मंगलवार, 10 दिसंबर 2019

👉 परम मित्र कौन है?

एक व्यक्ति था उसके तीन मित्र थे। एक मित्र ऐसा था जो सदैव साथ देता था। एक पल, एक क्षण भी बिछुड़ता नहीं था।

दूसरा मित्र ऐसा था जो सुबह शाम मिलता।

और तीसरा मित्र ऐसा था जो बहुत दिनों में जब तब मिलता।

एक दिन कुछ ऐसा हुआ की उस व्यक्ति को अदालत में जाना था और किसी कार्यवश साथ में किसी को गवाह बनाकर साथ ले जाना था। अब वह व्यक्ति अपने सब से पहले अपने उस मित्र के पास गया जो सदैव उसका साथ देता था और बोला :- "मित्र क्या तुम मेरे साथ अदालत में गवाह बनकर चल सकते हो?

वह मित्र बोला :- माफ़ करो दोस्त, मुझे तो आज फुर्सत ही नहीं। उस व्यक्ति ने सोचा कि यह मित्र मेरा हमेशा साथ देता था। आज मुसीबत के समय पर इसने मुझे इंकार कर दिया।

अब दूसरे मित्र की मुझे क्या आशा है। फिर भी हिम्मत रखकर दूसरे मित्र के पास गया जो सुबह शाम मिलता था, और अपनी समस्या सुनाई।

दूसरे मित्र ने कहा कि :- मेरी एक शर्त है कि मैं सिर्फ अदालत के दरवाजे तक जाऊँगा, अन्दर तक नहीं।

वह बोला कि :- बाहर के लिये तो मै ही बहुत हूँ मुझे तो अन्दर के लिये गवाह चाहिए। फिर वह थक हारकर अपने तीसरे मित्र के पास गया जो बहुत दिनों में मिलता था, और अपनी समस्या सुनाई।

तीसरा मित्र उसकी समस्या सुनकर तुरन्त उसके साथ चल दिया।

अब आप सोच रहे होंगे कि...
वो तीन मित्र कौन है...?

तो चलिये हम आपको बताते है इस कथा का सार।

जैसे हमने तीन मित्रों की बात सुनी वैसे हर व्यक्ति के तीन मित्र होते हैं। सब से पहला मित्र है हमारा अपना 'शरीर' हम जहा भी जायेंगे, शरीर रुपी पहला मित्र हमारे साथ चलता है। एक पल, एक क्षण भी हमसे दूर नहीं होता।

दूसरा मित्र है शरीर के 'सम्बन्धी' जैसे :- माता - पिता, भाई - बहन, मामा -चाचा इत्यादि जिनके साथ रहते हैं, जो सुबह - दोपहर शाम मिलते है।

और तीसरा मित्र है :- हमारे 'कर्म' जो सदा ही साथ जाते है।

अब आप सोचिये कि आत्मा जब शरीर छोड़कर धर्मराज की अदालत में जाती है, उस समय शरीर रूपी पहला मित्र एक कदम भी आगे चलकर साथ नहीं देता। जैसे कि उस पहले मित्र ने साथ नहीं दिया।

दूसरा मित्र - सम्बन्धी श्मशान घाट तक यानी अदालत के दरवाजे तक "राम नाम सत्य है" कहते हुए जाते हैं तथा वहाँ से फिर वापिस लौट जाते है।

और तीसरा मित्र आपके कर्म हैं।
कर्म जो सदा ही साथ जाते है चाहे अच्छे हो या बुरे।

अब अगर हमारे कर्म सदा हमारे साथ चलते है तो हमको अपने कर्म पर ध्यान देना होगा अगर हम अच्छे कर्म करेंगे तो किसी भी अदालत में जाने की जरुरत नहीं होगी।

और धर्मराज भी हमारे लिए स्वर्ग का दरवाजा खोल देगा।

रामचरित मानस की पंक्तियां हैं कि...
"काहु नहीं सुख-दुःख कर दाता।
निजकृत कर्म भोगि सब भ्राता।।"

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तमसो मा ज्योतिर्गमय
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👉 MISCONCEPTIONS ABOUT ELIGIBILITY FOR GAYATRI SADHANA (Part 2)

Q.2. Is it true that Gayatri Sadhana is permissible to a particular caste only ?

Ans. The concept of caste is grossly misunderstood in the modern society. Ancient Indian Culture did not relate the caste system to one’s parentage or ancestry. In those days, defaulters of basic codes of social conduct were deprived of normal civil rights. They were compelled by the society to undertake specific duties along with deprivation of the right to worship Gayatri. The caste of a person thus denoted the field of his activity rather than his parentage. Denial of worship was, therefore, a punishment to the guilty. In the present context, the codes for “social punishment” have changed. Work-assignments have also undergone a sea-change. Under these circumstances, all human beings, owing their existence to the one Supreme Being, are entitled to worship Gayatri irrespective of their ancestry, parentage or belief.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 28

👉 कुछ ख़ास बातें..

1. आप कुछ नहीं करेंगे..
तो आप को कोई कुछ नहीं कहेगा..!!

2. आप अगर सक्रिय हैँ..
तो हमेशा आप पर उँगलियाँ उठेगी..!!

3. अगर आप ये नहीं सोचेंगे..
कि श्रेय किसको मिलेगा..
तो आप बहुत कुछ कर सकते हैँ..!!

4. आपके जितने विरोधी होंगे..
आपका उतना बड़ा कद होगा..!!

5. आप जितना ज्यादा काम करेंगे..
उतना ज्यादा और काम करना पड़ेगा..!!

6. जिम्मेदारी उसी की तरफ खिंची आती हैं..
जो उन्हें उठाना चाहता है..!!

7. आप जो भी प्रोजेक्ट करेंगे..
उसकी सफलता का श्रेय संस्था को मिलेगा..
और असफलता की जवाबदेही आपकी होगी..!!

8. जो आपका सबसे अच्छा हितैषी है..
वो आपके मुँह पर आपकी आलोचना करेगा.!!

9. आप को प्रशंसा जब मिलेगी..
जब आप उसकी अपेक्षा करना बंद कर देंगे..!!

10. आप लोकप्रिय तब होंगे..
जब अपने साथियों के कार्यों को सराहेंगे..
और उनका उत्साह बढ़ाएंगे..!!

11. आप कब सही थे..कोई याद नहीं रखेगा, आप कब गलत थे..कोई नहीं भूलेगा..!!

12. आप जितना नियम मान कर चलेंगे..
आप पर उतना ज्यादा नियम मानने का दबाव बनाया जायेगा..!!

सबसे ख़ास बात..
सामाजिक कार्यों का उद्देश्य मन की संतुष्टि होता है..और इस के लिए बहुत कुछ सहना होता है..और आत्मसंतुष्टि से बढ़कर कुछ नहीं है...!!!

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा

आध्यात्मिक चिकित्सा- बोध, निदान एवं विज्ञान का पूर्ण तंत्र है। इसमें जीवन की दृश्य-अदृश्य संरचना का सम्पूर्ण बोध है। इसी के साथ यहाँ जीवन के दैहिक-दैविक एवं आध्यात्मिक रोगों के निदान की सूक्ष्म विधियों का समग्र ज्ञान है। इतना ही नहीं इसमें इन सभी रोगों के सार्थक समाधान का प्रायोगिक विज्ञान भी समाविष्ट है, जो मानव जीवन की सम्पूर्ण चिकित्सा के ऋषि संकल्प को दुहराता है।
  
यह वही महासंकल्प है, जो ऋग्वेद के दशम मण्डल के रोग निवारण सूक्त के पंचम मंत्र के ऋषि विश्वामित्र की अन्तर्चेतना में गूँजा था। नवयुग की नवीन सृष्टि करने वाले ब्रह्मर्षि विश्वामित्र उन क्षणों में चिन्तन में निमग्न थे। तभी उन्हें एक करूण, आर्त स्वर सुनाई दिया। यह विकल स्वर एक दुःखी नारी का था, जिसे उनका शिष्य जाबालि लिए आ रहा था। इस युवती नारी को रोगों ने असमय वृद्ध बना दिया था।
  
पास आते ही ब्रह्मज्ञानी महर्षि ने उसकी व्यथा के सारे सूत्र जान लिए। और जाबालि को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा- वत्स! चिकित्सा की सारी प्रचलित विधियाँ एवं औषधियाँ इस पर नाकाम हो गयी हैं, यही कहना चाहते हो न। हँं आचार्यवर...। वह अभी आगे कुछ कह पाता तभी ऋषि बोले-वत्स! अभी एक चिकित्सा विधि बाकी है- और वह है आध्यात्मिक चिकित्सा। तुम्हारे सम्मुख मैं आज इसका प्रयोग करूँगा।
  
शिष्य जाबालि अपने आचार्य की अनन्त आध्यात्मिक शक्तियों से परिचित थे, सो वे शान्त रहे। फिर भी उनमें जिज्ञासा तो थी ही। जिसका समाधान करते हुए अन्तर्यामी ब्रह्मर्षि बोले- पुत्र जाबालि, सफल चिकित्सा के लिए जीवन का समग्र बोध आवश्यक है। और जीवन मात्र देह नहीं है। इसमें इन्द्रिय, प्राण, मन, चित्त, बुद्धि, अहं एवं अन्तरात्मा की अन्य अदृश्य कड़ियाँ भी हैं। रोग के सही निदान के लिए इनका पारदर्शी ज्ञान होना चाहिए। तभी समाधान का विज्ञान कारगर होता है। यह कहते हुए महर्षि ने उस पीड़ित नारी को सामने बिठाकर उसे अपने महातप के एक अंश का अनुदान देने का संकल्प करते हुए कहा- आ त्वागमं शंतातिभिरथो अरिष्टातातिभिः। दक्षं त उग्रमाभारिषं परा यक्ष्मं सुवामि ते॥
  
अर्थात्- ‘आपके पास शान्ति फैलाने वाले तथा अविनाशी साधनों के साथ आया हूँ। तेरे लिए प्रचण्ड बल भर देता हूँ। तेरे रोग को दूर भगा देता हूँ।’ महर्षि के इस संकल्प ने उस पीड़ित नारी को स्वास्थ्य का वरदान देने के साथ आध्यात्मिक चिकित्सा की पुण्य परम्परा का प्रारम्भ भी किया।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १३५

Jeevan Ki Bagdor Aapke Hath Mai | जीवन की बागडोर आपके हाथ में | Pt Shrir...



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शनिवार, 7 दिसंबर 2019

👉 को धर्मानुद्धरिष्यसि?

हिमालय के हिमशिखरों से बहती हुई बासन्ती बयार हमारे दिलों को छूने आज फिर आ पहुँची है। इस बयार में दुर्गम हिमालय में महातप कर रहे महा-ऋषियों, महासिद्धों के तप प्राण घुले हुए हैं। इसमें घुली हुई है- उनकी विकल वेदना, उनकी गहरी पीड़ा और उनके सघन सन्ताप से उपजा महाप्रश्न- को धर्मानुद्धरिष्यसि? कौन करेगा धर्म का उद्धार? यदि हमारे दिलों में संवेदना है तो इस प्रश्न की टीस भरी चुभन हमें जरूर महसूस होगी। हमारे प्राण इस ऋषि पीड़ा को अवश्य अनुभव करेंगे।
  
धर्म-प्रवचन नहीं है। बौद्धिक तर्क विलास, वाणी का वाक् जाल भी धर्म नहीं है। धर्म- तप है। धर्म- तितीक्षा है। धर्म- कष्ट सहिष्णुता है। धर्म- परदुःख कातरता है। धर्म- सच्चाइयों और अच्छाइयों के लिए जीने और इनके लिए मर मिटने का साहस है। धर्म- मर्यादाओं की रक्षा के लिए उठने वाली हुंकारें हैं। धर्म- सेवा की सजल संवेदना है। धर्म- पीड़ा निवारण के लिए स्फुरित होने वाला महासंकल्प है। धर्म- पतन निवारण के लिए किए जाने वाले युद्ध का महाघोष है। धर्म- दुष्वृत्तियों, दुष्कृत्यों, दुरीतियों के महाविनाश के लिए किए जाने वाले अभियान का शंखनाद है। धर्म- सर्वहित के लिए स्वहित का त्याग है।
  
ऐसा धर्म केवल तप के बासन्ती अंगारों में जन्म लेता है। बलिदान के बासन्ती राग में इसकी सुमधुर गूंज सुनी जाती है। अबकी बार वसन्त पंचमी पर बहती बासन्ती बयार हम सबके जीवन में तप के इन्हीं अंगारों को दहकाने आयी है। महातप की इन्हीं ज्वालाओं को धधकाने आयी है। हमें ऋषि सन्तान होने का बोध और इससे जुड़े कर्त्तव्यों का अहसास कराने आयी है। हमें ही देना है बासन्ती बयार में घुले हुए ऋषियों के महाप्रश्न का उत्तर। हमें ही गढ़नी है अपने जीवन में धर्म की सच्ची परिभाषा। लेकिन यह होगा तभी जब हम अपने जीवन को धर्म का यज्ञकुण्ड बना लें। और तप की महाज्वालाओं में स्वयं के प्राणों का अनवरत समिधादान करते रहें। इस धर्म यज्ञ का सुफल ही धर्म के सत्य को व्यापक विस्तार देगा।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १३९

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

👉 ध्यान का विहान

नए साल का सूरज ध्यान का विहान लेकर आया है। हिमालय की हिमाच्छादित पर्वतमालाओं पर होने वाला नव वर्ष का यह सूर्योदय सब भाँति अद्भुत व अपूर्व है। सम्पूर्ण विश्व को प्रकाश व प्राण देने वाले सविता देव ने हिमालय के हिम शिखरों, वहाँ के नदी-नद व घाटियों को, गहन गुफाओं को अपने स्वर्णिम प्रकाश से भर दिया है। नव वर्ष के इस सूर्य ने दुर्गम हिमालय में रहने वाले ऋषियों, तपस्वियों,-महासिद्धों को ध्यान से सबेरा दिया है। ध्यान के इस विहार में उनकी प्राण चेतना-विचार चेतना व भाव चेतना सूर्य की स्वर्णिम आभा से जगमगा उठी है।
  
ध्यान में यह विहान आपके जीवन में भी अवतरित हो सकता है। करना बस इतना है कि प्रायः सूर्योदय के समय बिस्तर पर लेटे हुए या आसन पर बैठे हुए अपनी आँखें बन्द करें। और मन की आँखों से हिमालय के इस अद्भुत सूर्योदय को निहारें। भाव यह करें कि हिमालय के हिम शिखरों में अवतरित हुई सूर्य की स्वर्णिम आभा, जिसमें हिमालय के ऋषियों, तपस्वियों व सिद्धों का तप-प्राण घुला है, आपके सिर से होकर शरीर में प्रवेश कर रहा है। आभा के इस दिव्य पुञ्ज को अपने सिर के ऊपर कुछ इस तरह अनुभव करें, जैसे कि सिर के ऊपर सूर्योदय हो गया है। और आपके सिर के ऊपर प्रकाश व प्राण की धाराएँ उड़ेल रहा हो।
  
भीतर जाती हुई प्रत्येक श्वास के साथ इस कल्पना को प्रगाढ़ करें। अपनी गहराइयों में प्रवेश करते प्रकाश को अनुभव करें। श्वास को छोड़ते हुए यह कल्पना करें कि शरीर प्राण व मन के प्रत्येक कण में समाया अंधेरा एक अंधेरी नदी के रूप में सिर से बाहर की ओर निकल रहा है। इस पूरी प्रक्रिया में श्वास के आने-जाने की गति को अति धीमी व गहरी बनाए रखें। बहुत धीरे-धीरे इस क्रम को आगे बढ़ाए। सुबह-सुबह कम से कम बीस-पच्चीस मिनट इस प्रक्रिया को पूरी करें। लगातार करते रहा जाय तो छः महीने में इसके परिणाम मिलने लगेंगे। प्राण-मन व अन्तःकरण में ध्यान का सबेरा साफ-साफ झलकने लगता है। ध्यान के इस विहार में प्राण चेतना, विचार चेतना व भाव चेतना सूर्य की स्वर्णिम आभा से जगमगाते अनुभव होते हैं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १३८

गुरुवार, 5 दिसंबर 2019

👉 जीवन की सफलता

जीवन ऊर्जा का महासागर है। काल के किनारे पर अगणित अन्तहीन ऊर्जा की लहरें टकराती रहती हैं। इनकी न कोई शुरुआत है, और न कोई अन्त; बस मध्य है। मनुष्य भी इन अनगिनत तरंगों में एक छोटी सी तरंग है। एक लघु बीज है- असीम सम्भावनाओं का।
  
तरंग की स्वाभाविक आकांक्षा है सागर होने की और बीज की स्वाभाविक चाहत है कि वृक्ष हो जाय। तरंग जब तक महासागर की व्यापकता में फैले नहीं, बीज जब तक फूलों से खिले नहीं, फलों से लदे नहीं, तब तक तृप्ति असम्भव है। इनके अस्तित्त्व की, इनके जीवन की सफलता भी इसी में है।
  
मनुष्य की स्वाभाविक आकांक्षा है परमात्मा होने की। परमात्मा का अर्थ है जीवन की सफलता और पूर्णता। परमात्मा स्वर्ग या आसमान में बैठा हुआ कोई व्यक्ति नहीं है। यह तो जीवन की अन्तिम सफलता है, परम पूर्णता है। जीवन की तृप्ति एवं परितोष यही है। इसके पहले पड़ाव तो बहुत हैं पर मंजिल नहीं है।
  
इस मंजिल तक पहुँचे बिना प्रत्येक मनुष्य पीड़ित रहता है। असफलता का दंश उसे सालता रहा है। वह चाहे जितना धन कमा ले, कितना ही वैभव जुटा ले, किन्तु उसे अपने जीवन की सफलता एवं सार्थकता की अनुभूति नहीं हो पाती। एक कंटीली चुभन, बेचैनी भरा दर्द हमेशा बना रहता है। इसे भुलाने की कितनी ही कोशिशें की जाती हैं, लेकिन हर कोशिश कुंठा में ही तब्दील होती है।
  
और यह ठीक भी है, क्योंकि यदि कहीं ऐसा हो जाय तो बीज कभी भी वृक्ष न बनेगा। तरंग को कभी सागर की व्यापकता न मिलेगी। बीज जब तक वृक्ष बनकर फूलों से न खिलें, उसकी सुगन्ध मुक्त आकाश में न बिखरे तब तक परितृप्ति कैसी? तरंग जब तक महासागर की व्यापकता न पाए तब तक सफलता कैसी? मनुष्य भी जब तक जीवन के परम शिखर परमात्मा को छूकर उससे एकाकार न हो तब तक उसकी सार्थकता कैसी?
  
जीवन की सफलता तो परमात्मा की अनन्तता को पाने में है। इसे पाए बिना जिन्होंने समझ लिया कि वे सफल हो गए, बड़े अभागे हैं। बड़भागी तो वे हैं, जो अनुभव करते हैं कि जीवन में कुछ भी करो, कुछ भी पाओ असफलता ही हाथ लगती है। क्योंकि ये एक न एक दिन परमात्मा को पा लेंगे, स्वयं परमात्मा हो जाएँगे।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १३७

मंगलवार, 3 दिसंबर 2019

👉 आदर्शों की राह

आदर्शविहीन जीवन बस अन्तहीन भटकन है, जिसकी न कोई मंजिल है और न राह, यहाँ तक कि राही भी बेसुध-बेखबर है। ऐसे जीवन की दशा उस नाव की भाँति है, जिसका मल्लाह नदारद है। अथवा फिर बेखबर सोया हुआ है। और अनुभव की बात यह है कि जीवन के सागर पर तूफान हमेशा बने रहते हैं। आदर्श न हो तो जीवन की नौका को डूबने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं बचता।
  
स्वामी विवेकानन्द के वचन हैं- ‘आदर्शों की ताकत चर्म चक्षुओं से न दिखने पर भी अतुलनीय है। पानी की एक बूंद को यूं देखें तो उसमें कुछ भी ताकत नजर नहीं आती। लेकिन यदि उसे किसी चट्टान की दरार में जमकर बर्फ बनने का अवसर मिल जाय, तो वह चट्टान को फोड़ देगी। इस जरा से परिवर्तन से बूंद को कुछ हो जाता है। और उसमें सोयी हुई ताकत सक्रिय एवं परिणामकारी हो उठती है। ठीक यही बात आदर्शों की है। जब तक वे विचार रूप में रहते हैं, उनकी शक्ति परिणामकारी नहीं होती। लेकिन जब वे किसी के व्यक्तित्व और आचरण में ठोस रूप लेते हैं, तब उनसे विराट शक्ति और महत् परिणाम उत्पन्न होते हैं।’
  
आदर्श- सघन तम से महासूर्य की ओर उठने की आकांक्षा है। जिसे यह आकांक्षा विकल-बेचैन नहीं करती, वह हमेशा अन्धकार में ही पड़ा रहता है। लेकिन यह याद रहे कि आदर्श केवल आकांक्षा भर नहीं है। यह साहस भरा संकल्प भी है। क्योंकि जिस आकांक्षा के साथ साहसिक संकल्प का बल नहीं होता, उसका होने या न होने का कोई अर्थ नहीं है। यह हमेशा निर्जीव और बेजान बनी रहती है।
  
अपने साहस भरे संकल्प के साथ आदर्श कठोर श्रम की कठिन तप साधना भी है। क्योंकि अविराम श्रम साधना के अभाव में कोई बीज कभी वृक्ष नहीं बनता है। जो भी आदर्शों की राह पर चले हैं, उन सभी का निष्कर्ष एक है, जिस आदर्श में व्यवहार का प्रयत्न न हो, वह निरर्थक है। और जो व्यवहार आदर्श प्रेरित न हो, वह भयावह है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १३६

सोमवार, 2 दिसंबर 2019

👉 जीवन का आनन्द

जीवन का आनन्द किसी वस्तु या परिस्थिति में नहीं, बल्कि जीने वाले के दृष्टिकोण में है। स्वयं अपने आप में है। क्या हमको मिला है- उसमें नहीं, बल्कि कैसे हम उसे अनुभव करते हैं? किस तरह से उसे लेते हैं- उसमें है। यही वजह है कि एक ही वस्तु या परिस्थिति दो भिन्न दृष्टिकोण के व्यक्तियों के लिए अलग-अलग अर्थ रखती है। एक को उसमें आनन्द की अनुभूति होती है- दूसरे को विषाद की।
  
दक्षिणेश्वर के मन्दिर निर्माण के समय तीन श्रमिक धूप में बैठे पत्थर तोड़ रहे थे। उधर से गुजर रहे श्री रामकृष्ण देव ने उनसे पूछा- क्या कर रहे हैं? एक बोला; अरे भई, पत्थर तोड़ रहा हूँ। उसके कहने में दुःख था और बोझ था। भला पत्थर तोड़ना आनन्द की बात कैसे हो सकती है। वह उत्तर देकर फिर बुझे हुए मन से पत्थर तोड़ने लगा।
  
तभी श्री परमहंस देव की ओर देखते हुए दूसरे श्रमिक ने कहा, बाबा, यह तो रोजी-रोटी है। मैं तो बस अपनी आजीविका कमा रहा हूँ। उसने जो कहा, वह भी ठीक बात थी। वह पहले मजदूर जितना दुःखी तो नहीं था, लेकिन आनन्द की कोई झलक उसकी आँखों में नहीं थी। बात भी सही है, आजीविका कमाना भी एक काम है, उसमें आनन्द की अनुभूति कैसे हो सकती है।
  
तीसरा श्रमिक यूँ तो हाथों से पत्थर तोड़ रहा था, पर उसके होंठो पर गीत के स्वर फूट रहे थे- ‘मन भजलो आमार काली पद नील कमले’। उसने गीत को रोककर परमहंस देव को उत्तर दिया- बाबा, मैं तो माँ का घर बना रहा हूँ। उसकी आँखों में चमक थी, हृदय में जगदम्बा के प्रति भक्ति हिलोर ले रही थी। निश्चय ही माँ का मन्दिर बनाना कितना सौभाग्यपूर्ण है। इससे बढ़कर आनन्द भला और क्या हो सकता है। इन तीनों श्रमिकों की बात सुनकर परमहंस देव भाव समाधि में डूब गए। सचमुच जीवन तो वही है, पर दृष्टिकोण भिन्न होने से सब कुछ बदल जाता है। दृष्टिकोण के भेद से फूल काँटे हो जाते हैं, और काँटे फूल हो जाते हैं। आनन्द अनुभव करने का दृष्टिकोण जिसने पा लिया उसके जीवन में आनन्द के सिवा और कुछ नहीं रहता।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १३४

रविवार, 1 दिसंबर 2019

👉 मन-दर्पण की सफाई

हम सभी का मन एक दर्पण की भाँति है। सुबह से शाम तक इस दर्पण पर धूल जमती रहती है। जो लोग इस धूल को अपने मन पर जमने देते हैं, वे दर्पण नहीं रह पाते। इस दर्पण की स्थिति के अनुसार ही ज्ञान प्रतिफलित होता है। जिसका मन जितनी मात्रा में दर्पण है, उतनी ही मात्रा में उसमें सत्य प्रतिबिम्बित होता है।
  
सूफी सन्त बायजीद से किसी साधक ने कहा कि विचारों का प्रवाह उसे बहुत परेशान कर रहा है। बायजीद ने उसे निदान और चिकित्सा के लिए अपने मित्र फकीर समद के पास भेज दिया। और उससे कहा- ‘जाओ उनकी समग्र दिनचर्या ध्यान से देखो, उसी से तुम्हें राह मिलेगी।’
  
उस साधक को अपने गन्तव्य पर पहुँच कर अचरज हुआ- क्योंकि ये फकीर समद एक सराय में चौकीदारी का काम करते थे। उनकी दिनचर्या में ऐसी कोई खास बात नहीं थी। वह बहुत ही साधारण व्यक्ति दिखाई दिए। ज्ञान के कोई लक्षण उनमें उसे नजर नहीं आए। हाँ, वह सरल बहुत थे, एकदम शिशुवत निर्दोष जीवन था उनका।
  
उनकी पूरी दिनचर्या में इतनी बात जरूर थी कि रात को सोने से पहले वे सराय के सारे बर्तन माँजते थे। यही नहीं, सुबह उठकर भी सबसे पहले इन बर्तनों को धो लेते थे। कुरेदने पर उन्होंने कहा- सोने से पहले बर्तनों की गन्दगी हटाने के लिए मैं बर्तनों को माँजता हूँ। और चूँकि रात भर में उनमें थोड़ी बहुत धूल पुनः जम जाती है इसलिए सुबह उन्हें फिर से धोना जरूरी हो जाता है।
  
उस साधक को इसमें कोई विशेष बात नजर नहीं आयी। निराश होकर वह वापस बायजीद के पास लौट गया। उनके पूछने पर उसने निराश मन से सारी कहानी सुना दी। सारी बातें सुनकर बायजीद हल्के से हँसे और बोले- काम की सारी बातें तुमने देखी और सुनी तो है, पर समझी नहीं है। समझदारी यही है कि तुम भी फकीर समद की तरह अपने मन को रात को सोने से पहले माँजो और सुबह उसे धो डालो। मन के दर्पण को जिसने साफ करना सीख लिया- समझो उसने जिन्दगी का रहस्य जान लिया।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १३३

शनिवार, 30 नवंबर 2019

👉 अपने लिए नहीं, ईश्वर के लिये जिएँ?

सभी ईश्वर के पुत्र हैं और सब में परमात्मा का निवास है यह मानते हुए यदि हम परस्पर एकता, निश्छलता, प्रेम और उदारता का व्यवहार करने लगें तो जीवन में अजस्र पवित्रता का अवतरण होने लगे, सर्वत्र सद्व्यवहार के दर्शन होने लगें और आज जो कटुता, संकीर्णता और कलह का वातावरण दीख पड़ता है, उसका अन्त होने में देर न लगे।

हमें केवल अपने शरीर के लिए ही नहीं, आत्मा के लिए भी जीना चाहिए। यदि मनुष्य शरीर की सुविधा और सजावट का ताना-बाना बुनते रहने में ही इस बहुमूल्य जीवन को व्यतीत कर दें, तो उसे वह लक्ष्य कैसे प्राप्त होगा जिसके लिये जन्मा है। स्वार्थ में संलग्न व्यक्ति तो विघटन की ओर ही बढ़ेंगे। उनके व्यवहार एक दूसरे के लिए असन्तोषजनक और असमाधानकारक ही बनेंगे। ऐसी दशा में द्वेष और परायेपन की भावना बढ़कर आवरण को नारकीय क्लेश-कलह से भर देगी, और यह संसार अशांति एवं विनाश की काली घटाओं से घिरने लगेगा।

ईसा ने सोचा कि यदि ईश्वर का, पुत्र केवल शारीरिक सुखों के लिए जीवन धारण किये रहेगा तो इस संसार में धर्म का राज्य कभी उदय न होगा। यदि अपने लिए ही जिया गया तो मनुष्य की पशुओं की अपेक्षा श्रेष्ठता कैसे बनी रहेगी, यह अनुभव करते हुए वे इसी निर्णय पर पहुँचे कि हमें अपने लिए नहीं प्रभु के लिए जीना चाहिए। अस्तु ईसा मसीह घर छोड़ कर चल दिए और बन पर्वतों और ग्राम नगरों में धर्म का प्रचार करते हुए भ्रमण करने लगे। ईश्वर का पुत्र अपने लिए नहीं ईश्वर के लिए ही जी सकता है, इसके अतिरिक्त उसके पास और दूसरा मार्ग ही क्या है?

टॉलस्टाय
अखण्ड ज्योति अगस्त 1964 पृष्ठ 1

शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

👉 मैं कौन हूँ

मैं कौन हूँ? अनगिनत बार यह सवाल अपने से पूछा। कितने महीने-साल इस प्रश्न के साथ गुजरे, अब तो उसका कोई हिसाब भी सम्भव नहीं। हर बार बुद्धि ने उत्तर देने की कोशिश की, पढ़े-सुने हुए, संस्कार जन्य उत्तर। लेकिन इन सब उत्तरों से कभी तृप्ति नहीं मिली, क्योंकि ये सभी उत्तर उधार के थे, मरे हुए थे। हर बार सतह पर गूँज कर कहीं विलीन हो जाते थे। अन्तरात्मा की गहनता में उनकी कोई ध्वनि नहीं सुनाई पड़ती थी। प्रश्न जहाँ पर था, वहाँ इन उत्तरों की पहुँच नहीं थी।
  
अनुभूति इतनी जरूर हुई कि प्रश्न कहीं केन्द्र पर था, जबकि उत्तर परिधि पर थे। प्रश्न अन्तस में अंकुरित हुआ था, जबकि समाधान बाहर से थोपा हुआ था। इस समझ ने जैसे जीवन में क्रान्ति कर दी। बुद्धि का भ्रम टूट गया। और अन्तर्चेतना में एक नया द्वार खुल गया। यह सब कुछ ऐसा था, जैसे कि अचानक अंधेरे में प्रकाश उतर आया हो। अपनी ही चेतना की गहराइयों में यह अहसास होने लगा कि कोई बीज भूमि को बेधकर प्रकाश के दर्शन के लिए तड़प रहा है। बौद्धिकता का माया जाल ही इसमें मुख्य बाधा है।
  
इस नयी समझ ने अन्तर्गगन को उजाले से भर दिया। बुद्धि द्वारा थोपे गए उत्तर सूखे पत्तों की तरह झड़ गए। प्रश्न गहराता गया। साक्षी भाव में यह सारी प्रक्रिया चलती रही। परिधि की प्रतिक्रियाएँ झड़ने लगी, केन्द्र का मौन मुखर होने लगा। मैं कौन हूँ? इस प्रश्न प्यास से समग्र व्यक्तित्व तड़प उठा। मैं कौन हूँ? इस प्रश्न के प्रचण्ड झोकों से प्रत्येक श्वास कंपित हो गयी। एक अग्नि ज्वाला की भांति अन्तस की गहराइयों में यह हुंकार गूँज उठा- आखिर कौन हूँ मैं?
  
बड़ा अचरज था, ऐसे में कि हमेशा नए-नए तर्क देने वाली बुद्धि चुप थी। आज परिधि पर मौन छाया था, केवल केन्द्र मुखर था। कुछ ऐसा था जैसे कि मैं ही प्रश्न बन गया था। और तभी अन्तर सत्ता में एक महाविस्फोट हुआ। एक पल में सब परिवर्तित हो गया। प्रश्न समाप्त हो गया, समाधान का स्वर संगीत गूँजने लगा। और तब इस अनुभूति ने जन्म लिया- शब्द में नहीं शून्य में समाधान है। निरुत्तर हो जाने में उत्तर है। सच तो यही है कि समाधि ही समाधान है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १३२

Chhoti Si Galti Ki Itni Badi Saja | छोटी सी गलती की इतनी बड़ी सजा | Motiv...



Title

मंगलवार, 26 नवंबर 2019

👉 विवेक:-

एक बार महावीर अपने पुत्र से कह रहे थे की एक बार मैं एक रेलवे स्टेशन पर बैठा था मेरे पास एक व्यक्ति और बैठा था हम दोनो बाते कर रहे थे उसने कहा की मुझे भी अमुक स्थान पर जाना है हम दोनो को एक ही स्थान पर जाना था !

मै केन्टिन में गया और चाय व कुछ नाश्ता लेकर आया मैंने देखा वो व्यक्ति फोन पर बात करते हुये आगे चला जा रहा!

शायद ट्रेन आने वाली थी मैंने बेग उठाया और तेजी से उसके पिछे चलने लगा शायद आगे जाने से सीट मिल जाये मेरे पिछे कई व्यक्ति चलने लगे और चलते चलते हम सभी प्लेटफार्म नम्बर एक से नम्बर दो पर पहुँच गये और वो वहाँ बैठा तब मेरे मन में एक विचार आया की मैं इसके पीछे पीछे कहाँ आ गया मॆरी ट्रेन तो प्लेटफार्म नम्बर एक पर आने वाली है और मैं तो बिल्कुल उल्टी जगह पर आ गया और देखते ही देखते मॆरी आँखो के सामने से मॆरी ट्रेन चली गई और जो चाय नाश्ता लिया वो भी वही रह गया!

अब मुझे उस व्यक्ति पर बड़ा गुस्सा आ रहा था और मैं उसके पास गया और उससे लड़ने लगा की तुम्हारी वजह से मॆरी ट्रेन छुट गई मैं अपशब्द पे अपशब्द बोले जा रहा था और वो सुने जा रहा था काफी देर बोलने के बाद मैं वहाँ बैठ गया फिर वो बड़े ही शालीनता के साथ बोले भाई सा. यदि आपकी बात समाप्त हो गई हो तो मैं कुछ बोलुं?

मैंने कहा हाँ बोलो तब उन्होंने मुझे वो शिक्षा दी जो मैं आज तक नही भुला उन्होंने कहा।

"भाई सा. अचानक मुझे घर से कॉल आया की मुझे दिल्ली की बजाय मुम्बई जाना है क्योंकि हम सभी का प्लान चेंज हो गया और मॆरी ट्रेन प्लेटफार्म नम्बर दो पर आयेगी पर आप मुझे एक बात बताईये की जब आपको पता था और बोर्ड पे साफ शब्दों में लिखा था और बार बार अलाउन्समेन्ट हो रहा था की दिल्ली जाने वाली ट्रेन प्लेटफार्म नम्बर एक पर आयेगी तो आपने मुझे फॉलो क्यों किया? क्या आपको उस बोर्ड और उस अलाउन्समेन्ट के ऊपर कोई विश्वास न था? आपकी सबसे बड़ी गलती यही थी की आपने अपने विवेक से काम नही किया बस बिना सोचे समझे किसी को फोलो किया इसलिये आपका चाय-नाश्ता भी गया और चाय से हाथ भी जलाया और आपकी आँखो के सामने से आपकी ट्रेन चली गई और आप बस देखते रह गये!

और इतने में उनकी ट्रेन आ गई और वो उसमें बैठकर चले गये और जाते जाते मुझे कह गये की भाई सा. जिन्दगी में एक बात अच्छी तरह से याद रखना की अंधाधुंध फोलो किसी को मत करना अपने विवेक से काम लेना की जिस राह पे तुम जा रहे हो क्या वो तुम्हे सही मंजिल तक पहुंचायेगा? किसी को फोलो करोगे तो भटक सकते हो!

यदि फोलो करना ही है तो रामायण को, धर्म -शास्त्र को फोलो करना ताकी तुम कही भटको नही किसी व्यक्ति को कभी फोलो मत करना क्योंकि पाप कभी भी किसी के भी मन में आ सकता है या फिर उसका लक्ष्य कब बदल जाये कुछ पता नही इसलिये स्वविवेक से काम लेना। अच्छाई दिखे और लगे की ये चीज प्रकाश से जोड़ सकती है परम पिता परमेश्वर से मिला सकती है और मुझे एक बेहतरीन इन्सान बना सकती है तो उसे ग्रहण कर लेना नही तो छोड़ देना और अंधाधुंध फोलो करोगे बिना परिणाम जाने भेड़-चाल चलोगे तो हो सकता है की तुम भटक जाओ और गहरे अन्धकार में लुप्त हो जाओ!

इसलिये जिन्दगी में हमेशा बेहतरीन इन्सान बनने की कोशिश करना पर किसी को अंधाधुंध फोलो मत करना फोलो प्रकाश दे सकता है तो गहरा अंधकार भी दे सकता है!

👉 ॐकार का अनुभव

ॐकार दिव्य नाद है। यह परम संगीत है। सृष्टि के सभी स्वर इसमें पिरोए हैं। पेड़ों पर बैठे पखेरुओं का कलरव, उच्च हिम शिखरों पर छायी शान्ति, पहाड़ों से उतरते झरनों की मर्मर, वृक्षों से गुजरती हवाओं की सरसर, महासागरों में लहरों का तर्जन, आकाश में बादलों का गर्जन- सभी का सार यह ओंकार है।
  
ॐकार शब्द बीज है। सभी शब्द इसी से जन्मे हैं। इसी से उन्हें जीवन मिलता है और इसी में उन्हें लय होना है। वेद ही नहीं बाइबिल भी ओम् से उपजी है। गीता और गायत्री इसी से प्रकट हुई है। इसीलिए तो वेद कहते हैं कि ओम् को जिन्होंने जान लिया, उन्हें जानने को कुछ शेष न रहा। बाइबिल भी इसी सच्चाई को दुहराती है कि प्रारम्भ में ईश्वर था, और ईश्वर शब्द के साथ और फिर उसी शब्द से सब प्रकट हुआ।
  
ॐकार सृष्टि बीज है। सृष्टि की सभी ऊर्जाओं का परम स्रोत है यह। अनन्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त ऊर्जा के विभिन्न स्तर, आयाम और ऊर्जा धाराएँ ओंकार से ही प्रवाहित हुई हैं। तभी तो उपनिषद् कहते हैं कि ओंकार से सब पैदा हुआ, ओंकार में सभी का जीवन है और अन्त में सब कुछ ओंकार में ही विलीन हो जाएगा। सृष्टि के सूक्ष्मतम से महाविराट् होने तक के सभी रहस्य इस ओंकार में समाए हैं।
  
ॐकार ध्यान बीज है। इसके ध्यान से सभी रहस्य उजागर होते हैं। शक्ति के स्रोत उफनते हैं। यह ओंकार हममें है, तुममें है, सबमें है। पर है अभी यह बन्धन में। जब तक यह बन्धन में रहेगा। हमारे भीतर रुदन का हाहाकार मचा रहेगा। वेदनाएँ हमें सालती रहेंगी। ओंकार के बन्धन मुक्त होते ही रुदन की चीत्कार संगीत के उल्लास में बदल जाएगी। ध्यान से ही यह बन्धनमुक्ति सम्भव होती है। ध्यान से ही ओंकार का बीज अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित होता है। इस ओंकार के ध्यान से ही गायत्री का गान फूटता है। यह शास्त्र की नहीं, अनुभव की बात है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १३१

👉 MISCONCEPTIONS ABOUT ELIGIBILITY FOR GAYATRI SADHANA (Part 1)

Q.1. Are there any restrictions on Gayatri worship?

Ans. There is a prevalent belief that the right to worship Gayatri is exclusively restricted to the Brahmans or the so called “Dwij” (which is traditionally considered synonymous with “Brahmans”, a caste in India).           
This is a gross misconception. If there is a dispute on the basis of caste only Kshatriyas will be entitled to Gayatri Sadhana as revealed to Vishwamitra, who was its rishi. His descendants will be well within their right to lay claim to  their ancestral right . But such an argument would be nothing but childish.   
  
If persons living in India alone claim the right in respect of Gayatri what will happen to those Indians who have accepted citizenship of other countries? If Gayatri Sadhana  is regarded only for Hindus, a ban will have to be imposed on those scientists who are conducting research in this field in foreign countries. In fact, in this age of intellectual freedom it is ridiculous to talk of such absurdities. Gayatri is the manifestation of the Creative Power of God; and like the sun,  water, air earth etc. everyone is entitled to derive benefit from it. The concept of proprietary rights is applicable to only material objects. Creations of nature are accessible to all in equal measure. Endless benefits (Gayatri kalpavrikcha) can be enjoyed by invocation of Gayatri by all human beings irrespective of their social status. Every religion has its Supreme Mantra like Kalma of Muslims, ‘Baptisma’ of Christians, Namonkar of Jains, Om Mani Padme Ham of Tibetan Buddhists. So also in Indian religions tradition there is only one Supreme Mantra, Gayatri Mantra.

It is foolish to say that Brahmans, Kshatriyas, Vaishyas, Kayasthas etc. have different Gayatris. This bane of discrimination on account of high or low caste should not be allowed to enter into and pollute the spiritual environment in which there is one God, one religion and one source of knowledge.
  
Gayatri is also the key to the invisible Cosmic Consciousness. An ancient Indian practice required compulsory admission of children to schools (Gurukuls) for learning spiritual concepts and practices. Here, the student was initiated by the spiritual preceptor (Guru) through this very Gayatri-Mantra, irrespective of his social background. As a matter of fact, the Shikha (tuft of hair on the crown of head) symbolises Ancient Indian (Bhartiya) culture. All Hindus traditionally keep Shikha as constant reminder to them to nurture high and noble thoughts. As such, Shikha itself represents Gayatri, which entitles all to the worship of Gayatri.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 27

रविवार, 24 नवंबर 2019

👉 मन और आत्मा

मन: कल तो में भाग मिल्खा भाग फिल्म देखकर आया, उस फिल्म के किरदार ने मेरे अंदर बहुत ही अधिक ऊर्जा भर दी है, और अब मुझमे इतना साहस आ चुका है कि में कुछ भी करके दिखा सकता हूँ।

मन घर आया और फिल्म की ऊर्जा के विश्वास पर अपने संकल्पो को पूरा करने लग गया, परन्तु दो दिन बाद ही उसकी ऊर्जा ध्वस्त हो गयी।

उस समय उसने सोचा की मुझे किसी और का मोटिवेशनल वीडियो देखना चाहिए। उसने you tube पर वीडियो देखे और फिर से उसने स्वयं के समस्त संकल्पो को मजबूत कर लिया और फिर से तैयारी शुरू कर दी। लेकिन वो फिर से हार गया।

परन्तु इस बार मन स्वयं की आत्मा से पूछने लगा आखिर में गलती क्या कर रहा हूँ।

आत्मा का जवाब: आप भाग मिल्खा भाग फिल्म देखकर आकर्षित तो हुए, किन्तु आपके आकर्षण का कारण उस  फिल्म के किरदार का अभिनय था। आपने बहुत ही कम समय में आपने आदर्श को चुन लिया

इसलिए  वो विचार आपकी "जीवात्मा" तक नही  पहुच सके

मन: है महान आत्मा अब मुझे क्या करना चाहिए। जिससे की मेरे विचार "आकर्षण के स्थान पर विवेक" को महत्व दें।
            
आत्मा: मेरे मित्र हमेशा उन्ही को सुनो उन्ही को अपनी अभिप्रेरणा बनाओ, जिनके पास "विचारो की सिद्धि हो"। जो पूजनीय है जिनका व्यक्तित्व अलौकिक है ऐसे लोग दुनिया में बहुत कम है जैसे कि👇👇

राम कृष्ण परमहंस, समर्थगुरु रामदास, प. श्रीराम शर्मा आचार्य, स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविन्द, महर्षि रमण आदि।

👉 निसंदेह: दुनिया में बहुत सारे विचारक है, हो सकता है वो श्रेष्ठ वक्ता भी हो, लेकिन वे लोग पूजनीय हो ये जरूरी नहीं।

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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