बुधवार, 14 अगस्त 2019

👉 एक ओंकार सतनाम

नानक एक मुसलमान नवाब के घर मेहमान थे। नानक को क्या हिंदू क्या मुसलमान! जो ज्ञानी है, उसके लिए कोई संप्रदाय की सीमा नहीं। उस नवाब ने नानक को कहा कि अगर तुम सच ही कहते हो कि न कोई हिंदू न कोई मुसलमान, तो आज शुक्रवार का दिन है, हमारे साथ नमाज पढ़ने चलो। नानक राजी हो गए। पर उन्होंने कहा कि अगर तुम नमाज पढ़ोगे तो हम भी पढ़ेंगे। नवाब ने कहा, यह भी कोई शर्त की बात हुई? हम पढ़ने जा ही रहे हैं।

पूरा गांव इकट्ठा हो गया। मुसलमान-हिंदू सब इकट्ठे हो गए। हिंदुओं में तहलका मच गया। नानक के घर के लोग भी पहुंच गए कि यह क्या कर रहे हो? लोगों को लगा कि नानक मुसलमान होने जा रहे हैं। लोग अपने भय से ही दूसरों को भी तौलते हैं।

नानक मस्जिद गए। नमाज पढ़ी गई। नवाब बहुत नाराज हुआ। बीच-बीच में लौट-लौट कर देखता था कि नानक न तो झुके, न नमाज पढ़ी। बस खड़े हैं। जल्दी-जल्दी नमाज पूरी की, क्योंकि क्रोध में कहीं नमाज हो सकती है! करके किसी तरह पूरी, नानक पर लोग टूट पड़े। और उन्होंने कहा, तुम धोखेबाज हो। कैसे साधु, कैसे संत! तुमने वचन दिया नमाज पढ़ने का और तुमने की नहीं।

नानक ने कहा, वचन दिया था, शर्त आप भूल गए। कहा था कि अगर आप नमाज पढ़ोगे तो मैं पढूंगा। आपने नहीं पढ़ी तो मैं कैसे पढ़ता?

नवाब ने कहा, क्या कह रहे हो? होश में हो? इतने लोग गवाह हैं कि हम नमाज पढ़ रहे थे।

नानक ने कहा, इनकी गवाही मैं नहीं मानता, क्योंकि मैं आपको देख रहा था भीतर क्या चल रहा है। आप काबुल में घोड़े खरीद रहे थे।

नवाब थोड़ा हैरान हुआ; क्योंकि खरीद वह घोड़े ही रहा था। उसका अच्छे से अच्छा घोड़ा मर गया था उसी दिन सुबह। वह उसी की पीड़ा से भरा था। नमाज क्या खाक! वह यही सोच रहा था कि कैसे काबुल जाऊं, कैसे बढ़िया घोड़ा खरीदूं, क्योंकि वह घोड़ा बड़ी शान थी, इज्जत थी।

और नानक ने कहा, यह जो मौलवी है तुम्हारा, जो पढ़वा रहा था नमाज, यह खेत में अपनी फसल काट रहा था।

और यह बात सच थी। मौलवी ने भी कहा कि बात तो यह सच है। फसल पक गयी है और काटने का दिन आ गया है, गांव में मजदूर नहीं मिल रहे हैं और चिंता मन पर सवार है।

तो नानक ने कहा, अब तुम बोलो, तुमने नमाज पढ़ी जो मैं साथ दूं?

एक ओंकार सतनाम🙏

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 14 Augest 2019




👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 14 August 2019



👉 जमाना तेजी से बदलेगा

हमारा पहला परामर्श यह है कि अब किसी को भी धन का लालच नहीं करना चाहिए और बेटे-पोतों को दौलत छोड़ मरने की विडम्बना में नहीं उलझना चाहिये। यह दोनों ही प्रयत्न सिद्ध होंगे। अगला जमाना जिस तेजी से बदल रहा है उससे इन दानों विडम्बनाओं से कोई कुछ लाभान्वित न हो सकेगा वरन् लोभ और मोह की इस दुष्प्रवृत्ति के कारण सर्वत्र धिक्कार भर जायेगा। दौलत छिन जाने का दुख और पश्चाताप सताएगा सो अलग। इसलिए यह परामर्श हर दृष्टि से सही ही सिद्ध होगा कि मानव जीवन जैसी महान् उपलब्धि का उतना ही अंश खर्च करना चाहिए जितना निर्वाह के लिये अनिवार्य रूप से आवश्यक हो। इस मान्यता को हृदयंगम किये बिना आज की युग पुकार के लिये किसी के लिये कुछ ठोस कार्य कर सकना सम्भव न होगा। एक ओर से दिशा पड़े बिना दूसरी दिशा में चल सकना सम्भव ही न होगा। लोभ-मोह में जो जितना डूबा हुआ होगा उसे लोक मंगल के लिए न समय मिलेगा न सुविधा। सो परमार्थ पक्ष पर चलने वालों को सबसे प्रथम अपने इन दो शत्रुओं को-रावण कुम्भ करण को- कंस, दुर्योधन को निरस्त करना होगा।

यह दो आन्तरिक शत्रु ही जीवन-विभूति को नष्ट करने के सब से बड़े कारण है। सो इनसे निपटने का अन्तिम महाभारत हमें सबसे पहले आरम्भ करना चाहिए। देश के सामान्य नागरिक जैसे स्तर का सादगी और मितव्ययिता पूर्ण जीवन स्तर बनाकर स्वल्प व्यय में गुजारे की व्यवस्था बनानी चाहिए और परिवार को स्वावलम्बी बनाने की योग्यता उत्पन्न करने और हाथ-पाँव से कमाने में समर्थ बना कर उन्हें अपना वजन आप उठा सकने की सड़क पर चला देना चाहिये। बेटे-पोतों के लिये अपनी कमाई की दौलत छोड़ मरना भारत की असंख्य कुरीतियों और दुष्ट परम्पराओं में से एक है। संसार में अन्यत्र ऐसा नहीं होता। लोग अपनी बची हुई कमाई को जहाँ उचित समझते हैं वसीयत कर जाते हैं। इसमें न लड़कों की शिकायत होती है न बाप को कंजूस कृपण को गालियाँ पड़ती है।

सो हम लोगों में से जो विचारशील है, उन्हें तो ऐसा साहस इकट्ठा करना चाहिए। जिनके पास इस प्रकार का ब्रह्म वर्चस न होगा। वे माला सटक कर, पूजा-पत्री उलट-पलट कर मिथ्या आत्म प्रवंचना भले ही करते रहें। वस्तुतः परमार्थ पथ पर एक कदम भी न बढ़ सकेंगे। समय, श्रम, मन और धन का अधिकाधिक समर्पण विश्व-मानव की सेवा को समर्पण कर सकने की स्थिति तभी बनेगी जब लोभ और मोह के खर-दूषण कुछ अवसर मिलने दें लोभ और मोह ग्रस्त को ‘आपापूती’ से ही फुरसत नहीं, बेचारा लोक-मंगल के लिये कहाँ से कुछ निकाल सकेगा और इसके बिना जीवन साधना का स्वरूप ही क्या बन पड़ेगा ? जिनके पास गुजारे भर के लिए पैतृक सम्पत्ति मौजूद है, उनके लिये यही उचित है कि आगे के लिये उपार्जन बिलकुल बन्द कर दें और सारा समय परमार्थ के लिये लगायें। प्रयत्न यह भी होना चाहिए कि सुयोग्य स्त्री-पुरुषों में से एक कमाये घर खर्च चलाये और दूसरे को लोक-मंगल में प्रवृत्त होने की छूट दे दे संयुक्त परिवारों में से एक व्यक्ति विश्व सेवा के लिये निकाला जाय और उसका खर्च परिवार वहन करें। जिनके पास संग्रहित पूँजी नहीं है। रोज कमाते रोज खाते हैं उन्हें भी परिवार का एक अतिरिक्त सदस्य बेटा ‘लोक-मंगल’को मान लेना चाहिए और उसके लिए जितना श्रम समय और धन अन्य परिवारियों पर खर्च होता है उतना तो करना ही चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, जून १९७१, पृष्ठ ५७


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/June/v1.57

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ४८)

👉 मंत्रविद्या असम्भव को सम्भव बनाती हैं

प्रक्रिया की दृष्टि से तो मंत्र की कार्यशैली अद्भुत है। इसकी साधना का एक विशिष्ट क्रम पूरा होते ही यह साधक की चेतना का सम्पर्क ब्रह्माण्ड की विशिष्ट ऊर्जा धारा या देवशक्ति से कर देता है। यह इसके कार्य का एक आयाम है। इसके दूसरे आयाम के रूप में यह साथ ही साथ साधक के अस्तित्व या व्यक्तित्व को उस विशिष्ट ऊर्जाधारा अथवा देव शक्ति के लिए ग्रहणशील बनाता है। इसके लिए मंत्र साधना द्वारा साधक के कतिपय गुह्य केन्द्र जागृत हो जाते हैं। ऐसा होने पर ही वह सूक्ष्म शक्तियों को ग्रहण करने- धारण करने एवं उनका नियोजन करने में समर्थ होता है। ऐसा होने पर ही कहा जाता है कि मंत्र सिद्ध हो गया।

यह मंत्र सिद्धि केवल मंत्र को रटने या दुहराने भर से नहीं मिलती। और यही वजह है कि सालों- साल किसी मंत्र की साधना करने वालों को बुरी तरह से निराश होना पड़ता है। पहले तो उनको कोई फल ही नहीं मिलता और यदि किसी तरह कुछ मिला भी तो वह काफी नगण्य व आधा- अधूरा सा होता है। इस स्थिति के लिए दोष मंत्र का नहीं, स्वयं साधक का है। ध्यान रहे किसी मंत्र की साधना में साधक को मंत्र की प्रकृति के अनुसार अपने जीवन की प्रकृति बनानी पड़ती है। मंत्र साधना के विधि- विधान के सम्यक् निर्वाह के साथ उसे अपने खानपान, वेश- विन्यास, आचरण- व्यवहार देवता या देवी की प्रकृति के अनुसार ढालना पड़ता है। उदाहरण के लिए कहीं तो श्वेत वस्त्र, श्वेत खानपान आवश्यक होते हैं, तो कहीं यह रंग पीला हो जाता है। आचरण- व्यवहार में भी पवित्रता का सम्यक् समावेश जरूरी है।

यदि सब कुछ सही रीति से निभाया जाय तो मंत्र का सिद्ध होना अनिवार्य है। मंत्र सिद्ध होने का मतलब है कि मंत्र की शक्तियों का साधक की चेतना में क्रियाशील हो जाना। यह स्थिति कुछ इसी तरह से है जैसे कि कोई श्रमशील किसान किसी महानदी से पर्याप्त बड़ी नहर खोदकर उसका पानी अपने खेतों तक ले आये। जेसे नदी से नहर आने पर किसान के समूचे क्षेत्र में जलधाराएँ उफनती- उमड़ती रहती हैं। उसी तरह से मंत्र सिद्ध होने पर देव शक्ति का ऊर्जा प्रवाह हर पल- हर क्षण साधक की अन्तर्चेतना में उफनता- उमड़ता रहता है। इसका वह मनचाहे ढंग से अपने संकल्प के अनुसार नियोजन कर सकता है। मंत्र की शक्ति व प्रकृति के अनुसार वह असाध्य बीमारियों को ठीक कर सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ६८

👉 Awakening Divinity in Man (Part 1)

Let us begin with the Gayatri mantra:

“Om bhur bhuva¡ swah tatsaviturvarenyan bhargo devasya dhimahi dhiyo yonah pracodayat”

You all must have heard of the grace of God. His manifestations are called “devata” (deity) in the Vedas; devata means “one who gives”.  Many of us pray and worship the deities because we either want something or we need help in adverse moments. Let us discuss about deities.

There is no doubt that deities do bless us enormously; otherwise they would not have been named as “deities” because by definition deities always give something. There is nothing wrong or unnatural if one requests something from someone who always wants to give. But what do deities give? They give only what they themselves possess. Naturally, one can give only what one has. Deities have only one thing – divinity (devatva). Divinity is the most refined and virtuous form of one’s nature, conduct, qualities and deeds. Deities bestow divinity upon the devotees and become relieved, saying that, “we have given you the best we could; now it is up to you to accept and make use of it in the way you find it suitable and succeed accordingly.”

There is one thing in the world that indeed yields commendable success and that is excellence of personality. It is the minimum requirement to achieve anything worthwhile and fulfilling. If one has somehow gained something despite having an inferior personality and without demonstrating his talents, hard work and essential qualities, then his success will be short lived and incomplete. If your digestive system is weak then an overdose of eatables is sure to create problems and upset your health. Similarly, if you don’t have wisdom and the ability to make proper use of the resources, facilities and prosperities available to you, then these would trouble you in one way or the other. If there is a lack of virtues and saneness then your inherited or inappropriately earned wealth will act as a catalyst for your evils and weaknesses; these would nurture improper addictions, enhance your ego and sooner or later ruin your life.

.....to be continue

सोमवार, 12 अगस्त 2019

संकल्प जगायें ऊँचे उठें | Studying the Self-life & its Significance | Pt...



Title

Gayatri Ka Jaap Karo | गायत्री का जाप करो | Pragya Bhajan Sangeet



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👉 चरित्र-रक्षा के लिये बलिदान

राजनर्तकी मुदाल के सौंदर्य की ख्याति पूर्णमासी के चन्द्रमा की तरह सारे उरु प्रदेश में फैली हुई थी। उसे पाने के लिए राजधानी के बड़े-बड़े सामंतों, विद्वानों, प्रचारकों तथा राज घराने तक के लोगों में कुचक्र चल रहा था। ठीक उसी समय मुदाल अपने बिस्तर पर लेटी अपने और राष्ट्र के भविष्य पर विचार कर रही थी।

देश के कर्णधार मार्गदर्शक और प्रभावशाली लोग ही चरित्र भ्रष्ट हो गये तो फिर सामान्य प्रजा का क्या होगा ? अभी वह इस चिन्ता में डूबी थी कि किसी ने द्वार पर दस्तक दी- मुदाल ने दरवाजा खोला तो सामने खड़े महाराज करुष को देखते ही स्तम्भित रह गई। इस समय आने का कारण महाराज! न चाहते हुए भी मुदाल को प्रश्न करना पड़ा।

बड़ा विद्रूप उत्तर मिला- मुदाल! तुम्हारे रूप और सौंदर्य पर सारा उरु प्रदेश मुग्ध है। त्यागी, तपस्वी तुम्हारे लिए सर्वस्व न्यौछावर कर सकते हैं, फिर मेरे ही यहाँ आने का कारण क्यों पूछती हो भद्रे!

महाराज! सामान्य प्रजा की बात आप छोड़िये। आप इस देश के कर्णधार है, प्रजा मार्ग भ्रष्ट हो जाये तो उसे सुधारा भी जा सकता है पर यदि समाज के शीर्षस्थ लोग ही चरित्र भ्रष्ट हो जाये तो वह देश खोखला हो जाता है, ऐसे देश, ऐसी जातियाँ अपने अस्तित्व की रक्षा भी नहीं कर पाती महाराज! इसीलिये आपका इस समय यहाँ आना, अशोभनीय ही नहीं, सामाजिक अपराध भी है।

किसी ने सच कहा है अधिकार और अहंकार मनुष्य के दो प्रबल शत्रु है। वह जिस अन्तः करण में प्रवेश कर जाते हैं उसमें उचित और अनुचित के विचार की शक्ति भी नहीं रह पाती। मुदाल के यह सीधे-साधे शब्द करुष को बाण की तरह चुभे। वे तड़प कर बोले- मुदाल हम तुम्हारा उपदेश सुनने नहीं आये, तुम एक नर्तकी हो और शरीर का सौदा तुम्हारा धर्म है। कीमत माँग सकती हो, धर्म क्या है, अधर्म क्या है ? यह सोचना तुम्हारा काम नहीं है।

नर्तकी भर होते तब तो आपका कथन सत्य था महाराज! मुदाल की गंभीरता अब दृढ़ता और वीरोचित स्वाभिमान में बदल रही थी - किन्तु हम मनुष्य भी है और मनुष्य होने के नाते समाज के हित, अहित की बात सोचना भी हमारा धर्म है। हम सत्ता को दलित करके अपने देशवासियों को मार्ग-भ्रष्ट करने का पाप अपने सिर कदापि नहीं ले सकते।

स्थिति बिगड़ते देखकर महाराज करुष ने बात का रुख बदल दिया। पर वे अब भी इस बात को तैयार नहीं थे कि साधारण नर्तकी उनकी वासना का दमन कर जाये और मुदाल का कहना था कि विचारशील और सत्तारूढ़ का पाप सारे समाज को पापी बना देता है। इसलिये चरित्र को वैभव के सामने झुकाया नहीं जा सकता। मुदाल ने बहुत समझाया पर महाराज का रौद्र कम न हुआ। स्थिति अनियंत्रित होते देखकर मुदाल ने कहा- महाराज यदि आप साधिकार चेष्टा करना ही चाहते हैं तो तीन दिन और रुके, मैं रजोदर्शन की स्थिति में हूँ आज से चौथे दिन आप मुझे “चैत्य सरोवर” के समीप मिलें, आपको यह शरीर वही समर्पित होगा।

तीन दिन करुष ने किस तरह बिताये यह वही जानते होगे। चौथे दिन चन्द्रमा के शीतल प्रकाश में अगणित उपहारों के साथ महाराज करुष जब चैत्य विहार पहुँचे तो वहाँ जाकर उन्होंने जो कुछ देखा उससे उनकी तृष्णा और कामुकता स्तब्ध रह गई। मुदाल का शरीर तो वहां उपस्थित था पर उसमें जीवन नहीं था। एक पत्र पास ही पड़ा हुआ था - सौंदर्य राष्ट्र के चरित्र से बढ़कर नहीं चरित्र की रक्षा के लिये यदि सौंदर्य का बलिदान किया जा सकता है तो उसके लिए मैं सहर्ष प्रस्तुत हूँ शव देखने से लगता था मुदाल ने विषपान कर लिया है।

मुदाल के बलिदान ने करुष की आंखें खोल दी। उस दिन से वे आत्म-सौंदर्य की साधना में लग गये।

📖 अखण्ड ज्योति 1971 फरवरी पृष्ठ 44

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/February/v1.44

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 12 Augest 2019




👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 12 August 2019



👉 परिजनों को परामर्श

अपना विशाल परिवार हमने एक ही प्रयोजन के लिये बनाया और सींचा है कि विश्व-मानव की अन्तर्वेदना हलकी करने में और रुदन, दरिद्र, जलन से बचाने के लिये कुछ योगदान सम्भव हो सके, पेट और प्रजनन की कृमि कीटकों जैसी सड़न से ही हम सब बहुमूल्य जिन्दगी न बिता डालें वरन् कुछ ऐसे हो जो जीवनोद्देश्य को समझें और उसे पूरा करने के लिये अपनी विभूतियों और सम्पत्तियों का एक अंश अनुदान दे सकने में तत्पर हो सकें। उच्च आदर्शों पर चल कर विश्व के भावनात्मक नव-निर्माण की दृष्टि से ही हमने अपना विशाल परिवार बनाया। यों दुख कष्ट से पीड़ितों की सहायता के लिए हमारे पास जो कुछ था उसे देते रहे पर उसका प्रयोजन विवेकहीन तथा कथित दानियों द्वारा लोगों की तृष्णा भड़काना स्वल्प प्रयत्न में अधिक लाभ उठाने की दुष्प्रवृत्ति जगाना एवं भिक्षा-वृत्ति का अभ्यस्त बनाना नहीं था। सिद्ध पुरुष हमें संयोग ने ही बना दिया, मनोकामना पूर्ण करने की बात अनायास ही हमारे ऊपर लग पाई वस्तुतः हम लोक मानस में उत्कृष्टता की वृष्टि करने वाले एक संदेश वाहक के रूप में ही आये और जिये। परिवार भी अपने मूल प्रयोजन के लिये ही बनाया।

अपने इस हरे-भरे उद्यान परिवार के फले-फूले परिजन वट-वृक्षों से हम कुछ आशा अपेक्षा रखें तो उसे अनुचित नहीं कहा जाना चाहिए उनके लिए कुछ भाव भरा संदेश प्रस्तुत करें तो इसे उचित ओर उपयुक्त ही माना जना चाहिए। हमारा प्रत्येक परिजन को बहुत ही मार्मिक और दूर-दर्शिता भरा परामर्श हैं, उन्हें गम्भीरता पूर्वक लिया जाना चाहिए उन पर चिंतन−मनन किया जाना चाहिए और यदि वे उचित जंचे तो तद्नुकूल अपनी मनोभूमि एवं क्रिया-पद्धति में ढालने के लिए विचार किया जाना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, जून १९७१, पृष्ठ ५७

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/June/v1.57

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ४७)

👉 मंत्रविद्या असम्भव को सम्भव बनाती हैं

मंत्र चिकित्सा अध्यात्म विद्या का महत्त्वपूर्ण आयाम है। इसके द्वारा असाध्य रोगों को ठीक किया जा सकता है। कठिनतम परिस्थितियों पर विजय पायी जा सकती है। व्यक्तित्व की कैसी भी विकृतियाँ व अवरोध दूर किये जा सकते हैं। अनुभव कहता है कि मंत्र विद्या से असम्भव- सम्भव बनता है, असाध्य सहज साध्य होता है। जो इस विद्या के सिद्धान्त एवं प्रयोगों से परिचित हैं वे प्रकृति की शक्तियों को मनोनुकूल मोड़ने में समर्थ होते हैं। प्रारब्ध उनके वशवर्ती होता है। जीवन की कर्मधाराएँ उनकी इच्छित दिशा में मुड़ने और प्रवाहित होने के लिए विवश होती हैं। इन पंक्तियों को पाठक अतिशयोक्ति समझने की भूल न करें। बल्कि इसे विशिष्ट साधकों की कठिन साधना का सार निष्कर्ष मानें।

मंत्र है क्या? तो इसके उत्तर में कहेंगे- ‘मननात् त्रायते इति मंत्रः’ जिसके मनन से त्राण मिले। यह अक्षरों का ऐसा दुर्लभ एवं विशिष्ट संयोग है, जो चेतना जगत् को आन्दोलित, आलोड़ित एवं उद्वेलित करने में सक्षम होता है। कई बार बुद्धिशील व्यक्ति मंत्र को पवित्र विचार के रूप मं परिभाषित करते हैं। उनका ऐसा कहना- मानना गलत नहीं है। उदाहरण के लिए गायत्री महामंत्र सृष्टि का सबसे पवित्र विचार है। इसमें परमात्मा से सभी के लिए सद्बुद्धि एवं सन्मार्ग की प्रार्थना की गयी है। लेकिन इसके बावजूद इस परिभाषा की सीमाएँ सँकरी हैं। इसमें मंत्र के सभी आयाम नहीं समा सकते। मंत्र का कोई अर्थ हो भी सकता है और नहीं भी। यह एक पवित्र विचार हो भी सकता है और नहीं भी। कई बार इसके अक्षरों का संयोजन इस रीति से होता है कि उससे कोई अर्थ प्रकट होता है और कई बार यह संयोजन इतना अटपटा होता है कि इसका कोई अर्थ नहीं खोजा जा सकता।

दरअसल मंत्र की संरचना किसी विशेष अर्थ या विचार को ध्यान में रख कर की नहीं जाती। इसका तो एक ही मतलब है- ब्रह्माण्डीय ऊर्जा की किसी विशेष धारा से सम्पर्क, आकर्षण, धारण और उसके सार्थक नियोजन की विधि का विकास है। मंत्र कोई भी हो वैदिक अथवा पौराणिक या फिर तांत्रिक इसी विधि के रूप में प्रयुक्त होते हैं। इस क्रम में यह भी ध्यान रखने की बात है कि मंत्र की संरचना या निर्माण कोई बौद्धिक क्रियाकलाप नहीं है। कोई भी व्यक्ति भले ही कितना भी प्रतिभावान् या बुद्धिमान क्यों न हो, वह मंत्रों की संरचना नहीं कर सकता। यह तो तप साधना के शिखर पर पहुँचे सूक्ष्म दृष्टाओं व दिव्यदर्शियों का काम है।

ये महासाधक अपनी साधना के माध्यम से ब्रह्माण्डीय ऊर्जा की विभिन्न व विशिष्ट धाराओं को देखते हैं। इनकी अधिष्ठातृ शक्तियाँ जिन्हें देवी या देवता कहा जाता है, उन्हें प्रत्यक्ष करते हैं। इस प्रत्यक्ष के प्रतिबिम्ब के रूप में मंत्र का संयोजन उनकी भावचेतना में प्रकट होता है। इसे ऊर्जाधारा या देवशक्ति का शब्द रूप भी कह सकते हैं। मंत्र विद्या में इसे देव शक्ति का मूल मंत्र कहते हैं। इस देवशक्ति के ऊर्जा अंश के किस आयाम को और किस प्रयोजन के लिए ग्रहण- धारण करना है उसी के अनुरूप इस देवता के अन्य मंत्रों का विकास होता है। यही कारण है कि एक देवता या देवी के अनेकों मंत्र होते हैं। यथार्थ में इनमें से प्रत्येक मंत्र अपने विशिष्ट प्रयोजन को सिद्ध व सार्थक करने में समर्थ होते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ६७

👉 Solving Life’s Problems - Last Part

I got her a job in a florist shop so she could earn her living working with flowers. She loved it. She said she would do it for nothing. But we used the other things too. Remember, she needed more than just a livelihood. She needed other things. The swimming became her exercise. It fits in with sensible living habits. The piano playing became her path of service. She went to a retirement home and played the old songs for the people there. She got them to sing, and she was good at that. Out of those three things such a beautiful life was built for that woman. She became a very attractive woman and married a year or so later.. She stayed right in that life pattern.

I knew another woman who was confined to her room and had been there for quite some time. I went in to see her and I could tell immediately from the lines in her face and her tenseness that it wasn’t physical at all. And I don’t think I had talked to her for more than five minutes before she was telling me all about how mean her sister had been to her. The way she told it, I knew she had told that story again and again and mulled over in her mind constantly that bitterness against her sister. I found myself explaining to her that if she would forgive, ask forgiveness, and make peace with her sister, then she could look for an improvement in her health. “Huh!” she said. “I’d rather die. You have no idea how mean she was.” So the situation drifted for a while.
To be continued...

But early one morning at dawn this woman wrote a beautiful and inspired letter to her sister, which she showed to me. (There is something very wonderful to be said about dawn. Sunset is good, too. The only thing is, at sunset almost everybody is awake and they’re hurrying and scurrying around. At dawn, mostly everybody is slowed down or asleep and they are much more harmonious when they’re asleep. So dawn is often a good time for spiritual things.) I immediately went into town and mailed the letter before she could change her mind. When I got back, she had changed her mind — so it’s a good thing I had mailed it! She worried a little, but by return mail came a letter from her sister, and her sister was so glad they were to be reconciled. And, you know, on the same day that letter arrived from her sister the woman was up and around and out of bed, and the last I saw of her she was joyously off for a reconciliation with her sister.

There’s something to that old saying that hate injures the hater, not the hated.

...End...
📖 From Akhand Jyoti

शनिवार, 10 अगस्त 2019

👉 संस्कार

सन्तोष मिश्रा जी के यहाँ पहला लड़का हुआ तो पत्नी ने कहा, "बच्चे को गुरुकुल में शिक्षा दिलवाते है, मैं सोच रही हूँ कि गुरुकुल में शिक्षा देकर उसे धर्म ज्ञाता पंडित योगी बनाऊंगी।"

सन्तोष जी ने पत्नी से कहा, "पाण्डित्य पूर्ण योगी बना कर इसे भूखा मारना है क्या!! मैं इसे बड़ा अफसर बनाऊंगा ताकि दुनिया में एक कामयाबी वाला इंसान बने।।"

संतोष जी सरकारी बैंक में मैनेजर के पद पर थे! पत्नी धार्मिक थी और इच्छा थी कि बेटा पाण्डित्य पूर्ण योगी बने, लेकिन सन्तोष जी नहीं माने।

दूसरा लड़का हुआ पत्नी ने जिद की, सन्तोष जी इस बार भी ना माने, तीसरा लड़का हुआ पत्नी ने फिर जिद की, लेकिन सन्तोष जी एक ही रट लगाते रहे, "कहां से खाएगा, कैसे गुजारा करेगा, और नही माने।"

चौथा लड़का हुआ, इस बार पत्नी की जिद के आगे सन्तोष जी हार गए, और अंततः उन्होंने गुरुकुल में शिक्षा दीक्षा दिलवाने के लिए वही भेज ही दिया।

अब धीरे धीरे समय का चक्र घूमा, अब वो दिन आ गया जब बच्चे अपने पैरों पे मजबूती से खड़े हो गए, पहले तीनों लड़कों ने मेहनत करके सरकारी नौकरियां हासिल कर ली, पहला डॉक्टर, दूसरा बैंक मैनेजर, तीसरा एक गोवरमेंट कंपनी मेें जॉब करने लगा।

एक दिन की बात है सन्तोष जी  पत्नी से बोले, "अरे भाग्यवान! देखा, मेरे तीनो होनहार बेटे सरकारी पदों पे हो गए न, अच्छी कमाई भी कर रहे है, तीनो की जिंदगी तो अब सेट हो गयी, कोई चिंता नही रहेगी अब इन तीनो को। लेकिन अफसोस मेरा सबसे छोटा बेटा गुुुरुकुल का आचार्य बन कर घर घर यज्ञ करवा रहा है, प्रवचन कर रहा है! जितना वह छ: महीने में कमाएगा उतना मेरा एक बेटा एक महीने में कमा लेगा, अरे भाग्यवान! तुमने अपनी मर्जी करवा कर बड़ी गलती की, तुम्हे भी आज इस पर पश्चाताप होता होगा, मुझे मालूम है, लेकिन तुम बोलती नही हो"।

पत्नी ने कहा, "हम मे से कोई एक गलत है, और ये आज दूध का दूध पानी का पानी हो जाना चाहिए, चलो अब हम परीक्षा ले लेते है चारों की, कौन गलत है कौन सही पता चल जाएगा।।"

दूसरे दिन शाम के वक्त पत्नी ने बाल बिखरा, अपनी साड़ी का पल्लू फाड़ कर और चेहरे पर एक दो नाखून के निशान मार कर आंगन मे बैठ गई और पतिदेव को अंदर कमरे मे छिपा दिया ..!!

बड़ा बेटा आया पूछा, "मम्मी क्या हुआ?"
माँ ने जवाब दिया, "तुम्हारे पापा ने मारा है!"
पहला बेटा :- "बुड्ढा, सठिया गया है क्या ? कहां है ? बुलाओतो जरा।।"
माँ ने कहा, "नही है , बाहर गए है!"
पहला बेटा - "आए तो मुझे बुला लेना, मैं कमरे मे हूँ, मेरा खाना निकाल दो मुझे भूख लगी है!"

ये कहकर कमरे मे चला गया।

दूसरा बेटा आया पूछा तो माँ ने वही जवाब दिया,
दूसरा बेटा : "क्या पगला गए है इस बुढ़ापे मे, उनसे कहना चुपचाप अपनी बची खुची गुजार ले, आए तो मुझे बुला लेना और मैं खाना खाकर आया हूँ सोना है मुझे, अगर आये तो मुझे अभी मत जगाना, सुबह खबर लेता हूँ उनकी।।",

ये कह कर वो भी अपने कमरे मे चला गया।

तीसरा बेटा आया पूछा तो आगबबूला हो गया, "इस बुढ़ापे मे अपनी औलादो के हाथ से जूते खाने वाले काम कर रहे है! इसने तो मर्यादा की सारी हदें पार कर दीं।"
यह कर वह भी अपने कमरे मे चला गया।।

संतोष जी अंदर बैठे बैठे सारी बाते सुन रहे थे, ऐसा लग रहा था कि जैसे उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई हो, और उसके आंसू नही रुक रहे थे, किस तरह इन बच्चो के लिए दिन रात मेहनत करके पाला पोसा, उनको बड़ा आदमी बनाया, जिसकी तमाम गलतियों को मैंने नजरअंदाज करके आगे बढ़ाया! और ये ऐसा बर्ताव, अब तो बर्दाश्त ही नहीं हो रहा.....

इतने मे चौथा बेटा घर मे ओम् ओम् ओम् करते हुए अंदर आया।।

माँ को इस हाल मे देखा तो भागते हुए आया, पूछा, तो माँ ने अब गंदे गंदे शब्दो मे अपने पति को बुरा भला कहा तो चौथे बेटे ने माँ का हाथ पकड़ कर समझाया कि "माँ आप पिताजी की प्राण हो, वो आपके बिना अधूरे हैं,---अगर पिता जी ने आपको कुछ कह दिया तो क्या हुआ, मैंने पिता जी को आज तक आपसे बत्तमीजी से बात करते हुए नही देखा, वो आपसे हमेशा प्रेम से बाते करते थे, जिन्होंने इतनी सारी खुशिया दी, आज नाराजगी से पेश आए तो क्या हुआ, हो सकता है आज उनको किसी बात को लेकर चिंता रही हो, हो ना हो माँ ! आप से कही गलती जरूर हुई होगी, अरे माँ ! पिता जी आपका कितना ख्याल रखते है, याद है न आपको, छ: साल पहले जब आपका स्वास्थ्य ठीक नही था,  तो पिता जी ने कितने दिनों तक आपकी सेवा कीे थी, वही भोजन बनाते थे, घर का सारा काम करते थे, कपड़े धोते थे, तब आपने फोन करके मुझे सूचना दी थी कि मैं संसार की सबसे भाग्यशाली औरत हूँ, तुम्हारे पिता जी मेरा बहुत ख्याल करते हैं।"

इतना सुनते ही बेटे को गले लगाकर फफक फफक कर रोने लगी, सन्तोष जी आँखो मे आंसू लिए सामने खड़े थे।

"अब बताइये क्या कहेंगे आप मेरे फैसले पर", पत्नी ने संतोष जी से पूछा।

सन्तोष जी ने तुरन्त अपने बेटे को गले लगा लिया, !

सन्तोष जी की धर्मपत्नी ने कहा, "ये शिक्षा इंग्लिश मीडियम स्कूलो मे नही दी जाती। माँ-बाप से कैसे पेश आना है, कैसे उनकी सेवा करनी है। ये तो गुरुकुल ही सिखा सकते हैं जहाँ वेद गीता रामायण जैसे ग्रन्थ पढाये जाते हैैं संस्कार दिये जाते हैं।

अब सन्तोष जी को एहसास हुआ- जिन बच्चो पर लाखो खर्च करके डिग्रीया दिलाई वे सब जाली निकले, असल में ज्ञानी तो वो सब बच्चे है, जिन्होंने जमीन पर बैठ कर पढ़ा है, मैं कितना बड़ा नासमझ था, फिर दिल से एक आवाज निकलती है, काश मैंने चारो बेटो को गुरुकुल में शिक्षा दीक्षा दी होती।

मातृमान पितृमान आचार्यावान् पुरुषो वेद:।।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 10 August 2019




👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 10 Augest 2019



👉 हम बदलेंगे युग बदलेगा

बड़े आदमी बनने की हविस और ललक स्वभावतः हर मनुष्य में भरी पड़ी है। उसके लिये किसी को सिखाना ही पड़ता। धन, पद, इन्द्रिय सुख, प्रशंसा, स्वास्थ्य आदि कौन नहीं चाहता? वासना और तृष्णा की पूर्ति में कौन व्याकुल नहीं है? पेट और प्रजनन के लिये किसका चिंतन योचित नहीं है। अपने परिवार को हमने बड़े आदमियों के समूह बनाने की बात कभी नहीं सोची। उसे महापुरुषों का देव समाज देखने की ही अभिलाषा सदा से रही वस्तुतः महा मानव बनना ही व्यक्तिगत जीवन का संकल्प और समाज का सौभाग्य माना जा सकता है। मनुष्य जीवन की सार्थकता महा मानव बनने में है। इसके अतिरिक्त आज की परिस्थितियां महा मानवों की इतनी आवश्यकता अनुभव करती है कि उन्हीं के लिये सर्वत्र त्राहि-त्राहि मची हुई है। हर क्षेत्र उन्हीं के अभाव में वीरान और विकृत हो रहा है ओछे स्तर के- बड़प्पन के भूखे लोग बरसाती उद्भिजों की तरह अहर्निश बढ़ते चले जा रहे हैं पर महामानवों की उद्भव स्थली सूनी पड़ी है। गीदड़ों के झुण्ड बढ़ चले पर सिंहों की गुफाएं सुनसान होती चली जा रही है। इस युग की सब से बड़ी आवश्यकता महामानवों का उद्भव होना ही है। वे बढ़ने तो ही विश्व के हर क्षेत्र में संव्याप्त उलझनों और शोक सन्तापों का समाधान होगा। अपने परिवार का गठन हमने इसी प्रयोजन के लिये किया था इस खान से नर रत्न निकले और विश्व इतिहास का एक नया अध्याय आरम्भ करें। युग-परिवर्तन जैसे महान् अभियान को उथले स्तर के व्यक्तियों द्वारा नहीं केवल उन्हीं लोगों से सम्पन्न किया जा सकता है जिनको महापुरुषों की श्रेणी में खड़ा किया जा सके।

हर विभूति कुछ मूल्य देकर खरीदी जाती है। उपहार पाने के लिये भी पात्रता उत्पन्न करनी पड़ती है। समय आ गया कि अपने विशाल परिवार के सामने उन प्रयोगों को प्रस्तुत करें जो आत्मबल सम्पन्न तथा लोक निर्माण में समर्थ व्यक्तियों के लिये अनिवार्य रूप से आवश्यक है। हमने अपनी जीवन साधना में इन तत्वों का समावेश किया और मंजिल की एक सन्तोष जनक लम्बाई पार कर चुके। अपने हर अनुयायी से इस अवसर पर यही अनुरोध कर सकते हैं कि जितना अधिक सम्भव हो इसी मार्ग पर कदम बढ़ायें जिस पर हम चलते रहे है। महामानव बनने के लिए जिन त्याग बलिदानोँ का मूल्य चुकाना पड़ता है आत्म परिष्कार का जो प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है, उसी की चर्चा यहाँ कर रहे है।

हम अपने जीवन का भावी कार्यक्रम निर्धारित कर चुके है, अपनी धर्म-पत्नी को एक निश्चित कार्य-पद्धति में जुटा दिया। हमारे साथ चल सकने की हिम्मत जिनने दिखाई उन्हें बुला कर युग-निर्माण योजना में जुटा दिया। गायत्री तपोभूमि में एक ऐसी टीम छोड़ दी जो हमारे संगठनात्मक, प्रचारात्मक, रचनात्मक और संघर्षात्मक मोर्चों पर समर्थ चतुरंगिणी की तरह लड़ती रहेगा। अब हमारा विशाल परिवार ही शेष रह गया है जिसे कुछ अन्तिम निर्देश देकर जाना है। कितने व्यक्ति कहते रहते हैं कि हम आपके साथ हिमालय चलेंगे। उनसे यही कहना है कि वे आदर्शों के हिमालय पर उसी तरह चढ़ें जिस तरह हम जीवन भर चढ़ते रहे। तपश्चर्या का मार्ग अति कठिन है। हमारी हिमालय यात्रा काश्मीर की सैर नहीं है जिसका मजा लूटने हर कोई विस्तार बाँधकर चलदे। उसकी पात्रता उसी में हो सकती है। जिसने आदर्शों के हिमालय पर चढ़ने की प्राथमिक पात्रता एकत्रित कर ली। सो हम अपने हर अनुयायी से अनुरोध करते रहे है और अब अधिक कहें और अधिक सजीव शब्दों में अनुरोध करते हैं कि वे बड़प्पन की आकाँक्षा को बदल कर महानता की आराधना शुरू करदें। यह युग परिवर्तन का शुभारम्भ है जो हमारे परिजनों को तो आरम्भ कर देना चाहिए। हम बदलेंगे युग बदलेगा’ का नारा-हमें अपने व्यक्तिगत जीवन कि विचार पद्धति और कार्य-प्रणाली में आमूल चूल परिवर्तन प्रस्तुत करके सार्थक बनाना चाहिए। निःसन्देह अपने परिवार में इस प्रकार का बदलाव यदि आ जाये तो फिर कोई शक्ति युग-परिवर्तन एवं नव-निर्माण को सफल बनाने में बाधक न हो सकेंगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, जून १९७१, पृष्ठ ५६

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/June/v1.56

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