शनिवार, 15 जून 2019

प्रेम एक महान शक्ति | Love, a Great Power | Hariye Na Himmat Day 13



Title

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 14)

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा का मूल है आस्तिकता

तमिलनाडु के तिरूवन्नामल्लाई स्थान पर साधना करने वाले योगिवर रमण। पवित्र पर्वत अरूणाचलम् में तप कर रहे सन्त रमण महर्षि। इस नाम ने उनके हृदय के तारों में एक मधुर झंकार पैदा कर दी। उन्हें ऐसा लगा जैसे कि महर्षि अपने अदृश्य स्वरों से उन्हें आमंत्रित कर रहे हों। स्वर अनजाने थे, पर पुकार आत्मीय थी। वह चल पड़े। कुछ एक दिनों में अपनी इस यात्रा को पूरा कर वह पवित्र पर्वत अरूणाचलम् के पदभ्रान्त में पहुँच गए। यहाँ पहुँचकर उन्हें पता चला कि महर्षि अभी अपनी गुफा में हैं। हो सकता है कि वे साँझ को नीचे उतरें। पॉल ब्रॉन्टन के लिए यह साँझ की प्रतीक्षा बड़ी कष्टकारी थी। फिर भी उन्होंने धैर्यपूर्वक यह समय गुजारा।

प्रतीक्षा के क्षण बीतने पर महर्षि से उनकी मुलाकात हुई। इस मिलन के प्रथम क्षण में ही उन्होंने अपनी जिज्ञासा उड़ेल दी, आस्तिकता क्या है? ईश्वर है भी या नहीं? उनके इस सवालों पर महर्षि हँस पड़े और बोले- पहले यह बताओ कि तुम हो या नहीं और यदि तुम हो तो तुम कौन हो? उनके सहज प्रश्रों के उत्तर में महर्षि के अटपटे प्रश्र। पॉल ब्रॉन्टन कुछ कह सके, पर महर्षि के व्यक्तित्व की पारदर्शी सच्चाई ने उन्हें गहरे तक छू लिया। महर्षि की बातों में उन्हें सत्य का दर्शन हुआ। और वे मैं कौन हूँ? इस प्रश्र का समाधान पाने में जुट गए।

पॉल ब्रान्टन की जिज्ञासा तीव्र थी। उनकी भावनाएँ सच्ची थी, फिर उनमें लगन की भी कोई कमी न थी। महर्षि का प्रश्र ही उनका ध्यान बन गया। वह अपने अस्तित्व की परत- दर भेदते हुए गहनता में उतरते चले गए। ज्यों- ज्यों वह अपनी गहराई में उतरते- उनका अचरज बढ़ता जाता। परिधि में सीमाएँ थीं, परन्तु केन्द्र में असीमता की अनुभूति थी। मैं की सच्ची पहचान में उन्हें ईश्वर की पहचान भी मिल गयी। आस्तिकता के अस्तित्व का बोध भी हो गया। जब वह वापस महर्षि के पास पहुँचे तो उनके होठों पर बड़ी करुणापूर्ण मुस्कान थी। पॉल ब्रॉन्टन को देखकर वह बोले, पुत्र आस्तिकता आध्यात्मिक चिकित्सा की एक विधि है। जीवन का सारा दुःख इसके अधूरेपन की अनुभूति में है। जब कोई इसे सम्पूर्णता में अनुभव करता है तो उसके सारे सन्ताप शमित हो जाते हैं। अपनी अन्तरात्मा में ही उसे परमात्मा की झाँकी मिलती है। स्वयं के जीवन में ही जगत् के विस्तार का बोध होता है। हालाँकि इस अनुभूति के लिए नैतिकता की नीति का अनुसरण करना जरूरी है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 20

👉 आज का सद्चिंतन 15 June 2019


👉 प्रेरणादायक गुरुदेव का सन्देश


👉 अध्यात्म से मानव-जीवन का चरमोत्कर्ष (अंतिम भाग)

पूर्वकालीन ऋषि मुनियों ने भी उच्च स्तरीय अध्यात्म में सहसा छलाँग नहीं लगाई। उन्होंने भी अभ्यास द्वारा पहले अपने बाह्य जीवन को ही परिष्कृत किया और तब क्रम क्रम से उस आत्मिक जीवन में उच्च साधना के लिये पहुँचे थे। इस नियम का-कि पहले बाह्य जीवन में व्यावहारिक अध्यात्म का समावेश करके उसे सुख शान्तिमय बनाया जाय। इस प्रसंग में जो भी पुण्य परमार्थ अथवा पूजा उपासना अपेक्षित हो उसे करते रहा जाये। लौकिक जीवन को सुविकसित एवं सुसंस्कृत बना लेने के बाद ही आत्मिक अथवा अलौकिक जीवन में प्रवेश किया जाय-उल्लंघन करने वाले कभी सफलता के अधिकारी नहीं बन सकते। लौकिक जीवन की निकृष्टता आत्मिक जीवन के मार्ग में पर्वत के समान अवरोध सिद्ध होती है।

अध्यात्म मानव जीवन के चरमोत्कर्ष की आधार शिला है, मानवता का मेरुदण्ड है। इसके अभाव में असुखकर अशान्ति एवं असन्तोष की ज्वालाएँ मनुष्य को घेरे रहती है। मनुष्य जाति की अगणित समस्याओं को हल करने और सफल जीवन जीने के लिये अध्यात्म से बढ़कर कोई उपाय नहीं है। पूर्वकाल में, जीवन में सुख समृद्धियों के बहुतायत के कारण जिस युग को सतयुग के नाम से याद किया जाता है, उसमें और कोई विशेषता नहीं थी-यदि विशेषता थी तो यह कि उस युग के मनुष्यों का जीवन अध्यात्म की प्रेरणा से ही अनुशासित रहता था। आज उस तत्व की उपेक्षा होने से जीवन में चारों ओर अभाव, अशान्ति और असन्तोष व्याप्त हो गया है और इन्हीं अभिशापों के कारण ही आज का युग कलियुग के कलंकित नाम से पुकारा जाता है।

अपने युग का यह कलंक आध्यात्मिक जीवन पद्धति अपनाकर जब मिटाया जा सकता है तो क्यों न मिटाया जाना चाहिये? मिटाया जाना चाहिये और अवश्य मिटाया जाना चाहिये। अपने युग को लाँछित अथवा यशस्वी बनाना उस युग के मनुष्यों पर ही निर्भर है, तब क्यों न हम सब जीवन में आध्यात्मिक पद्धति का समावेश कर अपने युग को भी उतना ही सम्मानित एवं स्मरणीय बना दें, जितना कि सतयुग के मनुष्यों ने अपने आचरण द्वारा अपने युग को बनाया था?

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1969 पृष्ठ 10

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/January/v1.10

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 25)

THE RELATIVITY OF VIRTUES AND SINS

The qualitative assessment of good and evil is always relative. On the scale of virtue you will find persons, who belong to a grade lower than yours, those who are in the same grade as your own; and others who have a much higher grade than yours. Suppose you are studying in a college. You may consider the persons with the highest character (Satoguni) studying in a class senior to your own, your classmates as students of the intermediate class (Rajoguni) and the juniors, being educated in the lower class (Tamoguni). However, as mentioned earlier, this relationship of moral status is relative. For instance, in comparison to a bandit, a thief is more virtuous (has more Satogun), because the latter is more humane.

Compared to both the thief and the dacoit, a labourer has more Satogun. A social reformer would have more Satogun than a common man, and a spiritual teacher more than that of the social worker. Thus, on the scale of Satogun, a spiritual teacher stands at a much higher level than a bandit, but he is graded lower than enlightened, liberated soul whose Silent Presence is the greatest of sermons. It does not mean that the dacoit is the most degraded soul. He is better than animal.

The superiority of spiritual status of a person is measured by the number of people being ethically benefited by his altruistic deeds. On the lowest level, a self-centered person acts only for the welfare of his own family. A dacoit does not rob members of his family. A thief does not commit theft in the house of a friend. For a social worker, welfare activities are confined to a particular class or community. The spiritual teacher works for enlightenment of all human beings.

The enlightened souls see all living beings, as manifestations of God, be it man or beast, plant or animal. In a nutshell, in the process of progressive evolution, before attaining self-realization, all living beings are at different stages of conscious awakening. Everyone lives with lack of one virtue or the other. When all impurities are removed, nothing can stop a person from reaching the ultimate state of liberation from cycles of birth and death. This is the ultimate goal of human existence.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 44

👉 भगवान् की कृपा Bhagwan Ki Kripa

किसी स्थान पर संतों की एक सभा चल रही थी, किसी ने एक घड़े में गंगाजल भरकर वहां रखवा दिया ताकि संतजन को जब प्यास लगे तो गंगाजल पी सकें।

संतों की उस सभा के बाहर एक व्यक्ति खड़ा था, उसने गंगाजल से भरे घड़े को देखा तो उसे तरह-तरह के विचार आने लगे। वह सोचने लगा:- "अहा, यह घड़ा कितना भाग्यशाली है, एक तो इसमें किसी तालाब पोखर का नहीं बल्कि गंगाजल भरा गया और दूसरे यह अब सन्तों के काम आयेगा। संतों का स्पर्श मिलेगा, उनकी सेवा का अवसर मिलेगा, ऐसी किस्मत किसी-किसी की ही होती है।

घड़े ने उसके मन के भाव पढ़ लिए और घड़ा बोल पड़ा:- बंधु मैं तो मिट्टी के रूप में शून्य पड़ा था, किसी काम का नहीं था, कभी नहीं लगता था कि भगवान् ने हमारे साथ न्याय किया है। फिर एक दिन एक कुम्हार आया, उसने फावड़ा मार-मारकर हमको खोदा और गधे पर लादकर अपने घर ले गया। वहां ले जाकर हमको उसने रौंदा, फिर पानी डालकर गूंथा, चाक पर चढ़ाकर तेजी से घुमाया, फिर गला काटा, फिर थापी मार-मारकर बराबर किया।

बात यहीं नहीं रूकी, उसके बाद आंवे के अंदर आग में झोंक दिया जलने को। इतने कष्ट सहकर बाहर निकला तो गधे पर लादकर उसने मुझे बाजार में भेज दिया, वहां भी लोग ठोक-ठोककर देख रहे थे कि ठीक है कि नहीं?

ठोकने-पीटने के बाद मेरी कीमत लगायी भी तो क्या- बस 20 से 30 रुपये, मैं तो पल-पल यही सोचता रहा कि:- "हे ईश्वर सारे अन्याय मेरे ही साथ करना था, रोज एक नया कष्ट एक नई पीड़ा देते हो, मेरे साथ बस अन्याय ही अन्याय होना लिखा है।"

भगवान ने कृपा करने की भी योजना बनाई है यह बात थोड़े ही मालूम पड़ती थी। किसी सज्जन ने मुझे खरीद लिया और जब मुझमें गंगाजल भरकर सन्तों की सभा में भेज दिया तब मुझे आभास हुआ कि कुम्हार का वह फावड़ा चलाना भी भगवान् की कृपा थी। उसका वह गूंथना भी भगवान् की कृपा थी, आग में जलाना भी भगवान् की कृपा थी और बाजार में लोगों के द्वारा ठोके जाना भी भगवान् की कृपा ही थी।

अब मालूम पड़ा कि सब भगवान् की कृपा ही कृपा थी। परिस्थितियां हमें तोड़ देती हैं, विचलित कर देती हैं- इतनी विचलित की भगवान के अस्तित्व पर भी प्रश्न उठाने लगते हैं। क्यों हम सबमें इतनी शक्ति नहीं होती ईश्वर की लीला समझने की, भविष्य में क्या होने वाला है उसे देखने की? इसी नादानी में हम ईश्वर द्वारा कृपा करने से पूर्व की जा रही तैयारी को समझ नहीं पाते।

बस कोसना शुरू कर देते हैं कि सारे पूजा-पाठ, सारे जतन कर रहे हैं फिर भी ईश्वर हैं कि प्रसन्न होने और अपनी कृपा बरसाने का नाम ही नहीं ले रहे। पर हृदय से और शांत मन से सोचने का प्रयास कीजिए, क्या सचमुच ऐसा है या फिर हम ईश्वर के विधान को समझ ही नहीं पा रहे? आप अपनी गाड़ी किसी ऐसे व्यक्ति को चलाने को नहीं देते जिसे अच्छे से ड्राइविंग न आती हो तो फिर ईश्वर अपनी कृपा उस व्यक्ति को कैसे सौंप सकते हैं जो अभी मन से पूरा पक्का न हुआ हो।

कोई साधारण प्रसाद थोड़े ही है ये, मन से संतत्व का भाव लाना होगा। ईश्वर द्वारा ली जा रही परीक्षा की घड़ी में भी हम सत्य और न्याय के पथ से विचलित नहीं होते तो ईश्वर की अनुकंपा होती जरूर है, किसी के साथ देर तो किसी के साथ सवेर।

यह सब पूर्वजन्मों के कर्मों से भी तय होता है कि ईश्वर की कृपादृष्टि में समय कितना लगना है। घड़े की तरह परीक्षा की अवधि में जो सत्यपथ पर टिका रहता है वह अपना जीवन सफल कर लेता है।

शुक्रवार, 14 जून 2019

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 13)

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा का मूल है आस्तिकता

वैज्ञानिक समुदाय को हार मानकर यह बात स्वीकारनी पड़ी कि जीवन के सभी तन्तु एक दूसरे से गहराई से गुँथे हैं। जीवन और जगत् अपनी गहराइयों में परस्पर जुड़े हैं। इन्हें अलग समझना भारी भूल है। ये वैज्ञानिक निष्कर्ष ही प्रकारान्तर से इकॉलॉजी, इकोसिस्टम, डीप इकॉलॉजी एवं इन्वायरन्मेटल साइकोलॉजी जैसी शब्दावली के रूप में प्रकाशित हुए। इन तथ्यों को यदि अहंकारी हठवादिता को त्यागते हुए स्वीकारें तो इसे आस्तिकता के अस्तित्व की स्वीकारोक्ति ही कहेंगे। इस वैज्ञानिक निष्कर्ष के बारे में युगों पूर्व श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया था- ‘सूत्रे मणिगणाइव’। यानि कि जीवन के सभी रूप एक परम दिव्य चेतना के सूत्र में मणियों की भाँति गुँथे हैं। उपनिषदों ने इसी सच्चाई को ‘अयमात्मा ब्रह्म’ कहकर प्रतिपादित किया। इसका मतलब यह है कि यह मेरी अन्तरात्मा ही ब्राह्मी चेतना का विस्तार है। इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि अपने जीवन का भाव भरा विस्तार ही यह जगत् है। अपने विस्तार में ही समष्टि है।

उपनिषद् युग की इन अनुभूतियों को कई मनीषी इस वैज्ञानिक युग में भी उपलब्ध कर रहे हैं। और यही वजह है कि उन्होंने आस्तिकता को आध्यात्मिक चिकित्सा के सर्वमान्य सिद्धान्त के रूप में मान्यता दी है। इन्हीं में एक टी.एल. मिशेल का कहना है कि आस्तिकता से इन्कार जीवन चेतना को विखण्डित कर इसे अपंग- अपाहिज बना देता है। इस इन्कार से जीवन में अनेकों नकारात्मक भाव पैदा होते हैं, जिनके बद्धमूल होने से कई तरह के रोगों के होने की सम्भावना पनपती है। उनका यह भी मत है कि यदि आस्तिकता को सही अर्थों में समझा एवं आत्मसात कर लिया जाय तो निजी जिन्दगी में पनपती हुई कई तरह की मनोग्रन्थियों से छुटकारा पाया जा सकता है।

इस सम्बन्ध में अंग्रेज पत्रकार एवं लेखक पॉल ब्रॉन्टन की अनुभूति बहुत ही मधुर है। कई देशों की यात्रा करने के बाद पॉल ब्रॉन्टन भारत वर्ष आए। अपनी खोजी प्रकृति के कारण यहाँ वे कई महान् विभूतियों से मिले। इनमें से कई सिद्ध और चमत्कारी महापुरुष भी थे। लेकिन ये सभी चमत्कार, अचरज से भरे करतब उनकी जिज्ञासाओं का समाधान न दे पाए। इन सारी भेंट मुलाकातों के बावजूद उनके सवाल अनुत्तरित रहे। मन जस का तस अशान्त रहा। वे अपने आप में आध्यात्मिक चिकित्सा की गहरी आवश्यकता महसूस कर रहे थे। पर यह सम्भव कैसे हो? अपने सोच- विचार एवं चिन्तन के इन्हीं क्षणों में उन्हें महर्षि रमण का पता चला।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 19

मंगलवार, 11 जून 2019

👉 आज का सद्चिंतन परिवर्तन की बेला


👉 प्रेरणादायक स्वामी विवेकानन्द Swami Vivekanand


👉 अध्यात्म से मानव-जीवन का चरमोत्कर्ष (भाग 4)

आज हम सब जिस स्थिति में चल रहे है, उसमें जीवन निर्माण की सरल आध्यात्मिक साधना ही सम्भव है। इस स्तर से शुरू किए बिना काम भी तो नहीं चल सकता। बाह्य जीवन को यथास्थिति में छोड़कर आत्मिक स्तर पर पहुँच सकना भी तो सम्भव नहीं है। अस्तु हमें उस अध्यात्म को लेकर ही चलना होगा, जिसे जीवन जीने की कला कहा गया है। जीवन विषयक अध्यात्म हमारे गुण, कर्म, स्वभाव से सम्बन्धित है। हमें चाहिये कि हम अपने में गुणों की वृद्धि करते रहे। ब्रह्मचर्य, सच्चरित्रता, सदाचार, मर्यादा-पालन और अपनी सीमा में अनुशासित रहना आदि ऐसे गुण हैं, जो जीवन जीने की कला के नियम माने गये हैं। व्यसन, अव्यवस्था, अस्तव्यस्तता व आलस्य अथवा प्रमाद जीवनकाल के विरोधी दुर्गुण है। इनका त्याग करने से जीवनकाल को बल प्राप्त होता है। हमारे कर्म भी गुणों के अनुसार ही होने चाहिये। गुण और कर्म में परस्पर विरोध रहने से जीवन में न शांति का आगमन होता है और न प्रगतिशीलता का समावेश। हममें सत्य-निष्ठा का गुण तो हो पर उसे कर्मों में मूर्तिमान् करने का साहस न हो तो कर्म तो जीवन कला के प्रतिकूल होते ही है, वह गुण भी मिथ्या हो जाता है।

सत्कर्म में हमारी आस्था तो हो पर पुण्य परमार्थ की सक्रियता से दूर ही रहें तो जीवन कला के क्षेत्र में यह एक आत्म प्रवंचना ही होगी। इसी प्रकार हमारा स्वभाव भी इन दोनों के अनुरूप ही होना चाहिये। हममें दानशीलता का गुण भी हो और अवसरानुसार सक्रिय भी होता हो, किन्तु उसके साथ यदि अहंकार भी जुड़ा है तो यह उस गुण कर्म का स्वाभाविक विरोध होगा, जो जीवन कला के अनुरूप नहीं है। हम सदाशयी, परमार्थी और सेवाभावी तो हे और कर्मों में अपनी इन भावनाओं को मूर्तिमान् भी करते है, किन्तु यदि स्वभाव से क्रोधी, कठोर अथवा निर्बल है तो इन सद्गुणों और सत्कर्मों का कोई मूल्य नहीं रह जाता। किसी को यदि परोपकार द्वारा सुखी करते है और किसी को अपने क्रोध का लक्ष्य बनाते है तो एक ओर का पुण्य दूसरे ओर के पाप से ऋण होकर शून्य रह जायेगा। गुण, कर्म, स्वभाव तीनों का सामंजस्य एवं अनुरूपता ही वह विशेषता है, जो जीवन जीने की कला में सहायक होती है।

जीवन यापन की वह विधि ही जीवन जीने की कला है, जिसके द्वारा हम स्वयं अधिकाधिक सुखी, शान्त और संतुष्ट रह सकें, साथ ही दूसरों को भी उसी प्रकार रहने में सहयोगी बना सकें और यही वह प्रारम्भिक अध्यात्म है, जिसके द्वारा जीवन निर्माण होता है और आत्मा की सूक्ष्म अध्यात्म साधना का पथ प्रशस्त होता है। हम सबको इसी सरल एवं साध्य अध्यात्म को लेकर क्रम क्रम से आगे बढ़ना चाहिये। सहसा आदि से अन्त पर कूद जाने का प्रयत्न करना एक ऐसी असफलता को आमन्त्रित करना है, जिससे न तो ठीक से जीवन जिया जा सकता है और न उच्च स्तरीय साधना को सामान्य बनाया जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1969 पृष्ठ 9

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/January/v1.9

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 12)

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा का मूल है आस्तिकता

आस्तिकता के अस्तित्व को झुठलाना सम्भव नहीं। यह इतना स्पष्ट है जितना कि हम स्वयं, हमारा अपना जीवन। जिन्हें जीवन की सम्पूर्णता का अहसास होता है, वे आस्तिकता की अनुभूति किए बिना नहीं रहते। जो आस्तिकता को नकारते हैं, दरअसल वे जिन्दगी को नकारते हैं, अपने आप को अस्वीकार करते हैं। आस्तिकता का मतलब है, जीवन के होने की सच्ची स्वीकारोक्ति, जीवन और जगत् के सम्बन्धों की सूक्ष्म व सघन अनुभूति। लोक प्रचलन में ईश्वर के प्रति विश्वास या आस्था को आस्तिकता का पर्याय माना जाता है। वैदिक विद्वान ‘नास्तिकोवेद निन्दकः’ कहकर वेदज्ञान के प्रति आस्था को आस्तिकता के रूप में परिभाषित करते हैं।

अपने सार मर्म में, प्रचलन में एवं दर्शन में आस्तिकता के बारे में जो भी कुछ कहा गया है, वह एक ही सच के विविध रूप हैं। कथन और परिभाषाएँ अनेक होने पर भी आस्तिकता का सच एक ही है। जब हम आस्तिकता को ईश्वर के प्रति आस्था कहते हैं, तो इसका मतलब इतना ही है कि हमें समष्टि जीवन के प्रति, सर्वव्यापी अस्तित्व के प्रति आस्थावान होना चाहिए। यही बात वेदज्ञान के बारे में है। वेद का मतलब चार पोथियाँ नहीं हैं। बल्कि यह सत्यज्ञान एवं सत्य विद्या है। परम्परागत ढंग से सोचें तो प्राचीन ऋषिगणों ने जीवन और जगत् की सूक्ष्मताओं एवं गहनताओं का जो ज्ञान पाया वही वेदों में संकलित है। इसकी अवहेलना या उपेक्षा कर के हम जीवन के समग्र विकास को कभी भी नहीं पा सकते।

बीते सालों में विज्ञान के नाम पर आस्तिकता को झुठलाने की अनेकों कोशिशें की गई। कई तरह के व्यंग, कटाक्ष एवं कटूक्तियाँ उच्चारित की गयीं। बात यहाँ तक बढ़ी कि नास्तिकता को वैज्ञानिकता का पर्याय माना जाने लगा। इस उलटी सोच ने अनेकों उलटे काम कराए। समष्टि जीवन चेतना को नकारने से स्वार्थपरता व अहंता को भारी बढ़ावा मिला। प्राकृतिक संसाधनों का अन्धाधुंध दोहन हुआ। मानवीय अहंता की चपेट में आकर जीव- जन्तुओं की अनगिनत प्रजातियाँ नष्ट हुई। इसी के साथ प्राकृतिक संकटों के बादल भी घहराए। पर्यावरण संकट, मौसम के संकट, भाँति- भाँति की बीमारियाँ, महामारियाँ, आपदाएँ इन्सानी जिन्दगी को दबोचने की तैयारियाँ करने लगीं। स्वार्थलिप्सा से ग्रसित अहंकारी मानव को मनोरोगों ने भी धर पटका। यह सब हुआ क्यों? किस तरह? और कैसे? इन सवालों के जवाब की ढूँढ खोज में जब वैज्ञानिक जुटे तो उन्होंने अपने प्रयोगों के निष्कर्ष में यही पाया कि समष्टि चेतना के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 18

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 24)

YOUR WORLD – A REFLECTION OF YOUR MIND

In this world, we find people complaining about many types of misfortunes and feeling euphoric on insignificant occasions of pleasure. There are habitual pessimists blaming everyone for everything. Expressions like “This world is very bad”; “Times are bad”; “Honesty is a virtue of the past”; “Religion has been buried for good”- are very commonly bandied about. If someone is in the habit of repeating such phrases, he is expressing only the impressions of his mind and you can safely assume that he himself is a cheat and dishonest person.

Man has systematically built the image of his unhappy world by interacting with pessimistic people around himself. If someone is in the habit of complaining about lack of opportunities for work, widespread unemployment, failure of good industries and non-availability of good jobs, take it for granted that his ideosphere is full of thick clouds of indolence, torpor and incompetence. This he finds reflected everywhere in the world. If someone sees this world as full of self-centered hypocrites or sinners or evil and uncivilized persons, infer that the individual himself has an abundance of corresponding negative attributes in his own self. This world is like a magnificent large mirror, which faithfully reflects your ideosphere. As mentioned earlier, elements of this world
precipitate three types of qualitative attributes (Sat, Raj and Tam) in life. Whichever attribute dominates in the personality
of an individual, it attracts its counterpart from the world at large.

Wherever a short-tempered person goes, he finds someone to quarrel with. One who has hatred in mind will always find out an object to be hated. To an unfair person everyone appears, ill-mannered, uncivil and worthy of punishment. Whenever an individual interacts with someone, he/she views the latter in the same light with which his own personality is coloured. A person of impeccable morality rarely comes across a woman of fallen virtue. Scholars do get avenues for right information. Seekers of truth always find opportunities for quenching their thirst for wisdom. Enlightened souls have always been living on this earth. Wherever they live, environment around them attracts virtuous persons.

However, it is not our intention to prove that there is absolutely no evil on this earth and whatever good or bad we find here is totally a reflection of our own field of view. It has been repeatedly stated that in this world, good, average and bad (Sat, Raj and Tam) coexist and one receives what one gets tuned into.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 42-43

सोमवार, 10 जून 2019

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 23)

WHO ARE YOU?

Each individual has different identities for different roles in life. This identity depends on the relationship with the person with whom he/she interacts. For mother he/she may be an object of maternal affection, for father an obedient child, for the teacher an intelligent pupil and for friends a dependable good-humoured buddy. Wife looks at a man as her beloved darling, whereas his son relates to him as his father. The same person appears to his enemy as an adversary; to the shopkeeper as a customer; to the servant as a master; to the horse as a rider; to the caged bird as the jailor. Bed bugs and mosquitoes find him as nothing else but a source of delicious blood. If one could visualize the various mental images, which people have for an individual, it would be found that each person has one’s own peculiar concept and none of these conform to the other. Besides, none of these images identifies the whole individual accurately.

Everyone conceptualizes an individual according to the particular bend with which they are mutually related to each other. It is even more amusing that man himself lives confused in his multi-personal bends. Throughout life he lives with multiple self-identifications. Various thoughts like “I am an adulterer”; “I am wealthy”; “I am old”; “I have no family”; “I am ugly”; “I am popular”; “I am unhappy”; “I am surrounded by vile persons”;……….keep on changing and churning his ideosphere. As other persons form an image about an individual according to their interests, the individual too builds an eccentric lop-sided image of himself based on perceptions of his sense organs. Like a drugged person he keeps on hallucinating in his numerous momentary identities. If he could truly identify with his own inner self, he would be surprised to know how far he has strayed away from Truth. (Read, “What am I” by the author).

Man always lives in a make-believe world created by his own imagination. In this dream world, one man builds castles in the air, the other fights with the windmills like Don Quixote and yet other derives pleasure of embracing and kissing his beloved while fondling his pet dog. Deluded by ignorance, we are all hallucinating in an imaginary world. One thinks that he is living in a palace.

The other trembles because of imaginary fears. Yet another daydreams of being engaged to the most beautiful damsel in the world. Some insane person is found rejoicing in showing off wealth and ‘kingdom’. This world is like a mental asylum where we find all types of mad caps. Each has one’s own eccentricity. Everyone considers himself as the most intelligent person. Go to a mental asylum and observe the fantasies of the long-term inmates. You will find a close parallel to the daydreamers of this world, who very much consider themselves as sane and sober.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 40-41

👉 Bapu Roti Laya बापू रोटी लाया...

डाइनिंग टेबल पर खाना देखकर बच्चा भड़का, फिर वही सब्जी, रोटी और दाल में तड़का...? मैंने कहा था न कि मैं पिज्जा खाऊंगा, रोटी को बिलकुल हाथ नहीं लगाउंगा! बच्चे ने थाली उठाई और बाहर गिराई...

बाहर थे कुत्ता और आदमी, दोनों रोटी की तरफ लपके.. कुत्ता आदमी पर भोंका, आदमी ने रोटी में खुद को झोंका और हाथों से दबाया.. कुत्ता कुछ भी नहीं समझ पाया उसने भी रोटी के दूसरी तरफ मुहं लगाया..

दोनों भिड़े जानवरों की तरह एक तो था ही जानवर, दूसरा भी बन गया था जानवर.. आदमी ज़मीन पर गिरा, कुत्ता उसके ऊपर चढ़ा कुत्ता गुर्रा रहा था और अब आदमी कुत्ता है या कुत्ता आदमी है कुछ भी नहीं समझ आ रहा था...

नीचे पड़े आदमी का हाथ लहराया, हाथ में एक पत्थर आया कुत्ता कांय-कांय करता भागा.. आदमी अब जैसे नींद से जागा हुआ खड़ा और लड़खड़ाते कदमों से चल पड़ा.... वह कराह रहा था रह-रह कर हाथों से खून टपक रहा था बहते खून के साथ ही आदमी एक झोंपड़ी पर पहुंचा..

झोंपड़ी से एक बच्चा बाहर आया और ख़ुशी से चिल्लाया.. आ जाओ, सब आ जाओ बापू रोटी लाया, देखो बापू रोटी लाया, देखो बापू रोटी लाया..

👉 आज का सद्चिंतन10 June 2019


👉 प्रेरणादायक गायत्री मंत्र की महिमा


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...