मंगलवार, 9 अप्रैल 2019

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 5)

HOW DOES CHITRAGUPTA MAINTAIN THE RECORD?

In human society, there are two departments for punishing the violators of law- namely the police and the court of justice. The police arrest the accused, collect the evidence and present these in the court of law. Thereafter the process of justice takes over. The judge delivers the judgement after considering all aspects of the offence and related circumstances. Depending on the circumstantial evidence, individuals are handed down varied sentences for the same type of offence. Let us consider an example. Three persons are accused of killing a person. Because of different circumstances associated with the crime, one is set free, the second person is sentenced to five years of imprisonment and the third is sent to the electric chair.

The person, who was released, was a mason. While working at an elevated label, he had accidentally dropped a brick, which killed a passer by. The presiding judge found that the brick was dropped accidentally and unintentionally, without an ulterior motive. Hence the accused was released without punishment. The second accused was a farmer. Finding a thief stealing his crop, he had given him a fatal blow, killing the offender. Taking the circumstances, which prompted the offence, the judge considered that though it was natural for the farmer to show his anger on finding someone stealing his property, nevertheless, since he had over-reacted to a small offence, a sentence of five years imprisonment was given. The third person was a notorious robber who had robbed a rich man and intentionally killed him in the process. In this way the worldly court of justice pronounces judgement after minutely examining all circumstantial evidences.

In the inner-mind the secret recordings of Chitragupta discharge the dual responsibility of the police and court of justice. In the material world, if the prosecutor presents inadequate or false evidence, the judgement of the court is likely to be unfair, but in the inner occult world there is absolutely no possibility of such miscarriage of justice. The inmost mind, being the direct and transparent witness to all physical as well as mental activities of a person, is wholestically aware of the intentions, motives and circumstances of each and every action. Being wholestically informed, the secret mind does not require the testimony of the external mind to arrive at a conclusion. In Divine Justice the gravity of a sin (vice) or merit of a virtue is decided on the basis of the motive and degree of emotional involvement with the deed. Whereas in the material world objects are measured materially on the basis of their mundane worth, this measure is irrelevant for dispensing Divine Justice. The material world may ignore a poor donor of ten cents and admire a person donating ten thousand dollars, but in Divine Jurisprudence the worth of such acts of altruism will not be assessed on this gross physical basis.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 12

👉 आत्मचिंतन के क्षण 9 April 2019

★ समर्पण की सच्ची साधना है- अंतःकरण में न कोई छल, न छद्म। अपनी बौद्धिक क्षमताएँ, यश, सक्रियता, प्रगति सब ध्येय के प्रति अर्पित हों।  यह सौभाग्य जिन प्रयोजनों को मिल जाते हैं, चाहे वे सांसारिक हों या आध्यात्मिक, उनकी सफलता की आधी मंजिल तत्काल पूर्ण हो जाती है। साथ ही उस समर्पित आत्मा को ईश्वरीय सान्न्ध्यि का एक ऐसा दिव्य लाभ इसी साधना से मिल जाता है, जिसके लिए योगाभ्यास और जन्म-जन्मांतरों के दोष-परिमार्जन की एक कठिन  और लम्बी साधना पूरी करनी पड़ती।

◆ ज्ञानयोग की साधना यह है कि मस्तिष्कीय गतिविधियों पर-विचारधाराओं पर विवेक का आधिपत्य स्थापित किया जाय। चाहे जो कुछ सोचने की छूट न हो। चाहे जिस स्तर की चिंतन प्रक्रिया अपनाने न दी जाय। औचित्य-केवल औचित्य-मात्र औचित्य ही चिंतन का आधार हो सकता है। यह निर्देश मस्तिष्क को लाख बार समझाया जाय और उसे सहमत अथवा बाध्य किया जाय कि इसके अतिरिक्त उसे और किसी अनुपयुक्त प्रवाह में बह चलने की छूट न मिल सकेगी।

◇ नियति क्रम से हर वस्तु का-हर व्यक्ति का अवसान होता है। मनोरथ और प्रयास भी सर्वदा सफल कहाँ होते हैं। यह सब अपने ढंग से चलता रहे, पर मनुष्य भीतर से टूटने न पाये इसी में उसका गौरव है। जैसे समुद्र तट पर जमी हुई चट्टानें चिर अतीत से अपने स्थान पर जमी अड़ी बैठी हैं। हिलोरों ने अपना टकराना बंद नहीं किया सो ठीक है, पर यह भी कहाँ गलत है कि चट्टान ने हार नहीं मानी। न हमें टूटना चाहिए और न हार माननी चाहिए।

■ वर्तमान ही हमारा है। हमें तो पहले आज की परवाह करनी चाहिए। यह सुंदर सुहावना आज, यह उल्लासपूर्ण आज ही हमारी अमूल्य निधि है। यह आज ही हमारे हाथ में है। यह हमारा साथी है। इस आज की ही प्रतिष्ठा कीजिए। आज के साथ खूब खेलिए, कूदिए, मस्त रहिए और इसे अधिकाधिक उत्साहपूर्ण और उल्लासपूर्ण बनाइए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1 द्वितीयोSध्याय) श्लोक 9 से 13

सत्ये युगे नरा: सर्वे सुसंस्कृतसमुन्नतम्।
देवजीवनपद्धत्या जीवन्ति स्म, धरामिमाम्॥९॥
स्वर्ग्येणैव तु दिव्येन वातावरणकेन ते।
भरितां विदधानाश्च विचरन्ति, कथं पुन:?॥१०॥
कारणं किं समुत्पन्नं पातगर्ते यथाऽपतन्।
साम्प्रतीकीं स्थितिं दीनां गता: सर्वे यतो मुने॥११॥
दुर्धर्षायां विपत्तौ तु विग्रहे वाप्युस्थिते।
उत्पद्यते विवशता नैतदस्ति तु साम्प्रतम्॥१२॥
सामान्यं दिनचर्याया: क्रमश्चलति मानवा:।
शक्तिसाधनसम्पन्ना: पातगर्ते पतन्ति किम्?॥१३॥

टीका- सतयुग में सभी मनुष्य समुन्नत सुसंस्कृत स्तर का देव जीवन जीते थे और इस धरती को स्वर्ग जैसे दिव्य वातावरण से भरा-पूरा रखते थे। फिर क्या कारण हुआ जिससे लोग पतन के गर्त में गिरे और आज जैसी दयनीय स्थिति में जा पहुँचे। कोई दुर्धर्ष-विपत्ति-विग्रह आने पर विवशता उत्पन्न हो सकती है किन्तु सामान्य-क्रम चलते रहने पर भी शक्ति-साधनों से सम्पन्न मनुष्य अधःपतन के गर्त में क्यों गिरते जा रहे है

व्याख्या- ऐसी बात नहीं कि जब से मनुष्य को यह जन्म मिला हैं-सृष्टि की उत्पत्ति व विकास हुआ है-यह हेय स्तर का ही जीवन जीता आया है। मानव सतयुग में सभ्य-सुसंस्कृत जीवन भी जी चुका है। श्रेष्ठता की उसे ऊँचाई पर पहुँचकर फिर जीचे गिर पड़ना कहाँ तक उचित माना जायेगा? होना तो यह था कि आज स्थिति सतयुग से भी श्रेष्ठ स्तर की स्वर्गोपम होती। परन्तु ऋषि पाते हैं कि प्रस्तुत परिस्थितियाँ तो नारकीय स्थिति से भी गयी बीती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 39

सोमवार, 8 अप्रैल 2019

👉 धर्म का आचरण (भाग 1)

आप यह अच्छी तरह समझ रक्खें कि किसी धर्म-पुस्तक का पाठ करने अथवा उसमें लिखी हुई धर्म विधियों की कवायद करने से ही कोई धार्मिक नहीं हो सकता। किसी धर्म या धर्म-पुस्तक पर विश्वास करने से ही यह ‘जन्म सार्थक नहीं होगा’ उसमें बताये हुए मार्गों का अनुभव करना चाहिये। ‘जिनका अन्तःकरण पवित्र है, वे धन्य हैं, वे ईश्वर को देख सकेंगे ।’ यह बाइबिल का कथन अक्षरशः सत्य है। परमेश्वर का साक्षात्कार करना ही मुक्ति है। कुछ मन्त्र रट लेने या मन्दिरों में शब्दाडम्बर करने से मुक्ति नहीं मिलती,परमात्मा की प्राप्ति के लिए बाह्य साधन कुछ काम नहीं आते, उसके लिये आन्तरिक सामग्री की जरूरत है। इससे कोई यह न समझलें कि बाहरी साधनों का मैं विरोधी हूँ। आरम्भ में उनकी आवश्यकता होती ही है पर साधक जैसा-जैसा उन्नत होता है, वैसी-वैसी उसकी उस ओर से प्रवृत्ति कम हो चलती है, आप यह निश्चय समझें कि किसी पुस्तक ने ईश्वर को उत्पन्न नहीं किया किन्तु ईश्वर की प्रेरणा से धर्म पुस्तकों की रचना हुई है।

यही बात जीवात्मा और परमात्मा का ऐक्य कर देने का है। यही विश्वधर्म है। कल्पना और मार्ग भिन्न 2 होने पर भी सबका केन्द्र एक ही है। सब धर्मों का मूल्य क्या है? ऐसा यदि कोई मुझ से प्रश्न करे तो मैं उसे यही उत्तर दूँगा कि ‘आत्मा की परमात्मा से एकता कर देना ही सब धर्मों का मूल है। सच्ची दृष्टि से छाया के समान देख पड़ने वाले और इंद्रियों से अनुभव होने वाले इस जगत में जिस दिन परमात्मा का अनुभव कर लेंगे उसी दिन हम कृतकार्य होंगे तब हमको इस बात के विचार करने की आवश्यकता न होगी कि हमें यह दसा किस मार्ग से प्राप्त हुई है। आप चाहे किसी मत को स्वीकार करें, या न करें किसी मत या पन्थ के कहावें या न कहावें परमेश्वर का अस्तित्व अपने आप में अनुभव करने से ही आपका काम बन जायगा।

कोई मनुष्य संसार के सब धर्मों पर विश्वास करता होगा, संसार के सब धर्म ग्रन्थ उसे कंठस्थ होंगे, संसार के सब तीर्थों में उसने स्नान किया होगा । तो भी यह सम्भव नहीं है कि परमात्मा की स्पष्ट कल्पना भी उसके हृदय में हो ! इसके विपरीत सारे जीवन में जिसने एक भी मन्दिर या धर्मग्रन्थ नहीं देखा और न उसमें लिखी कोई विधि ही की होगी, ऐसा पुरुष परमात्मा का अनुभव अन्तःकरण में करता हुआ देख पड़ना सम्भव है।

स्वामी विवेकानन्द जी
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1941 पृष्ठ 9

रविवार, 7 अप्रैल 2019

👉 26 साल के इंजिनियर ने नौकरी छोड़ जिंदा किए मरते 10 तालाब

मरते तालाबों को जिंदा करने को मकैनिकल इंजिनियर रामवीर तंवर ने अपनी नौकरी को बाय-बाय कह दिया। रामवीर मकैनिकल इंजिनियरिंग में बीटेक हैं और एक एमएनसी में काम करते थे। ग्रेटर नोएडा में रहने वाले रामवीर ने कहा, 'जल संरक्षण के काम में करियर मेरे लिए एसी ऑफिस में बैठने से ज्यादा अहमियत रखता है।' पिछले 5 सालों में रामवीर 10 तालाबों को जिंदा कर चुके हैं।

ग्रेटर नोएडा गौतम बुद्ध नगर जिले का हिस्सा है और यहां सैकड़ों छोटे-छोटे तालाब हैं, जिनकी देखरेख नहीं हो पा रही थी। अब रामवीर ने यह बीड़ा उठाया है। रामवीर ग्रेटर नोएडा के ही एक किसान के बेटे हैं। 60 एकड़ में फैले सूरजपुर वेटलैंड जैसे बड़े जलाशयों को तो वन संरक्षण नियमों के मुताबिक संरक्षण मिला हुआ है लेकिन डाढा गांव में आए दिन पानी की दिक्कत पेश आती थी। यहीं पले-बढ़े रामवीर देखते थे कि किस तरह छोटे-छोटे जलाशय सूख रहे हैं और उनका इस्तेमाल कूड़ा फेंकने के लिए होना लगा, जबकि इन्हीं जलाशयों पर यहां रहने वाले कई परिवारों की पानी की जरूरत निर्भर करती है। वह बताते हैं, 'मैं जलाशयों के साथ होते इस गलत व्यवहार को देखते-देखते हुए बड़ा हुआ हूं।'

21 साल की उम्र में जब रामवीर कॉलेज स्टूडेंट थे, उन्होंने जलाशयों की सफाई के लिए गांववालों की जल चौपाल लगाई। नौकरी छोड़ने के बाद रामवीर पूरी तरह इसी काम में लग गए।

👉 खर्च चलाने को देते हैं ट्यूशन

धीरे-धीरे इस काम के लिए वॉलंटियरों की टीमें बनाई गईं। रामवीर ने बताया, जल्द जल चौपाल एक ऐसा प्लैटफॉर्म बन गई, जो एक गांव से दूसरे गांव जाकर लोगों को जल संरक्षण के बारे में बताते हैं। वे बताते हैं कि जलाशयों में कूड़ा फेंकना बंद करने की जरूरत है। वॉलंटियरों ने सबसे पहले 2014 में डाबरा गांव में जलाशय की सफाई का काम किया। रामवीर बताते हैं कि उस जलाशय में बहुत कूड़ा था। उस साफ करने में महीनों लग गए। इसके बाद एक फिल्टर सिस्सटम बनाकर हमने पानी की सफाई की, उसे सिंचाई के लिए किसानों के उपयोग लायक बनाया। जलाशय को साफ बनाए रखने के लिए उसने मछलीपालन को प्रोत्साहित किया गया।

जलाशयों को जिंदा करने के लिए और लोगों की जरूरत थी, इसके लिए रामवीर ने सोशल मीडिया का सहारा लिया। वह बताते हैं, हमारे फेसबुक पेज 'बूंद-बूंद पानी' के अब एक लाख से ज्यादा सदस्य हैं। जब भी हमें वॉलंटिअर्स की जरूरत हुई, हम पेज पर अनाउंस कर देते और हर बार करीब 100 लोग संरक्षण के इस काम लिए पहुंच जाते, फिर चाहे इलाका दूरदराज का ही क्यों न हो।

रामवीर ने अपना जॉब छोड़ा और शाम के समय ट्यूशन देकर घर का खर्च चलाते हैं। उनके काम ने लोगों का ध्यान तब खींचा, जब पिछले साल उन्होंने #सेल्फीविदपॉन्ड के के साथ गांववालों को अपने इलाके के जलाशयों की तस्वीरें भेजने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया। इसके बा से स्पॉन्सरशिप के मौके आए। रामवीर ने बताया, 'काफी मेहनत के बाद हमें साल 2018 में 2.5 लाख की सीएसआर फंडिंग मिली।' उन्होंने पूरे पैसे को जलाशयों को जीवंत करने के काम पर लगा दिए।

👉 अपनी कमजोरियों को दूर कीजिये (अंतिम भाग)

(6) अन्य मनुष्यों से किसी वस्तु के मिलने की आशा मत रखिये। आप यदि दूसरों से कुछ मिलने की आशा करेंगे, तो वह वस्तु न मिलने पर अवश्य ही आप दुखी होंगे अतः दिल से भी किसी की वस्तु मत माँगिये! दूसरों के स्वभाव को परिवर्तित करने की व्यर्थ चेष्टा मत करिये। जो जैसा है, उसे वैसा ही रहने दीजिये। जो मनुष्य ऐसा नहीं करते वे पिता-पुत्र, पति-पत्नी, सम्बन्धी एवं कोई भी हों, स्वभाव के कारण एक दूसरे के व्यवहार से अत्यन्त दुखी रहते हैं।

उपर्युक्त ढंग से बुरे विचारों से पूर्ण मानसिक दशा को परिवर्तित करिए, इस प्रकार आप दुखी होने से बच सकेंगे। बातों पर विचार करिए और प्रसन्नता एवं आनन्द का अनुभव करिए

(7) किसी भी परिचित मनुष्य की, जिससे आपको कुछ कार्य भी सिद्ध करना है, इच्छाओं, और कठिनाइयों, जिनके कारण वह दुखी है लिख लीजिए। उसकी सहायता करने और उसे प्रसन्न करने की चेष्टा करिये। दूसरे मनुष्यों को सुखी एवं प्रसन्न करने का सच्चा प्रयत्न स्वर्गीय आनन्द प्राप्त करने का मूल मन्त्र है जो वर्णन नहीं, केवल अनुभव ही किया जा सकता है! उस मनुष्य का, जिसे आपने प्रसन्न करने की चेष्टा की है, सन्तोष, हर्ष, उल्लास एवं आनन्द से प्रसन्न मुख देखकर आप स्वयं हर्ष से फूल उठेंगे।

कल के विषय में न सोचने का दृढ़ संकल्प कर लीजिये। उमर खय्याम की भाँति जीवन के प्रति क्षण में आनन्द और सुख का अनुभव कीजिये। न बीते हुए पर दुखी होइए और न भविष्य से डरिए।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1956 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1956/February/v1.27

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 April 2019


👉 आज का सद्चिंतन 7 April 2019


👉 The Absolute Law Of Karma (Part 4)

HOW DOES CHITRAGUPTA MAINTAIN THE RECORD?

Let us now discuss the working of Chitragupta. Why and how this deity evaluates the deeds of a person and what are the yardsticks of this evaluation? We shall also find out how after physical death, the lines of fate drawn by Chitragupta determine a soul’s new incarnation in conditions of hell or heaven. In the foregoing discussion, the reader has been introduced to the concept that our sub-conscious mind, itself operates as the deity Chitragupta. It keeps a continuous micro-record of our good and evil deeds in a condensed form, like the recordings on a small compact disc, the details of our virtuous and sinful deeds registered microscopically and subtly on certain neurons on the inner chambers of mind. In this way the writings of Chitragupta could be regarded as shorthand notes taken by the divine stenographer, Chitragupta, for presentation as testimony for objective evaluation of the total span of our life.

We are aware that human mind works on two levels- one external and the other internal. The outer mind is analytical. It analyses the pros and cons, accepts and discards, takes decisions and changes resolutions. The inner mind, on the other hand, is like an innocent but resolute child. It neither accepts nor discards anything, but as the true faithful representative of the Divine, functions impartially toward divine justice. The external mind may think of escaping punishment by suppressing or overlooking the recordings of the lines of evil deeds and highlight only the virtuous deeds for reward. The inner mind (conscience is one of its constituents), on the other hand, works differently.

It takes decisions like an unbiased judge of highest integrity, who cannot be influenced by allurement, fear or vested interest. It is said that in each human being there co-exist a saint and a devil. You may consider the secret inner mind as a representative of divinity and the external mind, which is ever engaged in reasoning, rationalizing, deliberating, conspiring and hypocrisy, as a tool of the devil. The external mind may deceive the soul by justifying each and every action of a person. The inner-mind, on the contrary, is the flame of the soul and a projection of the Absolute Truth. It is, therefore, incapable of conceit and deceit and is innately calm and detached. That is why God has entrusted it with such crucial responsibility. For the common man, it is the deity Chitragupta. Being absolutely impartial, this deity has been given the high seat of Divine Judge. Like a secret service agent, this deity is all the time vigilantly shadowing a person and recording his action in its secret diary.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 10

👉 आत्मचिंतन के क्षण 7 April 2019

★ अंतरात्मा में यदि किसी दिव्य वाणी को सुनने की शक्ति हो तो अपने  भीतर बैठा हुआ कोई ‘नैतिक’ यह कहते हुए पाया जायेगा कि जो सुख-साधन समाज के अनुग्रह से मिले हैं, उन्हें लूट का माल न समझा जाय, ऋण माना जाय और उसका प्रतिदान चुकाया जाय। यदि इस आत्मा की पुकार को न सुना जाय तो उसका प्रतिफल यह होगा कि ऋणग्रस्तों की तरह अपना अंतःकरण भारी होता चला जाएगा और उस उल्लास की अनुभूति न हो सकेगी, जो जीवन देवता के अनुग्रह से हर घड़ी होती रहनी चाहिए।

◆ अपने साथ पक्षपात की आदत से प्रायः सभी लोग घिरे रहते हैं। दूसरों की आलोचना करने के लिए काफी तथ्य संग्रह कर लिये जाते हैं, पर अपनी खामियाँ, खराबियाँ ढूँढने के लिए किसी की रुचि नहीं होती। इतना ही नहीं, कोई वैसा सुझाता है तो बुरा लगता है। इस स्वभावगत दुर्बलता से लोहा लेकर जो अपनी कमजोरियों को स्वयं ढूँढते हैं, उन्हें स्वीकार करते हैं और सुधारने के लिए बार-बार असफल होने पर भी धैर्यपूर्वक जुटे रहते हैं उन्हें बहादुर ही कहा जाएगा।

◇ एक बार हमारा एक नौकर काशीनाथ बीमार हुआ। उसे प्लेग की गिल्टी निकल आई। वह चुपचाप अस्पताल को चला गया और रिश्तेदार को एक पत्र लिख दिया कि जज साहब को खबर न होने पावे, वरना वे मेरे लिए बहुत चिन्ता करेंगे। फिर भी मेरी पत्नी को किसी प्रकार पता चल गया और हम लोग उसकी सेवा सुश्रूषा करने अस्पताल नित्य जाने लगे। हमारे एक मित्र ने कहा-छोटे नौकर के लिए हाईकोर्ट के प्रधान जज को इतनी दौड़ धूम करना उचित नहीं। मैंने हँसते हुए कहा- जज होने से पहले मैं मनुष्य हूँ और मनुष्य का धर्म है कि अपने से छोटे व्यक्तियों की शक्ति भर सहायता करे।

■ विचारों का परिष्कार एवं प्रसार करके आप मनुष्य से महामनुष्य, दिव्य मनुष्य और यहाँ तक ईश्वरत्त्व तक प्राप्त कर सकते हैं। इस उपलब्धि में आड़े आने के लिए कोई अवरोध संसार में नहीं। यदि कोई अवरोध हो सकता है, तो वह स्वयं ेका आलस्य, प्रमाद, असंमय अथवा आत्म अवज्ञा का भाव। इस अनंत शक्ति का द्वार सबके लिए समान रूप से खुला है और यह परमार्थ का पुण्य पथ सबके लिए प्रशस्त है। अब कोई उस पर चले या न चले यह उसकी अपनी इच्छा पर निर्भर है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अपंगो ने शक्ति पायी-खोयी

एक बार पाँच ने असमर्थ और अपंग इकट्ठे हुए। अन्धा बोला- मेरी आँखें होती तो जो कुछ अनुपयुक्त दिखाई देता उसे ठीक करता। लँगड़ा बोला- मैं तो दौड़- दौड़कर लोगों की भलाई करता। निर्बल बोला- मेरे पास बल होता तो दीन- दुखियों की सेवा करता। निर्धन ने कहा- मैं धनी होता तो किसी को भूखा न रहने देता। मूर्ख बोला- मैं पण्डित होता तो लोगों को सच्चा ज्ञान देता। वरुणदेव ने उनकी बातें सुनी तो दया आ गई। उनकी इच्छायें उन्होंने पूरी कर दीं। पर अब तो अन्धा सौन्दर्य दर्शन में ही लीन रहने लगा। लंगड़ा सैर- सपाटे के लिए निकल पड़ा। निर्धन धन के नशे में डूब गया। निर्बल दूसरों को सताने लगा और मूर्ख अपनी ही शेखी बघारने लगा। वरुणदेव ने यह देखा तो उन्हें बड़ा दु :ख हुआ। अपनी दी हुई शक्तियां उनसे छीन ली।

इसी तथ्य को रामायणकार ने इस प्रकार लिखा है-
करम प्रधान विश्व करि राखा। जो जस करहिं तो तस फल चाखा।

मनुष्य के लिए तो यही उचित है कि वह अपनी गरिमा के अनुरूप सदैव उत्थान की ओर बढ़े। अन्यों को भी साथ ले।

ऊर्ध्य उठे फिर ना गिरे, यही मनुज को कर्म। औरन ले ऊपर उठे, इससे बडौ न धर्म।
इस तथ्य को मनुष्य समझ नहीं पाता और अपनी ही रची नारकीय सृष्टि से दूर भागने का विफल प्रयास करते देखा जाता है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग 1

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1 द्वितीयोSध्याय) श्लोक 7 से 8

सामर्थ्यन्यूनतायां तु साधनाभाव एव वा।
प्रतिकूलस्थितौ वापि नरस्त्वसफलो भवेत्॥७॥
यत्रैतन्नास्ति तन्नापि सृष्टिरत्नं नर: कथम् ?
दैन्येन ग्लपितेनाथ जीवतीह घृणास्पद: ॥८॥

टीका-  सामर्थ्य की न्यूनता, साधनों का अभाव, प्रतिकूल परिस्थितियाँ होने पर तो सफल न हो सकने की बात समझ में आती है किन्तु जहाँ ऐसा कुछ भी न हो, वहाँ मनुष्य जैसा सृष्टि का मुकुटमणि हेय स्तर का जीवन क्यों जिये? और क्यों घृणास्पद बने? ॥७-८॥

व्याख्या- यदि वह सब न होता जिससे मानव समृद्ध-सम्पन्न बन सका है तो मानव के उपरोक्त दो प्रयोजनों, सृष्टि उत्पत्ति, सृष्टि संचालन में असफल रहने की बात स्वीकार्य भी होती, पर ऐसा तो कुछ है नहीं। इसके स्थान पर जन्म देने के बाद उसे तो साधन, सामर्थ्य एवं सहयोगकारी परिस्थितियों का अनुदान भी परम पिता ने दिया है। फिर वह सदैव प्रतिकूलताओं का रोना क्यों रोता है? यह ब्रह्मज्ञानी जिज्ञासु के लिए एक ऊहापोह बना हुआ है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 38

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

👉 नवरात्रि अनुष्ठान का विधि- विधान

नवरात्र पर्व वर्ष में दो बार आता है (चैत्र  & आश्विन)।
(१) चैत्र नवरात्र जिस दिन आरम्भ होता है, उसी दिन विक्रमी संवत् का नया वर्ष प्रारम्भ होता है। चैत्र नवरात्र का समापन दिवस भगवान् श्री राम का जन्म दिन रामनवमी होता है।

(२) दूसरा नवरात्र आश्विन शुक्ल मे पड़ता है। इससे लगा हुआ विजयदशमी पर्व आता है।

ऋतुओं के सन्धिकाल इन्हीं पर्वों पर पड़ते हैं। सन्धिकाल को उपासना की दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है। प्रातः और सायं, ब्राह्ममुहूर्त्त एवं गोधूलि वेला दिन और रात्रि के सन्धिकाल हैं। इन्हें उपासना के लिए उपयुक्त माना गया है। इसी प्रकार ऋतु सन्धिकाल के नौ-नौ दिन दोनों नवरात्रों में विशिष्ट रूप से साधना-अनुष्ठानों के लिए महत्त्वपूर्ण माने गये हैं।

नवरात्रि साधना को दो भागें में बाँटा जा सकता है : एक उन दिनों की जाने वाली जप संख्या एवं विधान प्रक्रिया। दूसरे आहार- विहार सम्बन्धी प्रतिबन्धों की तपश्चर्या ।। दोनों को मिलाकर ही अनुष्ठान पुरश्चरणों की विशेष साधना सम्पन्न होती है।

जप संख्या के बारे में विधान यह है कि ९ दिनों में २४ हजार गायत्री मन्त्रों का जप पूरा होना चाहिए। कारण २४ हजार जप का लघु गायत्री अनुष्ठान होता है। प्रतिदिन २७ माला जप करने से ९ दिन में २४० मालायें अथवा २४०० मंत्र जप पूरा हो जाता है। मोटा अनुपात घण्टे में ११- ११ माला का रहता है। इस प्रकार प्रायः २(१/२) घण्टे इस जप में लग जाते हैं। चूंकि उसमें संख्या विधान मुख्य है इसलिए गणना के लिए माला का उपयोग आवश्यक है। सामान्य उपासना में घड़ी की सहायता से ४५ मिनट का पता चल सकता है, पर जप में गति की न्यूनाधिकता रहने से संख्या की जानकारी बिना माला के नहीं हो सकती। अस्तु नवरात्रि साधना में गणना की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए माला का उपयोग आवश्यक माना गया है।

जिनसे न बन पड़े, वे प्रतिदिन १२ माला करके १०८ माला का अनुष्ठान कर सकते हैं।

उपासना की विधि सामान्य नियमों के अनुरूप ही है। स्नानादि से निवृत्त होकर आसन बिछाकर पूर्व को मुख करके बैठें। जिन्होंने कोई प्रतिमा या चित्र किसी स्थिर स्थान पर प्रतिष्ठित कर रखा हो वे दिशा का भेद छोड़कर उस प्रतिमा के सम्मुख ही बैठें। वरूण देव तथा अग्नि देव को साक्षी करने के लिए पास में जल पात्र रख लें और घृत का दीपक या अगरबत्ती जला लें सन्ध्यावन्दन करके, गायत्री माता का आवाहन करें। आवाहन मन्त्र जिन्हें याद न हो वे गायत्री शक्ति की मानसिक भावना करें। धूप, दीप, अक्षत, नैवेद्य, पुष्प, फल, चन्दन, दूर्वा, सुपारी आदि पूजा की जो मांगलिक वस्तुएँ उपलब्ध हों उनसे चित्र या प्रतिमा का पूजन कर लें। जो लोग निराकार को मानने वाले हों वे धूपबत्ती या दीपक की अग्नि को ही माता का प्रतीक मान कर उसे प्रणाम कर लें।

अपने गायत्री गुरू का भी इस समय पूजन वन्दन कर लेना चाहिए, यही शाप मोचन है।

इस तरह आत्म शुद्धि और देव पूजन के बाद जप आरम्भ हो जाता है। जप के साथ- साथ सविता देवता के प्रकाश का अपने में प्रवेश होते पूर्ववत् अनुभव किया जाता है। सूर्य अर्घ्य आदि अन्य सब बातें उसी प्रकार चलती हैं, जैसी दैनिक साधना में। हर दिन जो आधा घण्टा जप करना पड़ता था वह अलग से नहीं करना होता वरन् इन्हीं २७ मालाओं में सम्मिलित हो जाता है।

गायत्री मन्त्र एवं भावार्थ

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

भावार्थ : उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।

अनुष्ठान में पालन करने के लिए दो नियम अनिवार्य हैं।

इन नौ दिनों ब्रह्मचर्य पालन अनिवार्य रूप से आवश्यक है।

दूसरा अनिवार्य नियम है उपवास। जिनके लिए सम्भव हो वे नौ दिन फल, दूध पर रहें। एक समय अन्नाहार, एक समय फलाहार, दो समय दूध और फल, एक समय आहार, एक समय फल दूध का आहार, केवल दूध का आहार इनमें से जो भी उपवास अपनी सामर्थ्यानुकूल हो उसी के अनुसार साधना आरम्भ कर देनी चाहिए। जिनसे इतना भी न बन पड़े वे अन्नाहार पर भी रह सकते हैं, पर नमक और शक्कर छोड़कर अस्वाद व्रत का पालन उन्हें भी करना चाहिए। भोजन में अनेक वस्तुएँ न लेकर दो ही वस्तुएँ ली जायें। जैसे- रोटी, दाल। रोटी- शाक, चावल- दाल, दलिया, दही आदि।

अनुष्ठान में पालन करने के लिए तीन सामान्य नियम हैं


कोमल शैया का त्याग

अपनी शारीरिक सेवाएँ अपने हाथों करना
हिंसा द्रव्यों का त्याग (चमड़े के जूते , रेशम, कस्तूरी, मांस, अण्डा )।

अनुष्ठान के दिनों में मनोविकारों और चरित्र दोनों पर कठोर दृष्टि रखी जाय और अवांछनीय उभारों को निरस्त करने के लिए अधिकाधिक प्रयत्नशील रहा जाय। असत्य भाषण, क्रोध, छल, कटुवचन , अशिष्ट आचरण, चोरी, चालाकी, जैसे अवांछनीय आचरणों से बचा जाना चाहिए, ईर्ष्या, द्वेष, कामुकता, प्रतिशोध जैसे दुर्भावनाओं से मन को जितना बचाया जा सके उतना अच्छा है। जिनसे बन पड़े वे अवकाश लेकर ऐसे वातावरण में रह सकते हैं जहाँ इस प्रकार की अवांछनीयताओं का अवसर ही न आवे। जिनके लिए ऐसा सम्भव नहीं, वे सामान्य जीवन यापन करते हुए अधिक से अधिक सदाचरण अपनाने के लिए सचेष्ट बने रहें ।।

संक्षिप्त गायत्री हवन पद्धति की प्रक्रिया बहुत ही सरल है। जप का शतांश हवन किया जाना चाहिए। पूर्णाहुति के बाद प्रसाद वितरण, कन्या भोजन आदि का प्रबन्ध अपनी सामर्थ्य के अनुसार करना चाहिए। गायत्री आद्य शक्ति- मातृु शक्ति है। उसका प्रतिनिधित्व कन्या करती है। अस्तु अन्तिम दिन कम से कम एक और अधिक जितनी सुविधा हो कन्याओं को भोजन कराना चाहिए।

अनुष्ठान के साथ दान की परम्परा जुड़ी हुई है। ज्ञानदान सर्वश्रेष्ठ है। इस दृष्टि से प्रत्येक साधक को चाहिए कि यथाशक्ति वितरण योग्य सस्ता युग साहित्य खरीदकर उन्हें उपयुक्त व्यक्तियों को साधना का प्रसाद कहकर दें।

जिन्हें नवरात्रि की साधनायें करनी हों, उन्हें दोनों बार समय से पूर्व उसकी सूचना हरिद्वार भेज देनी चाहिए, ताकि उन दिनों साधक के सुरक्षात्मक, संरक्षण और उस क्रम में रहने वाली भूलों के दोष परिमार्जन का लाभ मिलता रहे। विशेष साधना के लिए विशेष मार्ग- दर्शन एवं विशेष संरक्षण मिल सके तो उससे सफलता की सम्भावना अधिक बढ़ जाती है। वैसे प्रत्येक शुभ कर्म की संरक्षण भगवान स्वयं ही करते हैं।

👉 ज्ञान और आस्था

एक पंडित जी थे। उन्होंने एक नदी के किनारे अपना आश्रम बनाया हुआ था। पंडित जी बहुत विद्वान थे। उनके आश्रम में दूर-दूर से लोग ज्ञान प्राप्त करने आते थे।

नदी के दूसरे किनारे पर लक्ष्मी नाम की एक ग्वालिन अपने बूढ़े पिता के साथ रहती थी। लक्ष्मी सारा दिन अपनी गायों को देखभाल करती थी। सुबह जल्दी उठकर अपनी गायों को नहला कर दूध दुहती, फिर अपने पिताजी के लिए खाना बनाती, तत्पश्चात् तैयार होकर दूध बेचने के लिए निकल जाया करती थी।

पंडित जी के आश्रम में भी दूध लक्ष्मी के यहाँ से ही आता था। एक बार पंडित जी को किसी काम से शहर जाना था। उन्होंने लक्ष्मी से कहा कि उन्हें शहर जाना है, इसलिए अगले दिन दूध उन्हें जल्दी चाहिए। लक्ष्मी अगले दिन जल्दी आने का वादा करके चली गयी।

अगले दिन लक्ष्मी ने सुबह जल्दी उठकर अपना सारा काम समाप्त किया और जल्दी से दूध उठाकर आश्रम की तरफ निकल पड़ी। नदी किनारे उसने आकर देखा कि कोई मल्लाह अभी तक आया नहीं था। लक्ष्मी बगैर नाव के नदी कैसे पार करती ? फिर क्या था, लक्ष्मी को आश्रम तक पहुँचने में देर हो गयी। आश्रम में पंडित जी जाने को तैयार खड़े थे। उन्हें सिर्फ लक्ष्मी का इन्तजार था। लक्ष्मी को देखते ही उन्होंने लक्ष्मी को डाँटा और देरी से आने का कारण पूछा।

लक्ष्मी ने भी बड़ी मासूमियत से पंडित जी से कह दिया कि- “नदी पर कोई मल्लाह नहीं था, मै नदी कैसे पार करती ? इसलिए देर हो गयी।“

पंडित जी गुस्से में तो थे ही, उन्हें लगा कि लक्ष्मी बहाने बना रही है। उन्होंने भी गुस्से में लक्ष्मी से कहा, ‘‘क्यों बहाने बनाती है। लोग तो जीवन सागर को भगवान का नाम लेकर पार कर जाते हैं, तुम एक छोटी सी नदी पार नहीं कर सकती?”

पंडित जी की बातों का लक्ष्मी पर बहुत गहरा असर हुआ। दूसरे दिन भी जब लक्ष्मी दूध लेकर आश्रम जाने निकली तो नदी के किनारे मल्लाह नहीं था। लक्ष्मी ने मल्लाह का इंतजार नहीं किया। उसने भगवान को याद किया और पानी की सतह पर चलकर आसानी से नदी पार कर ली। इतनी जल्दी लक्ष्मी को आश्रम में देख कर पंडित जी हैरान रह गये, उन्हें पता था कि कोई मल्लाह इतनी जल्दी नहीं आता है।

उन्होंने लक्ष्मी से पूछा- “ तुमने आज नदी कैसे पार की ? इतनी सुबह तो कोई मल्लाह नही मिलता।”

लक्ष्मी ने बड़ी सरलता से कहा- ‘‘पंडित जी आपके बताये हुए तरीके से नदी पार कर ली। मैंने भगवान् का नाम लिया और पानी पर चलकर नदी पार कर ली।’’

पंडित जी को लक्ष्मी की बातों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने लक्ष्मी से फिर पानी पर चलने के लिए कहा। लक्ष्मी नदी के किनारे गयी और उसने भगवान का नाम जपते-जपते बड़ी आसानी से नदी पार कर ली।

पंडित जी हैरान रह गये। उन्होंने भी लक्ष्मी की तरह नदी पार करनी चाही। पर नदी में उतरते वक्त उनका ध्यान अपनी धोती को गीली होने से बचाने में लगा था। वह पानी पर नहीं चल पाये और धड़ाम से पानी में गिर गये।

 पंडित जी को गिरते देख लक्ष्मी ने हँसते हुए कहा- ‘‘आपने तो भगवान का नाम लिया ही नहीं, आपका सारा ध्यान अपनी नयी धोती को बचाने में ही लगा हुआ था।’’

पंडित जी को अपनी गलती का अहसास हो गया। उन्हें अपने ज्ञान पर बड़ा अभिमान था। पर अब उन्होंने जान लिया था कि भगवान को पाने के लिए किसी भी ज्ञान की जरूरत नहीं होती। उसे तो पाने के लिए सिर्फ सच्चे मन से याद करने की जरूरत है। 

👉 अपनी कमजोरियों को दूर कीजिये (भाग 3)

(4) चिन्ता दूर करने के उपाय हैं— विश्लेषण द्वारा निर्णय कर लेना, संकल्प, मन की शान्ति, जिस विषय से आप चिन्तित हों, उसका भली-भाँति विश्लेषण कीजिए। चिन्ता, भय का ही दूसरा बढ़ा-चढ़ा रूप है। भयभीत मन की दशाएं ही नारकीय पीड़ायें हैं। चिंतित और भयभीत गरीब अत्यन्त दुख का अनुभव करता है। चिन्तित, दुखित और भयभीत होकर कष्ट सहन करने की अपेक्षा कष्टों का सामना कर लेने का दृढ़ संकल्प कर लीजिये। आप को यदि अपने कार्य के छूट जाने का भय है और चिन्ता है तो उस परिस्थिति का कम से कम चिंतित होकर सामना कीजिए। भयभीत रहने और अप्रयत्न-शील बनने की अपेक्षा अपनी योजनाऐं बदल कर नई योजनाऐं बना लीजिये।

मानसिक शान्ति प्राप्त करने के लिये आराम से बिस्तर पर लेट जाइये और सोचिये कि आपका शरीर पूर्णतया स्वस्थ है। स्फूर्ति लाने के लिए कोई शारीरिक कार्य अथवा कोई खेल खेलिये। आप यदि किसी वस्तु को पाने के लिये अथवा अन्य किसी छोटी सी बात पर चिन्तित हैं, तो निद्रा अथवा स्थान परिवर्तन ही उपयुक्त है। यदि यह असंभव है, तो आप आत्मशक्ति द्वारा बुरे विचारों को मन में मत आने दीजिये।

(5) अधिक आशाऐं मत बाँधिये-
किसी कार्य को करने के लिए भरसक प्रयत्न करिये किन्तु फल ईश्वर पर छोड़ दीजिये। असफल होने पर हतोत्साह मत होइए। याद रखिये असफलता ही सफलता की नींव है। वे पुरुष, जिन्होंने संसार में महान् कार्य किये हैं, उन्हें भी बार-बार असफल होते रहने के बाद ही सफलतायें मिली हैं।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1956 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1956/February/v1.27

👉 आज का सद्चिंतन 5 April 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 April 2019


👉 The Absolute Law Of Karma (Part 4)

WHO MAINTAINS RECORD OF SINS AND VIRTUES?

Human mind has an infinite capacity for storage of information. It is quite possible for the subtle sentient mechanism of subconscious mind to maintain a systematic record of activities of a living being. There is also no contradiction in the one Chitragupta of mythology being countless Chitraguptas in innumerable beings. Divine powers of God are omnipresent. The universal life-force- Prana is one, but it is individually present in each living being. Similarly, the subtle celestial elements designated as
deities Indra, Varun, Agni, Shiva and Yama in mythology are also all-pervasive. Air, for instance, in spite of being identified as fresh air of a garden or polluted air of an industrial area, is an integral part of the same atmosphere enveloping the earth. Similarly, though inhabiting and operating in numerous bodies independently, the deity Chitragupta is a single universal celestial entity.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 8

👉 व्याध, संत, वेश्या एवम् सद्गृहस्थ के दृश्य

स्वर्ग और नरक करनी के फल है, एक सन्त ने अपने शिष्य को समझाया पर  शिष्य की समझ में बात आयी नहीं। तब उसका उत्तर देने के लिए अगले दिन सन्त शिष्य के लेकर एक बहेलिए कें पास पहुँचे। वहाँ जाकर देखा कुछ जंगल से व्याध निरीह पक्षी पकड़कर लाया था, वह काट रहा था, घर कलह मची थी। यह सब  देखते ही शिष्य ही शिष्य चिल्लया- ' महाराज! यहाँ तो नरक है, यहाँ से शीघ्र '' चलिए। '' सन्त बोले- ' सचमुच, इस बहेलिये ने इतने जीव मार डाले, पर आज तक फूटी कौड़ी तक न जोड़ पाया। कपड़ों तक के पैसे नहीं, इसके लिए यह संसार भी नरक है और परलोक में तो इतने मारे गये जीवों की तड़पती आत्मायें उसे जितना कष्ट देंगी, उसकी तो कल्पना भी नहीं हो सकती।

सन्त दूसरे दिन एक साधु की कुटी पर पधारे। शिष्य भी साथ थे, वहाँ जाकर देखा, साधु के पास है तो कुछ नहीं, पर उनकी मस्ती का कुछ ठिकाना नहीं, बड़े सन्तुष्ट, बड़े प्रसन्न दिखाई दे रहे थे। सन्त ने कहा- ' वत्स! यह साधु इस जीवन में कष्ट का, तपश्चर्या का जीवन जी रहे हैं तो भी मन में इतना आह्लाद इस बात का प्रतीक है कि इन्हें पारलौकिक सुख तो निश्र्चित ही है। ''

सांयकाल सन्त एक वेश्या के घर में प्रवेश करने लगे तो शिष्य चिल्लाया- ' महाराज! यहाँ कहाँ?' सन्त बोले- ' वत्स! यहाँ का वैभव भी देख लें। मनुष्य इस सांसारिक सुखोपभोग के लिए अपने शरीर, शील और चरित्र को भी किस तरह बेचकर मौज उड़ाता है पर शरीर का सौन्दर्य नष्ट होते ही कोई पास नहीं आता, यह इस बात का प्रतीक है कि इसके लिए यह संसार स्वर्ग की तरह है, पर अन्त इसका वही है, जो उस बहेलिये का था। ''

अन्तिम दिन वे एक सद्गृहस्थ के घर रुके। गृहस्थ बड़ा परिश्रमी, संयमशील, नेक और ईमानदार था सो सुख- समृद्धि की उसे कोई कमी नहीं थी वरन् वह बढ़ रही थी। सन्त ने कहा- यह वह व्यक्ति है, जिसे इस पृथ्वी पर भी स्वर्ग है और परलोक में भी। शिष्य ने इस तत्व- ज्ञान को भली प्रकार समझ लिया कि स्वर्ग और नरक वस्तुत :करनी का फल है।

विधाता ने तो मानव को यही सोच कर भेजा है कि वह पृथ्वी पर अन्य जीवधारियों से अलग अपनी दिशाधारा चयन करेगा और श्रेय पक्ष की ओर बढ़कर सबका कल्याण करेगा पर उसे भी वर्तमान स्थिति देखकर निराशा ही होती होगी।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग 1

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1 द्वितीयोSध्याय) श्लोक 5 से 6

अष्टावक्र उवाच

ईश्वर: भूपति: साक्षाद् ब्रह्माण्डस्य महाने।
मानवं राजपुत्रं स्वं कर्तुं सर्वगुणान्वितम् ॥५॥
विभूती: स्वा अदाद् बीजरूपे सर्वा मुदान्वित:
सृष्टि संचालकोऽप्येष श्रेयसा रहित: कथम्?॥६॥

टीका- ब्रह्माण्ड के सम्राट् ईश्वर ने मनुष्य को सर्वगुण सम्पन्न उत्तराधिकारी राजकुमार बनाया। अपनी समस्त विभूतियाँ उसे बीजरूप में प्रसन्नतापूर्वक प्रदान कीं। उसे सुष्टि संचालन में सहयोगी बन सकने के योग्य बनाया, फिर भी वह उस श्रेय से, गौरव से वंचित क्यों रहता है? ॥५-६॥

व्याख्या- ब्रह्मज्ञानी अष्टावक्र की जिज्ञासा मानव मात्र से सम्बन्धित है। नित्य देखने में आता है ईश्वर का मुकुटमणि कहलाने वाला, सुर दुर्लभ मानव योनि पाने वाला यह सौभाग्यशाली जीव अपने परम पिता से दो विशेष विभूतियाँ पाने के बावुजूद दिग्भ्रान्त हो दीन-हीन जैसा जीवन जीता है। ये दो विभूतियाँ  हैं-बीज रूप में ईश्वर के समस्त गुण तथा सृष्टि को सुव्यवस्थित बनाने में उसकी ईश्वर के साथ साझेदार जैसी भूमिका। बीज फलता है तब मृदा को स्वरूप लेता है। इसका बहिरंग स्वरूप उसी जाति का होता है जिस जाति का वह स्वयं है। लघु से महान्, अणु से विभु बनने की महत् सामर्थ्य अपने आपमें एक अलभ्य विरासत है। इसे पाने के लिए उसे न जाने कितनी योनियों में कष्ट भोगना पड़ा।

सहयोग-सहकार भी सुसंचालन के लिए न कि संतुलन को बिगाड़ने के लिए। ऐसे में जब मुण कर्म रूपी बीज भी गलने से इन्कार कर दे एवं मानव संतुलन-व्यवस्था के स्थान पर विग्रह-असहयोग करने लगे तो असमंजस होना स्वाभाविक है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 37

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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