बुधवार, 7 अप्रैल 2021

👉 तलवार या प्रेम?

किसी पर विजय प्राप्त करने के लिये मनुष्य के पास दो ही साधन उपलब्ध हो सकते हैं। एक तलवार तथा दूसरा प्रेम।

तलवार से किसी को अपने वश में किया जा सकता है, उससे अपना आदेश मनवाया जा सकता है। किन्तु यह विजय क्षणिक है, इससे किसी के हृदय पर अधिकार नहीं जमाया जा सकता है। परास्त मनुष्य तभी तक अपने को परास्त समझता है जब तक वह निर्बल है और उसके पास ईंट का जवाब पत्थर से देने का साधन उपलब्ध नहीं है। वह भीतर ही भीतर ऐसे सुअवसर की प्रतीक्षा में रहता है जब वह अपने शत्रु से बदला लेने में अपने को समर्थ समझ सके। और एक न एक दिन उसे ऐसा अवसर मिल ही जाता है।

प्रेम से प्राप्त किया हुआ अधिकार स्थायी होता है। विजयी न अपने को विजयी समझता है और न विजित अपने को विजित। वे सदा के लिये सच्चे मित्र बन जाते है। एक के हृदय पर दूसरे का अटल अधिकार हो जाता है।

शक्तिशाली लोग तलवार का प्रयोग इसलिये करते हैं कि उनकी शक्ति को अपने काम में ला सके। यह कार्य प्रेम से भी हो सकता है। राम के साथ बानरों की असंख्य सेना, ईसा और बुद्ध के अनगित अनुयायी गान्धी के अनेक सत्याग्रही इस बात के साक्षी हैं कि प्रेम का बन्धन तलवार के भय से प्रबल है।

आप दूसरों को अपना सहायक बनाना चाहते हैं, उनकी शक्ति का उपयोग करना चाहते हैं, यश या ऐश्वर्य चाहते हैं तो प्रेम शस्त्र को अपनाइये यह तलवार की अपेक्षा सैंकड़ों गुनी शक्ति रखता है।

📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1940 पृष्ठ 16

मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

👉 अन्तःकरण की आवाज सुनो और उसका अनुकरण करो

जब मनुष्य अकेला होता है, उसके पास और आस-पास भी जब कोई नहीं होता है, तब कोई पाप करने से उसे जो भय लगता है, एक शंका रहती है, वह किसके कारण होती है? उसे बार-बार ऐसा क्यों लगता है कि कोई उसके पाप को देख रहा है? क्यों उसका शरीर पूरे उत्साह से उस पाप कर्म में उत्साहित नहीं रहता? और क्यों बाद में भी वह एक अपराधी की तरह मलीन रहता है? क्या कभी कोई इस पर विचार करता है कि जब उसके पाप को देखने वाला कोई मौजूद नहीं तब उसे भय किसका है वह किससे डर रहा है? कौन उसे ऐसा करने को निःशब्द रोकता और टोकता रहता है? कौन उसके मन, प्राण और शरीर में कंपन उत्पन्न कर देता है?

निःसंदेह यह उसका अपना अन्तःकरण है, जो उसे उस पाप से हटाने के प्रयत्न में विविध प्रकार की शंकाओं, संदेहों व कम्पनादि भयद्योतक अनुभवों से उसे वैसा न करने के लिए संकेत करता जाता है और जो मनुष्य उसकी अवहेलना करके वैसा करता है, उसका अन्तःकरण एक न एक दिन उसकी गवाही देकर उसे दण्ड का भागी बनाता है। यह हो सकता है कि किसी का पाप कर्म दुनिया से छिपा रहे, किंतु उसके अपने अन्तःकरण से कदापि नहीं छिप सकता।

वह उसकी एक-एक क्रिया और विचार का सबसे प्रबल और सच्चा साक्षी होता है। जब किसी कारणवश मनुष्य को अपने पाप का दण्ड किसी और से नहीं मिल पाता तो समय आने पर उसका अन्तःकरण उसे स्वयं दण्डित करता है। हमारे लिए उचित यही है कि अन्तःकरण में विद्यमान परमात्मा की आवाज को सुनें और उसका अनुसरण करें।

महर्षि रमण
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1965 पृष्ठ 1

👉 मनुष्य की महानता का रहस्य

मनुष्य सब प्राणियों से श्रेष्ठ है। शक्तिमान् होना अथवा शक्तिहीन होना मनुष्य के स्वयं अपने हाथ में है।

अपनी प्रत्येक आदत एवं वासना के ऊपर आप नियंत्रण पा सकते हैं, क्योंकि आप अनंत परमात्मा के एक अंश हैं और परमात्मा के बल के आगे ऐसा कुछ भी नहीं है, जो टिक सके। अनेक मनुष्य हलके प्रकार का जीवन इस तरह बिताते हैं, जिसमें व्यक्ति स्वतंत्र होता ही नहीं है। क्या तुम्हें इस संसार में प्रभावशाली बनना है? यदि हाँ, तो आप अपने आप पर निर्भर रहो और स्वतंत्र बनने का प्रयत्न करो। अपने आप को साधारण मनुष्य मत समझो। हम गरीब हैं, हमसे क्या होगा, ऐसा मत कहो।

यदि आप परमात्मा के ऊपर विश्वास रखकर लोगों की आलोचना से नहीं डरोगे, तो प्रभु अवश्य आप को सहायता देगा। यदि लोगों को खुश करने के लिए अपना जीवन बिताएँगे, तो लोगों से आप कदापि खुश नहीं रहेंगे, बल्कि जैसे-जैसे आप उन्हें खुश रखने में लगेंगे, वैसे-वैसे ही आप गुलाम बनते जाऍगे, वैसे-वैसे ही आप से उनकी माँग भी बढ़ती जाएगी।

जो कोई स्वाभाविक रीति से अपनी सामर्थ्य का उपयोग करता है, वह निश्चित रूप से महान् पुरुष है। जिन मनुष्यों को अपनी मूलशक्ति आत्मशक्ति का भान होता है, वे ओछे और बेकार काम करते हुए नहीं दिखाई देते।

📖 अखण्ड ज्योति-मई 1948 पृष्ठ 7

👉 Chintan Ke Kshan चिंतन के क्षण 6 April 2021

◆ पुरुषार्थ ही हमारी स्वतंत्रता और सभ्यता की रक्षा करने के लिए दृढ़ दुर्ग है जिसे कोई भी बेध नहीं सकता। हमें अपनी शक्ति पर भरोसा रखकर, पुरुषार्थ के बल पर जीवन संघर्ष में आगे बढ़ना। यदि हमें कुछ करना है, स्वतंत्र रहना है, जीवित रहना है, तो एक ही रास्ता है-पुरुषार्थ की उपासना का। पुरुषार्थ ही हमारे जीवन का मूलमंत्र  है।

◇ लेखों और भाषणों का युग अब बीत गया। गाल बजाकर लम्बी चौड़ी डींग हाँक कर या बड़े बड़े कागज काले करके संसार के सुधार की आशा करना व्यर्थ है। इन साधनों से थोड़ी मदद मिल सकती है, पर उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। संसार को सुधारने का प्रधान साधन यही हो सकता है कि हम अपना मानसिक स्तर ऊँचा उठायें, चरित्र की दृष्टि से अपेक्षाकृत उत्कृष्ट बनें। अपने आचरण से ही दूसरों को प्रभावशाली शिक्षा दी जा सकती है।

◆ सीखने की इच्छा रखने वाले के लिए पग-पग पर शिक्षक मौजूद हैं, पर आज सीखना कौन चाहता है? सभी तो अपनी अपूर्णता के अहंकार के मद में ऐंठे-ऐंठे से फिरते हैं। सीखने के लिए हृदय का द्वार खोल दिया जाय तो बहती हुई वायु की तरह शिक्षा, सच्ची शिक्षा स्वयमेव हमारे हृदय में प्रवेश करने लगे।

📖 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

👉 गुरु सांचे में ढलना होगा


गुरुवर यदि श्रेष्ठ चाहिए, मिट्टी बनकर गलना होगा,
बनना है यदि सुपात्र तो, गुरु सांचे में ढलना होगा।
मिट्टी को छैनी लगती तो, मन का अहम गल जाता है,
पानी के सानिध्य से ही, एकत्व का भाव फिर आता है,
पात्र बन जाने पर भी, अभी आग में जलना होगा,
बनना है यदि सुपात्र तो, गुरु सांचे में ढलना होगा।

मिट्टी तो मिट्टी होती है, कभी रौंदी, कुचली जाती है,
बार बार पैरों से मिसकर, डंडे से पिटती जाती है,
गुरुवर जब शिष्य परखते, पल पल चोट कराते हैं,
मैं का भाव मिटाने को, कर्तव्य मार्ग में तपाते हैं।
हर कष्ट को सहकर भी, ओस की भांति निखरना होगा
बनना है यदि सुपात्र तो, गुरु सांचे में ढलना होगा।

मिट्टी जब चाक में आती, जीवन युद्ध शुरू होता है,
हाथ सुगढ़ का लग जाए तो, कायाकल्प फिर होता है
गुरुवर बाहर से हमें परखते, अंदर से सम्बल देते हैं
बार बार विपरीतताओं से, हमारी निष्ठा को बल देते हैं
सच्चा शिष्य बनना है तो, चरणों में समर्पण करना होगा,
बनना है यदि सुपात्र तो, गुरु सांचे में ढलना होगा।

इतना तप करने पर भी, कभी अंत में बिखराव आ जाता है
बनते बनते वह सुपात्र, फिर कुपात्र बन जाता है।
जैसे चिलम बन मिट्टी स्वयं जलती, दूजों को जलाती है
इतनी व्यथा सहकर भी सुराही सा यश नहीं पाती है।
निंदा मिले तो सहकर भी, उचित मार्ग पर चलना होगा,
बनना है यदि सुपात्र तो, गुरु सांचे में ढलना होगा।

डॉ आरती कैवर्त 'रितु'

गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

👉 सीमित रहे सपनों की उड़ान

हर व्यक्ति के अन्दर दिव्यता का खजाना छुपा हुआ है। इसको खोदकर बाहर निकालने के लिए जरूरी है कि मानसिक हलचलों को सृजनात्मक स्वरूप प्रदान किया जाए। इसके लिए ऐसे जीवन दर्शन को प्रोत्साहन देना चाहिए, जो दोनों बातों पर ध्यान रखें। एक ओर मानव स्वभाव और उसके परिष्कार पर, तो दूसरी ओर व्यवहारिक क्रियाकलापों को सुधारने, संवारने पर। ऐसा करने पर हर कोई अपनी जिन्दगी को शुभ और सुन्दर बना सकेगा। सफलता अनायास ही उत्पन्न नहीं होती, इस क्रियाशीलता की प्रतिक्रिया कह सकते हैं। यह क्रिया भी अकारण उत्पन्न नहीं होती। उसके पीछे इच्छा शक्ति की प्रबल प्रेरणा काम कर रही होती है। सरल शब्दों में कहें तो इच्छा से क्रिया, क्रिया से साधन और साधन से परिस्थिति का क्रम चल रहा दिखाई पड़ेगा।

बड़ी-बड़ी सफलताएँ चाहने के लिए न जाने कौन-कौन, कितने-कितने सपने देखता रहता है। सोते में चित्र-विचित्र स्वप्नों की कथाएं, जगने पर कई लोग सुनाते हैं। जाग्रत अवस्था में अपने असफल अरमानों का संजोया हुआ श्मशान देखते दिखाई देते हैं। उन्हें दुख होता है कि इतनी मनोकामनाएं उनने संजोईं, पर एक भी पूरी नहीं हुई। इन दिवास्वप्न देखने वालों को निशास्वप्न देखने वालों की पंक्ति में बिठाया जा सकता है। अन्तर इतना ही होता है कि सपने में राजा बनने और जागने पर गद्दी छिन जाने का उतना दुख नहीं होता, जितना कि अरमानों के महल खड़े करने वालों को उनके उजड़ जाने का होता है।

कल्पनाओं की उपयोगिता तो है, पर उससे दिशा मिलने का ही प्रयोजन सिद्ध होता है। सोचने भर से चाही वस्तु मिलना संभव नहीं। उसके लिए साधन जुटाने और परिस्थितियां उत्पन्न करनी पड़ती हैं। इसके लिए प्रचण्ड पुरूषार्थ करने की आवश्यकता पड़ती है। बिना थके, बिना हारे चलते रहने और कठिनाइयों से पग-पग पर जूझने का साहस ही लम्बी मंजिल पूरी करा सकने में सफल होता है। उचित परिश्रम के मूल्य पर ही अनुकूलताएं उत्पन्न होती हैं। उन्हीं के सहारे सफलताओं की संभावनाएं दृष्टिगोचर होती हैं। यह अथक  परिश्रम और साहस भरे संकल्पों पर ही निर्भर है। देर तक टिकने वाला और प्रतिकूलताओं से जूझने वाला साहस ही संकल्प कहलाता है। कल्पना से नहीं, संकल्प शक्ति से मनोरथ पूरा करने की परिस्थितियां बनती हैं।

बच्चे भविष्य के मधुर सपने देखने में निरत रहते हैं। बूढ़ों को भूतकाल की स्मृतियों में उलझे रहना सुहाता है, किन्तु तरुण को वर्तमान से जूझना पड़ता है। बच्चों को स्वप्नदर्शी कहते हैं। वे कल्पनाओं के आकाश में उड़ते हैं और परियों के साथ खेलते हैं। यहां सपनों का कोई मोल नहीं। संसार के बाजार में पुरूषार्थ से योग्यता भी बढ़ती है और साधन भी जुटते हैं। इन दुहरी उपलब्धियों के सहारे ही प्रगति के पथ पर दो पहिए की गाड़ी लुढ़कती है। स्वप्नों के पंख लगाकर सुनहरे आकाश में दौड़ तो कितनी ही लम्बी लगाई जा सकती है, पर पहुंचा कहीं नहीं जा सकता।

ऊंची उड़ान उड़ने की अपेक्षा यह अच्छा है कि आज की स्थिति का सही मूल्यांकन करें और उतनी बड़ी योजना बनाएं, जिसे आज के साधनों से पूरा कर सकना संभव है। कल साधन बढ़े तो कल्पना को विस्तार करने में कुछ भी कठिनाई नहीं होगी। मंजिल एक-एक कदम उठाते हुए पूरी की जाती है। लम्बी छलांग आश्चर्य भर उत्पन्न करती है, मंजिल तक नहीं पहुंचती। कल्पना की समीक्षा करें और उसे आज की परिस्थितियों के साथ चलने योग्य बनाएं। गुण-दोषों का, सम्भव-असम्भव, पक्ष-विपक्ष का ध्यान रखते हुए विवेकपूर्ण निर्णय किया जाए। उसे पूरा करने के लिए अटूट साहस और प्रबल पुरुषार्थ के लिए जुटा जाय। इससे विश्वास किया जा सकता है कि सफलता का वृक्ष अपने समय पर अवश्य ही फूलेगा और फल देगा।        
                                      
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 31 मार्च 2021

👉 शिव बन कर ही शिव की पूजा करें

शिव का अर्थ है  ‘शुभ’। शंकर का अर्थ होता है, कल्याण करने वाले। निश्चित रूप से उसे प्रसन्न करने के लिए मनुष्य को उनके अनुरूप ही बनना पड़ेगा। ‘शिवो भूत्वा शिवं यजेत्’ अर्थात् शिव बनकर ही शिव की पूजा करें।

हमारे धर्म  ग्रंथों में वर्णित शिव के स्वरूप की प्रलयंकारी रूद्र के रूप में स्तुति की गयी है। ॐ नमस्ते रुद्र मन्यवऽउतो तऽइषवे नमः बाहुभ्यामुत ते नमः- यजुर्वेद (१६.१) शिव दुष्टों को रुलाने वाले रुद्र हैं तथा सृष्टि का संतुलन बनाने वाले संहारक शंकर है।
    
शिव पुराण में शिव महिमा का गान इस प्रकार किया गया है-
वंदे देव मुमापतिं सुरगुरुं वंदे जगत् कारणं। वंदे पन्नगभूषणं मृगधरं वंदे पशूनाम्पतिम्॥ वंदे सूर्य शशांक वह्निनयनं वंदे मुकुंदप्रियं। वंदे भक्त जनाश्रयं च वरदं वंदे शिवं शंकरम्॥
    
शंकर जी के ललाट पर स्थित चंद्र, शीतलता और संतुलन का प्रतीक है। विश्व कल्याण का प्रतीक और चन्द्रमा सुन्दरता का पर्याय है, जो सुनिश्चित ही शिवम् से सुन्दरम् को चरितार्थ करता है। सिर पर बहती गंगा शिव के मस्तिष्क में अविरल प्रवाहित पवित्रता का प्रतीक है। आज विवेकहीन अदूरदर्शिता के कारण मानव दुःखी है। भगवान् शिव का तीसरा नेत्र विवेक का प्रतीक है। जिसके खुलते ही कामदेव नष्ट हुआ था अर्थात् विवेक से कामनाओं को विनष्ट करके ही शांति ्रप्राप्त की जा सकती है। सर्पों की माला दुष्टों को भी गले लगाने की क्षमता तथा कानों में बिच्छू, बर्र के कुण्डल अर्थात् कटु एवं कठोर शब्द को सुनने की सहनशीलता ही सच्चे साधक की पहचान है। मृगछाल निरर्थक वस्तुओं का सदुपयोग करना और मुण्डों की माला, जीवन की अंतिम अवस्था की वास्तविकता को दर्शाती है। भस्म लेपन, शरीर के अंतिम परिणति दर्शाती है। भगवान् शिव के अंतस् का वह तत्त्वज्ञान जो शरीर की नश्वरता और आत्मा अमरता की ओर संकेत करता है।
    
शिव को नील कंठेश्वर कहते हैं। पुराणों में समुद्र मंथन की कथा आती है। समुद्र से नाना प्रकार के रत्न निकले। जिसको सभी देवताओं ने अपनी इच्छानुसार हथिया लिया। अमृत देवता पी गये, वारूणि राक्षस पी गये। समुद्र से जहर निकला। सारे देवी-देवता समुद्र तट से भाग खड़े हुए। जहर की भीषण ज्वालाओं से सारा विश्व जलने लगा, तब शिव आगे बढ़े और कालकूट प्रलयंकर बन गये और नीलकंठ देवाधिदेव महादेव कहलाने लगे।
    
हमारे कुछ धार्मिक कहे जाने वाले व्यक्तियों ने शिव पूजा के साथ नशे की  परिपाटी जोड़ रखी है। बड़ा आश्चर्य है, जो शिव-
हमरे जान सदा शिव जोगी। अज अनवद्य अकाम अभोगी॥
    
जैसा विराट् पवित्र व्यक्तित्व है, उसने पता नहीं नशा पत्ता कब किया होगा। भांग, धतूरा, चिलम गाँजा जैसे घातक नशे करना मानवता पर कलंक है, अतः शंकर भक्त को ऐसी बुराइयों से दूर रहकर शिव के चरणों में बिल्व पत्र ही समर्पित करना चाहिए। बेल के तीन पत्र हमारे लोभ, मोह, अहंकार को मिटाने में समर्थ है। शंकर जी हाथ में त्रिशूल इसलिए धारण किये रहते हैं, जिससे दुःखदायी इन तीन भूलों को सदैव याद रखा जाय।
    
नशेबाजी एक धीमी आत्म हत्या है। इस व्यक्तिगत और सामाजिक बुराई से बचकर नशा निवारण के संकल्पों को उभारना ही शंकर की सच्ची आराधना है। शंकर के सच्चे वीरभद्र बनने की आवश्यकता है। वीरता अभद्र न हो, तो संसार के प्रत्येक व्यक्ति को न्याय मिल सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Chintan Ke Kshan चिंतन के क्षण 31 March 2021

◆ भगवान की शरण में जाकर अब लज्जा, भय, यह सब छोडो़ मैं अगर भगवत्कीर्तन में नाचूँ तो लोग मुझे क्या कहेंगे, यह सब भाव छोडो़ "लज्जा, घृणा और भय, इन तीनों में किसी के रहते ईश्वर नहीं मिलते। लज्जा, घृणा, भय जाति अभिमान, गुप्त रखने की इच्छा, ये सब पाश हैं। इन सब के चले जाने से जीव की मुक्ति होती है।

◇ जो अज्ञानी है, वही कहता है कि ईश्वर 'वहाँ' बहुत दूर हैं। जो ज्ञानी है, वह जानता है कि ईश्वर 'यहाँ' अत्यन्त निकट, हृदय के बीच अन्तर्यामी के रूप में विराजमान हैं, फिर उन्होंने स्वयं भिन्न भिन्न रूप भी धारण किये हैं।"

◆ दया बहुत अच्छी है। दया और माया में बडा़ अन्तर है। दया अच्छी नहीं। माया का अर्थ है आत्मियों से प्रेम अपनी स्त्री, पुत्र, भाई, बहन, भतीजा, माँ, बाप इन्हीं से प्रेम। दया अर्थात सब प्राणियों से समान प्रेम"।

◇ जब तक देहबुद्धि है, तभी तक सुख दुःख, जन्म मृत्यु, रोग शोक हैं। ये सब देह के हैं, आत्मा के नहीं। देह की मृत्यु के बाद सम्भव है वे अच्छे स्थान पर ले जायें जिस प्रकार प्रसव वेदना के बाद सन्तान की प्राप्ति! आत्मज्ञान होने पर सुख दुःख, जन्म मृत्यु स्वप्न जैसे लगते हैं।

📖 राम कृष्ण वचनामृत से

मंगलवार, 30 मार्च 2021

👉 अध्यात्म और प्रेम

“अध्यात्म में प्रेम का प्रमुख स्थान है पर यह प्रेम देश के प्रति, देश-वासियों के प्रति, देश के गौरव, उसकी महानता और जाति के सुख, दैवी आनन्द का, या अपने देशवासियों के प्रति आत्म-बलि देने, उसके कष्ट निवारण के लिए स्वयं कष्ट सहन करने, देश की स्वतन्त्रता के लिए अपना रक्त बहाने, जाति के जनकों के साथ-साथ मृत्यु का आलिंगन करने में, आनन्द की अनुभूति करने का हो।

व्यक्तिगत सुख का प्रेम नहीं। मातृ-भूमि के स्पर्श से शरीर के पुलकित होने का आनन्द हो और हिन्द महासागर से जो हवायें बहती हैं, उनके स्पर्श से भी वहीं अनुभूति हो। भारतीय पर्वत माला से बहने वाली नदियों से भी वही सुख प्राप्त हो। भारतीय भाषा, संगीत , कविता, परिचित दृश्य, स्रोत, आदतें, वेश-भूषा जीवनक्रम आदि भौतिक प्रेम के मूल हैं। अपने अतीत के प्रति गर्व, वर्तमान के प्रति दुःख और भविष्य के प्रति अनुराग उसकी शाखायें हैं।

आत्माहुति और आत्म-विस्मृति, महान सेवा, और देश के लिए महान सेवा, और देश के लिए अपार सहन शक्ति उसके फल हैं। और जो इसे जीवित रखता है, वह है देश में भगवान की, मातृ-भूमि की अनुभूति, माँ का दर्शन, माँ का ज्ञान, और उसका निरन्तर ध्यान एवं माँ की स्तुति तथा सेवा।”

✍🏻 योगी अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1964 पृष्ठ 1

👉 सद्ज्ञान की उपलब्धि मनुष्य का श्रेष्ठतम सौभाग्य

शरीर को जीवित रखने के लिए अन्न, जल और वायु की अनिवार्य आवश्यकता है। आत्मा को सजीव और सुविकसित बनाने के लिए उस ज्ञान आहार की आवश्यकता है जिसके आधार पर गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता उपलब्ध की जा सके। समुन्नत जीवन का एकमात्र आधार सद्ज्ञान है। इस अवलम्ब के बिना कोई ऊँचा नहीं उठ सकता—आगे नहीं बढ़ सकता। सन्तोष, सम्मान और वैभव की अनेकानेक श्रेयस्कर विभूतियाँ इस सद्ज्ञान सम्पदा पर ही अवलम्बित हैं।

मनुष्य में ज्ञान सम्पादन की क्षमता ही है पर उसे एकाकी विकसित नहीं कर सकता। दूसरों के सहारे ही उसकी महानता विकसित हो सकती है। इस सहारे का नाम स्वाध्याय और सत्संग है। शास्त्र और सत् संपर्क से यह प्रयोजन पूरा होता है प्रशिक्षित मनःस्थिति यह लाभ चिन्तन और मनन से भी ले सकती है। पशु को मनुष्य बनाने के लिए उस सद्ज्ञान की अनिवार्य आवश्यकता रहती है जो उसकी चिन्तन प्रक्रिया एवं कार्य−पद्धति में उच्चस्तरीय उभार उत्पन्न कर सके।

मानवी महानता का सारा श्रेय उस सद्ज्ञान को है जो उसकी चिन्तन प्रक्रिया एवं कार्य−पद्धति को आदर्शवादी परम्पराओं का अवलंबन करने की प्रेरणा देता हो। सौभाग्य और दुर्भाग्य की परख इस सद्ज्ञान संपदा के मिलने न मिलने की स्थिति को देखकर की जा सकती है। जिसे प्रेरक प्रकाश न मिल सका वह अँधेरे में भटकेगा, जिसे सद्ज्ञान की ऊर्जा से वञ्चित रहना पड़ा, वह सदा पिछड़ा और पतित ही बना रहेगा। पारस छू कर लोहे को सोना बनाने वाली किंवदंती सच हो या झूठ, यह सुनिश्चित तथ्य है सद्ज्ञान की उपलब्धि मनुष्य को सौभाग्य के श्रेष्ठतम स्तर तक पहुँचा देती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1974 पृष्ठ 1

सोमवार, 29 मार्च 2021

👉 इस बार की होली ऐसी हो


हर मन मे एक प्रश्न है उठता, इस बार की होली कैसी हो
जीवन में शिष्यत्व जगे, इस बार की होली ऐसी हो।

गुरुवर की प्रीति अंग लगे, करुणा मन से छलकाये,
साधक में रंग यूं चढ़े, साधना में जीवन ढल जाए,
रंगों से नही इस बार की होली, गुरुदेव की होली जैसी हो,
जीवन में शिष्यत्व जगे, इस बार की होली ऐसी हो।

घर आंगन को आओ बुहारे, मन के सब कल्मष धो डालें
आपस के सब भेद मिटा लें, प्रेम का सबको रंग लगा लें
आपस की दूरी में भी लगे, मन में दूरी ना जैसी हो,
जीवन में शिष्यत्व जगे, इस बार की होली ऐसी हो।

मीठे मीठे पकवानों सी, बोली भी मीठी हो जाये,
तेरा मेरा का भेद मिटे, सबमें अपनत्व का रंग आये
अहम भांग सा एक नशा है, अपनी हालत ना ऐसी हो
जीवन में शिष्यत्व जगे, इस बार की होली ऐसी हो।

डॉ आरती कैवर्त'रितु'

👉 आज गुरु संग की होली


"गुरु के रंग में जो भी रंगा वो, तर गया जीवन सारा,
द्वार मिला है गुरु का जब से, हो गया वारा न्यारा।।"

अब की होली गुरु संग की होली, रंग गई मैं गुरु रंग की होली
आई रे, आई रे इस बार, आज गुरु संग की होली।
                   
इस रंग में जीवन रंग डाला, तन क्या हमने मन रंग डाला,
और कोई न रंग चढ़े जो, हमनें अंग अंग रंग डाला
आशीषों की बौछार, आज गुरु संग की होली।
आई रे, आई रे इस बार, आज गुरु संग की होली।1।
                
और कोई न रंग ही भाए, जब से गुरु के दर पे आए,
लाल गुलाबी नीले पीले, कोई भी ना रंग सुहाए,
श्रेष्ठ गुरु का प्यार, आज गुरु संग की होली।
आई रे, आई रे इस बार, आज गुरु संग की होली।2।
               
जन्म जन्म के कर्म सधे हैं, हम गुरु से आज मिले हैं
जन्म मरण के कितने बंधन, बरसों बाद आज कटे हैं
गुरु का है उपहार, आज गुरु संग की होली।
आई रे, आई रे इस बार, आज गुरु संग की होली।3।

डॉ आरती कैवर्त 'रितु'

रविवार, 28 मार्च 2021

👉 सबको रंग लगायेंगे


रंग गुलाल लेकर निकले है, सबको रंग लगायेंगे।
उत्साह उमंग जहाँ सोया है, उनको पुन: जगायेंगे।।

खुशियों का त्यौहार है प्यारा, झूम रहा देखो जग सारा।
अब तो आलस दूर भगाओ, इक दूजे को रंग लगाओ।।
राग द्वेष जो भी मन में है, उसको आज हटायेंगे।
रंग गुलाल लेकर निकले है, सबको रंग लगायेंगे।।  

आओ मस्ती में झूम जायें, प्यार और सहकार बढ़ाएं।
कटुता का रंग फैला है जो, उसे हटा सद्भाव बढ़ाएं।।
प्रेम रंग में रंगकर सबमें, प्रेम भाव विकासायेंगे।।
रंग गुलाल लेकर निकले है, सबको रंग लगायेंगे।।

आओ रंग की नदी बहायें, अम्बर में गुलाल उड़ायें।
कलह कलुष को धोएं इसमें, रंग लगा संगी बन जाए।।
सभी चेहरे एक रूप कर, महफिल आज सजायेंगे।
रंग गुलाल लेकर निकले है, सबको रंग लगायेंगे।।

मन में नहीं कपट छल होगा, सत्य न्याय का संबल होगा।
कडवाहट की कैद हटेगी, सबका उच्च मनोबल होगा।।  
मिलकर सारे एक बनेंगे, अंतर सारे मिट जायेंगे।
रंग गुलाल लेकर निकले है, सबको रंग लगायेंगे।।

थिरक रहें है पाँव हमारे, ढोल मजीरे के संग सारे।
स्नेह प्यार के रंग में भींगे, शुद्ध भाव हो रहे हमारे।।
होली कि रंगोली से ही, प्रेम मिलन कर पायेंगे ।
रंग गुलाल लेकर निकले है, सबको रंग लगायेंगे।।

उमेश यादव

👉 तेरे रंग में रंग जाए


हे रंगरेज रंगो कुछ ऐसा, मन तेरे रंग में रंग जाए।
जितना धोऊ उतना चमके, जीवन सतरंगी बन जाए।।

जहाँ जहाँ रंग मलिन हुआ है, फिर से धवल बना दो।
सूख रही भावों की नदियाँ, स्नेह प्यार से सजल बना दो।।
नहीं रहे बदरंग कहीं अब, सब पर ऐसा रंग चढ़ जाए।
हे रंगरेज रंगो कुछ ऐसा, मन तेरे रंग में रंग जाए।।  

श्याम रंग क्यों डाला हमने, छवि अपनी मैली कर डाली।
प्रेम रंग अति गाढ़ा था पर, घृणा द्वेष भर उसे मिटा ली।।  
रंग बदलकर भी क्या जीना, खरा रंग अंग अंग लग जाए।
हे रंगरेज रंगो कुछ ऐसा, मन तेरे रंग में रंग जाए।।  
 
धरती,अम्बर,अवनि सबको, दिव्य रंग में रंग डाला है।
सूरज,चाँद,सितारों से, दुनियां ही अनुपम कर डाला है।।
कुछ ऐसा तू हमें भी रंग दे, तू जैसा चाहे बन जायें।
हे रंगरेज रंगो कुछ ऐसा, मन तेरे रंग में रंग जाए।।

फाग रंग अब नीरस हुआ है, हर्ष जोश का भंग चढ़ा दे।
राग द्वेष बढ़े जो मन में, उसे मिटा अब प्यार बढ़ा दे।।
अंतःकरण के दोष हटाकर, इन्द्रधनुष सा मन रंग जाए।   
हे रंगरेज रंगो कुछ ऐसा, मन तेरे रंग में रंग जाए।।

तू है बड़ा रंगीला तूने, कहाँ कहाँ पर रंग नहीं डाला।
जीव जगत सब रंग में तेरे, सबको ही तूने रंग डाला।।
प्रेम रंग में रंग दे सबको, प्रेममयी जीवन बन जाए।
हे रंगरेज रंगो कुछ ऐसा, मन तेरे रंग में रंग जाए।।

उमेश यादव

शुक्रवार, 26 मार्च 2021

👉 तप से ही कल्याण होगा

“जिस प्रकार अग्नि में स्वर्ण को तपाने से उसके तमाम मल नष्ट हो जाते हैं, कान्ति अधिक आती है और मूल्य बढ़ जाता है, उसी प्रकार जो सत्य-रूपी अग्नि में प्रवेश करते हैं, उनका केवल शारीरिक बल ही नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक बल भी अहर्निश वृद्धि को प्राप्त होता है। सच्चा तप निर्बल को सबल, निर्धन को धनी, प्रजा को राजा, शूद्र को ब्राह्मण, दैत्य को देवता, दास को स्वामी और भिक्षुक को दाता बना देता है। सच्चे तप का भाव उस देश-भक्त में है जो अपने देश एवं अपनी जाति के गौरव और प्रतिष्ठा, कीर्ति और मान, सम्पत्ति और ऐश्वर्य की वृद्धि और उन्नति के लिए दृढ़ इच्छा रखता है।

अनेक प्रकार के दुःखों, कष्टों और संकटों को सहन करने, कठिन से कठिन मेहनत और श्रम को उठाने और विघ्नों से मुकाबला करने के लिए उद्यत रहता है। सच्चे देश-प्रेमी और देशानुरागी कल्याण की इच्छा करते हुए तप का अनुष्ठान करके, आत्मा और मन को धर्माचरण-रूपी प्रचण्ड अग्नि में दग्ध करके, अपने और अपने देश की अपवित्रता, मलिनता और अन्य अशुद्धियों को दूर कर जाति को आरोग्यता एवं सुख-सम्पत्ति की योग्यता प्रदान करते हैं।

जिन देशानुरागी पुरुषों में तपश्चर्या नहीं, जो मुसीबतों, विघ्नों और आफतों का मुकाबला करने से घबराते हैं, जो द्वन्द्वों को सहन नहीं कर सकते, जो भूख और प्यास, सर्दी और गर्मी धूप और छाँह, कोमल और कठोर, मीठा और खट्टा आदि द्वन्द्वों के दास हैं, ये संसार-रूपी युद्ध-पोत में कदापि कृत-कृत्य नहीं हो सकते।”

✍🏻 महामना मदन मोहन मालवीय
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1964 पृष्ठ 1

सोमवार, 22 मार्च 2021

👉 Chintan Ke Kshan चिंतन के क्षण 22 March 2021

◆ स्वतंत्र बुद्धि की कसौटी पर आप जिस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं उसे साहस के साथ प्रकट कीजिए, दूसरों को सिखाइए। चाहे आपको कितने ही विरोध-अवरोधों का सामना करना पड़े, आपकी बुद्धि जो निर्णय देती है, उसका गला न घोटें। आप देखेंगे कि इससे आपकी बौद्धिक तेजस्विता, विचारों की प्रखरता बढ़ेगी और आपकी बुद्धि अधिक कार्य कुशल और समर्थ बनेगी।

◇ भूलें वे हैं, जो अपराधों की श्रेणी में नहीं आतीं, पर व्यक्ति के विकास में बाधक हैं। चिड़चिड़ापन, ईर्ष्या, आलस्य, प्रमाद, कटुभाषण, अशिष्टता, निन्दा, चुगली, कुसंग, चिन्ता, परेशानी, व्यसन, वासनात्मक कुविचारों एवं दुर्भावनाओं में जो समय नष्ट होता है, उसे स्पष्टतः समय की बर्बादी कहा जायेगा। प्रगति के मार्ग में यह छोटे-छोटे दुर्गुण ही बहुत बड़ी बाधा बनकर प्रस्तुत होते हैं।  यह भूलें अपराधों के समान ही हानिकारक हैं।

◆ घिसने और टकराने से शक्ति उत्पन्न होती है। यह वैज्ञानिक नियम है। ईश्वर अपने प्रिय पुत्र मानव को शक्तिवान्, प्रगतिशील, विकासोन्मुख, चतुर, साहसी और पराक्रमी बनाना चाहता है। इसीलिए वह समस्याओं और कठिनाइयों का एक बड़ा अम्बार प्रत्येक मनुष्य के सामने खड़ा किया करता है।

◇ ईश्वर को इस बात की इच्छा नहीं कि आप तिलक लगाते हैं या नहीं, पूजा-पत्री करते हैं या नहीं, भोग-आरती करते हैं या नहीं, क्योंकि उस सर्वशक्तिमान् प्रभु का कुछ भी काम इन सबके बिना रुका हुआ नहीं है। वह इन बातों से प्रसन्न नहीं होता, उसकी प्रसन्नता तब प्रस्फुटित होती है जब अपने पुत्रों को पराक्रमी, पुरुषार्थी, उन्नतिशील, विजयी, महान् वैभव युक्त, विद्वान्, गुणवान्, देखता है और अपनी रचना की सार्थकता अनुभव करता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 20 मार्च 2021

👉 व्यभिचार की ओर आकर्षित मत होना

व्यभिचार सबसे बड़ा विश्वासघात है। किसी स्त्री के पास तुम तभी तो पहुँच पाते हो जब उसके घरवाले तुम्हारा विश्वास करते हैं और उस तक पहुँच जाने देते हैं। कौन है जो किसी अपरिचित व्यक्ति के घर में निधड़क चला जावे और उससे मनचाही बातचीत करे। इसलिए सज्जनों! अपने मित्र के घर पर हमला मत करो। जरा पाप से डरो और हया शर्म का ख्याल रखो। क्या पाप, घृणा, बदनामी और कलंक का तुम्हें जरा भी डर नहीं है?

सद्गृहस्थ वह है जो पड़ौसी की स्त्री के रूप में अपनी माता की छाया देखता है। वीर वह है जो पराई स्त्री पर पाप की दृष्टि से नहीं देखता। स्वर्ग के वैभव का अधिकारी वह है जो स्त्रियों को माता, बहिन, और पुत्री समझता हुआ उनके चरणों में प्रणाम करता है।

मनुष्यों! व्यभिचार की ओर मत बढ़ो। यह जितना ही लुभावना है, उतना ही दुखदायी है। अग्नि की तरह यह सुनहरा चमकता है। पर देखो, जरा मूल से भस्म कर डालने की उसमें बड़ी घातक शक्ति है। इस सर्वनाश के मार्ग पर मत चलना, क्योंकि जिसने भी इधर कदम बढ़ाया है उसे भारी क्षति और विपत्ति का सामना करते हुए हाथ मल मलकर पछताना पड़ा है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1944 पृष्ठ 1

गुरुवार, 18 मार्च 2021

👉 Aadha Kilo Aata आधा किलो आटा

एक नगर का सेठ अपार धन सम्पदा का स्वामी था। एक दिन उसे अपनी सम्पत्ति के मूल्य निर्धारण की इच्छा हुई। उसने तत्काल अपने लेखा अधिकारी को बुलाया और आदेश दिया कि मेरी सम्पूर्ण सम्पत्ति का मूल्य निर्धारण कर ब्यौरा दीजिए, पता तो चले मेरे पास कुल कितनी सम्पदा है।

सप्ताह भर बाद लेखाधिकारी ब्यौरा लेकर सेठ की सेवा में उपस्थित हुआ। सेठ ने पूछा- “कुल कितनी सम्पदा है?” लेखाधिकारी नें कहा – “सेठ जी, मोटे तौर पर कहूँ तो आपकी सात पीढ़ी बिना कुछ किए धरे आनन्द से भोग सके इतनी सम्पदा है आपकी”

लेखाधिकारी के जाने के बाद सेठ चिंता में डूब गए, ‘तो क्या मेरी आठवी पीढ़ी भूखों मरेगी?’ वे रात दिन चिंता में रहने लगे।  तनाव ग्रस्त रहते, भूख भाग चुकी थी, कुछ ही दिनों में कृशकाय हो गए। सेठानी द्वारा बार बार तनाव का कारण पूछने पर भी जवाब नहीं देते। सेठानी से हालत देखी नहीं जा रही थी। उसने मन स्थिरता व शान्त्ति के किए साधु संत के पास सत्संग में जाने को प्रेरित किया। सेठ को भी यह विचार पसंद आया। चलो अच्छा है, संत अवश्य कोई विद्या जानते होंगे जिससे मेरे दुख दूर हो जाय।

सेठ सीधा संत समागम में पहूँचा और एकांत में मिलकर अपनी समस्या का निदान जानना चाहा। सेठ नें कहा- “महाराज मेरे दुख का तो पार नहीं है, मेरी आठवी पीढ़ी भूखों मर जाएगी। मेरे पास मात्र अपनी सात पीढ़ी के लिए पर्याप्त हो इतनी ही सम्पत्ति है। कृपया कोई उपाय बताएँ कि मेरे पास और सम्पत्ति आए और अगली पीढ़ियाँ भूखी न मरे। आप जो भी बताएं मैं अनुष्ठान, विधी आदि करने को तैयार हूँ”

संत ने समस्या समझी और बोले- “इसका तो हल बड़ा आसान है। ध्यान से सुनो सेठ, बस्ती के अन्तिम छोर पर एक बुढ़िया रहती है, एक दम कंगाल और विपन्न। उसके न कोई कमानेवाला है और न वह कुछ कमा पाने में समर्थ है। उसे मात्र आधा किलो आटा दान दे दो। अगर वह यह दान स्वीकार कर ले तो इतना पुण्य उपार्जित हो जाएगा कि तुम्हारी समस्त मनोकामना पूर्ण हो जाएगी। तुम्हें अवश्य अपना वांछित प्राप्त होगा।”

सेठ को बड़ा आसान उपाय मिल गया। उसे सब्र कहां था, घर पहुंच कर सेवक के साथ कुन्तल भर आटा लेकर पहुँच गया बुढिया के झोपडे पर। सेठ नें कहा- “माताजी मैं आपके लिए आटा लाया हूँ इसे स्वीकार कीजिए”

बूढ़ी मां ने कहा- “बेटा आटा तो मेरे पास है, मुझे नहीं चाहिए” 

सेठ ने कहा- “फिर भी रख लीजिए”

बूढ़ी मां ने कहा- “क्या करूंगी रख के मुझे आवश्यकता नहीं है”

सेठ ने कहा- “अच्छा, कोई बात नहीं, कुन्तल नहीं तो यह आधा किलो तो रख लीजिए”

बूढ़ी मां ने कहा- “बेटा, आज खाने के लिए जरूरी, आधा किलो आटा पहले से ही  मेरे पास है, मुझे अतिरिक्त की जरूरत नहीं है”

सेठ ने कहा- “तो फिर इसे कल के लिए रख लीजिए”

बूढ़ी मां ने कहा- “बेटा, कल की चिंता मैं आज क्यों करूँ, जैसे हमेशा प्रबंध होता है कल के लिए कल प्रबंध हो जाएगा”  बूढ़ी मां ने लेने से साफ इन्कार कर दिया।

सेठ की आँख खुल चुकी थी, एक गरीब बुढ़िया कल के भोजन की चिंता नहीं कर रही और मेरे पास अथाह धन सामग्री होते हुए भी मैं आठवी पीढ़ी की चिन्ता में घुल रहा हूँ। मेरी चिंता का कारण अभाव नहीं तृष्णा है।

वाकई तृष्णा का कोई अन्त नहीं है। संग्रहखोरी तो दूषण ही है। संतोष में ही शान्ति व सुख निहित है।

👉 हम सब परस्पर एकता के सूत्र में जुड़े हैं

समुद्र में असंख्यों लहरें उठती हैं—उनका अस्तित्व अलग-अलग होता है। हर लहर पर एक स्वतन्त्र सूरज चमकता दिखाई देता है, इतने पर भी यदि तात्विक दृष्टि से देखा जाय तो प्रतीत होगा कि इस भिन्नता के भीतर एक अविछिन्न एकता की सत्ता विद्यमान है। सारा समुद्र एक ही है। एक ही सूर्य असंख्यों लहरों पर चमकता है। इन प्रतिबिंबों की अनेकता के कारण कितने ही सूर्यो की सत्ताएँ सिद्ध नहीं होती। हवा और जल के संयोग से उत्पन्न होते रहने वाले बबूले एक-दूसरे से अलग दिखाई भले ही दें वे सुविस्तृत जलाशय से पृथक नहीं माने जा सकते।

मनुष्य की संख्या करोड़ों में है। उनकी देह तथा आकृति-प्रकृति में भी अन्तर है। इतने पर भी वे सभी एक ही अनन्त विश्वात्मा के अविछिन्न अंग अवयव हैं। माला के मध्य पिरोये हुए सूत्र की तरह एक ही आत्मा सबको एकता के बन्धनों में बाँधे हुए है। देखने में हम एक दूसरे से पृथक लग सकते हैं,पर हमारा अस्तित्व पूर्ण तथा एक दूसरे पर निर्भर है। एकाकी जीवन एक क्षण के लिए भी सम्भव नहीं। सकते। दूसरे का सहयोग पाये बिना अपना निर्वाह किसी भी प्रकार नहीं हो सकता।

प्राणिमात्र के भीतर काम करने वाली इस एकात्म चेतना की अनुभूति ही अध्यात्म दर्शन का मूलभूत उद्देश्य है। समष्टि की इकाई ही व्यष्टि हे। समाज का एक पुर्जा ही मनुष्य है। इस मान्यता को अपनाकर आत्मोपभ्येन सर्वत्र की दृष्टि हम विकसित करें और आत्मा को विश्वात्मा का घटक मात्र माने तो वह जीवन लक्ष्य प्राप्त हो सकता है, जिसे ईश्वर की उपलब्धि कहते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1974 पृष्ठ 1

👉 Chintan Ke Kshan चिंतन के क्षण 18 March 2021

◆ स्वार्थी व्यक्ति यों किसी का कुछ प्रत्यक्ष बिगाड़ नहीं करता, किन्तु अपने लिए सम्बद्ध व्यक्तियों की सद्भावना खो बैठना एक ऐसा घाटा है, जिसके कारण उन सभी लाभों से वंचित होना पड़ता है जो सामाजिक जीवन में पारस्परिक स्नेह-सहयोग पर टिके हुए हैं।

◇ ईश्वर को इस बात की इच्छा नहीं कि आप तिलक लगाते हैं या नहीं, पूजा-पत्री करते हैं या नहीं, भोग-आरती करते हैं या नहीं, क्योंकि उस सर्वशक्तिमान् प्रभु का कुछ भी काम इन सबके बिना रुका हुआ नहीं है। वह इन बातों से प्रसन्न नहीं होता, उसकी प्रसन्नता तब प्रस्फुटित होती है जब अपने पुत्रों को पराक्रमी, पुरुषार्थी, उन्नतिशील, विजयी, महान् वैभव युक्त, विद्वान्, गुणवान्, देखता है और अपनी रचना की सार्थकता अनुभव करता है।

◆ आनंद का सबसे बड़ा शत्रु है- असंतोष। हम प्रगति के पथ पर उत्साहपूर्वक बढ़ें, परिपूर्ण पुरुषार्थ करें। आशापूर्ण सुंदर भविष्य की रचना के लिए संलग्न रहें, पर साथ ही यह भी ध्यान रखें कि असंतोष की आग में जलना छोड़ें। इस दावानल में आनंद ही नहीं, मानसिक संतुलन और सामर्थ्य का स्रोत भी समाप्त हो जाता है। असंतोष से प्रगति का पथ प्रशस्त नहीं, अवरुद्ध ही होता है।

◇ किसी को यदि परोपकार द्वारा सुखी करते हैं और किसी को अपने क्रोध का लक्ष्य बनाते हैं, तो एक ओर का पुण्य दूसरी ओर के पाप से ऋण होकर शून्य रह जायेगा। गुण, कर्म, स्वभाव तीनों का सामंजस्य एवं अनुरूपता ही वह विशेषता है, जो जीवन जीने की कला में सहायक होती है।

◆ ऐसे विश्वासों और सिद्धान्तों को अपनाइये जिनसे लोक कल्याण की दिशा में प्रगति होती हो। उन विश्वासों और सिद्धान्तों को हृदय के भीतरी कोने में गहराई तक उतार लीजिए। इतनी दृढ़ता से जमा लीजिए कि भ्रष्टाचार और प्रलोभन सामने उपस्थित होने पर भी आप उन पर दृढ़ रहें, परीक्षा देने एवं त्याग करने का अवसर आवे तब भी विचलित न हों। वे विश्वास श्रद्धास्पद होने चाहिए, प्राणों से अधिक प्यारे होने चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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