शनिवार, 7 सितंबर 2019

Vyakti Nirmaan, Pariwaar Nirmaan Aur Samaj Nirmaan | Pt Shriram Sharma A...



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👉 सत्य की जीत

एक राज्य में एक अत्यंत न्यायप्रिय राजा था। वह अपने राज्य में सभी का ध्यान रखता था। वह वेष बदल कर अपने राज्य में भ्रमण करता था ,और अपने राज्य संचालन में निरन्तर सुधार का प्रयत्न करता रहता था। कई दिन उसने अपने राज्य में परेशानियां देखी। कुछ दिन बाद उसने अपने राज्य में एक कानून पारित किया कि -'यदि बाजार में किसी का सामान बेचने के बाद रह जाता है, और वह नही बिकता तो उसे राजा खरीद लेंगे।'
       
एक दिन की बात थी, एक चित्रकार की चित्र नही बिक रही थी। उस पर शनि देव की चित्र बनी थी। वह राजा के पास गया और राजा ने उसे खरीद लिया। उसने अपने राज महल में शनि देव की स्थापन करवाई। स्थापना के अगले दिन ही राजा के स्वप्न में लक्ष्मी जी आई। लक्ष्मी जी ने कहा -"राजन,आपने अपने महल में शनि देव की स्थापन करवाई है, मैं अब यहां नही रुक सकती, मैं अब यह से जा रही हूँ।  अगले दिन स्वप्न में धर्म आया उसने भी यही कहा और वहां से चल दिया। राजा मन ही मन परेशान हो गया उसके समझ में नही आ रहा था वह क्या करे?

अगले दिन पुनः उसके स्वप्न में सत्य आया उसने भी यही बात कही और जाने लगा, राजा ने अपने कथनानुसार सत्य जा पालन किया था। राजा ने उत्तर में कहा-'देव मैंने अपने कथनानुसार सत्य का पालन किया है, आप का जाना न्याय सांगत नही होगा।' राजा की यह बात यथार्थ थी और सत्य नही गया। कुछ दिनों बाद लक्ष्मी जी और धर्म पुनः वापस आ गए।
      
दोस्तों, आज के समय में सत्य बोलने का सबसे बड़ा फायदा यह है की आप के कहे गए वाक्यो को, आपको याद करने की आवश्यकता नही होती। सत्य हमे आत्मसम्मान दिलाता है, हमे अपनी ही दृष्टि में उच्च बनाता है।रात को जब हम निद्रा के लिए जाते है, तो अलौकिक आनंद की अनुभूति करता है। दोस्तों, सत्य का प्रयोग करके देखे उत्तर आप के सामने स्वतः ही आ जायेगा।

👉 कर्मफल हाथों-हाथ

अहंकार और अत्याचार संसार में आज तक किसी को बुरे कर्मफल से बचा न पाये। रावण का असुरत्व यों मिटा कि उसके सवा दो लाख सदस्यों के परिवार में दीपक जलाने वाला भी कोई न बचा। कंस, दुर्योधन, हिरण्यकशिपु की कहानियाँ पुरानी पड़ गयीं। हिटलर, सालाजार, चंगेज और सिकन्दर, नैपोलियन जैसे नर-संहारकों को किस प्रकार दुर्दिन देखने पड़े, उनके अन्त कितने भयंकर हुए, यह भी अब अतीत की गाथाओं में जा मिले हैं। नागासाकी पर बम गिराने वाले अमेरिकन वैमानिक फ्रेड ओलीपी और हिरोशिमा के विलेन (खलनायक) मेजर ईथरली का अन्त कितना बुरा हुआ, यह देखकर सुनकर सैंकड़ों लोगों ने अनुभव कर लिया कि संसार संरक्षक के बिना नहीं है। शुभ-अशुभ कर्मों का फल देने वाला न रहता होता, तो संसार में आज जो भी कुछ चहल-पहल, हंसी खुशी दिखाई दे रही है, वह कभी की नष्ट हो चुकी होती।

इन पंक्तियों में लिखी जा रही कहानी एक ऐसे खलनायक की है जिसने अपने दुष्कर्मों का बुरा अन्त अभी-अभी कुछ दिन पहले ही भोगा है। जलियावाला हत्याकाँड की जब तक याद रहेगी तब तक जनरल डायर का डरावना चेहरा भारतीय प्रजा के मस्तिष्क से न उतरेगा। पर बहुत कम लोग जानते होंगे कि डायर को भी अपनी करनी का फल वैसे ही मिला जैसे सहस्रबाहु, खर-दूषण, वृत्रासुर आदि को।

पंजाब में जन्मे, वहीं के अन्न और जल से पोषण पा कर अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर में सिख धर्म में दीक्षित होकर भी जनरल डायर ने हजारों आत्माओं को निर्दोष पिसवा दिया था, उसे कौन नहीं जानता। इंग्लैंड उसकी कितनी ही प्रशंसा करता पर वह भगवान के दण्ड-विधान से उसी प्रकार नहीं बच सकता था, जैसे संसार का कोई भी व्यक्ति अपने किये हुए का फल भोगने से वंचित नहीं रहता। भगवान की हजार आँखें, हजार हाथ और कराल दाढ़ से छिपकर बचकर कोई जा नहीं सकता। जो जैसा करेगा, उसे वैसा भरना ही पड़ेगा। यह सनातन ईश्वरीय नीति कभी परिवर्तित न होगी।

हंटर कमेटी ने उसके कार्यों की सार्वजनिक निन्दा की, उससे उसका मन अशान्त हो उठा। तत्कालीन भारतीय सेनापति ने उसके किये हुए काम को बुरा ठहराकर त्यागपत्र देने का आदेश दिया। फलतः अच्छी खासी नौकरी हाथ से गई, पर इतने भर को नियति की विधि-व्यवस्था नहीं कहा जा सकता। आगे जो हुआ, प्रमाण तो वह है, जो यह बताता है कि करने के फल विलक्षण और रहस्यपूर्ण ढंग से मिलते हैं।

सन 1921 में जनरल डायर को पक्षाघात हो गया, उससे उसका आधा शरीर बेकार हो गया। प्रकृति इतने से ही सन्तुष्ट न हुई फिर उसे गठिया हो गया। उसके मित्र उसका साथ छोड़ गये। उसके संरक्षक माइकेल ओडायर की हत्या कर दी गई। उसे तो चलना-फिरना तक दूभर हो गया। ऐसी ही स्थिति में एक दिन उसके दिमाग की नस फट गई और लाख कोशिशों के बावजूद वह ठीक नहीं हुई। डायर सिसक-सिसक कर, तड़प-तड़प कर मर गया। अन्तिम शब्द उसके यह थे-

‘मनुष्य को परमात्मा ने यह जो जीवन दिया है, उसे बहुत सोच-समझ कर बिताने वाले ही व्यक्ति बुद्धिमान होते हैं, पर जो अपने को मुझ जैसा चतुर और अहंकारी मानते हैं, जो कुछ भी करते न डरते हैं न लजाते हैं, उनका क्या अन्त हो सकता है? यह किसी को जानना हो तो इन प्रस्तुत क्षणों में मुझसे जान ले।’

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ६४)

👉 आसन, प्राणायाम, बंध एवं मुद्राओं से उपचार

शारीरिक दृष्टि से देखें तो आसनों से शरीर की सबसे महत्त्वपूर्ण अन्तःस्रावी ग्रन्थि प्रणाली नियंत्रित एवं सुव्यवस्थित होती है। परिणामतः सभी ग्रन्थियों से उचित मात्रा में रस का स्राव होने लगता है। ध्यान देने की बात यह भी हे कि मांसपेशियां, हड्डियाँ, स्नायु मण्डल, ग्रन्थिप्रणाली, श्वसन प्रणाली, उत्सर्जन प्रणाली, रक्त संचरण प्रणाली सभी एक दूसरे से सम्बन्धित हैं। वे एक दूसरे के सहयोगी हैं। आसन के अनेक प्रकार शरीर को लचीला तथा परिवर्तित वातावरण के अनुकूल बनाने के योग्य बनाते हैं। इनके प्रभाव से पाचन क्रिया तीव्र हो जाती है। उचित मात्रा में पाचक रस तैयार होता है। अनुकम्पी एवं परानुकम्पी तंत्रिका प्रणाली में सन्तुलन आ जाता है। फलस्वरूप इनके द्वारा बाहरी और आन्तरिक अंगों के कार्य ठीक ढंग से होने लगते हैं।

शरीर के साथ आसनों की क्रियाएँ मन को भी समर्थ व शक्तिशाली बनाती हैं। इनके प्रभाव से दृढ़ता व एकाग्रता की शक्ति विकसित होती है। यहां तक कि कठिनाइयाँ मानसिक शक्तियों के विकास का माध्यम बन जाती हैं। व्यक्ति में आत्मविश्वास आता है और वह औरों के लिए प्रेरणादायक बन जाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो आसनों के प्रभाव से शरीर शुद्ध होकर उच्चस्तरीय आध्यात्मिक साधनाओं के लिए तैयार हो जाता है। यहाँ इस सच्चाई को स्वीकारने में थोड़ा सा भी संकोच नहीं कि आसनों से कोई आध्यात्मिक अनुभव तो नहीं होते पर ये आध्यात्मिक अनुभवों को पाने में सहायक जरूर हैं।

प्राणायाम आसनों की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म विधि है। यूं तो इसकी सारी प्रक्रियाएँ श्वसन के आरोह- अवरोह एवं इसके स्वैच्छिक नियंत्रण पर टिकी हैं। पर यथार्थ में यह विश्व व्यापी प्राण ऊर्जा से अपना सामञ्जस्य स्थापित करने की विधि है। आमतौर पर लोग इसे केवल अधिक आक्सीजन प्राप्त करने की प्रणाली के रूप में जानते हैं। किन्तु सत्य इससे भिन्न है। श्वसन के माध्यम से इसके द्वारा नाड़ियों, प्राण नलिकाओं एवं प्राण के प्रवाह पर व्यापक असर होता है। परिणामतः नाड़ियों का शुद्धिकरण होता है तथा मौलिक और मानसिक स्थिरता प्राप्ति होती है। इसमें की जाने वाली कुम्भक प्रक्रिया द्वारा न केवल प्राण का नियंत्रण होता है, बल्कि मानसिक शक्तियों का भी विकास होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ८८

👉 आत्मचिंतन के क्षण 7 Sep 2019

★ गायत्री मंत्र में सम्स्त संसार को धारण, पोषण और अभिवर्द्धन करने वाले परमात्मा से सद्बुद्धि प्रदान करने की प्रार्थना की गई है। श्रद्धा-विश्वासपूर्वक की गई यह उपासना साधक की अंतश्चेतना में, उसके मन, अन्त:करण, मस्तिष्क, विचारों और भावनाओं में सन्मार्ग की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा भरती है। साधक जब इस महामंत्र के अर्थ पर विचार करता है तो वह समझ जाता है कि संसार की सर्वोपरि समृद्धि और जीवन की सबसे बडी सफलता सद्बुद्धि को प्राप्त करना है।  
 
□ ज्ञानवान, विवेकवान, और विद्वान बनने का साधन पुस्तकावलोकन ही है। पेट से कोई ज्ञानी नहीं होता वरन् परिस्थिति संगति एवं वातावरण में रहकर तदनुसार मनोभूमि का निर्माण होता है। जिस दिशा में हमें मस्तिष्क उन्नत करना है, उस दिशा में आगे बढे़ हुए विद्वानों का सत्संग उनकी पुस्तकों द्वारा ही हो सकता है। अत: स्वाध्याय की आदत डालिये।
 
◆ सच्ची नीति का नियम यह है कि हम जिस मार्ग को जाते हैं उसे ही ग्रहण करके न रह जायें। किन्तु जो मार्ग सच्चा है फिर चाहे हम उससे परिचित हों या न हों उसे ग्रहण करना ही चाहिए। मतलब यह है कि जब हम यह जान जायें कि फलाँ मार्ग सच्चा है तब हमें उस पर जाने के लिए निर्भय होकर जी तोड परिश्रम करना चाहिए। जब इस प्रकार नीति का पालन किया जा सकें तभी हम आगे बढ़ सकते हैं।

◇ हिन्दू धर्म आध्यात्म प्रधान रहा है। आध्यात्मिक जीवन उसका प्राण है। अध्यात्म के प्रति उत्सर्ग करना ही सर्वोपरि नहीं है, बल्कि पूर्ण शक्ति का उद्भव और उत्सर्ग दोनों की ही आध्यात्मिक जीवन में आवश्यकता है। कर्म करना और कर्म को चैतन्य के साथ मिला देना ही यज्ञमय जीवन है। यह यज्ञ जिस संस्कृति का आधार होगा, वह संस्कृति और संस्कृति को मानने वाली जाति हमेशा अमर रहेगी ।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 7 Sep 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 7 Sep 2019



शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ६३)

👉 आसन, प्राणायाम, बंध एवं मुद्राओं से उपचार

हठयोग की विधियाँ जीवन के प्राण प्रवाह को सम्वर्धित , नियंत्रित व नियोजित करती हैं। अध्यात्म चिकित्सा के सभी विशेषज्ञ इस बारे में एक मत हैं कि प्राण प्रवाह में व्यतिक्रम या व्यतिरेक आने से देह रोगी होती है और मन अशान्त। इस असन्तुलन के कारण शारीरिक हो सकते हैं और मानसिक भी, पर परिणाम एक ही होता है कि हमारा विश्व व्यापी प्राणऊर्जा से सम्बन्ध दुर्बल या विच्छिन्न हो जाता है। यदि यह सम्बन्ध पुनः संवर सके और देह में प्राण फिर से सुचारू रूप से संचालित हो सके तो सभी रोगों को भगाकर स्वास्थ्य लाभ किया जा सकता है। इतना ही नहीं प्राण प्रवाह के सम्वर्धन से देह को दीर्घजीवी व वज्रवत बनाया जा सकता है। नाड़ियाँ व स्नायु संस्थान के विद्युतीय प्रवाह अधिक प्रबल किए जा सकते हैं।

हठयोग की प्रक्रियाएँ आरोग्य व प्राण बल के सम्वर्धन की सुनिश्चित गारंटी देती है। क्योंकि इस विद्या के जानकारों को यह ज्ञान है कि यदि जीवन में प्राणों की दीवार अभेद्य है तो कोई भी रोग प्रवेश नहीं कर सकता। इसलिए इन प्रक्रियाओं का सारा जोर प्राणों के सम्वर्धन, परिशोधन व विकास पर है। हमारे जीवन में प्राण प्रवाह का स्थूल रूप श्वास है श्वास के आवागमन से देह में प्राण प्रवेश करते हैं और अंग- प्रत्यंग में विचरण करते हैं। आसन, प्राणायाम, बंध एवं मुद्रा आदि प्रक्रियाओं के द्वारा इन पर नियंत्रण स्थापित करके इनके प्रवाह को अपनी इच्छित दिशा में मोड़ा जा सकता है। यही वजह है कि हठयोगी अपने स्वास्थ्य का स्वामी है। रोग उसके पास फटकते भी नहीं। किसी तरह की बीमारियाँ उसे प्रभावित नहीं कर पाती।

ये प्रभाव हठयोग की विधियों के हैं, जिनमें सबसे प्रारम्भिक विधि आसन है। शरीर के विभिन्न अंगों को मोड़- मरोड़ कर किए जाने वाले ये आसन अनेक हैं। और प्रत्यक्ष में ये किसी व्यायाम जैसे लगते हैं, किन्तु यथार्थता इससे भिन्न है। व्यायाम की प्रक्रियाएँ कोई भी हो, कैसी भी हो इनका प्रभाव केवल शरीर के प्रत्येक अवयव में प्राण को क्रियाशील करके उसे सम्पूर्ण स्वास्थ्य प्रदान करता है। प्रभाव की दृष्टि से सोचें तो इनके प्रभाव शारीरिक होने के साथ मानसिक व आध्यात्मिक भी हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ८७

👉 स्वाध्याय, जीवन विकास की एक अनिवार्य आवश्यकता (भाग ४)

स्वाध्याय से मनुष्य का अन्तःकरण निर्मल कर देने और उसके अंतर्पट खोलने की सहज क्षमता विद्यमान् है। आन्तरिक उद्घाटन हो जाने से मनुष्य स्वयं ही आत्मा अथवा परमात्मा के प्रति जिज्ञासु हो उठता है। उसकी चेतना ऊर्ध्वमुखी होकर उसी ओर को उड़ने के लिए पर तोलने लगती है। उच्च आध्यात्मिक अनुभूतियों का प्रस्फुटन स्वाध्याय के द्वारा ही हुआ करता है। स्वाध्याय निःसन्देह एक ऐसा अमृत है, जो मानस में प्रवेश कर मनुष्य की पाशविक प्रवृत्तियों को नष्ट कर देता है।

चारित्रिक उज्ज्वलता स्वाध्याय का एक साधारण और मनोवैज्ञानिक फल है। सद्ग्रन्थों में सन्निहित साधु वाणियों का निरन्तर अध्ययन एवं मनन करते रहने से मन पर शिव संस्कारों की स्थापना होती हैं, जिससे चित्त अपने आप दुष्कृत्यों की ओर से फिर जाता है। स्वाध्यायी व्यक्ति पर कुसंग का भी प्रभाव नहीं पड़ने पाता, इसका भी एक वैज्ञानिक कारण है। जिसकी स्वाध्याय में रुचि है ओर जो उसको जीवन का एक ध्येय मानता है, वह आवश्यकताओं से निवृत्त होकर अपना सारा समय स्वाध्याय में तो लगाता है। इसलिये उसके पास कोई फालतू समय ही नहीं रहता, जिसमें वह जाकर इधर-उधर यायावरी करेगा और दूषित वातावरण से अवांछनीय तत्त्व ग्रहण कर लायेगा।

उसी प्रकार रुचि-साम्य-संपर्क के सिद्धान्त के अनुसार भी यदि उसके पास कोई आयेगा तो प्रायः उसी रुचि का होगा और उन दोनों को एक सामयिक सत्संग का लाभ होगा। रुचि वैषम्य रखने वाला स्वाध्यायशील के पास जाने का कोई प्रयोजन अथवा साहस ही न रखेगा और यदि संयोगवश ऐसे कोई व्यक्ति आ भी जाते हैं तो उसके पास का वातावरण अपने अनुकूल न पाकर, देर तक ठहर ही न पायेंगे। निदान संगत-असभ्य आचरण दोषों का स्वाध्यायशील के पास कोई प्रश्न ही नहीं उठता।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च १९६९ पृष्ठ २४

बुधवार, 4 सितंबर 2019

👉 "मर्द"..आज के..

आज हमेंशा की तरह ट्रेन में कम भीड़ थी,पुष्पा ने खाली जगह पर अपना ऑफिस बैग रखा और खुद बगल में बैठ गई। पूरे डिब्बे में कुछ मर्दों के अलावा सिर्फ पुष्पा ही थी। रात का समय था सब उनींदे से सीट पर टेक लगाये या तो बतिया रहे थे या ऊंघ रहे थे।

अचानक डिब्बे में 3-4 तृतीय लिंगी तालियां बजाते हुए पहुंचे और मर्दों से 5-10 रूपये वसूलने लगे कुछ ने चुपचाप दे दिए और कुछ उनींदे से बड़बड़ाने लगे- क्या मौसी रात को तो छोड़ दिया करो ये हफ्ता वसूली... वह सभी पुष्पा की तरफ रुख न करते हुए सीधा आगे बढ़ गए, फिर ट्रेन कुछ देर रुकी और कुछ लड़के चढ़े, फिर दौड़ ली आगे की ओर।

पुष्पा की मंजिल अभी 1 घंटे के फासले पर थी वे 4-5 लड़के पुष्पा के नजदीक खड़े हो गए और उनमे से एक ने नीचे से उपर तक पुष्पा को ललचाई नजरो से देखा और बोला -मैडम अपना ये बैग तो उठा लो सीट बैठने के लिए है, सामान रखने के लिए नहीं।

साथी लड़कों ने वीभत्स हंसी से उसका साथ दिया, पुष्पा ने अपना बैग उठाया और सीट पर सिमट कर बैठ गई। वे सारे लड़के पुष्पा के बगल में आकर बैठ गए।

पुष्पा ने कातर नजरों से सामने बैठे 2-3 पुरुषों की ओर देखा पर वे ऐसा जाहिर करने लगे मानो पुष्पा का कोई अस्तित्व ही ना हो। तभी पास बैठे लड़के ने पुष्पा की बांह पर अपनी ऊंगली फेरी तो बाकी लड़कों ने फिर उसी वीभत्स हंसी से उसका उत्साहवर्धन किया।

ओ मिस्टर थोड़ा तमीज में रहिये- पुष्पा सीट से उठ खड़ी हुई और ऊंची आवाज में बोली। डिब्बे के सभी मर्द अब भी अपनी अपनी मोबाइल में विचरण कर रहे थे। किसी के मुंह से कुछ नहीं निकला।

अरे..अरे मैडम तो गुस्सा हो गईं,अरे बैठ जाइये मैडम आपकी और हमारी मंजिल अभी दूर है तब तक हम आपका मनोरंजन करते रहेंगे,कत्थई दांतों वाला लड़का पुष्पा का हाथ पकड़कर बोला।

डिब्बे की सारीं सीटों पर मानो पत्थर की मूर्तियां विराजमान थी। तभी...अरे तूं क्या मनोरंजन करेगा? हम करतें हैं तेरा मनोरंजन।

शबाना उठा रे लहंगा, ले इस चिकने को लहंगे में बड़ी जवानी चढ़ी है इसे। आय हाय मुंह तो देखो सुअरों का,कुतिया भी ना चाटे। इनके बदन में बड़ी मस्ती चढ़ी है,अरे वो जूली उतारो इनके कपड़े,पूरी मस्ती निकालते हैं इन कमीनों की।

जूली नाम का भयंकर डीलडौल वाला तृतीय लिंगी जब उन लड़कों की तरफ बढ़ा तो सभी लड़के डिब्बे के दरवाजे की ओर भाग निकले और धीमे चलती ट्रेन से बाहर कूद पड़े।
पुष्पा की भीगी आंखों ने अपनी सुरक्षा करने के लिए सिर झुकाकर उन सभी तृतीय लिगिंयों का अभिवादन किया और फिर नजर जब डिब्बे के कथित मर्दों की तरफ पड़ी जो अपनी आंखे झुकाएं अपनी मोबाइल में व्यस्त थे।

और असली मर्द तालियां बजाते आगे की ओर बढ़ गये।
कौन है असली मर्द??

👉 स्वाध्याय, जीवन विकास की एक अनिवार्य आवश्यकता (भाग ३)

एक वकालत में ही नहीं, किसी भी विषय अथवा क्षेत्र में अध्ययन-शीलता एवं अध्ययन-हीनता का परिणाम एक जैसा ही होता है। इसमें चिर, नवीन अवस्था का कोई आपेक्ष नहीं होता। यह एक वैज्ञानिक सत्य है जिसमें अपवाद के लिए कोई गुँजाइश नहीं है।

धार्मिक अथवा आध्यात्मिक क्षेत्र ले लीजिये कोई अमुक नित्य चार-चार बार पूजा करता, तीन-तीन घण्टे आसन लगाता, जाप करता अथवा कीर्तन में मग्न रहता। व्रत-उपवास रखता, दान-दक्षिणा देता है, किन्तु शास्त्रों अथवा सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय, उनके विचारों का चिन्तन-मनन नहीं करता। सोच लेता है जब मैं इतना क्रिया-काण्ड करता हूँ तो इसके बाद अध्ययन की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। आत्म-ज्ञान अथवा परमात्म अनुभूति करा देने के लिए इतना ही पर्याप्त है तो निश्चय ही वह भ्रम में है। आत्मा का क्षेत्र वैचारिक क्षेत्र है, सूक्ष्म भावनाओं एवं मनन-चिन्तन का क्षेत्र हैं।

अध्ययन के अभाव में इस आत्म-जगत् में गति कठिन है। आत्मा के स्वरूप का ज्ञान अथवा परमात्मा के अस्तित्व का परिचय प्राप्त हुए बिना उनसे संपर्क किस प्रकार स्थापित किया जा सकता है? इस अविगत का ज्ञान तो उन महान् मनीषियों का अनुभव अध्ययन करने से ही प्राप्त हो सकना सम्भव है, जो अवतार रूप में संसार को वेदों का ज्ञान देने के लिए परमात्मा का प्रतिनिधित्व करते रहते हैं। आसन ध्यान, पूजा-पाठ तो प्रधान रूप से बुद्धि को परिष्कृत और आचरण को उज्ज्वल बनाने के लिये, इस हेतु करना आवश्यक है कि अध्यात्म के दैविक तत्त्व को समझने और ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त हो सके। इसके विपरीत यदि एक बार पूजा-पाठ को स्थगित भी रखा जाये और एकाग्रता एवं आस्थापूर्वक स्वाध्याय और उसका चिन्तन मनन भी किया जाये तो बहुत कुछ उस दिशा में बढ़ा जा सकता है। स्वाध्याय स्वयं ही एक तप, आसन और निदिप्यास के समान है। इसका नियम निर्वाह से आप ही आप अनेक नियम, संयमों का अभ्यास हो जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च १९६९ पृष्ठ २४

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 4 Sep 2019




👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 4 Sep 2019



👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ६२)

👉 अति विलक्षण स्वाध्याय चिकित्सा

पाण्डिचेरी आश्रम महर्षि श्री अरविन्द के शिष्य नलिनीकान्त गुप्त ने स्वाध्याय के बारे में अपना उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कई मर्मिक बातें कही हैं। यहाँ ध्यान दिलाना आवश्यक है कि नलिनीकान्त अपनी सोलह वर्ष की आयु से लगातार श्री अरविन्द के पास रहे। श्री अरविन्द उन्हें अपनी अन्तरात्मा का साथी- सहचर बताते थे। वह लिखते हैं कि आश्रम में आने पर अन्यों की तरह मैं भी बहुत पढ़ा करता है। अनेक तरह के शास्त्र एवं अनेक तरह की पुस्तकें पढ़ना स्वभाव बन गया था। एक दिन श्री अरविन्द ने बुलाकर उनसे पूछा- इतना सब किसलिए पढ़ता था। उनके इस प्रश्र का सहसा कोई जवाब नलिनीकान्त को न सूझा। वह बस मौन रहे।

वातावरण की इस चुप्पी को तोड़ते हुए श्री अरविन्द बोले- देख पढ़ना बुरा नहीं है। पर यह पढ़ना दो तरह का होता है- एक बौद्धिक विकास के लिए, दूसरा मन- प्राण को स्वस्थ करने के लिए। इस दूसरे को स्वाध्याय कहते हैं और पहले को अध्ययन। तुम इतना अध्ययन करते हो सो ठीक है, पर स्वाध्याय भी किया करो। इसके लिए अपनी आन्तरिक स्थिति के अनुरूप किसी मन्त्र या विचार का चयन करो। और फिर उसके अनुरूप स्वयं को ढालने की साधना करो। नलिनीकान्त लिखते हैं, यह बात उस समय की है, जब श्री अरविन्द सावित्री पूरा कर रहे थे। मैंने इसी को अपने स्वाध्याय की चिकित्सा की औषधि बना लिया।

फिर मेरा नित्य का क्रम बन गया। सावित्री के एक पद को नींद से जगते ही प्रातःकाल पढ़ना और सोते समय तक प्रतिपल- प्रतिक्षण उस पर मनन करना। उसी के अनुसार साधना की दिशा- धारा तय करना। इसके बाद इस तय क्रम के अनुसार जीवन शैली- साधना शैली विकसित कर लेना। उनका यह स्वाध्याय क्रम इतना प्रगाढ़ हुआ कि बाद के दिनों में जब श्री अरविन्द से किसी ने पूछा- कि आपके और माताजी के बाद यहाँ साधना की दृष्टि से कौन है? तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा- नलिनी। इतना कहकर थोड़ी देर चुप रहने के बाद बोले, ‘नलिनी इज़ इम्बॉडीमेण्ट ऑफ प्यूरिटी’ यानि कि नलिनी पवित्रता की मूर्ति है। नलिनी ने वह सब कुछ पा लिया है जो मैंने या माता जी ने पाया है। ऐसी उपलब्धियाँ हुई थीं स्वाध्याय चिकित्सा से नलिनीकान्त को। हालांकि वह कहा करते थे कि स्वस्थ जीवन के लिए शुरूआत अपनी स्थिति के अनुसार मन के स्थान पर तन से भी की जा सकती है। इसके लिए हठयोग की विधियाँ श्रेष्ठ हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ८५

👉 आत्मचिंतन के क्षण 4 Sep 2019

★ मानसिक रोगों का एक कारण मनोविज्ञानी आत्म केन्द्रित होना बताते हैं। व्यक्ति जितना आत्म केन्द्रित होगा उतनी ही मानस रोग एवं शारीरिक रोग की संभावना उसमें बढ़ जाएगी। संभवत: इस तथ्य से हमारे प्राचीन ऋषि परिचित रहे होंगे । इसलिए "आत्मवत सर्वभूतेषु" और "वसुधैव कुटुम्बकम्" जैसे सिद्धान्त-वाक्यों के पीछे उनका एक भाव व्यक्ति और सामाज को आत्मकेन्द्रित होने से बचाना भी होगा, ताकि स्वरुप मन और स्वस्थ शरीर वाले व्यक्ति और समाज की रचना की जा सके। 
 
□ पिछले सौ-डेढ़ सौ वर्षों से संसार में स्वार्थपरता की वृद्धि के साथ ही ईश्वर से विमुखता का भाव भी जोर पकड रहा था। अब कई बार ठोकरें खाने के बाद संसार को विशेष रुप से सबसे धनी और ऐश्वर्यशाली देशों को फिर से ईश्वर की याद आ रही है। केवल धन से ही सुख तथा शान्ति नहीं मिलती। इसके लिए चित्त की शुद्धता बिना विवेक के संभव नहीं और विवेक धर्म तथा ईश्वर के ज्ञान से ही उत्पन्न हो सकता है।
 
◆ मनुष्य चाहे समाज की दृष्टि से बचकर चुपचाप कोई पाप कर डाले, जंगल में छिपकर किसी की हत्या कर डाले, रात के घनघोर अन्धकार में पाप कर ले, लेकिन सर्वव्यापक परमात्मा की दिनरात, भीतर बाहर सब ओर देखने वाली असंख्य दृष्टियों से नहीं बच सकता। घर, बाहर, जंगल, समुद्र, आकाश, व्यवहार, व्यापार सर्वत्र ईश्वर ही ईश्वर है। आप की अलग कोई सत्ता नहीं है। आप स्वयं ही अपने अन्दर परमात्मा को बसाये हुए हैं।

◇ जिस प्रकार शरीर के रोग हैं उसी प्रकार मन के रोग भी हैं और वे मनुष्य की कल्पना से ही जन्म लेते हैं। जब मन में क्रोध होता है तो किसी से बदला लेने की इच्छा होती है। ईर्ष्या होती है तो मन अशान्त हो जाता है और मन दु:खी रहता है। अनेक लोग दुसरों को झूठ-मूँठ शत्रु अथवा प्रतियोगी समझकर दुख पाते हैं। जिस मनुष्य ने अपने जीवन में अनेक अत्याचार किये हैं वह भी मरने के समय उनकी स्मृति से अत्यन्त दु:ख को प्राप्त होता है। चुगलखोर के मन में एक प्रकार की खुजलाहट बनी रहती है जो उसके मन को सदैव अशान्त रखती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 3 सितंबर 2019

Hriday Mandir Ke Andar Santosh हृदय-मंदिर के अंदर संतोष | Pt Shriram Sha...



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👉 झूठा अभिमान

एक मक्खी एक हाथी के ऊपर बैठ गयी। हाथी को पता न चला मक्खी कब बैठी। मक्खी बहुत भिनभिनाई आवाज की, और कहा, ‘भाई! तुझे कोई तकलीफ हो तो बता देना। वजन मालूम पड़े तो खबर कर देना, मैं हट जाऊंगी।’ लेकिन हाथी को कुछ सुनाई न पड़ा। फिर हाथी एक पुल पर से गुजरने लगा बड़ी पहाड़ी नदी थी, भयंकर गङ्ढ था, मक्खी ने कहा कि ‘देख, दो हैं, कहीं पुल टूट न जाए! अगर ऐसा कुछ डर लगे तो मुझे बता देना। मेरे पास पंख हैं, मैं उड़ जाऊंगी।’

हाथी के कान में थोड़ी-सी कुछ भिनभिनाहट पड़ी, पर उसने कुछ ध्यान न दिया। फिर मक्खी के बिदा होने का वक्त आ गया। उसने कहा, ‘यात्रा बड़ी सुखद हुई, साथी-संगी रहे, मित्रता बनी, अब मैं जाती हूं, कोई काम हो, तो मुझे कहना, तब मक्खी की आवाज थोड़ी हाथी को सुनाई पड़ी, उसने कहा, ‘तू कौन है कुछ पता नहीं, कब तू आयी, कब तू मेरे शरीर पर बैठी, कब तू उड़ गयी, इसका मुझे कोई पता नहीं है। लेकिन मक्खी तब तक जा चुकी थी सन्त कहते हैं, ‘हमारा होना भी ऐसा ही है। इस बड़ी पृथ्वी पर हमारे होने, ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।

हाथी और मक्खी के अनुपात से भी कहीं छोटा, हमारा और ब्रह्मांड का अनुपात है । हमारे ना रहने से क्या फर्क पड़ता है? लेकिन हम बड़ा शोरगुल मचाते हैं। वह शोरगुल किसलिये है? वह मक्खी क्या चाहती थी? वह चाहती थी हाथी स्वीकार करे, तू भी है; तेरा भी अस्तित्व है, वह पूछ चाहती थी। हमारा अहंकार अकेले तो नहीं जी सक रहा है। दूसरे उसे मानें, तो ही जी सकता है। इसलिए हम सब उपाय करते हैं कि किसी भांति दूसरे उसे मानें, ध्यान दें, हमारी तरफ देखें; उपेक्षा न हो।

सन्त विचार- हम वस्त्र पहनते हैं तो दूसरों को दिखाने के लिये, स्नान करते हैं सजाते-संवारते हैं ताकि दूसरे हमें सुंदर समझें। धन इकट्ठा करते, मकान बनाते, तो दूसरों को दिखाने के लिये। दूसरे देखें और स्वीकार करें कि तुम कुछ विशिष्ट हो, ना की साधारण।

तुम मिट्टी से ही बने हो और फिर मिट्टी में मिल जाओगे, तुम अज्ञान के कारण खुद को खास दिखाना चाहते हो वरना तो तुम बस एक मिट्टी के पुतले हो और कुछ नहीं। अहंकार सदा इस तलाश में है–वे आंखें मिल जाएं, जो मेरी छाया को वजन दे दें।

याद रखना आत्मा के निकलते ही यह मिट्टी का पुतला फिर मिट्टी बन जाएगा इसलिए अपना झूठा अहंकार छोड़ दो और सब का सम्मान करो क्योंकि जीवों में परमात्मा का अंश आत्मा है।

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ६१)

👉 अति विलक्षण स्वाध्याय चिकित्सा

इस विधि के चार मुख्य बिन्दु है। इसके पहले क्रम में हम उन ग्रन्थों- विचारों का चयन करते हैं, जिन्हें स्व की अनुभूति से सम्पन्न महामानवों ने सृजित किया है। ध्यान रखें कोई भी पुस्तक या विचार स्वाध्याय की सामग्री नहीं बन सकता। इसके लिए जरूरी है कि यह पुस्तक या विचार किसी महान् तपस्वी अध्यात्मवेत्ता के द्वारा सृजित हो। इसके लिए श्रीमद्भगवद्गीता, उपनिषद् अथवा परम पूज्य गुरुदेव के द्वारा लिखित ग्रन्थों का चयन किया जा सकता है। इस चयन के बाद दूसरा चरण प्रारम्भ होता है। इस क्रम में हम इन महान् विचारों के परिप्रेक्ष्य में स्वयं को देखते हैं, ऑकलन करते हैं। इस सत्य पर विचार करते हैं कि हमें क्या करना चाहिए और क्या कर रहे हैं? क्या सोचना चाहिए और क्या सोच रहे हैं?

यह बड़ा ही महत्त्वपूर्ण क्रम है। इसी स्तर पर हम अपने स्वयं के चिन्तन तंत्र की विकृतियों व विकारों को पहचानते हैं। उनका भली प्रकार निदान करते हैं। गड़बड़ियाँ कहाँ है- और उनके प्रभाव कहाँ पड़ रहे हैं, आगे कहाँ पड़ने की उम्मीद है। इन सभी बातों पर विचार करते हैं। यह सच है कि निदान सही हो सका तो समाधान की नीति भी सही तय होती है। स्वाध्याय चिकित्सा का तीसरा मुख्य बिन्दु यही है। विचार, भावनाओं, विश्वास, आस्थाओं, मान्यताओं, आग्रहों से समन्वित अपने दृष्टिकोण को ठीक करने की नीति तय करना। इसकी पूरी प्रकिया को सुनिश्चित करना। हम कहाँ से प्रारम्भ करें और किस रीति से आगे बढ़ें। इसकी पूरी विधि- विज्ञान को इस क्रम में बनाना और तैयार करना पड़ता है।

इसके बाद चौथा बिन्दु है, इस विधि- विज्ञान के अनुसार व्यवहार। यानि कि स्वाध्याय को औषधि के रूप में ग्रहण करके स्वयं के परिष्कार का साहसिक कार्य। यह काम ऐसा है, जिसे जुझारू एवं संघर्षशील लोग ही कर पाते हैं। क्योंकि किसी सत्य की वैचारिक स्वीकारोक्ति कर लेना आसान है, पर उसके अनुसार जीवन जीने लगना कठिन है। इसमें आदतों एवं संस्कारों की अनेक बाधाएँ आती हैं। अहंकार अनगिन अवरोध खड़ा करता है। इन्हें दूर करने का एक ही उपाय है हमारी जुझारू एवं साहसिक वृत्ति। जो अपने अहंकार को अपने ही पाँवों के नीचे रौंदने का साहस करते हैं, उनसे बड़ा साहसी इस सृष्टि में और कोई नहीं। सचमुच ही जो अपने को जीतता है, वह महावीर होता है। स्वाध्याय की औषधि का सेवन करने वाले को ऐसा ही साहसी होना पड़ता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ८४

👉 स्वाध्याय, जीवन विकास की एक अनिवार्य आवश्यकता (भाग २)

नित्य ही तो न्यायालयों में देखा जा सकता है कि कोई एक वकील तो धारावाहिक रूप में बोलता और नियमों की व्याख्या करता जाता है और कोई टटोलकर भूलता याद करता हुआ सा कुछ थोड़ा-बहुत बोल पाता है। दोनों वकीलों ने एक समान ही कानून की परीक्षा पास की, उनके अध्ययन का समय भी बराबर रहा, पैसा और परिश्रम भी परीक्षा पास करने में लगभग एक सा ही लगाया और न्यायालयों में पक्ष प्रतिपादन का अधिकार भी समान रूप से ही मिला है- तब यह ध्यानाकर्षण अन्तर क्यों? इस अन्तर का अन्य कोई कारण नहीं एक ही अन्तर है और वह है स्वाध्याय। जो वकील धारावाहिक रूप में बोल कर न्यायालय का वायु-मण्डल प्रभावित कर अपने पक्ष का समर्थन जीत लेता है -वह निश्चय ही बिलाना। घंटों स्वाध्याय का व्रती होगा। इसके विपरीत जो वकील अविश्वासपूर्ण विश्रृंखल प्रतिपादन करता हुआ दिखलाई दे, विश्वास कर लेना चाहिए कि वह स्वाध्याय शील नहीं है।

योंहीं अपनी पिछली योग्यता, स्मृति शक्ति के आधार पर पक्ष प्रतिपादन का असफल प्रयत्न कर रहा है। इस प्रकार के स्वाध्याय हीन वकील अथवा प्रोफेसर अपने काम में सफल नहीं हो पाते और प्रगति की दौड़ में पीछे पड़े हुये घिसटते रहते हैं। उनको अपने पेशे में कोई अभिरुचि नहीं रहती और शीघ्र ही वे उसे छोड़कर भाग जाने की सोचने लगते है।
ऐसे असफल न जाने कितने वकील एवं प्रोफेसर देखने को मिल सकते हैं, जो स्वाध्याय-हीनता के दोष के कारण अपना-अपना स्थान छोड़कर छोटी-मोटी नौकरी में चले गये है। ऐसे विशाल एवं सम्मानित क्षेत्र को अपने अवांछनीय दोष के कारण भाग खड़ा होना मनुष्य के लिए बड़ी लज्जाप्रद असफलता है।

इतना ही नहीं वर्षों पुराने, अनुभवी और मजबूती से जमे हुए अनेक वकील प्रमाद के कारण नये-नये आये हुए वकीलों द्वारा उखाड़ फेंके जाते देखे जा सकते हैं। पुराने लोग अपने विगत स्वाध्याय, जमी प्रेक्टिस, प्रमाणित प्रतिभा और लम्बे अनुभव के अभिमान में आकर यह सोच कर दैनिक स्वाध्याय में प्रमाद करने लगते हैं कि हम तो इस क्षेत्र में महारथी हैं, इस विषय के सर्वज्ञ है, कोई दूसरा हमारे सामने खड़े होने का साहस ही नहीं कर सकता। किन्तु नया आया हुआ वकील नियमपूर्वक अपने विषय का अनुदैनिक स्वाध्याय करता और ज्ञान को व्यापक बनाता और माँजता रहता है। प्रमाद एवं परिश्रम का जो परिणाम होना है, वह दोनों के सामने उसी रूप में आता है। निदान वकील पीछे पड़ जाता है और नया आगे निकल जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च १९६९ पृष्ठ २४



http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/March/v1.24

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 3 Sep 2019


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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