गुरुवार, 31 अक्टूबर 2019

Deepak Sa Til Til Jalna Hi | दीपक सा तिल-तिल जलना ही | Pragya Bhajan San...



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👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ८७)

👉 पंचशीलों को अपनाएँ, आध्यात्मिक चिकित्सा की ओर कदम बढ़ाएँ

२. साधना के लिए बढ़ाएँ साहसिक कदम- आज के दौर में साधना का साहस विरले ही कर पाते हैं। इस सम्बन्ध में बातें तो बहुत होती हैं, पर प्रत्यक्ष में कर दिखाने की हिम्मत कम ही लोगों को होती है। बाकी लोग तो इधर- उधर के बहाने बनाकर कायरों की तरह मैदान छोड़कर भाग जाते हैं। ऐसे कायर और भीरू जनों की आध्यात्मिक चिकित्सा सम्भव नहीं। जो साहसी हैं वे मंत्र- जप व ध्यान आदि प्रक्रियाओं के प्रभाव से अपनी आस्थाओं, अभिरुचि व आकांक्षाओं को परिष्कृत करते हैं। वे अनुभूतियों के दिवा स्वप्नों में नहीं खोते। इस सम्बन्ध में की जाने वाली चर्चा व चिन्ता के शेखचिल्लीपन में उनका भरोसा नहीं होता।

वे तो बस अपनी आध्यात्मिक चेतना के शिखरों पर एक समर्थ व साहसी पर्वतारोही की भाँति चढ़ते हैं। बातें साधना की और कर्म स्वार्थी व अहंकारी के। ऐसे ढोंगियों और गपोड़ियों ने ही आध्यात्मिक साधनाओं को हंसी- मजाक की वस्तु बना दिया है। जो सचमुच में साधना करते हैं, वे पल- पल अपने अन्तस् को बदलने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। उनका विश्वास बातों व विचारों के परिवर्तन में नहीं अपनी गहराइयों में छुपे संस्कारों के परिवर्तन में होता है। आध्यात्मिक प्रयोगों को ये उत्खनन विधियों के रूप में इस्तेमाल करते हैं। जो इसमें जुटे हैं, वे इन कथनों की सार्थकता समझते हैं। उन्हीं में वह साहस उभरता है, जिसके बलबूते वे अपने स्वार्थ और अहंकार को पाँवों के नीचे रौंदने, कुचलने का साहस रखते हैं। कोई भी क्षुद्रता उन्हें छू नहीं पाती। कष्ट के कंटकों की परवाह किए बगैर वे निरन्तर महानता और आध्यात्मिकता के शिखरों पर चढ़ते जाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ १२१

👉 गुरुवर की वाणी

★ मुद्दतों से देव परम्पराएं अवरुद्ध हुई पड़ी हैं। अब हमें सारा साहस समेटकर तृष्णा और वासना के कीचड़ से बाहर निकलना होगा और वाचालता और विडम्बना से नहीं, अपनी कृतियों से अपनी उत्कृष्टता का प्रमाण देना होगा। हमारा उदाहरण ही दूसरे अनेक लोगों को अनुकरण का साहस प्रदान करेगा। यही ठोस, वास्तविक और प्रभावशाली पद्धति है।
(महाकाल का युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया)

□ गर्मी की तपन बढ़ चलने पर वर्षा की संभावना का अनुमान लगा लिया जाता है। दीपक जब बुझने को होता है, उसकी लौ जोर से चमकती है। मरण की वेला निकट आते ही रोगी में हलकी-सी चेतना लौटती है एवं लम्बी सांसें चलने लगती हैं। जब संसार में अनीति की मात्रा बढ़ती है, जागरूकता, आदर्शवादिता और साहसिकता की उमंगें अनय की असुरता के पराभव हेतु आत्माओं में जलने लगती हैं। प्रज्ञावतार की इस भूमिका को युग परिवर्तन की वेला में ज्ञानवानों की पैनी दृष्टि सरलतापूर्वक देख सकती है।
(प्रज्ञा अभियान-1983, जुलाई-17)


■ सत्साहस अपनाने की गरिमा तो सदा ही रही है और रहेगी, पर इस दिशा में बढ़ने, सोचने वालों में से अत्यधिक भाग्यवान् वे हैं, जो किसी महान् अवसर के सामने आते ही उसे हाथ से न जाने देने की तत्परता बरत सके। बड़प्पन न बड़ा बनने में, न संचय में और न उपभोग में है। बड़प्पन एक दृष्टिकोण है, जिसमें सदा ऊंचा उठने, आगे बढ़ने, रास्ता बनाने और जो श्रेष्ठ है उसी को अपनाने की उमंग उठती और हिम्मत बंधती है।

(प्रज्ञा अभियान का दर्शन, स्वरूप कार्यक्रम-18)

सोमवार, 28 अक्टूबर 2019

दो सत्यानाशी कार्य | Do Satyanashi Karya



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दो सत्यानाशी कार्य | Do Satyanashi Karya



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👉 साकारात्मक हार

गोपालदास जी के एक पुत्र और एक पुत्री थे। उन्हे अपने पुत्र के विवाह के लिये संस्कारशील पुत्रवधु की तलाश थी। किसी मित्र ने सुझाया कि पास के गांव में ही स्वरूपदास जी के एक सुन्दर सुशील कन्या है।

गोपालदास जी किसी कार्य के बहाने स्वरूपदास जी के घर पहूंच गये, कन्या स्वरूपवान थी देखते ही उन्हे पुत्रवधु के रूप में पसन्द आ गई। गोपालदास जी ने रिश्ते की बात चलाई जिसे स्वरूपदास जी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। स्वरूपदास जी की पत्नी ने मिष्ठान भोजन आदि से आगत स्वागत की।

संयोगवश स्वरूपदास जी की पत्नी के लिये नवसहर का सोने का हार आज ही बनकर आया था। समधन ने बडे उत्साह से समधी को दिखाया, हार वास्तव में सुन्दर था। गोपालदास जी ने जी भरकर उस हार की तारीफ की। कुछ देर आपस में बातें चली और फ़िर गोपालदास जी ने लौटने के लिये विदा मांगी और घर के लिये चल दिये।

चार दिन बाद ही स्वरूपदास जी की पत्नी को किसी समारोह में जाने की योजना बनी, और उन्हे वही हार पहनना था। उन्होने ड्रॉअर का कोना कोना छान मारा पर हार नहीं मिला। सोचने लगी हार गया तो गया कहाँ? कुछ निश्चय किया और स्वरूपदास जी को बताया कि हार गोपालदास जी, चोरी कर गये है।

स्वरूपदास जी ने कहा भागवान! ठीक से देख, घर में ही कहीं होगा, समधी ऐसी हरक़त नहीं कर सकते। उसने कहा मैने सब जगह देख लिया है और मुझे पूरा यकीन है हार गोपाल जी ही ले गये है, हार देखते ही उनकी आंखे फ़ट गई थी। वे बडा घूर कर देख रहे थे, निश्चित ही हार तो समधी जी ही लेकर गये है।आप गोपाल जी के यहां जाईए और पूछिए, देखना! हार वहां से ही मिलेगा।

बडी ना-नुकर के बाद पत्नी की जिद्द के आगे स्वरूप जी को झुकना पडा और बडे भारी मन से वे गोपाल जी के घर पहूंचे। आचानक स्वरूप जी को घर आया देखकर गोपाल जी शंकित हो उठे कि क्या बात हो गई?

स्वरूपजी दुविधा में कि आखिर समधी से कैसे पूछा जाय। इधर उधर की बात करते हुए साहस जुटा कर बोले- आप जिस दिन हमारे घर आए थे, उसी दिन घर एक हार आया था, वह मिल नहीं रहा।

कुछ क्षण के लिये गोपाल जी विचार में पडे, और बोले अरे हां, ‘वह हार तो मैं लेकर आया था’, मुझे अपनी पुत्री के लिये ऐसा ही हार बनवाना था, अतः सुनार को सेम्पल दिखाने के लिये, मैं ही ले आया था। वह हार तो अब सुनार के यहां है। आप तीन दिन रुकिये और हार ले जाईए। किन्तु असलियत में तो हार के बारे में पूछते ही गोपाल जी को आभास हो गया कि हो न हो समधन ने चोरी का इल्जाम लगाया है।

उसी समय सुनार के यहां जाकर, देखे गये हार की डिज़ाइन के आधार पर सुनार को बिलकुल वैसा ही हार,मात्र दो दिन में तैयार करने का आदेश दे आए। तीसरे दिन सुनार के यहाँ से हार लाकर स्वरूप जी को सौप दिया। लिजिये सम्हालिये अपना हार।

घर आकर स्वरूप जी ने हार श्रीमति को सौपते हुए हक़िक़त बता दी। पत्नी ने कहा- मैं न कहती थी,बाकि सब पकडे जाने पर बहाना है, भला कोई बिना बताए सोने का हार लेकर जाता है ? समधी सही व्यक्ति नहीं है, आप आज ही समाचार कर दिजिये कि यह रिश्ता नहीं हो सकता। स्वरूप जी नें फ़ोन पर गोपाल जी को सूचना दे दी, गोपाल जी कुछ न बोले।उन्हे आभास था ऐसा ही होना है।

सप्ताह बाद स्वरूप जी की पत्नी साफ सफ़ाई कर रही थी, उन्होने पूरा ड्रॉअर ही बाहर निकाला तो पिछे के भाग में से हार मिला, निश्चित करने के लिये दूसरा हार ढूढा तो वह भी था। दो हार थे। वह सोचने लगी, अरे यह तो भारी हुआ, समधी जी नें इल्जाम से बचने के लिये ऐसा ही दूसरा हार बनवा कर दिया है।

तत्काल उसने स्वरूप जी को वस्तुस्थिति बताई, और कहा समधी जी तो बहुत उंचे खानदानी है। ऐसे समधी खोना तो रत्न खोने के समान है। आप पुनः जाईए, उन्हें हार वापस लौटा कर  और समझा कर रिश्ता पुनः जोड कर आईए। ऐसा रिश्ता बार बार नहीं मिलता।

स्वरूप जी पुनः दुविधा में फंस गये, पर ऐसे विवेकवान समधी से पुनः सम्बंध जोडने का प्रयास उन्हे भी उचित लग रहा था। सफलता में उन्हें भी संदेह था पर सोचा एक कोशीश तो करनी ही चाहिए।

स्वरूप जी, गोपाल जी के यहां पहूँचे, गोपाल जी समझ गये कि शायद पुराना हार मिल चुका होगा।

स्वरूप जी ने क्षमायाचना करते हुए हार सौपा और अनुनय करने लगे कि जल्दबाजी में हमारा सोचना गलत था। आप हमारी भूलों को क्षमा कर दिजिए, और उसी सम्बंध को पुनः कायम किजिए।

गोपाल जी नें कहा देखो स्वरूप जी यह रिश्ता तो अब हो नहीं सकता, आपके घर में शक्की और जल्दबाजी के संस्कार है जो कभी भी मेरे घर के संस्कारो को प्रभावित कर सकते है।

लेकिन मैं आपको निराश नहीं करूंगा। मैं अपनी बेटी का रिश्ता आपके बेटे के लिये देता हूँ, मेरी बेटी में वो संस्कार है जो आपके परिवार को भी सुधार देने में सक्षम है। मुझे अपने संस्कारो पर पूरा भरोसा है। पहले रिश्ते में जहां दो घर बिगडने की सम्भावनाएं थी, वहां यह नया रिश्ता दोनो घर सुधारने में सक्षम होगा। स्वरूप जी की आंखे ऐसा हितैषी पाकर छल छला आई।

👉 कर्ज से छुटकारा पाना ही ठीक है। (अंतिम भाग)

अपने रुके हुये काम को आगे बढ़ाने के या कोई आर्थिक धन्धा चलाने के लिये थोड़े समय के लिए किसी आत्मीय जन से सहायता लेकर थोड़े ही दिनों में उसे लौटा देना अनुचित भले ही न कहा जाय, पर जिन्होंने कर्ज को एक तरह का पेशा ही समझ लिया हो, उनको चाहिए कि वे समाज में वैमनस्यता उत्पन्न करने के अपराध से बचें। कर्ज से चिन्ता बढ़ती है और कार्य क्षमता घटती है। इससे राष्ट्रीय संपत्ति का नाश होता है इस लिये ऋणी होना अनागरिक कर्म की कहा जायगा। इससे बचने में ही मनुष्य का कल्याण है।

आध्यात्मिक दृष्टि से तो ऋणी होना और भी अपराध है। धर्म-ग्रन्थों में तो यहाँ तक कहा जाता है कि जो इस जीवन में ऋण नहीं चुका पाते उन्हें निम्न-योनियों में जन्म लेकर इसका भुगतान करना पड़ता है। इस पर भले ही लोग विश्वास न करें पर यह बात सभी समझ सकते हैं चरित्र और नैतिक साहस को गिराने में ऋण बहुत बड़ा सहायक है। इससे अकर्मण्यता और फिजूलखर्ची को पोषण मिलता है, कटुता बढ़ती है और सामाजिक सन्तुलन बिगड़ता है।

मनुष्य को परमात्मा ने बड़ी शक्ति असीम साधन और अतुलित पौरुष प्रदान किया है। इन्हीं के सहारे वह अपनी प्रगति कर सकता है। ऋणी होना न तो विकास ही दृष्टि से उचित है और न आध्यात्मिक दृष्टि से ही। इससे तो छुटकारा पाना ही ठीक है। कोई अकस्मात दुर्घटना जीवन संकट जैसे अवसर उपस्थित हों, और अपने साधन उस स्थिति का मुकाबला करने में असमर्थ हो रहे हों तो कर्ज लेना दूसरी बात है, पर आलस से दिन काटते हुये शरीर मौज के लिए तो कदापि कर्ज नहीं लिया जाना चाहिये। और न ऐसे लोगों को कर्ज देना ही चाहिये। इस्लाम धर्म में ब्याज को हराम, इसलिये कहा गया है कि ऋण का व्यवसाय अन्तः जगत के लिये हर समय ही हानिकारक सिद्ध होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1966 पृष्ठ 45


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/April/v1.45

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ८६)

👉 पंचशीलों को अपनाएँ, आध्यात्मिक चिकित्सा की ओर कदम बढ़ाएँ

इन्हें आध्यात्मिक चिकित्सा के पंचशील की संज्ञा दी जा सकती है। इन्हें मां गायत्री के पंचमुख और उनकी पूजा में प्रयुक्त होने वाला पंचोपचार भी कहा जा सकता है। जिन्हें आध्यात्मिक चिकित्सा में अभिरूचि है उन्हें इस बात की शपथ लेनी चाहिए कि इनका पालन अपने व्यक्तिगत जीवन में संकल्पपूर्वक होता रहे। आध्यात्मिक चिकित्सा के विशेषज्ञों ने इन्हें अपने स्तर पर आजीवन अपनाया है। यही उनकी दिव्य विभूतियों व आध्यात्मिक शक्तियों का स्रोत साबित होता रहा है। अब बारी उनकी है, जो आध्यात्मिक स्वास्थ्य व इसकी प्रयोग विधि से परिचित होना चाहते हैं। इच्छा यही है कि उनमें इन पंचशीलों के पालन का उत्साह उमड़े और वे इसके लिए इसी शारदीय नवरात्रि से साधना स्तर का प्रयत्न प्रारम्भ कर दें।

१. बनें अपने आध्यात्मिक विश्व के विश्वामित्र- जिस दुनिया में हम जीते हैं, उसका चिन्तन व व्यवहार ही यदि अपने को प्रेरित प्रभावित करता रहे तो फिर आध्यात्मिक जीवन दृष्टि अपनाने की आशा नहीं के बराबर रहेगी। लोग तो वासना, तृष्णा और अहंता का पेट भरने के अलावा और किसी श्रेष्ठ मकसद के लिए न तो सोचते हैं और न करते हैं। उनका प्रभाव और परामर्श अपने ही दायरे में घसीटता है। यदि जीवन में आध्यात्मिक चिकित्सा करनी है तो सबसे पहले अपना प्रेरणा स्रोत बदलना पड़ेगा। परामर्श के नए आधार अपनाने पड़ेंगे। अनुकरण के नए आदर्श ढूँढने पड़ेंगे।

इसके लिए हमें आध्यात्मिक चिकित्सा के मर्मज्ञों व विशेषज्ञों को अपना प्रेरणा स्रोत बनाना होगा। हां, यह सच है कि ऐसे लोग विरल होते हैं। हर गली- कूचे में इन्हें नहीं ढूँढा जा सकता। ऐसी स्थिति में हमें उन महान् आध्यात्मिक चिकित्सकों के विचारों के संसर्ग में रहना चाहिए, जिनका जीवन हमें बार- बार आकॢषत करता है। हमारे प्रेरणा स्रोत युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव, महर्षि श्री अरविन्द, स्वामी विवेकानन्द स्तर के कोई महामानव हो सकते हैं। इनमें से किसी से और इनमें से सभी से अपना भाव भरा नाता जोड़ा जा सकता है। अपने जीवन की महत्त्वपूर्ण समस्याओं के समाधान के लिए इनके व्यक्तित्व व विचारों से परामर्श किया जाना चाहिए। इन सबकी हैसियत हमारे जीवन में परिवार के सदस्यों की तरह होनी चाहिए। महर्षि विश्वामित्र की भाँति हमें संकल्पपूर्वक अभी इन्हीं क्षणों में अपना यह नया आध्यात्मिक विश्व बसा लेना चाहिए। दैनिक क्रिया कलापों को करते हुए हमें अपना अधिकतम समय अपने इसी आध्यात्मिक विश्व में बिताना चाहिए। ऐसा हो सके तो समझना चाहिए कि अपनी आध्यात्मिक चिकित्सा का एक अति महत्त्वपूर्ण आधार मिल गया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ १२०

👉 गुरुवर की वाणी

★ प्रखर प्रतिभा संकीर्ण स्वार्थपरता से ऊंची उठी होती है। उसे मानवी गरिमा का ध्यान रहता है। उसमें आदर्शों के प्रति अनन्य निष्ठा का समावेश रहता है। लोकमंगल और सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन से उसे गहरी रुचि रहती है। ऐसे लोग असफल रहने पर शहीदों में गिने और देवताओं की तरह पूजे जाते हैं। यदि वे सफल होते हैं, तो इतिहास बदल देते हैं। प्रवाहों को उलटना इन्हीं का काम होता है।
(21 वीं सदी बनाव उज्ज्वल भविष्य-29)

◆ अवांछनीयताओं के विरुद्ध मोर्चा लेने के लिए अपनी नीति और कार्यपद्धति स्पष्ट है। ज्ञानयज्ञ का- विचार क्रान्ति का प्रचार अभियान इसीलिए खड़ा किया गया है। अवांछनीयताएं वैयक्तिक एवं सामाजिक जीवन में बेतरह घुस पड़ी हैं। यह सब चल इस लिए रहा है कि उसे सहन कर लिया गया है। इसके लिए लोकमानस ने समझौता कर लिया है और बहुत हद तक उसे अपना लिया है। जन साधारण को प्रचार अभियान द्वारा प्रकाश का लाभ और अंधकार की हानि को गहराई तक अनुभव करा दिया, तो निश्चय ही दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध विद्रोह भड़क सकता है। अवांछनीयता एवं दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष व्यापक रूप से खड़ा किया जाना चाहिए। इसके लिए भर्त्सना अभियान चलाएं।
(हमारी युग निर्माण योजना-2, पेज-203)

■  दुर्योधन जैसे अनीति का चयन करने वाले एवं अर्जुन जैसे ईश्वरीय कृपा को वरण करने वाले तत्त्व हर मनुष्य के भीतर विद्यमान है। एक को विवेक या सुबुद्धि एवं दूसरे को अविवेक या दुर्बुद्धि कह सकते हैं। किसका चयन व्यक्ति करता है, यह उसकी स्वतंत्रता है।
(प्रज्ञापुराण-1, पेज-51)

★ समस्त मनुष्य समाज एक शरीर की तरह है और उसके घटकों को सुख-दुःख में सहयोगी रहना पड़ता है। एक नाव में बैठने वाले साथ-साथ डूबते पार होते हैं। मानवी चिन्तन और चरित्र यदि निकृष्टता के प्रवाह में बहेगा तो उसकी अवांछनीय प्रतिक्रिया सूक्ष्म जगत् में विषाक्त विक्षोभ उत्पन्न करेगी और प्राकृतिक विपत्तियों के रूप में प्रकृति प्रताड़ना बरसेगी। चित्र-विचित्र स्तर के दैवी प्रकोप, संकटों और त्रासों से जनजीवन को अस्त-व्यस्त करके रख देंगे। हर व्यक्ति का कर्तव्य है कि अपनी सज्जनता तक ही न सीमित रहे, वरन् आगे बढ़कर संपर्क क्षेत्रों की अवांछनीयता से जूझें। जो इस समूह धर्म की अवहेलना करता है, वह भी विश्व व्यवस्था की अदालत में अपराधी माना जाता है।
(प्रज्ञा अभियान का दर्शन, स्वरूप-8)

शनिवार, 26 अक्टूबर 2019

👉 कर्ज से छुटकारा पाना ही ठीक है। (भाग ३)

उधार लेते समय प्रायः सभी यह सोचते हैं कि फसल की अच्छी कमाई होगी, बीमा पॉलिसी मिलेगी, मकान का किराया आवेगा या प्राविडेण्ट फण्ड का पैसा मिलेगा तब आसानी से इसे अदा कर देंगे। यह सोचकर लोग शादी-विवाह, मृतक संस्कार, भोज या अन्य किसी आवश्यकता के लिये कर्ज ले लेते हैं। अदायगी के समय तक सूद ही बहुत बढ़ जाता है, फिर उस समय भी तो खर्चे बने रहते हैं अतः. देने में बड़ी कठिनाई आती है। इस तरह ऋणी और साहूकार के आपसी सम्बन्ध भी खराब होते हैं, और देने वालों की कमाई का वह भाग व्यर्थ ही चला जाता है जिससे परिवार के अन्य सदस्यों के विकास में सहायता मिल सकती थी।

सूद के रूप में दिया जाने वाला पैसा एक तरह का अपने परिजनों की प्रगति पर आघात है। जेवर या जमीन रखकर लिया गया पैसा भी अपराध ही है क्योंकि इनके बदले में ली गई मूल रकम तो चुकानी ही पड़ती है, ब्याज भी देना पड़ता है और इन वस्तुओं का उपयोग भी कुछ नहीं हो पाता। कुछ दिन कठिनाइयों को सहन कर लेना या जेवर बेच देना कर्ज लेन से कहीं अधिक अच्छा है क्यों कि इससे हमारा नैतिक साहस ऊँचा उठा रहता है और सूद पर अकारण जाने वाला धन भी बच जाता है।

ऋण मनुष्य की खर्चीली प्रवृत्ति को प्रोत्साहन देता है। चोरी, बेईमानी, जुआ, सट्टा आदि से ग्रसित लोगों को प्रायः ऋणी देखा जाता है क्योंकि इन लोगों को धन बेरोक टोक खर्च करने का स्वभाव हो जाता है। इससे विलासिता बढ़ती है और लोग पूर्व संचित संपत्ति भी गँवा देते है। ऋण के फेर में फँस कर धनी, सेठ, साहूकार तक अपनी बड़ी-बड़ी दुकानें, मकान आदि गँवा कर निर्धन हो जाते हैं। उदारता वश किसी की सहायता करके उसे आर्थिक धन्धा दे देना दूसरी बात है किन्तु ऋण लेने देने की आदत को व्यवसायिक रूप देना सदैव ही घातक होता है। अधिकाँश मध्यम वर्ग के लोगों में यह बुरी लत पड़ जाती है। अपने को ऊँचा करने के लिए सीमित साधनों से आगे बढ़ने का प्रयत्न करना ही कर्ज का कारण बन जाता है। लोग यह समझते हैं कि अमुक कार्य इस ढंग का नहीं होगा तो दूसरे व्यक्ति अपमानित करेंगे, छोटा समझेंगे। अपनी हेठी न हो इसी कायरता के कारण लोग आर्थिक परतन्त्रता स्वीकार कर लेते हैं। किन्तु यह एक मामूली सी समस्या है, लोग अपनी औकात के अनुसार खर्च की मर्यादा बनाये रहें तो ऋण लेने की समस्या कभी भी सामने न आये।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1966 पृष्ठ 45

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ८5)

👉 पंचशीलों को अपनाएँ, आध्यात्मिक चिकित्सा की ओर कदम बढ़ाएँ

आध्यात्मिक स्वास्थ्य का अर्थ समझें- आध्यात्मिक चिकित्सा की ओर बढ़ाएँ कदम! यही वह दैवी सन्देश है- जिसे इस समय अन्तस् सुना रहा है। हिमालय की हवाओं ने जिसे हम सबके लिए भेजा है। नवरात्रि के पवित्र पलों में इसी की साधना की जानी है। भगवती महाशक्ति से यही प्रार्थना की जानी है कि हम सभी आध्यात्मिक स्वास्थ्य का अर्थ और मर्म समझ सकें। और भारत देश फिर से आध्यात्मिक चिकित्सा में अग्रणी हो। इसी सन्देश को ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की रजत जयंती के अवसर पर जन- जन को सुनाया जाना है। क्योंकि स्वास्थ्य किसी एक की समस्या नहीं है। अकेले अपने महादेश भारत में ही नहीं- सम्पूर्ण विश्व के कोटि- कोटि जन इससे ग्रसित हैं। सच तो यह है कि जो अपने को स्वस्थ कहते हैं, वे भी किसी न किसी रूप में बीमार हैं।

जिनका तन ठीक है, उनका मन बीमार है। आध्यात्मिक स्वास्थ्य के अर्थ से प्रायः सभी अपरिचित हैं। हालांकि इसका परिचय- इसकी परिभाषा इतनी ही है कि तन और मन ही नहीं हमारी जीवात्मा भी अपने स्व में स्थित हो। हमारी आत्म शक्तियाँ जीवन के सभी आयामों से अभिव्यक्त हों। हम भगवान् के अभिन्न अंश हैं यह बात हमारे व्यवहार, विचार व भावनाओं से प्रमाणित हो। यदि ऐसा कुछ हमारी अनुभूतियों में समाएगा तभी हम आध्यात्मिक स्वास्थ्य का सही अहसास कर पाएँगे। इसी के साथ हमारे- हम सबके कदम साहसिक साधनाओं की ओर बढ़ने चाहिए। तभी हम आध्यात्मिक चिकित्सा की ओर बढ़ सकते हैं और भविष्य में आध्यात्मिक चिकित्सक होने का गौरव पा सकते हैं।

बात जब आध्यात्मिक चिकित्सा की चलती है तो इसे कतिपय क्रियाओं- कर्मकाण्डों व प्रयोगों तक सीमित मान लिया जाता है। और आध्यात्मिक जीवन दृष्टि की अपेक्षा- अवहेलना की जाती है। इस अवहेलना भरी अनदेखी के कारण ये कर्मकाण्ड और प्रयोग थोड़े ही समय में अपने प्रभाव का प्रदर्शन करके किसी अंधियारे में समा जाते हैं। इस सच को हर हालत में समझा जाना चाहिए कि आध्यात्मिक जीवन दृष्टि ही सभी आध्यात्मिक उपचारों व प्रयोगों की ऊर्जा का स्रोत है। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है। इसी वजह से जो अध्यात्म चिकित्सा के सिद्धान्तों व प्रयोगों के विशेषज्ञ व मर्मज्ञ हैं उन्होंने पाँच सूत्रों को अपनाने की बात कही है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ११९

बुधवार, 23 अक्टूबर 2019

दुर्भावनाओं को जीतो | Durbhavnaon Ko Jito | Pt Shriram Sharma Acharya



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👉 ज्ञान की चार बात

एक राजा के विशाल महल में एक सुंदर वाटिका थी,जिसमें अंगूरों की एक बेल लगी थी।वहां रोज एक चिड़िया आती और मीठे अंगूर चुन-चुनकर खा जाती और अधपके और खट्टे अंगूरों को नीचे गिरा देती।

माली ने चिड़िया को पकड़ने की बहुत कोशिश की पर वह हाथ नहीं आई। हताश होकर एक दिन माली ने राजा को यह बात बताई। यह सुनकर भानुप्रताप को आश्चर्य हुआ। उसने चिड़िया को सबक सिखाने की ठान ली और वाटिका में छिपकर बैठ गया।

जब चिड़िया अंगूर खाने आई तो राजा ने तेजी दिखाते हुए उसे पकड़ लिया। जब राजा चिड़िया को मारने लगा,तो चिड़िया ने कहा- हे राजन !! मुझे मत मारो। मैं आपको ज्ञान की 4 महत्वपूर्ण बातें बताऊंगी।'

राजा ने कहा, 'जल्दी बता।'

चिड़िया बोली, 'हे राजन !! सबसे पहले, तो हाथ में आए शत्रु को कभी मत छोड़ो।'

राजा ने कहा, 'दूसरी बात बता।'

चिड़िया ने कहा, 'असंभव बात पर भूलकर भी विश्वास मत करो और तीसरी बात यह है कि बीती बातों पर कभी पश्चाताप मत करो।'

राजा ने कहा, 'अब चौथी बात भी जल्दी बता दो।'

इस पर चिड़िया बोली, 'चौथी बात बड़ी गूढ़ और रहस्यमयी है। मुझे जरा ढीला छोड़ दें क्योंकि मेरा दम घुट रहा है। कुछ सांस लेकर ही बता सकूंगी।'

चिड़िया की बात सुन जैसे ही राजा ने अपना हाथ ढीला किया,चिड़िया उड़ कर एक डाल पर बैठ गई और बोली, 'मेरे पेट में दो हीरे हैं।'

यह सुनकर राजा पश्चाताप में डूब गया। राजा की हालत देख चिड़िया बोली, 'हे राजन !! ज्ञान की बात सुनने और पढ़ने से कुछ लाभ नहीं होता,उस पर अमल करने से होता है। आपने मेरी बात नहीं मानी।

मैं आपकी शत्रु थी, फिर भी आपने पकड़कर मुझे छोड़ दिया।

मैंने यह असंभव बात कही कि मेरे पेट में दो हीरे हैं फिर भी आपने उस पर भरोसा कर लिया।

आपके हाथ में वे काल्पनिक हीरे नहीं आए, तो आप पछताने लगे।

👉👉 उपदेशों को आचरण में उतारे बगैर उनका कोई मोल नहीं।

👉 कर्ज से छुटकारा पाना ही ठीक है। (भाग २)

प्रमुख बात यह है कि हर मनुष्य में इतनी शक्ति और सामर्थ्य होती है कि वह अपनी शारीरिक, पारिवारिक जिम्मेदारियों का पालन ठीक तरह से कर ले। कर्ज की आवश्यकता उन्हीं को होती है जिन्हें अपना पारिवारिक खर्च ठीक प्रकार चलाना नहीं आता या जो श्रम-चोर होते हैं। उन्हें भी मिलता तो कुछ है नहीं और फालतू के व्यसन और पाल लेते हैं, सो उनकी पूर्ति के लिये कहीं से पैसा आना चाहिए। दुस्साहसी पुरुष चोरी छल आदि का आश्रय ले लेते हैं आलसी और अकर्मण्य इसके लिये दूसरों के आगे हाथ फैलाते हैं। कर्ज ले आना तो आसान बात है। चिकनी चुपड़ी बातें बनाकर या मित्रता का ढोंग बना कर किसी से उधार ले तो सकते हैं किन्तु जब अदायगी का समय आता है तो यह बोझ सारे परिवार की अर्थ व्यवस्था पर पड़ता है। फलस्वरूप परिवारों का सौमनस्य समाप्त हो जाता है। क्लेश, कलह और कटुता बढ़ जाती है। इसमें समय भी नष्ट होता है और सदस्यों की योग्यता भी व्यर्थ चली जाती है। कर्ज एक प्रकार से गृहस्थी को चौपट करने वाला होता है।

जिन लोगों की आमदनी बहुत थोड़ी होती है और खर्च अधिक होता है वे लोग कर्ज लेकर अपने को लंगड़ा-लूला जैसा ही अनुभव करते हैं। थोड़ी देर तक के लिये भले ही पूर्ति अनुभव हो किन्तु यह बोझ बढ़ जाता है तो बस मनुष्य का सारा जीवन कर्ज को निबटाने में ही चला जाता है। ऐसे लोग देखे जा सकते हैं जो ब्याज की एवज में साहूकार का ही जीवन भर काम करते रहते हैं उनका कर्ज फिर भी अदा नहीं हो पाता तो वह बोझ उठाकर उनके निरीह बच्चों पर डाल दिया जाता है और फिर एक पैतृक समस्या बन जाती है।

कर्ज एक तरह का सामाजिक कलंक है। लेने वाले के लिये ही वह कठिन अपराध और भारस्वरूप नहीं होते वरन् देने वाले की भी परेशानियाँ कम नहीं होतीं। महात्मा टॉलस्टाय ने लिखा है “कर्ज देना मानों किसी चीज पहाड़ की चोटी से गिराना है और फिर उसे वसूल करना उतना ही कठिन होता है जितना किसी वजनदार चीज को पहाड़ की चोटी पर ले जाना। कर्ज मनुष्य की सबसे बड़ी और दूसरे को देने की गरीबी है।”

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1966 पृष्ठ 44


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/April/v1.44

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ८४)

👉 भविष्य का सम्पूर्ण व समग्र विज्ञान अध्यात्म

शारीरिक रोगों के साथ आध्यात्मिक तकनीकों के प्रयोग मनोरोगों पर भी किए गए हैं। इस सम्बन्ध में विलियम वेस्ट की पुस्तक ‘साइकोथेरेपी एण्ड स्प्रिचुयैलिटी’ पठनीय है। इस पुस्तक में विख्यात मनोचिकित्सक विलियम वेस्ट का कहना है कि अब इस जमाने में मनोचिकित्सा व अध्यात्म विद्या के बीच खड़ी दीवार टूट रही है। मनोरोगों का सही व सम्पूर्ण इलाज आध्यात्मिक तकनीकों के प्रयोग से ही सम्भव है। उन्होंने एक अन्य शोधपत्र में यह भी कहा है कि आध्यात्मिक जीवन शैली को अपनाने से लोगों को मानसिक रोगों की सम्भावना नहीं रहती। इस क्रम में उन्होंने प्रार्थना व ध्यान को मनोरोगों की कारगर औषधि बताया है।

अध्यात्म चिकित्सा के सम्बन्ध में विश्वदृष्टि को परिवर्तित करने वालों में डॉ. ब्रायन वीज़ का नाम उल्लेखनीय है। पेशे से डॉ. वीज़ साइकिएट्रिस्ट हैं। परन्तु अब वे स्वयं को आध्यात्मिक चिकित्सक कहलाना पसन्द करते हैं। उनकी कई पुस्तकें जिनकी चर्चा पहले भी की जा चुकी है- अध्यात्म चिकित्सा की सार्थक उपयोगिता को प्रमाणित करती हैं। इनका कहना है कि आध्यात्मिक सिद्धान्तों व साधना से ही सम्पूर्ण जीवन बोध सम्भव है। चिकित्सा के सम्बन्ध में जब भी वैज्ञानिक असफलताओं की बात होती है, तो इसका कारण एकांगीपन होता है। विज्ञान कहता है कि इन्सान केवल देह मात्र है, जो सच नहीं है। हमारा जीवन देह, प्राण, मन व आत्मा का संयोग है। और ये सम्पूर्ण आयाम आध्यात्मिक दृष्टि के बिना नहीं जाने जा सकते।

एक अन्य वैज्ञानिक रिचर्ड कार्लसन का अपने शोध निष्कर्ष ‘स्प्रिचुयैलिटी  कम्पलीट साइन्स ऑफ लाइफ’ यानि कि आध्यात्मिकता जीवन का सम्पूर्ण विज्ञान, में इन तथ्यों का खुलासा किया है। उनका मानना है कि अध्यात्म के बिना जीवन का सम्पूर्ण बोध असम्भव है। कार्लसन कहते हैं कि जिस तरह से कटी हुई अंगुलियों के सहारे मानवीय देह की समग्रता को नहीं जाना जा सकता, उसी तरह केवल देह के बलबूते सम्पूर्ण अस्तित्त्व को जानना असम्भव है। उन्होंने अपनी पुस्तक में इस सम्बन्ध में कई सत्यों व तथ्यों का विश्लेषण करते हुए कहा है कि जिस तरह बीसवीं सदी विज्ञान की सदी साबित हुई है। उसी तरह यह इक्कीसवीं सदी आध्यात्म की सदी के रूप में देखी, जानी व अनुभव की जाएगी। आध्यात्मिक जीवन दृष्टि, अध्यात्म चिकित्सा के सिद्धान्त व प्रयोगों को सभी इस सदी की महानतम उपलब्धि के रूप में अनुभव करेंगे। इसलिए यही उपयुक्त है कि आध्यात्मिक स्वास्थ्य का अर्थ समझें व अध्यात्म चिकित्सा की ओर बढ़ाएँ कदम।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ११७

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026

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