गुरुवार, 25 जुलाई 2019

👉 प्याले में समुद्र:-

यूनानी दार्शनिक सुकरात समंदर के किनारे टहल रहे थे। उनकी नजर रेत पर बैठे एक अबोध बालक पर पड़ी, जो रो रहा था। सुकरात ने रोते हुए बालक का सिर सहलाते हुए उससे रोने का कारण पूछा। बालक ने कहा, ‘यह जो मेरे हाथ में प्याला है, इसमें मैं समुद्र के सारे पानी को भरना चाहता हूं, किंतु यह मेरे प्याले में समाता ही नहीं।’ बालक की बात सुनकर सुकरात की आंखों में आंसू आ गए।

सुकरात को रोता देख, रोता हुआ बालक शांत हो गया और चकित होकर पूछने लगा, ‘आप भी मेरी तरह रोने लगे, पर आपका प्याला कहां है?’ सुकरात ने जवाब दिया, ‘बच्चे, तू छोटे से प्याले में समुद्र भरना चाहता है, और मैं अपनी छोटी सी बुद्धि में संसार की तमाम जानकारियां भरना चाहता हूं।’ बालक को सुकरात की बातें कितनी समझ में आईं यह तो पता नहीं, लेकिन दो पल असमंजस में रहने के बाद उसने अपना प्याला समंदर में फेंक दिया और बोला, ‘सागर यदि तू मेरे प्याले में नहीं समा सकता, तो मेरा प्याला तो तेरे में समा सकता है।’

बच्चे की इस हरकत ने सुकरात की आंखें खोल दीं। उन्हें एक कीमती सूत्र हाथ लग गया था। सुकरात ने दोनों हाथ आकाश की ओर उठाकर कहा, ‘हे परमेश्वर, आपका असीम ज्ञान व आपका विराट अस्तित्व तो मेरी बुद्धि में नहीं समा सकता, किंतु मैं अपने संपूर्ण अस्तित्व के साथ आपमें जरूर लीन हो सकता हूं।’

दरअसल, सुकरात को परमात्मा ने बालक के माध्यम से ज्ञान दे दिया। जिस सुकरात से मिलने के लिए बड़े-बड़े विद्वानों को समय लेना पड़ता था, उसे एक अबोध बालक ने परमात्मा का मार्ग बता दिया था। असलियत में परमात्मा जब आपको अपनी शरण में लेता है, यानि जब आप ईश्वर की कृपादृष्टि के पात्र बनते हैं तो उसकी एक खास पहचान यह है कि आपके अंदर का ‘मैं’ मिट जाता है। आपका अहंकार ईश्वर के अस्तित्व में विलीन हो जाता है।

‘मैं-पन’ का भाव छूटते ही हमारे समस्त प्रकार के पूर्वाग्रह, अपराधबोध, तनाव, व्यग्रता और विकृतियों का ईश्वरीय चेतना में रूपांतरण हो जाता है। दरअसल, हरेक व्यक्ति को कई बार अपने जीवन में परमात्मा की अनुभूति होती है। जितना हमारा जीवन सहज-सरल, व पावन-पवित्र होता जाता है, उतना ही परमात्मा प्रसाद-स्वरूप हमारे जीवन में समाहित होता जाता है।

👉 आज का सद्चिंतन 25 July 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 July 2019


👉 काया से नहीं, प्राणों से प्यार करें:-

जो हमें प्यार करता हो, उसे हमारे मिशन से भी प्यार करना चाहिए। जो हमारे मिशन की उपेक्षा, तिरस्कार करता है लगता है वह हमें ही उपेक्षित-तिरस्कृत कर रहा है। व्यक्तिगत रूप से कोई हमारी कितनी ही उपेक्षा करे, पर यदि हमारे मिशन के प्रति श्रद्धावान् है, उसके लिए कुछ करता, सोचता है तो लगता है मानो हमारे ऊपर अमृत बिखेर रहा है और चंदन लेप रहा है। किंतु यदि केवल हमारे व्यक्तित्त्व के प्रति ही श्रद्धा है, शरीर से ही मोह है, उसी की प्रशस्ति पूजा की जाती है और मिशन की बात उठाकर ताक पर रख दी जाती है तो लगता है हमारे प्राण का तिरस्कार करते हुए केवल शरीर पर पंखा ढुलाया जा रहा हो।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, अगस्त १९६९, पृष्ठ ९, १०

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग 36)

👉 आध्यात्मिक निदान- पंचक

आध्यात्मिक चिकित्सक के रूप में परम पूज्य गुरुदेव इन सभी प्रक्रियाओं में निष्णात व मर्मज्ञ थे। आध्यात्मिक निदान पंचक में उनकी विशेषज्ञता का पास रहने वालों को नित्यप्रति अनुभव होता था। यूं तो इस तरह के अनुभव एवं घटनाएँ तो हजारों हैं, पर यहाँ केवल एक घटना का उल्लेख किया जा रहा है। यह घटना एक ऐसे व्यक्ति से सम्बन्धित है जो गुरुदेव से वर्षों से जुड़ा हुआ था। वर्षों के सान्निध्य के बाजवूद उसका घर- परिवार रोग- शोक से घिरा था। आर्थिक स्थिति भी विपन्न थी। जब भी वह गुरुदेव के पास आता, अपनी परेशानी कहते हुए रोने लगता। गुरुदेव भी उसके दुःख से द्रवित हो जाते। कभी- कभी तो उनके आँसू भी छलक आते। यह भी कहते तुम परेशान न हो बेटा मैं तुम्हारे लिए प्रयास कर रहा हूँ। पर उनके इस कथन एवं आश्वासन के बावजूद उसके जीवन में कहीं कोई अच्छा होने के लक्षण नहीं नजर आ रहे थे।

हार- थक कर एक दिन वह प्रयाग चला गया। वहाँ कुम्भ मेला लगा हुआ था। अनेकों सन्त- महात्मा यहाँ आए हुए थे। एक स्थान पर देवरहा बाबा का भी मचान लगा हुआ था। परेशान तो वह था ही। इस परेशानी को ओढ़े हुए वह उनके पास गया। उसे देखकर पहले तो उन्होंने आशीर्वाद का हाथ उठाया। फिर स्वयं ही बोले- तुम्हारा नाम रामनारायण है, फतेहपुर के रहने वाले हो, शान्तिकुञ्ज के आचार्य जी के शिष्य हो। अच्छा मेरे पास आओ। और उन्होंने भीड़ में से उसे बुलाकर अपना चरण उसके माथे पर रखा और कहा तुम इतने हैरान क्यों हों, तुम्हारे ऊपर आचार्य जी की कृपा है। तुम नहीं जानते कि वह बिना कुछ कहे तुम्हारे लिए क्या कुछ कर रहे हैं।

यह कहते हुए वह थोड़ा रुके और बोले- तुम्हारे संस्कार, प्रारब्ध एवं पूर्वजन्म के कर्म भयावह हैं। अगर आचार्य जी की कृपा न होती तो तुम्हारा सभी कुछ तिनका- तिनका बिखर गया होता। न तुम बचते और न तुम्हारा परिवार। अब तक सब कुछ समाप्त हो चुका होता। आचार्य श्री दिव्य द्रष्टा हैं, वह सब कुछ जानते हैं और उचित उपाय कर रहे हैं। तुम सोचो कि तुम्हारे ऊपर उनका इतना स्नेह है कि अभी थोड़ी देर पहले वह सूक्ष्म रूप से हमारे पास आए थे, और उन्होंने कहा कि आप हमारे इस बच्चे को समझा दो कि उसका सब कुछ ठीक हो जाएगा। देवरहा बाबा की बातों ने सुनने वाले को अभिभूत कर दिया। समयानुसार शान्तिकुञ्ज आने पर उसने ये सारी बातें गुरुदेव को बतायी। सुनकर वह मुस्करा दिए। बस इतना बोले बेटा- तुम अभी मेरे अस्पताल में भरती हो। मैं एक अच्छे डाक्टर की तरह तुम्हारी देखभाल कर रहा हूँ। कुछ ही वर्षों बाद उसकी परिस्थितियाँ बदल गई। उसने चिकित्सक एवं रोगी के सम्बन्धों की पवित्र भावनाओं को अपने अन्तःकरण में महसूस किया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 53

👉 Amrit Chintan 25 July 2019

The lotus is the most beautiful flower, whose petals open one by one. But it will only grow in the mud. In order to grow and gain wisdom, first you must have the mud --- the obstacles of life and its suffering. ... The mud speaks of the common ground that humans share, no matter what our stations in life. ... Whether we have it all or we have nothing, we are all faced with the same obstacles: sadness, loss, illness, dying and death. If we are to strive as human beings to gain more wisdom, more kindness and more compassion, we must have the intention to grow as a lot, open each petal one by one.

Goldie Hawn

Man today is fascinated by the possibility of buying, more, better, and especially, new things. He is consumption hungry... To buy the latest gadget, the latest model of anything that is on the market, is the dream of everybody, in comparison to which the real pleasure in use is quite secondary. Modern man, if he dared to be articulate about his concept of heaven, would describe a vision which would look like the biggest department store in the world.

Erich Fromm

👉 आत्म विकास की सामान्य प्रक्रिया

कई व्यक्ति कम से कम समय में अधिक से अधिक बढ़-चढ़कर उपलब्धियाँ प्राप्त करने के लिए आतुर होते और आकुल व्याकुल बनते देखे गए हैं। ऐसे लोगों के लिए बच्चों वाले बालू के महल और टहनियाँ गाड़कर बगीचा खड़ा करने जैसा कौतुक रचना पड़ता है या फिर बाजीगरों जैसा छद्म भरा कौतूहल दिखाकर अबोधजनों को चमत्कृत करना पड़ता है। आँखों में चकाचौंध उत्पन्न करने का रूप धारा करने में नाटक कर्त्ता ही प्रवीण होते हैं। उन्हीं को मुखौटे लगाना, मेकअप करना और साजसज्जा से अलंकृत होना आता है। शालीनता के रहते बचकानी योजना बन नहीं सकती। कार्यान्वित होने का तो कभी अवसर ही नहीं आता। स्थाई निर्माणों में देर लगती हैं। स्नातक, इंजीनियर, डॉक्टर, पहलवान बनने में भी समय लगता है। जमीन से गढ़ा खजाना मिलने पर धनवान बनने वाले सुने तो जाते हैं, पर देखे नहीं गए। देवता के वरदान अथवा जादू मंत्र से किसी ने ऋद्धि-सिद्धि अर्जित नहीं की है। अंतराल को जगाने, दृष्टिकोण बदलने और गतिविधियों को सुनियोजित  आदर्शवादी बनाने-संकल्पों पर आरूढ़ रहने से ही इस स्तर का विकास हो सकता है, जिसमें बहुविधि सफलताओं के फल-फूल लगें। विभूतियों के चमत्कारी उभार उभरें।

अदूरदर्शी तत्काल सम्पन्नता व सफलता से भरे पूरे अवसर उपलब्ध करना चाहते हैं। प्रकृति क्रम से यह संभव नहीं। उसमें कर्म और फल के बीच अंतर अवधि रहने का विधान है। नौ महीने माँ के पेट में रहने के उपरांत ही भ्रूण इस स्थिति तक पहुँचता है कि प्रसवकाल की कठिनाई सह सके और नये वातावरण में रह सकने की जीवट से सज्जित हो सके। जो इन तथ्यों को अनदेखा करते हैं और अपनी हठवादिता को ही अपनाये रहते हैं। उन्हें इसकी पूर्ति के लिए छद्मों का सहारा लेना पड़ता है। किसी को प्रलोभन देकर या दबाव से विवश करके ही वाहवाही का पुलिंदा हथियायो जा सकता है। काँच के बने नगीने ही सस्ते बिकते हैं। असली हीरा खरीदना हो तो उसके लिए समूचित मूल्य जुटाया जाना चाहिए। फसल से घर भरने के लिए किसान जैसी तत्परता अपनाई जानी चाहिए और बोने से लेकर काटने तक की लम्बी अवधि में धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करनी चाहिए।

आत्मिक प्रगति के लिए दुष्प्रवृत्तियों का निराकरण, सुसंस्कारों का अभिवर्धन हेतु दुहरा पुरुषार्थ अपनाया जाना चाहिए। इसका प्रथम चरण है- संयम, साधना और दूसरा- उदार संलगनता। इन दोनों के लिए आवश्यक श्रद्धा विश्वास अंतराल में पक सके, इसके लिए योगाभ्यास स्तर की तपश्चर्याओं का आश्रय लेना चाहिए। यों इस प्रकार के क्रिया कृत्यों विश्वास पर न रखने वाले व्यक्ति अपनी समूची क्रियाशीलता और सद्भावना उच्च स्तरीय क्रिया- कलापों में नियोजित करके समग्र जीवन को साधनामय बना सकते हैं।

आत्मिक विकास के लिए शरीर को स्वस्थ रखना परम आवश्यक है और शरीर को समुन्नत, समग्र, सुविकसित बनाने का सामान्य तरीका अत्यंत सरल और सामान्य है। शरीर स्वस्थता के लिए अकेला संयम भी अपना चमत्कार दिखाता है फिर अगर पौष्टिक भोजन और नियमित व्यायाम का सुयोग भी मिल जाय, तो समझना चाहिए सोना और सुगन्ध मिलने जैसी बात बन गई। वस्तुतः इन्द्रिय असंयम ही शरीर को रुग्णता और दुर्बलता के गर्त में गिराता है। मानसिक स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के लिए संतुलन अपने आपमें पूर्ण है। राग-द्वेष से आवेश, अवसाद से-लिप्सा, लालसा से-अहमन्यता और महत्त्वाकांक्षा से यदि अपने को बचाये रखा जा सके, तो कल्पना-शक्ति, विचार-शक्ति, निर्णय शक्ति न केवल सुरक्षित रहती है, वरन् बढ़ती भी रहती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 24 जुलाई 2019

👉 "त्याग का फल"

"भैया, परसों नये मकान पे हवन है। छुट्टी (इतवार) का दिन है। आप सभी को आना है, मैं गाड़ी भेज दूँगा।" छोटे भाई लक्ष्मण ने बड़े भाई भरत से मोबाईल पर बात करते हुए कहा।

"क्या छोटे, किराये के किसी दूसरे मकान में शिफ्ट हो रहे हो?" " नहीं भैया, ये अपना मकान है, किराये का नहीं । " अपना मकान", भरपूर आश्चर्य के साथ भरत के मुँह से निकला। "छोटे तूने बताया भी नहीं कि तूने अपना मकान ले लिया है।" " बस भैया", कहते हुए लक्ष्मण ने फोन काट दिया।

"अपना मकान", " बस भैया " ये शब्द भरत के दिमाग़ में हथौड़े की तरह बज रहे थे।

भरत और लक्ष्मण दो सगे भाई और उन दोनों में उम्र का अंतर था करीब पन्द्रह साल। लक्ष्मण जब करीब सात साल का था तभी उनके माँ-बाप की एक दुर्घटना में मौत हो गयी। अब लक्ष्मण के पालन-पोषण की सारी जिम्मेदारी भरत पर थी। इस चक्कर में उसने जल्द ही शादी कर ली कि जिससे लक्ष्मण की देख-रेख ठीक से हो जाये।

प्राईवेट कम्पनी में क्लर्क का काम करते भरत की तनख़्वाह का बड़ा हिस्सा दो कमरे के किराये के मकान और लक्ष्मण की पढ़ाई व रहन-सहन में खर्च हो जाता। इस चक्कर में शादी के कई साल बाद तक भी भरत ने बच्चे पैदा नहीं किये। जितना बड़ा परिवार उतना ज्यादा खर्चा।

पढ़ाई पूरी होते ही लक्ष्मण की नौकरी एक अच्छी कम्पनी में लग गयी और फिर जल्द शादी भी हो गयी। बड़े भाई के साथ रहने की जगह कम पड़ने के कारण उसने एक दूसरा किराये का मकान ले लिया। वैसे भी अब भरत के पास भी दो बच्चे थे, लड़की बड़ी और लड़का छोटा।

मकान लेने की बात जब भरत ने अपनी बीबी को बताई तो उसकी आँखों में आँसू आ गये। वो बोली, " देवर जी के लिये हमने क्या नहीं किया। कभी अपने बच्चों को बढ़िया नहीं पहनाया। कभी घर में महँगी सब्जी या महँगे फल नहीं आये। दुःख इस बात का नहीं कि उन्होंने अपना मकान ले लिया, दुःख इस बात का है कि ये बात उन्होंने हम से छिपा के रखी।"

इतवार की सुबह लक्ष्मण द्वारा भेजी गाड़ी, भरत के परिवार को लेकर एक सुन्दर से मकान के आगे खड़ी हो गयी। मकान को देखकर भरत के मन में एक हूक सी उठी। मकान बाहर से जितना सुन्दर था अन्दर उससे भी ज्यादा सुन्दर। हर तरह की सुख-सुविधा का पूरा इन्तजाम। उस मकान के दो एक जैसे हिस्से देखकर भरत ने मन ही मन कहा, " देखो छोटे को अपने दोनों लड़कों की कितनी चिन्ता है। दोनों के लिये अभी से एक जैसे दो हिस्से (portion) तैयार कराये हैं। पूरा मकान सवा-डेढ़ करोड़ रूपयों से कम नहीं होगा। और एक मैं हूँ, जिसके पास जवान बेटी की शादी के लिये लाख-दो लाख रूपयों का इन्तजाम भी नहीं है।"

मकान देखते समय भरत की आँखों में आँसू थे जिन्हें उन्होंने बड़ी मुश्किल से बाहर आने से रोका। तभी पण्डित जी ने आवाज लगाई, " हवन का समय हो रहा है, मकान के स्वामी हवन के लिये अग्नि-कुण्ड के सामने बैठें।"

लक्ष्मण के दोस्तों ने कहा, " पण्डित जी तुम्हें बुला रहे हैं।" यह सुन लक्ष्मण बोले, " इस मकान का स्वामी मैं अकेला नहीं, मेरे बड़े भाई भरत भी हैं। आज मैं जो भी हूँ सिर्फ और सिर्फ इनकी बदौलत। इस मकान के दो हिस्से हैं, एक उनका और एक मेरा।"

हवन कुण्ड के सामने बैठते समय लक्ष्मण ने भरत के कान में फुसफुसाते हुए कहा, " भैया, बिटिया की शादी की चिन्ता बिल्कुल न करना। उसकी शादी हम दोनों मिलकर करेंगे।"

पूरे हवन के दौरान भरत अपनी आँखों से बहते पानी को पोंछ रहे थे, जबकि हवन की अग्नि में धुँए का नामोनिशान न था।

👉 आज का सद्चिंतन 24 July 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 July 2019

👉 श्रद्धा है, तो सक्रिय हों

हमारी इन दिनों अभिलाषा यह है कि अपने स्वजन-परिजनों को नव निर्माण के लिए कुछ करने के लिए कहते-सुनते रहने का अभ्यस्त मात्र न बना दें, वरन कुछ तो करने के लिए उनमें सक्रियता पैदा करें। थोड़े कदम तो उन्हें चलते-चलाते अपनी आँखों से देख लें। हमने अपना सारा जीवन जिस मिशन के लिए तिल-तिल जला दिया, जिसके लिए हम आजीवन प्रकाश प्रेरणा देते रहे उसका कुछ तो सक्रिय स्वरूप दिखाई देना ही चाहिए। हमारे प्रति आस्था और श्रद्धा व्यक्त करने वाले क्या हमारे अनुरोध को भी अपना सकते हैं? क्या हमारे पद-चिह्नों पर कुछ दूर चल सकते हैं? देखा यह भी जाना चाहिए। ताकि हम देख सकें कि हम सच्चे साथियों के रूप में परिवार का सृजन करते रहें अथवा शेखचिल्ली जैसी कल्पना के महल गढ़ते रहे? इस परख में वस्तुस्थिति सामने आ जाएगी और हम अपने परिवार के साथ जोड़े हुए प्रश्नों की यथार्थता, निरर्थकता के संबंध में किसी सुरक्षित निष्कर्ष पर पहुँच जाएँगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, अगस्त १९६९, पृष्ठ ९

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग 35)

👉 आध्यात्मिक निदान- पंचक

आध्यात्मिक चिकित्सा के क्षेत्र में रोग निदान का परिदृश्य थोड़ा अधिक व्यापक है। इसमें प्रचलित व पारम्परिक तरीकों से अलग हटकर इसका तंत्र विकसित किया गया है। इसका कारण यह है कि आध्यात्मिक दृष्टि मानवीय जीवन को समग्रता एवं परिपूर्णता से देखने पर विश्वास करती है। उसका जोर किसी एक आयाम पर नहीं है, बल्कि दृश्य- अदृश्य सभी आयामों पर समान रूप से है। इसी को ध्यान में रखकर इसकी रोग निदान विधियों को विकसित किया गया है। ताकि रोग की जड़ें कितनी भी गहरी क्यों न हो, उन्हें उखाड़ा और नष्ट किया जा सके।

इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए आध्यात्मिक चिकित्सा के, रोग निदान के पांच आयामों का ताना- बाना बुना गया है। आयुर्वेद- निदान पंचक की भाँति इसे आध्यात्मिक निदान- पंचक नाम दिया जा सकता है। इसके अन्तर्गत आध्यात्मिक चिकित्सक रोगी के व्यक्तित्व के पांच तत्त्वों का परीक्षण करते हैं। इनमें से पहला है व्यवहार, २. चिन्तन, ३. संस्कार, ४. प्रारब्ध एवं ५. पूर्वजन्म के दोष- दुष्कर्म। इन पांच का परीक्षण करके रोग का सही निदान कर लिया जाता है। जहाँ तक इन पाँच तत्त्वों का प्रश्र है, तो आध्यात्मिक चिकित्सा के लिए इन सभी का व्यापक महत्त्व है। हालांकि इनमें एक को छोड़कर बाकी सभी आयाम अदृश्य हैं, जो आध्यात्मिक दृष्टि एवं शक्ति के बिना देखे एवं जाने नहीं जा सकते। लेकिन इन अदृश्य तथ्यों को जाने बिना आध्यात्मिक चिकित्सा भी तो सम्भव नहीं है।

इसमें से पहले यानि कि व्यवहार के अन्तर्गत रोगी की शारीरिक पीड़ा- परेशानी अथवा मानसिक दुःख- दर्द का लेखा- जोखा उसके व्यवहार की स्थिति के आधार पर करते हैं। इस सबसे उसके चिन्तन चेतना पर पड़े हुए प्रभावों की पड़ताल, चिन्तन प्रक्रिया की जाँच से की जाती है। तीसरे क्रम में संस्कार की परत अपेक्षाकृत गहरी है। इसकी जांच किसी भी मनोवैज्ञानिक परीक्षण के द्वारा सम्भव नहीं। इसे तो सीधे ही आध्यात्मिक दृष्टि एवं शक्ति से किया जाना होता है। ज्यादातर रोगों के कारण यहीं जड़ जमाए होते हैं। चौथे क्रम में प्रारब्ध की जाँच परख थोड़ी और जटिल होती है। यदि रोग के कारण हमारे बाह्य जीवन में कहीं नजर नहीं आ रहे। और इनका पता हमारे संस्कार क्षेत्र में नहीं चल रहा तो फिर प्रारब्ध की छान- बीन करनी ही पड़ती है।

लम्बे समय तक यानि कि दस- पन्द्रह वर्षों तक चलने वाले रोग अथवा फिर एक के बाद एक नए कष्ट- कठिनाइयों का प्रकट होना प्रायः प्रारब्ध के ही कारण होता है। यहीं पर इनकी जड़ें होती हैं। यदि इस गहरी परत को सही ढंग से न जाना समझा गया तो रोग या कष्ट निवारण के सारे प्रयास धरे रह जाते हैं। पांचवे क्रम में आध्यात्मिक चिकित्सक को कतिपय विशेष रोगियों के रोग निवारण में यह भी जानना पड़ता है कि उसके जीवन में प्रारब्ध के ये दुर्योग क्यों आए। यह दुःखद प्रक्रिया आखिर चली ही क्यों? पिछले जन्मों के कौन से कर्म इसका कारण रहे हैं। पूर्वजन्मों के ज्ञान से ही इस सच का पता लगाया जा सकता है। ऐसा करके ही रोग के सटीक निदान एवं सार्थक समाधान तक पहुँचना सम्भव हो पाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 51

👉 The Paradoxical Commandments

People are illogical, unreasonable, and self-centered. Love them anyway. If you do good, people will accuse you of selfish ulterior motives. Do good anyway. If you are successful, you will win false friends and true enemies. Succeed anyway. The good you do today will be forgotten tomorrow. Do good anyway. Honesty and frankness make you vulnerable. Be honest and frank anyway. The biggest men and women with the biggest ideas can be shot down by the smallest men and women with the smallest minds. Think big anyway. What you spend years building may be destroyed overnight. Build anyway. People really need help but may attack you if you do help them. Help people anyway. Give the world the best you have and you’ll get kicked in the teeth. Give the world the best you have anyway.

Kent M. Keith

👉 आत्मा की परमात्मा से पुकार

आत्मा ने परमात्मा से याचना की ‘असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतंगमय’। यह तीनों ही पुकारें ऐसी हैं, जिन्हें द्रौपदी और गज की पुकार के समतुल्य समझा जा सकता है। निर्वस्त्र होते समय द्रौपदी ने अपने को असहाय पाकर भगवान् को पुकारा था। गज जब ग्राह के मुख में फँसता ही चला गया, पराक्रम काम न आया, जब जौ भर सूँड़ जल से बाहर रह गयी, तो उसने भी गुहार मचाई। दोनों को ही समय रहते सहारा मिला। एक की लाज बच गयी, दूसरे के प्राण बच गये। जीवात्मा की तात्त्विक स्थिति भी ऐसी ही है। उसका संकट इनसे किसी भी प्रकार कम नहीं है।

प्रश्न उठता है कि इस स्थिति का कारण क्या है? जब इस प्रश्न पर विचार किया जाता है, तब पता चलता है कि जो असत् था, अस्थिर था, नाशवान् था, जाने वाला था, उसे चाहा गया, उसे पकड़ा गया। जो स्थिर, शाश्वत्, सनातन, सत्-चित् आनन्द से ओत-प्रोत था, उसकी उपेक्षा की गयी। फलस्वरूप भीतर और बाहर से सब प्रकार से सम्पन्न होते हुए भी अभावग्रस्तों की तरह, दीन-हीन की तरह, अभागी जिन्दगी जियी गयी।

सत् स्थिर आत्मा है। गुण कर्म स्वभााव में सन्निहित मानवीय गरिमा ही सत् है। जो सत् को पकड़ता है,अपनाता है और धारण करता है, उसका आनन्द सुरक्षित रहता है। भीतर से उभरी गरिमा बाह्य जीवन को भी उल्लसित, विकसित विभूतिवान बना देती है। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में ऐसी शालीनता भर देती है, जिसका प्रतिफल दसों दिशाओं में अमृत तुल्य अनुदान बरसता है। आत्मा ने उसी के लिए पुकार की है। ‘असतो मा सद्गमय’। उसे सत् की उपलब्धि हो। असत् की ओर आँखें मूँदकर दौड़ने की प्रवृत्ति रूके। शान्ति का सरोवर सामने रहते हुए भी सड़न भरे दल-दल में घुस पड़ने और चीखने-चिल्लाने की आदत पर अंकुश लगे। अपने अंतराल से ही आनन्द का ऐसा निर्झर बहे, जो अपने को गौरव प्रदान करे और दूसरों की हित साधना करते हुए धन्य बने।

आत्मा की दूसरी पुकार है- ‘तमसो माँ ज्योतिर्गमय’। हे सर्वशक्तिमान्! हमें अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चल। जो क्रम अपनाया गया है, वह अंधकार में भटकने के समान है। रात के अंधियारे में कुछ पता नहीं चलता कि किस दिशा में चल रहे हैं। यथार्थता का बोध नहीं होने से ठोकर खाते और काँटों की चुभन से मर्माहत होते हैं। कुछ का कुछ समझ में आता है, कुछ का कुछ दीख पड़ता है। शरीरगत सुविधाएँ भी लक्ष्य रखती है। जड़ का जड़ता के साथ पाला पड़ता है। वर्तमान और भविष्य अंधकारमय दीखता है। ऐसी परिस्थिति में घिरी हुई आत्मा अपने सृजेता से पुकारता है- ‘अंधकार से प्रकाश की ओर’। ‘अज्ञान से ज्ञान की ओर लें चल। भटकाव से निकाल और उस राह पर खड़ा कर जिसे अपनाकर सफलतापूर्वक लक्ष्य तक पहुँचा जा सके।

जीवात्मा की तीसरी पुकार है- ‘मृत्योर्मा मा अमृतं गमय’। मृत्यु की ओर नहीं, अमृत की ओर ले चल। कुसंस्कारिता के कषाय-कल्मष सम्पर्क क्षेत्र के प्रचलन, उस ओर घसीट लिए जा रहे हैं, जिस पर मरण ही मरण है। आत्म हनन के उपरांत जो कुछ हस्तगत होता है, उसे मरणधर्मा ही कहा जा सकता है। आकांक्षाओं की बाढ़ के बहाव में न धैर्य टिक पाता है, न विवेक।

प्रकृति चक्र के अनुसार समय-समय पर उनमें परिवर्तन होते रहते हैं। व्यक्तियों पर इन परिवर्तनों का प्रभाव पड़ता है और वह प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। इसलिए हे परमात्मन्! अपनी सत्ता का मरण हो रहा है। मौत एक-एक कदम आगे बढ़ती आ रही है और अब तब में दबोचने ही वाली है। इससे पूर्व हम अपने अन्तःकरण को, आनन्द को, भविष्य को निरन्तर मारते-कुचलते रहते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 23 जुलाई 2019

👉 भगवान को भेंट

पुरानी बात है एक सेठ के पास एक व्यक्ति काम करता था। सेठ उस व्यक्ति पर बहुत विश्वास करता था। जो भी जरुरी काम हो सेठ हमेशा उसी व्यक्ति से कहता था। वो व्यक्ति भगवान का बहुत बड़ा भक्त था l वह सदा भगवान के चिंतन भजन कीर्तन स्मरण सत्संग आदि का लाभ लेता रहता था।

एक दिन उस ने सेठ से श्री जगन्नाथ धाम यात्रा करने के लिए कुछ दिन की छुट्टी मांगी सेठ ने उसे छुट्टी देते हुए कहा- भाई ! "मैं तो हूं संसारी आदमी हमेशा व्यापार के काम में व्यस्त रहता हूं जिसके कारण कभी तीर्थ गमन का लाभ नहीं ले पाता। तुम जा ही रहे हो तो यह लो 100 रुपए मेरी ओर से श्री जगन्नाथ प्रभु के चरणों में समर्पित कर देना।" भक्त सेठ से सौ रुपए लेकर श्री जगन्नाथ धाम यात्रा पर निकल गया।

कई दिन की पैदल यात्रा करने के बाद वह श्री जगन्नाथ पुरी पहुंचा। मंदिर की ओर प्रस्थान करते समय उसने रास्ते में देखा कि बहुत सारे संत, भक्त जन, वैष्णव जन, हरि नाम संकीर्तन बड़ी मस्ती में कर रहे हैं। सभी की आंखों से अश्रु धारा बह रही है। जोर-जोर से हरि बोल, हरि बोल गूंज रहा है। संकीर्तन में बहुत आनंद आ रहा था। भक्त भी वहीं रुक कर हरिनाम संकीर्तन का आनंद लेने लगा।

फिर उसने देखा कि संकीर्तन करने वाले भक्तजन इतनी देर से संकीर्तन करने के कारण उनके होंठ सूखे हुए हैं वह दिखने में कुछ भूखे भी प्रतीत हो रहे हैं। उसने सोचा क्यों ना सेठ के सौ रुपए से इन भक्तों को भोजन करा दूँ।

उसने उन सभी को उन सौ रुपए में से भोजन की व्यवस्था कर दी। सबको भोजन कराने में उसे कुल 98 रुपए खर्च करने पड़े। उसके पास दो रुपए बच गए उसने सोचा चलो अच्छा हुआ दो रुपए जगन्नाथ जी के चरणों में सेठ के नाम से चढ़ा दूंगा l

जब सेठ पूछेगा तो मैं कहूंगा पैसे चढ़ा दिए। सेठ यह तो नहीं कहेगा 100 रुपए चढ़ाए। सेठ पूछेगा पैसे चढ़ा दिए मैं बोल दूंगा कि, पैसे चढ़ा दिए। झूठ भी नहीं होगा और काम भी हो जाएगा।

भक्त ने श्री जगन्नाथ जी के दर्शनों के लिए मंदिर में प्रवेश किया श्री जगन्नाथ जी की छवि को निहारते हुए अपने हृदय में उनको विराजमान कराया। अंत में उसने सेठ के दो रुपए श्री जगन्नाथ जी के चरणो में चढ़ा दिए। और बोला यह दो रुपए सेठ ने भेजे हैं।

उसी रात सेठ के पास स्वप्न में श्री जगन्नाथ जी आए आशीर्वाद दिया और बोले सेठ तुम्हारे 98 रुपए मुझे मिल गए हैं यह कहकर श्री जगन्नाथ जी अंतर्ध्यान हो गए। सेठ जाग गया सोचने लगा मेरा नौकर तौ बड़ा ईमानदार है, पर अचानक उसे क्या जरुरत पड़ गई थी उसने दो रुपए भगवान को कम चढ़ाए ? उसने दो रुपए का क्या खा लिया ? उसे ऐसी क्या जरूरत पड़ी ? ऐसा विचार सेठ करता रहा।

काफी दिन बीतने के बाद भक्त वापस आया और सेठ के पास पहुंचा। सेठ ने कहा कि मेरे पैसे जगन्नाथ जी को चढ़ा दिए थे  ? भक्त बोला हां मैंने पैसे चढ़ा दिए। सेठ ने कहा पर तुमने 98 रुपए क्यों चढ़ाए दो रुपए किस काम में प्रयोग किए।

तब भक्त ने सारी बात बताई की उसने 98 रुपए से संतो को भोजन करा दिया था। और ठाकुरजी को सिर्फ दो रुपए चढ़ाये थे। सेठ सारी बात समझ गया व बड़ा खुश हुआ तथा भक्त के चरणों में गिर पड़ा और बोला- "आप धन्य हो आपकी वजह से मुझे श्री जगन्नाथ जी के दर्शन यहीं बैठे-बैठे हो गए l

सन्तमत विचार- भगवान को आपके धन की कोई आवश्यकता नहीं है। भगवान को वह 98 रुपए स्वीकार है जो जीव मात्र की सेवा में खर्च किए गए और उस दो रुपए का कोई महत्व नहीं जो उनके चरणों में नगद चढ़ाए गए...

इस कहानी का सार ये है कि.........
भगवान को चढ़ावे की जरूरत नही होती जी🙏
सच्चे मन से किसी जरूरतमंद की जरूरत को पूरा कर देना भी .....
भगवान को भेंट चढ़ाने से भी कहीं ज्यादा अच्छा होता है जी..!!!
हम उस परमात्मा को क्या दे सकते हैं..... जिसके दर पर हम ही भिखारी हैं।

👉 आज का सद्चिंतन 23 July 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 July 2019


👉 मजबूत आधारशिला रखना है

युग निर्माण योजना की मजबूत आधारशिला रखे जाने का अपना मन है। यह निश्चित है कि निकट भविष्य में ही एक अभिनव संसार का सृजन होने जा रहा है। उसकी प्रसव पीड़ा में अगले दस वर्ष अत्यधिक अनाचार, उत्पीड़न, दैवीय कोप, विनाश और क्लेश, कलह से भरे बीतने हैं। दुष्प्रवृत्तियों का परिपाक क्या होता है, इसका दंड जब भरपूर मिल लेगा, तब आदमी बदलेगा। यह कार्य महाकाल करने जा रहा है। हमारे हिस्से में नवयुग की आस्थाओं और प्रक्रियाओं को अपना सकने योग्य जनमानस तैयार करना है। लोगों को यह बताना है कि अगले दिनों संसार का एक राज्य, एक धर्म, एक अध्यात्म, एक समाज, एक संस्कृति, एक कानून, एक आचरण, एक भाषा और एक दृष्टिकोण बनने जा रहा है, इसलिए जाति, भाषा, देश, सम्प्रदाय आदि की संकीर्णताएँ छोड़ें और विश्वमानव की एकता की, वसुधैव कुटुंबकम् की भावना स्वीकार करने के लिए अपनी मनोभूमि बनाएँ।

लोगों को समझाना है कि पुराने से सार भाग लेकर विकृत्तियों को तिलांजलि दे दें। लोकमानस में विवेक जाग्रत् करना है और समझाना है कि पूर्व मान्यताओं का मोह छोड़कर जो उचित उपयुक्त है केवल उसे ही स्वीकार शिरोधार्य करने का साहस करें। सर्वसाधारण को यह विश्वास कराना है कि धन की महत्ता का युग अब समाप्त हो चला, अगले दिनों व्यक्तिगत संपदाएँ न रहेंगी, धन पर समाज का स्वामित्व होगा। लोग अपने श्रम एवं अधिकार के अनुरूप सीमित साधन ले सकेंगे। दौलत और अमीरी दोनों ही संसार से विदा हो जाएँगी। इसलिए धन के लालची बेटे-पोतों के लिए जोड़ने-जाड़ने वाले कंजूस अपनी मूर्खता को समझें और समय रहते स्वल्प संतोषी बनने एवं शक्तियों को संचय उपयोग से बचाकर लोकमंगल की दिशाओं में लगाने की आदत डालें। ऐसी-ऐसी बहुत बातें लोगों के गले उतारनी हैं, जो आज अनर्गल जैसी लगती हैं।

संसार बहुत बड़ा है, कार्य अति व्यापक है, हमारे साधन सीमित हैं। सोचते हैं एक मजबूत प्रक्रिया ऐसी चल पड़े जो अपने पहिए पर लुढ़कती हुई उपरोक्त महान लक्ष्य को सीमित समय में ठीक तरह पूरा कर सके।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च 1969, पृष्ठ 59,60

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग 34)

👉 आध्यात्मिक निदान- पंचक

रोग निदान- रोगी की चिकित्सा का आधार है। इसी के सहारे रोगी के लिए औषधि, अनुपान, पथ्यापथ्य आहार एवं जीवन क्रम का निर्धारण हो पाता है। इसमें थोड़ी सी भूल- चूक होने पर चिकित्सा का सारा सरंजाम लड़खड़ा जाता है। यही नहीं कभी- कभी तो स्वास्थ्य का वरदान देने वाली चिकित्सा प्रणाली जानलेवा भी सिद्ध होती है। इसी वजह से प्रत्येक चिकित्सा पद्धति ने अपने ढंग से रोग निदान की अचूक विधियों की खोज की है। इसके कारगर तरीकों का अनुसन्धान एवं विकास किया है। क्योंकि चिकित्सा प्रणाली कोई भी हो, इसकी सफलता या विफलता का सारा दारोमदार सही व सटीक रोग निदान पर निर्भर करता है। स्थिति तो यहाँ तक है कि आज रोग निदान की अचूक विधियों को ही चिकित्सा प्रणाली की सफलता की गारन्टी के रूप में माना जाने लगा है।

जिसे हम आधुनिक चिकित्सा पद्धति कहते हैं, उसने अपनी सफलता के लिए रोग निदान की अत्याधुनिक तकनीकें विकसित की हैं। कई चिकित्सालयों एवं चिकित्सा संस्थानों ने तो इसी के लिए अपनी प्रसिद्धि हासिल की है, कि उनके यहाँ रोग निदान का यह ढांचा कितना चुस्त- दुरुस्त एवं मजबूत है। सामान्य रोगी परीक्षण या रोग निदान की क्लीनिकल विधियों से लेकर पेथोलोजिकल विधियाँ या फिर सी- टी. स्कैन, एम.आर. आई. के मंहगे उपकरण इसी महत्त्वपूर्ण उद्देश्य के लिए तत्पर रहते हैं। अपने- अपने ढंग से चिकित्सकों की कोशिश यही रहती है कि इसमें किसी तरह की कोई भूल- चूक न होने पाए।

चिकित्सा प्रणाली कोई भी हो, पर रोग निदान के एकदम सटीक होने की कोशिश सभी जगह हैं। आयुर्वेद में वात, पित्त एवं कफ प्रकृति को ध्यान में रखकर रोग निदान करने की परम्परा है। उसके लिए नाड़ी परीक्षण एवं निदान पंचक आदि की प्रक्रियाएँ अपनायी जाती हैं। इसके निष्कर्षों के आधार पर ही रोगी की चिकित्सा का सरंजाम किया जाता है। होमियोपैथी में यह परिदृश्य थोड़ा अलग ढंग का है, इसमें रोगी की शारीरिक स्थिति के साथ उसकी मनोदशा का भी परीक्षण करते हैं। इन प्रचलित एवं पारम्परिक चिकित्सा प्रणालियों के अलावा वैकल्पिक चिकित्सा प्रणालियों के जो आयाम इन दिनों विकसित हुए हैं, उन सभी में कहीं न कहीं रोग निदान की समुचित विधि व्यवस्था की गयी है। क्योंकि जब निदान ही नहीं तो समाधान किस व्याधि का।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 50

👉 Life will give you back

A son and his father were walking on the mountains.
Suddenly, his son falls, hurts himself and screams.
To his surprise, he hears the voice repeating,
somewhere in the mountain.
Curious, he yells: ‘‘Who are you?’’
He receives the answer: ‘‘Who are you?’’
And then he screams to the mountain: ‘‘I admire you!’’
The voice answers: ‘‘I admire you!’’
Angered at the response, he screams: ‘‘Coward!’’
He receives the answer: ‘‘Coward!’’
He looks to his father and asks: ‘‘What’s going on?’’
The father smiles and says: ‘‘My son, pay attention.’’
Again the man screams: ‘‘You are a champion!’’
The voice answers: ‘‘You are a champion!’’
The boy is surprised, but does not understand.
Then the father explains: ‘‘People call this ECHO, but really this is LIFE.
It gives you back everything you say or do.
Our life is simply a reflection of our actions.
If you want more love in the world, create more love in your heart.
If you want more competence in your team, improve your competence.
This relationship applies to everything, in all aspects of life;
Life will give you back everything you have given to it.

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...