शनिवार, 15 जनवरी 2022

👉 असली शांति

एक राजा था जिसे चित्रकला से बहुत प्रेम था। एक बार उसने घोषणा की कि जो कोई भी चित्रकार उसे एक ऐसा चित्र बना कर देगा जो शांति को दर्शाता हो तो वह उसे मुँह माँगा पुरस्कार देगा।

निर्णय वाले दिन एक से बढ़ कर एक चित्रकार पुरस्कार जीतने की लालसा से अपने-अपने चित्र लेकर राजा के महल पहुँचे। राजा ने एक-एक करके सभी चित्रों को देखा और उनमें से दो चित्रों को अलग रखवा दिया। अब इन्ही दोनों में से एक को पुरस्कार  के लिए चुना जाना था।

पहला चित्र एक अति सुंदर शांत झील का था। उस झील का पानी इतना स्वच्छ  था कि उसके अंदर की सतह तक दिखाई दे रही थी। और उसके आस-पास विद्यमान हिमखंडों की छवि उस पर ऐसे उभर रही थी मानो कोई दर्पण रखा हो। ऊपर की ओर नीला आसमान था जिसमें रुई के गोलों के सामान सफ़ेद बादल तैर रहे थे। जो कोई भी इस चित्र को देखता उसको यही लगता कि शांति को दर्शाने के लिए इससे अच्छा कोई चित्र हो ही नहीं सकता। वास्तव में यही शांति का एक मात्र प्रतीक है।

दूसरे चित्र में भी पहाड़ थे, परंतु वे बिलकुल सूखे, बेजान, वीरान थे और इन पहाड़ों के ऊपर घने गरजते बादल थे जिनमें बिजलियाँ चमक रहीं थीं…घनघोर वर्षा होने से नदी उफान पर थी… तेज हवाओं से पेड़ हिल रहे थे… और पहाड़ी के एक ओर स्थित झरने ने रौद्र रूप धारण कर रखा था। जो कोई भी इस चित्र को देखता यही सोचता कि भला इसका ‘शांति’ से क्या लेना देना… इसमें तो बस अशांति ही अशांति है।

सभी आश्वस्त थे कि पहले चित्र बनाने वाले चित्रकार को ही पुरस्कार मिलेगा। तभी राजा अपने सिंहासन से उठे और घोषणा की कि दूसरा चित्र बनाने वाले चित्रकार को वह मुँह माँगा पुरस्कार देंगे। हर कोई आश्चर्य में था!

पहले चित्रकार से रहा नहीं गया, वह बोला, “लेकिन महाराज उस चित्र में ऐसा क्या है जो आपने उसे पुरस्कार देने का फैसला लिया… जबकि हर कोई यही कह रहा है कि मेरा चित्र ही शांति को दर्शाने के लिए सर्वश्रेष्ठ है?”

“आओ मेरे साथ!”, राजा ने पहले चित्रकार को अपने साथ चलने के लिए कहा।दूसरे चित्र के समक्ष पहुँच कर राजा बोले, “झरने के बायीं ओर हवा से एक ओर झुके इस वृक्ष को देखो। उसकी डाली पर बने उस घोंसले को देखो… देखो कैसे एक चिड़िया इतनी कोमलता से, इतने शांत भाव व प्रेमपूर्वक अपने बच्चों को भोजन करा रही है…”

फिर राजा ने वहाँ उपस्थित सभी लोगों को समझाया, “शांत होने का अर्थ यह नहीं है कि आप ऐसी स्थिति में हों जहाँ कोई शोर नहीं हो…कोई समस्या नहीं हो… जहाँ कड़ी मेहनत नहीं हो… जहाँ आपकी परीक्षा नहीं हो… शांत होने का सही अर्थ है कि आप हर तरह की अव्यवस्था, अशांति, अराजकता के बीच हों और फिर भी आप शांत रहें, अपने काम पर केंद्रित रहें… अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर रहें।”

अब सभी समझ चुके थे कि दूसरे चित्र को राजा ने क्यों चुना है।
 
मित्रों, हर कोई अपने जीवन में शांति चाहता है। परंतु प्राय: हम ‘शांति’ को कोई बाहरी वस्तु समझ लेते हैं, और उसे दूरस्थ स्थलों में ढूँढते हैं, जबकि शांति पूरी तरह से हमारे मन की भीतरी चेतना है, और सत्य यही है कि सभी दुःख-दर्दों, कष्टों और कठिनाइयों के बीच भी शांत रहना ही वास्तव में शांति है।

👉 तटस्थ रहिए—दुःखी मत हूजिये (भाग १)

‘‘संसार-दुख-सागर है’’—ऐसी मान्यता रखने वाले प्रायः वे ही लोग हुआ करते हैं जो अपनी दुर्बलताओं के कारण संसार में सुख-दर्शन नहीं कर पाते। उनकी यह मान्यता ही बतलाती है कि वे कितने दुखी रहने वाले व्यक्ति होंगे। ऐसे व्यक्तियों के लिये संसार की प्रत्येक क्रिया-प्रतिक्रिया, प्रत्येक परिस्थिति तथा घटना दुःख-दायी ही होती है—और होनी भी चाहिये। जिसका विश्वास बन चुका है कि संसार दुःख-सागर है उसे इस दुनिया में सिवाय दुःख के और क्या हाथ आ सकता है? ऐसी निराशापूर्ण भावना बना लेने वाला जीवन भर रोने, झींखने, चिढ़ाने और कुढ़ाने के अतिरिक्त और कर ही क्या सकता है? दूसरे को हंसते, खेलते, खाते-पीते, बोलते, बात करते और प्रसन्न रहते देख कर ईर्ष्या करता और मन ही मन जलता रहता है। ऐसे व्यक्ति को औरों का हंसना, बोलना अपने पर व्यंग मालूम होता है, अपना उपहास-सा प्रतीत होता है। हंसना, बोलना ही नहीं दूसरों का रोना धोना भी उसे अच्छा नहीं लगता। किसी का हंसना, प्रसन्न होना तो ईर्ष्या के कारण नहीं भाता और खुद के दुःख को उत्तेजित करने के कारण किसी के रोने-धोने में भी बुरा मानता है। निःसन्देह, ऐसे दुःख-प्रवण व्यक्तियों का जीवन एक भयंकर अभिशाप बन जाता है।

दुःखों के कारणों में दुर्भावनायें भी बहु बड़ा कारण है। दुर्भावनायें एक भयंकर रोग की तरह हैं। जिसको लग जाती हैं, जिसके हृदय में बस जाती हैं, उसे कहीं का नहीं रखती हैं। दुर्भावना वाले व्यक्ति का जीवन प्रतिक्षण दुःखी रहता है।

दुर्भावनाओं में अधिकतर दूसरों का अहित करने का ही भाव निहित रहता है। दुर्भावनाओं वाला व्यक्ति किसी का थोड़ा-सा भी अभ्युदय नहीं देख सकता। किसी के अभ्युदय से अपनी कोई हानि न होने पर भी ऐसा व्यक्ति यही प्रयत्न करता है कि अमुक व्यक्ति की उन्नति न हो, विकास न हो, उसे कोई सफलता न मिले। किन्तु जो प्रयत्नशील है, परिश्रम कर रहा है उसकी उन्नति तो होती है। ऐसी दशा में रोड़े अटकाने, कोसने अथवा चाहने पर भी जब किसी की उन्नति नहीं रोक पाता तो दुर्भावी व्यक्ति के लिये जलने, कुढ़ने तथा दुःखी होने के अतिरिक्त और कोई चारा ही नहीं रह जाता। इस प्रकार दुर्भावना रखने वाला व्यक्ति दुहरा दुःख पाता है—एक तो किसी का अहित चाहने पर भी उसकी असफलता तथा आत्म-प्रतारणा दण्डित करती है, दूसरे जिसका उसने अहित चाहा उसकी उन्नति उसे दिन-रात चैन न लेने देगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 भक्तिगाथा (भाग १०२)

भगवत्प्रेमी ही है सच्चा भक्त

विचारों के निःशब्द स्पन्दन सब ओर सम्पूर्णता में व्याप रहे थे। महान सप्तर्षिगण; वहाँ उपस्थित सभी देवता, ऋषि, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर, चारण सभी भक्ति की सुकोमल भावनाओं से पुलकित थे। उन्हें ऐसा लग रहा था कि भक्तिगाथा का श्रवण करने के साथ उनमें काफी कुछ बदल रहा है। वे एक गहरे आन्तरिक रूपान्तरण से गुजर रहे हैं। कुछ ऐसा जैसे कि निशा-दिवस में रूपान्तरित होती है। भोर के सूरज की उजास बिना कुछ कहे ही सबको स्वतः ही परिवर्तित कर देती है, सभी स्वयं में ऐसा ही कुछ अनुभव कर रहे थे। अभी कुछ ही देर पहले सभी ब्रह्मबेला में की जाने वाली उपासना को पूर्ण करके आ जुटे थे।

पूर्व दिशा में भोर की अरूणिमा छाने लगी थी। सूर्योदय हो रहा है यह अहसास ऋषियों एवं देवों को ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण प्रकृति को भी था। एक विचित्र सी ऊर्जावान स्फूर्ति का अनुभव सभी में संव्याप्त था। इस अनोखे सिंचन से सिंचित गायत्री महामन्त्र के स्वर ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के पावन मुख से सबसे पहले निःसृत हुए। इसके बाद सभी ने मिलकर पवित्र सामगान किया। यह सामगान अभी सम्पूर्ण होने वाला ही था कि एक अनोखे ओंकार के अनहद स्वर को सबके सब अपने अन्तःकरण में महसूस करने लगे। अपनी साधना एवं समाधि में यह अनुभव पहले भी बहुतों को हो चुका था। पर इस अनुभव की विचित्रता यह थी कि अब की बार इन क्षणों में अन्तःकरण के साथ वहाँ के प्राकृतिक पर्यावरण में भी ये अनहद स्वर परिव्याप्त हो रहे थे।

इस अनोखी अनुभूति ने कहीं गहरे में सबको जता दिया कि शीघ्र ही कोई विशेष घटनाक्रम घटित होने वाला है। हालांकि, अभी तो सभी के नेत्र भगवान् भुवनभास्कर की अगवानी करने में लगे थे। सप्तवर्णी, सप्त रश्मि अश्वों पर बैठे अरूण सारथी को आगे किए सूर्यदेव आकाश मण्डल में आ विराजे थे। उनके आने से सारे अग-जग में उजियारा हो गया था। हिमालय के उत्तुंग हिमशिखर सूर्य रश्मियों की स्वर्ण राशि अपने में समेटने में लगे थे। हिमपक्षियों एवं हिमालय के वन्य पशुओं में एक नवीन संचेतना संचारित हो रही थी। उत्साह, उल्लास एवं प्राकृतिक उत्सव के इन पलों में सबके सब, तब चकित रह गए जब उन्होंने देखा सूर्यमण्डल धरा पर अवतीर्ण हो रहा है। इन क्षणों में सभी विस्मय जड़ित से हो गए। उन्हें लगने लगा कि क्या आज स्वयं सूर्यनारायण धरती पर उतर रहे हैं अथवा उनका सम्पूर्ण प्रकाश व प्रभा धारण करके स्वयं वेदमाता गायत्री अवतरित हो रही हैं।

अनेकों अन्तःकरण में ऐसे अनेक प्रश्न चुभे। हालांकि इन प्रश्नों की चुभन सुखद व मधुर थी। हाँ, सब इससे ऊहापोह में अवश्य थे। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र इस विचित्र मनःस्थिति को अनुभव कर मन्द-मन्द मुस्करा रहे थे। उनकी यह रहस्यमयी मुस्कान देखकर ऋषि विवर्ण से न रहा गया और आखिर उन्होंने पूछ ही लिया- ‘‘हे ब्रह्मर्षि! आपकी इस मुस्कान का क्या अर्थ है?’’ उत्तर में विश्वामित्र ने शान्त स्वर में कहा- ‘‘कुछ अधिक नहीं महर्षि! बस जिस तेज को देखकर आप सब चकित हो रहे हैं, वह तेज परम तेजस्वी ऋषि कहोड़ का है। वे भगवती वेदमाता गायत्री के अनन्य भक्त हैं। उन्होंने अपनी भक्ति के प्रभाव से भगवती के भर्ग को इतनी सम्पूर्णता से धारण कर लिया है कि वे स्वयं सूर्य हो गए हैं।’’
‘‘किन्तु ब्रह्मर्षि?’’ ‘‘मैं आपका आशय समझता हूँ ऋषिश्रेष्ठ!’’ ऋषि विवर्ण कुछ अधिक कह पाते इसके पहले ही ब्रह्मर्षि विश्वामित्र उन्हें विनम्र स्वरों में रोकते हुए कहा- ‘‘यह सच है कि भगवती वेदमाता के महामन्त्र गायत्री का द्रष्टा ऋषि मैं हूँ। मैंने ही इसके अनोखे विज्ञान को धरती पर प्रकट किया है, परन्तु जहाँ तक बात भक्ति की है, वहाँ मैं किसी भी तरह से महर्षि कहोड़ की बराबरी नहीं कर सकता। वे अद्भुत हैं, अपूर्व हैं।’’

ब्रह्मर्षि विश्वामित्र अभी कुछ और कह पाते, इतने में वह परम तेजस्वी प्रकाशपुञ्ज धरा पर अवतरित हो गया। इसके पास आने पर सबने अनुभव किया कि आश्चर्यजनक रूप से यह प्रकाशपुञ्ज सुखद एवं शीतल है। धीरे-धीरे इससे एक मानवाकृति प्रकट हुई- यह गौरवर्ण, सुन्दर देहयष्टि वाले ऋषि कहोड़ थे। जिनके सिर के केश, श्मश्रु व रोमावलि ऐसे प्रकाशित हो रहे हैं जैसे कि ये केश न होकर सूर्यरश्मियाँ हों। इनकी आँखों से निकलती प्रकाशधाराएँ तो अवर्णनीय थीं।

ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने स्वयं आगे आकर उनकी अभ्यर्थना की। अन्य ऋषियों ने भी उनका स्वागत किया। देवों सहित अन्य सभी उनके तेजस्वी स्वरूप को देखकर अभिभूत थे। परन्तु स्वयं वे शिशु की भाँति सरल व निश्छल थे। उन्होंने दूर से ही देवर्षि को प्रणाम करते हुए कहा- ‘‘हे भक्ति के आचार्य! मुझे तो बस आपके सूत्रों को श्रवण करने की इच्छा यहाँ तक खींच लायी है।’’ उनका यह भावुक भोलापन देवर्षि नारद को भी गहरे से छू गया। उन्होंने बड़े आदरपूर्ण स्वरों में कहा- ‘‘मैं और मेरे सभी सूत्र आज आपका सान्निध्य पाकर कृतार्थ हैं।’’
इतना कहने के साथ देवर्षि नारद ने मधुर स्वर में कहा-
‘वेदानपिसंन्यस्यति, केवलमविच्छिन्नानुरागं लभते’॥ ४९॥

जो वेदों का भी भली भाँति परित्याग कर देता है और जो अखण्ड, असीम भगवत्प्रेम प्राप्त कर लेता है।

भक्ति के महान आचार्य ऋषि नारद का यह सूत्र श्रवण करने के बाद ब्रह्मर्षि वशिष्ठ एवं ब्रह्मर्षि विश्वामित्र दोनों ही लगभग एक साथ कह उठे- ‘‘हे देवर्षि! आपके इस सूत्र ने आज महर्षि कहोड़ के रूप में साकार स्वरूप धारण किया।’’ ‘‘ऐसा न कहें आप दोनों’’, थोड़ा संकुचित होते हुए ऋषि कहोड़ ने कहा। ‘‘मैंने तो बस ज्यादा कुछ न करके भगवती वेदमाता गायत्री की भक्तिपूर्ण अर्चना की है।’’ उनके इस तरह से कहने पर नारद ऋषि ने कहा- ‘‘भगवन्! आपकी सारी बातें हम सबको शिरोधार्य हैं। बस आप गायत्री भक्ति के बारे में कुछ कहें। आप जो भी कहेंगे वही मेरे सूत्र का सत्य होगा। वही उसकी व्याख्या होगी।’’

देवर्षि नारद के ऐसा कहने पर महातपस्वी कहोड़ ऋषि ने कहा- ‘‘हे भक्तप्रवर! मैंने बचपन से ही अपने पिताश्री से सुना था कि गायत्री सभी वेदों का सार है। इसके उपासक को स्वयं ही वेद का सम्पूर्ण मर्म पता चल जाता है। मैंने सोचा कि यदि ऐसा है तो फिर व्यर्थ में समय गंवाने का क्या प्रयोजन? यही सोचकर मैंने सब छोड़कर भगवती गायत्री की भक्ति प्रारम्भ की। गायत्री महामन्त्र का जप तो बस मेरे लिए सामान्य सी क्रिया थी। मेरी साधना का सत्य तो भगवती के चरणों में असीम अनुराग था। स्वयं के अस्तित्त्व एवं स्वयं की चेतना का उनमें पल-प्रतिपल अर्पण था। उनका अहर्निश स्मरण एवं उनमें सतत समर्पण था।

ऐसा करते हुए न तो कभी बोझ लगा और न कभी थकान अनुभव हुई। इस बीच अनेकों विपत्तियाँ-बाधाएँ एवं विघ्न आए। इन सबको मैंने माता का कृपाप्रसाद माना। वर्षों तक यही चलता रहा। लेकिन इसके साथ ही भगवती के भर्ग के प्रभाव से मेरा चित्त भी निर्मल होता गया और धीरे-धीरे वेद के सभी तत्त्व एवं सत्य स्वयं ही मेरे मन-अन्तःकरण में प्रकट हो गए और फिर मेरी चैतन्यता इनके पार भी चली गयी। बची रह गयी तो सिर्फ भक्ति।’’ इतना कहकर ऋषि कहोड़ शान्त हो गए। फिर उन्होंने धीमे स्वरों मे किन्तु रूंधे गले से कहा- ‘‘आगे की कथा मैं कुछ समय रूक कर कह सकूँगा-आप सब प्रतीक्षा करें।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १९४

बुधवार, 12 जनवरी 2022

👉 हित-साधना के दो प्रयाग

लुहार अपनी दुकान पर लोहे के टुकड़ों से तरह तरह की चीजें बनाता रहता है। उन टुकड़ों को वह कभी गरम करने के लिए भट्टी में तपाता है कभी पानी में डालकर ठण्डा कर लेता है। इन विसंगतियों को देखकर कोई भोला मनुष्य असमंजस में पड़ सकता है कि लुहार ने इस दुमुँही प्रक्रिया को क्यों अपना रखा है। पर वह कारीगर जानता है कि किसी लोहे के टुकड़े को बढ़िया उपकरण की शक्ल में परिणत करने के लिये दोनों ही प्रकार की ठण्डी-गरम प्रणालियों का प्रयुक्त होना आवश्यक है।

मनुष्य के जीवन में भी सुख-दुख का, धूप-छाँह का अपना महत्व है। रात-दिन की अँधेरी, उजेली, विसंगतियाँ ही तो कालक्षेप का एक सर्वांगपूर्ण विधान प्रस्तुत करती हैं। यदि मनुष्य सदा सुखी और सम्पन्न ही रहे तो निश्चय ही उसकी आन्तरिक प्रगति रूप जाएगी। जो झटके प्रगति के लिए आवश्यक हैं उन्हें ही हम कष्ट कहते हैं। इन्हें सच्चा भक्त कड़ुई औषधि की तरह ही शिरोधार्य करता है। सन्निपात का मरीज जैसे डॉक्टर को गाली देता है वैसी भूल समझदार आस्तिक ईश्वर के प्रति नहीं कर सकता।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 भक्तिगाथा (भाग १०१)

कर्मों का त्याग ही है सच्ची भक्ति

देवर्षि नारद के सूत्र उच्चारित करने के उपरांत ब्रह्मर्षि विश्वामित्र सुगना की कथा को आगे बढ़ाते हुए बोले- ‘‘निर्द्वन्द्वता उसमें साफ झलक रही थी। न कोई भय, न कोई शंका और न ही अभिमान। महामायिविनी-भीम भयंकर ताड़का के क्षेत्र में एकाकी-सर्वसाधन विहीन भील के मन में ऐसी निश्चिन्तता चकित कर देने वाली थी। मैंने उससे जानना चाहा- वत्स! तुम्हें यहाँ कभी कोई चिन्ता सताती है?

उत्तर में सुगना हल्के से हँस दिया और बोला- महर्षि! आप तो परमज्ञानी हैं, भली-भाँति जानते हैं कि जब ‘मैं’ होता है तो ही चिन्ता, परेशानी अथवा भय भयभीत करते हैं। लेकिन मेरा ‘मैं’ तो प्रभु के चरणों में विलीनता पा चुका है। मैं सर्वदा यह सच अनुभव करता हूँ कि बस यह देह सुगना भील की है, इसमें जो चैतन्यता अथवा क्रियाशक्ति है, वह तो स्वयं नारायण की है। मेरे प्रभु परम समर्थ हैं, जब तक वह चाहेंगे, इस देह को रखेंगे, जब नहीं चाहेंगे, यह पंचभौतिक देह, पंचभूतों में विलीन हो जाएगी।

फिर उसने अपनी ओर इंगित करते हुए कहा- इस देह से होने वाले समस्त कर्म उन्हीं के द्वारा, उन्हीं के लिए हो रहे हैं। मैं बीते वर्षों से यही अनुभव किए जा रहा हूँ कि क्रिया, कर्त्ता, कर्मफल सभी का आधार परमेश्वर नारायण ही हैं। बातचीत में कहा जाने वाला ‘मैं’ अथवा इस देह का ‘सुगना नाम’ तो बस व्यवहार निभाने के लिए है। यथार्थ अनुभव में न तो ‘मैं’ का कोई अस्तित्त्व है और न ही ‘सुगना नाम’ का। उसकी सभी बातें अद्भुत थीं। साथ ही अद्भुत था उसका भोलापन। वह अन्दर से बाहर तक सम्पूर्ण सच्चा और निष्कपट था। मेरा उसके साथ अभी तक का वार्तालाप खड़े-खड़े ही हो रहा था। अब सम्भवतः उसे चेत हुआ और उसने अपनी भावनाओं से उबरते हुए कहा- प्रभु! आप दोनों इस तरह खड़े न रहें, इधर विराज कर इस अकिंचर के कक्ष को पावन करें। ऐसा कहते हुए उसने पास के दर्भासन की तरफ इशारा किया।

मैं और ऋषि रुद्रांश दोनों ही बैठ गए। सुगना हम दोनों की ही आवभगत करने की कोशिश कर रहा था। उसने झोपड़ी में रखे हुए फल हमारे सामने रखते हुए कहा- भगवन्! यह नारायण का प्रसाद है इसे ग्रहण करें। उसका प्रेम, आदर और अपूर्व निश्छलता मेरा मन मोहित कर रही थी। मैं देख रहा था कि वह कर्म करते हुए भी करता नहीं है, और कर्मफल की उसे कोई आकांक्षा नहीं है। सचमुच ही वह अतीत, वर्तमान एवं भविष्य से ऊपर उठ चुका था। उसने न तो कोई लौकिक विद्याएँ अर्जित की थीं और न ही आध्यात्मिक विद्याओं का अर्जन कर रहा था। इन सबकी कोई चाहत भी नहीं थी उसे। उसकी दिनचर्या भी सहज थी, उसमें कोई भी कठिन व्रत, अनुष्ठान या तप का समावेश नहीं था। सम्भवतः उसे इसकी कोई आवश्यकता भी नहीं थी।

अपनी स्मृतियों के झरोखे से झांकते हुए ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने कहा- सुगना से मिलने के बाद मैं जान सका कि भक्त भगवान है, क्योंकि वह भगवान की ओर सतत अग्रसर है। भक्त इसलिए भी भगवान है, क्योंकि वह भगवान होने की तरफ प्रतिक्षण रूपान्तरित हो रहा है। सत्य यही है कि भक्त निरन्तर भगवान में बदल रहा होता है। उसकी प्रत्येक प्रार्थना उसे भगवान बना रही होती है। उसकी हर पूजा उसे भगवान में बदल रही होती है। भक्तिपथ पर चलते हुए भक्त और भगवान का फासला निरन्तर कम होता जाता है। हर क्षण, हर पल यह घटित होता है और एक पल वह भी आता है जबकि भक्त अपने भगवान में होता है और भगवान अपने भक्त में होते हैं। सुगना के रूप में उस दिन मैंने इस सत्य को प्रकट देखा।’’ ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की बातें सुनकर ऋषिमण्डल एवं देवमण्डल चकित रह गया। देवर्षि नारद स्वयं में अन्तर्लीन थे। सम्भवतः वह अपने अगले सूत्र के बारे में विचार कर रहे थे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १९२

सोमवार, 10 जनवरी 2022

👉 अपनी पड़ताल स्वयं करे

"दूसरों की आलोचना करने वालों को इस घटना को भी स्मरण रखना चाहिए।"

एक व्यक्ति के बारे में मशहूर हो गया कि उसका चेहरा बहुत मनहूस है। लोगों ने उसके मनहूस होने की शिकायत राजा से की। राजा ने लोगों की इस धारणा पर विश्वास नहीं किया, लेकिन इस बात की जाँच खुद करने का फैसला किया। राजा ने उस व्यक्ति को बुला कर अपने महल में रखा और एक सुबह स्वयं उसका मुख देखने पहुँचा। संयोग से व्यस्तता के कारण उस दिन राजा भोजन नहीं कर सका। वह इस नतीजे पर पहुंचा कि उस व्यक्ति का चेहरा सचमुच मनहूस है। उसने जल्लाद को बुलाकर उस व्यक्ति को मृत्युदंड देने का हुक्म सुना दिया।

जब मंत्री ने राजा का यह हुक्म सुना तो उसने पूछा,"महाराज! इस निर्दोष को क्यों मृत्युदंड दे रहे हैं? राजा ने कहा,"हे मंत्री! यह व्यक्ति वास्तव में मनहूस है। आज सर्वप्रथम मैंने इसका मुख देखा तो मुझे दिन भर भोजन भी नसीब नहीं हुआ। इस पर मंत्री ने कहा,"महाराज क्षमा करें, प्रातः इस व्यक्ति ने भी सर्वप्रथम आपका मुख देखा। आपको तो भोजन नहीं मिला, लेकिन आपके मुखदर्शन से तो इसे मृत्युदंड मिल रहा है।

अब आप स्वयं निर्णय करें कि कौन अधिक मनहूस है। "राजा भौंचक्का रह गया। उसने इस दृष्टि से तो सोचा ही नहीं था। राजा को किंकर्तव्यविमूढ़ देख कर मंत्री ने कहा, "राजन्! किसी भी व्यक्ति का चेहरा मनहूस नहीं होता। वह तो भगवान की देन है। मनहूसियत हमारे देखने या सोचने के ढंग में होती है।

आप कृपा कर इस व्यक्ति को मुक्त कर दें। राजा ने उसे मुक्त कर दिया। उसे सही सलाह मिली।


👉 कटु और मधु अनुभूतियाँ

माता मधुर मिष्ठान्न भी खिलाती है और आवश्यकता पड़ने पर कड़ुई दवा भी खिलाती है। दुलार से गोदी में भी उठाये फिरती है और जब आवश्यकता समझती है डॉक्टर के पास सुई लगाने या आपरेशन कराने के लिए भी ले जाती है। माता की प्रत्येक क्रिया बालक के कल्याण के लिये ही होती है, परमात्मा की ममता जीवन के प्रति माता से भी अधिक है। प्रतिकूलताएं प्रस्तुत करने में उसकी उपेक्षा या निष्ठुरता नहीं, हितकामना ही छिपी रहती है।

अपनी कठिनाइयों को हल करने मात्र के लिए, अपनी सुविधाएँ बढ़ाने की लालसा मात्र से जो प्रार्थना पूजा करते हैं वे उपासना के तत्वज्ञान से अभी बहुत पीछे हैं। उन्हें उन बालकों में गिना जाना चाहिये जो प्रसाद के लालच से मन्दिर में जाया करते हैं। ऐसे बच्चे वह आनन्द कहाँ पाते हैं जो भक्तिरस में निमग्न एक भावनाशील आस्तिक को प्रभु के सम्मुख अपना हृदय खोलने और मस्तक झुकाने में आता है। प्रभु के चरणों पर अपनी अन्तरात्मा की अर्पण करने वाले भावविभोर भक्त और प्रसाद को मिठाई लेने के उद्देश्य में खड़े हुए भिखमंगे में जो अन्तर होता है वही सच्चे और झूठे उपासकों में होता है। एक का उद्देश्य परमार्थ है दूसरे का स्वार्थ। स्वार्थी को कहीं भी सम्मान नहीं मिलता। परमात्मा की दृष्टि में भी ऐसे लोगों का क्या कुछ मूल्य होगा?

👉 भक्तिगाथा (भाग १०१)

कर्मों का त्याग ही है सच्ची भक्ति

ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के भावों से भीगे हुए शब्द सभी की भावनाओं को भिगोते चले गए। हिमालय का आर्द्र वातावरण और भी आर्द्र हो उठा। हालांकि यह आर्द्रता जलीय नहीं रसमयता की थी। भक्तिरस की फुहारों ने इसे रससिक्त किया था, आर्द्र बनाया था। सुनने वाले भावविभोर विश्वामित्र को देखकर चकित थे, आश्चर्यजड़ित थे। उन्होंने अब तक कर्मकठोर विश्वामित्र को देखा था। उन्होंने कभी भी न थकने वाले, कभी भी किसी से हार न मानने वाले, विलक्षण साहसी, सतत संघर्षरत योद्धा ऋषि विश्वामित्र को देखा था, जिन्होंने अपने सम्पूर्ण जीवन में दुर्धर्ष एवं प्रचण्ड चुनौतियों को सामना किया था और उन पर विजय पायी थी। सम्पूर्ण ऋषिमण्डल एवं देवमण्डल ने महाचुनौतियों के शिखरों पर उनके साहसिक तप की प्रज्ज्वलित पताकाएँ फहराती हुई देखी थीं। बड़ी से बड़ी चुनौतियाँ भी उनके पदाघात से चकनाचूर होती रही थीं। विरोधियों के प्रबलतम पराक्रम उनके सम्मुख आते ही स्वयं पराजित हो जाते थे।

ऐसे महाबज्र विश्वामित्र के अन्तस भावों की रसधार को देखकर सबके सब चकित भाव से उन्हें देखते रहे। उन सबमें सुगना भील के बारे में और भी अधिक जानने की लालसा बढ़ गयी। ऐसा क्या था सुगना में, जिसने कुलिश कठोर, महर्षि विश्वामित्र की तेजस्विता, प्रखरता को रसमय बना दिया। सब के मन के इन मानसिक स्पन्दनों को शब्द दिए ऋषि क्रतु ने। उन्होंने कहा- ‘‘हे  परमतेजस्वी महर्षि! हम सभी को सुगना भील की भक्तिकथा का श्रवण कराएँ।’’ ऋषि क्रतु के इस कथन ने कथा की बिखरी कड़ियाँ जोड़ दीं। तप तेजस के सघन स्वरूप ऋषि विश्वामित्र को सुगना का स्मरण हो आया। वह कृष्णवर्ण भील, सुडौल-सुगठित कद-काठी का स्वामी था, जिसकी काली किन्तु चमकदार स्वच्छ आँखों में सदा भक्ति छलकती रहती थी।

उसे याद करते हुए विश्वामित्र कहने लगे- ‘‘उस दिन मैं ऋषि रुद्रांश के साथ उसकी झोपड़ी में गया। सघन अरण्य में वृक्षों के झुरमुट की ओट में बनी वह फूस की झोपड़ी भक्ति के दिव्य प्रकाश से पूर्ण थी। झोपड़ी के अन्दर व बाहर थोड़ी दूर तक की भूमि गाय के गोबर से लिपी हुई थी। बाहर सुगन्धित पुष्प वाले पौधे लगे हुए थे। अन्दर पूजा की चौकी थी, जिस पर भगवान् नारायण का चित्र रखा था। यह चित्र सम्भवतः उसी ने अपने हाथों से बनाया था। चित्र के पास कुछ पुष्प बिखरे थे। उससे थोड़ी दूर हटकर पुआल का एक बिछौना था। सामान के नाम पर वहाँ प्रायः कुछ भी नहीं था। बस थोड़ी सी पत्तियाँ, कुछ फल, कुछ काष्ठ सामग्री- यही सब कुछ था। यह सब देखकर ऋषि रुद्रांश ने मुझसे कहा- महर्षि! यह झोपड़ी किसी सिद्धस्थल से भी बढ़कर है। इस पर मैंने अनुभव किया कि ऋषि रुद्रांश सम्पूर्ण सत्य कह रहे हैं।

मैंने कुछ क्षणों के बाद सुगना से पूछा- वत्स! तुम्हारी दिनचर्या क्या है? तुम काम क्या करते हो? उत्तर में उसने कहा- भगवन्! भगवान नारायण का स्मरण! उन्हीं में समर्पण, यही मेरी दिवसचर्या है, यही मेरी रात्रिचर्या है। रही काम की बात तो नर में नारायण का रूप देखकर उनकी सेवा का यत्न करता हूँ। पर सच तो यह है महर्षि! न तो मुझे कर्मफल की आकांक्षा है और न ही कर्मों में अभिरुचि। बस मैं अपने नारायण का यंत्र हूँ। मुझे ऐसा अनुभव होता है कि मैं कुछ नहीं करता, मेरे माध्यम से जो कुछ भी होता है, वह सब कुछ मेरे आराध्य भगवान नारायण ही करते हैं।’’ महर्षि विश्वामित्र की ये बातें सुनकर देवर्षि नारद उत्साहित हो गए और कहने लगे यही तो है भक्त की भक्ति का सही परिचय। यही मेरा अगला सूत्र भी है, जो मैं आप सबके सामने कह रहा हूँ-

‘यः कर्मफलं त्यजति, कर्माणि संन्यस्यति, ततो निर्द्वन्द्वो भवति’॥ ४८॥
जो कर्मफल का त्याग करता है, कर्मों का भी त्याग करता है और तब सब कुछ त्याग कर जो निर्द्वन्द्व हो जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १९१

शनिवार, 8 जनवरी 2022

👉 पूजा और उपासना

किसी व्यक्ति की उपासना सच्ची है या झूठी है उसकी एक ही परीक्षा है कि साधक की अन्तरात्मा में सन्तोष, प्रफुल्लता, आशा, विश्वास और सद्भावना का कितनी मात्रा में अवतरण हुआ। यदि यह गुण नहीं आये हैं और हीन वृत्तियाँ उसे घेरे हुए हैं तो समझना चाहिए कि वह व्यक्ति पूजा पाठ कितना ही करता हो उपासना से अभी दूर ही है।
पूजा पाठ अलग बात है, उपासना अलग। उपासना के लिए पूजा पाठ से कर्मकाण्ड की चिन्हपूजा करते रहने मात्र से उपासना का उद्देश्य प्राप्त नहीं हो सकता। जीव को जीवन धारण करने के लिये शरीर की आवश्यकता होती है पर शरीर ही जीवन नहीं है। जीव विहीन शरीर देखा तो जा सकता है पर उसका कोई लाभ नहीं। इसी प्रकार उपासना विहीन पूजा भी होती तो है पर उससे कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।

आत्मा जब परमात्मा की गोदी में बैठता है तो उसे प्रभु की सहज करुणा और अनुकम्पा का लाभ मिलता है। उसे तुरन्त ही निर्भयता और निश्चिन्तता की प्राप्ति होती है। हानि, घाटा, रोग, शोक, विछोह, चिन्ता, असफलता और विरोध की विपन्न स्थितियों में भी उसे विचलित होने की आवश्यकता नहीं पड़ती। उसे इन प्रतिकूलताओं में भी अपने हित साधन का कोई विधान छिपा दिखाई पड़ता है। वस्तुतः विपन्नता हमारी त्रुटियों का शोधन करने और पुरुषार्थ को बढ़ाने के लिए ही आती है। आलस्य और प्रमाद को, अहंकार और मत्सर को मनोभूमि से हटाना ही प्रतिकूलताओं का उद्देश्य होता है। सच्चे आस्तिक को अपने प्रिय परमेश्वर पर सच्ची आस्था होती है और वह अनुकूलताओं की तरह प्रतिकूलताओं का भी खुले हृदय से स्वागत करता है।

👉 भक्तिगाथा (भाग १००)

योग-क्षेम का त्यागी कहलाता है भक्त

इस सूत्र में सभी को भक्ति की सर्वथा नवीन परिभाषा की झलक दिखायी दी परन्तु सभी की तुलना में इस सूत्र को सुनकर महर्षि विश्वामित्र के मुख पर अधिक ही प्रसन्नता छलक उठी, इसे सब ने अनुभव किया। महर्षि क्रतु ने तो कह भी दिया- ‘‘लगता है ऋषिश्रेष्ठ विश्वामित्र को इस सूत्र ने उनकी कठिन तपस्या के दिन याद दिला दिए।’’ इसे सुनकर विश्वामित्र हल्के से हँसे, फिर बोले- ‘‘नहीं महर्षि! मेरी तपस्या कठिन अवश्य थी, परन्तु उसमें भक्ति की कोमल भावनाएँ नहीं, बल्कि अहंकार की कठोरता थी। एक अहंकारी का कर्म भला भक्ति की पावनता कैसे पा सकता है, फिर भले ही वह तप क्यों न हो?’’

ऐसा कहते हुए महर्षि के नेत्र छलछला उठे। थोड़ी देर बाद वह अपने भावों को संयत करते हुए बोले- ‘‘मुझे तो बस भोले भक्त सुगना भील की याद आ गयी।’’ सुगना का नाम सुनकर ऋषि वसिष्ठ से न रहा गया, वे बोल उठे- ‘‘हे ब्रह्मर्षि! हम आपके व्यक्तित्व के सतत रूपान्तरण के स्वयं साक्षी हैं पर सुगना के बारे में मैंने मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम से सुना है। उसकी चर्चा करते हुए वे भी यदा-कदा भावुक हो उठते थे। वह था ही ऐसा भोला भक्त, उसका जीवन अपने भगवान में इतना अधिक अर्पित था कि भगवान उस पर अवश्य सम्मोहित हुए होंगे।’’

ब्रह्मर्षि वसिष्ठ एवं ब्रह्मर्षि विश्वामित्र का यह वार्तालाप सभी ने सुना। इसकी कुछ ही पंक्तियों ने सभी के मन में यह जिज्ञासा पैदा कर दी कि आखिर यह सुगना कौन है? अब तो सभी की आँखें ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के मुख पर टिक गयीं। महर्षि क्रतु ने तो प्रकट में कह भी दिया कि- ‘‘हे ब्रह्मर्षि! आप हम सबको भक्त सुगना भील का कथा वृतान्त सुनाकर तृप्त करें।’’ ऋषि क्रतु के इस कथन पर महर्षि विश्वामित्र ने भावुक स्वर में कहा- ‘‘हे महर्षि! यह कथा उन दिनों की है, जब मैं भारतभूमि के मिथिला प्रदेश में सिद्धाश्रम में रहा करता था। सिद्धाश्रम मेरी प्रयोगस्थली ओर साधनास्थली दोनों ही था। मेरे साथ विशिष्ट ऋषियों, मनीषियों, विशेषज्ञों, विद्वानों का एक खास समुदाय था। ये सभी विविध विद्याओं के धनी एवं अनेकों चमत्कारी प्रयोगों में निष्णात थे।

मेरे और मेरे सभी सहयोगियों के सारे प्रयोगों का उद्देश्य एक ही था कि देवभूमि भारत सदा के लिए आसुरी आतंक से मुक्त हो सके। हम सभी के दिन और रात, इन्हीं सब प्रयोगों एवं विद्याओं की साधना में बीतते थे। एक दिन प्रातः ब्रह्मबेला में जबमैं ऋषि रूद्रांश के साथ भ्रमण के लिए निकला तो देखा कि पास के बीहड़ वन में एक कृष्ण वर्ण युवा भील वट वृक्ष की छांव में बैठा हुआ ध्यानमग्न है।

ऋषि रूद्रांश ने मेरा ध्यान उसकी ओर आकर्षित करते हुए कहा- महर्षि यह भीषण वन तो महामायाविनी एवं महाभयाविनी ताड़का का क्षेत्र है। यहाँ तो ताड़का, मारीच, सुबाहु के साथ मनुष्यों एवं पशु-पक्षियों को ही नहीं, वृक्ष-वनस्पतियों को भी आतंकित करती रहती है। हम जैसे तपस्वियों एवं आप सदृश परम तेजस्वी महर्षि को भी इधर आने से पहले रक्षोघ्न प्रयोगों को करना पड़ता है। ऐसे में यह एकाकी युवा भील, इतना निर्भय एवं इतना अधिक प्रसन्नचित्त- सचमुच अचरज है।

ऋषि रुद्रांश का कथन सच था, बात अचरज की ही थी। इस युवा भील का वहाँ जीवित होना ही आश्चर्य था। उसकी प्रसन्नता एवं निर्भयता तो शायद उस युग का परम आश्चर्य थी। हम दोनों धीमे कदमों से चलते हुए उसके पास गए। वह हम दोनों के पांव की आहट सुनकर उठ गया। उसके नेत्रों से भक्ति के आंसू छलक रहे थे। पास पहुँचते ही उसने हम दोनों को ही प्रणाम किया। उसके प्रणाम में उसके भावों की गहराई स्पष्ट थी।

हमने उसे आशीष देते हुए पूछा-पुत्र! तुम यहीं रहते हो। उत्तर में उसने थोड़ी दूर पर वृक्षों के झुरमुट की ओट में बनी एक झोंपड़ी की ओर इशारा किया। उसे पहली दृष्टि में देखकर लगा- सचमुच ही निर्जन स्थान पर रहने वाले इस भील भक्त ने सभी लौकिक बन्धन तोड़ डाले हैं। निःसन्देह उसकी चेतना तीनों गुणों के पार है और भगवान् के इस अनन्य भक्त ने असन्दिग्ध रूप से योग तथा क्षेम का परित्याग कर दिया है। परन्तु उसके बारे में अभी अनेकों जिज्ञासाएँ थीं, जिनका समाधान आगे होना था।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १८८


बुधवार, 5 जनवरी 2022

👉 स्वामी विवेकानन्द के विचार

मेरी दृढ धारणा है कि तुममें अन्धविश्वास नहीं है। तुममें वह शक्ति विद्यमान है, जो संसार को हिला सकती है, धीरे - धीरे और भी अन्य लोग आयेंगे। 'साहसी' शब्द और उससे अधिक 'साहसी' कर्मों की हमें आवश्यकता है। उठो! उठो! संसार दुःख से जल रहा है। क्या तुम सो सकते हो? हम बार - बार पुकारें, जब तक सोते हुए देवता न जाग
 उठें, जब तक अन्तर्यामी देव उस पुकार का उत्तर न दें। जीवन में और क्या है? इससे महान कर्म क्या है?

अकेले रहो, अकेले रहो। जो अकेला रहता है, उसका किसीसे विरोध नहीं होता, वह किसीकी शान्ति भंग नहीं करता, न दूसरा कोई उसकी शान्ति भंग करता है।

जो पवित्र तथा साहसी है, वही जगत् में सब कुछ कर सकता है। माया-मोह से प्रभु सदा तुम्हारी रक्षा करें। मैं तुम्हारे साथ काम करने के लिए सदैव प्रस्तुत हूँ एवं हम लोग यदि स्वयं अपने मित्र रहें तो प्रभु भी हमारे लिए सैकडों मित्र भेजेंगे, आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुः।

अफसोस इस बात का है कि यदि मुझ जैसे दो - चार व्यक्ति भी तुम्हारे साथी होते - तमाम संसा हिल उठता। क्या करूँ धीरे - धीरे अग्रसर होना पड रहा है। तूफ़ान मचा दो तूफ़ान!

👉 भक्तिगाथा (भाग १००)

योग-क्षेम का त्यागी कहलाता है भक्त

अजामिल की कथा, भगवान के पवित्र नारायण नाम का प्रभाव एवं सत्संग की महिमा सुनकर, सुनने वालों की अन्तर्भूमि में भक्ति सरिता प्रवाहित हो उठी। वे सोचने लगे कि भक्ति भावनाओं को भिगोने के साथ उन्हें धुलकर धवल करती है। जो किसी भी भांति प्रत्यक्ष या परोक्ष, भक्तिमय भावनाओं अथवा भक्तिपूर्ण वातावरण के सम्पर्क में रहता है, उसे किसी भी कारण कल्मष की कालिमा छू भी नहीं सकती। कुटिल कुसंस्कार उसको सहज ही छोड़ देते हैं। सोचने वालों की ये चिन्तन तरंगें हिमालय के दिव्य वातावरण की सम्पूर्णता में व्याप्त हो गयीं। इनके पवित्र स्पन्दनों ने वहाँ की पावनता को भी पावन कर दिया। सभी ने महर्षि पुलह की ओर कृतज्ञ नजरों से देखा, जिन्होंने भक्ति, भक्त और भगवान के पवित्र नाम की महिमा बखान करने वाली यह सुमनोरम कथा सुनायी थी।

स्वयं महर्षि पुलह भी कम आह्लादित नहीं थे। उन्हें स्वयं में गहरी पुलकन एवं रोम-रोम में रोमांच की अनुभूति हो रही थी। अजामिल के अनुभव की बात सोचकर उन्हें लग रहा था कि कोई भी किसी भी स्थिति में क्यों न हो, उसका पुनरोदय सम्भव है। आखिरकार किसी जीवात्मा का पतन उसके चित्त की कालिमा और कलुष के कारण ही होता है, यदि यह कलुष व कालिमा किसी भी तरह धुल सके तो जीवात्मा अपने ईश्वरीय स्वरूप को पुनः पा सकती है और यह सब भक्तिमय भावना के द्वारा सम्भव है। भक्ति की पावनता से ही सब कुछ पावन होता है। भक्ति में वह परमपावनी सामर्थ्य है जिससे साधक, साधना एवं उसकी सिद्धि, तीनों ही पवित्र होते हैं। यही तो आध्यात्मिक जीवन साधना का शीर्ष व शिखर है। जो इसके अतिरिक्त किसी अन्य सिद्धि, उपलब्धि, सम्पदा व विभूति को साधना मान लेते हैं, वे भ्रम के भटकावों में ही भटकते रहते हैं।

महर्षि पुलह के इस अन्तर्चिन्तन के साथ सब तरफ मौन पसरा रहा। अन्य सभी के मन भी कहीं गहरे में डूबे रहे। यह स्थिति कितनी देर तक रही किसी को पता न चला।

हिमालय के हिमप्रपातों की कल-कल ध्वनि, हिमपक्षियों का कलरव एवं हिमप्रदेश में रहने वाले पशुओं की चित्र-विचित्र आवाजें भी इस निःस्पन्दता को स्पन्दित न कर सकीं। इसे तो महर्षि विश्वामित्र के स्वरों ने बेधा। उन्होंने देवर्षि को सम्बोधित करते हुए कहा- ‘‘हे भगवान विष्णु के परमप्रिय भक्त! हम सभी को आपके नवीन सूत्र की प्रतीक्षा है।’’ अब तक देवर्षि नारद भी पता नहीं किन भावों में खोए हुए थे। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के स्वरों ने उन्हें चेताया। विश्वामित्र का सम्बोधन सुनकर वह बड़े हल्के से मुस्कराए, फिर उनके मुख से बड़े मधुर स्वरों में प्रभु का परम पावन नाम नारायण! नारायण!! उच्चारित हुआ। इस अनोखे भक्तिपूर्ण उच्चारण से अन्य सभी की चिन्तन चेतना भी बाह्य जगत् में लौट आयी।
इसी के साथ देवर्षि नारद ने अपने नवीन सूत्र का मधुरवाणी में उच्चारण किया-

‘यो विविक्तस्थानं सेवते, यो लोकबन्धमुन्मूलयति,
निस्त्रैगुण्यो भवति, योगक्षेमं त्यजति’॥ ४७॥
जो निर्जन स्थान में वास करता है, जो लौकिक बन्धनों को तोड़ डालता है और जो योग तथा क्षेम का परित्याग कर देता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १८६

मंगलवार, 4 जनवरी 2022

👉 स्वामी विवेकानन्द के विचार

यही रहस्य है। योग प्रवर्तक पंतजलि कहते हैं, " जब मनुष्य समस्त अलौकेक दैवी शक्तियों के लोभ का त्याग करता है, तभी उसे धर्म मेघ नामक समाधि प्राप्त होती है। वह परमात्मा का दर्शन करता है, वह परमात्मा बन जाता है और दूसरों को तदरूप बनने में सहायता करता है। मुझे इसीका प्रचार करना है। जगत् में अनेक मतवादों का प्रचार हो चुका है। लाखों पुस्तकें हैं, परन्तु हाय! कोई भी किंचित् अंश में प्रत्य्क्ष आचरण नहीं करता।

एक महान रहस्य का मैंने पता लगा लिया है -- वह यह कि केवल धर्म की बातें करने वालों से मुझे कुछ भय नहीं है। और जो सत्यद्र्ष्ट महात्मा हैं, वे कभी किसी से बैर नहीं करते। वाचालों को वाचाल होने दो! वे इससे अधिक और कुछ नहीं जानते! उन्हे नाम,  यश, धन, स्त्री से सन्तोष प्राप्त करने दो। और हम धर्मोपलब्धि, ब्रह्मलाभ एवं ब्रह्म होने के लिए ही दृढव्रत होंगे। हम आमरण एवं जन्म-जन्मान्त में सत्य का ही अनुसरण करेंगें। दूसरों के कहने पर हम तनिक भी ध्यान न दें और यदि आजन्म यत्न के बाद एक, देवल एक ही आत्मा संसार के बन्धनों को तोडकर मुक्त हो सके तो हमने अपना काम कर लिया।

जो सबका दास होता है, वही उन्का सच्चा स्वामी होता है। जिसके प्रेम में ऊँच - नीच का विचार होता है, वह कभी नेता नहीं बन सकता। जिसके प्रेम का कोई अन्त नहीं है, जो ऊँच - नीच सोचने के लिए कभी नहीं रुकता, उसके चरणों में सारा संसार लोट जाता है।

वत्स, धीरज रखो, काम तुम्हारी आशा से बहुत ज्यादा बढ जाएगा। हर एक काम में सफलता प्राप्त करने से पहले सैंकडो कठिनाइयों का सामना करना पडता है। जो उद्यम करते रहेंगे, वे आज या कल सफलता को देखेंगे। परिश्रम करना है वत्स, कठिन परिश्रम्! काम कांचन के इस चक्कर में अपने आप को स्थिर रखना, और अपने आदर्शों पर जमे रहना, जब तक कि आत्मज्ञान और पूर्ण त्याग के साँचे में शिष्य न ढल जाय निश्चय ही कठिन काम है। जो प्रतिक्षा करता है, उसे सब चीज़े मिलती हैं। अनन्त काल तक तुम भाग्यवान बने रहो।

👉 भक्तिगाथा (भाग ९९)

नारायण नाम का चमत्कार

अब बारी इस सूत्र की व्याख्या की थी। इसके लिए सबकी नजरें प्रायः एक साथ ऋषि पुलह की ओर घूमीं क्योंकि अभी तक अजामिल की कथा आगे सुनने का उत्साह बना हुआ था। ऋषि पुलह भी इस सच से परिचित थे। उन्होंने कहा कुछ भी नहीं, बस कुछ समय तक मौन रहे, तब आगे बोले- ‘‘ब्राह्मणपुत्र अजामिल महामाया के दुस्तर भंवर में फँस चुका था। उसके चारों ओर घना अंधेरा था और सब तरफ इस अंधियारे के साथी उसे घेरे हुए थे। प्रकाश की एक भी किरण इस घने अंधेरे को भेद सके, ऐसा भी सम्भव न था। मैं स्वयं भी उस युवक के लिए चिन्तित था, पर स्थिति ऐसी न थी कि उसके लिए कुछ भी किया जा सके। बस यदा-कदा उसके बारे में सोच लेता था, और सर्वसमर्थ प्रभु से प्रार्थना करता था। हाँ! मेरे मन में बेचैनी और विवशता अवश्य थी।

तभी अचानक एक दिन खबर आयी कि चन्द्रलेखा ने एक सुपुत्र को जन्म दिया है। अन्य कोई तो उसके पुत्रजन्म के अवसर पर जाने को तैयार न था। हारकर उसने नामकरण के अवसर पर मुझे बुलावा भेजा। उसकी वेश्या पत्नी मेरे इस तरह बुलावे पर चिन्तित थी। उसकी चिन्ता का कारण यह था कि कहीं मैं उसके प्रेमी व पति अजामिल को वैराग्य का पाठ न पढ़ा दूँ परन्तु मेरा ऐसा कोई विचार न था। मैं तो अजामिल के परम कल्याण के लिए चिन्तित था। इसी चिन्ता को लिए मैं उसके द्वार पहुँचा। द्वार पर चन्द्रलेखा और अजामिल ने मेरा भरपूर स्वागत किया। हालांकि इस स्वागत में कहीं न कहीं संकोच छुपा था और इस संकोच में दोनों के अपने-अपने कारण थे। अजामिल के संकोच का कारण चन्द्रलेखा के प्रति उसका प्रेम और साधना से पतन था जबकि चन्द्रलेखा के संकोच का कारण उसके मन का पापभाव था जो लगातार दीर्घकाल से संचित हो रहा था।

परन्तु मैं उन दोनों के इस संकोच को दरकिनार कर उनसे बड़ी आत्मीयता से मिला। मेरी आत्मीयता देख वे दोनो रो पड़े। देर तक यूं ही उनका यह रोना चलता रहा। फिर अजामिल कहने लगा- भगवन्! क्या अब भी मेरे उद्धार की कोई राह शेष है परन्तु मैं अब अपनी पत्नी व पुत्र को नहीं छोड़ सकता। उसके इस कथन पर मैंने कहा- पुत्र! तुम्हें किसी को भी छोड़ने की जरूरत नहीं, क्योंकि भगवान के तो सभी अपने हैं। क्या मैं भी? चन्द्रलेखा के स्वर में किञ्चित उत्साह अधिक था। उसके इस तरह पूछने पर मैंने कहा- हाँ पुत्री! तुम भी। प्रभु के तो सभी अपने हैं। वे कभी किसी को नहीं भुलाते, हाँ हम ही किसी न किसी रूप में उनसे मुख मोड़ लेते हैं। मेरी इस बात ने उन दोनों को बड़ी आश्वस्ति दी। अब वे मुझे पूरे मन से सुनने के लिए तैयार थे।

उन्होंने कहा- हम दोनों को क्या करना होगा भगवन्! मैंने कहा कुछ विशेष नहीं। अभी तो हम लोग पुत्र का नामकरण कर लेते हैं। इतना कहते ही चन्द्रलेखा की दासी, पुत्र को ले आयी। बड़ा ही प्यारा शिशु था, बहुत ही लुभावना रूप था उसका। उसे गोद में लेते हुए मुझे ऐसा लगा जैसे कि स्वयं नारायणभक्त प्रह्लाद मेरी गोद में आ गए हों। यह स्मरण करते ही, बरबस मेरे मुख से नारायण निकल पड़ा। वे दोनों पति-पत्नी भी अनायास ही नारायण! नारायण!! बोल उठे। इस उच्चारण के बाद अजामिल ने कहा- भगवन्! क्या इसका नाम हम लोग नारायण रखें? अवश्य पुत्र! अब से नारायण ही इसका नाम होगा।

परन्तु आप ने मेरे उद्धार का कोई उपाय नहीं बताया? तुम्हारे पुत्र का यह नाम ही तुम्हारा उद्धार करेगा। इसके अतिरिक्त यदि कुछ और करना चाहते हो तो बस एकादशी का व्रत करो। एकादशी का व्रत सभी पापों का हरण व शमन करता है। एक बात और पुत्र, जब तुम अपने बेटे को नारायण नाम से पुकारना, तब यह भी स्मरण रखना कि यही नाम परमकरूणामय परमेश्वर का है। इतना कहकर मैं चुप हो गया। चन्द्रलेखा मेरे इस तरह से चुप होने पर बोली- हम दोनों को क्या बस इतना ही करना है?  मैंने कहा- हाँ पुत्री! करना तो बस इतना ही है, परन्तु बड़ी निष्ठापूर्वक और सच्चे व निष्कपट भाव से करना है।

अवश्य! उन दोनों ने लगभग एक साथ ही कहा। उन दोनों ने केवल इतना कहा ही नहीं, बल्कि इसे सच कर दिखाया। अब वे जब भी नारायण नाम लेते, बरबस उन्हें परमेश्वर याद आ जाते। उनके मन के भाव विगलित होकर बरबस प्रभु के लिए उमड़ पड़ते। नारायण का भावपूर्ण स्मरण करते हुए उनका सब कुसंग छूट गया। मन की कालिमा हटने-घटने और मिटने लगी। अब तो वह यदा-कदा मेरे यहाँ भी आ जाते। एकादशी के व्रत-विधान और उपवास, इसने तो जैसे स्वर्ण को सुगन्धित कर दिया। अब उनकी कुसंगों के प्रति आसक्ति टूट गयी। उनका चित्त ममतारहित-आसक्तिरहित हो गया। एकादशी का दिवस और रात्रि तो उनके लिए साधना की अहोरात्रि हो गयी। धीरे-धीरे उनके द्वेष-दुर्भाव, टूटने-छूटने लगे। उनके अन्तहृदय में प्रसन्नता अविचल व स्थिर हो गयी। एक दिन वे चकित होकर मेरे पास आए और बोले- भगवन्! आपके सत्संग ने हमें चमत्कारित रूप से बदल दिया। उनके इस तरह कहने पर मैंने कहा- पुत्र! यह तो नारायण नाम का चमत्कार है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १८४

बुधवार, 29 दिसंबर 2021

👉 स्वामी विवेकानन्द के विचार

आओ हम नाम, यश और दूसरों पर शासन करने की इच्छा से रहित होकर काम करें। काम, क्रोध एंव लोभ -- इस त्रिविध बन्धन से हम मुक्त हो जायें और फिर सत्य हमारे साथ रहेगा।

एक ही आदमी मेरा अनुसरण करे, किन्तु उसे मृत्युपर्यन्त सत्य और विश्वासी होना होगा। मैं सफलता और असफलता की चिन्ता नहीं करता। मैं अपने आन्दोलन को पवित्र रखूँगा, भले ही मेरे साथ कोई न हो। कपटी कार्यों से सामना पडने पर मेरा धैर्य समाप्त हो जाता है। यही संसार है कि जिन्हें तुम सबसे अधिक प्यार और सहायता करो, वे ही तुम्हे धोखा देंगे।

प्रायः देखने में आता है कि अच्छे से अच्छे लोगों पर कष्ट और कठिनाइयाँ आ पडती हैं। इसका समाधान न भी हो सके, फिर भी मुझे जीवन में ऐसा अनुभव हुआ है कि जगत में कोई ऐसी वस्तु नहीं, जो मूल रूप में भली न हो। ऊपरी लहरें चाहे जैसी हों, परन्तु वस्तु मात्र के अन्तरकाल में प्रेम एवं कल्याण का अनन्त भण्डार है। जब तक हम उस
अन्तराल तक नहीं पहुँचते, तभी तक हमें कष्ट मिलता है। एक बार उस शान्ति-मण्डल में प्रवेश करने पर फिर चाहे आँधी और तूफान के जितने तुमुल झकोरे आयें, वह मकान, जो सदियों की पुरानि चट्टान पर बना है, हिल नहीं सकता।

न संख्या-शक्ति, न धन, न पाण्डित्य, न वाक चातुर्य, कुछ भी नहीं, बल्कि पवित्रता, शुध्द जीवन, एक शब्द में अनुभूति, आत्म-साक्षात्कार को विजय मिलेगी! प्रत्येक देश में सिंह जैसी शक्तिमान दस-बारह आत्माएँ होने दो, जिन्होने अपने बन्धन तोड डाले हैं, जिन्होने अनन्त का स्पर्श कर लिया है, जिन्का चित्र ब्रह्मनुसन्धान में लीन है, जो न धन की चिन्ता करते हैं, न बल की, न नाम की और ये व्यक्ति ही  संसार को हिला डालने के लिए पर्याप्त होंगे।

👉 भक्तिगाथा (भाग ९८)

नारायण नाम का चमत्कार

अजामिल की कथा ने सुनने वालों की भावनाओं को भिगो दिया। एक अजब सी नीरवता, निस्तब्धता, निस्पन्दता वातावरण में घिर आयी। सभी मौन थे, लेकिन सबके मन की गहरी परतों में कुछ स्पन्दित था। सम्भवतः सबके सब अपने मन के किसी कोने में यह सोच रहे थे कि कैसा घातक होता है कुसंग, जिसके प्रभाव से अजामिल जैसे तेजस्वी ब्राह्मण पुत्र की चरित्रनिष्ठा ढह गयी। शायद कुसंग ही माया का महास्र होता है, जिसका आघात सदा ही अचूक और अचानक होता है। जो भी इसकी लपेट में, चपेट में आया, वह घायल और क्षत-विक्षत हुए बिना नहीं रहता।

अजामिल के लिए उपस्थित ऋषिमण्डल एवं देवमण्डल के अन्तर्भावों में कहीं तरल संवेदना प्रवाहित हो उठी थी। सब उत्सुक हो रहे थे कि आगे की कथा जानने के लिए, सुनने के लिए और समझने के लिए क्योंकि उनके मन में जिज्ञासा थी कि अचानक आयी कुसंग की लहर क्या साधक की सम्पूर्ण समाप्ति कर देती है अथवा फिर पिछले समय की गयी साधना फिर कभी उदित होकर साधक का उद्धार करती है।

सबकी इस सोच से असंपृक्त महर्षि पुलह मन्द-मन्द मुस्कराते हुए देवर्षि की ओर देखे जा रहे थे। उनकी यह दृष्टि मर्मभेदी थी। शायद इसमें यह सच छुपा था कि न तो अभी अजामिल की कथा पूरी हुई है और न ही देवर्षि का सूत्र पूर्ण हुआ है। अपने मन्द हास्य को बीच में रोककर महर्षि पुलह अपनी रौ में बोले- कस्तरति कस्तरति मायाम्? उनका यह प्रश्न स्वयं से था अथवा भक्ति के आचार्य देवर्षि नारद से, यह तो किसी को भी समझ में नहीं आया। परन्तु देवर्षि ने महर्षि पुलह के ही अन्दाज में कहा- यः सङ्गास्त्यजति, यो महानुभावं सेवते, निर्ममो भवति। महर्षि पुलह के प्रश्न के अनुरूप ही देवर्षि का उत्तर था। मर्मभेदी प्रश्न का सटीक उत्तर। इसे सुनकर सुनने वालों को आश्वस्ति मिली।

लेकिन महर्षि वसिष्ठ के मुख से कुछ ऐसा लगा जैसे कि वह कुछ कहना चाहते हों? उनकी यह मुख मुद्रा भांपकर देवर्षि नारद ने कहा- ‘‘आपके कथन का स्वागत है महर्षि।’’ देवर्षि के इस कथन पर ऋषि वसिष्ठ हँसते हुए बोले- ‘‘मैं कुछ विशेष नहीं कहना चाहता, बस मैं आपके सूत्र को पूर्ण करना चाहता हूँ।’’ मेरे विचार से ऋषि पुलह का प्रश्न और आपका उत्तर मिलकर पूर्ण सूत्र की रचना करते हैं, कुछ इस तरह से-

‘कस्तरति कस्तरति मायाम्?
यः सङ्गास्त्यजति, यो महानुभावं सेवते, निर्ममो भवति’॥ ४६॥

(प्रश्न) कौन तरता है? (दुस्तर) माया से कौन तरता है? (उत्तर) जो सब सङ्गों का त्याग करता है, जो महानुभावों की सेवा करता है और जो ममतारहित होता है। महर्षि वसिष्ठ के इस सूत्र सम्पादन ने सभी के मन मुग्ध कर लिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १८४

मंगलवार, 28 दिसंबर 2021

👉 स्वामी विवेकानन्द के विचार

पूर्णतः निःस्वार्थ रहो, स्थिर रहो, और काम करो। एक बात और है। सबके सेवक बनो और दूसरों पर शासन करने का तनिक भी यत्न न करो, क्योंकि इससे ईर्ष्या उत्पन्न होगी और इससे हर चीज़ बर्बाद हो जायेगी। आगे बढो तुमने बहुत अच्छा काम किया है। हम अपने भीतर से ही सहायता लेंगे अन्य सहायता के लिए हम प्रतीक्षा नहीं करते। मेरे
बच्चे, आत्मविशवास रखो, सच्चे और सहनशील बनो।

यदि तुम स्वयं ही नेता के रूप में खडे हो जाओगे, तो तुम्हे सहायता देने के लिए कोई भी आगे न बढेगा। यदि सफल होना चाहते हो, तो पहले 'अहं' ही नाश कर डालो।

पक्षपात ही सब अनर्थों का मूल है, यह न भूलना। अर्थात् यदि तुम किसी के प्रति अन्य की अपेक्षा अधिक प्रीति-प्रदर्शन करते हो, तो याद रखो उसीसे भविष्य में कलह का बिजारोपण होगा।

बच्चे, जब तक तुम्हारे हृदय में उत्साह एवं गुरू तथा ईश्वर में विश्वास- ये तीनों वस्तुएँ रहेंगी -- तब तक तुम्हें कोई भी दबा नहीं सकता। मैं दिनो-दिन अपने हृदय में शक्ति के विकास का अनुभव कर रहा हूँ। हे साहसी बालकों, कार्य करते रहो।

रविवार, 26 दिसंबर 2021

👉 स्वामी विवेकानन्द के विचार

बच्चों, धर्म का रहस्य आचरण से जाना जा सकता है, व्यर्थ के मतवादों से नहीं। सच्चा बनना तथा सच्चा बर्ताव करना, इसमें ही समग्र धर्म निहित है। जो केवल प्रभु-प्रभु की रट लगाता है, वह नहीं, किन्तु जो उस परम पिता के इच्छानुसार कार्य करता है वही धार्मिक है। यदि कभी कभी तुमको संसार का थोडा-बहुत धक्का भी खाना पडे, तो उससे विचलित न होना, मुहूर्त भर में वह दूर हो जायगा तथा सारी स्थिति पुनः ठीक हो जायगी।

बालकों, दृढ बने रहो, मेरी सन्तानों में से कोई भी कायर न बने। तुम लोगों में जो सबसे अधिक साहसी है - सदा उसीका साथ करो। बिना विघ्न - बाधाओं के क्या कभी कोई महान कार्य हो सकता है? समय, धैर्य तथा अदम्य इच्छा-शक्ति से ही कार्य हुआ करता है। मैं तुम लोगों को ऐसी बहुत सी बातें बतलाता, जिससे तुम्हारे हृदय उछल पडते, किन्तु मैं ऐसा नहीं करूँगा। मैं तो लोहे के सदृश दृढ इच्छा-शक्ति सम्पन्न हृदय चाहता हूँ, जो कभी कम्पित न हो। दृढता के साथ लगे रहो, प्रभु तुम्हें आशीर्वाद दे। सदा शुभकामनाओं के साथ तुम्हारा विवेकानन्द।

साहसी होकर काम करो। धीरज और स्थिरता से काम करना -- यही एक मार्ग है। आगे बढो और याद रखो धीरज, साहस, पवित्रता और अनवरत कर्म। जब तक तुम पवित्र होकर अपने उद्देश्य पर डटे रहोगे, तब तक तुम कभी निष्फल नहीं होओगे -- माँ तुम्हें कभी न छोडेगी और पूर्ण आशीर्वाद के तुम पात्र हो जाओगे।

धीरज रखो और मृत्युपर्यन्त विश्वासपात्र रहो। आपस में न लडो! रुपये - पैसे के व्यवहार में शुध्द भाव रखो। हम अभी महान कार्य करेंगे। जब तक तुममें ईमानदारी, भक्ति और विश्वास है, तब तक प्रत्येक कार्य में तुम्हे सफलता मिलेगी।

शनिवार, 25 दिसंबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ९७)

कुसंग की तरंग बन जाती है महासमुद्र

‘‘हे महर्षि! इसे आवश्य कहें। आपके मुख से सुनकर हम सभी भक्ति के नवीन तत्त्व को जान सकेंगे।’’ महर्षि पुलह ये यह अनुरोध सभी ने लगभग एक साथ किया। महर्षि पुलह ने यह सुनकर एक बार अंतरिक्ष की ओर देखा फिर अपने मनःआकाश में लीन हो गए। सम्भवतः वह अपने स्मृतिकोश में कुछ खोज रहे थे। कुछ पलों की इस चुप्पी के बाद वे मुधर स्वर में बोले— ‘‘यह घटना श्रेष्ठकुल में उत्पन्न ब्राह्मणकुमार अजामिल की है। अजामिल अचारवान ब्राह्मणकुल में उत्पन्न हुआ था। उसने बचपन से ही त्रैकालिक संध्यावंदन के साथ गायत्री महामंत्र का जप करना सीखा था। संभवतः यह दैव कोप था कि उउसे सात्त्विक संस्कार देने वाले उसके पिता का देहावसान हो गया था। माता का निधन पहले ही उसके जन्म के समय हो गया था। पिता के इस असमय निधन ने अजामिल को अकेला कर दिया।

हालांकि पिता के इस निधन के बावजूद अजामिल ने अपनी साधना एवं अध्ययन को बरकरार रखा। यदा-कदा वह मेरे पास भी आया करता था। उन दिनों मैं उसी के गाँव के पास से गुजरने वाली नदी के तट पर कुटिया बनाकर साधना कर रहा था। मेरी मुलाकात उन दिनों यद्यपि किसी से नहीं होती थी, फिर भी मैं इस संस्कारवान ब्राह्मण बालक से मिलने के लिए समय निकाल लेता था। किशोर से तरुणाई की ओर अग्रसर अजामिल भी मेरे पास आकर प्रसन्न होता था। उसके मन में अनेक सात्त्विक जिज्ञासाएँ अंकुरित होती थी, जिनका मैं अपने विवेक के अनुसार समाधान कर दिया करता था, हालांकि इस सबके बीच यदा-कदा उसमें भावनात्मक पीड़ा के अंकुर फूटते थे। इस अंकुरण पर मैंने उसे कई बार सचेत किया- पुत्र! अपनी भावुकता और भावनात्मक पीड़ा को भक्ति में रूपान्तरित कर लो, अन्यथा तुम्हारा जीवन दिशा भटक सकता है।

मेरे इस कथन को वह अपने आचरण में न ढाल सका। इसी बीच उसके गाँव में चन्द्रलेखा नाम की नर्तकी का आगमन हुआ। वह नर्तकी कई महीनों तक उस गाँव में रही। प्रारम्भ में तो अजामिल उससे सर्वथा दूर बना रहा, परन्तु उसके युवा मित्र उसे बार-बार समझाते रहे- आखिर एक बार चलकर उसका नृत्य देखने क्या बुराई है, इससे तुम्हारी उदासी शांत होगी। तुम्हारी भावनात्मक पीड़ा में मरहम लगेगा। कुछ मित्रों का दबाव और कुछ भावोद्वेग, इन सभी से विवश होकर अजामिल ने यह बात मान ली और अंततः संस्कारवान, कुलीन, वेदपाठी ब्राह्मणकुमार अजामिल को कुसंग की उस लघु लहर ने छू लिया। रूप-यौवन से सम्पन्न चन्द्रलेखा के सम्मोहपाश में अजामिल अचानक कब बँधा, उसे स्वयं भी पता न चला।

लावण्यमयी चन्द्रलेखा भी उस तपस्वी ब्राह्मणकुमार अजामिल से सम्मोहित हुए बिना न रह सकी। उसने स्वयं बढ़कर अजामिल का हाथ थामा। अजामिल भी अब प्रायः हर दिन उसके नृत्य आयोजनों में जाने लगा। घुँघरू की रुन-झुन, तबले की तिरकिट-धिन में अजामिल के अनुष्ठान विलीन होने लगे। चन्द्रलेखा के सम्मोहन-पाश में बँधा अजामिल उसी को अपना सब कुछ मानने लगा। चन्द्रलेखा भी उसे भाँति-भाँति से रिझाने लगी। इसी क्रम में कुसंग की छोटी सी तरंग अब महासागर का रूप धरने लगी। वेद की ऋचाओं का सस्वर पाठ करने वाला अजामिल अब प्रेम के गीत गाने लगा। उसकी सम्पूर्ण चेतना इस महासमुद्र में डूबने लगी।

उसे अब कोई होश न था। कुछ की मर्यादाएँ विलीन हो चुकी थीं। नित्य का संध्यावंदन, गायत्री अर्चन कब और किस तरह से छूटा, पता ही न चला। उसकी स्वयं की स्थिति एक मूर्च्छित व्यक्ति की भाँति हो गइ। चन्द्रलेखा के मोहपाश से उमड़े कुसंग के महासागर में उसका सम्पूर्ण आध्यात्मिक वैभव डूब गया। अब तो वह सब कुछ भुलाकर चन्द्रलेखा के साथ ही रहने लगा। उसका नृत्य, उसकी गीत ही उसके लिए सब कुछ हो गए। हे ऋषिगण! यह मैंने स्वयं देखा है कि किस तरह कुसंग की तरंग ने धीरे-धीरे महासमुद्र का रूप धर कर सकी आध्यात्मिक चेतना को निगल लिया। वह महामाया के इस उफनते सागर को पार न कर सका, परन्तु चेतना की परतों में सम्भवतः अभी कुछ और छिपा था, जिसे अभी प्रकट होना था।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १८३

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2021

👉 टूटते रिश्ते

सुबह के साढ़े सात बजे जब निधि स्कूल के लिए ‌तैयार हुई तो‌ चुपके से ऊपर मम्मी के बेडरूम में ‌ग‌ई। धीरे से डोर सरकाया देखा तो सारा सामान बिखरा पड़ा था। नीचे ड्राइंग रूम में आई पापा सोफे पर बेसुध सो रहे थे। अपने रुम में आकर उसने अपनी गुल्लक में से पचास रुपए निकाल कर पौकेट में रख लिए। बैग उठा कर बस के लिए निकलने लगी तो सरोज आई निधि बेटा आलू का परांठा बनाया है खा लो। निधि ने मायूस नजरों से सरोज आंटी को देखा नहीं आंटी भूख नहीं है। सरोज ने जबरदस्ती टिफिन उसके बैग में डाला। निधि स्कूल के ‌लिए निकल गई सरोज ‌सोचने लगी बेचारी छोटी बच्ची साहब और मेमसाब के रोज के लडा़ई झगडे से इस तेरह साल की उम्र में ‌कितनी बड़ी हो गई है।

सरोज पिछले दस सालों से नेहा व नरेश के यहां काम कर रही है। दोनों ‌मल्टीनेशनल कंपनी में ऊंचे ‌पदों पर कार्यरत हैं। निधि उनकी इकलौती बेटी है किसी भी चीज की कोई कमी नहीं है। पर हर समय दोनों एक दूसरे से लड़ते रहते हैं। नरेश पिछले कुछ समय से नेहा से तलाक चाह रहा है और चाहता है निधि की जिम्मेदारी नेहा उठाए और नेहा निधि की जिम्मेदारी ‌नरेश को देने के साथ जायदाद में हिस्सा चाहती है। इस कारण दोनों ‌लड़ते रहते हैं। बच्चे की जिम्मेदारी कोई नहीं लेना चाहता इसलिए दोनों एक दूसरे के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल ‌करते हैं बेचारी निधि ‌स्कूल से घर आकर अपने कमरे में ‌दुबक जाती है केवल सरोज आंटी ‌से ही‌‌ बात करती है।

रोज‌ की तरह नेहा और नरेश ने नाश्ता ‌अपने अपने कमरे में किया और ऑफिस के लिए निकल गये। करीब बारह बजे स्कूल से कॉल आया कि जल्दी हास्पिटल पहुंचो निधि को चोट‌ आई है। हास्पिटल पहुंच कर पता चला कि निधि बहुत ऊपर से सीढ़ियों से गिर गई है। आईसीयू में रखा गया था। आपरेशन की तैयारी हो रही थी सिर में बहुत गहरी चोट आई थी। आपरेशन शुरू हुआ। पर जिंदगी ‌मौत से हार गई। नेहा और नरेश स्तब्ध रह गए। उन्हें ऐसा झटका लगा था कि अपनी सुध-बुध ही खो बैठे थे। निधि की दादी ‌भी आ गई थी बेटा बहू को देखकर नफरत से मुंह फेर लिया। पूछताछ हुई टीचर स्टुडेंट्स सभी के बयान लिए गए यही पता चला कि बैलेंस बिगड़ने से नीचे गिर गई। तेरहवां ‌निबटने‌ के बाद नरेश ने अपनी मां को रोकना चाहा पर उन्होंने आंखों में आंसू भर कर कहा तुम दोनों खूनी हो तुम्हारी जिद मेरी पोती को खा ग‌ई। मैं उसे अपने साथ ले जाना चाहती थी पर तुम दोनों ने उसे अपने अहम का मोहरा बना कर उसकी जान ले ली। मां चली गई।

सरोज तब से सदमे में थी फिर उसने जैसे तैसे होश संभाला नरेश और नेहा से कहा मेमसाब मैं अब यहां नहीं रह ‌पाऊंगी इस घर की दीवारें मेरी निधि की सिसकियों से भरी हैं। उसे मैंने कभी अपनी गोद में तो कभी छिप कर रोते हुए देखा है। कभी तो मेरा मन किया कि उसे लेकर भाग जाऊं पर मैं डरपोक थी ऐसा नहीं कर सकी। अगर चली जाती तो शायद वो आज जिंदा होती। नरेश और नेहा के पास अब शायद कहने को कुछ नहीं था। जैसे जैसे दिन बीत रहे थे उनका लडा़ई झगड़ा एक अजीब सी बर्फ में में तब्दील हो चुका था। उनकी सारी भावनाएं अंदर ‌ही अंदर एक खामोशी अख्तियार कर चुकी थी।

संडे का दिन था बड़ी मुश्किल से नेहा ने निधि के रूम में जाने की हिम्मत जुटाई थी महीनों दोनों उसके कमरे में कदम नहीं रखते थे कैसे मां बाप थे वो दोनों। उसका रूम उसका बेड तकिया उसकी किताबें उसकी पेंसिल पैन स्कूल बैग सब वैसे ही रखा था। अलमारी खोली तो उसके कपड़े नीचे गिर पड़े उसका हल्का ब्लू नाइट सूट जिसे वह अक्सर पहना करती थी। नेहा रोते हुए अलमारी से सामान निकालने लगी। तभी उसके‌ हाथ एक ब्लू कलर की डायरी लगी। उसने कांपते हाथों से उसे खोला आगे के कुछ पेज फटे हुए थे। पेज दर पेज टूटे‌ दिल की दास्तां छोटे छोटे टुकड़ों में दर्ज थी–

मम्मी पापा मैं आपको डियर नहीं ‌लिखूंगी । क्योंकि डियर का मीनिंग प्यारा होता है। पापा आप मम्मी को कहते हो कि तुम्हारी बेटी। और मम्मी आप पापा को कहते हो तुम्हारी बेटी आप दोनों ये क्यों नहीं कहते हो ‌हमारी‌ बेटी।

अगले पेज पर था–
पता है जब मैं मामा जी के घर ‌जाती हूं मामा मामी ‌मुझे बहुत प्यार‌ करते हैं मामी अनु को जब प्यार से मेरा बच्चा कहती हैं तो मुझे लगता है कि क्या मैं प्यारी बच्ची नहीं हूं ?मम्मा मैं तो ‌आपका सारा कहना मानती हूं फिर भी आपने मुझे कभी‌ प्यारी बच्ची नहीं कहा।
अगले पेज पर था–
मम्मी जब मैं बुआ के घर जाती हूं तो बुआ मुझे बहुत प्यार करती हैं। पर खाना नक्ष की पंसद‌ का बनाती हैं मम्मा मुझे भी ‌राजमा बहुत पसंद है मैंने कहा था कि आप बनाओ पर आपने कहा मुझे मत तंग किया करो। जो खाना है सरोज आंटी को बोला करो। पता है मम्मा मैंने राजमा खाना छोड़ दिया है।अब मन नहीं करता।

अगले पेज पर था–

पापा मैं आपके साथ आइसक्रीम खाने जाना चाहती थी पर आपने कहा आपके पास फालतू चीजों के लिए ‌टाइम नहीं है। पापा जब चीनू मासी और मौसा जी मुझे और विपुल को आइसक्रीम खाने ले जा सकते हैं तो फिर वो क्यों नहीं कहते कि ‌ये सब फालतू चीजें हैं ।पता है मम्मी मैं अपने घर से दूर जाना चाहती हूं जहां मुझे ये न सुनाई दे कि निधि को ‌मैं नहीं रखूंगी। जहां पापा के चिल्लाने की आवाज न सुनाई दे। पापा अगर मैं बड़ी होती तो मैं आप दोनों को कभी परेशान नहीं करती मैं खुद ही चली जाती। मैं तो आप दोनों से बहुत प्यार करती हूं। पापा मम्मी ‌आप दोनों मुझे प्यार क्यों नही करते।

एक पेज पर था–आइलव यू सरोज आंटी मुझे प्यार करने के लिए। जब मुझे डर लगता है अपने पास सुलाने के लिए।मेरी हर बात सुनने के लिए।

और अंतिम पेज पर था दादी आई लव यू आप मुझे यहां से ‌ले ‌जाओ आइ प्रामिस कभी तंग नहीं करूंगी।
नेहा डायरी को सीने से लगा कर जोर जोर से रो पड़ी।नरेश भी उसके रोने की आवाज सुनकर आ गया था नेहा ने डायरी उसे पकडा़ दी। पेज दर पेज पलटते हुए उसके चेहरे के भाव बदलते जा रहे थे। वह ‌खुद को संभाल नहीं पाया ‌जमीन पर बैठ गया। नेहा रोते हुए बोली नरेश पता है वो एक्सीडेंट नहीं आत्महत्या थी सुसाइड था जिस रिश्ते को हम बोझ समझते थे। हमारी निधि ने उससे ‌हमें आजाद कर‌ दिया। नरेश हम दोनों ने अपनी बच्ची ‌का खून किया है। नरेश फूट-फूट कर रो पड़ा।

ये कहानी हर उस घर की है जहां मां-बाप बच्चों के ‌सामने लड़ते हैं या घर टूट कर बिखरते हैं और उसका सबसे बड़ा खामियाजा बच्चे भरते हैं।अगर आप अच्छी परवरिश नहीं दे सकते तो आपको बच्चे को जन्म देने का कोई अधिकार नहीं है।

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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