बुधवार, 5 जनवरी 2022

👉 स्वामी विवेकानन्द के विचार

मेरी दृढ धारणा है कि तुममें अन्धविश्वास नहीं है। तुममें वह शक्ति विद्यमान है, जो संसार को हिला सकती है, धीरे - धीरे और भी अन्य लोग आयेंगे। 'साहसी' शब्द और उससे अधिक 'साहसी' कर्मों की हमें आवश्यकता है। उठो! उठो! संसार दुःख से जल रहा है। क्या तुम सो सकते हो? हम बार - बार पुकारें, जब तक सोते हुए देवता न जाग
 उठें, जब तक अन्तर्यामी देव उस पुकार का उत्तर न दें। जीवन में और क्या है? इससे महान कर्म क्या है?

अकेले रहो, अकेले रहो। जो अकेला रहता है, उसका किसीसे विरोध नहीं होता, वह किसीकी शान्ति भंग नहीं करता, न दूसरा कोई उसकी शान्ति भंग करता है।

जो पवित्र तथा साहसी है, वही जगत् में सब कुछ कर सकता है। माया-मोह से प्रभु सदा तुम्हारी रक्षा करें। मैं तुम्हारे साथ काम करने के लिए सदैव प्रस्तुत हूँ एवं हम लोग यदि स्वयं अपने मित्र रहें तो प्रभु भी हमारे लिए सैकडों मित्र भेजेंगे, आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुः।

अफसोस इस बात का है कि यदि मुझ जैसे दो - चार व्यक्ति भी तुम्हारे साथी होते - तमाम संसा हिल उठता। क्या करूँ धीरे - धीरे अग्रसर होना पड रहा है। तूफ़ान मचा दो तूफ़ान!

👉 भक्तिगाथा (भाग १००)

योग-क्षेम का त्यागी कहलाता है भक्त

अजामिल की कथा, भगवान के पवित्र नारायण नाम का प्रभाव एवं सत्संग की महिमा सुनकर, सुनने वालों की अन्तर्भूमि में भक्ति सरिता प्रवाहित हो उठी। वे सोचने लगे कि भक्ति भावनाओं को भिगोने के साथ उन्हें धुलकर धवल करती है। जो किसी भी भांति प्रत्यक्ष या परोक्ष, भक्तिमय भावनाओं अथवा भक्तिपूर्ण वातावरण के सम्पर्क में रहता है, उसे किसी भी कारण कल्मष की कालिमा छू भी नहीं सकती। कुटिल कुसंस्कार उसको सहज ही छोड़ देते हैं। सोचने वालों की ये चिन्तन तरंगें हिमालय के दिव्य वातावरण की सम्पूर्णता में व्याप्त हो गयीं। इनके पवित्र स्पन्दनों ने वहाँ की पावनता को भी पावन कर दिया। सभी ने महर्षि पुलह की ओर कृतज्ञ नजरों से देखा, जिन्होंने भक्ति, भक्त और भगवान के पवित्र नाम की महिमा बखान करने वाली यह सुमनोरम कथा सुनायी थी।

स्वयं महर्षि पुलह भी कम आह्लादित नहीं थे। उन्हें स्वयं में गहरी पुलकन एवं रोम-रोम में रोमांच की अनुभूति हो रही थी। अजामिल के अनुभव की बात सोचकर उन्हें लग रहा था कि कोई भी किसी भी स्थिति में क्यों न हो, उसका पुनरोदय सम्भव है। आखिरकार किसी जीवात्मा का पतन उसके चित्त की कालिमा और कलुष के कारण ही होता है, यदि यह कलुष व कालिमा किसी भी तरह धुल सके तो जीवात्मा अपने ईश्वरीय स्वरूप को पुनः पा सकती है और यह सब भक्तिमय भावना के द्वारा सम्भव है। भक्ति की पावनता से ही सब कुछ पावन होता है। भक्ति में वह परमपावनी सामर्थ्य है जिससे साधक, साधना एवं उसकी सिद्धि, तीनों ही पवित्र होते हैं। यही तो आध्यात्मिक जीवन साधना का शीर्ष व शिखर है। जो इसके अतिरिक्त किसी अन्य सिद्धि, उपलब्धि, सम्पदा व विभूति को साधना मान लेते हैं, वे भ्रम के भटकावों में ही भटकते रहते हैं।

महर्षि पुलह के इस अन्तर्चिन्तन के साथ सब तरफ मौन पसरा रहा। अन्य सभी के मन भी कहीं गहरे में डूबे रहे। यह स्थिति कितनी देर तक रही किसी को पता न चला।

हिमालय के हिमप्रपातों की कल-कल ध्वनि, हिमपक्षियों का कलरव एवं हिमप्रदेश में रहने वाले पशुओं की चित्र-विचित्र आवाजें भी इस निःस्पन्दता को स्पन्दित न कर सकीं। इसे तो महर्षि विश्वामित्र के स्वरों ने बेधा। उन्होंने देवर्षि को सम्बोधित करते हुए कहा- ‘‘हे भगवान विष्णु के परमप्रिय भक्त! हम सभी को आपके नवीन सूत्र की प्रतीक्षा है।’’ अब तक देवर्षि नारद भी पता नहीं किन भावों में खोए हुए थे। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के स्वरों ने उन्हें चेताया। विश्वामित्र का सम्बोधन सुनकर वह बड़े हल्के से मुस्कराए, फिर उनके मुख से बड़े मधुर स्वरों में प्रभु का परम पावन नाम नारायण! नारायण!! उच्चारित हुआ। इस अनोखे भक्तिपूर्ण उच्चारण से अन्य सभी की चिन्तन चेतना भी बाह्य जगत् में लौट आयी।
इसी के साथ देवर्षि नारद ने अपने नवीन सूत्र का मधुरवाणी में उच्चारण किया-

‘यो विविक्तस्थानं सेवते, यो लोकबन्धमुन्मूलयति,
निस्त्रैगुण्यो भवति, योगक्षेमं त्यजति’॥ ४७॥
जो निर्जन स्थान में वास करता है, जो लौकिक बन्धनों को तोड़ डालता है और जो योग तथा क्षेम का परित्याग कर देता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १८६

मंगलवार, 4 जनवरी 2022

👉 स्वामी विवेकानन्द के विचार

यही रहस्य है। योग प्रवर्तक पंतजलि कहते हैं, " जब मनुष्य समस्त अलौकेक दैवी शक्तियों के लोभ का त्याग करता है, तभी उसे धर्म मेघ नामक समाधि प्राप्त होती है। वह परमात्मा का दर्शन करता है, वह परमात्मा बन जाता है और दूसरों को तदरूप बनने में सहायता करता है। मुझे इसीका प्रचार करना है। जगत् में अनेक मतवादों का प्रचार हो चुका है। लाखों पुस्तकें हैं, परन्तु हाय! कोई भी किंचित् अंश में प्रत्य्क्ष आचरण नहीं करता।

एक महान रहस्य का मैंने पता लगा लिया है -- वह यह कि केवल धर्म की बातें करने वालों से मुझे कुछ भय नहीं है। और जो सत्यद्र्ष्ट महात्मा हैं, वे कभी किसी से बैर नहीं करते। वाचालों को वाचाल होने दो! वे इससे अधिक और कुछ नहीं जानते! उन्हे नाम,  यश, धन, स्त्री से सन्तोष प्राप्त करने दो। और हम धर्मोपलब्धि, ब्रह्मलाभ एवं ब्रह्म होने के लिए ही दृढव्रत होंगे। हम आमरण एवं जन्म-जन्मान्त में सत्य का ही अनुसरण करेंगें। दूसरों के कहने पर हम तनिक भी ध्यान न दें और यदि आजन्म यत्न के बाद एक, देवल एक ही आत्मा संसार के बन्धनों को तोडकर मुक्त हो सके तो हमने अपना काम कर लिया।

जो सबका दास होता है, वही उन्का सच्चा स्वामी होता है। जिसके प्रेम में ऊँच - नीच का विचार होता है, वह कभी नेता नहीं बन सकता। जिसके प्रेम का कोई अन्त नहीं है, जो ऊँच - नीच सोचने के लिए कभी नहीं रुकता, उसके चरणों में सारा संसार लोट जाता है।

वत्स, धीरज रखो, काम तुम्हारी आशा से बहुत ज्यादा बढ जाएगा। हर एक काम में सफलता प्राप्त करने से पहले सैंकडो कठिनाइयों का सामना करना पडता है। जो उद्यम करते रहेंगे, वे आज या कल सफलता को देखेंगे। परिश्रम करना है वत्स, कठिन परिश्रम्! काम कांचन के इस चक्कर में अपने आप को स्थिर रखना, और अपने आदर्शों पर जमे रहना, जब तक कि आत्मज्ञान और पूर्ण त्याग के साँचे में शिष्य न ढल जाय निश्चय ही कठिन काम है। जो प्रतिक्षा करता है, उसे सब चीज़े मिलती हैं। अनन्त काल तक तुम भाग्यवान बने रहो।

👉 भक्तिगाथा (भाग ९९)

नारायण नाम का चमत्कार

अब बारी इस सूत्र की व्याख्या की थी। इसके लिए सबकी नजरें प्रायः एक साथ ऋषि पुलह की ओर घूमीं क्योंकि अभी तक अजामिल की कथा आगे सुनने का उत्साह बना हुआ था। ऋषि पुलह भी इस सच से परिचित थे। उन्होंने कहा कुछ भी नहीं, बस कुछ समय तक मौन रहे, तब आगे बोले- ‘‘ब्राह्मणपुत्र अजामिल महामाया के दुस्तर भंवर में फँस चुका था। उसके चारों ओर घना अंधेरा था और सब तरफ इस अंधियारे के साथी उसे घेरे हुए थे। प्रकाश की एक भी किरण इस घने अंधेरे को भेद सके, ऐसा भी सम्भव न था। मैं स्वयं भी उस युवक के लिए चिन्तित था, पर स्थिति ऐसी न थी कि उसके लिए कुछ भी किया जा सके। बस यदा-कदा उसके बारे में सोच लेता था, और सर्वसमर्थ प्रभु से प्रार्थना करता था। हाँ! मेरे मन में बेचैनी और विवशता अवश्य थी।

तभी अचानक एक दिन खबर आयी कि चन्द्रलेखा ने एक सुपुत्र को जन्म दिया है। अन्य कोई तो उसके पुत्रजन्म के अवसर पर जाने को तैयार न था। हारकर उसने नामकरण के अवसर पर मुझे बुलावा भेजा। उसकी वेश्या पत्नी मेरे इस तरह बुलावे पर चिन्तित थी। उसकी चिन्ता का कारण यह था कि कहीं मैं उसके प्रेमी व पति अजामिल को वैराग्य का पाठ न पढ़ा दूँ परन्तु मेरा ऐसा कोई विचार न था। मैं तो अजामिल के परम कल्याण के लिए चिन्तित था। इसी चिन्ता को लिए मैं उसके द्वार पहुँचा। द्वार पर चन्द्रलेखा और अजामिल ने मेरा भरपूर स्वागत किया। हालांकि इस स्वागत में कहीं न कहीं संकोच छुपा था और इस संकोच में दोनों के अपने-अपने कारण थे। अजामिल के संकोच का कारण चन्द्रलेखा के प्रति उसका प्रेम और साधना से पतन था जबकि चन्द्रलेखा के संकोच का कारण उसके मन का पापभाव था जो लगातार दीर्घकाल से संचित हो रहा था।

परन्तु मैं उन दोनों के इस संकोच को दरकिनार कर उनसे बड़ी आत्मीयता से मिला। मेरी आत्मीयता देख वे दोनो रो पड़े। देर तक यूं ही उनका यह रोना चलता रहा। फिर अजामिल कहने लगा- भगवन्! क्या अब भी मेरे उद्धार की कोई राह शेष है परन्तु मैं अब अपनी पत्नी व पुत्र को नहीं छोड़ सकता। उसके इस कथन पर मैंने कहा- पुत्र! तुम्हें किसी को भी छोड़ने की जरूरत नहीं, क्योंकि भगवान के तो सभी अपने हैं। क्या मैं भी? चन्द्रलेखा के स्वर में किञ्चित उत्साह अधिक था। उसके इस तरह पूछने पर मैंने कहा- हाँ पुत्री! तुम भी। प्रभु के तो सभी अपने हैं। वे कभी किसी को नहीं भुलाते, हाँ हम ही किसी न किसी रूप में उनसे मुख मोड़ लेते हैं। मेरी इस बात ने उन दोनों को बड़ी आश्वस्ति दी। अब वे मुझे पूरे मन से सुनने के लिए तैयार थे।

उन्होंने कहा- हम दोनों को क्या करना होगा भगवन्! मैंने कहा कुछ विशेष नहीं। अभी तो हम लोग पुत्र का नामकरण कर लेते हैं। इतना कहते ही चन्द्रलेखा की दासी, पुत्र को ले आयी। बड़ा ही प्यारा शिशु था, बहुत ही लुभावना रूप था उसका। उसे गोद में लेते हुए मुझे ऐसा लगा जैसे कि स्वयं नारायणभक्त प्रह्लाद मेरी गोद में आ गए हों। यह स्मरण करते ही, बरबस मेरे मुख से नारायण निकल पड़ा। वे दोनों पति-पत्नी भी अनायास ही नारायण! नारायण!! बोल उठे। इस उच्चारण के बाद अजामिल ने कहा- भगवन्! क्या इसका नाम हम लोग नारायण रखें? अवश्य पुत्र! अब से नारायण ही इसका नाम होगा।

परन्तु आप ने मेरे उद्धार का कोई उपाय नहीं बताया? तुम्हारे पुत्र का यह नाम ही तुम्हारा उद्धार करेगा। इसके अतिरिक्त यदि कुछ और करना चाहते हो तो बस एकादशी का व्रत करो। एकादशी का व्रत सभी पापों का हरण व शमन करता है। एक बात और पुत्र, जब तुम अपने बेटे को नारायण नाम से पुकारना, तब यह भी स्मरण रखना कि यही नाम परमकरूणामय परमेश्वर का है। इतना कहकर मैं चुप हो गया। चन्द्रलेखा मेरे इस तरह से चुप होने पर बोली- हम दोनों को क्या बस इतना ही करना है?  मैंने कहा- हाँ पुत्री! करना तो बस इतना ही है, परन्तु बड़ी निष्ठापूर्वक और सच्चे व निष्कपट भाव से करना है।

अवश्य! उन दोनों ने लगभग एक साथ ही कहा। उन दोनों ने केवल इतना कहा ही नहीं, बल्कि इसे सच कर दिखाया। अब वे जब भी नारायण नाम लेते, बरबस उन्हें परमेश्वर याद आ जाते। उनके मन के भाव विगलित होकर बरबस प्रभु के लिए उमड़ पड़ते। नारायण का भावपूर्ण स्मरण करते हुए उनका सब कुसंग छूट गया। मन की कालिमा हटने-घटने और मिटने लगी। अब तो वह यदा-कदा मेरे यहाँ भी आ जाते। एकादशी के व्रत-विधान और उपवास, इसने तो जैसे स्वर्ण को सुगन्धित कर दिया। अब उनकी कुसंगों के प्रति आसक्ति टूट गयी। उनका चित्त ममतारहित-आसक्तिरहित हो गया। एकादशी का दिवस और रात्रि तो उनके लिए साधना की अहोरात्रि हो गयी। धीरे-धीरे उनके द्वेष-दुर्भाव, टूटने-छूटने लगे। उनके अन्तहृदय में प्रसन्नता अविचल व स्थिर हो गयी। एक दिन वे चकित होकर मेरे पास आए और बोले- भगवन्! आपके सत्संग ने हमें चमत्कारित रूप से बदल दिया। उनके इस तरह कहने पर मैंने कहा- पुत्र! यह तो नारायण नाम का चमत्कार है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १८४

बुधवार, 29 दिसंबर 2021

👉 स्वामी विवेकानन्द के विचार

आओ हम नाम, यश और दूसरों पर शासन करने की इच्छा से रहित होकर काम करें। काम, क्रोध एंव लोभ -- इस त्रिविध बन्धन से हम मुक्त हो जायें और फिर सत्य हमारे साथ रहेगा।

एक ही आदमी मेरा अनुसरण करे, किन्तु उसे मृत्युपर्यन्त सत्य और विश्वासी होना होगा। मैं सफलता और असफलता की चिन्ता नहीं करता। मैं अपने आन्दोलन को पवित्र रखूँगा, भले ही मेरे साथ कोई न हो। कपटी कार्यों से सामना पडने पर मेरा धैर्य समाप्त हो जाता है। यही संसार है कि जिन्हें तुम सबसे अधिक प्यार और सहायता करो, वे ही तुम्हे धोखा देंगे।

प्रायः देखने में आता है कि अच्छे से अच्छे लोगों पर कष्ट और कठिनाइयाँ आ पडती हैं। इसका समाधान न भी हो सके, फिर भी मुझे जीवन में ऐसा अनुभव हुआ है कि जगत में कोई ऐसी वस्तु नहीं, जो मूल रूप में भली न हो। ऊपरी लहरें चाहे जैसी हों, परन्तु वस्तु मात्र के अन्तरकाल में प्रेम एवं कल्याण का अनन्त भण्डार है। जब तक हम उस
अन्तराल तक नहीं पहुँचते, तभी तक हमें कष्ट मिलता है। एक बार उस शान्ति-मण्डल में प्रवेश करने पर फिर चाहे आँधी और तूफान के जितने तुमुल झकोरे आयें, वह मकान, जो सदियों की पुरानि चट्टान पर बना है, हिल नहीं सकता।

न संख्या-शक्ति, न धन, न पाण्डित्य, न वाक चातुर्य, कुछ भी नहीं, बल्कि पवित्रता, शुध्द जीवन, एक शब्द में अनुभूति, आत्म-साक्षात्कार को विजय मिलेगी! प्रत्येक देश में सिंह जैसी शक्तिमान दस-बारह आत्माएँ होने दो, जिन्होने अपने बन्धन तोड डाले हैं, जिन्होने अनन्त का स्पर्श कर लिया है, जिन्का चित्र ब्रह्मनुसन्धान में लीन है, जो न धन की चिन्ता करते हैं, न बल की, न नाम की और ये व्यक्ति ही  संसार को हिला डालने के लिए पर्याप्त होंगे।

👉 भक्तिगाथा (भाग ९८)

नारायण नाम का चमत्कार

अजामिल की कथा ने सुनने वालों की भावनाओं को भिगो दिया। एक अजब सी नीरवता, निस्तब्धता, निस्पन्दता वातावरण में घिर आयी। सभी मौन थे, लेकिन सबके मन की गहरी परतों में कुछ स्पन्दित था। सम्भवतः सबके सब अपने मन के किसी कोने में यह सोच रहे थे कि कैसा घातक होता है कुसंग, जिसके प्रभाव से अजामिल जैसे तेजस्वी ब्राह्मण पुत्र की चरित्रनिष्ठा ढह गयी। शायद कुसंग ही माया का महास्र होता है, जिसका आघात सदा ही अचूक और अचानक होता है। जो भी इसकी लपेट में, चपेट में आया, वह घायल और क्षत-विक्षत हुए बिना नहीं रहता।

अजामिल के लिए उपस्थित ऋषिमण्डल एवं देवमण्डल के अन्तर्भावों में कहीं तरल संवेदना प्रवाहित हो उठी थी। सब उत्सुक हो रहे थे कि आगे की कथा जानने के लिए, सुनने के लिए और समझने के लिए क्योंकि उनके मन में जिज्ञासा थी कि अचानक आयी कुसंग की लहर क्या साधक की सम्पूर्ण समाप्ति कर देती है अथवा फिर पिछले समय की गयी साधना फिर कभी उदित होकर साधक का उद्धार करती है।

सबकी इस सोच से असंपृक्त महर्षि पुलह मन्द-मन्द मुस्कराते हुए देवर्षि की ओर देखे जा रहे थे। उनकी यह दृष्टि मर्मभेदी थी। शायद इसमें यह सच छुपा था कि न तो अभी अजामिल की कथा पूरी हुई है और न ही देवर्षि का सूत्र पूर्ण हुआ है। अपने मन्द हास्य को बीच में रोककर महर्षि पुलह अपनी रौ में बोले- कस्तरति कस्तरति मायाम्? उनका यह प्रश्न स्वयं से था अथवा भक्ति के आचार्य देवर्षि नारद से, यह तो किसी को भी समझ में नहीं आया। परन्तु देवर्षि ने महर्षि पुलह के ही अन्दाज में कहा- यः सङ्गास्त्यजति, यो महानुभावं सेवते, निर्ममो भवति। महर्षि पुलह के प्रश्न के अनुरूप ही देवर्षि का उत्तर था। मर्मभेदी प्रश्न का सटीक उत्तर। इसे सुनकर सुनने वालों को आश्वस्ति मिली।

लेकिन महर्षि वसिष्ठ के मुख से कुछ ऐसा लगा जैसे कि वह कुछ कहना चाहते हों? उनकी यह मुख मुद्रा भांपकर देवर्षि नारद ने कहा- ‘‘आपके कथन का स्वागत है महर्षि।’’ देवर्षि के इस कथन पर ऋषि वसिष्ठ हँसते हुए बोले- ‘‘मैं कुछ विशेष नहीं कहना चाहता, बस मैं आपके सूत्र को पूर्ण करना चाहता हूँ।’’ मेरे विचार से ऋषि पुलह का प्रश्न और आपका उत्तर मिलकर पूर्ण सूत्र की रचना करते हैं, कुछ इस तरह से-

‘कस्तरति कस्तरति मायाम्?
यः सङ्गास्त्यजति, यो महानुभावं सेवते, निर्ममो भवति’॥ ४६॥

(प्रश्न) कौन तरता है? (दुस्तर) माया से कौन तरता है? (उत्तर) जो सब सङ्गों का त्याग करता है, जो महानुभावों की सेवा करता है और जो ममतारहित होता है। महर्षि वसिष्ठ के इस सूत्र सम्पादन ने सभी के मन मुग्ध कर लिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १८४

मंगलवार, 28 दिसंबर 2021

👉 स्वामी विवेकानन्द के विचार

पूर्णतः निःस्वार्थ रहो, स्थिर रहो, और काम करो। एक बात और है। सबके सेवक बनो और दूसरों पर शासन करने का तनिक भी यत्न न करो, क्योंकि इससे ईर्ष्या उत्पन्न होगी और इससे हर चीज़ बर्बाद हो जायेगी। आगे बढो तुमने बहुत अच्छा काम किया है। हम अपने भीतर से ही सहायता लेंगे अन्य सहायता के लिए हम प्रतीक्षा नहीं करते। मेरे
बच्चे, आत्मविशवास रखो, सच्चे और सहनशील बनो।

यदि तुम स्वयं ही नेता के रूप में खडे हो जाओगे, तो तुम्हे सहायता देने के लिए कोई भी आगे न बढेगा। यदि सफल होना चाहते हो, तो पहले 'अहं' ही नाश कर डालो।

पक्षपात ही सब अनर्थों का मूल है, यह न भूलना। अर्थात् यदि तुम किसी के प्रति अन्य की अपेक्षा अधिक प्रीति-प्रदर्शन करते हो, तो याद रखो उसीसे भविष्य में कलह का बिजारोपण होगा।

बच्चे, जब तक तुम्हारे हृदय में उत्साह एवं गुरू तथा ईश्वर में विश्वास- ये तीनों वस्तुएँ रहेंगी -- तब तक तुम्हें कोई भी दबा नहीं सकता। मैं दिनो-दिन अपने हृदय में शक्ति के विकास का अनुभव कर रहा हूँ। हे साहसी बालकों, कार्य करते रहो।

रविवार, 26 दिसंबर 2021

👉 स्वामी विवेकानन्द के विचार

बच्चों, धर्म का रहस्य आचरण से जाना जा सकता है, व्यर्थ के मतवादों से नहीं। सच्चा बनना तथा सच्चा बर्ताव करना, इसमें ही समग्र धर्म निहित है। जो केवल प्रभु-प्रभु की रट लगाता है, वह नहीं, किन्तु जो उस परम पिता के इच्छानुसार कार्य करता है वही धार्मिक है। यदि कभी कभी तुमको संसार का थोडा-बहुत धक्का भी खाना पडे, तो उससे विचलित न होना, मुहूर्त भर में वह दूर हो जायगा तथा सारी स्थिति पुनः ठीक हो जायगी।

बालकों, दृढ बने रहो, मेरी सन्तानों में से कोई भी कायर न बने। तुम लोगों में जो सबसे अधिक साहसी है - सदा उसीका साथ करो। बिना विघ्न - बाधाओं के क्या कभी कोई महान कार्य हो सकता है? समय, धैर्य तथा अदम्य इच्छा-शक्ति से ही कार्य हुआ करता है। मैं तुम लोगों को ऐसी बहुत सी बातें बतलाता, जिससे तुम्हारे हृदय उछल पडते, किन्तु मैं ऐसा नहीं करूँगा। मैं तो लोहे के सदृश दृढ इच्छा-शक्ति सम्पन्न हृदय चाहता हूँ, जो कभी कम्पित न हो। दृढता के साथ लगे रहो, प्रभु तुम्हें आशीर्वाद दे। सदा शुभकामनाओं के साथ तुम्हारा विवेकानन्द।

साहसी होकर काम करो। धीरज और स्थिरता से काम करना -- यही एक मार्ग है। आगे बढो और याद रखो धीरज, साहस, पवित्रता और अनवरत कर्म। जब तक तुम पवित्र होकर अपने उद्देश्य पर डटे रहोगे, तब तक तुम कभी निष्फल नहीं होओगे -- माँ तुम्हें कभी न छोडेगी और पूर्ण आशीर्वाद के तुम पात्र हो जाओगे।

धीरज रखो और मृत्युपर्यन्त विश्वासपात्र रहो। आपस में न लडो! रुपये - पैसे के व्यवहार में शुध्द भाव रखो। हम अभी महान कार्य करेंगे। जब तक तुममें ईमानदारी, भक्ति और विश्वास है, तब तक प्रत्येक कार्य में तुम्हे सफलता मिलेगी।

शनिवार, 25 दिसंबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ९७)

कुसंग की तरंग बन जाती है महासमुद्र

‘‘हे महर्षि! इसे आवश्य कहें। आपके मुख से सुनकर हम सभी भक्ति के नवीन तत्त्व को जान सकेंगे।’’ महर्षि पुलह ये यह अनुरोध सभी ने लगभग एक साथ किया। महर्षि पुलह ने यह सुनकर एक बार अंतरिक्ष की ओर देखा फिर अपने मनःआकाश में लीन हो गए। सम्भवतः वह अपने स्मृतिकोश में कुछ खोज रहे थे। कुछ पलों की इस चुप्पी के बाद वे मुधर स्वर में बोले— ‘‘यह घटना श्रेष्ठकुल में उत्पन्न ब्राह्मणकुमार अजामिल की है। अजामिल अचारवान ब्राह्मणकुल में उत्पन्न हुआ था। उसने बचपन से ही त्रैकालिक संध्यावंदन के साथ गायत्री महामंत्र का जप करना सीखा था। संभवतः यह दैव कोप था कि उउसे सात्त्विक संस्कार देने वाले उसके पिता का देहावसान हो गया था। माता का निधन पहले ही उसके जन्म के समय हो गया था। पिता के इस असमय निधन ने अजामिल को अकेला कर दिया।

हालांकि पिता के इस निधन के बावजूद अजामिल ने अपनी साधना एवं अध्ययन को बरकरार रखा। यदा-कदा वह मेरे पास भी आया करता था। उन दिनों मैं उसी के गाँव के पास से गुजरने वाली नदी के तट पर कुटिया बनाकर साधना कर रहा था। मेरी मुलाकात उन दिनों यद्यपि किसी से नहीं होती थी, फिर भी मैं इस संस्कारवान ब्राह्मण बालक से मिलने के लिए समय निकाल लेता था। किशोर से तरुणाई की ओर अग्रसर अजामिल भी मेरे पास आकर प्रसन्न होता था। उसके मन में अनेक सात्त्विक जिज्ञासाएँ अंकुरित होती थी, जिनका मैं अपने विवेक के अनुसार समाधान कर दिया करता था, हालांकि इस सबके बीच यदा-कदा उसमें भावनात्मक पीड़ा के अंकुर फूटते थे। इस अंकुरण पर मैंने उसे कई बार सचेत किया- पुत्र! अपनी भावुकता और भावनात्मक पीड़ा को भक्ति में रूपान्तरित कर लो, अन्यथा तुम्हारा जीवन दिशा भटक सकता है।

मेरे इस कथन को वह अपने आचरण में न ढाल सका। इसी बीच उसके गाँव में चन्द्रलेखा नाम की नर्तकी का आगमन हुआ। वह नर्तकी कई महीनों तक उस गाँव में रही। प्रारम्भ में तो अजामिल उससे सर्वथा दूर बना रहा, परन्तु उसके युवा मित्र उसे बार-बार समझाते रहे- आखिर एक बार चलकर उसका नृत्य देखने क्या बुराई है, इससे तुम्हारी उदासी शांत होगी। तुम्हारी भावनात्मक पीड़ा में मरहम लगेगा। कुछ मित्रों का दबाव और कुछ भावोद्वेग, इन सभी से विवश होकर अजामिल ने यह बात मान ली और अंततः संस्कारवान, कुलीन, वेदपाठी ब्राह्मणकुमार अजामिल को कुसंग की उस लघु लहर ने छू लिया। रूप-यौवन से सम्पन्न चन्द्रलेखा के सम्मोहपाश में अजामिल अचानक कब बँधा, उसे स्वयं भी पता न चला।

लावण्यमयी चन्द्रलेखा भी उस तपस्वी ब्राह्मणकुमार अजामिल से सम्मोहित हुए बिना न रह सकी। उसने स्वयं बढ़कर अजामिल का हाथ थामा। अजामिल भी अब प्रायः हर दिन उसके नृत्य आयोजनों में जाने लगा। घुँघरू की रुन-झुन, तबले की तिरकिट-धिन में अजामिल के अनुष्ठान विलीन होने लगे। चन्द्रलेखा के सम्मोहन-पाश में बँधा अजामिल उसी को अपना सब कुछ मानने लगा। चन्द्रलेखा भी उसे भाँति-भाँति से रिझाने लगी। इसी क्रम में कुसंग की छोटी सी तरंग अब महासागर का रूप धरने लगी। वेद की ऋचाओं का सस्वर पाठ करने वाला अजामिल अब प्रेम के गीत गाने लगा। उसकी सम्पूर्ण चेतना इस महासमुद्र में डूबने लगी।

उसे अब कोई होश न था। कुछ की मर्यादाएँ विलीन हो चुकी थीं। नित्य का संध्यावंदन, गायत्री अर्चन कब और किस तरह से छूटा, पता ही न चला। उसकी स्वयं की स्थिति एक मूर्च्छित व्यक्ति की भाँति हो गइ। चन्द्रलेखा के मोहपाश से उमड़े कुसंग के महासागर में उसका सम्पूर्ण आध्यात्मिक वैभव डूब गया। अब तो वह सब कुछ भुलाकर चन्द्रलेखा के साथ ही रहने लगा। उसका नृत्य, उसकी गीत ही उसके लिए सब कुछ हो गए। हे ऋषिगण! यह मैंने स्वयं देखा है कि किस तरह कुसंग की तरंग ने धीरे-धीरे महासमुद्र का रूप धर कर सकी आध्यात्मिक चेतना को निगल लिया। वह महामाया के इस उफनते सागर को पार न कर सका, परन्तु चेतना की परतों में सम्भवतः अभी कुछ और छिपा था, जिसे अभी प्रकट होना था।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १८३

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2021

👉 टूटते रिश्ते

सुबह के साढ़े सात बजे जब निधि स्कूल के लिए ‌तैयार हुई तो‌ चुपके से ऊपर मम्मी के बेडरूम में ‌ग‌ई। धीरे से डोर सरकाया देखा तो सारा सामान बिखरा पड़ा था। नीचे ड्राइंग रूम में आई पापा सोफे पर बेसुध सो रहे थे। अपने रुम में आकर उसने अपनी गुल्लक में से पचास रुपए निकाल कर पौकेट में रख लिए। बैग उठा कर बस के लिए निकलने लगी तो सरोज आई निधि बेटा आलू का परांठा बनाया है खा लो। निधि ने मायूस नजरों से सरोज आंटी को देखा नहीं आंटी भूख नहीं है। सरोज ने जबरदस्ती टिफिन उसके बैग में डाला। निधि स्कूल के ‌लिए निकल गई सरोज ‌सोचने लगी बेचारी छोटी बच्ची साहब और मेमसाब के रोज के लडा़ई झगडे से इस तेरह साल की उम्र में ‌कितनी बड़ी हो गई है।

सरोज पिछले दस सालों से नेहा व नरेश के यहां काम कर रही है। दोनों ‌मल्टीनेशनल कंपनी में ऊंचे ‌पदों पर कार्यरत हैं। निधि उनकी इकलौती बेटी है किसी भी चीज की कोई कमी नहीं है। पर हर समय दोनों एक दूसरे से लड़ते रहते हैं। नरेश पिछले कुछ समय से नेहा से तलाक चाह रहा है और चाहता है निधि की जिम्मेदारी नेहा उठाए और नेहा निधि की जिम्मेदारी ‌नरेश को देने के साथ जायदाद में हिस्सा चाहती है। इस कारण दोनों ‌लड़ते रहते हैं। बच्चे की जिम्मेदारी कोई नहीं लेना चाहता इसलिए दोनों एक दूसरे के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल ‌करते हैं बेचारी निधि ‌स्कूल से घर आकर अपने कमरे में ‌दुबक जाती है केवल सरोज आंटी ‌से ही‌‌ बात करती है।

रोज‌ की तरह नेहा और नरेश ने नाश्ता ‌अपने अपने कमरे में किया और ऑफिस के लिए निकल गये। करीब बारह बजे स्कूल से कॉल आया कि जल्दी हास्पिटल पहुंचो निधि को चोट‌ आई है। हास्पिटल पहुंच कर पता चला कि निधि बहुत ऊपर से सीढ़ियों से गिर गई है। आईसीयू में रखा गया था। आपरेशन की तैयारी हो रही थी सिर में बहुत गहरी चोट आई थी। आपरेशन शुरू हुआ। पर जिंदगी ‌मौत से हार गई। नेहा और नरेश स्तब्ध रह गए। उन्हें ऐसा झटका लगा था कि अपनी सुध-बुध ही खो बैठे थे। निधि की दादी ‌भी आ गई थी बेटा बहू को देखकर नफरत से मुंह फेर लिया। पूछताछ हुई टीचर स्टुडेंट्स सभी के बयान लिए गए यही पता चला कि बैलेंस बिगड़ने से नीचे गिर गई। तेरहवां ‌निबटने‌ के बाद नरेश ने अपनी मां को रोकना चाहा पर उन्होंने आंखों में आंसू भर कर कहा तुम दोनों खूनी हो तुम्हारी जिद मेरी पोती को खा ग‌ई। मैं उसे अपने साथ ले जाना चाहती थी पर तुम दोनों ने उसे अपने अहम का मोहरा बना कर उसकी जान ले ली। मां चली गई।

सरोज तब से सदमे में थी फिर उसने जैसे तैसे होश संभाला नरेश और नेहा से कहा मेमसाब मैं अब यहां नहीं रह ‌पाऊंगी इस घर की दीवारें मेरी निधि की सिसकियों से भरी हैं। उसे मैंने कभी अपनी गोद में तो कभी छिप कर रोते हुए देखा है। कभी तो मेरा मन किया कि उसे लेकर भाग जाऊं पर मैं डरपोक थी ऐसा नहीं कर सकी। अगर चली जाती तो शायद वो आज जिंदा होती। नरेश और नेहा के पास अब शायद कहने को कुछ नहीं था। जैसे जैसे दिन बीत रहे थे उनका लडा़ई झगड़ा एक अजीब सी बर्फ में में तब्दील हो चुका था। उनकी सारी भावनाएं अंदर ‌ही अंदर एक खामोशी अख्तियार कर चुकी थी।

संडे का दिन था बड़ी मुश्किल से नेहा ने निधि के रूम में जाने की हिम्मत जुटाई थी महीनों दोनों उसके कमरे में कदम नहीं रखते थे कैसे मां बाप थे वो दोनों। उसका रूम उसका बेड तकिया उसकी किताबें उसकी पेंसिल पैन स्कूल बैग सब वैसे ही रखा था। अलमारी खोली तो उसके कपड़े नीचे गिर पड़े उसका हल्का ब्लू नाइट सूट जिसे वह अक्सर पहना करती थी। नेहा रोते हुए अलमारी से सामान निकालने लगी। तभी उसके‌ हाथ एक ब्लू कलर की डायरी लगी। उसने कांपते हाथों से उसे खोला आगे के कुछ पेज फटे हुए थे। पेज दर पेज टूटे‌ दिल की दास्तां छोटे छोटे टुकड़ों में दर्ज थी–

मम्मी पापा मैं आपको डियर नहीं ‌लिखूंगी । क्योंकि डियर का मीनिंग प्यारा होता है। पापा आप मम्मी को कहते हो कि तुम्हारी बेटी। और मम्मी आप पापा को कहते हो तुम्हारी बेटी आप दोनों ये क्यों नहीं कहते हो ‌हमारी‌ बेटी।

अगले पेज पर था–
पता है जब मैं मामा जी के घर ‌जाती हूं मामा मामी ‌मुझे बहुत प्यार‌ करते हैं मामी अनु को जब प्यार से मेरा बच्चा कहती हैं तो मुझे लगता है कि क्या मैं प्यारी बच्ची नहीं हूं ?मम्मा मैं तो ‌आपका सारा कहना मानती हूं फिर भी आपने मुझे कभी‌ प्यारी बच्ची नहीं कहा।
अगले पेज पर था–
मम्मी जब मैं बुआ के घर जाती हूं तो बुआ मुझे बहुत प्यार करती हैं। पर खाना नक्ष की पंसद‌ का बनाती हैं मम्मा मुझे भी ‌राजमा बहुत पसंद है मैंने कहा था कि आप बनाओ पर आपने कहा मुझे मत तंग किया करो। जो खाना है सरोज आंटी को बोला करो। पता है मम्मा मैंने राजमा खाना छोड़ दिया है।अब मन नहीं करता।

अगले पेज पर था–

पापा मैं आपके साथ आइसक्रीम खाने जाना चाहती थी पर आपने कहा आपके पास फालतू चीजों के लिए ‌टाइम नहीं है। पापा जब चीनू मासी और मौसा जी मुझे और विपुल को आइसक्रीम खाने ले जा सकते हैं तो फिर वो क्यों नहीं कहते कि ‌ये सब फालतू चीजें हैं ।पता है मम्मी मैं अपने घर से दूर जाना चाहती हूं जहां मुझे ये न सुनाई दे कि निधि को ‌मैं नहीं रखूंगी। जहां पापा के चिल्लाने की आवाज न सुनाई दे। पापा अगर मैं बड़ी होती तो मैं आप दोनों को कभी परेशान नहीं करती मैं खुद ही चली जाती। मैं तो आप दोनों से बहुत प्यार करती हूं। पापा मम्मी ‌आप दोनों मुझे प्यार क्यों नही करते।

एक पेज पर था–आइलव यू सरोज आंटी मुझे प्यार करने के लिए। जब मुझे डर लगता है अपने पास सुलाने के लिए।मेरी हर बात सुनने के लिए।

और अंतिम पेज पर था दादी आई लव यू आप मुझे यहां से ‌ले ‌जाओ आइ प्रामिस कभी तंग नहीं करूंगी।
नेहा डायरी को सीने से लगा कर जोर जोर से रो पड़ी।नरेश भी उसके रोने की आवाज सुनकर आ गया था नेहा ने डायरी उसे पकडा़ दी। पेज दर पेज पलटते हुए उसके चेहरे के भाव बदलते जा रहे थे। वह ‌खुद को संभाल नहीं पाया ‌जमीन पर बैठ गया। नेहा रोते हुए बोली नरेश पता है वो एक्सीडेंट नहीं आत्महत्या थी सुसाइड था जिस रिश्ते को हम बोझ समझते थे। हमारी निधि ने उससे ‌हमें आजाद कर‌ दिया। नरेश हम दोनों ने अपनी बच्ची ‌का खून किया है। नरेश फूट-फूट कर रो पड़ा।

ये कहानी हर उस घर की है जहां मां-बाप बच्चों के ‌सामने लड़ते हैं या घर टूट कर बिखरते हैं और उसका सबसे बड़ा खामियाजा बच्चे भरते हैं।अगर आप अच्छी परवरिश नहीं दे सकते तो आपको बच्चे को जन्म देने का कोई अधिकार नहीं है।

👉 स्वामी विवेकानन्द के विचार

मन और मुँह को एक करके भावों को जीवन में कार्यान्वित करना होगा। इसीको श्री रामकृष्ण कहा करते थे, "भाव के घर में किसी प्रकार की चोरी न होने पाये।" सब विषओं में व्यवहारिक बनना होगा। लोगों या समाज की बातों पर ध्यान न देकर वे एकाग्र मन से अपना कार्य करते रहेंगे क्या तुने नहीं सुना, कबीरदास के दोहे में है- "हाथी चले बाजार में, कुत्ता भोंके हजार साधुन को दुर्भाव नहिं, जो निन्दे संसार" ऐसे ही चलना है। दुनिया के लोगों की बातों पर ध्यान नहीं देना होगा। उनकी भली बुरी बातों को सुनने से जीवन भर कोई किसी प्रकार का महत् कार्य नहीं कर सकता।

अन्त में प्रेम की ही विजय होती है। हैरान होने से काम नहीं चलेगा- ठहरो- धैर्य धारण करने पर सफलता अवश्यम्भावी है- तुमसे कहता हूँ देखना- कोई बाहरी अनुष्ठानपध्दति आवश्यक न हो- बहुत्व में एकत्व सार्वजनिन भाव में किसी तरह की बाधा न हो। यदि आवश्यक हो तो "सार्वजनीनता" के भाव की रक्षा के लिए सब कुछ छोडना होगा। मैं मरूँ चाहे बचूँ, देश जाऊँ या न जाऊँ, तुम लोग अच्छी तरह याद रखना कि, सार्वजनीनता- हम लोग केवल इसी भाव का प्रचार नहीं करते कि, "दुसरों के धर्म का द्वेष न करना"; नहीं, हम सब लोग सब धर्मों को सत्य समझते हैं और उन्का ग्रहण भी पूर्ण रूप से करते हैं हम इसका प्रचार भी करते हैं और इसे कार्य में परिणत कर दिखाते हैं सावधान रहना, दूसरे के अत्यन्त छोटे अधिकार में भी हस्तक्षेप न करना - इसी भँवर में बडे-बडे जहाज डूब जाते हैं पुरी भक्ति, परन्तु कट्टरता छोडकर, दिखानी होगी, याद रखना उन्की कृपा से सब ठीक हो जायेगा।

जिस तरह हो, इसके लिए हमें चाहे जितना कष्ट उठाना पडे- चाहे कितना ही त्याग करना पडे यह भाव (भयानक ईर्ष्या) हमारे भीतर न घुसने पाये- हम दस ही क्यों न हों- दो क्यों न रहें- परवाह नहीं परन्तु जितने हों सम्पूर्ण शुध्दचरित्र हों।

क्या संस्कृत पढ रहे हो? कितनी प्रगति होई है? आशा है कि प्रथम भाग तो अवश्य ही समाप्त कर चुके होगे। विशेष परिश्रम के साथ संस्कृत सीखो।

👉 भक्तिगाथा (भाग ९६)

कुसंग की तरंग बन जाती है महासमुद्र

महर्षि रुक्मवर्ण की अनुभव कथा सुनने वालों के दिलों को गहराई तक छुआ। सभी कहे गए शब्दों के भावों में गहरे डूबे, रोमांचित हुए। इसे सुनते-सुनते किसी की आँखें छलछलाई तो कोई अपनी आँखें मूँदकर स्वयं में खो गया। महर्षि के अपने अतीत की यह अनुभूति थी ही कुछ ऐसी, जो बरबस सभी को स्वयं में घोलती चली गई। इतना ही नहीं, यह स्वयं भी सबमें घुल गई। उन क्षणों में जिन्होंने भी ऋषि रुक्मवर्ण की यह कथा सुनी, उन्हें यह सोचकर सिहरन हो आई कि कितना विषैला फल है कुसंग का। यह कुसंग चिन्तन के द्वार से प्रवेश कर सम्पूर्ण चेतना को विषाक्त कर देता है। फिर क्या है- इसके प्रभाव वाली विषैली मूर्च्छा में व्यक्ति कुछ भी करने लगता है। जो कर रहा है, उसकी दशा एवं उसके दुष्परिणामों के बारे में सोचने की उसकी स्थिति ही नहीं रहती।

अप्रकट रूप से चिंतन की ये लहरें प्रायः सभी के चित्त में उठती-गिरती रहीं, किन्तु प्रकट रूप से सब ओर मौन पसरा रहा। निस्तब्ध पवर्तशिखर मौन साधे खड़े थे। उन्होंने अपनी ओट में झरनों के संगीत को छिपा लिया था। हिमपक्षिों का कलरव भी इस समय शांत था। पशु, जिन्हें बेजुबान कहा जाता है, वे भी अभी इधर-उधर कहीं गुम हो गए थे। ऋषियों, देवों, सिद्धों का यह समुदाय अभी तक इस प्रश्न-कटंक की चुभन कर रहा था कि कुसंग के विषैले काँटों से इस युग को किस तरह से बचाया जाय? लेकिन देवर्षि नारद के मुख मण्डल की भाव ऊर्मियाँ कुछ और ही कह रही थी। उन्हें जैसे अभी कुछ और कहना था। सम्भवतः वे अभी कुसंग के प्रभाव को थोड़ा और अधिक बताया चाहते थे।

उनके इन भावों पर महर्षि पुलह की दृष्टि गई। अपने इस दृष्टि-निक्षेप से अंतर्यामी महर्षि ने देवर्षि के मन का सच जान लिया और उन्होंने लगभग मुस्कराते हुए कहा- ‘‘अपने नवीन सूत्र को कहें देवर्षि! क्योंकि आपका प्रत्येक नवीन सूत्र इस प्रवाहमान भक्ति-सरिता में पवित्र भावों की नई जलधार की भाँति होता है।’’ महर्षि पुलह की मुस्कान और उसके इस कथन ने शून्य नीरवता में सर्वथा नवीन चेतना का संचार किया। सभी की चेतना के उद्यान में अनायास भावों के पुष्प विहँस उठे। इस दश्य ने देवर्षि को भी विभोर किया। उन्होंने प्रसन्नता के साथ अपने नवीन सूत्र का उच्चार करते हुए कहा-

‘‘तरङ्गायिता अपीमे सङ्गात्समुद्रायन्ति’’॥ ४५॥
ये(काम, क्रोध आदि विकार) पहले तरंग की तरह (क्षुद्र आकार में) आकार भी (दुःसंग के प्रभाव से) विशाल समुद्र का आकार ग्रहण कर लेते हैं।

देवों के भी पूज्य ऋषि नारद के मुख से यह सूत्र सुनकर ऋषि पुलह के माथे की लकीरें कुछ गहरी हुईं। उनके मुख की प्रदीप्ति में एक घनापन आया, परन्तु वे मौन रहे। उनके इस सूक्ष्म भाव-परिवर्तन को देवर्षि सहित सभी ने निहारा। देवर्षि कुछ क्षणों तक उन्हें यों ही देखते रहे, फिर  बोले- ‘‘मेरे आज के सूत्र पर आप कुछ कहेंगे ऋषिश्रेष्ठ।’’ उत्तम में महर्षि पुलह ने धीमे स्वर में कहा ‘‘इस बारे में कहने के लिए कुछ नया नहीं है। जो कुछ मैं कहना चाहता हूँ उसे आप सभी जानते हैं। पुराणकथाओं में भी इसका उल्लेख है। मेरी यदि कुछ नवीनता है तो बस इतनी कि मैं इस घटनाक्रम का स्वयं साक्षी रहा हूँ।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १८२

बुधवार, 22 दिसंबर 2021

👉 स्वामी विवेकानन्द के विचार

ईश्वर ही ईश्वर की उपलब्थि कर सकता है। सभी जीवंत ईश्वर हैं–इस भाव से सब को देखो। मनुष्य का अध्ययन करो, मनुष्य ही जीवन्त काव्य है। जगत में जितने ईसा या बुद्ध हुए हैं, सभी हमारी ज्योति से ज्योतिष्मान हैं। इस ज्योति को छोड़ देने पर ये सब हमारे लिए और अधिक जीवित नहीं रह सकेंगे, मर जाएंगे। तुम अपनी आत्मा के ऊपर स्थिर रहो।

मानव-देह ही सर्वश्रेष्ठ देह है, एवं मनुष्य ही सर्वोच्च प्राणी है, क्योंकि इस मानव-देह तथा इस जन्म में ही हम इस सापेक्षिक जगत् से संपूर्णतया बाहर हो सकते हैं–निश्चय ही मुक्ति की अवस्था प्राप्त कर सकते हैं, और यह मुक्ति ही हमारा चरम लक्ष्य है।

जो महापुरुष प्रचार-कार्य के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं, वे उन महापुरुषों की तुलना में अपेक्षाकृत अपूर्ण हैं, जो मौन रहकर पवित्र जीवनयापन करते हैं और श्रेष्ठ विचारों का चिन्तन करते हुए जगत् की सहायता करते हैं। इन सभी महापुरुषों में एक के बाद दूसरे का आविर्भाव होता है–अंत में उनकी शक्ति का चरम फलस्वरूप ऐसा कोई शक्तिसम्पन्न पुरुष आविर्भूत होता है, जो जगत् को शिक्षा और सुरक्षा  प्रदान करता है।

मुक्ति-लाभ के अतिरिक्त और कौन सी उच्चावस्था का लाभ किया जा सकता है? देवदूत कभी कोई बुरे कार्य नहीं करते, इसलिए उन्हें कभी दंड भी प्राप्त नहीं होता, अतएव वे मुक्त भी नहीं हो सकते। सांसारिक धक्का ही हमें जगा देता है, वही इस जगत्स्वप्न को भंग करने में सहायता पहुँचाता है। इस प्रकार के लगातार आघात ही इस संसार से छुटकारा पाने की अर्थात् मुक्ति-लाभ करने की हमारी आकांक्षा को जाग्रत करते हैं।

👉 भक्तिगाथा (भाग ९५)

उबारता है सत्संग

उनकी अतिरूपवती कन्या अपने सलज्ज किन्तु सम्मोहक नयनों से बार-बार उनकी बातों में स्वयं की सहमति जता रही थी। बातों-बातों में वह बीच में अपनी बेटी से पूछ लेते थे कि बेटी! तुम्हें इनकी भक्ति से कोई आपत्ति तो नहीं है? उत्तर में हर बार वह यही कहती- मैं तो स्वयं इनके साथ भक्तिमय जीवन जीना चाहती हूँ। परन्तु ये तो केवल बातें थीं। इन बातों के पीछे रची जा रही अन्तर्कथा कुछ और ही थी। सत्य यही था कि भक्तिपूर्ण जीवन से उस समय किसी को कोई लेना-देना न था। उनकी कन्या को सुशील, स्वस्थ, सुन्दर और आज्ञाकारी पति चाहिए था। उसने इन सारी बातों की परखकर हामी भरी थी। उन सम्पन्न व्यवसायी को अपनी अतुलनीय सम्पत्ति के लिए ऐसे प्रहरी व प्रबन्धक की आवश्यकता थी, जो ईमानदार हो। उन्होंने अपनी आवश्यकता के अनुरूप सभी गुणों को मुझमें परख लिया था।

जहाँ तक मेरी स्वयं की स्थिति की बात थी, तो मेरी चित्त चेतना दुःसंग के कुपरिणामों से आक्रान्त होने लगी थी। सदा प्रभुस्मरण करने वाला मेरा मन इस समय वासनाओं के कुहांसे से घिरा हुआ था। कामज्वर से मेरा तन-मन तप रहा था। कहीं यह सब कुछ मेरे हाथ से निकल न जाय यह सोचकर एक अजीब सी खीझ-झुंझलाहट और क्रोध मेरे भीतर उफन रहा था। रही बात मोह की तो इस समय मेरी पूरी चेतना ही मोहाक्रान्त थी। इस विनाशकारी मोह ने मेरी सभी पवित्र स्मृतियों को खण्डित और नष्ट कर दिया था। मै इस समय अपने स्वरूप एवं कर्त्तव्य को पूरी तरह से भूल चुका था। रही बात मेरी बुद्धि की तो उसकी तर्क, निर्णय एवं विश्लेषण क्षमताएँ समाप्त हो चुकी थीं। ऐसी विनष्ट हुई बुद्धि के साथ मैं अपने सर्वनाश के द्वार पर खड़ा था।

कुछ समय के दुःसंग ने मेरे सभी आध्यात्मिक गुणों का हरण कर लिया था, विवेक-वैराग्य का लेश भी मुझमें अब न बचा था। बस मेरी चिन्तन चेतना में एक ही त्वरा थी कि किस विधि से वह रूपवती कन्या मेरी पत्नी बन जाय? और मैं कितना शीघ्र उस व्यवसायी के सम्पन्न एवं सुविस्तृत व्यावसायिक साम्राज्य का स्वामी बनूं। मेरा धैर्य चुक रहा था, टूट रहा था। मैं अपने स्वयं के आध्यात्मिक जीवन का सर्वनाश करने के लिए उतारू था। लेकिन शायद अभी मेरे कुछ पुण्य शेष बचे थे। विधाता को मेरे जीवन की दिशा का कुछ और ही निर्धारण करना था।

तभी अकल्पित होनी की भांति मेरे पूज्य आचार्य ने द्वार पर दस्तक दी। इसके बारे में उन्होंने बाद में बताया कि मेरे लिए वह अपनी तीर्थयात्रा बीच में ही छोड़कर चले आए थे। उन्हें यह अनुभव हो गया था कि मैं किसी बड़े संकट में फँस गया हूँ। द्वार पर आते ही उन्होंने पुकारा- कैसे हो पुत्र रूक्मवर्ण? किन्तु आश्चर्य सदा ही उनकी एक पुकार पर भाग कर आने वाला मैं आज उनके स्वरों को पहचान न सका। बस जैसा का तैसा बैठा रहा। अन्दर आकर उन्होंने उस व्यवसायी का संरजाम भी देख लिया। वे अन्तर्ज्ञानी थे, उन्हें सत्य को समझने में देर न लगी।

लेकिन उन्होंने कुछ कहा नहीं। बस मेरे पास आकर उन्होंने स्नेह से मेरे सिर पर हाथ रखा और बोले- तनिक मेरी आँखों में देखो पुत्र! मैंने अनमने भाव से उनके नयनों में निहारा। लेकिन यह क्या उनके नेत्रों में निहारते ही असंख्य प्रकाशधाराएँ मेरे अस्तित्त्व में प्रवाहित हो उठीं। वासना की घटाएँ कब और कहाँ विलीन हुईं, मुझे पता भी न चला। मेरा चित्त फिर से विवेक-वैराग्य से दीप्त हो उठा। दुःसंग ने मुझे सर्वनाश के जिस महागर्भ में धकेला था, सत्संग ने मुझे फिर से उबार लिया। मेरे आचार्य को देखकर उन व्यवसायी महोदय को भी सम्भवतः अपनी भूल का अहसास हुआ। बस वह बिना कुछ बोले मेरे पूज्य आचार्यदेव को प्रणाम कर वहाँ से चले गए और मैं स्वयं पुनः अपने निर्धारित आध्यात्मिक पथ पर चलने लगा।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १८१

सोमवार, 20 दिसंबर 2021

👉 जनम - जनम के साक्षी व साथी हैं हमारे गुरु देव

यह घटना महर्षि अरविन्द और उनके शिष्य दिलीप कुमार राय के बारे में थी। विश्व विख्यात संगीतकार दिलीप राय उन दिनों श्री अरविन्द से दीक्षा पाने के लिए जोर जबरदस्ती करते थे। वह ऐसी दीक्षा चाहते थे, जिसमें श्री अरविन्द दीक्षा के साथ ही उन पर शक्तिपात करें। उनके इस अनुरोध को महर्षि हर बार टाल देते थे। ऐसा कई बार हो गया। निराश दिलीप ने सोचा कि इनसे कुछ काम बनने वाला नहीं है। चलो किसी दूसरे गुरु की शरण में जाएँ। और उन्होंने एक महात्मा की खोज कर ली। ये सन्त पाण्डिचेरी से काफी दूर एक सुनसान स्थान में रहते थे।

दीक्षा की प्रार्थना लेकर जब दिलीप राय उन सन्त के पास पहुँचे। तो वह इस पर बहुत हँसे और कहने लगे- तो तुम हमें श्री अरविन्द से बड़ा योगी समझते हो। अरे वह तुम पर शक्तिपात नहीं कर रहे, यह भी उनकी कृपा है। दिलीप को आश्चर्य हुआ- ये सन्त इन सब बातों को किस तरह से जानते हैं। पर वे महापुरुष कहे जा रहे थे, तुम्हारे पेट में भयानक फोड़ा है। अचानक शक्तिपात से यह फट सकता है, और तुम्हारी मौत हो सकती है। इसलिए तुम्हारे गुरु पहले इस फोड़े को ठीक कर रहे हैं। इसके ठीक हो जाने पर वह तुम्हें शक्तिपात दीक्षा देंगे। अपने इस कथन को पूरा करते हुए उन योगी ने दिलीप से कहा- मालूम है, तुम्हारी ये बातें मुझे कैसे पता चली? अरे अभी तुम्हारे आने से थोड़ी देर पहले सूक्ष्म शरीर से महर्षि अरविन्द स्वयं आए थे। उन्होंने ही मुझे तुम्हारे बारे में सारी बातें बतायी।

उन सन्त की बातें सुनकर दिलीप तो अवाक् रह गये। अपने शिष्य वत्सल गुरु की करुणा को अनुभव कर उनका हृदय भर आया। पर ये बातें तो महर्षि उनसे भी कह सकते थे, फिर कहा क्यों नहीं? यह सवाल जब उन्होंने वापस पहुँच कर श्री अरविन्द से पूछा, तो वह हँसते हुए बोले, यह तू अपने आप से पूछ, क्या तू मेरी बातों पर आसानी से भरोसा कर लेता। दिलीप को लगा, हाँ यह बात भी सही है। निश्चित ही मुझे भरोसा नहीं होता। पर अब भरोसा हो गया। इस भरोसे का परिणाम भी उन्हें मिला निश्चित समय पर श्री अरविन्द ने उनकी इच्छा पूरी की।

यह सत्य कथा सुनाकर गुरुदेव बोले- बेटा! गुरु को अपने हर शिष्य के बारे में सब कुछ मालूम होता है। वह प्रत्येक शिष्य के जन्मों- जन्मों का साक्षी और साथी है। किसके लिए उसे क्या करना है, कब करना है वह बेहतर जानता है। सच्चे शिष्य को अपनी किसी बात के लिए परेशान होने की जरूरत नहीं है। उसका काम है सम्पूर्ण रूप से गुरु को समर्पण और उन पर भरोसा। इतना कहकर वह हँसने लगे, तू यही कर। मैं तेरे लिए उपयुक्त समय पर सब कर दूँगा। जितना तू अपने लिए सोचता है, उससे कहीं ज्यादा कर दूँगा। मुझे अपने हर बच्चे का ध्यान है। अपनी बात को बीच में रोककर अपनी देह की ओर इशारा करते हुए बोले- बेटा! मेरा यह शरीर रहे या न रहे, पर मैं अपने प्रत्येक शिष्य को पूर्णता तक पहुँचाऊँगा। समय के अनुरूप सबके लिए सब करूंगा। किसी को भी चिन्तित- परेशान होने की जरूरत नहीं  है। गुरुदेव के यह वचन प्रत्येक  शिष्य के लिए महामंत्र के समान हैं। अपने गुरु के आश्रय में बैठे किसी शिष्य के लिए कोई चिन्ता और भय नहीं है।

अखण्ड ज्योति जुलाई 2003

👉 स्वामी विवेकानन्द के विचार

किसी को उसकी योजनाओं में हतोत्साह नहीं करना चाहिए। आलोचना की प्रवृत्ति का पूर्णतः परित्याग कर दो। जब तक वे सही मार्ग पर अग्रेसर हो रहे हैं; तब तक उन्के कार्य में सहायता करो; और जब कभी तुमको उनके कार्य में कोई ग़लती नज़र आये, तो नम्रतापूर्वक ग़लती के प्रति उनको सजग कर दो। एक दूसरे की आलोचना ही सब दोषों की जड है। किसी भी संगठन को विनष्ट करने में इसका बहुत बडा हाथ है।

हर काम को तीन अवस्थाओं में से गुज़रना होता है -- उपहास, विरोध और स्वीकृति। जो मनुष्य अपने समय से आगे विचार करता है, लोग उसे निश्चय ही ग़लत समझते है। इसलिए विरोध और अत्याचार हम सहर्ष स्वीकार करते हैं; परन्तु मुझे दृढ और पवित्र होना चाहिए और भगवान् में अपरिमित विश्वास रखना चाहिए, तब ये सब लुप्त हो जायेंगे।

भाग्य बहादुर और कर्मठ व्यक्ति का ही साथ देता है। पीछे मुडकर मत देखो आगे, अपार शक्ति, अपरिमित उत्साह, अमित साहस और निस्सीम धैर्य की आवश्यकता है- और तभी महत कार्य निष्पन्न किये जा सकते हैं। हमें पूरे विश्व को उद्दीप्त करना है।

जब तक तुम लोगों को भगवान तथा गुरू में, भक्ति तथा सत्य में विश्वास रहेगा,तब तक कोई भी तुम्हें नुक़सान नहीं पहुँचा सकता। किन्तु इनमें से एक के भी नष्ट हो जाने पर परिणाम विपत्तिजनक है।

👉 भक्तिगाथा (भाग ९४)

उबारता है सत्संग

वर्षों पूर्व अतीत में साधु द्वारा सुनाए गए उस प्रभाती गीत का स्मरण करके महर्षि रूक्मवर्ण की आँखें छलक आयीं। वह देर तक यूं ही मौन बैठे आकाश को निहारते रहे। इस बीच न तो उन्हें किसी ने टोका और न ही वह स्वयं ही कुछ बोले। बस उन्हें अनन्त आकाश की ओर देखते हुए कुछ ऐसा लग रहा था जैसे कि वह इस अनन्त अन्तरिक्ष में व्याप्त रहस्यमय विधाता द्वारा लिखे गए रहस्यमय अक्षरों को पढ़ने की कोशिश कर रहे हों। इस बीच सब कुछ ठहरा रहा। हवाओं में निस्पन्द नीरवता संव्याप्त रही। हिमालय के उत्तुंग पर्वत शिखर, बर्फ की श्वेत-धवल चादर ओढ़े मौन खड़े रहे। बीतते क्षणों के साथ शान्ति सघन होती रही। तभी किसी हिमपक्षी की कलरव ध्वनि ने नीरवता में सुरों का रव घोला। सभी को जैसे चेत आया, स्वयं महर्षि रूक्मवर्ण भी सजग हुए।

उन्होंने उपस्थित समुदाय को देखा और हल्के से मुस्करा दिये। उनकी विशेष दृष्टि देवर्षि नारद की ओर थी। देवर्षि ने भी जैसे उनका अभिप्राय समझ लिया। उन्होंने भगवान् श्रीहरि का पावन नाम ‘नारायण’ उच्चारण करने के साथ अपने नए सूत्र का सत्योच्चार किया-

‘कामक्रोधमोहस्मृतिभ्रंशबुद्धिनाश-सर्वनाशकारणत्वात्’॥४४॥
क्योंकि वह (दुःसंग) काम, क्रोध, मोह, स्मृतिभ्रंश, बुद्धिनाश एवं सर्वनाश का कारण है।

देवर्षि के इस सूत्र को सुनकर महर्षि रूक्मवर्ण अतीत की स्मृति की बिखरी कड़ियों को एक-दूसरे से जोड़ने लगे। उनकी इस मानसिक क्रिया के स्पर्श ने कहीं चेतना के अन्तराल में देवर्षि को स्पन्दित किया और उन्होंने बड़े धीमे किन्तु मधुर स्वरों में अनुरोध किया- ‘‘इस सूत्र की व्याख्या भी आप ही करें महर्षि।’’

उत्तर में महर्षि रूक्मवर्ण ने कहा- ‘‘अवश्य देवर्षि। आप जैसे महान भगवद्भक्त का अनुरोध भी मेरे लिए आदेश है। इसी बहाने आप सबको अपनी आपबीती कहने का अवसर मिल जाएगा।’’ इतना कहकर वह फिर से चुप हो गए किन्तु यह चुप्पी कुछ ही पलों की थी। इन पलों के बाद वे बोले- ‘‘दुःसंग भले ही कितना मधुर एवं सम्मोहक लगे किन्तु उसका यथार्थ महाविष की भांति संघातक होता है लेकिन तब मैं यह सब समझ नहीं सका। उन व्यवसायी महाशय की बातों ने मेरे अन्दर उथल-पुथल मचा दी थी। अपनी बाल्यावस्था से ही मैं अपने आचार्य, अभिभावक उन भगवद्भक्त महापुरुष के साथ था। उनके साथ सदा ही मैंने सात्त्विक एवं अपरिग्रही जीवन जिया था, ऐसा जीवन जिसमें न तो ऐश्वर्य था, न कोई वैभव और न ही विलास। साधन-सुविधाओं की भरमार की बात तो क्या, उनके पास तो सामान्य साधन-सुविधाएँ तक नहीं थीं।

इन असुविधाओं की कठोरता के बीच मैं पला था। सम्भवतः कहीं मन की गहरी परतों के नीचे लालसाओं-वासनाओं के बीज दबे-छुपे रहे होंगे जिन्होंने उस घड़ी में प्रकट होकर उस सम्पन्न व्यवसायी का रूप लिया था। उन व्यवसायी की बातें, उनका यह अनुरोध, उनकी अतुल धन-सम्पत्ति और सबसे बढ़कर उनकी षोडश वर्षीया अतिरूपवती कन्या, जिसे देखते ही मैं पलकें झपकना भूल गया था।

उस श्रेष्ठ कन्या के पिता ने अपनी सुदीर्घ आयु में अनगिनत सांसारिक अनुभव बटोरे थे। उन्हें मेरी मानसिक स्थिति का अहसास करने में देर न लगी। सारी स्थिति भांपकर और यह जानकर कि मेरा मन विलासिता की ओर आकर्षित हो रहा है, उन्होंने एक बार फिर से गरम लोहे पर चोट करनी शुरू की। यह लोहा और कुछ नहीं बस लालसाओं और वासनाओं के अतिरेक से उत्तप्त हुआ मेरा मन था, जिस पर वे अपनी मायावी बातों की चोटें किए जा रहे थे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १७९

शनिवार, 18 दिसंबर 2021

👉 गलती स्वयं सुधारें

एक बार गुरू आत्मानंद ने अपने चार शिष्यों को एक पाठ पढाया। पाठ पढाने के बाद वह अपने शिष्यों से बोले - “अब तुम चारों इस पाठ का स्वाध्ययन कर इसे याद करो। इस बीच यह ध्यान रखना कि तुममें से कोई बोले नहीं। एक घंटे बाद मैं तुमसे इस पाठ के बारे में बात करुँगा।“

यह कह कर गुरू आत्मानंद वहाँ से चले गए। उनके जाने के बाद चारों शिष्य बैठ कर पाठ का अध्ययन करने लगे। अचानक बादल घिर आए और वर्षा की संभावना दिखने लगी।

यह देख कर एक शिष्य बोला- “लगता है तेज बारिश होगी।“

ये सुन कर दूसरा शिष्य बोला - “तुम्हें बोलना नहीं चाहिये था। गुरू जी ने मना किया था। तुमने गुरू जी की आज्ञा भंग कर दी।“

तभी तीसरा शिष्य भी बोल पड़ा- “तुम भी तो बोल रहे हो।“

इस तरह तीन शिष्य बोल पड़े, अब सिर्फ चौथा शिष्य बचा वो कुछ भी न बोला। चुपचाप पढ़ता रहा।

एक घंटे बाद गुरू जी लौट आए। उन्हें देखते ही एक शिष्य बोला- “गुरूजी ! यह मौन नहीं रहा, बोल दिया।“

दुसरा बोला - “तो तुम कहाँ मौन थे, तुम भी तो बोले थे।“

तीसरा बोला - “इन दोनों ने बोलकर आपकी आज्ञा भंग कर दी।“

ये सुन पहले वाले दोनों फिर बोले - “तो तुम कौन सा मौन थे, तुम भी तो हमारे साथ बोले थे।“

चौथा शिष्य अब भी चुप था।

यह देख गुरू जी बोले - “मतलब तो ये हुआ कि तुम तीनों ही बोल पड़े । बस ये चौथा शिष्य ही चुप रहा। अर्थात सिर्फ इसी ने मेरी शिक्षा ग्रहण की और मेरी बात का अनुसरण किया। यह निश्चय ही आगे योग्य आदमी बनेगा। परंतु तुम तीनों पर मुझे संदेह है। एक तो तुम तीनों ने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया; और वह भी एक-दूसरे की गलती बताने के लिये। और ऐसा करने में तुम सब ने स्वयं की गलती पर ध्यान न दिया।

आमतौर पर सभी लोग ऐसा ही करते हैं। दूसरों को गलत बताने और साबित करने की कोशिश में स्वयं कब गलती कर बैठते हैं। उन्हें इसका एहसास भी नहीं होता। यह सुनकर तीनो शिष्य लज्जित हो गये। उन्होंने अपनी भूल स्वीकार की, गुरू जी से क्षमा माँगी और स्वयं को सुधारने का वचन दिया।

👉 स्वामी विवेकानन्द के विचार

मैं चाहता हूँ कि मेरे सब बच्चे, मैं जितना उन्नत बन सकता था, उससे सौगुना उन्न्त बनें। तुम लोगों में से प्रत्येक को महान शक्तिशाली बनना होगा- मैं कहता हूँ, अवश्य बनना होगा। आज्ञा-पालन, ध्येय के प्रति अनुराग तथा ध्येय को कार्यरूप में परिणत करने के लिए सदा प्रस्तुत रहना -- इन तीनों के रहने पर कोई भी तुम्हे अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सकता।

नीतिपरायण तथा साहसी बनो, अन्त: करण पूर्णतया शुध्द रहना चाहिए। पूर्ण नीतिपरायण तथा साहसी बनो  प्रणों के लिए भी कभी न डरो। कायर लोग ही पापाचरण करते हैं, वीर पुरूष कभी भी पापानुष्ठान नहीं करते -- यहाँ तक कि कभी वे मन में भी पाप का विचार नहीं लाते। प्राणिमात्र से प्रेम करने का प्रयास करो।

बच्चो, तुम्हारे लिए नीतिपरायणता तथा साहस को छोडकर और कोई दूसरा धर्म नहीं।इसके सिवाय और कोई धार्मिक मत-मतान्तर तुम्हारे लिए नहीं है। कायरता, पाप्,असदाचरण तथा दुर्बलता तुममें एकदम नहीं रहनी चाहिए, बाक़ी आवश्यकीय वस्तुएँ अपने आप आकर उपस्थित होंगी।

शक्तिमान, उठो तथा सामर्थ्यशाली बनो। कर्म, निरन्तर कर्म; संघर्ष , निरन्तर संघर्ष! अलमिति। पवित्र और निःस्वार्थी बनने की कोशिश करो सारा धर्म इसी में है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965 पृष्ठ १७

👉 भक्तिगाथा (भाग ९३)

सर्वथा त्याज्य है दुःसंग

मेरी स्वयं की कथा तो उस समय की है जब मैं किशोरवय में था। बचपन से ही आश्रम के निवास एवं भगवद्भक्त महापुरूष के सुपास की वजह से मन स्वभावतः संस्कारी एवं शान्त था फिर भी जन्मों के दुष्कृत बीज कहीं गहरे मन में होते हैं, जो समयानुसार काल प्रवाह में उदित एवं अंकुरित होते रहते हैं। ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ। मेरे आश्रम के अधिष्ठाता आचार्य मुझे आश्रम में अकेला छोड़कर तीर्थयात्रा के लिए चले गए। आश्रम के अन्य भक्त एवं शिष्य भी उनके साथ हो लिए। बस मैं अकेला ही रह गया। मैंने अपने पूज्य आचार्य से बहुतेरी विनती की, परन्तु उन्होंने मेरी एक न मानी। बहुत आग्रह करने पर उन्होंने केवल इतना कहा, कभी-कभी जीवन में परीक्षा की घड़ियाँ आती हैं, जिनसे अकेले ही गुजरना पड़ता है। तुम्हारे लिए भी यह समय परीक्षा का है। इसे सफलतापूर्वक उत्तीर्ण करो। इतना कहकर उन्होंने मेरे सिर पर आशीष का हाथ रखा और प्रस्थान कर गए।

उनके जाने के कुछ समय बाद एक प्रतिष्ठित व्यवसायी आश्रम पधारे। उनके साथ उनके साथी-संगी भी थे। वह व्यवसायी अपने साथ ऐश्वर्य-विलास के सम्पूर्ण साधन लेकर आए थे। ऐसे साधन जिनकी आश्रम जीवन में, साधना जीवन में कोई उपयोगिता न थी। मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की, पर उन्हें कुछ भी समझ में न आया। उल्टे उन्होंने मुझे समझा दिया कि अभी तुम्हारी आयु कम है, इसी के साथ जीवन की समझ भी कम है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इतनी कम आयु में भला यह वैराग्य लेने की क्या तुक है। सांझ के समय उन्होंने मुझको अपने आवासीय शिविर में बुलाया और जीवन की अपनी समझ में समझदारी की बातें बतायीं। इतना ही नहीं बातों में उन्होंने यह भी कह डाला कि उनके ऐश्वर्यशाली परिवार में कोई उत्तराधिकारी नहीं है, बस एक विवाहयोग्य कन्या है जिसके लिए वे योग्य वर की तलाश कर रहे हैं।

उनकी इन बातों ने मेरे मन में हलचल मचा दी। मन में एक साथ अनेकों हिलोरें उठीं। तरंगित मन शान्त न हो सका। प्रातः भी नित्य की भांति प्रभु का नाम संकीर्तन न कर सका। इसी अन्यमनस्कता में मैंने बाहर विचरण कर रहे एक साधु के प्रभाती के स्वर सुने-

हंसा मानसरोवर भूला
सनी पंक में चोंच
हो गए उजले पंख मटमैले
कंकर चुनने लगा वही जो
मोती चुगता था पहले
क्षर में ऐसा क्या सम्मोहन
जो तू अक्षर भूला?
कमल नाल से बिछुड़
कांस के सूखे तिनके जोड़े
अवगुंठित कलियों के धोखे
कुंठित शूल बटोरे
पर में ऐसा क्या आकर्षण
जो तू परमेश्वर को भूला?
नीर-क्षीर की दिव्य दृष्टि में
अन्य वासना जागी
चंचलता का परम प्रतीक बन गया
स्थिरता का अनुरागी
क्षण को अर्पित हुआ
साधना का मन्वन्तर भूला
हंसा मानसरोवर भूला
हंसा तू मानसरोवर भूला।
भ्रमण कर रहे साधु के इस प्रभाती गीत ने मुझे झकझोरा तो सही, परन्तु सम्पूर्ण चेत न हो सका। सम्भवतः दुःसंग के और भी परिणाम आने अभी शेष थे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १७७

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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