सत्य का साक्षात्कार है—निर्वितर्क समाधि
युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव कहते थे कि स्मृति के दोहरे अर्थ हैं। एक अर्थ-सामान्य, साधारण है और एक है— विशिष्ट, आध्यात्मिक। सामान्य साधारण अर्थ में स्मृति हमारा पिछला कल है, आज का वर्तमान है। लेकिन इसका दायरा हमारे वर्तमान जीवन तक सीमित है। आज के रिश्ते-नाते, इनकी खटास-मिठास, बीता हुआ बचपन, कहीं खो चुकी या खो रही किशोरवय, स्मृतियों के पिटारे में ही तो कैद है। अगर किसी तरह इसका लोप हो जाय, तो प्रकारान्तर से हम ही लुप्त हो जायेंगे।
स्मृति के इस सिलसिले से परे इनका एक आध्यात्मिक पहलू है। जिसमें हमारा सम्पूर्ण अतीत बँधा है। इसमें पिरोये हैं—हमारे अनगिनत जन्म, हमारे सभी कर्मबीज। हमारे आग्रह, हमारी मान्यताएँ, हमारी सोच, हमारा दृष्टिकोण। योग साधना में इसी का शोधन करना है। इस तथ्य को पतंजलि स्मृति शुद्धि कहते हैं। इसे ही आचार्य शंकर ने चित्तशुद्धि कहा है। स्मृति का यह जमावड़ा-जखीरा वस्तुतः हम पर बोझ है। इसे हल्का करने की जरूरत है। स्मृति की यह अशुद्धि ही प्रकारान्तर से हमारे जीवन की विकृति है। इसे धोये बिना, इसे जलाये-गलाये बिना आध्यात्मिक पथ प्रशस्त नहीं होता।
स्मृति परिशुद्धि या चित्तशुद्धि की यह यात्रा बड़ी दुःखदायी है। यह धधकती आग का वह दरिया है, जिसे प्रत्येक साधक को पार करना पड़ता है। यही यथार्थ साधना है, सच यह भी है कि इसी में सभी साधनाओं की सार्थकता है। इसके अभाव में सभी साधनाएँ निरर्थक हैं। इसे किये बिना जप, मंत्र, योग, तप किसी का कोई मूल्य नहीं है। योग और तंत्र में कई बार कई चमत्कारी संतों की कथाएँ कहीं सुनी जाती हैं। परन्तु इनमें से किसी भी चमत्कार से चित्तशुद्ध नहीं होता। यह ऐसा चमत्कार है, जिसे योग साधक को स्वयं करना पड़ता है।
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १७१
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या