शनिवार, 30 मार्च 2019

👉 Nari Abhuydha

Nari Abhuydha is 5th Annual Women Empowerment program by All World Gayatri Parivar Women Circle Mumbai. There is need for intellectual training, Scientific Education and Character Building Education. We have paid heavily for blindly imitating western ideals.There is a need for harmony of ideals between school & home. Ikkisvi Sadi is Nari Sadi and indian women needs to travel as much as to study for playing a larger role in national life. Education through Indian vernaculars and developing arts,culture, crafts and allied occupations needs to take centre stage.DIYA gives an awakening call for empowering women for a prosperous future. Come join us on 30th March Saturday 2019

Venue: Suraj Hanuman Mandir Ground,Anand Nagar Nr Mudraneshwar Temple, Dahisar East, Mumbai

Timings : Evening 5.00 pm onwards

Contact:
09821393345
09892722773
09892583224
09320922220

Email: mumbai@diya.net.in

Entry is free and open to all.
Pls pass message to all in your circle of influence

👉 मेरे पिता

शहर के एक प्रसिद्ध विद्यालय के बग़ीचे में तेज़ धूप और गर्मी की परवाह किये बिना, बड़ी लग्न से पेड़ - पौधों की काट छाँट में लगा था कि तभी विद्यालय के चपरासी की आवाज़ सुनाई दी, "गंगादास! तुझे प्रधानाचार्या जी तुरंत बुला रही हैं।"

गंगादास को आख़िरी के पांँच शब्दों में काफ़ी तेज़ी महसूस हुई और उसे लगा कि कोई महत्त्वपूर्ण बात हुई है जिसकी वज़ह से प्रधानाचार्या जी ने उसे तुरंत ही बुलाया है। शीघ्रता से उठा, अपने हाथों को धोकर साफ़ किया और  चल दिया, द्रुत गति से प्रधानाचार्या के कार्यालय की ओर।
     
उसे प्रधानाचार्या महोदया के कार्यालय की दूरी मीलों की लग रही थी जो ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही थी। उसकी हृदयगति बढ़ गई थी।  सोच रहा था कि उससे क्या ग़लत हो गया जो आज उसको प्रधानाचार्या महोदया ने  तुरंत ही अपने कार्यालय में आने को कहा।
    
वह एक ईमानदार कर्मचारी था और अपने कार्य को पूरी निष्ठा से पूर्ण करता था। पता नहीं क्या ग़लती हो गयी। वह इसी चिंता के साथ प्रधानाचार्या के कार्यालय पहुँचा...... "मैडम, क्या मैं अंदर आ जाऊँ? आपने मुझे बुलाया था।"
     
"हाँ। आओ और यह देखो" प्रधानाचार्या महोदया की आवाज़ में कड़की थी और उनकी उंगली एक पेपर पर इशारा कर रही थी। "पढ़ो इसे" प्रधानाचार्या ने आदेश दिया। "मैं, मैं, मैडम! मैं तो इंग्लिश पढ़ना नहीं जानता मैडम!" गंगादास ने घबरा कर उत्तर दिया।
   
"मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ मैडम यदि कोई गलती हो गयी हो तो। मैं आपका और विद्यालय का पहले से ही बहुत ऋणी हूँ। क्योंकि आपने मेरी बिटिया को इस विद्यालय में निःशुल्क पढ़ने की इज़ाज़त दी। मुझे कृपया एक और मौक़ा दें मेरी कोई ग़लती हुई है तो सुधारने का। मैं आप का सदैव ऋणी रहूंँगा।" गंगादास बिना रुके घबरा कर बोलता चला जा रहा था।
    
उसे प्रधानाचार्या ने टोका "तुम बिना वज़ह अनुमान लगा रहे हो। थोड़ा इंतज़ार करो, मैं तुम्हारी बिटिया की कक्षा-अध्यापिका को बुलाती हूँ।" वे पल जब तक उसकी बिटिया की कक्षा-अध्यापिका प्रधानाचार्या के कार्यालय में पहुँची बहुत ही लंबे हो गए थे गंगादास के लिए। सोच रहा था कि क्या उसकी बिटिया से कोई ग़लती हो गयी, कहीं मैडम उसे विद्यालय से निकाल तो नहीं रहीं। उसकी चिंता और बढ़ गयी थी।

कक्षा-अध्यापिका के पहुँचते ही प्रधानाचार्या महोदया ने कहा, "हमने तुम्हारी बिटिया की प्रतिभा को देखकर और परख कर ही उसे अपने विद्यालय में पढ़ने की अनुमति दी थी। अब ये मैडम इस पेपर में जो लिखा है उसे पढ़कर और हिंदी में तुम्हें सुनाएँगी, ग़ौर से सुनो।"

कक्षा-अध्यापिका ने पेपर को पढ़ना शुरू करने से पहले बताया, "आज मातृ दिवस था और आज मैंने कक्षा में सभी बच्चों को अपनी अपनी माँ के बारे में एक लेख लिखने को कहा। तुम्हारी बिटिया ने जो लिखा उसे सुनो।" उसके बाद कक्षा- अध्यापिका ने पेपर पढ़ना शुरू किया।

"मैं एक गाँव में रहती थी, एक ऐसा गाँव जहाँ शिक्षा और चिकित्सा की सुविधाओं का आज भी अभाव है। चिकित्सक के अभाव में कितनी ही माँयें दम तोड़ देती हैं बच्चों के जन्म के समय। मेरी माँ भी उनमें से एक थीं। उन्होंने मुझे छुआ भी नहीं कि चल बसीं। मेरे पिता ही वे पहले व्यक्ति थे मेरे परिवार के जिन्होंने मुझे गोद में लिया। पर सच कहूँ तो मेरे परिवार के वे अकेले व्यक्ति थे जिन्होंने मुझे गोद में उठाया था। बाक़ी की नज़र में तो मैं अपनी माँ को खा गई थी। मेरे पिताजी ने मुझे माँ का प्यार दिया। मेरे दादा - दादी चाहते थे कि मेरे पिताजी दुबारा विवाह करके एक पोते को इस दुनिया में लायें ताकि उनका वंश आगे चल सके। परंतु मेरे पिताजी ने उनकी एक न सुनी और दुबारा विवाह करने से मना कर दिया। इस वज़ह से मेरे दादा - दादीजी ने उनको अपने से अलग कर दिया और पिताजी सब कुछ, ज़मीन, खेती बाड़ी, घर सुविधा आदि छोड़ कर मुझे साथ लेकर शहर चले आये और इसी विद्यालय में माली का कार्य करने लगे। मुझे बहुत ही लाड़ प्यार से बड़ा करने लगे। मेरी ज़रूरतों पर माँ की तरह हर पल उनका ध्यान रहता है।"

"आज मुझे समझ आता है कि वे क्यों हर उस चीज़ को जो मुझे पसंद थी ये कह कर खाने से मना कर देते थे कि वह उन्हें पसंद नहीं है, क्योंकि वह आख़िरी टुकड़ा होती थी। आज मुझे बड़ा होने पर उनके इस त्याग के महत्त्व पता चला।"

"मेरे पिता ने अपनी क्षमताओं में मेरी हर प्रकार की सुख - सुविधाओं का ध्यान रखा और मेरे विद्यालय ने उनको यह सबसे बड़ा पुरस्कार दिया जो मुझे यहाँ निःशुल्क पढ़ने की अनुमति मिली। उस दिन मेरे पिता की ख़ुशी का कोई ठिकाना न था।"

"यदि माँ, प्यार और देखभाल करने का नाम है तो मेरी माँ मेरे पिताजी हैं।" "यदि दयाभाव, माँ को परिभाषित करता है तो मेरे पिताजी उस परिभाषा के हिसाब से पूरी तरह मेरी माँ हैं।"

"यदि त्याग, माँ को परिभाषित करता है तो मेरे पिताजी इस वर्ग में भी सर्वोच्च स्थान पर हैं।" "यदि संक्षेप में कहूँ कि प्यार, देखभाल, दयाभाव और त्याग माँ की पहचान है तो मेरे पिताजी उस पहचान पर खरे उतरते हैं और मेरे पिताजी विश्व की सबसे अच्छी माँ हैं।"
    
आज मातृ दिवस पर मैं अपने पिताजी को शुभकामनाएँ दूँगी और कहूँगी कि आप संसार के सबसे अच्छे पालक हैं। बहुत गर्व से कहूँगी कि ये जो हमारे विद्यालय के परिश्रमी माली हैं, मेरे पिता हैं।"
   
"मैं जानती हूँ कि मैं आज की लेखन परीक्षा में असफल हो जाऊँगी। क्योंकि मुझे माँ पर लेख लिखना था और मैंने पिता पर लिखा,पर यह बहुत ही छोटी सी क़ीमत होगी उस सब की जो मेरे पिता ने मेरे लिए किया। धन्यवाद"। आख़िरी शब्द पढ़ते - पढ़ते अध्यापिका का गला भर आया था और प्रधानाचार्या के कार्यालय में शांति छा गयी थी।
    
इस शांति में केवल गंगादास के सिसकने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। बग़ीचे में धूप की गर्मी उसकी कमीज़ को गीला न कर सकी पर उस पेपर पर बिटिया के लिखे शब्दों ने उस कमीज़ को पिता के आँसुओं से गीला कर दिया था। वह केवल हाथ जोड़ कर वहाँ खड़ा था।  उसने उस पेपर को अध्यापिका से लिया और अपने हृदय से लगाया और रो पड़ा।
    
प्रधानाचार्या ने खड़े होकर उसे एक कुर्सी पर बैठाया और एक गिलास पानी दिया तथा कहा, "गंगादास तुम्हारी बिटिया को इस लेख के लिए पूरे 10/10 नम्बर दिए गए है। यह लेख मेरे अब तक के पूरे विद्यालय जीवन का सबसे अच्छा मातृ दिवस का लेख है। हम कल मातृ दिवस अपने विद्यालय में बड़े ज़ोर - शोर से मना रहे हैं। इस दिवस पर विद्यालय एक बहुत बड़ा कार्यक्रम आयोजित करने जा रहा है। विद्यालय की प्रबंधक कमेटी ने आपको इस कार्यक्रम का मुख्य अतिथि बनाने का निर्णय लिया है। यह सम्मान होगा उस प्यार, देखभाल, दयाभाव और त्याग का जो एक आदमी अपने बच्चे के पालन के लिए कर सकता है।

हमें गर्व है कि संसार का एक अच्छा पिता हमारे विद्यालय में पढ़ने वाली बच्ची का पिता है जैसा कि आपकी बिटिया ने अपने लेख में लिखा। गंगादास हमें गर्व है कि आप एक माली हैं और सच्चे अर्थों में माली की तरह न केवल विद्यालय के बग़ीचे के फूलों की देखभाल की बल्कि अपने इस घर के फूल को भी सदा ख़ुशबूदार बनाकर रखा जिसकी ख़ुशबू से हमारा विद्यालय महक उठा। तो क्या आप हमारे विद्यालय के इस मातृ दिवस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बनेंगे?"
    
रो पड़ा गंगादास और दौड़ कर बिटिया की कक्षा के बाहर से आँसू भरी आँखों से निहारता रहा , अपनी प्यारी बिटिया को।

👉 आज का सद्चिंतन 30 March 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 March 2019


👉 सद्भावना ही श्रेष्ठ है।

आपरा की सद्भावना अनिवार्य है। हर परस्पर सन्देह और संशय करके तो भय को ही उत्पन्न करेंगे और एक दूसरे का हास और अन्ततः नाश ही करेंगे। हमें आपस में विचार करना सीखना होगा। विश्वास की भित्ति पवित्रता है और पवित्र हृदयों में ही विश्वास उत्पन्न होता है। पवित्र हृदय और निर्मल बुद्धि में सद्भावना का उदय होता है। सद्भावना परम आवश्यक है। सद्भावना से ही आपस का दृष्टिकोण सम्यक् बनता है। सद्भावना के अभाव में तो एक दूसरे में सन्देह और भय की ही उत्पत्ति है। हम आपस में क्यों एक दूसरे से भय करें।

भय की जाँच की जाय तो इसका छिपा हुआ कारण निजी या सामूहिक स्वार्थ ही होता है, और जब वह स्वार्थ किसी देश और जाति भर में फैल जाता है तो एक दूसरे राष्ट्र पर सन्देह होने लगता है। जब राष्ट्र आपस में एक दूसरे की उन्नति और प्रगति को सन्देह की दृष्टि से देखने लगते हैं तो वास्तव में उनकी सम्यक् दृष्टि रहती ही नहीं, वे रंगी हुई ऐनक से ही देखते हैं और चाहे वह रंग उनका अपना ही चढ़ाया हुआ हो, जब तक वह रंग ऐनक के आइनों पर चढ़ा रहेगा, सभी उसी रंग में रंगे दीखेंगे और जब हम दूसरे राष्ट्र को सन्देह की दृष्टि से देखेंगे तो वह हमें क्यों न सन्देह की दृष्टि से देखे? इस प्रकार संदेह और भय का एक चक्र बन जाता है। क्या आजकल राष्ट्र इस प्रकार एक दूसरे से दूर नहीं होते जा रहे?

छिपी हुई दूषित अथवा विशुद्ध मनोवृत्ति व्यवहार में प्रकट हो जाती है। मनोवृत्ति को छिपा कर ऊपर से शिष्टता का व्यवहार भी बहुत देखने में आ रहा है, पर वास्तविकता छिपाये नहीं छिप सकती। हमें सबको मित्र दृष्टि से देखना चाहिए, मन में किसी प्रकार की मलिनता का स्थान नहीं देना चाहिए, पर साथ ही सचेत और सावधान भी रहना चाहिये कि कहीं हमारी सरलता से ही लाभ न उठाया जाये। सतर्क रहना सावधान रहना चाहिए, पर मनोमालिन्य अच्छा नहीं।

📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1956 पृष्ठ 15

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1956/February/v1.15

👉 Amrit Chintan

■ Four habits constitute human nature – mind, nature, instinct and ego. Mind’s job is to decide yes or no to the proposals of thoughts. Chit is memory chip and ego which covers self. These four factors always keep man in body sense and does allow to be conscious of soul. Hence, the only way to become soul conscious is through process of self rectification and selfless love which permits soul radiation to come out.
 
□ The aim of sadhana is realization. Most of the devotees do all their worship for worldly gains and for that they do Anusthan – a – disciplined package of enchanting. This intense to become a type of ritual oriented results of material things. Such way of worship does not help to grow spiritual power. Sadhana can only bring result when a long steady practice is done under the guidance of a Guru in most disciplined way.

◆ Every one who has chosen the field for spiritual developments, a wave of that discipline must spread. Diet control, chasticity in life, income, daily routine of life, expense, reading of good books, help to become soul conscious. Worship, exercise, helping others and like activities will have to be imposed on our-self strictly. Vices must be controlled. Restrain in life and adopting of good virtues must be the aim of everyone in this field of spirituality.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 बुद्ध शव देख कर हँसे

सुजाता ने खीर दी, बुद्ध ने उसे ग्रहण कर परम सन्तोष का अनुभव किया। उस दिन उनकी जो समाधि लगी तो फिर सातवें दिन जाकर टूटी। जब वे उठे, उन्हें आत्म- साक्षात्कार हो चुका था।

निरंजना नदी के तट पर प्रसन्न मुख आसीन भगवान् बुद्ध को देखने गई सुजाता बड़ी विस्मित हो रही थी कि यह सात दिन तक एक ही आसन पर कैसे यै बैठे रहे? तभी सामने से एक शव लिए जाते हुए कुछ व्यक्ति दिखाई दिये। उस शव कों देखते ही भगवान बुद्ध हँसने लगे।

सुजाता ने प्रश्न किया- ''योगिराज! कल तक तो आप शव को देखकर दुःखी हो जाते थे, आज वह दुःख कहाँ चला गया ?

भगवान् बुद्ध ने कहा- ''बालिके। सुख- दुःख मनुष्य की कल्पना मात्र है। कल तक जड़ वस्तुओं में आसक्ति होने के कारण यह भय था कि कहीं यह न छूट जाय,वह न बिछुड़ जाय। यह भय ही दु:ख का कारण था, आज मैंने जान लिया कि जो जड़ है, उसका तो गुण ही परिवर्तनशील है, पर जिसके लिए दुःख करते हैं, वह न तो परिवर्तनशील, न नाशवान्।  अब तू ही बता जो सनातन वस्तु पा ले, उसे नाशवान् वस्तुओं का क्या दुःख' ?

आत्मावलम्बन की उपेक्षा व्यक्ति को कहाँ से कहाँ पहुंचा देती है, इसके कई उदाहरण देखने को मिलते है। सद्गति का लक्ष्य समीप होते हुए भी ये अपने इस परम पुरुषार्थ की अवहेलना कर पतन के गर्त में भी जा पहुंचते है। अहंकार की उत्पत्ति व उसका उद्धत प्रदर्शन इसी आत्म तत्व की उपेक्षा की फलश्रुति है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग 1

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 78 से 80

जागृतात्मवतामेतं सन्देशं प्रापयास्तु मे।
नोपेक्ष्मोऽनुपम: काल: क्रियतां साहसं महत्॥७८॥
महान्तं प्रतिफलं लब्ध्वा कृतकृत्या भवन्तु ते।
जन्मन इदमेवास्ति फलमुद्देश्यरूपकम्॥७१॥
अग्रगामिन एवात्र प्रज्ञासंस्थान निर्मिती।
प्रज्ञाभियान सूत्राणां योग्या: संचालने सदा॥८०॥

टीका- अस्तु जागृत आत्माओं तक मेरा यह सन्देश पहुँचाना कि वे इस अनुपम अवसर की उपेक्षा न करें बड़ा साहस करें, बड़ा प्रतिफल अर्जित करके कृतकृत्य बनें। यही उनके जन्म का उद्देश्य है। जो अग्रगामी हों उन्हें प्रज्ञा संस्थानों के निर्माण तथा प्रज्ञा-अभियान के सूत्र संचालन में जुटाना ॥७८-८०॥

व्याख्या- जागृत आत्माएँ कभी अवसर नहीं चूकतीं। वे जिस उद्देश्य को लेकर अवतरित होती हैं, उसे पूरा किये बिना उन्हें चैन नहीं पड़ता। जागृत वे जो अदृश्य जगत में बह रहे प्रकृति प्रवाह को पहचानते हैं, परिवर्तन में सहायक बनते हैं। दूसरे जब आगे चलकर उन परिणामों को देखते हैं तो पछताते हैं कि हमने अवसर की उपेक्षा क्यों कर दी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 33

👉 आत्मचिंतन के क्षण 30 March 2019

★ जो लोग सुखी हैं, सन्मार्गगामी और सदाचारी हैं, उन्हें किसी की सेवा की क्या जरूरत पड़ेगी? सहायता करने का पुण्य-परमार्थ तो आप उन्हीं व्यक्तियों के माध्यम से प्राप्त कर सकते हैं, जो पिछड़े हैं, दुःखी या पीड़ित हैं। वे अपने आपके लिए अभागे हो सकते हैं, पर आपका सौभाग्य ही है कि उन पीड़ितों के कारण आपके दयाभाव को विकसित होने और सेवा कार्य करने का अवसर मिला।

◆ हमें क्या अधिकार है कि पीड़ितों से इसलिए घृणा करें कि उनने कभी कोई भूल की होगी, जिसका दण्ड उन्हें मिल रहा है। हमें तो इतना ही सोचना चाहिए कि पीड़ितों के रूप में ईश्वर हमारी परीक्षा के लिए सामने आया है कि देखें हममें कुछ उदारता, दया, सहृदयता और नेक भावना शेष है या नहीं?

◇ अच्छाई इसलिए पनप नहीं पाती कि उसका शिक्षण करने वाले ऐसे लोग नहीं निकल पाते, जो अपनी एक निष्ठा के द्वारा दूसरों की अंतरात्मा पर अपनी छाप छोड़ सकें। अपने अवगुणों को छिपाने के लिए या सस्ती प्रशंसा प्राप्त करने के लिए धर्म का आडम्बर मात्र ओढ़ लेते हैं।

■ भूलकर भी मन में यह विचार मत आने दीजिए कि मनुष्य हाड़-मांस का एक पुतला है। पाप से उत्पन्न हुआ है और पाप में ही प्रवृत्त रहता है। यह विचार स्वयं ही एक बड़ा पाप है। अपने प्रति निकृष्ट दृष्टिकोण रखने वाला कभी भी उन्नतिशील नहीं हो सकता। उन्नति का आधार है अपने प्रति ऊँचा और पवित्र विचार रखना। मनुष्य की वास्तविकता यह है कि वह अखण्ड अगणित चेतना, अणु-परमाणुओं का सजीव तेज पुञ्ज है। असीम और अक्षय शक्तियों से भरा हुआ है। उसके आंतरिक कोषों और चक्रों में सारी सिद्धियाँ सोयी हुई हैं। ईश्वर का पुत्र और उसका प्रतिनिधि है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 29 मार्च 2019

👉 आज का सद्चिंतन 29 March 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 March 2019


👉 यज्ञ संस्कृति के पिता

जहाँ गायत्री को विश्वमाता कहा गया है वहाँ यज्ञ को देव संस्कृति-धर्म का पिता कहा गया है। दोनों के समन्वय-सहयोग से ही देव संस्कृति का जन्म, विकास एवं परिपोषण सम्भव हुआ।

'यज्ञ' में यज्ञीय भावनाओं के अभिवर्धन को बहुत महत्व दिया गया है। यज्ञ शब्द का भावार्थ है- पवित्रता, प्रखरता एवं उदारता। यह तत्वदर्शन व्यक्तिगत जीवन में भी समाविष्ट रहना चाहिए और उसे लोक व्यवहार में भी उत्कृष्टता की प्रथा-परम्परा जैसा प्रश्रय मिलना चाहिए। जीवन यज्ञ की चर्चा शास्त्रों में स्थान-स्थान पर हुई है। ब्रह्म यज्ञ, विश्वयज्ञ आदि नामों से समाज में यज्ञीय प्रचलन की प्रमुखता पर बल दिया है। पशु-प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने, पतनोन्मुख प्रवाह को उत्कृष्टता की ओर मोड़ने के अनुबन्ध निर्धारण यज्ञ कहलाते हैं। इसी अवलम्बन के सहारे मानवी प्रगति सम्भव हुई है। वर्तमान की स्थिरता एवं उज्जवल भविष्य की सम्भावना भी इसी सदाशयता के अवलम्बन पर निर्भर रहेगी।

यज्ञ दर्शन को अपनाकर ही आज की संकीर्ण स्वार्थपरता से प्रचण्ड मोर्चा ले सकना सम्भव है। यज्ञ के साथ यही प्रेरणा जुड़ी है कि मन:क्षेत्र में घुसी निकृष्टता का निराकरण हो, व्यक्ति महान् एवं समाज सुसंस्कृत बने।

यज्ञ का अर्थ मात्र अग्निहोत्र नहीं, शास्त्रों में जीवन अग्नि की दो शक्तियाँ मानी गई है - एक 'स्वाहा' दूसरी 'स्वधा'। 'स्वाहा' का अर्थ है- आत्म-त्याग और अपने से लड़ने की क्षमता। 'स्वधा' का अर्थ है- जीवन व्यवस्था में 'आत्म-ज्ञान' को धारण करने का साहस।

लौकिक अग्नि में ज्वलन और प्रकाश यह दो गुण पाये जाते हैं। इसी तरह जीवन अग्नि में उत्कर्ष की उपयोगिता सर्वविदित है। आत्मिक जीवन को प्रखर बनाने के लिए उस जीवन अग्नि की आवश्यकता है। जिसे 'स्वाहा' और 'स्वधा' के नाम से, प्रगति के लिए संघर्ष और आत्मनिर्माण के नाम से पुकारा जाता है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण भाग 1

👉 Amrit Chintan

■ The motto of our life our action and reaction must not be self centered but others welfare must also be considered. It must be constructive ans should not hurt others – anyway. Our life is a part of society and we owe society for its big share to develop the present civilization. Our development depends on the growth of the society we live. If we participate in the development of society with our utmost sincerity at individual level – we will create heaven on earth.
 
□ Society grows and develops it’s– culture and establish its civilization by a collective efforts of the individuals of the society. But our all abilities status, position must also be used to help downtrodden people and impart help to those who are trying to stand on their feet. Only then we are making proper use of our life given by the creator. This way our all habits and actions should not be individualistic but for others too. The philosophy of our life must be so that we are for others too. The interest and welfare of masses must be the aim of our life.

◆ To develop greatness in life is to leave an example on the hearts of people for ages, we will have to develop own will power. A constant divine light in yourself must guide you. It is that divine light which every man has. One can successfully overpower all sorts of hurdles in life. A firm believes on self – the purest and sacred most consciousness of yours – is the secret to lead you the true success is life and also to achieve greatness – the excellence of life.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 72 से 75

प्रज्ञापीठस्वरूपेषु युगदेवालया भुवि।
भवन्तु तत एतासां सृज्यानामथ नारद ॥७२॥
सूत्रं संस्कारयोग्यानां प्रवृत्तीनां च सञ्चलेत्।
नृणां येन स्वरूपं च भविष्यत्संस्कृतं भवेत् ॥७३॥
सहैव पृष्ठभूमिश्च परिवर्तनहेतवे।
निर्मिता स्याद् युगस्यास्तु संधिकालस्तु विंशति: ॥७४॥
वर्षाणां, सुप्रभातस्य वेलाऽऽवर्तनं हेतुका।
अवाञ्छनीयताग्लानि: सदाशयविनिर्मिति" ॥७५॥

टीका- हे नारद ! युग देवालय, प्रज्ञापीठों के रूप में बनें। वहाँ से सृजनात्मक और सुधारात्मक सभी प्रवृत्तियों का सूत्र-संचालन हो, जिससे मनुष्य का स्वरूप एवं भविष्य सुधरे, साथ ही महान् परिवर्तन के लिए आवश्यक पृष्ठभूमि भी बनने लगे। युग-सन्धि के ये वर्ष प्रभात की परिवर्तन बेला की तरह है। इसमें अवाञ्छनीयता की गलाई और सदाशयता की ढलाई होगी।

व्याख्या- नये युग में इन्हीं प्रज्ञा की अधिष्ठात्री गायत्री के मन्दिर और यज्ञ शालाएँ बननी चाहिए। उन्हीं के माध्यम से रचनात्मक कार्य चलने चाहिए। महामना मदनमोहन मालवीय कहा करते थे-

ग्रामें ग्रामे सभाकार्या: ग्रामेग्रामे कथाशभा:। पाठशाला, मल्लशला, प्रतिपर्वा महोत्सवा:॥

अर्थात् गाँव-गाँव ऐसे देवमन्दिर रहे जहाँ से न्याय, पर्व-संस्कार मनाने, विद्याध्ययन, आरोग्य सम्वर्धन के क्रिया कृत्य चलते रहें। केवल मन्दिरों से काम चलेगा नहीं।

आद्य शंकराचार्य ने जब मान्धाता से यही बात कही तो उन्होंने चार धामों की स्थापना के लिए अपना अंदाय भण्डार खोल दिया। इन तीर्थो के माध्यम से धर्म-धारणा विस्तार की कितनी बड़ी सेवा हुई है-
इसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।

मन्दिर मात्र पलायनवादी श्रद्धा नहीं, कर्म योगी निष्ठा जगायें तो ही उनकी सार्थकता है।

जब इन देवालयों से, जनजागृति केन्द्रों के माध्यम से सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन की गतिविधियाँ चलने लगेंगी, तो जन-जन में प्रखरता का उदय होगा तथा परिवर्तन के दृश्य सुनिश्चित रूप से दिखाई पड़ने लयोंगे। प्रस्तुत समय संधिवेला का है। आज संसार के सभी विद्धान, ज्योतिर्विद, अतीन्द्रिय दृष्टा इस सम्बन्ध में एक मत हैं कि युग परिवर्तन का समय आ पहुँचा। परिस्थितियों की विषमता अपनी चरम सीमा पर है। ऐसे में इन युग देवालयों की भूमिका अपनी जगह बड़ी महत्वपूर्ण है।

सूरदास ने लिखा है-
'एक सहस्र नौ सौ के ऊपर ऐसी योग परै। सहस्र वर्ष लौं सतयुग बीते धर्म की बेलि बढ़े ॥'

अर्थात् ११ वीं शताब्दी के अन्त में ऐसा ही परिवर्तन होगा जिसके बाद सहस्रों वर्षों के लिए धर्म का, सुख-शांति का राज्य स्थापित होगा।

संक्रमण वेला में किस प्रकार की परिस्थितियाँ बनती और कैसे घटनाक्रम घटित होते हैं, इसका उल्लेख महाभारत के वन पर्व में इस प्रकार आता है-

ततस्तु भूले संघाते वर्तमाने युग क्षये। यदा चन्द्रस्य सूर्यस्य तया तस्य बृहस्पति: ॥ एकराशौ समेष्यन्ति प्रयत्स्यति तदा कृतम्। कालवर्षी च पर्जन्यो नक्षत्राणि शुभानि च ॥ क्षेमं सुभिक्षमारोग्यं भविष्यति निरामयम्॥

अर्थात्- जब एक युग समाप्त होकर दूसरे युग का प्रारम्भ होने को होता है, तब संसार में संघर्ष और तीव्र हलचल उत्पन्न हो जाती है। जब चन्द्र, सूर्य, बृहस्पति तथा पुष्य नक्षत्र एक राशि पर जायेंगे तब सतयुग का शुभारम्भ होगा। इसके बाद शुभ नक्षत्रों की कृपा वर्षा होगी। पदार्थो की वृद्धि से सुख-समृद्धि, लोग स्वस्थ और प्रसन्न होने लगेंगे।

इस प्रकार का ग्रह योग अभी कुछ समय पहले ही आ चुका है। अन्याय गणनाओं के आधार पर भी यही समय है।

विशिष्ट अवसरों को आपत्तिकाल कहते हैं और उन दिनों आपत्ति धर्म निभाने की आवश्यकता पड़ती है। अग्निकाण्ड, दुर्घटना, दुर्भिदा, बाढ़, भूकम्प, युद्ध, महामारी जैसे अवसरों पर सामान्य कार्य छोड़कर भी सहायता के लिए दौड़ना पढ़ता है। छप्पर उठाने, धान रोपने, शादी-खुशी में साथ रहने, सत्प्रयोजनों का समर्थन करने के लिए भी निजी काम छोड़कर उन प्रयोजनों में हाथ बँटाना आवश्यक होता है। युग सन्धि में जागरूकों को युग धर्म निभाना चाहिए। व्यक्तिगत लोभ, मोह को गौण रखकर विश्व संकट की इन घड़ियों में उधस्तरीय कर्त्तव्यों के परिपालन को प्रमुख प्राथमिकता देनी चाहिए। यही है परिवर्तन की इस प्रभात वेला में दिव्य प्रेरणा, जिसे अपनाने में हर दृष्टि से हर किसी का कल्याण है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 31

गुरुवार, 28 मार्च 2019

👉 आज मानवता रो रही है। (अन्तिम भाग)

जातिवाद

हिन्दू समाज का जातिवाद शोषण का एक और कारण है। इसका प्रारम्भ वर्ण व्यवस्था से किया गया था। वर्ण व्यवस्था पेशों को दृष्टि में रखकर सुविधा के कारण हुई थी। उसमें ऊँच नीच, छूतछात, ऊँचाई निचाई की संकुलित भावनाएँ न थीं। धीरे-धीरे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र जन्मजात वर्ण बन गए और प्रत्येक वर्ण की अनेक उपजातियाँ बन गई। धीरे धीरे एक जाति के लोगों ने दूसरी जाति के खानपान, रोटी बेटी के व्यवहार बन्द किए। एक दूसरे के प्रति घृणा, वैर, ऊँच नीच के विचार आ गए। ऊँची कहलाने वाली जातियाँ नीची कहलाने वाली जातियों पर अत्याचार, आर्थिक शोषण और छूतछात के विचार रखने लगीं। जाति वाद के अत्याचारों, संकुचिता, शोषण, बहिष्कार के कारण हमारा देश हजारों वर्ष तक गुलाम रहा। एक जाति और वर्ण के व्यक्ति दूसरी जाति या वर्ण के लोगों को नीचा दिखाने में ही शान समझते रहे। जातिवाद के अत्याचारों के कारण हिंदू समाज का छोटा, नीच, दबा, पिसा और शोषित हिंदू शूद्र हिंदू तिरस्कार छूतछात, हीनत्व तथा हेटेपन का जीवन व्यतीत कर रहा है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि मानव समूहों में हो रहे कठोर तम शोषण और संघर्षों के प्रधान कारण तीन रहे हैं। (1) अर्थनीतिक, (2) वर्ग या जातिगत और (3) मत या धर्म गत। प्रथम महायुद्ध में अर्थनीतिक कारण था, दूसरे में अर्थनीतिक के साथ साथ मत सम्बन्धी भी कारण संयुक्त हो रहे थे। यदि भविष्य में तृतीय महायुद्ध हुआ तो उसमें अर्थनीतिक, जाति तथा मत वैषस्य-ये तीनों ही कारण मौजूद होंगे।

आज विश्व की विचित्र दशा है। शैतानी, आसुरी, पैशाचिक शक्तियों ने मनुष्य को उसके दैवी स्वभाव तथा जन्म सिद्ध पवित्र अधिकारों से वंचित कर दिया है। अज्ञान, अविवेक, प्रलोभन, स्वार्थ, नैराश्य, संकीर्णता, ने उसकी दिव्य दृष्टि का अपहरण करके उसे क्रूर, कुकर्मी, हिंसक, हत्यारा, धूर्त, मूर्ख, पाखण्डी, एवं मोहग्रस्त बना दिया है। सृष्टि का मुकुटमणि, धर्म को धारण करने वाला महा मानव-आज निरीह एवं असहाय की तरह दुख दारिद्र की शैतानी षड़यंत्र की चक्की में पिस रहा है। हा, हन्त!

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1953 पृष्ठ 6
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1953/January/v1.6

👉 आज का सद्चिंतन 28 March 2019

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 March 2019


👉 Amrit Chintan

■ When one’s Soul attain oneness with super-consciousness or God, it means that beastile behavior (selflessness) gets change into divinity, the beggar becomes a donor and so on. This type of change in human nature is known as unity with God – vilay, visarjan and sharnagati or total surrender to God. At that level the devotee and God become one or adwait i.e. oneness (no two).
 
□ The Omnipresent God - is a law, a system, which controls the entire creation, Existence of all – animates and in-animates are under that system. Any one who does not follow – gets destroyed. If we can assure our-self to this law and follow we are true devotee to God.

◆ Love is a great force of attraction which moves a man towards God. Then he will love every creature of the universe. It means now he truly believe presence of invisible God visible in every body. God is always with him. Love is God and God is love, that is all you know and you need to know. This practice of love for all is easiest and blissful worship of God.

◇ Science of Spirituality is the way to achieve the true wisdom of life. It is that path which leads to make the proper use of this finest gift of the creator. If God’s worship does not take care of his own life – it is a waste of time in – worship.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 69 से 71


धर्मस्य चेतनां भूयो जीवितां कर्तुमद्य तु।
अधिष्ठात्रीं युगस्यास्य महाप्रज्ञामृतम्भराम्॥६९॥
गायत्रीं लोकचित्ते तां कुरु पूर्णाप्रतिष्ठिताम् ।
पराक्रमं च प्रखरं कर्तुं सर्वत्र नारद ॥७०॥
पवित्रतोदारतां तु यज्ञजां च प्रचण्डताम्।
प्रखरां कर्तुमेवाद्यानिवार्यं मन्यतां त्वया ॥७१॥

टीका- आज धर्मचेतना को पुनर्जीवित करने के लिए इस युग की अधिष्ठात्री महाप्रज्ञा ऋतम्भरा गायत्री को लोकमानस में प्रतिष्ठित किया जाय। हे नारद! पराक्रम की प्रखरता के लिए सर्वत्र यज्ञीय पवित्रतार उदारता एवं प्रचंडता को प्रखर करने की आवश्यकता है॥६९-७१॥

व्याख्या- महाप्रज्ञा को अध्यात्म की भाषा में गायत्री कहते हैं, इसके दो पथ हैं-एक दर्शन अर्थात् तत्वचिंतन-अध्यात्म, दूसरा व्यवहार अर्थात् शालीनता युक्त आचरण-धर्म। महाप्रज्ञा की परिणति अन्त:क्षेत्र में प्रतिष्ठित होने पर साधक के व्यक्तित्व में आमूल-चूल परिवर्तन ला देती है। आत्मिक विभूतियाँ-ऋद्धियाँ तथा लोक व्यवहार में प्राप्त सम्पदा-सिद्धियाँ इसी के तत्व चिन्तन का प्रतिफल हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 26-27

बुधवार, 27 मार्च 2019

👉 संघर्ष करना सिखाइए

बाज पक्षी जिसे हम ईगल या शाहीन भी कहते है। जिस उम्र में बाकी परिंदों के बच्चे चिचियाना सीखते है उस उम्र में एक मादा बाज अपने चूजे को पंजे में दबोच कर सबसे ऊंचा उड़ जाती है। पक्षियों की दुनिया में ऐसी Tough and tight training किसी भी ओर की नही होती।

मादा बाज अपने चूजे को लेकर लगभग 12 Km ऊपर ले जाती है। जितने ऊपर अमूमन जहाज उड़ा करते हैं और वह दूरी तय करने में मादा बाज 7 से 9 मिनट का समय लेती है।

यहां से शुरू होती है उस नन्हें चूजे की कठिन परीक्षा।

उसे अब यहां बताया जाएगा कि तू किस लिए पैदा हुआ है?

तेरी दुनिया क्या है?

तेरी ऊंचाई क्या है?

तेरा धर्म बहुत ऊंचा है

और फिर मादा बाज उसे अपने पंजों से छोड़ देती है।

धरती की ओर ऊपर से नीचे आते वक्त लगभग 1 Km उस चूजे को आभास ही नहीं होता कि उसके साथ क्या हो रहा है।

6 Km के अंतराल के आने के बाद उस चूजे के पंख जो कंजाइन से जकड़े होते है, वह खुलने लगते है।

लगभग 8 Km आने के बाद उनके पंख पूरे खुल जाते है। यह जीवन का पहला दौर होता है जब बाज का बच्चा पंख फड़फड़ाता है।

अब धरती से वह लगभग 1000 मीटर दूर है ,लेकिन अभी वह उड़ना नहीं सीख पाया है। अब धरती के बिल्कुल करीब आता है जहां से वह देख सकता है उसके स्वामित्व को।

अब उसकी दूरी धरती से महज 700/800 मीटर होती है लेकिन उसका पंख अभी इतना मजबूत नहीं हुआ है की वो उड़ सके।

धरती से लगभग 400/500 मीटर दूरी पर उसे अब लगता है कि उसके जीवन की शायद अंतिम यात्रा है। फिर अचानक से एक पंजा उसे आकर अपनी गिरफ्त मे लेता है और अपने पंखों के दरमियान समा लेता है।
यह पंजा उसकी मां का होता है जो ठीक उसके उपर चिपक कर उड़ रही होती है और उसकी यह ट्रेनिंग निरंतर चलती रहती है जब तक कि वह उड़ना नहीं सीख जाता।

यह ट्रेनिंग एक कमांडो की तरह होती है। तब जाकर दुनिया को एक बाज़ मिलता है अपने से दस गुना अधिक वजनी प्राणी का भी शिकार करता है।

हिंदी में एक कहावत है... "बाज़ के बच्चे मुँडेर पर नही उड़ते।"

बेशक अपने बच्चों को अपने से चिपका कर रखिए पर... उसे दुनियां की मुश्किलों से रूबरू कराइए, उन्हें लड़ना सिखाइए। बिना आवश्यकता के भी संघर्ष करना सिखाइए।

अपने बच्चे को राष्ट्र व धर्म की रक्षा के लिए सदैव तैयार रहना.. सिखाईये .. आसान रास्तों के लिए गद्दार मुंडेरो पर नहीं .. देशभक्ति का संकल्प लेकर एक अनन्त  ऊंचाई तक ले जायें ...

ये TV के रियलिटी शो और अंग्रेजी स्कूल की बसों ने मिलकर आपके बच्चों को "ब्रायलर मुर्गे" जैसा बना दिया है जिसके पास मजबूत टंगड़ी तो है पर चल नही सकता। वजनदार पंख तो है पर उड़ नही सकता क्योंकि...

"गमले के पौधे और जंगल के पौधे में बहुत फ़र्क होता है।"

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...