बुधवार, 27 फ़रवरी 2019

👉 अच्छा काम हमेशा कर देना चाहिए!!

एक आदमी ने एक पेंटर को बुलाया अपने घर, और अपनी नाव दिखाकर कहा कि इसको पेंट कर दो। वो पेंटर पेंट ले कर उस नाव को पेंट कर दिया, लाल रंग से जैसा कि, नाव का मालिक चाहता था। फिर पेंटर ने अपने पैसे लिए, और चला गया।

अगले दिन, पेंटर के घर पर वो नाव का मालिक पहुँच गया, और उसने एक बहुत बड़ी धनराशी का चेक दिया उस पेंटर को। पेंटर भौंचक्का हो गया, और पूछा कि ये किस बात के इतने पैसे हैं? मेरे पैसे तो आपने कल ही दे दिया था।

मालिक ने कहा कि "ये पेंट का पैसा नहीं है, बल्कि ये उस नाव में जो "छेद" था, उसको रिपेयर करने का पैसा है।"

पेंटर ने कहा,. "अरे साहब, वो तो एक छोटा सा छेद था, सो मैंने बंद कर दिया था। उस छोटे से छेद के लिए इतना पैसा मुझे, ठीक नहीं लग रहा है।"

मालिक ने कहा,.. "दोस्त, तुम समझे नहीं मेरी बात, अच्छा विस्तार से समझाता हूँ। जब मैंने तुम्हें पेंट के लिए कहा, तो जल्दबाजी में तुम्हें ये बताना भूल गया कि नाव में एक छेद है, उसको रिपेयर कर देना। और जब पेंट सूख गया, तो मेरे दोनों बच्चे,.. उस नाव को समुद्र में लेकर मछली मारने की ट्रिप पर निकल गए।

मैं उस वक़्त घर पर नहीं था, लेकिन जब लौट कर आया और अपनी पत्नी से ये सुना कि बच्चे नाव को लेकर, नौकायन पर निकल गए हैं,.. तो मैं बदहवास हो गया। क्योंकि मुझे याद आया कि नाव में तो छेद है। मैं गिरता पड़ता भागा उस तरफ, जिधर मेरे प्यारे बच्चे गए थे। लेकिन थोड़ी दूर पर मुझे मेरे बच्चे दिख गए, जो सकुशल वापस आ रहे थे। अब मेरी ख़ुशी और प्रसन्नता का आलम तुम समझ सकते हो। फिर मैंने छेद चेक किया, तो पता चला कि,. मुझे बिना बताये,.. तुम उसको रिपेयर कर चुके हो।

तो,.. मेरे दोस्त,.. उस महान कार्य के लिए, तो ये पैसे भी बहुत थोड़े हैं। मेरी औकात नहीं कि उस कार्य के बदले तुम्हे ठीक ठाक पैसे दे पाऊं।"
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इस कहानी से हमें यही समझना चाहिए कि भलाई का कार्य हमेशा "कर देना" चाहिए, भले ही वो बहुत छोटा सा कार्य हो। क्योंकि वो छोटा सा कार्य किसी के लिए "अमूल्य" हो सकता है।

👉 आदमी बनो! (अंतिम भाग)

यदि आप कहें कि वह मनुष्य था तो इसमें सन्देह नहीं किया जायेगा। एक बात अवश्य है, शरीर से वह मनुष्य था हृदय और मस्तिष्क उसे मिलना था, पर वह इससे पहले ही आपके द्वारा हिन्दू, मुसलमान ईसाई बना दिया गया? क्या ही अच्छा होता कि - उसे जब मनुष्य का शरीर मिला था तो मनुष्य का हृदय और मस्तिष्क भी पा जाने देते और वह हिन्दुस्तानी, हिन्दू मुसलमान, राजपूत, ब्राह्मण, पंजाबी, बंगाली बनता, वह आदमी भी रहता और हिन्दू, मुसलमान, ईसाई भी। परन्तु आपकी भयानक भूल से वह आज तक केवल शरीर से मनुष्य अर्थात् आधा ही मनुष्य रहा। ठीक यही दशा आपकी भी है आप कोरे दुकानदार, वकील और दस्तकार हैं, आदमी नहीं।

यदि शरीर की बनावट पर ध्यान न दिया जाय तो आप में और पशु में बहुत कम अन्तर रह गया है एक आप जैसा मनुष्य रूप में पशु सिगरेट पीने लगा है, आप भी उसकी देखा−देखी सिगरेट पीना शुरू कर देते हैं, आपको इस चाल में भेड़ की सिफत है। आपके हित के लिये कोई मनुष्य का संगठन करना चाहता है। आप में से एक भागता है, उसको संभालता है तो दूसरा चला जाता है, तीसरा काबू में आया तो चौथा निकल गया। यह आप में उन मेंढ़कों के गुण हैं जो तोलने में नहीं आते। इसी तरह आप में चमगादड़, बगुले, काग और गीदड़ आदि पशुओं के स्वभाव और उनकी आदमें मिलती हैं। इसलिये आपके सम्बंध में कूपमण्डूक, तराजू के मेंढक भेड़चाल आदि उपाधि ठीक ही प्रचलित है।

आज आपका समाज मानव समाज नहीं, हिन्दू समाज मुसलिम समाज है। आपका धर्म मानव धर्म नहीं, सनातनधर्म इस्लाम धर्म है। आपकी जाति मनुष्य नहीं, गूजर कोली, ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय, चमार है।

आपकी सभ्यता मानव सभ्यता नहीं, इंग्लिश एटिकेट है। असल बात यह है कि आप मनुष्य ही नहीं हैं, और न जाने क्या-क्या हैं। आप में एक खूबी है, मनुष्य हृदय और मस्तिष्क आवश्यक है और हृदय और मस्तिष्क की खुराक भी, पर आप इन सब के बिना भी जीते हैं, पर केवल जीते ही हैं, वे सर्वोच्च आनन्द, जिनकी जीवित प्राणी आकाँक्षा कर सकता है, आपको प्राप्त नहीं है। निर्दोष, शाँतिमय, सर्वांगपूर्ण जिन्दगी का मजा आपको चखने भर को नहीं मिलता। किसी प्रकार आपका जीवन तो स्थिर है पर उसमें जिन्दगी का नाम नहीं। अब भी यदि आप जीवन के सर्वोच्च आनन्दों को जानना चाहते हैं तो मजबूत बनें, महान बनें, और बनें शरीर तथा हृदय और मस्तिष्क वाले पूर्ण मनुष्य उस जीवन को, जिसमें जिन्दगी का नाम नहीं, और जो सड़ी गली चीजों से पूर्ण है, धता बतायें। जीवन की यह कोई साहित्यिक और शास्त्रीय व्याख्या नहीं सीधी सादी बात है-

हमने माना हो फरिश्ते शेरुजी।
आदमी होना बहुत दुश्वार है॥

📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1943 पृष्ठ 9

सहज़ साधना

एक स्त्री ने दो चाकू ख़रीदे, एक को उसने सुरक्षित आलमारी में रख दिया और दूसरे को प्रयोग में हमेशा लिया सब्जी और फ़ल काटने में। दूसरा हमेशा पहले से जलता देख़ो कितना प्यार करती उसे सम्हाल के रखा मुझे रोज़ प्रयोग करती हैं।

वर्ष भर बाद एक दिन त्यौहार में दूसरे चाकू की अवश्यक्ता पड़ी, लेकिन कभी उपयोग न होने के कारण रखे रखे उसमे जंग लग गया आवशयक्ता पड़ने पर काम न आ सका।

मित्रों इसी तरह यदि हमने दीक्षा ली और नियमित उपासना, साधना, आराधना के साथ सत्साहित्य का नियमित अध्ययन नहीं किया तो हमको अपेक्षित सफलता नहीं मिलेगी। हमारी साधना में प्राण नहीँ आयेगा। हमारी गुरु दीक्षा को जंग लग जायेगा और हमारा उद्धार नहीं हो पायेगा।

साधना में प्राण आएगा ईश्वर के प्रति सच्चे प्रेम, नियमितता (जप,ध्यान और स्वाध्याय), सच्चे भाव, श्रद्धा आर पूर्ण विश्वास से।

👉 आज का सद्चिंतन 27 Feb 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 Feb 2019




👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 24 से 26

वरिष्ठता नराणां तु श्रंद्धाप्रज्ञाऽवलम्बिता ।
निष्ठाश्रिता च व्यक्तित्वं सर्वेषामत्र संस्थितम्॥२४॥
न्यूनाधिकता हेतो: क्षीयते वर्धते च तत्।
उत्थानसुखजं पातदु:खजं जायते वृति:॥२५॥
अधुना मानवैस्त्यक्ता श्रेष्ठताऽऽभ्यन्तर स्थिता ।
फलत आत्मनेऽन्येभ्य: सटान् भावयन्ति ते॥२६॥

टीका:- मनुष्य की वरिष्ठा श्रद्धा, प्रज्ञा और निष्ठा पर अवलम्बित है। इन्हीं की न्यूनाधिकता से उसका व्यक्तित्व उठता-गिरता है। (व्यक्तित्व) के उठने-गिरने के कारण उत्थानजन्म सुखों और पतनजन्य दुखों का वातावरण बनता है। इन दिनों मनुष्यों ने आन्तरिक वरिष्ठता गँवा दी है। फलत: अपने तथा सबके लिए संकट उत्पन्न कर रहे है ॥२४-२६॥

व्याख्या:- श्रद्धा अर्थात् सद्भाव, प्रज्ञा अर्थात् सद्ज्ञान एवं निष्ठा अर्थात् सत्कर्म। तीनों का समन्वित स्वरूप ही व्यक्तित्व का निर्माण करता है। श्रद्धा अन्तःकरण से प्रस्फुटित होने वाले आदर्शो के प्रति प्रेम है। इस गंगोत्री से निःसृत होने वाली पवित्र धारा ही सद्ज्ञान और सत्कर्म से मिलकर पतितपावनी गंगा का स्वरुप ले लेती है। इन तीनों का विकास-उत्थान ही मानव की महामानव बनाता है तथा इस क्षेत्र का पतन ही उसे विकृष्ट स्तर का जीवनयापन करने को विवश करता है।

मनुष्य अपनी वरिष्ठता का कारण अपने वैभव-पुरुषार्थ, बुद्धिबल-धनबल को मानता है, जबकि यह मान्यता नितान्त मिथ्या है। व्यक्तित्व का निर्धारण तो अपना ही स्व-अन्त:करण करता है। निर्णय, निर्धारण यहाँ से होते हैं। मन और शरीर स्वामिभक्त सेवक की तरह अन्त:करण की आकांशा पूरी करने के लिए तत्परता और स्फूर्ति से लगे रस्ते हैं। उन्नति-अवनति का भाग्य-विधान यही लिखा जाता है।

अन्तःकरण से सद्भाव न उपजेगा तो सद्ज्ञान व सदाचरण किस प्रकार फलीभूत होगा ? वस्तुत: तीनों ही परस्पर पूरक हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 11-12

👉 अशुभ चिंतन छोड़िये-भय मुक्त होइये

बहुधा नये कामों का आरम्भ करते समय एक किस्म का संकोच होने लगता है। कारण वही है- अशुभ आशंका। उस स्थिति में अशुभ आशंकाओं को अपने मन से झटक कर विचार किया जाना चाहिए। सफलता और असफलता दोनों ही सम्भावनाएँ खुली हुई हैं। फिर क्या जरूरी है कि असफल ही होना पड़ेगा। मन में आशा का यह अंकुर जमा लिया जाए तो असफलता भी पराजित नहीं कर पाती। उस स्थिति में भी व्यक्ति को यह सन्तोष रहता है कि असफलता कोई नये अनुभव दे गई है। इन अनुभवों से लाभ उठाते हुए आशावादी व्यक्ति दुबारा प्रयत्न करता रहता है और तब तक प्रयत्न करता रहता है, जब तक कि सफलता हस्तगत नहीं हो जाती।

असफलताओं और दुःखदाई घटनाओं को स्मृति पटल पर बार-बार लाने की अपेक्षा ऐसी घटनाओं का स्मरण करना चाहिए जो अपने आपके प्रति आस्था और विश्वास को जगाती हैं। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में सफलता के और असफलता के दोनों ही अवसर आते हैं, दोनों तरह की परिस्थितियाँ आती हैं जो अच्छी और बुरी होती है। सुख-दुःख के क्षण सभी के जीवन में आते हैं। असफलताओं, कठिनाइयों और कष्टों को याद रखने तथा याद करने की अपेक्षा सफलताओं और सुखद क्षणों को याद करना आशा तथा उत्साह का जनक होता है। ये स्मृतियाँ व्यक्ति में आत्मविश्वास उत्पन्न करती हैं और जो व्यक्ति अपने आप में विश्वास रखता है, हर कठिनाई को सामना करने के लिए प्रस्तुत रहता है उसके लिए कैसा भय और कैसी निराशा?

भविष्य के प्रति आशंका, भय को आमंत्रण मनुष्य की नैसर्गिक क्षमताओं को कुँद बना देते हैं। अस्तु, जिन्हें जीवन में सफलता प्राप्त करने की आकांक्षा है उन्हें चाहिए कि वे अशुभ चिन्तन, भविष्य के प्रति आशंकित रहने और व्यर्थ के भयों को पालने की आदत से छुटकारा प्राप्त करें।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1981 पृष्ठ 22
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1981/January/v1.22

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019

👉 आदमी बनो!

आपके जीवन में एक नहीं, अनेक बार ऐसे अवसर आये होंगे कि आपके साथ कोई पूरा आदमी हो और उसके विषय में किसी ने पूछा हो कि ‘आप की तारीफ?’ अर्थात् यह कौन है, तो आपने उत्तर दिया हो कि ‘आप अमुक फैक्टरी के मैनेजर हैं, अच्छे लेखक और वक्ता हैं अथवा डॉक्टर हैं, ग्रेजुएट हैं, गुजराती हैं, इत्यादि’ किन्तु किसी की तारीफ में आपने न तो कभी यह कहा होगा न कि किसी दूसरे के मुँह से सुना होगा, कि आप मनुष्य हैं। क्या हुआ यदि आपने किसी से पूछा हो-”आप कौन हैं?” तो किसी ने मजाक में कह ही दिया हो-”आदमी है।”

आप ऐसा जवाब सुनकर या तो खीझ गये होंगे या हंस दिया होगा। हमारा ख्याल है कि आपने कभी यकीन नहीं किया होगा कि वे कहने वाले सचमुच आदमी हैं। दुनिया में चाहे आज झूठ का बोल बाला हो पर यदि कहीं कुछ झूठ नहीं कही जाती तो केवल यही कि किसी को आदमी कहने के विषय में आज भी बड़े संयम और सत्य से काम लिया जाता है। एक साहब राजपूत हैं और साथ ही राजस्थानी भी हैं, हिन्दुस्तानी भी हैं, गोरे हैं-प्रोफेसर हैं, तो भी हो सकता है कि वे आदमी न हों। एक बच्चा ठोकर खाकर गिर पड़ता है, पीछे आने वाली लकड़ी उस गिरे हुए बच्चे को खून में लथपथ देखकर भी छोड़कर चली जाती है। इसलिये न कि वह उसका कोई नहीं है।

दिन दहाड़े एक भले आदमी को एक गुण्डा तंग कर रहा है, आप उसे क्यों नहीं बचाते। इसलिये कि आप उन दोनों से परिचित नहीं है या वे दोनों लड़ने वाले दूसरी कौम या मजहब के हैं। आप अपने बच्चे के लिये खिलौने लाये हैं, दूसरा एक बच्चा भी सामने खड़ा है, वह भी आपके बच्चे की तरह खिलौने के लिये लालायित है पर खिलौना आप उसे नहीं देते, इसलिये कि वह बच्चा आपका नहीं है, चाहे वह यह भेद न जानता हो। एक बेचारा रोगी दर्द से पीड़ित आपको कुर्सी के पास बैठा मुँह की तरफ देख रहा है आप उसे देखने से पहले सेठजी के कब्ज की शिकायत सुन रहे हैं। आप कैसे डॉक्टर हैं। उस दिन जो एक थका हुआ आदमी बिना पूछे आपकी सड़क पर पड़ी खाली चारपाई पर बैठ गया था तो आप उससे क्यों लड़ पड़े थे। इसलिये तो कि वह अनजान पंजाबी था यह आपकी रोज की आदतें हैं।

आप इन बातों में कभी अपनी कमजोरी या गलती अनुभव नहीं करते, इसलिये कि आप अभ्यस्त हो गये हैं उन हाकिमों की तरह जो क्लर्कों से 10-11 घण्टे काम लेकर भी उन पर इसलिये नाराज हो उठते हैं कि वे काम नहीं करते। तब सोलह आना हमारी समझ में आ गया कि आप सचमुच आदमी न होकर कुछ और ही हैं। आप अपने जन्म की स्थिति को चाहे न जानते हों, परन्तु किसी बच्चे को जन्म के समय अवश्य देखा होगा। आप बताइये, वह उस समय क्या था बेदर्दी डॉक्टर या निर्दय अफसर या बेईमान वकील? क्या उस समय वह मुसलमान था। उसकी सुन्नत हुई थी? क्या वह हिन्दू था? क्या उस समय उसके चोटी या जनेऊ या तिलक था?

📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1943 पृष्ठ 9

👉 आज का सद्चिंतन 26 Feb 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 Feb 2019


👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 21 से 23

ईदृश्यां च दशायां तु स्वप्रतिज्ञानुसारत: ।
जाता नवावतारस्य व्यवस्थायाः स्थिति: स्वयम्॥२१॥
प्रज्ञावतारनाम्नां च युगस्यास्यावतारक:।
भूलोके मानवानां तु सर्वेषां हि मन:स्थितौ॥२२॥
परिस्थितौ च विपुलं चेष्टते परिवर्तनम्।
सृष्टिक्रमे चतुर्विश एष निर्धार्यतां क्रम:॥२३॥

टीका:- ऐसी दशा में अपनी प्रतिज्ञानुसार नये अवतार की व्यवस्था बन गई। प्रज्ञावतार नाम से इस का अवतरण भूलोक के मनुष्य समुदाय की मनःस्थिति एवं में भारी परिवर्तन करने जा रहा है । सृष्टि क्रम में इस प्रकार का यह चौबीसवाँ निर्धारण है॥२१-२३॥

व्याख्या:- आस्था संकट के दौर में भगवान हमेशा अपनी प्रतिज्ञा पूरी करते हैं, ऐसी परिस्थिति में ईश्वरीय, संत्ता के अवतरण का उद्देश्य एक ही रहता है । गीता में कहा हैं-

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थनमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे-युगे॥

गोस्वामी तुलसीदास के अनुसार-
असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निजश्रुति सेतु ।
जग विस्तारहिं विशद यश राम जनम कर हेतु ॥

भावार्थ यह है किं अधर्म का नाश और धर्म की स्थापना अवतार प्रक्रिया का मूलभूत प्रयोजन है। यह संकल्प विराट है और अनादिकाल से यथावत् चला आ रहा हैं।


.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 10-11

👉 अशुभ चिंतन छोड़िये-भय मुक्त होइये (भाग 3)

भय और मनोबल, अशुभ और शुभ चिन्तन आशंकाएं और आशाएँ सब मन के ही खेल हैं। इनमें पहले वर्ग का चुनाव जहाँ व्यक्ति को आत्मघाती स्थिति में धकेलता है वही दूसरे प्रकार का चुनाव उसे उत्कर्ष तथा प्रगति के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करता है। सर्वविदित है कि आत्मघात, व्यक्तित्व का हनन या असफलता का चुनाव व्यक्ति किन्हीं विवशताओं के कारण ही चुनता है। अन्यथा सभी अपना विकास, प्रगति और अपने अभियानों में सफलता चाहते हैं। जब सभी लोग सफलता और प्रगति की ही आकाँक्षा करते हैं तो मन में समाये भय के भूत को जगाकर क्यों असफलताओं को आमन्त्रित करता है? इसके लिए मन की उस दुर्बलता को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है जिसे आत्मविश्वास का अभाव कहा जाता है।

प्रथम तो अशुभ चिन्तन और अमंगलकारी आशंकाओं से ही बचा जाना चाहिए। लेकिन यह स्वभाव में सम्मिलित हो गया है और अपने आपके प्रति अविश्वास बहुत गहरे तक बैठ गया तो उसके लिए भी प्रयत्न करना चाहिए। इस दिशा में सचेष्ट होते समय यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि हम स्वयं ही भय की रचना करते हैं, उसे बुलाते और अपनी हत्या के लिए आमन्त्रित करते हैं। यह जान लिया गया तो यह समझ पाना भी कठिन नहीं है कि स्वयं ही भय को नष्ट भी किया जा सकता है।

अपने लगाये पेड़ को स्वयं काटा भी जा सकता है और सन्दर्भों में यह बात लागू होती हो अथवा नहीं होती हो किन्तु मन के सम्बन्ध में यह बात शत प्रतिशत लागू होती है कि वह तभी भयभीत होता है, जब जाने अनजाने उसे भयभीत होने की आज्ञा दे दी जाती है। यह आज्ञा अशुभ आशंकाओं के रूप में भी हो सकती है और अतीत के कटु अनुभवों तथा दुःखद स्मृतियों के रूप में भी। कहने का आशय यह कि किसी भी व्यक्ति के मन में उसकी इच्छा और अनुमति के विपरीत भय प्रवेश कर ही नहीं सकता। तो भीरुता को अपने स्वभाव से हटाने के लिए पहली बात तो यह आवश्यक है कि भय को अपने मनःक्षेत्र में प्रवेश करने की अनुमति न दी जाए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1981 पृष्ठ 21
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1981/January/v1.21

👉 स्वप्न का राजा

एक युवक ने स्वप्न देखा कि वह किसी बड़े राज्य का राजा हो गया है। स्वप्न में मिली इस आकस्मिक विभूति के कारण उसकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। प्रात:काल पिता ने काम पर चलने को कहा, माँ ने लकडियाँ लाने की आज्ञा दी, धर्मपत्नी ने बाजार से सौदा लाने का आग्रह किया, पर युवक ने कोई भी काम न कर एक ही उत्तर दिया- 'मैं राजा हूँ, मैं कोई भी काम कैसे कर सकता हूँ?'

घर वाले बड़े हैरान थे, आखिर किया क्या जाये? तब कमान सम्भाली उसकी छोटी बहिन ने। एक- एक कर उसने सबको बुलाकर चौके में भोजन करा दिया, अकेले खयाली महाराज ही बैठे के बैठे रह गये। शाम हो गई, भूख से आँतें कुलबुलाने लगीं। आखिर जब रहा नहीं गया तो उसने बहन से कहा- 'क्यों री! मुझे खाना नहीं देगी क्या?' बालिका ने मुँह बनाते कहा- '
राजाधिराज! रात आने दीजिए, परियाँ आकाश से उतरेंगी तथा वही आपके लिए उपयुक्त भोजन प्रस्तुत करेंगी। हमारे रूखे- सूखे भोजन से आपको सन्तोष कहाँ होगा?'

व्यर्थ की कल्पनाओं में विचरण करने वाले युवक ने हार मानी और शाश्वत और सनातन सत्य को प्राप्त करने का, श्रमशील बनकर पुरुषार्थरत होने का, वचन देने पर ही भोजन पाने का अधिकारी बन सका।

ऐसे लोगों की स्थिति वैसी ही होती है, जिनका कबीर ने अपनी ही शैली में वर्णन किया है-

ज्यों तिल माही तेल है, ज्यों चकमक में आग।
तेरा साँई तुझ में, जागि सके तो जाग॥
ज्यों नैनों में पूतली, त्यों मालिक सर मांय।
मूर्ख लोग ना जानिये, बाहर ढूँढ़न जाँय॥

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १

सोमवार, 25 फ़रवरी 2019

👉 रिश्तो को दूषित करता आज का मिडिया

आधुनिक टेलीविजन--

टेलीविजन पर जितने भी विज्ञापन आते है सबका एक ही उद्देश्य है लड़की . . . .
सेहत कुछ नही, संस्कार कुछ नही, देश का विकास नही , भ्रष्टाचार से कोई मतलब नही, बलात्कार से मतलब नही केवल और केवल लड़की को अपने जाल मे फंसाओ।
कुछ उदाहरण है:-
1 spirit पियो लड़की पटाओ
2 Raymond's या या कोई सा भी सूट पहनो लड़की पटाने के लिए
3 कोलगेट करो तो लड़की पटती है
4 क्लोजअप करो लड़की आर्कषित होती है
5 हिरो पैशन चलाओ तो लड़की कार छोड़ मोटर साइकिल पर आ जाती है
6 फेयर एंड हैडसम का एक ही फायदा लड़की ठीक यही फायदा फेयर एंड लवली का है लड़का पटाओ
7 स्कुटी चलाओ तो लड़के से आगे निकल जाओ
8 यहाँ तक गंजी तथा छोटे कपड़े पहनो तो भी लड़की
9 पाउडर, क्रिम या शेन्ट या डिओ सब का एक ही मकसद लड़की या लड़का
10 जिलेट ब्लेड से ढाड़ी बनाओ तो वहा भी लड़की सेहत और पैसे का कोई महत्व नही मतलब इन सब चीजो से कोई फायदा नही, देश का विकास नही।

बच्चों को रखे टीवी से दूर...

इन कामो मे सबसे ज्यादा विदेशी कम्पनियाँ है ये भारत के अरबो रुपये लूट कर अपने देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर कर रही है और हमे महँगाई, बेरोजगारी के दलदल मे ढकेल रही है। जनता इस काम मे साथ दे रहे है। आप से यह निवेदन टीवी, देख कर न चले, समान न खरिदे। अपनी बुद्धि का प्रयोग करे और जरूरतानुसार खरीदारी करे। केवल स्वदेशी वस्तुओ का प्रयोग करे। अगर वह किसी गरीब का कुटीर उद्धोग हो तो और भी अच्छा, आप का पैसा किसी गरीब के पास जायेगा,उसका विकास होगा और आप का सेहत और पैसा दोनो बचेगा। अगर आप को क्वालीटी की चिन्ता है तो आप को बता दू इन विदेशीयो मे कोई गुण नही है,अगर आप इनका गहरा अध्धयन करो ये आप को पता चलेगा, ये सिर्फ हमे बेवकुफ बनाती है।

टेलिविजन नही यह इडियट बॉक्स है, और इस इडियट़ बॉक्स ने हमारे देश की युवा पिढ़ी के विचारो को पोलियो ग्रस्त कर दिया है।
टीवी पर दिखाये गये एड़, टीवी सीरियल, न्यूज़ चैनल, वेबसाइट्स, फ़िल्मे, में नारी को मन बहलाने की चीज की तरह दिखाया जाता है।

यकीन मानिये जिस दिन इस देश से माँतृ शक्ती विलुप्त हो गई उस दिन यह धरती वीरो, महाबलीयो, शूरवीरो, योद्धाओ, बुद्धजीवियों से शून्य हो जायेगी तब देश में केवल .... ही पैदा होंगे जो कुछ तो विपक्ष में, फिल्मो और JNU जैसे कॉलेजो में आसानी से मिल जायेंगे और इनकी आने वाली नस्ल तो...

क्या हम माँतृ शक्ती को पुनः सम्मान दिला सकते है?

👉 आज का सद्चिंतन 25 Feb 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 Feb 2019


शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019

👉 एक प्यार ऐसा भी....

नींद की गोलियों की आदी हो चुकी बूढ़ी माँ नींद की गोली के लिए ज़िद कर रही थी।

बेटे की कुछ समय पहले शादी हुई थी।

बहु डॉक्टर थी। बहु सास को नींद की दवा की लत के नुक्सान के बारे में बताते हुए उन्हें गोली नहीं देने पर अड़ी थी। जब बात नहीं बनी तो सास ने गुस्सा दिखाकर नींद की गोली पाने का प्रयास किया।

अंत में अपने बेटे को आवाज़ दी।

बेटे ने आते ही कहा, 'माँ मुहं खोलो। पत्नी ने मना करने पर भी बेटे ने जेब से एक दवा का पत्ता निकाल कर एक छोटी पीली गोली माँ के मुहं में डाल दी।
पानी भी पिला दिया। गोली लेते ही आशीर्वाद देती हुई माँ सो गयी।

पत्नी ने कहा,

ऐसा नहीं करना चाहिए। पति ने दवा का पत्ता अपनी पत्नी को दे दिया। विटामिन की गोली का पत्ता देखकर पत्नी के चेहरे पर मुस्कराहट आ गयी।

धीरे से बोली

आप माँ के साथ चीटिंग करते हो।

''बचपन में माँ ने भी चीटिंग करके कई चीजें खिलाई है। पहले वो करती थीं, अब मैं बदला ले रहा हूँ।

यह कहते हुए बेटा मुस्कुराने लगा।"

👉 आज का सद्चिंतन 22 Feb 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 22 Feb 2019


👉 दुःखों की गठरी घटे कैसे ?

दुःखों को कैसे बँटाया जाए और उनसे कैसे निबटा जाए, इस संबंध में बायजीद नामक एक सूफी फकीर ने बड़ी सुंदर कथा कही है। उस फकीर ने एक दिन प्रार्थना की, हे मेरे भगवान्! मेरे मालिक!! मेरा दुःख किसी और को दे। मुझे थोड़ा छोटा दुःख दे दो, मेरे पास बहुत दुःख हैं। प्रार्थना करते- करते उसको नींद लग गई। उसने स्वप्र देखा कि खुदा मेहरबान है। दुनिया के सब लोग आकर उसके पास दुःखों की गठरियाँ टाँगते चले जा रहे हैं। भगवान् कह रहे हैं कि अपनी गठरियाँ मेरे पास बाँध दो और मनचाही वह दूसरी लेते जाओ। बायजीद मुस्कराए, सोचा भगवान् ने मन की बात सुन ली। अब मैं भी अपनी दुःखों की गठरी बाँधकर हलके दुःखों वाली गठरी ले जाता हूँ। बायजीद ने आश्चर्य से देखा कि दुनिया में दुःख तो बहुत हैं। न्यूनतम दुःखों वाली गठरी भी उसकी गठरी से दुगनी थी। सपने में ही वह भागा कि अपनी वाली गठरी पहले उठा लूँ। कहीं ऐसा न हो कि मेरे जिम्मे दुगने दुःखों वाली गठरी आ जाए और मेरी गठरी कोई और ले जाए। माँगा तो था मैंने कम दुःख और कोई मुझे अधिक दुःख पकड़ा जाए।

यदि इस कथा का मर्म हमारी समझ में आ जाए, तो हम भगवान् से, अपने खुदा से, अपने इष्ट से कभी प्रार्थना नहीं करेंगे कि हमारे दुःख कम हों, हम कहेंगे कि औरों के दुःख कम हों, उनकी फलों में आसक्ति कम हो, वे विकर्मी नहीं दिव्यकर्मी बनें। दुःख हमारे हित में है। दुःख को तप बना लेना ज्ञानी का काम है। सुख को यही ज्ञानी योग बना लेता है। जो दुःख में, कष्ट में परेशान हो जाए, उद्विग्र हो जाए तथा सुख में भोग- विलासी बन जाए, वह अज्ञानी है। ज्ञान की पवित्र अग्रि में कर्मों को भस्म कर व्यक्ति यही पहला मर्म सीखता है कि मुझे औरों के लिए जीना चाहिए। जीवन भर परम पूज्य गुरुदेव यही शिक्षण हमें देते चले गए। उन्होंने कहा, ‘‘औरों के हित जो जीता है, औरों के हित जो मरता है, उसका हर आँसू रामायण, प्रत्येक कर्म ही गीता है।’’ इसी आग ने तो कइयों के अंदर परहितार्थाय मर मिटने की अलख जगा दी और देखते- देखते एक विराट् संगठन गायत्री परिवार का खड़ा होता चला गया।

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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