मंगलवार, 29 जनवरी 2019

👉 आत्म निर्माण-जीवन का प्रथम सोपान (भाग 3)

दूसरों का आदर करना, सद्व्यवहार का अभ्यस्त होना, सज्जनोचित शिष्टाचार बरतना, मधुर वचन बोलना यह व्यक्तित्व की गरिमा बढ़ाने वाली साधना है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। उसे दूसरों के साथ मिल-जुल कर रहना पड़ता है। स्नेह सौहार्द का वातावरण तभी बना रह सकता है जब दूसरों के साथ शालीनता का व्यवहार किया जाय। अहंकारी व्यक्ति दूसरों को तुच्छ समझते है और कटु वचन एवं दुर्व्यवहार पर उतारू रहते हैं। उद्धत आतंकवादी उच्छृंखल आचरण करके कोई अपने अहंकार की पूर्ति होने की बात सोच सकता है, पर वस्तुतः वह हर किसी की दृष्टि में अपना सम्मान खोता है। स्तर गिराता है और घृणास्पद बनता है। उद्धत आचरण से सम्भव है सामने वाला चुप ही रहे, परन्तु उसका स्नेह सहयोग तो चला ही जाता है। इस प्रकार क्रोधी, अशिष्ट, उच्छृंखल व्यक्ति अपना नाम बढ़ाने की बात सोचता है, पर वस्तुतः उसे निरन्तर खोता चला जाता है। कुसमय में अपने को एकाकी अनुभव करता है। स्नेह सहयोग से वंचित होकर वह भूत बेताल की अशान्त अतृप्त मनःस्थिति में जा फँसता है।

ईर्ष्या, द्वेष, झूठ, छल, प्रपंच, दुरभिसन्धि, षड्यन्त्र, शोषण, अपहरण, आक्रमणों की आसुरी मनोवृत्ति अपना कर मनुष्य अपराधी आचरण ही करता हैं उसकी गतिविधियाँ ऐसी हो जाती हैं, जिससे मनुष्य सबकी आँखों में गिरता है यहाँ तक कि अपनी आँखों में भी। धन या पद पाने की अपेक्षा लोकश्रद्धा प्राप्त करना अधिक मूल्यवान है। दुष्ट-दुराचारी बनकर कोई यदि साधन सम्पन्न बन जाय तो यही कहा जाना चाहिए कि उसने खोया बहुत पाया कम। व्यसनी, व्यभिचारी, आलसी और प्रमादी, आतंकवादी, अत्याचारी, उस सुखद उपलब्धि से वंचित ही रहते है जिसे पाने के लिए यह कुमार्ग अपनाया। दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों का आश्रय लेकर मनुष्य दूसरों की जितनी हानि करता है उसकी तुलना में अपनी असंख्य गुनी हानि कर लेता है।

समय को नियमितता के बन्धनों में बाँधा जाना चाहिए। चौबीसों घण्टे की निर्धारित दिनचर्या बनानी चाहिए और उस पर तत्परतापूर्वक चलते जाना चाहिए। समय ही सबसे बड़ी सम्पदा है, उसका एक क्षण भी बर्बाद नहीं होना चाहिये। शरीर की क्षमता के अनुरूप श्रम किया जाय, काम का स्तर और सिलसिला बदलते ही रहा जाय ताकि थकान नहीं चढ़ेगी। हर काम में दिलचस्पी पैदा की जाय, उसे खेल समझते हुए पूरे मनोयोग के साथ करना चाहिए। यह आदत पड़ जाय तो दुर्बल शरीर वाला व्यक्ति भी बिना थके बहुत काम करता रह सकता है। आहार-विहार विवेकपूर्ण और क्रमबद्ध होने चाहिए। समयानुसार काम बदलने से विश्राम और विनोद का उद्देश्य पूरा हो सकता है। सामने प्रस्तुत कामों को दिलचस्पी और मनोयोग के साथ करने का अभ्यास करना मनोनिग्रह का सर्वोत्तम योगाभ्यास है। उस साधना में निष्णात व्यक्ति हाथों हाथ क्रिया कुशलता के अभिवर्धन और सफलताओं के वरण का उत्साहवर्द्धक लाभ प्राप्त करता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

Subscribe Us On YouTube:-
👇👇👇
https://bit.ly/2KISkiz

सोमवार, 28 जनवरी 2019

👉 झुठा

"मम्मी , मम्मी ! मैं उस बुढिया के साथ स्कुल नही जाउँगा ना ही उसके साथ वापस आउँगा "मेरे दस वर्ष के बेटे ने गुस्से से अपना स्कुल बैग फेकतै हुए कहा तो मैं बुरी तरह से चौंक गई !

यह क्या कह रहा है? अपनी दादी को बुढिया क्यों कह रहा है? कहाँ से सीख रहा है इतनी बदतमीजी?

मैं सोच ही रही थी कि बगल के कमरे से उसके चाचा बाहर निकले और पुछा-"क्या हुआ बेटा?"

उसने फिर कहा -"चाहे कुछ भी हो जाए मैं उस बुढिया के साथ स्कुल नहीं जाउँगा हमेशा डाँटती रहती है और मेरे दोस्त भी मुझे चिढाते हैं !"

घर के सारे लोग उसकी बात पर चकित थे
घर मे बहुत सारे लोग थे मैं और मेरे पति, दो देवर और देवरानी , एक ननद , ससुर और नौकर भी !

फिर भी मेरे बेटे को स्कुल छोडने और लाने की जिम्मेदारी उसकी दादी की ही थी पैरों मे दर्द रहता था पर पोते के प्रेम मे कभी शिकायता नही करती थी बहुत प्यार करती थी उसको क्योंकि घर का पहला पोता था।

पर अचानक बेटे के मुँह से उनके लिए ऐसे शब्द सुन कर सबको बहुत आश्चर्य हो रहा था शाम को खाने पर उसे बहुत समझाया गया पर वह अपनी जिद पर अडा रहा
पति ने तो गुस्से मे उसे थप्पड़ भी मार दिया तब सबने तय किया कि कल से उसे स्कुल छोडने और लेने माँजी नही जाएँगी !!!

अगले दिन से कोई और उसे लाने ले जाने लगा पर मेरा मन विचलित रहने लगा कि आखिर उसने ऐसा क्यों किया?
मै उससे कुछ नाराज भी थी !

शाम का समय था मैने दुध गर्म किया और बेटे को देने के लिए उसने ढुँढने लगी मैं छत पर पहुँची तो बेटे के मुँह से मेरे बारे मे बात करते सुन कर मेरे पैर ठिठक गये...
मैं छुपकर उसकी बात सुनने लगी वह अपनी दादी के गोद मे सर रख कर कह रहा था-

"मैं जानता हूँ दादी कि मम्मी मुझसे नाराज है पर मैं क्या करता?
इतनी ज्यादा गरमी मे भी वो आपको मुझे लेने भेज देते थे ! आपके पैरों मे दर्द भी तो रहता है मैने मम्मी से कहा तो उन्होंने कहा कि दादी अपनी मरजी से जाती हैं !
दादी मैंने झुठ बोला......बहुत गलत किया पर आपको परेशानी से बचाने के लिये मुझे यही सुझा...

आप मम्मी को बोल दो मुझे माफ कर दे "

वह कहता जा रहा था और मेरे पैर तथा मन सुन्न पड़ गये थे मुझे अपने बेटे के झुठ बोलने के पीछे के बड़प्पन को महसुस कर गर्व हो रहा था....
मैने दौड कर उसे गले लगा लिया और बोली-"नहीं , बेटे तुमने कुछ गलत नही किया

हम सभी पढे लिखे नासमझो को समझाने का यही तरीका था..शाबाश... बेटा !!!

Subscribe Us On YouTube:-
👇👇👇
https://bit.ly/2KISkiz

👉 आत्म निर्माण-जीवन का प्रथम सोपान (भाग 2)

स्वच्छता और व्यवस्था ऐसा गुण है जिसमें किसी की कुरुचि का सहज ही परिचय प्राप्त किया जा सकता है। गन्दगी से घृणा और स्वच्छता से प्रेम रखा जाय तो वह उत्साह सहज ही बना रहेगा जिसके आधार पर शरीर, वस्त्र, फर्नीचर, पुस्तकें, स्टेशनरी, बर्तन, फर्श, चित्र, साइकिल आदि सम्बन्धित सामान को स्वच्छ एवं सुव्यवस्थित रखा जा सके। सफाई की यह आदत हिसाब-किताब पर, लेन-देन पर भी लागू होती है। घर, दफ्तर को, बच्चों को, वस्तुओं को साफ-सुथरा रखकर न केवल आगन्तुकों को अपनी सुरुचि का परिचय देते हैं वरन् अपने स्वभाव में अनोखी विशेषता उत्पन्न करते है।

जिसे ईमानदारी का जीवन जीना हो उसे पूर्व तैयारी मितव्ययी रहने की, सादा जीवन जीने की करनी चाहिए। जो कम में गुजारा करना जानता है उसी के लिए यह सम्भव है कि कम आमदनी से सन्तोष पूर्वक निर्वाह कर ले। ईमानदारी से आय सीमित रहती है, उतनी नहीं हो सकती जितनी बेईमानी अपनाने से। ऐसी दशा में यदि श्रेष्ठ जीवन जीना हो तो अपने खर्च जहाँ तक सम्भव हो वहाँ तक घटाने चाहिए। जिसने खर्च बढ़ा रखे हैं उन्हें उनकी पूर्ति के लिए बेईमानी का रास्ता ही अपनाना पड़ेगा। फिजूलखर्ची यों निर्दोष भी मालूम पड़ सकती है। अपना कमाना अपना उड़ाना इसमें किसी को क्या ऐतराज होना चाहिए। परन्तु बात इतनी सरल नहीं है। प्रकारान्तर से फिजूलखर्ची बेईमानी अपनाने के लिए बाध्य करती है।

अनियन्त्रित खर्च करने की आदत बढ़ती ही जाती है और वह देखते-देखते उस सीमा को छूती है जहाँ न्यायोचित आमदनी कम पड़े और घटोत्तरी की पूर्ति के लिए बेईमानी पर उतारू होना पड़े। जिसने आमदनी और खर्च का तालमेल बिठाना सीखा है वही कुछ सत्कर्मों के लिए भी बचा सकता है। अन्यथा सदुद्देश्य की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य भी आर्थिक तंगी के कारण रुके पड़े रहेंगे। सादगी की जीवनचर्या सस्ती पड़ती है, कम समय लेती है। अस्तु मितव्ययी व्यक्ति के लिए ही यह सम्भव होगा कि वह आदर्शवादी जीवन जी सके और परमार्थ की दिशा में कुछ कहने लायक योगदान दे सके।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)


Subscribe Us On YouTube:-
👇👇👇
https://bit.ly/2KISkiz

👉 आज का सद्चिंतन 28 Jan 2019

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 Jan 2019

शुक्रवार, 25 जनवरी 2019

👉 आत्म निर्माण-जीवन का प्रथम सोपान (भाग 1)

निर्माण आन्दोलन का प्रथम चरण आत्म-निर्माण है। उस दिशा में कदम बढ़ाने के लिए किसी भी स्थिति के व्यक्ति को कुछ भी कठिनाई अनुभव नहीं होनी चाहिए। पर्दे में जकड़ी स्त्रियाँ, जेल में बन्द कैदी, चारपाई पर पड़े रोगी और अपंग असमर्थ व्यक्ति भी आज जिस स्थिति में हैं उससे ऊँचे उठने, आगे बढ़ने में उन्हें कुछ भी कठिनाई अनुभव नहीं होनी चाहिए। मनोविकारों को ढूँढ़ निकालने और उनके विरुद्ध मोर्चा खड़ा कर देने में सांसारिक कोई विध्न बाधा अवरोध उत्पन्न नहीं कर सकती। दैनिक जीवन में निरन्तर काम आने वाली आदतों को परिष्कृत बनाने का प्रयास भी ऐसा है, जिनके न बन पड़ने का कोई कारण नहीं। आलस्य में समय न गँवाना, हर काम नियत समय पर नियमित रूप से उत्साह और मनोयोग पूर्वक करने की आदत डाली जाय तो प्रतीत होगा अपना क्रिया कलाप कितना उत्तम, कितना व्यवस्थित, कितना अधिक सम्पन्न हो रहा है।

प्रातःकाल अपनी दिनचर्या का निर्धारण कर लेना और पूरी मुस्तैदी से उसे पूरा करना, आलस्य प्रमाद को आड़े हाथों लेना, व्यक्तित्व निर्माण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। जल्दी सोने जल्दी उठने की एक छोटी सी ही आदत को लें तो प्रतीत होगा कि प्रातःकाल का कितना बहुमूल्य समय मुफ्त ही हाथ लग जाता है और उसका जिस भी कार्य में उपयोग किया जाय उसमें सफलता का कैसा स्वर्ण अवसर मिलता है। क्या व्यायाम, क्या अध्ययन, क्या भजन, कुछ भी कार्य प्रातःकाल किया जाय चौगुना प्रतिफल उत्पन्न करेगा। जो लोग देर में सोते और देर में उठते हैं वे यह नहीं जानते कि प्रातःकाल का ब्रह्म मुहूर्त इतना बहुमूल्य है जिसे हीरे मोतियों से भी नहीं तोला जा सकता, नियमित दिनचर्या का निर्धारण और उस पर हर दिन पूरी मुस्तैदी के साथ आचरण, देखने में यह बहुत छोटी बात मालूम पड़ती है पर यदि उसका परिणाम देखा जाय तो प्रतीत होगा कि हमने एक चौथाई जिन्दगी को बर्बादी से बचाकर कहने लायक उपलब्धियों में नियोजित कर लिया।

अस्त-व्यस्त और अनियमित व्यक्ति यों साधारण ढील पोल के दोषी ठहराए जाते हैं, पर बारीकी से देखने पर स्पष्ट हो जाता है कि वे लगभग आधी जिन्दगी जितना बहुमूल्य समय नष्ट कर देते है जिसका यदि क्रमबद्ध उपयोग हो सका होता तो प्रगति की कितनी ही कहने लायक उपलब्धियाँ सामने आती। यदि एक घण्टा रोज कोई व्यक्ति उपयोगी अध्ययन में लगाता रहे तो कुछ ही समय में वह ऐसा ज्ञानवान बन सकता है जिसकी विद्या बुद्धि पर स्पर्धा की जा सके।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

Subscribe Us On YouTube:-
👇👇👇
https://bit.ly/2KISkiz

👉 श्रद्धा के फूल

एक बार किसी गांव में महात्मा बुध्द का आगमन हुआ। सब इस होड़ में लग गये कि क्या भेंट करें। इधर गाँव में एक गरीब मोची था। उसने देखा कि मेरे घर के बाहर के तालाब में बेमौसम का एक कमल खिला है।

उसकी इच्छा हुई कि, आज नगर में महात्मा आए हैं, सब लोग तो उधर ही गए हैं, आज हमारा काम चलेगा नहीं, आज यह फूल बेचकर ही गुजारा कर लें। वह तालाब के अंदर कीचड़ में घुस गया। कमल के फूल को लेकर आया। केले के पत्ते का दोना बनाया..और उसके अंदर कमल का फूल रख दिया।

पानी की कुछ बूंदें कमल पर पड़ी हुई हैं ..और वह बहुत सुंदर दिखाई दे रहा है।

इतनी देर में एक सेठ पास आया और आते ही कहा-''क्यों फूल बेचने की इच्छा है ?'' आज हम आपको इसके दो चांदी के रूपए दे सकते हैं।

अब उसने सोचा ...कि एक-दो आने का फूल! इस के दो रुपए दिए जा रहे हैं। वह आश्चर्य में पड़ गया।

इतनी देर में नगर-सेठ आया । उसने कहा ''भई, फूल बहुत अच्छा है, यह फूल हमें दे दो'' हम इसके दस चांदी के सिक्के दे सकते हैं।

मोची ने सोचा, इतना कीमती है यह फूल। नगर सेठ ने मोची को सोच मे पड़े देख कर कहा कि अगर पैसे कम हों, तो ज्यादा दिए जा सकते हैं।

मोची ने सोचा-क्या बहुत कीमती है ये फूल?

नगर सेठ ने कहा-मेरी इच्छा है कि मैं महात्मा के चरणों में यह फूल रखूं। इसलिए इसकी कीमत लगाने लगा हूं।

इतनी देर में उस राज्य का मंत्री अपने वाहन पर बैठा हुआ पास आ गया और कहता है- क्या बात है? कैसी भीड़ लगी हुई है?
अब लोग कुछ बताते इससे पहले ही उसका ध्यान उस फूल की तरफ गया। उसने पूछा- यह फूल बेचोगे?

हम इस के सौ सिक्के दे सकते हैं। क्योंकि महात्मा आए हुए हैं। ये सिक्के तो कोई कीमत नहीं रखते।

जब हम यह फूल लेकर जाएंगे तो सारे गांव में चर्चा तो होगी कि महात्मा ने केवल मंत्री का भेंट किया हुआ ही फूल स्वीकार किया। हमारी बहुत ज्यादा चर्चा होगी।

इसलिए हमारी इच्छा है कि यह फूल हम भेंट करें और कहते हैं कि थोड़ी देर के बाद राजा ने भीड़ को देखा, देखने के बाद वजीर ने पूछा कि बात क्या है? वजीर ने बताया कि फूल का सौदा चल रहा है।

राजा ने देखते ही कहा-इसको हमारी तरफ से एक हजार चांदी के सिक्के भेंट करना। यह फूल हम लेना चाहते हैं।

गरीब मोची ने कहा-लोगे तो तभी जब हम बेचेंगे। हम बेचना ही नहीं चाहते। अब राजा कहता है कि...बेचोगे क्यों नहीं?

उसने कहा कि जब महात्मा के चरणों में सब कुछ-न-कुछ भेंट करने के लिए पहुंच रहे हैं..तो ये फूल इस गरीब की तरफ से आज उनके चरणों में भेंट होगा।
राजा बोला-देख लो, एक हजार चांदी के सिक्कों से तुम्हारी पीढ़ियां तर सकती हैं।

गरीब मोची कहा-मैंने तो आज तक राजाओं की सम्पत्ति से किसी को तरते नहीं देखा लेकिन महान पुरुषों के आशीर्वाद से तो लोगों को जरूर तरते देखा है।

राजा मुस्कुराया और कह उठा-तेरी बात में दम है। तेरी मर्जी, तू ही भेंट कर ले।

अब राजा तो उस उद्यान में चला गया जहां महात्मा ठहरे हुए थे...और बहुत जल्दी चर्चा महात्मा के कानों तक भी पहुंच गई, कि आज कोई आदमी फूल लेकर आ रहा है..

जिसकी कीमत बहुत लगी है। वह गरीब आदमी है इसलिए फूल बेचने निकला था कि उसका गुजारा होता। जैसे ही वह गरीब मोची फूल लेकर पहुंचा, तो शिष्यों ने महात्मा से कहा कि वह व्यक्ति आ गया है।

लोग एकदम सामने से हट गए। महात्मा ने उसकी तरफ देखा। मोची फूल लेकर जैसे पहुंचा तो उसकी आंखों में से आंसू बरसने लगे। कुछ बूंदे तो पानी की कमल पर पहले से ही थी...कुछ उसके आंसुओं के रूप में ठिठक गई पर कमल पर।

रोते हुए इसने कहा-सब ने बहुत-बहुत कीमती चीजेें आपके चरणों में भेंट की होंगी, लेकिन इस गरीब के पास यह कमल का फूल और जन्म-जन्मान्तरों के पाप जो पाप मैंने किए हैं उनके आंसू आंखों में भरे पड़े हैं। उनको आज आपके चरणों में चढ़ाने आया हूं। मेरा ये फूल और मेरे आंसू भी स्वीकार करो।

महात्मा के चरणों में फूल रख दिया। गरीब मोची घुटनों के बल बैठ गया।

महात्मा बुध्द ने अपने शिष्य आनन्द को बुलाया और कहा, देख रहे हो आनन्द! हजारों साल में  भी कोई राजा इतना नहीं कमा पाया जितना इस गरीब इन्सान ने आज एक पल में ही कमा लिया।

इसका समर्पण श्रेष्ठ हो गया। इसने अपने मन का भाव दे दिया।

एकमात्र ये मन का भाव ही है जिससे हम गुरु की कृपा प्राप्त कर सकते हैं।
त्रिलोकी का सामान भी कोई अहमियत नहीं रखता।


Subscribe Us On YouTube:-
👇👇👇
https://bit.ly/2KISkiz

👉 आत्मचिंतन के क्षण 25 Jan 2019

◾ मैं चाहता हूँ कि मेरे सब बच्चे, मैं जितना उन्नत बन सकता था, उससे सौगुना उन्नत बनें। तुम लोगों में से प्रत्येक को महान शक्तिशाली बनना होगा- मैं कहता हूँ, अवश्य बनना होगा। आज्ञा-पालन, ध्येय के प्रति अनुराग तथा ध्येय को कार्यरूप में परिणत करने के लिए सदा प्रस्तुत रहना -- इन तीनों के रहने पर कोई भी तुम्हे अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सकता।

◾ नीतिपरायण तथा साहसी बनो, अन्त: करण पूर्णतया शुध्द रहना चाहिए। पूर्ण नीतिपरायण तथा साहसी बनो -- प्रणों के लिए भी कभी न डरो। कायर लोग ही पापाचरण करते हैं, वीर पुरूष कभी भी पापानुष्ठान नहीं करते -- यहाँ तक कि कभी वे मन में भी पाप का विचार नहीं लाते। प्राणिमात्र से प्रेम करने का प्रयास करो। बच्चो, तुम्हारे लिए नीतिपरायणता तथा साहस को छोडकर और कोई दूसरा धर्म नहीं। इसके सिवाय और कोई धार्मिक मत-मतान्तर तुम्हारे लिए नहीं है। कायरता, पाप्, असदाचरण तथा दुर्बलता तुममें एकदम नहीं रहनी चाहिए, बाक़ी आवश्यकीय वस्तुएँ अपने आप आकर उपस्थित होंगी।

◾ पूर्णतः निःस्वार्थ रहो, स्थिर रहो, और काम करो। एक बात और है। सबके सेवक बनो और दूसरों पर शासन करने का तनिक भी यत्न न करो, क्योंकि इससे ईर्ष्या उत्पन्न होगी और इससे हर चीज़ बर्बाद हो जायेगी। आगे बढो तुमने बहुत अच्छा काम किया है। हम अपने भीतर से ही सहायता लेंगे अन्य सहायता के लिए हम प्रतीक्षा नहीं करते। मेरे बच्चे, आत्मविशवास रखो, सच्चे और सहनशील बनो।

◾ किसी को उसकी योजनाओं में हतोत्साह नहीं करना चाहिए। आलोचना की प्रवृत्ति का पूर्णतः परित्याग कर दो। जब तक वे सही मार्ग पर अग्रेसर हो रहे हैं; तब तक उन्के कार्य में सहायता करो; और जब कभी तुमको उनके कार्य में कोई ग़लती नज़र आये, तो नम्रतापूर्वक ग़लती के प्रति उनको सजग कर दो। एक दूसरे की आलोचना ही सब दोषों की जड है। किसी भी संगठन को विनष्ट करने में इसका बहुत बडा हाथ है।

✍🏻 स्वामी विवेकानन्द

Subscribe Us On YouTube:-
👇👇👇
https://bit.ly/2KISkiz

👉 आज का सद्चिंतन 25 Jan 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 Jan 2019


गुरुवार, 24 जनवरी 2019

👉 संयम की साधना

बाल ब्रह्मचारी दयानंद ने दो सांडों को आपस में लड़ते देखा। वे हटाये हट नहीं रहे थे। स्वामी जी ने दोनोँ के सींग दो हाथों से पकड़े और मरोड़कर दो दिशाओं में फेंक दिया। डर कर वे दोनों भाग खड़े हुए। ऐसी ही एक घटना और है।

स्वामी दयानंद शाहपुरा में निवास कर रहे थे। जहाँ वे ठहरे थे, उस मकान के निकट ही एक नयी कोठी बन रही थी। एक दिन अकस्मात् निर्माणाधीन भवन की छत टूट पड़ी। कई पुरुष उस खंडहर में बुरी तरह फँस गए। निकलने कोई रास्ता नजर आता नहीं था। केवल चिल्लाकर अपने जीवित होने की सूचना भर बाहर वालों को दे रहे थे। मलबे की स्थिति ऐसी बेतरतीब और खतरनाक थी कि दर्शकों में से किसी की हिम्मत निकट जाने की हो जाय तो बचाने वालों का साथ ही भीतर घिरे लोग भी भारी-भरकम दीवारों में पिस जा सकते हैं। तभी स्वामी जी भीड़ देखकर कुतूहलवश उस स्थान पर आ पहुँचे, वस्तुस्थिति की जानकारी होते ही वे आगे बढ़े और अपने एकाकी भुजा बल से उस विशाल शिला को हटा दिया, जिसके नीचे लोग दब गये थे।

आसपास एकत्रित लोग शारीरिक शक्ति का परिचय पाकर उनकी जयकार करने लगे। उनने सबको शाँत करके समझाया कि यह शक्ति किसी अलौकिकता या चमत्कारिता के प्रदर्शन के लिए आप लोगों को नहीं दिखायी है। संयम की साधना करने वाला हर मनुष्य अपने में इससे भी विलक्षण शक्तियों का विकास कर सकता है।

📖 अखण्ड ज्योति मई 1994

Subscribe Us On YouTube:-
👇👇👇
https://bit.ly/2KISkiz

👉 अपने दोषों को भी देखा कीजिए! (अन्तिम भाग)

इसी प्रकार चिड़चिड़ेपन का प्रतिद्वन्द्वी मनोभाव धैर्य और सहिष्णुता को अपना लेने से भी मानसिक प्रहारों की रक्षा की जा सकती है। प्रत्येक अशुभ संस्कार से बचने का यही सीधा-सच्चा व सरल उपाय है।

दूसरों को उजड्ड दुर्बुद्धि या विद्वेषी बताने की अपेक्षा यह अच्छा है कि आप स्वयं अपने आपको ही मिलनसार बनायें। औरों में दोष देखने का श्रम न करें। साथ ही अपनी उदारता, दूर-दर्शिता, सहनशीलता जैसे सामाजिक सद्गुणों का विकास करते रहें। इस बुद्धिमत्तापूर्ण मार्ग पर चलने से ही यह सम्भव है कि दूसरे लोग आपका सम्मान करें, आपकी बात मानें, सहयोग और सहानुभूति का व्यवहार करें। प्रायः कोई व्यक्ति स्वेच्छा से बुरा नहीं बनता अतः मनुष्य को यह सोचने की भूल कदापि नहीं करनी चाहिए कि हमारे विचारों के अनुसार जो लोग गलती करते हैं वे हमें परेशान करने के उद्देश्य से ऐसा करते हैं।

इस प्रकार की कल्पनाओं से सावधान रहें ताकि किसी के साथ अन्याय न हो आप इसका कारण अपने स्वभाव की छोटी-छोटी त्रुटियाँ भी हो सकती हैं जिन्हें आप नगण्य मानते हैं। इसलिए दूसरों से सामंजस्य सौहार्द, सौजन्यता और आत्मीयता बनाये रखने के लिये यही उचित है कि जब कभी कोई अशुभ परिस्थिति उठती दिखाई दे तब अपने दोषों को भी देख लिया करें। ऐसा दृष्टिकोण अपनाने से आये दिन दूसरों के साथ होते रहने वाले झंझटों में से अधिकांश तो स्वयं ही निर्मूल हो सकते हैं।

.....समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1964 पृष्ठ 42
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/July/v1.42


Subscribe Us On YouTube:-
👇👇👇
https://bit.ly/2KISkiz

👉 आज का सद्चिंतन 24 Jan 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 Jan 2019


👉 लक्ष्य प्राप्ति के तीन आधार

नीति के मार्ग पर चलने वालों को अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ, मनोयोग एवं धैर्य तीनों की आवश्यकता पड़ती है। असफलताएँ नीति के अवलंबन के कारण नहीं प्रस्तुत होती हैं, बल्कि उनके मूल में इन तीनों का अभाव ही प्रधान कारण होता है। जिन्हें भौतिक संपन्नता ही अभीष्ट हो वे भी नीति पर चलते हुए श्रमशीलता, मनोयोग एवं धैर्य का आश्रय लेकर अपने उद्देश्य में सफल हो सकते हैं। भौतिक संपन्नता में ईमानदारी बाधक सिद्ध होती है, यह मान्यता उन लोगों की है जो पुरुषार्थ से जी चुराते हैं । ऐन-केन-प्रकारेण कम समय एवं कम श्रम में अधिक लाभ उठाने की प्रवृत्ति से ही अनीति को प्रोत्साहन मिलता है तथा लंबे समय तक सफलता के लिए इंतजार करते नहीं बनता।

फलतः थोड़ा तात्कालिक लाभ भले ही उठा लें - महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों से सदा वंचित ही बने रहते हैं। देखा जाए तो भौतिक संपन्नता के क्षेत्र में शिखर पर वही पहुँचते हैं जो नीति के, ईमानदारी के समर्थक रहे हैं, पुरुषार्थी रहे हैं। विश्व के मूर्धन्य भौतिक संपन्न व्यक्तियों के जीवन क्रम पर दृष्टिपात करने पर यह तथ्य और भी स्पष्ट हो जाता है । ईमानदारी, पुरुषार्थ, मनोयोग एवं असीम धैर्य के सहारे ही वे सामान्य स्तर से असामान्य स्थिति तक जा पहुँचे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
बड़े आदमी नहीं महामानव बनें, पृष्ठ 10


Subscribe Us On YouTube:-
👇👇👇
https://bit.ly/2KISkiz

👉 Three Supports for Achieving Goal

People intending to achieve the desired goal by walking on the path of honesty and high morals essentially need three qualities: efforts or hard work, right type of mental attitude and patience. Lack of these three virtues is the real cause of failure and not the dependence on morals. Even those, who have set their target on material wealth, can achieve the desired goal by walking on the path of honesty with three virtues of diligence,attitude and patience. The belief that honesty becomes an obstacle in achieving worldly success is wrong and usually propagated by the people who do not wish to put any efforts. The tendency to obtain maximum benefit with spending minimum time and efforts encourages dishonesty and corruption. Such people are not ready to wait long for success, so they apply short-cuts.

As a result, they may pick up some quick gains, but are always deprived of really meaningful and important achievements. It is generally observed that even the people reaching peak of the material wealth are those who follow the principles of honesty and hard-work. If we look at the lifestyles of benevolent and noble rich of the world,this fact becomes even more evident. From a very base level, they reached the highest peak of success through honesty, diligence, proper attitude and of course,unlimited patience.

Pt. Shriram Sharma Aacharya
Badein Aadmi Nahi, Mahamanav Baniyein (Not a Big-Shot, Be Super-Human), Page 10"

Subscribe Us On YouTube:-
👇👇👇
https://bit.ly/2KISkiz

👉 आत्मचिंतन के क्षण 24 Jan 2019

◾ संघर्ष का ही दूसरा नाम जीवन है। जहाँ सक्रियता समाप्त हुई वहाँ जीवन का अंत समीप समझिए। आलसी, अकर्मण्यों को जीवित अवस्था में भी मृत की संज्ञा दी जाती है। जिसने पुरुषार्थ के प्रति अनास्था व्यक्त की वह जीवन के प्रति आस्था ही खो बैठा। मनुष्य की सच्ची वीरता युद्ध के मैदान में दुश्मनों को पराजित करने में नहीं, बल्कि मनोशक्ति के द्वारा अपनी वासनाओं और तृष्णाओं का हनन करने में निहित है।

◾ एकान्तवासी होने से उदासी पनपती और बढ़ती है। इसलिए लोगों के साथ घुलने-मिलने की, हँसने-खेलने की, अपनी कहने और दूसरों की सुनने की आदत डालनी चाहिए। मिलनसार बनने और व्यस्त रहने के प्रयत्न करने चाहिए। अनावश्यक संकोचशीलता को सज्जनता या बड़प्पन का चिह्न मान बैठना गलत है। गंभीर होना अलग बात है और गीदड़ों की तरह डरकर कोने में छिपे बैठे रहना और संकोच के कारण मुँह खोलने का साहस न जुटा पाना दूसरी।

◾ आज किसी भी बात के लिए जमाने को जिम्मेदार ठहरा देने का एक रिवाज सा चल पड़ा है। जमाने को दोष दिया और छुट्टी पाई, किन्तु यह सोचने-समझने का जरा भी कष्ट नहीं किया जाता कि आखिर किसी जमाने का स्वरूप बनता तो उस समय के आदमियों से ही है। वास्तव में जमाना किसी को बुरा नहीं बनाता, बल्कि मनुष्य ही जमाने को बुरा बनाते हैं।

◾ यह धु्रव सत्य है कि चाहे कितना ही छिपाकर, अँधेरे में, दीवारों के घेरे के भीतर या चिकनी-चुपड़ी लपेटकर झूठ बोला जाय, झूठा व्यवहार किया जाय, किन्तु वह एक न एक दिन अवश्य प्रकट होकर रहता ही है और एक न एक दिन उसके दुष्प्रिणाम मनुष्य को स्वयं ही भोगने पड़ते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 22 जनवरी 2019

👉 पिता की सिख....

पिता और पुत्र साथ-साथ टहलने निकले,वे दूर खेतों की तरफ निकल आये, तभी पुत्र ने देखा कि रास्ते में, पुराने हो चुके एक जोड़ी जूते उतरे पड़े हैं, जो ...संभवतः पास के खेत में काम कर रहे गरीब मजदूर के थे.

पुत्र को मजाक सूझा. उसने पिता से कहा क्यों न आज की शाम को थोड़ी शरारत से यादगार बनायें, आखिर ... मस्ती ही तो आनन्द का सही स्रोत है. पिता ने असमंजस से बेटे की ओर देखा.

पुत्र बोला हम ये जूते कहीं छुपा कर झाड़ियों के पीछे छुप जाएं. जब वो मजदूर इन्हें यहाँ नहीं पाकर घबराएगा तो बड़ा मजा आएगा. उसकी तलब देखने लायक होगी, और इसका आनन्द मैं जीवन भर याद रखूंगा.

पिता, पुत्र की बात को सुन  गम्भीर हुये और बोले बेटा ! किसी गरीब और कमजोर के साथ उसकी जरूरत की वस्तु के साथ इस तरह का भद्दा मजाक कभी न करना. जिन चीजों की तुम्हारी नजरों में कोई कीमत नहीं,

वो उस गरीब के लिये बेशकीमती हैं. तुम्हें ये शाम यादगार ही बनानी है, तो आओ .. आज हम इन जूतों में कुछ सिक्के डाल दें और छुप कर देखें कि ... इसका मजदूर पर क्या प्रभाव पड़ता है.पिता ने ऐसा ही किया और दोनों पास की ऊँची झाड़ियों में छुप गए.

मजदूर जल्द ही अपना काम ख़त्म कर जूतों की जगह पर आ गया. उसने जैसे ही एक पैर जूते में डाले उसे किसी कठोर चीज का आभास हुआ, उसने जल्दी से जूते हाथ में लिए और देखा कि ...अन्दर कुछ सिक्के पड़े थे.

उसे बड़ा आश्चर्य हुआ और वो सिक्के हाथ में लेकर बड़े गौर से उन्हें देखने लगा. फिर वह इधर-उधर देखने लगा कि उसका मददगार शख्स कौन है? दूर-दूर तक कोई नज़र नहीं आया, तो उसने सिक्के अपनी जेब में डाल लिए. अब उसने दूसरा जूता उठाया,  उसमें भी सिक्के पड़े थे.

मजदूर भाव विभोर हो गया.

वो घुटनो के बल जमीन पर बैठ ...आसमान की तरफ देख फूट-फूट कर रोने लगा. वह हाथ जोड़ बोला
हे भगवान् ! आज आप ही किसी रूप में यहाँ आये थे, समय पर प्राप्त इस सहायता के लिए आपका और आपके  माध्यम से जिसने भी ये मदद दी,उसका लाख-लाख धन्यवाद.
आपकी सहायता और दयालुता के कारण आज मेरी बीमार पत्नी को दवा और भूखे बच्चों को रोटी मिल सकेगी.तुम बहुत दयालु हो प्रभु ! आपका कोटि-कोटि धन्यवाद.

मजदूर की बातें सुन ... बेटे की आँखें भर आयीं.
पिता ने पुत्र को सीने से लगाते हुयेे कहा ~क्या तुम्हारी मजाक मजे वाली बात से जो आनन्द तुम्हें जीवन भर याद रहता उसकी तुलना में इस गरीब के आँसू और दिए हुये आशीर्वाद तुम्हें जीवन पर्यंत जो आनन्द देंगे वो उससे कम है, क्या ?

पिताजी .. आज आपसे मुझे जो सीखने को मिला है, उसके आनंद को मैं अपने अंदर तक अनुभव कर रहा हूँ. अंदर में एक अजीब सा सुकून है.

आज के प्राप्त सुख और आनन्द को मैं जीवन भर नहीं भूलूँगा. आज मैं उन शब्दों का मतलब समझ गया जिन्हें मैं पहले कभी नहीं समझ पाया था. आज तक मैं मजा और मस्ती-मजाक को ही वास्तविक आनन्द समझता था, पर आज मैं समझ गया हूँ कि लेने की अपेक्षा देना कहीं अधिक आनंददायी है

Subscribe Us On YouTube:-
👇👇👇
https://bit.ly/2KISkiz

👉 अपने दोषों को भी देखा कीजिए! (भाग 5)

प्रिय दर्शन मनुष्य का श्रेष्ठ सद्गुण है। औरों में अच्छाइयाँ देखने से अपने सद्गुणों का विकास होता है। वह कहना कि दूसरे ही निरे दोषी हैं, अनुचित बात है। संसार में हर किसी में कोई न कोई सद्गुण अवश्य होता है। किसी में सफाई अधिक है, कोई ईमानदार है, कोई नेक-चलन, कोई अच्छा वक्ता है, कोई संगीतज्ञ है। आत्मीयता, उदारता, साहस, नैतिकता, श्रमशीलता जैसे सदाचारों में से कोई न कोई संपत्ति हर किसी के पास मिलेगी। इन्हें ढूँढ़ने का प्रयास करें, उनके सत्परिणामों पर ध्यान दें तो अपना भी जी करता है कि हम भी वैसा ही करें। आत्म विकास का क्रम यही है। दूसरों की अच्छाइयों का अनुकरण करना मनुष्य को आगे बढ़ाता और ऊँचा उठाता है। मानव से महामानव बनने की पद्धति यही है कि छिद्रान्वेषण के स्वभाव को त्याग कर प्रत्येक व्यक्ति में जो भी अच्छाइयाँ दिखाई दें उनकी प्रशंसा करें और स्वयं भी वैसा ही बनने का प्रयत्न करें।

जिस प्रकार हम दूसरे व्यक्तियों के सत्कर्मों से प्रेरणा लेते हैं, उसी प्रकार अपने दोष दुर्गुणों को ढूँढ़ने और निकाल कर बाहर कर देने से आत्म-शोषण की प्रक्रिया और भी तीव्र होती है। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी भिन्न-भिन्न कठिनाइयाँ होती हैं। हो सकता है कोई अमीर हो, कोई चिड़चिड़ा हो, कोई ईर्ष्यालु अथवा अर्थलोलुप हो। जब इन कठिनाइयों, विकारों की खोजबीन कर लें तो उन पर शान्तिपूर्वक नियन्त्रण का प्रयास करना चाहिये।

मान लीजिये किसी में चिड़चिड़ापन अधिक है, बात-बात में उत्तेजित हो जाता है। अपनी भूल समझता भी है पर यह मान बैठता है, कि यह दोष उसके स्वभाव का अंग है। यह उससे छूटना सम्भव नहीं। ऐसी निराशा सर्वथा अनुपयुक्त है। मनुष्य चाहे तो अपने स्वभाव को थोड़ा प्रयत्न करके आसानी से सुधार सकता है। हमें अपना स्वभाव और दृष्टिकोण संघर्षमय न बनाकर रचनात्मक बनाना चाहिए। सड़क पर चलते हैं तो कंकड़ चुभेंगे ही किन्तु पैरों में जूते पहन लेते हैं तो चलते रहने की क्रिया में अन्तर भी नहीं पड़ता और आत्म-रक्षा भी हो जाती है।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1964 पृष्ठ 41

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/July/v1.41

Subscribe Us On YouTube:-
👇👇👇
https://bit.ly/2KISkiz

👉 आज का सद्चिंतन 23 Jan 2019


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...