शुक्रवार, 10 मई 2019

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 14)

SUFERINGS RESULTING FROM NATURAL CALAMITIES (Bhautik Dukhas):

Divine law expects man to abide by time-tested moral codes of conduct and also make maximum possible endeavor to prevent others from violating them. If some country or community or race does not make an effort to prevent or dissuade others from committing wrong deeds, in spite of being in a position to do so; or does not promote morality and ethics despite having the means to do so, the former too has to suffer its consequences. Such collective sins of inactivity or indifference invite combined punishment
from divine justice.

Earthquakes, deluge, drought, famine, world wars are consequences of collective sins of humanity, in which karmas for vested interests were given priority and welfare of the rest of the humanity was ignored. Examples are - spread of AIDS, drug abuse and alcoholism, disintegration of families, juvenile delinquency, terrorism, environmental pollution etc. The developed countries are suffering consequences of their smug indifference towards the welfare of the underprivileged masses elsewhere.

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✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 26

👉 आज का सद्चिंतन 10 May 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 May 2019

👉 आत्मचिंतन के क्षण 10 May 2019

★ समस्त शुभ-अशुभ, सुख-दुःख की परिस्थितियों के हेतु तथा उत्थान-पतन के मुख्य कारक विचारों को वश में रखना मनुष्य का प्रमुख कर्त्तव्य है। विचारों को उन्नत कीजिए, उनको मंगल मूलक बनाइए, उनका परिष्कार एवं परिमार्जन कीजिए और वे आपको स्वर्ग की सुखद परिस्थितियों में पहुँचा देंगे। इसके विपरीत यदि आपने विचारों को स्वतंत्र छोड़ दिया, उन्हें कलुषित एवं कलंकित होने दिया तो आपको हर समय नरक की ज्वाला में जलने के लिए तैयार रहना चाहिए। विचारों की चपेट से आपको संसार की कोई शक्ति नहीं बचा सकती।

◆ आज हमारे समाज में काम का फल जल्दी से जल्दी पाने की प्रवृत्ति हो गई है। लोग खेत को बिना जोते ही-बिना बोए या सींचे ही शान्ति और सफलता रूपी फसल काटने को तैयार बैठे हैं। जब कारण ही नहीं तो कार्य कैसे हो? और जब कार्य नहीं तो उसका फल कैसे हो सकता है? शून्य से कुछ भी पाने की आशा नहीं की जा सकती है। हमारा मन एक उपजाऊ खेत है, जिससे जो वस्तु चाहो सीधे रास्ते से पैदा कर सकते हो। उसका उचित चिंतन कीजिए । जैसा बोयेंगे-वैसा ही काटेंगे।

◇ आत्मोन्नति का अर्थ है-पशुत्व से मनुष्यत्व की ओर आना। पशुत्व क्या है- मनोविकारों के ऊपर तनिक भी शासन न कर पाना, जब जैसा मनोविकार आया, उसे ज्यों का त्यों प्रकट कर दिया, काम क्षुधा, भूख, प्यास आदि वासनाएँ जैसे ही उत्पन्न  हुईं कि तुरन्त उनकी पूर्ति कर ली गई, यह  पशुत्व की स्थिति है। जब इन वासनाओं पर संयम आना प्रारंभ होता है और मानवता के उच्चतम गुण-प्रेम, सहानुभूति, करुणा, दया, सहायता, संगठन, सहयोग, समष्टि के लिए व्यक्ति में त्याग इत्यादि भावनाओं का उदय होता है, तो मनुष्य मनुष्यत्व के स्तर पर निवास करता है।

👉 The secret of happiness

Everyone has their own way of life. They live according to their choice and wisdom. They live according to their sacraments and don’t care much about the way they are living is justified. They just do whatever they like. According to them whatever they feel is right, whether it is right or wrong.

Example- Is it OK to drink alcohol? You will say, no this is not right.
Then why do lot of people drink. The answer is clear; they feel it is justified, hence they drink.  Drinking is not right but because they like it so they use to drink.
This is the way, the whole world is doing according to their own choice and liking. This is what happening all around.
But this is not the fact. The fact is something else. The fact is, if you violate Divine laws, then you will definitely get penalised.
Whether you wish or not, you will have to follow the Divine laws. This is the law of Divine that always give happiness to others, never hurt. Therefore, as far as possible, always do good deeds for others; it is for your own welfare. Avoid any sort of iniquities. Be blessed of God's grace. Do good deeds, be happy, and let others be happy. Take control of your wrong desires and try to eliminate completely. Only then will you will be blissed, otherwise no chance of any well-being.

गुरुवार, 9 मई 2019

👉 आत्मचिंतन के क्षण 9 May 2019

★ भाग्य और भविष्य परमात्मा की जबर्दस्त शक्तियाँ हैं। मनुष्य की शक्ति इनके आगे छोटी है, पर वह अपने विवेक से यह निर्णय अवश्य ले सकता है कि उसका जन्म किसलिए हुआ है और वह ईश्वरीय विधान में किस हद तक सहायक हो सकता है। यदि वह इसके लिए तैयार हो सके तो इसी जीवन में अनेक आध्यात्मिक शक्तियों का विकास करता हुआ प्रत्येक व्यक्ति आत्म कल्याण का पथ प्रशस्त कर सकता है।

◆ अच्छाई के विकास में चिन्ता, दुःख और भय भी हमारे सामने आयें तो भी उनके सुखप्रद परिणाम की आशा से हमें उस प्रक्रिया को बंद नहीं कर देना चाहिए। सरल, शुद्ध और सहन करने योग्य दुःखों ने सदैव आत्मा को बलवान् ही बनाया है-उसे ईश्वरीय दिव्य शक्तियों की अनुभूति ही कराई है। यदि ये दुःख,चिन्ता,भय,आदि अवरोध प्रेम, दया, कृतज्ञता और विश्वास का अंत करते हों तब हमें एक वीर योद्धा की भाँति उनका सामना भी करना चाहिए।

◇ सत्य की उपेक्षा और प्रेम की अवहेलना करके छल, कपट और दम्भ के बल पर कोई कितना ही बड़ा क्यों न बन जाये, किन्तु उसका वह बड़प्पन एक विडम्बना के अतिरिक्त और कुछ भी न होगा।

★ हर मनुष्य के जीवन में अवसर आता है, किन्तु एक बार निराश होने पर दुबारा नहीं आता है। किसी भी अवसर से यह आशा करना मृग मरीचिका के तुल्य है कि वह आपका द्वार दुबारा खटखटायेगा। बुद्धिमान् लोग अवसर को आगे से आलिंगन करते हैं, घेरते हैं और पकड़ते हैं, क्योंकि इसके दुम नहीं होती जो आगे बढ़ जाने पर पकड़ी जा सके।

◆ हमें यह भ्रम निकाल ही देना चाहिए कि बेईमानी कुछ कमा सकती है। वह शराब की तरह उत्तेजना मात्र है, जिससे ठगने वाला और ठगा जाने वाला बुद्धिभ्रम में ग्रस्त हो जाते हैं। नशा उतरने पर नशेबाज की जो खस्ता हालत होती है वही पोल खुलने पर बेईमानी की होती है। उसका न कारोबार रहता है, न कोई ग्राहक, सहयोगी। अतएव हमें इस कंटकाकीर्ण पगडण्डी पर चलने की अपेक्षा ईमानदारी के राजमार्ग पर ही चलना चाहिए।

👉 आज का सद्चिंतन 9 May 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 May 2019


बुधवार, 8 मई 2019

👉 विश्वास की दौलत

सऊदी अरब में बुखारी नामक एक विद्वान रहते थे। वह अपनी ईमानदारी के लिए मशहूर थे। एक बार वह समुद्री जहाज से लंबी यात्रा पर निकले। उन्होंने सफर के खर्च के लिए एक हजार दीनार अपनी पोटली में बांध कर रख लिए। यात्रा के दौरान बुखारी की पहचान दूसरे यात्रियों से हुई। बुखारी उन्हें ज्ञान की बातें बताते।

एक यात्री से उनकी नजदीकियां कुछ ज्यादा बढ़ गईं। एक दिन बातों-बातों में बुखारी ने उसे दीनार की पोटली दिखा दी। उस यात्री को लालच आ गया। उसने उनकी पोटली हथियाने की योजना बनाई। एक सुबह उसने जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया, ‘हाय मैं मार गया। मेरा एक हजार दीनार चोरी हो गया।’ वह रोने लगा। जहाज के कर्मचारियों ने कहा, ‘तुम घबराते क्यों हो। जिसने चोरी की होगी, वह यहीं होगा। हम एक-एक की तलाशी लेते हैं। वह पकड़ा जाएगा।’

यात्रियों की तलाशी शुरू हुई। जब बुखारी की बारी आई तो जहाज के कर्मचारियों और यात्रियों ने उनसे कहा, ‘अरे साहब, आपकी क्या तलाशी ली जाए। आप पर तो शक करना ही गुनाह है।’ यह सुन कर बुखारी बोले, ‘नहीं, जिसके दीनार चोरी हुए है उसके दिल में शक बना रहेगा। इसलिए मेरी भी तलाशी भी जाए।’ बुखारी की तलाशी ली गई। उनके पास से कुछ नहीं मिला।

दो दिनों के बाद उसी यात्री ने उदास मन से बुखारी से पूछा, ‘आपके पास तो एक हजार दीनार थे, वे कहां गए?’ बुखारी ने मुस्करा कर कहा, ‘उन्हें मैंने समुद्र में फेंक दिया। तुम जानना चाहते हो क्यों? क्योंकि मैंने जीवन में दो ही दौलत कमाई थीं- एक ईमानदारी और दूसरा लोगों का विश्वास। अगर मेरे पास से दीनार बरामद होते और मैं लोगों से कहता कि ये मेरे हैं तो लोग यकीन भी कर लेते लेकिन फिर भी मेरी ईमानदारी और सच्चाई पर लोगों का शक बना रहता। मैं दौलत तो गंवा सकता हूं लेकिन ईमानदारी और सच्चाई को खोना नहीं चाहता।

👉 बोझ

एक महात्मा ने पूछा कि सबसे ज्यादा बोझ कौन सा जीव उठा कर घुमता है ?........
किसी ने कहा गधा तो किसी ने बैल तो किसी ने ऊंट अलग अलग प्राणीयो के नाम बताए।
लेकिन महात्मा किसी के भी जवाब से संतुष्ट नहीं हुए।

महात्मा ने हंसकर कहा - गधे, बैल और ऊट के ऊपर हम एक मंजिल तक बोझ रखकर उतार देते हैं लेकिन, इंसान अपने मन के ऊपर मरते दम तक विचारों का बोझ लेकर घूमता है किसी ने बुरा किया है उसे न भूलने का बोझ, आने वाले कल का बोझ, अपने किये पापों का बोझ इस तरह कई प्रकार के बोझ लेकर इंसान जीता है।

जिस दिन इस बोझ को इंसान उतार देगा तब सही मायने मे जीवन जीना सीख जाएगा।

👉 आज का सद्चिंतन 8 May 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 May 2019


👉 The Absolute Law Of Karma (Part 14)

SUFERINGS RESULTING FROM NATURAL CALAMITIES (Bhautik Dukhas):

Of late, science has begun to appreciate the impact of lop-sided human activities on pervasive global life-sustaining elements of nature. Indiscriminate use of chloroflouro carbons by some developing countries is damaging the global atmosphere for entire humankind by producing the greenhouse effect. Reckless deforestation in certain parts of the world is creating worldwide ecological imbalances. Such examples illustrate that basic elements of nature are globally interdependent and local changes in them have universal implications. The following observations bring out this eternal truth.

“Pran”- the universal life force, is one of the vital elements of nature, which is an integral constituent of all animate beings. The entire human race is inter-connected with this allpervasive element. Each spark of life in the individual animate being, which is known as “Atma” in spiritual parlance, is part of the omnipresence of THAT universal life force. The science of spirituality maintains that karmas and samskars of all living beings are mutually interactive. In social milieu these reactions are quite prominent. A criminal brings shame to his parents and family as well.

The latter too suffer disgrace since disregarding their responsibilities by not performing the right karmas; they did not exert enough influence to make the person a good citizen. The responsibility for spiritual development of the child (a virtuous karma) lies with the parents and other adults of the family. Hence, though in the material world only the offender receives the punishment from the law enforcers and the society, the souls of the parents and other family
members too have to suffer partially for this dereliction of duty, which the divine jurisprudence considers as a sin. When the neighbor's house is on fire, you cannot remain a silent spectator, since soon you may also become a victim. If in spite of being capable of preventing, one looks on at acts of theft, burglary, rape, murder etc. indifferently, the society would look down upon such a person contemptuously and the law would also not spare him. The laws of divine justice too follow a similar norm.

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✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
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👉 आत्मचिंतन के क्षण 8 May 2019

★ ये है तलवार कुछ भी काट दे इतनी है धार, शत्रु का विनाश करने में सक्षम, दूसरी ओर है ये ढाल किसी भी प्रहार को सहपाने में सक्षम, शत्रु से रक्षा की ढाल, रक्षा की दीवार है। इन दोनों के कार्य भिन्न हैं, इन दोनों का उद्देश्य भिन्न है, लेकिन इन दोनों के मूल एक ही हैं। दोनों बने हैं लोहे से। लोहे के खण्ड से बनी है ये तलवार, लोहे के खण्ड से बनी है ये ढाल। तलवार का मंतव्य है प्रहार, और ढाल का मंतव्य है बचाव। अन्तर किसका है? अन्तर है केवल सोच का। ये सोच ही है जो सच बनकर सामने आती है, संसाधन कभी भी व्यक्ति को सुखी नहीं करते, किन्तु सोच व्यक्ति का व्यक्तित्व बनाती है। या तो आप इन संसाधनों का प्रयोग नाश करने के लिये करो, या इन संसाधनों का प्रयोग उद्धार करने के करो। चयन आपका है।

◆ इस वृक्ष को देख रहे हैं आप कितना अडिग, दिनभर धूप में खड़ा रहता है, धूप में बैठने वाले को छाया देने के लिए। अब जैसे-जैसे समय बीतता है वैसे-वैसे इस वृक्ष की टहनियों पर पत्तों के साथ-साथ फूल खिलने लगते हैं। ये फूल बाद में फल बन जाते हैं। अब समय के साथ-साथ जब ऋतु बदलता है, तो ये फल तोड़े जाते हैं। कुछ फल गिर जाते हैं। पतझर आने पर इस पेड़ के पत्ते तक इसका साथ छोड़ देते हैं। किन्तु ये वृक्ष अडिग रहता है। नये फलों के आने का इंतजार करता रहता है। न फलों के आने का उत्सव मनाता है, न पतझड़ के आने का शोक और हम इस वृक्ष की पूजा करते हैं। क्योंकि ये वृक्ष अपने स्थान पर अडिग रहता है। इसी प्रकार सुख और दुःख हमारे जीवन का अभिन्न अंग हैं। सुख और दुःख हमेशा रहेंगे, इसलिये न कभी सुख के आने पर अभिमान से भर जाएँ, न कभी दुःख के आने पर शोक मनाएँ। क्योंकि सुख और दुःख जीवनरूपी वृक्ष के फल हैं, ये आते रहेंगे-जाते रहेंगे लेकिन सुख और दुःख में व्यक्ति अडिग होगा, वही पूजनीय होगा।

◇ हीरा। हमारे लिए अत्यंत प्रिय, अत्यंत चमकदार, हीरे की चमक तो सभी जानते हैं। किन्तु ये चमक आती कैसे है? किसी दूसरे हीरे से इस हीरे को तराशा गया है। तब जाके ये संभव हो पाया है। कितनी अच्छी बात है। स्वयं से स्वयं को तराशो और स्वयं को ही और बेहतर बना दो। अब सोचिये क्या कीचड़ से कीचड़ को साफ किया जा सकता है? नहीं। उसके लिये आपको आवश्यकता होगी शुद्ध-निर्मल जल की। इसी प्रकार अच्छाई से अच्छाई को, और भी सुन्दर बनाया जा सकता है, किन्तु बुराई से बुराई को सुधारा नहीं जा सकता। सर्वप्रथम अपने मन को पावन करें, अपने मन को शुद्ध करें और फिर देखें इस दृष्टि से संसार को। ये संसार अपने आप शुद्ध लगने लगेगा। यदि किसी में आप विकार देखो तो शुभ कर्म करके उसका विकार दूर करो, उसकी सहायता करो। ना कि उसके विकार देख के स्वयं के मन में विकार लाओ। क्योंकि आप हीरे हो, किसी और हीरे को तराशने में उसकी सहायता करो। अच्छा लगेगा।

सोमवार, 6 मई 2019

👉 आत्मचिंतन के क्षण 6 May 2019

★ धर्म ग्रन्थों में मामूली से कर्म काण्ड के फल बहुत ही बढ़ा-चढ़ा कर लिखे गये हैं। जैसे गंगा स्नान से सात जन्मों के पाप नष्ट होना, व्रत उपवास रखने से स्वर्ग मिलना, गौदान से वैतरणी तर जाना, मूर्ति पूजा से मुक्ति प्राप्त होना, यह सब बातें तत्व ज्ञान की दृष्टि से असत्य हैं क्योंकि इन कर्मकाण्डों से मन में पवित्रता का संचार होना और बुद्धि का धर्म की ओर झुकना तो समझ में आता है, पर यह समझ में नहीं आता कि इतनी सी मामूली क्रियाओं का इतना बड़ा फल कैसे हो सकता है? यदि होता तो योग यज्ञ और तप जैसे महान साधनों की क्या आवश्यकता रहती? टके सेर मुक्ति का बाजार गर्म रहता।

◆ भिक्षा अनैतिक है। भिक्षा व्यवसायी की मनोभूमि दिन-दिन पतित होती जाती है। उसका शौर्य, साहस, पौरुष, गौरव सब कुछ नष्ट हो जाता है और दीनता मस्तिष्क पर बुरी तरह छाई रहती है। अपराधी की तरह उसका सिर नीचा रहता है। अपनी स्थिति का औचित्य सिद्ध करने के लिए उसे हजार ढोंग रचने पड़ते हैं और लाख तरह की मूढ़ताएँ फैलानी पड़ती हैं। यह भार जनमानस को विकृत बनाने की दृष्टि से और भी अधिक भयावह है। हर विचारशील का कर्त्तव्य है कि भिक्षा व्यवसाय को  निरुत्साहित करे। $कुपात्रों को वाणी मात्र से भी उत्साह न दें।

◇ यह नहीं देखना चाहिए कि बुराई से वैभव बढ़ता है। यदि ऐसा हुआ भी तो वह क्षणिक ही होगा। बुराई  जितनी जल्दी बढ़ती है, उतनी ही जल्दी नष्ट हो जाती है, साथ ही कर्त्ता को भी नष्ट कर डालती है। आकाश तक फैलती है और अंत में सिकुड़कर स्वयं बुराई करने वाले के सिर पर आकर पड़ती है।

■ दुष्ट विचार हमारा सबसे बड़ा शत्रु है। पाप का विचार, चोरी, कपट, ईर्ष्या, निराशा का विचार हमारा सर्वनाश कर सकता है। ईश्वर का एक मानसिक चित्र अंतःकरण में तैयार कर लें और सत्य, प्रेम, न्याय से अपना हृदय नित्य विकसित करते रहें। स्वतंत्रता, स्वच्छन्दता और शान्ति के विचार हमारे दोस्त  हैं। ये हमें सिखाएँगे कि जीवन पूर्ण सुखमय है तथा उसके अनुभवों से झगड़ना मूर्खता में शामिल है।

शनिवार, 4 मई 2019

👉 सच्चे मित्र

कोई भी व्यक्ति संसार में अकेला नहीं जी सकता, क्योंकि वह अल्पशक्तिमान् है। इसलिए अपने सारे काम स्वयं नहीं कर सकता। एक दूसरे की सहायता लेनी ही पड़ती है। और सब लोग, सब की सहायता करते नहीं। सहायता लेने देने के लिए एक आपसी संबंध होता है, जिसे मित्रता कहते हैं। मित्र का अर्थ होता है, स्नेह करने वाला. यह स्नेह संबंध चाहे मां बेटी में हो, चाहे पिता पुत्र में हो, चाहे पति-पत्नी में हो, चाहे दो दोस्तों में हो,  इन सब में जो स्नेह का संबंध है, वही मित्रता है।

मित्र ऐसा बनाएं, जो एक दूसरे के कष्ट को समझे, और हृदय से उस की समस्याओं को दूर करने का पूरा प्रयत्न करे।

संसार में आपको बहुत से ऐसे लोग मिलेंगे, जिनमें इस प्रकार की मित्रता देखी जाती है। उदाहरण के लिए यदि बेटा बीमार हो जाए, तो माता-पिता को नींद नहीं आती। दिन-रात उसकी सेवा करते हैं। और पूरी शक्ति लगाकर वैद्य डॉक्टरों की सहायता से उसे स्वस्थ बना देते हैं । ऐसे ही यदि माता पिता को कष्ट हो, यदि वे रोगी या वृद्ध हो जाएँ, तो बच्चों को भी वैसी ही सेवा करनी चाहिए, जैसी माता पिता अपने बच्चों की करते हैं। बस इसी संबंध का नाम सच्ची मित्रता है। अन्यथा बहुत से लोग मित्रता का केवल दिखावा करते हैं। सच्ची मित्रता, सच्चा स्नेह उनमें नहीं होता। ऐसे नकली मित्रों से और नकली रिश्तेदारों से सावधान रहें।

सब लोगों को पहचानें। जो हृदय से सेवा करते हैं, सच्चे मित्र हैं, उनके साथ ही जीवन जीने में, जीवन का सच्चा आनंद है।

शुक्रवार, 3 मई 2019

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 May 2019

👉 आज का सद्चिंतन 3 May 2019


👉 प्रेम का अमरत्व और उसकी व्यापकता

कोई व्यक्ति जीवनभर प्राइमरी पाठशाला में ही पढ़ते रहने की जिद करे और अगले बड़े स्कूल में जाने के लिए तैयार न हो तो "उसे बाल बुद्धि ही कहा जाएगा।" "प्रेम" का प्रशिक्षण घर-परिवार में हो या किसी वस्तु अथवा व्यक्ति से प्रारम्भ हो, उसकी स्वाभाविकता समझ में आती है, पर जब कोई उतने तक ही सीमाबद्ध होकर रह जाएगा, "आगे न बढ़ेगा तो रुके हुए पानी की तरह सड़न पैदा हुए बिना न रहेगी।'

जो "प्यार" सीमा बद्ध होकर रह जाता है, उसे "मोह" कहते हैं, "मोह" में पक्षपात जुड़ जाता है, औचित्य का ध्यान नहीं रहता। प्रिय पात्र की त्रुटियों का परिमार्जन करने की इच्छा नहीं होती वरन "उन्हें भी प्रिय मानकर समर्थन किया जाने लगता है।" इससे "प्रेम" की महत्ता ही नष्ट हो जाती है।

"प्रेम" गंगाजल है, जिसे जहाँ छिड़का जाए, वहीं पवित्रता पैदा करे," पर यदि वह गंदे नाले में गिरकर अपनी पवित्रता खो दे तो इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा।

"प्रेम" लगाव का पात्र नहीं है और न पक्षपात के अथवा हर प्रकार के समर्थन-सहयोग का। "उसमें आदर्शो की अविच्छिन्नता जुड़ी रहती है।" "आदर्श विहीन प्यार को "मोह" कहेंगे।" "मोह" अपने प्रिय पात्र के अनुचित कार्यों का भी समर्थन करने लगता है, तब उसकी ऊँचा उठने की क्षमता नष्ट हो जाती है "मोह" को "प्रेम" की विकृति ही कह सकते हैं," इसलिए उसकी प्रशंसा नहीं की जा सकती है।

पं.श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी 1972 पृष्ठ 3

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 13)

PHYSICAL SUFFERINGS (Daihik Dukhas):

The cause of congenital deficiencies and genetic diseases is misutilisation of the corresponding organs in the previous life–cycles. After death, the soul discards the physical body but carries forward the astral body (Sookchma Shareer) to the next life. In the succeeding birth, the new body is shaped by this astral body. The astral body carries with it nuclei (seeds) of samskars of earlier physical existence to the next reincarnation. The corresponding components of physical organs, which are immorally used in the previous life, lose their vitality in the astral body but manifest as malfunctioning of those organs in the physical body of the next birth. Thus it is possible for a sexually indulgent person to be born with congenital impotence or with imperfections in sexual organs in the next life (Note that Roman Catholic Church defines indulgence as “a partial remission of the temporal punishment that is still due for sin after absolution). Giving exemplary punishment for over- indulgence in this manner, the divine justice also provides the being an excellent opportunity for self-upliftment.

The temporary period of non-function or malfunctions of the affected faculty serves the purpose of caution as well as rejuvenation for the next life. That is to say whichever organ of the body is recklessly misused for sense gratification is deemed to be engaged in a physical sin. In the next life that organ is either found missing or appears as a congenital defect. Thus congenital physical
deformities or diseases are for remission of sins. (ref. Absolution –Roman Catholic Theory.) The compulsive rest rejuvenates the organ of the body and also relieves the burden of sin from the mind through repentance. When a mental sin is intermixed with a physical sin and it has not been neutralized in the present life by punishment by the state, society or by atonement, it is also carried over to the next life.

However, if the sin is basically physical with little  or no input of mental sin (deliberate intention), the biological system immediately takes care of it. For instance man gets intoxicated and deranged on taking drugs, falls sick because of dietary irregularities or dies on consuming the poison. This is a physical punishment for a physical sin. The body cleans itself of the small physical sins speedily and these are neutralized in this very life. On the other hand, as mentioned earlier, serious physical vices, which are also associated with mental stimuli, are carried over by the astral body for being worked out in the next life.

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✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 24

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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