समस्त साधनाओं का सुफल है भक्ति
फिर उन्होंने ब्रह्मर्षि वसिष्ठ एवं ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की ओर देखते हुए कहा- ‘‘आप दोनों तो जानते ही हैं कि मेरे प्राण तो ‘राम’ में बसते थे। ‘राम’ का नाम ही मेरे अस्तित्त्व का सारभूत तत्त्व है। देवाधिदेव भोलेनाथ यही कहते हैं। यही कारण है कि मैं और भोलेनाथ सदा ही श्रीराम को कहते-सुनते रहते हैं। अब जब यहाँ शबरी की कथा सुना रहे थे तो उसे सुनकर मेरे यहाँ विराज रहे भोलेनाथ एवं माता पार्वती के नेत्र अश्रु से भीग गए। उन्होंने नारद की बड़ी प्रशंसा करते हुए रामभक्त गिलहरी की कथा सुनायी। भोलेनाथ के मुख से सुनकर यह कथा मुझे बहुत भायी। आप आदेश दें तो यह कथा मैं आप सब को भी सुनाऊँ।’’
‘‘हम सब धन्य हो जाएँगे भगवन्!’’ वसिष्ठ, विश्वामित्र के साथ सप्तर्षिगण व देवर्षि नारद सहित अन्य ऋषियों एवं देवों ने कहा। उनमें से कोई भी इस अहोभाग्य को खोना नहीं चाहता था। महर्षि अगस्त्य तो श्रीराम कथा के परम आनन्द को वितरित करने के लिए व बटोरने के लिए सदा ही तैयार रहते थे। उन्होंने बिना पल की देर लगाए कहना शुरू किया, ‘‘घटना सेतुबन्धन के समय की है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम वानर-भालुओं के साथ सेतुबन्धन का कार्य सम्पन्न कर रहे थे। सभी इस कार्य में तत्पर व तल्लीन थे। भक्तराज महावीर हनुमान भी विशालकाय पर्वत शिलाओं को शीघ्र लाकर नल-नील के हाथों में थमा रहे थे।
यह अपूर्व दृश्य था। यह कहते हुए ऋषि अगस्त्य जैसे भावसमाधि में प्रवेश कर उस बीते युग को निहारने लगे। कुछ क्षणों के बाद उनके मुख से उच्चारित हुआ, उसी समय महावीर हनुमान ने देखा कि एक क्षुद्र प्राणी इधर-उधर दौड़ रहा है। उन्होंने उसे अपने हाथों में थाम लिया, तुम यहाँ क्यों दौड़-भाग कर रहे हो, यहाँ तुम्हें चोट लग सकती है। चोट से क्या डर, उस क्षुद्र प्राणी ने कहा- रामकाज में प्राण निकलें, मेरी तो यही कामना है। तुम क्या रामकाज कर रही हो गिलहरी? वह क्षुद्र प्राणी गिलहरी थी, उससे हनुमान ने पूछा। मैं आपकी ही भांति प्रभु के सेतुबन्धन में सहयोगी हूँ। अब आपकी भांति भारी-भरकम शिलाएँ तो ला नहीं सकती इसलिए मैं धूल में लोटकर अपने शरीर के रोएँ में धूल भर लेती हूँ, फिर जहाँ सेतु बन रहा है, वहाँ यह धूल झाड़ देती हूँ। बहुत ज्यादा न सही लेकिन कुछ सहयोग तो कर ही रही हूँ।
उस गिलहरी की बातें सुनकर महावीर हनुमान का भी कण्ठ रुद्ध हो गया। उनके भाव भीग गए। वह चाहते थे कि वे उसे भगवान तक पहुँचा दे। परन्तु गिलहरी ने उनसे कहा- तुम तो भली-भाँति प्रभु का स्वभाव जानते हो महाबली! वे भला अपने भक्त को कब बिसारते हैं। वे स्वयं ही मुझे बुला लेंगे, तब तक मुझे अपना काम करने दें। ऐसा कहकर वह गिलहरी हनुमान के हाथों से उछलकर अपने उसी काम में जुट गयी। हनुमान चकित हो उसकी भक्ति को निहारते रहे। उन्होंने सोचा- भगवान तो संकटहारी हैं, अगर यह भक्त संकट में पड़े तो वे जरूर उसे अपने पास बुला लेंगे। ऐसा सोचकर उन्होंने अपने पाँव के नाखून से बहुत धीरे से गिलहरी की पूँछ दबा दी। उस गिलहरी ने इस पीड़ा से तड़पकर राम नाम का स्मरण किया।
भक्त गिलहरी की पीड़ा से विकल भगवान् राम दौड़ कर आए और उस गिलहरी को अपने हाथों में उठा लिया। फिर हनुमान की ओर कृत्रिम रोष से देखते हुए गिलहरी से बोले- प्रिय गिलहरी! तुम महाबली को उनके इस कृत्य के लिए क्या दण्ड देना चाहती हो। उत्तर में गिलहरी मुस्करा दी और बोली- प्रभु! भला भक्तों के संकटमोचन, कभी किसी भक्त को संकट में डाल सकते हैं। इन्होंने मुझे आप तक पहुँचाने के लिए यह किया था। इसलिए इन्हें तो पुरस्कार मिलना चाहिए। गिलहरी के इस कथन पर हनुमान की आँखें भीग गयीं और श्रीराम मुस्करा दिए।’’ अपनी इस कथा को सुनाते हुए ऋषि अगस्त्य बोले- ‘‘भक्ति तो सभी साधनाओं का सुफल है।’’ अगस्त्य के इन वचनों पर पुलकित होते हुए देवर्षि बोल उठे- ‘‘आपने मेरे अन्तःकरण की बात कह दी। मेरा अगला सूत्र भी यही कहता है-
‘फलरूपत्वात्॥२६॥’
यह भक्ति फलरूपा है।’’
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ११०