरावेगा, उसी दिन आत्मा को तृप्ति मिल जाएगी और वह अपने धाम को लौट जाएगी। सच्चा प्रेमी अपने सुखों की भी इच्छा नहीं करता वरन जिस पर प्रेम करता है उसके सुख  पर अपने सुख को उत्सर्ग कर देता है। लेने का उसे ध्यान भी नहीं, देना ही एक मात्र उसका कर्त्तव्य हो जाता है। जिसके हृदय में प्रेम की ज्योति जलेगी वह गोरे चमडे पर फिसल कर अपने चमारपन का परिचय न देगा और न व्यभिचार की कुदृष्टि रखकर अपनी आत्मा को पाप पंक में घसीटेगा। वह किसी स्त्री के रंग, चमक-दमक, हाव-भाव या स्वर कंठ पर मुग्ध नहीं होगा वरन किसी देवी में उज्ज्वल कर्त्तव्य का दर्शन करेगा तो उसको झुककर प्रणाम करेगा। प्रेमी का दम तो बेकाबू हो सकता है पर दिमाग काबू में रहेगा। वह दूसरों के सुख के लिए त्याग करने में अपने को बेकाबू पावेगा परतु किसी को पतन के मार्ग पर घसीटने का स्मरण आते ही उसकी आत्मा कांप जाएगी। इस दशा में उसका एक कदम भी आगे नहीं बढ सकता। अपने प्रेम पात्र को बदनामी, पतन, दुख, भ्रम और नरक में घसीटने वाला व्यक्ति किसी भी प्रकार प्रेमी नहीं कहा जा सकता, वह तो नरक का कीड़ा है जो अपनी विषय ज्वाला में जलाने के लिए प्रेम पात्र को फँसाकर काँटों में घसीटता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ १९

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👉 भक्तिगाथा (भाग ११४)

भक्ति की श्रेष्ठतम अवस्था

भक्त विमलतीर्थ की भक्तिगाथा को सुनाते हुए महात्मा सत्यधृति को ऐसी कितनी ही बीती स्मृतियों ने उन्हें घेर लिया। इन क्षणों में उनके आस-पास बैठा हुआ ऋषियों-महर्षियों एवं देवगणों का समुदाय प्रतीक्षा कर रहा था कि महात्मा सत्यधृति कुछ कहें। लेकिन इस समय तो वह स्वयं में लीन थे। यह स्थिति काफी देर तक बनी रही। कोई कुछ नहीं बोला, बस चतुर्दिक मौन पसरा रहा। नीरवता की सघनता सब ओर व्याप्त रही। यह स्थिति पता नहीं कितनी देर तक और बनी रहती, परन्तु ब्रह्मर्षि क्रतु के शब्दों ने नीरव में रव घोल दिया। उन्होंने सत्यधृति को सम्बोधित करते हुए कहा- ‘‘महात्मन्! हम सभी आपके अनुभवों को ग्रहण करने के लिए उत्सुक हैं।’’

ब्रह्मर्षि क्रतु के इस कथन पर महात्मा सत्यधृति पहले तो मुस्कराए, फिर हल्के हास्य के साथ बोले- ‘‘हे ऋषिश्रेष्ठ! मुझे भी उत्सुकता है देवर्षि नारद के नवीन सूत्र की।’’ सत्यधृति के इस कथन के साथ ही सबकी दृष्टि देवर्षि की ओर घूम गयी जो इस समय शान्त-मौन बैठे हुए किसी चिन्तन में लीन थे। सबके इस अचानक ध्यानाकर्षण से देवर्षि के चिन्तन की कड़ियों में एक अनोखी झंकृति हुई और उन्होंने मधुर मन्द मुस्कान के साथ अपने नए सूत्र का उच्चारण किया-

‘उत्तरस्मादुत्तर-स्मात्पूर्वपूर्वा श्रेयाय भवति’॥ ५७॥
(उनमें) उत्तर-उत्तर कम से पूर्व-पूर्व की भक्ति कल्याणकारिणी होती है।

देवर्षि के इस सूत्र को सुनकर देर तक मौन बने रहे महात्मा सत्यधृति अब मुखर हो गए। उन्होंने कहना शुरू किया- ‘‘पिता महाराज की आज्ञा से मैं भक्त विमलतीर्थ से मिला था। उन्होंने अपने जीवनकाल में भक्ति के सभी रूप अनुभव किए थे। जिस समय मेरी भेंट उनसे हुई, उस समय वह गौणी भक्ति की सभी कक्षाओं को पार करके पराभक्ति में प्रतिष्ठित थे। भगवान सदाशिव का नित्य साहचर्य उन्हें प्राप्त था। उनके जीवन की प्रत्येक क्रिया, भक्ति में भीगी थी। उनके द्वारा बोला जाने वाला प्रत्येक शब्द, भक्ति के अमृतरस से सना था। उन्होंने ही आग्रहपूर्वक मुझे वह अपनी अनुभवकथा सुनायी थी, जिसे मैंने आप सभी को सुनाया।

वह स्वयं जब अपने इन बीते अनुभवों को याद करते थे, तो हँस पड़ते थे। एक दिन ऐसे ही उन्होंने मुझे हँसते हुए कहा था- पुत्र! जीव का जीवन और जगत सब का सब, सदाशिव की लीला ही है। लेकिन यह लीला तब तक समझ में नहीं आती जब तक जीवात्मा प्रकृति के गुणों के प्रबली सम्मोहन में रहती है। जैसे-जैसे यह सम्मोहन हटता है, वैसे-वैसे अनुभव होता है कि तामसी भक्ति से राजसी भक्ति श्रेष्ठ है, राजसी भक्ति से सात्त्विकी भक्ति श्रेष्ठ है और इन सभी तीनों से पराभक्ति श्रेष्ठ है क्योंकि इसमें कोई आकांक्षा नहीं है। पराभक्ति की अवस्था विशुद्ध भगवान व भक्त के परस्पर प्रेम की अवस्था है। यहाँ किसी तरह का कोई लेन-देन नहीं है। भक्त इस अवस्था में सहज अनुभव करता है कि जीवन की सभी घटनाएँ भगवान की लीला के सिवाय और कुछ भी नहीं।

इस स्पष्ट अनुभव के बाद जीवन की सोच, जीवन की दृष्टि एवं जीवन के अनुभव सभी बदल जाते हैं। उस अवस्था में दुःख और सुख दोनों ही अपना अस्तित्त्व खो देते हैं। दुःख में दुःख का अहसास नहीं होता और सुख अपना कोई आकर्षण मन पर जमा नहीं पाता। बस एक सत्य जीवन के प्रत्येक घटनाक्रम में समाया दिखता है कि इन सभी घटनाओं में से प्रत्येक चित्तशुद्धि के लिए आवश्यक है। यदि इनमें से किसी भी घटनाक्रम को रोका गया तो चित्त की सम्पूर्ण शुद्धि न हो सकेगी और ऐसा हुए बगैर भक्ति की समग्रता जीवन में फलित न होगी।’’

महात्मा सत्यधृति ने देवर्षि नारद की ओर मीठे स्नेह से देखते हुए कहा- ‘‘हे देवर्षि! आप तो भगवान नारायण को परमप्रिय हैं। आप तो भक्ति के तत्त्व के परम ज्ञाता और विशद् मर्मज्ञ हैं। जबकि मेरा निजी अनुभव कुछ विशेष नहीं है। बस मैंने तो अपने जीवनकाल में प्रभुभक्तों के अनुभवों को सुना, बटोरा और स्वयं में इन्हें बोया और सींचा है। इन अनुभवों की कथा, विशेष तौर पर भक्त विमलतीर्थ के संग ने मुझे भक्ति का पावन स्पर्श प्रदान किया है। उन्हीं से मैंने यह जाना है कि आकांक्षा कोई भी और कैसी भी क्यों न हो, उससे भक्ति का  स्वरूप कभी निखर नहीं पाता। आकांक्षा का कोई भी रूप, प्यार को व्यापार में बदल देता है और इससे भक्ति की निष्कपट भावनाएँ दूषित एवं विक्षुब्ध हो जाती हैं।

इसीलिए तामसी भक्ति से राजसी भक्ति कहीं ज्यादा उचित है। जबकि राजसी से सात्त्विक भक्ति कहीं अधिक औचित्यपूर्ण है। और पराभक्ति! यहाँ तो आकांक्षा का निशान ही नहीं है। इसलिए यह श्रेष्ठतम है। जो इस अवस्था में जीता है, उसमें ही यथार्थ भक्ति प्रतिष्ठित है। यहाँ तो बस कृतज्ञता है, प्रार्थना है, अस्तित्त्व का अर्पण है, व्यक्तित्व का विसर्जन है, सर्वस्व का समर्पण है। यहाँ बूंद का सागर में स्वाभाविक विलय है। इस अवस्था में भक्त का रोम-रोम अनुभव करता है-

क्या पूजन क्या अर्चन रे!
पदरज को धोने उमड़े आते  
लोचन में जलकण रे!
अक्षत पुलकित रोम,
मधुर मेरी पीड़ा का कम्पन रे!
क्या पूजन क्या अर्चन रे!’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २२८

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 7 March 2022


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 7 March 2022


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👉 जानवर भी सिखाते है प्यार की भाषा

हर व्यक्ति के जीवन मे, उसके रिश्तो मे कभी न कभी उतार-चढाव अवश्य आते है। कुछ लोग अपने प्रेम, धैर्य व समझदारी से हर रिश्ते को आसानी से संजो लेते हैँ, वही कुछ लोग रिश्तोँ व प्यार मे खरे उतरने मे नाकाम हो जाते है। अगर आप भी रिश्तो को सम्भालने मे असमर्थ महसूस करते है तो एक बार अपने पालतू जानवर की ओर नजर घुमाकर देखिए। वह भी आपको प्यार का पाठ पढाएंगे। जरूरी नही है कि आप प्यार की भाषा सीखने के लिए किसी डॉक्टर या विशेषज्ञ के कमरे मे घंटो बिताएँ। आप चाहे तो इन पालतू जानवरो से भी बहुत कुछ सीख सकते है !

शर्तो मे रिश्ता नही

प्रेम व रिश्ते कभी भी शर्तो के आधार पर नही बनते। जिन रिश्तो मे शर्ते होती है, उनका लम्बे समय तक टिकना बेहद ही मुश्किल होता है। आपके पालतू जानवर भी जब आपको प्रेम देते है या आपके लिए कोई कार्य करते है तो उसके पीछे उनका कोई मकसद या शर्त नही होती। इतना ही नही, वह अपने फायदे के लिए न तो आपको धोखा देते है और न ही झूठ बोलते है। एक बार सोच कर देखिए कि यदि आपके रिश्ते भी इतने ही पाक हो तो वह आपको कितना सुकून पहुंचाएंगे।

सीखे माफ करना

दुनिया मे ऐसे बहुत कम मनुष्य ही है जो आसानी से दूसरो को माफ कर पाते है। गलतियाँ सभी से होती है, इसलिए उन्हे माफ करना भी सीखेँ। जिस मनुष्य मे क्षमा करने का गुण नही है तो वह दूसरो का नही बल्कि खुद का जीवन ही बेहद कठिन बना लेता है। लेकिन जानवर ऐसे नही होते। अगर आप कभी अपने पालतू जानवर को डांट भी दे तो भी वह आपसे गुस्सा नही होते बल्कि वह लौटकर आपके पास आते है और आपको बेशुमार प्यार करते हैँ।

समय से सीचे प्रेम

आपने कभी नोटिस किया है कि जब भी आप घर पर होते है तो आपके प्यारे पालतू आपको एक पल के लिए भी अकेला नही छोडते। किचन से लेकर ड्राइंग रूम यहाँ तक कि बेडरूम मे भी अक्सर वह आपके साथ खेल रहे होते है। चाहे आप परेशान हो या खुश, वह आपके साथ हर फीलिंग शेयर करते है। इतना ही नही, उनके साथ समय बिताकर आप अपनी परेशानी भूलकर एकदम फ्रेश हो जाते है। लेकिन रिश्तो को समय देने के लिए आपके पास वक्त नही होता। एक बात गांठ बान्ध ले कि जब तक आप अपने रिश्ते रूपी पौधे को समय व प्रेम की खाद से नही सीचेंगे तो वह कभी भी मजबूत पेड नही बनेगा।

रहे रियल

मनुष्य अपना जीवन कई मुखौटो के साथ जीता है, फिर चाहे बात घर की हो या बाहर की। हर जगह के लिए हमारे पास एक मुखौटा है। मुखौटो के साथ जीवन जीते हुए हम अपने वास्तविक चेहरे को ही नही पहचान पाते। लेकिन जानवर हमेशा रियल ही होते हैँ। वह जगह, लोग और अपनी सुविधा के अनुसार अपना व्यक्तित्व व व्यवहार नही बदलते। एक बार आप भी अपने रिलेशनशिप मे रियल होकर देखिए। यकीनन आपको प्यार की एक नई परिभाषा देखने को मिलेगी और आप पहले से काफी खुश रहना सीख जाएंगे।

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: ७

मार्गदर्शन के लिए अपनी ही ओर देखो

साक्षात्कार संपन्न पुरूष न तो दूसरों को दोष लगाता है और न अपने को अधिक शक्तिमान वस्तुओं से आच्छादित होने के कारण वह स्थितियों की अवहेलना करता है।

अहंकार से उतना ही सावधान रहो जितना एक पागल कुत्ते से। जैसे तुम विष या विषधर सर्प को नहीं छूते ,, उसी प्रकार सिद्धियों से अलग रहो और उन लोगों से भी जो इनका प्रतिवाद करते हैं। अपने मन और हृदय की संपूर्ण क्रियाओं को ईश्वर की ओर संचारित करो।

दूसरों का विश्वास तुम्हें अधिकाधिक असहाय और दु:खी बनाएगा। मार्गदर्शन के लिए अपनी ही ओर देखो, दूसरों की ओर नहीं ।। तुम्हारी सत्यता तुम्हें दृढ़ बनाएगी। तुम्हारी दृढ़ता तुम्हें लक्ष्य तक ले जाएगी।

~ पं श्रीराम शर्मा आचार्य


👉 Lose Not Your Heart Day 7
Look to Yourself for Guidance

One who knows himself to be part of God neither blames failure on others nor attributes success to himself. He does not become blinded by his own power and fail to see the real situation. Be as cautious of your own ego as you would of a rabid dog. Avoid attachment to your achievements as you would avoid a poisonous snake, and avoid people who will mock you for this. Direct every effort of your mind and heart towards God.

Depending on others for your happiness ultimately leads to helplessness and misery. Look within yourself for direction and not to others. Your true nature will help you become determined, and this determination will help you each your goal.

~ Pt. Shriram Sharma Acharya

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👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: ६

आत्म समर्पण करो

तुम्हें यह सीखना होगा कि इस संसार में कुछ कठिनाइयाँ हैं जो तुम्हें सहन करनी हैं। वे पूर्व कर्मों के फलस्वरूप तुम्हें अजेय प्रतीत होती हैं। जहाँ कहीं भी कार्य में घबराहट, थकावट और निराशाऐं हैं, वहाँ अत्यंत प्रबल शक्ति भी है। अपना कार्य कर चुकने पर एक ओर खड़े होओ। कर्म के फल को समय की धारा में प्रवाहित हो जाने दो।

अपनी शक्ति भर कार्य करो और तब अपना आत्मसमर्पण करो। किन्हीं भी घटनाओं में हतोत्साहित न हेाओ। तुम्हारा अपने ही कर्मों पर अधिकार हो सकता है। दूसरों के कर्मों पर नहीं। आलोचना न करो, आशा न करो, भय न करो, सब अच्छा ही होगा ।। अनुभव आता है और जाता है। खिन्न न होओ। तुम दृढ़ भित्ति पर खड़े हुए हो।

 ~ पं श्रीराम शर्मा आचार्य


👉 Lose Not Your Heart Day 6
Surrender Yourself

You must be prepared to face hardships in your life. You may be predisposed to feel that you cannot face them, but where you find doubt, tiredness, and despair in yourself, you will also find immense strength. Finish your work wholeheartedly and step aside. Let the results come to you in due course of time.

Work to your full potential. Do not get discouraged by any situation. The only actions you can control are your own, not those of others. Do not criticize others, and do not hold any expectations of them. There is no need to be afraid; everything will turn out for the best. Do & note despair. You are standing on firm ground.

 ~ Pt. Shriram Sharma Acharya

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शनिवार, 5 मार्च 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग ११

त्याग और सेवा द्वारा सच्चे प्रेम का प्रमाण दीजिए।

मैंने इतना प्यार दिया पर इसका बदला मुझे क्या मिला?'' ऐसे विचार करने में उतावली न कीजिए। बादलों को देखिए वे सारे संसार पर जल बरसाते फिरते हैं, किसने उसके अहसान का बदला चुका दिया? बडे-बडे भूमि खंडों का सिंचन करके उनमें हरियाली उपजाने वाली नदियों के परिश्रम की कीमत कौन देता है? हम पृथ्वी की छाती पर जन्म भर लदे रहते हैं और उसे मल-मूत्र  से गंदी करते रहते हैं किसने उसका मुआवजॉ अदा किया है। वृक्षों से फल, छाया, लकड़ी पाते हैं पर उन्हें क्या कीमत देते हैं? परोपकार स्वयं ही एक बदला है। त्याग करना आपको भले ही घाटे का सौदा प्रतीत होता हो पर जब आप उपकार करने का अनुभव स्वयं करेंगे तो देखेंगे कि ईश्वरीय वरदान की तरह यह दिव्य गुण स्वयं ही कितना शांतिदायक है, हृदय को कितनी महानता प्रदान करता  है। उपकारी जानता है कि मेरे कार्यों से जितना लाभ दूसरों का होता है उससे  कई गुना स्वयं मेरा होता है। ज्ञानवान पुरुष जो कमाते हैं वह दूसरों को बाँट देते हैं, वे सोचते हैं कि प्रकृति जब जीवन वस्तु मुफ्त दे रही है तो हम अपनी फालतू चीजें दूसरों को देने में कंजूसी क्यों करें ? आप बुरे दिनों और विपत्ति की घड़ियों में भी परोपकार के दिव्य गुण का परित्याग मत कीजिए। जब आप किसी को भौतिक पदार्थ देने में असमर्थ हो तो भी अपनी सद्भावनाएँ  और शुभकामनाएँ दूसरों को देते रहिए।

निःस्वार्थ भावना से जीवन व्यतीत करने वाले के लिए संसार में निरुत्साह, पश्चाताप और दुःख की कोई बात नहीं है। आप जरा सी बात के आवेश में आकर लडने-मरने पर उतारू मत हूजिये वरन अपने विरोधियों पर दया और प्रेम की वर्षा करते रहिए।
 
सद्भावना से दिव्य- दृष्टि मिलती है। जिसके हृदय में समस्त प्राणियों के प्रति सद्भावना भरी हुई है यथार्थ में वही दिव्य ज्ञान का अधिकारी है। मनुष्यों' में देवता वह है जो पवित्र है, निःस्वार्थ है, प्रेमी है, त्याग भावी है। अपन शारीरिक स्वार्थो को परित्याग करने के उपरांत जो संतोष प्राप्त होता है,वह चक्रवर्ती राजा हो जाने के सुख से भी हजारों गुना अधिक है। इसलिए आप स्वार्थ को त्यागने का अभ्यास आरम्भ कीजिए। ज्ञान के द्वारा अपनी पाशविक कंजूस वृत्ति को काबू में लाने का प्रयत्न करिए। तुच्छ स्वार्थों के गुलाम बनने से इंकार कर दीजिए। नम्रता, भलमनसाहत, क्षमा, दया, प्रेम और त्याग भावना को अंदर धारण करने से हृदय में शाश्वत शांति का आविर्भाव होता है। स्वार्थ रहित प्रेम के इस महान नियम में अपने को केंद्रस्थ करना मानो संतोष, शीतलता, विश्राम और ईश्वर को प्राप्त करने के मार्ग पर पदार्पण करना है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ १७

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👉 भक्तिगाथा (भाग ११४)

भक्ति की श्रेष्ठतम अवस्था

भक्त विमलतीर्थ की गाथा कहते हुए महात्मा सत्यधृति अपनी बीती यादों में लीन होने लगे। अन्तर्चेतना के झरोखे से उन्हें अपना अतीत याद आने लगा। वह पुरातन अतीत जब वे भारत की धरती पर सम्राट थे। महावैभवशाली साम्राज्य के प्रतापी सम्राट। वह सतयुग और त्रेतायुग की सन्धि बेला थी। कालचक्र सतयुग को विदाई दे रहा था और त्रेतायुग की अगवानी करने के लिए तत्पर था।

युगसन्धि के इसी अवसर पर महाराज सत्यधृति ने शासन सूत्र की बागडोर अपने हाथ में ली। उनके पिता शीलधृति भी तेजस्वी सम्राट थे। राजा होते हुए भी उनका आचरण ऋषियों की भाँति था। भूमण्डल के अन्य सभी नरेश उन्हें अपना संरक्षक मानने में गौरव अनुभव करते थे। ऋषि-महर्षियों के समुदाय में भी उनकी बड़ी प्रतिष्ठा थी। वे सभी मानते और अनुभव करते थे कि सम्राट शीलधृति ज्ञान-शिरोमणि हैं।

ऐसे महान् राजर्षि शीलधृति ने राज्य शासन का सूत्र-संचालन अपने प्रिय पुत्र को सौंपते हुए कहा- ‘‘वत्स! अब तक मैंने भगवान नारायण की कृपा और अपने विवेक से अपने दायित्व का यथाशक्ति निर्वहन किया है, अब बारी तुम्हारी है। पद, प्रतिष्ठा व प्रभुता पाकर सहज ही व्यक्तित्व में अहंता, वासना, तृष्णा के नाग फुंकारने लगते हैं। इनके महाविष से व्यक्तित्व को विषैला होते देर नहीं लगती। इस विषय से छुटकारा आसान नहीं है। केवल भगवद्भक्तों का सान्निध्य, भक्त और भगवान के चरणों में अविरल भक्ति के अमृत रस से ही इस विष का शमन सम्भव है।’’ इतना कहने के बाद सम्राट शीलधृति ने पुत्र सत्यधृति के सिर पर स्नेह भरा हाथ रखते हुए कहा- ‘‘वत्स! श्रेष्ठ सम्राट वही है जो शक्ति व सत्ता को केवल सेवा का साधन माने। ज्ञान और ज्ञानियों का समादर करे, किन्तु भक्त, भक्ति व भगवान को सर्वथा एक मान उन्हें अपना सर्वस्व मानना।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २२७

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समय नहीं मिलता” कहना छोडें

दुनिया में ऐसा कोई नही जो अपने जीवन में कुछ अच्छा करने की ना सोचता हो या फिर महान बनना ना चाहता हो. लेकिन विडंबना यह है कि हमें उसके लिए वक्त ही नही मिलता. हर दिन हम अपने लिए एक अच्छी रूटीन बनाते है – कि हम आज ऐसा करेंगे, आज उससे मिलेंगे, कुछ नया सीखेंगे या अपने लक्ष्य की तरफ थोड़ा आगे बढ़ने का प्रयास करेंगे. लेकिन वास्तविकता से आप भी परिचित है, ऐसा कुछ ना कर पाने का हम एक ही बहाना देते है कि ”हमारे पास अभी टाइम ही नही है, फिर कभी कोशिश करेंगे.” यह बात भी हम भली भाती जानते है – हम चाहें आगे बढ़े या ना बढ़े लेकिन समय किसी के लिए नही रुकता. इसलिए सदैव समय का सदुपयोग करें, यह आपके ही हाथ में है.

समय नही मिलता, आपकी इस धारणा को आज हम ऐसे रियल लाइफ कुछ रोचक उदाहरण से दूर करने की कोशिश करेंगे. जिसे पढ़कर आप सच में Inspire होंगे. ये उदाहरण हमें समय की कीमत तो समझाते ही है, साथ में यह भी बताते है कि व्यक्ति चाहें कितना भी व्यस्त क्यों ना हो वह अपने मनपसंद कार्य या लक्ष्य की ओर कैसे आगे बढ़ें.

तो आइये, आपको ऐसे कुछ वास्तविक उदाहरण से रूबरू कराते है –

1. ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जब कॉलेज जाते थे तो रास्ते के दुकानदार अपनी घड़ियाँ उन्हें देखकर ठीक करते थे. क्योंकि वे जानते थे कि विद्यासागर समय के बहुत पाबंद थे, वे कभी एक मिनट भी आगे-पीछे नहीं चलते थे।

2. USA के famous Mathematician Charles F ने रोजाना केवल एक घंटा Maths सीखने का नियम बनाया था और उस नियम पर अंत तक डटे रहकर ही उन्होंने Maths में महारथ हासिल कि थी।

3. Gallileo के medical shop होते हुए भी उन्हेंने थोडा-थोडा वक्त बचाकर विज्ञानं के महत्वपूर्ण आविष्कार कर डाले।

4. महात्मा गाँधी दातुन करने से पूर्व शीशे पर गीता का श्लोक चिपका लिया करते थे और दातुन करते समय याद कर लिया करते थे. इस तरह से समय का सदुपयोग करते हुए उन्होंने गीता के 13 अध्याय याद कर लिए।

5. Napolean ऑस्ट्रिया को इसलिए हरा पाया, क्योंकि वहां के सैनिक उसका सामना करने के लिए पाँच मिनट देरी से आये थे।

6. Henry Kirak ने घर से ऑफीस तक पैदल आने-जाने के दौरान समय का सदुपयोग करके Greek सीख ली थी. फौजी डॉक्टर बनने के बाद उनका अधिकांश समय घोड़े की पीठ पर बीतता था. उन्होंने उस समय भी Italian और French भाषा का ज्ञान भी प्राप्त किया।

7. रोज चाय बनाने में जितना समय लगता है, उस दौरान उसमे व्यर्थ न बैठकर लान्गफैले ने इन्फरल ग्रन्थ का अनुवाद कर लिया था।

8. हर घडी उपयोगी कार्य में लगे रहना मोजार्ट ने अपने जीवन का आदर्श बना लिया था. अपने इसी आदर्श पर डटे रहकर उन्होंने रैक्युम नामक फेमस ग्रन्थ को मौत से लड़ते-लड़ते पूरा किया।

आपको यह बहुत ही काल्पनिक लगता होगा पर यह बिल्कुल चौका देने वाले सच है. कोई रोज एक घंटे मात्र पढ़कर एक्सपर्ट बन गया, तो किसी ने पैदल चलने के समय का भी सदुपयोग किया, तो किसी ने चाय बनने के समय का भी उपयोग किया, कोई पाँच मिनट की देरी से हार जाता है, तो कोई ऐसे है कि लोग अपनी घड़ी से ज्यादा उनके समय की पाबंदी पर भरोसा करते थे और कोई ऐसे भी है जो मौत से लड़ते-लड़ते भी ग्रंथ लिख दिया.

जब यह लोग उसी 24 घंटे के समय में इतना कुछ कर सकते हैं तो अब यह प्रश्न उठता है कि आखिर हमारा समय बर्बाद कहां हो रहा है?
 
यकीन मानिए, हमें हमारे लक्ष्य को हासिल करने के लिए जीतने समय कि आवश्यकता है, उससे कहीं ज्यादा समय हमारे पास होता है. बस जरुरत है उस अमूल्य समय को बर्बाद होने से बचाने की. हमेशा इस बात का स्मरण रखे ”समय का सदुपयोग आपके ही हाथ में है!”

यह प्रचलित कहावत तो आपने कई बार सुनी होगी – ”काल करै सो आज कर, आज करै सो अब, पल में परले होइगी, बहुरि करेगा कब।”

अब समय है उपरोक्त कथन को जीवन में उतारने का.

आपको इन Examples में से जो भी प्रेरणादायक लगे उन्हें चुनकर एक स्लिप पर लिख लें और ऐसी जगह पर चिपका दें, जहाँ आपकी नजर बड़ी आसानी से जा सके, जिससे आप रोज इन्हे पढ़कर Inspire हो सकें. आप चाहें कितने भी Time Management टिप्स पढ़ लें. लेकिन आपको सबसे पहले स्वयं की आदत में बदलाव लाना होगा और वो है किसी काम को टालने की आदत. याद रखिये, किसी काम को समय पर करना उतना तकलीफ नहीं देता जितना उसको टालना. बस इस Tip को फॉलो करते ही आप बन जायेंगे एक Smart Time Manager।

हम मानते है, आप पहले भी समय का सही सदुपयोग करने का अथक प्रयास कर चुके होंगे और सफल भी हुए होंगे. लेकिन जो सफल नही हुए उनके पास हमेशा एक और मौका होता है. इस लिए सुबह उठते ही 10 से 15 मिनट में आप पुरे दिन का एक Time-Table बना लीजिए. अक्सर हम उत्साह में आकर Time-Table को बहुत ही कठिन बना लेते हैं. जिसे हम बहुत लंबे समय तक फॉलो नही कर पाते और अपने लक्ष्य से भटक जाते है. इसलिए हमेशा Time-Table साधारण ही बनाना चाहिए, ताकि आप इसमें Successful होकर खुद को Self-Motivate कर सकें।

दोस्तों, ब्रूस ली ने समय की कीमत को समझते हुए कहा है – ”अगर आप अपनी ज़िन्दगी से प्यार करते हैं तो वक़्त बर्वाद ना करें, क्योंकि वो वक़्त ही है जिससे ज़िन्दगी बनी होती है।”

तो चलिए, एक बार फिर समय के महत्त्व को महत्त्व देते हैं, और ”समय नही मिलता” कहना छोड़ कर उन चीजों के लिए वक़्त निकाले जो सचमुच में ज़रूरी है।

हम हर पल यह प्रयास करते है कि कुछ ऐसे लेख आपको दे जिससे आपको भी अपने जीवन में प्रेरणा मिलें और आप भी आगे बढ़े. आप अपने विचार कॉमेंट के द्वारा शेयर करें. आशा करते है यह लेख आपकी ज़रूर मदद करेगा. आपको यह लेख कैसा लगा? ज़रूर बताएं. आपकी प्रतिक्रिया हमारा उत्साह बढ़ाती है, हमें और भी बेहतर होने में मदद व प्रेरणा देती है।

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👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: ५

हँसते रहो, मुस्कराते रहो

उठो! जागो! रूको मत!!! जब तक की लक्ष्य न प्राप्त हो जाए। कोई दूसरा हमारे प्रति बुराई करे या निंदा करे, उद्वेगजनक बात कहे तो उसको सहन करने और उसे उत्तर न देने से बैर आगे नहीं बढ़ता। अपने ही मन में कह लेना चाहिए कि इसका सबसे अच्छा उत्तर है मौन। जो अपने कर्तव्य कार्य में जुटा रहता है और दूसरों के अवगुणों की खोज में नहीं रहता है उसे आंतरिक प्रसन्नता रहती है।

जीवन में उतार- चढ़ाव आते ही रहते हैं।

हँसते रहो, मुस्कुराते रहो।

ऐसा मुख किस काम का जो हँसे नहीं ,, मुस्कराए नहीं।

जो व्यक्ति अपनी मानसिक शक्ति स्थिर रखना चाहते हैं उनको दूसरों की आलोचनाओं से चिढऩानहीं चाहिए।

~ पं श्रीराम शर्मा आचार्य


👉 Lose Not Your Heart Day 5
Keep Smiling, Keep Laughing

Wake up! Do not rest until you have achieved your goal. If you regard gossip and ill-will as trivial and refuse to acknowledge them, hostility will not increase. For such things, silence is the best response. True happiness comes from focusing on one's duty rather than on shortcomings in others.

Life is full of ups and downs, but we must always remain cheerful. What good is a face that cannot smile or laugh? Do not be irritated by, criticism from others, and you will retain your mental equilibrium.

~ Pt. Shriram Sharma Acharya


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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 5 March 2022


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 5 March 2022



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शुक्रवार, 4 मार्च 2022

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: ४

जीवन को यज्ञमय बनाओ

मन में सबके लिए सद्भावनाएँ रखना, संयमपूर्ण सच्चरित्रता के साथ समय व्यतीत करना, दूसरों की भलाई बन सके उसके लिए प्रयत्नशील रहना, वाणी को केवल सत्प्रयोजनों के लिए ही बोलना, न्यायपूर्ण कमाई पर ही गुजारा करना, भगवान का स्मरण करते रहना, अपने कर्तव्य पथ पर आरूढ़ रहना, अनुकूल- प्रतिकूल परिस्थितियों में विचलित न होना- यही नियम हैं जिनका पालन करने से जीवन यज्ञमय बन जाता है। मनुष्य जीवन को सफल बना लेना ही सच्ची दूरदर्शिता औरबुद्धिमता है।

जब तक हम में अहंकार की भावना रहेगी तब तक त्याग की भावना का उदय होना कठिन है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य


👉 Lose Not Your Heart Day 4
Make Your Life an Offering

To make your life an offering, make sure that you comply with the following:

•    See every person as worthy of kindness.
•    Utilize your time with honesty and discipline.
•    Work for the welfare of others.
•    Limit your speech to worthy causes.
•    Accept only that which you have honestly earned.
•    Constantly keep God in your thoughts.
•    Stay focused on your duties.
•    Maintain your mental equilibrium.

Making your life an offering is the sign of true intelligence and farsight. Your life cannot truly be considered an offering until you give up your ego.

~ Pt. Shriram Sharma Acharya

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👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: ३

अंतरात्मा का सहारा पकड़ो

यदि तुम शांति, सामर्थ्य और शक्ति चाहते हो तो अपनी अंतरात्मा का सहारा पकड़ो। तुम सारे संसार को धोखा दे सकते हो किंतु अपनी आत्मा को कौन धेाखा दे सका है। यदि प्रत्येक कार्य में आप अंतरात्मा की सम्मति प्राप्त कर लिया करेंगे तो विवेक पथ नष्ट न होगा ।। दुनियाँ भर का विरोध करने पर भी यदि आप अपनी अंतरात्मा का पालन कर सकें तो कोई आपको सफलता प्राप्त करने से नहीं रोक सकता।

जब कोई मनुष्य अपने आपकेा अद्वितीय व्यक्ति समझने लगता है और अपने आपको चरित्र में सबसे श्रेष्ठ मानने लगता है, तब उसका आध्यात्मिक पतन होता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य


👉 Lose Not Your Heart Day 3
Take Refuge in Your Conscience

If you desire peace, capabilities, and energy, then take refuge in your conscience. Even if you deceive the entire world, you will never be able to deceive your conscience. If you consult it on every occasion, you will never lose your ability for moral discretion, and no matter the opposition, you will be able to succeed.

When you begin to think of yourself as the most virtuous and exemplary individual, your spiritual decay begins and you lose contact with your conscience.

~Pt. Shriram Sharma Acharya

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👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: २

मानवमात्र को प्रेम करो

हम जिस भारतीय संस्कृति, भारतीय विचारधारा का प्रचार करना चाहते हैं, उससे आपके समस्त कष्टों का निवारण हो सकता है। राजनीतिक शक्ति द्वारा आपके अधिकारों की रक्षा हो सकती है। पर जिस स्थान से हमारे सुख- दु:ख की उत्पत्ति होती है उसका नियंत्रण राजनीतिक शक्ति नहीं कर सकती। यह कार्य आध्यात्मिक उन्नति से ही संपन्न हो सकता है।

मनुष्य को मनुष्य बनाने की वास्तविक शक्ति भारतीय संस्कृति में ही है। यह संस्कृति हमें सिखाती है कि मनुष्य- मनुष्य से प्रेम करने को पैदा हुआ है, लडऩे- मरने को नहीं। अगर हमारे सभी कार्यक्रम ठीक ढंग से चलते रहें तो भारतीय संस्कृति का सूर्योदय अवश्य होगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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