गुरुवार, 24 जनवरी 2019

👉 संयम की साधना

बाल ब्रह्मचारी दयानंद ने दो सांडों को आपस में लड़ते देखा। वे हटाये हट नहीं रहे थे। स्वामी जी ने दोनोँ के सींग दो हाथों से पकड़े और मरोड़कर दो दिशाओं में फेंक दिया। डर कर वे दोनों भाग खड़े हुए। ऐसी ही एक घटना और है।

स्वामी दयानंद शाहपुरा में निवास कर रहे थे। जहाँ वे ठहरे थे, उस मकान के निकट ही एक नयी कोठी बन रही थी। एक दिन अकस्मात् निर्माणाधीन भवन की छत टूट पड़ी। कई पुरुष उस खंडहर में बुरी तरह फँस गए। निकलने कोई रास्ता नजर आता नहीं था। केवल चिल्लाकर अपने जीवित होने की सूचना भर बाहर वालों को दे रहे थे। मलबे की स्थिति ऐसी बेतरतीब और खतरनाक थी कि दर्शकों में से किसी की हिम्मत निकट जाने की हो जाय तो बचाने वालों का साथ ही भीतर घिरे लोग भी भारी-भरकम दीवारों में पिस जा सकते हैं। तभी स्वामी जी भीड़ देखकर कुतूहलवश उस स्थान पर आ पहुँचे, वस्तुस्थिति की जानकारी होते ही वे आगे बढ़े और अपने एकाकी भुजा बल से उस विशाल शिला को हटा दिया, जिसके नीचे लोग दब गये थे।

आसपास एकत्रित लोग शारीरिक शक्ति का परिचय पाकर उनकी जयकार करने लगे। उनने सबको शाँत करके समझाया कि यह शक्ति किसी अलौकिकता या चमत्कारिता के प्रदर्शन के लिए आप लोगों को नहीं दिखायी है। संयम की साधना करने वाला हर मनुष्य अपने में इससे भी विलक्षण शक्तियों का विकास कर सकता है।

📖 अखण्ड ज्योति मई 1994

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👉 अपने दोषों को भी देखा कीजिए! (अन्तिम भाग)

इसी प्रकार चिड़चिड़ेपन का प्रतिद्वन्द्वी मनोभाव धैर्य और सहिष्णुता को अपना लेने से भी मानसिक प्रहारों की रक्षा की जा सकती है। प्रत्येक अशुभ संस्कार से बचने का यही सीधा-सच्चा व सरल उपाय है।

दूसरों को उजड्ड दुर्बुद्धि या विद्वेषी बताने की अपेक्षा यह अच्छा है कि आप स्वयं अपने आपको ही मिलनसार बनायें। औरों में दोष देखने का श्रम न करें। साथ ही अपनी उदारता, दूर-दर्शिता, सहनशीलता जैसे सामाजिक सद्गुणों का विकास करते रहें। इस बुद्धिमत्तापूर्ण मार्ग पर चलने से ही यह सम्भव है कि दूसरे लोग आपका सम्मान करें, आपकी बात मानें, सहयोग और सहानुभूति का व्यवहार करें। प्रायः कोई व्यक्ति स्वेच्छा से बुरा नहीं बनता अतः मनुष्य को यह सोचने की भूल कदापि नहीं करनी चाहिए कि हमारे विचारों के अनुसार जो लोग गलती करते हैं वे हमें परेशान करने के उद्देश्य से ऐसा करते हैं।

इस प्रकार की कल्पनाओं से सावधान रहें ताकि किसी के साथ अन्याय न हो आप इसका कारण अपने स्वभाव की छोटी-छोटी त्रुटियाँ भी हो सकती हैं जिन्हें आप नगण्य मानते हैं। इसलिए दूसरों से सामंजस्य सौहार्द, सौजन्यता और आत्मीयता बनाये रखने के लिये यही उचित है कि जब कभी कोई अशुभ परिस्थिति उठती दिखाई दे तब अपने दोषों को भी देख लिया करें। ऐसा दृष्टिकोण अपनाने से आये दिन दूसरों के साथ होते रहने वाले झंझटों में से अधिकांश तो स्वयं ही निर्मूल हो सकते हैं।

.....समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1964 पृष्ठ 42
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/July/v1.42


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👉 आज का सद्चिंतन 24 Jan 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 Jan 2019


👉 लक्ष्य प्राप्ति के तीन आधार

नीति के मार्ग पर चलने वालों को अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ, मनोयोग एवं धैर्य तीनों की आवश्यकता पड़ती है। असफलताएँ नीति के अवलंबन के कारण नहीं प्रस्तुत होती हैं, बल्कि उनके मूल में इन तीनों का अभाव ही प्रधान कारण होता है। जिन्हें भौतिक संपन्नता ही अभीष्ट हो वे भी नीति पर चलते हुए श्रमशीलता, मनोयोग एवं धैर्य का आश्रय लेकर अपने उद्देश्य में सफल हो सकते हैं। भौतिक संपन्नता में ईमानदारी बाधक सिद्ध होती है, यह मान्यता उन लोगों की है जो पुरुषार्थ से जी चुराते हैं । ऐन-केन-प्रकारेण कम समय एवं कम श्रम में अधिक लाभ उठाने की प्रवृत्ति से ही अनीति को प्रोत्साहन मिलता है तथा लंबे समय तक सफलता के लिए इंतजार करते नहीं बनता।

फलतः थोड़ा तात्कालिक लाभ भले ही उठा लें - महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों से सदा वंचित ही बने रहते हैं। देखा जाए तो भौतिक संपन्नता के क्षेत्र में शिखर पर वही पहुँचते हैं जो नीति के, ईमानदारी के समर्थक रहे हैं, पुरुषार्थी रहे हैं। विश्व के मूर्धन्य भौतिक संपन्न व्यक्तियों के जीवन क्रम पर दृष्टिपात करने पर यह तथ्य और भी स्पष्ट हो जाता है । ईमानदारी, पुरुषार्थ, मनोयोग एवं असीम धैर्य के सहारे ही वे सामान्य स्तर से असामान्य स्थिति तक जा पहुँचे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
बड़े आदमी नहीं महामानव बनें, पृष्ठ 10


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👉 Three Supports for Achieving Goal

People intending to achieve the desired goal by walking on the path of honesty and high morals essentially need three qualities: efforts or hard work, right type of mental attitude and patience. Lack of these three virtues is the real cause of failure and not the dependence on morals. Even those, who have set their target on material wealth, can achieve the desired goal by walking on the path of honesty with three virtues of diligence,attitude and patience. The belief that honesty becomes an obstacle in achieving worldly success is wrong and usually propagated by the people who do not wish to put any efforts. The tendency to obtain maximum benefit with spending minimum time and efforts encourages dishonesty and corruption. Such people are not ready to wait long for success, so they apply short-cuts.

As a result, they may pick up some quick gains, but are always deprived of really meaningful and important achievements. It is generally observed that even the people reaching peak of the material wealth are those who follow the principles of honesty and hard-work. If we look at the lifestyles of benevolent and noble rich of the world,this fact becomes even more evident. From a very base level, they reached the highest peak of success through honesty, diligence, proper attitude and of course,unlimited patience.

Pt. Shriram Sharma Aacharya
Badein Aadmi Nahi, Mahamanav Baniyein (Not a Big-Shot, Be Super-Human), Page 10"

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👉 आत्मचिंतन के क्षण 24 Jan 2019

◾ संघर्ष का ही दूसरा नाम जीवन है। जहाँ सक्रियता समाप्त हुई वहाँ जीवन का अंत समीप समझिए। आलसी, अकर्मण्यों को जीवित अवस्था में भी मृत की संज्ञा दी जाती है। जिसने पुरुषार्थ के प्रति अनास्था व्यक्त की वह जीवन के प्रति आस्था ही खो बैठा। मनुष्य की सच्ची वीरता युद्ध के मैदान में दुश्मनों को पराजित करने में नहीं, बल्कि मनोशक्ति के द्वारा अपनी वासनाओं और तृष्णाओं का हनन करने में निहित है।

◾ एकान्तवासी होने से उदासी पनपती और बढ़ती है। इसलिए लोगों के साथ घुलने-मिलने की, हँसने-खेलने की, अपनी कहने और दूसरों की सुनने की आदत डालनी चाहिए। मिलनसार बनने और व्यस्त रहने के प्रयत्न करने चाहिए। अनावश्यक संकोचशीलता को सज्जनता या बड़प्पन का चिह्न मान बैठना गलत है। गंभीर होना अलग बात है और गीदड़ों की तरह डरकर कोने में छिपे बैठे रहना और संकोच के कारण मुँह खोलने का साहस न जुटा पाना दूसरी।

◾ आज किसी भी बात के लिए जमाने को जिम्मेदार ठहरा देने का एक रिवाज सा चल पड़ा है। जमाने को दोष दिया और छुट्टी पाई, किन्तु यह सोचने-समझने का जरा भी कष्ट नहीं किया जाता कि आखिर किसी जमाने का स्वरूप बनता तो उस समय के आदमियों से ही है। वास्तव में जमाना किसी को बुरा नहीं बनाता, बल्कि मनुष्य ही जमाने को बुरा बनाते हैं।

◾ यह धु्रव सत्य है कि चाहे कितना ही छिपाकर, अँधेरे में, दीवारों के घेरे के भीतर या चिकनी-चुपड़ी लपेटकर झूठ बोला जाय, झूठा व्यवहार किया जाय, किन्तु वह एक न एक दिन अवश्य प्रकट होकर रहता ही है और एक न एक दिन उसके दुष्प्रिणाम मनुष्य को स्वयं ही भोगने पड़ते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 22 जनवरी 2019

👉 पिता की सिख....

पिता और पुत्र साथ-साथ टहलने निकले,वे दूर खेतों की तरफ निकल आये, तभी पुत्र ने देखा कि रास्ते में, पुराने हो चुके एक जोड़ी जूते उतरे पड़े हैं, जो ...संभवतः पास के खेत में काम कर रहे गरीब मजदूर के थे.

पुत्र को मजाक सूझा. उसने पिता से कहा क्यों न आज की शाम को थोड़ी शरारत से यादगार बनायें, आखिर ... मस्ती ही तो आनन्द का सही स्रोत है. पिता ने असमंजस से बेटे की ओर देखा.

पुत्र बोला हम ये जूते कहीं छुपा कर झाड़ियों के पीछे छुप जाएं. जब वो मजदूर इन्हें यहाँ नहीं पाकर घबराएगा तो बड़ा मजा आएगा. उसकी तलब देखने लायक होगी, और इसका आनन्द मैं जीवन भर याद रखूंगा.

पिता, पुत्र की बात को सुन  गम्भीर हुये और बोले बेटा ! किसी गरीब और कमजोर के साथ उसकी जरूरत की वस्तु के साथ इस तरह का भद्दा मजाक कभी न करना. जिन चीजों की तुम्हारी नजरों में कोई कीमत नहीं,

वो उस गरीब के लिये बेशकीमती हैं. तुम्हें ये शाम यादगार ही बनानी है, तो आओ .. आज हम इन जूतों में कुछ सिक्के डाल दें और छुप कर देखें कि ... इसका मजदूर पर क्या प्रभाव पड़ता है.पिता ने ऐसा ही किया और दोनों पास की ऊँची झाड़ियों में छुप गए.

मजदूर जल्द ही अपना काम ख़त्म कर जूतों की जगह पर आ गया. उसने जैसे ही एक पैर जूते में डाले उसे किसी कठोर चीज का आभास हुआ, उसने जल्दी से जूते हाथ में लिए और देखा कि ...अन्दर कुछ सिक्के पड़े थे.

उसे बड़ा आश्चर्य हुआ और वो सिक्के हाथ में लेकर बड़े गौर से उन्हें देखने लगा. फिर वह इधर-उधर देखने लगा कि उसका मददगार शख्स कौन है? दूर-दूर तक कोई नज़र नहीं आया, तो उसने सिक्के अपनी जेब में डाल लिए. अब उसने दूसरा जूता उठाया,  उसमें भी सिक्के पड़े थे.

मजदूर भाव विभोर हो गया.

वो घुटनो के बल जमीन पर बैठ ...आसमान की तरफ देख फूट-फूट कर रोने लगा. वह हाथ जोड़ बोला
हे भगवान् ! आज आप ही किसी रूप में यहाँ आये थे, समय पर प्राप्त इस सहायता के लिए आपका और आपके  माध्यम से जिसने भी ये मदद दी,उसका लाख-लाख धन्यवाद.
आपकी सहायता और दयालुता के कारण आज मेरी बीमार पत्नी को दवा और भूखे बच्चों को रोटी मिल सकेगी.तुम बहुत दयालु हो प्रभु ! आपका कोटि-कोटि धन्यवाद.

मजदूर की बातें सुन ... बेटे की आँखें भर आयीं.
पिता ने पुत्र को सीने से लगाते हुयेे कहा ~क्या तुम्हारी मजाक मजे वाली बात से जो आनन्द तुम्हें जीवन भर याद रहता उसकी तुलना में इस गरीब के आँसू और दिए हुये आशीर्वाद तुम्हें जीवन पर्यंत जो आनन्द देंगे वो उससे कम है, क्या ?

पिताजी .. आज आपसे मुझे जो सीखने को मिला है, उसके आनंद को मैं अपने अंदर तक अनुभव कर रहा हूँ. अंदर में एक अजीब सा सुकून है.

आज के प्राप्त सुख और आनन्द को मैं जीवन भर नहीं भूलूँगा. आज मैं उन शब्दों का मतलब समझ गया जिन्हें मैं पहले कभी नहीं समझ पाया था. आज तक मैं मजा और मस्ती-मजाक को ही वास्तविक आनन्द समझता था, पर आज मैं समझ गया हूँ कि लेने की अपेक्षा देना कहीं अधिक आनंददायी है

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👉 अपने दोषों को भी देखा कीजिए! (भाग 5)

प्रिय दर्शन मनुष्य का श्रेष्ठ सद्गुण है। औरों में अच्छाइयाँ देखने से अपने सद्गुणों का विकास होता है। वह कहना कि दूसरे ही निरे दोषी हैं, अनुचित बात है। संसार में हर किसी में कोई न कोई सद्गुण अवश्य होता है। किसी में सफाई अधिक है, कोई ईमानदार है, कोई नेक-चलन, कोई अच्छा वक्ता है, कोई संगीतज्ञ है। आत्मीयता, उदारता, साहस, नैतिकता, श्रमशीलता जैसे सदाचारों में से कोई न कोई संपत्ति हर किसी के पास मिलेगी। इन्हें ढूँढ़ने का प्रयास करें, उनके सत्परिणामों पर ध्यान दें तो अपना भी जी करता है कि हम भी वैसा ही करें। आत्म विकास का क्रम यही है। दूसरों की अच्छाइयों का अनुकरण करना मनुष्य को आगे बढ़ाता और ऊँचा उठाता है। मानव से महामानव बनने की पद्धति यही है कि छिद्रान्वेषण के स्वभाव को त्याग कर प्रत्येक व्यक्ति में जो भी अच्छाइयाँ दिखाई दें उनकी प्रशंसा करें और स्वयं भी वैसा ही बनने का प्रयत्न करें।

जिस प्रकार हम दूसरे व्यक्तियों के सत्कर्मों से प्रेरणा लेते हैं, उसी प्रकार अपने दोष दुर्गुणों को ढूँढ़ने और निकाल कर बाहर कर देने से आत्म-शोषण की प्रक्रिया और भी तीव्र होती है। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी भिन्न-भिन्न कठिनाइयाँ होती हैं। हो सकता है कोई अमीर हो, कोई चिड़चिड़ा हो, कोई ईर्ष्यालु अथवा अर्थलोलुप हो। जब इन कठिनाइयों, विकारों की खोजबीन कर लें तो उन पर शान्तिपूर्वक नियन्त्रण का प्रयास करना चाहिये।

मान लीजिये किसी में चिड़चिड़ापन अधिक है, बात-बात में उत्तेजित हो जाता है। अपनी भूल समझता भी है पर यह मान बैठता है, कि यह दोष उसके स्वभाव का अंग है। यह उससे छूटना सम्भव नहीं। ऐसी निराशा सर्वथा अनुपयुक्त है। मनुष्य चाहे तो अपने स्वभाव को थोड़ा प्रयत्न करके आसानी से सुधार सकता है। हमें अपना स्वभाव और दृष्टिकोण संघर्षमय न बनाकर रचनात्मक बनाना चाहिए। सड़क पर चलते हैं तो कंकड़ चुभेंगे ही किन्तु पैरों में जूते पहन लेते हैं तो चलते रहने की क्रिया में अन्तर भी नहीं पड़ता और आत्म-रक्षा भी हो जाती है।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1964 पृष्ठ 41

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/July/v1.41

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👉 आज का सद्चिंतन 23 Jan 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 Jan 2019


👉 क्रोध मत करो, क्षमा करो

आग उसे जलाती है, जो उसके पास जाता है, पर क्रोध तो स्वयं जलाता है। यदि तुम जमीन पर हाथ पाठक, तो पहले तुम्हें ही चोट लगेगी। क्रोधी दूसरों का नुकसान पीछे करता है, पहले अपने को आहत कर लेता है। यदि तुम में बल हो और विरोधी से बदला लेने की योग्यता हो, तो भी उसे माफ करो, क्योंकि क्रोध करना तो बहुत ही बुरा है। यदि तुम क्रोध का परित्याग कर दो और जो कुछ कहना चाहते हो, शांतिपूर्वक कहो, तो उन समस्याओं का आधा हल तो अपने आप हो जाएगा, जिनके लिए तुम बेचैन हो।

इसमें क्या बड़प्पन है कि तुम बुराई करने वाले से बदला ले लो। ऐसा तो चींटी भी कर सकती है। बड़ा वह है जो अपने शत्रुओं को क्षमता कर देता है। धरी को देखो, तुम उसे खोदते हो और वह बदले में अन्न उपजाती है। गन्ने को दबाते हैं, तो उसमें से मीठा रस टपकता है।

जिसने तुम्हें हानि पहुँचाई, वह बेचारा कमजोर है, कायर है, क्योंकि निर्बल आत्मा वाले ही दूसरों को हानि पहुँचाते हैं। माफ कर दो इन गरीबों को, अंधों पर तलवार चलाना कोई बहादुरी थोड़े ही है। बदला लेने पर तुम्हें कुछ घंटे खुशी रह सकती है, पर क्षमा कर देने पर जो आनंद प्राप्त होगा, वह बहुत काल तक कायम रहेगा।

📖 अखण्ड ज्योति -जनवरी 1943

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👉 Embrace Forgiveness

Fire burns everything that comes into its contact. But the heat of anger of a person burns only himself. It you hit the earth by your hand; it’s only your hand that will suffer the pains. Your annoyance or irritation upon someone might disturb or hurt him, but it will certainly and firstly do more harm to you. Even if you feel justified in taking revenge against someone’s misdeeds and even if you are mightier and capable of retaliating, you should better forgive. Because, your anger and arrogance would be worse (for you also) than whatever wrong one might have done (to you). As you might have experienced on several occasions, if one controls the wrath and maintains mental stability, most disputes or problems could be resolved peacefully and give you the content of mind, which you are dying for.

So what if you take revenge against someone’s wrong against you? Every animal has this beastly instinct. Even a tiny ant can do that. Greater is the one who can forgive his enemies. Why don’t you learn, something form the earth? You dig it, plough it, but in return, it blesses you with crops, water, minerals and what not! Look at the piece of sugarcane! You cut it, press it, chew it, but it reacts by filling your mouth with sweet juice.

Those who have harmed you or committed crime against you are coward, weak, ignorant, because only those having a dormant conscience can do so. Why should you belittle yourself by responding back at their level? It does not suit an intrepid warrior to use weapons against the blinds or the slept ones.

Your act of revenge might sometimes, give temporary ‘satisfaction’ to your ego, but the joy induced by your act of forgiving would last for long…

📖 Akhand Jyoti, Jan. 1943

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👉 आत्मचिंतन के क्षण 23 Jan 2019

◾  मन और मुँह को एक करके भावों को जीवन में कार्यान्वित करना होगा। इसीको श्री रामकृष्ण कहा करते थे, "भाव के घर में किसी प्रकार की चोरी न होने पाये।" सब विषओं में व्यवहारिक बनना होगा। लोगों या समाज की बातों पर ध्यान न देकर वे एकाग्र मन से अपना कार्य करते रहेंगे क्या तुने नहीं सुना, कबीरदास के दोहे में है- "हाथी चले बाजार में, कुत्ता भोंके हजार साधुन को दुर्भाव नहिं, जो निन्दे संसार" ऐसे ही चलना है। दुनिया के लोगों की बातों पर ध्यान नहीं देना होगा। उनकी भली बुरी बातों को सुनने से जीवन भर कोई किसी प्रकार का महत् कार्य नहीं कर सकता।

◾  संन्यास का अर्थ है, मृत्यु के प्रति प्रेम। सांसारिक लोग जीवन से प्रेम करते हैं, परन्तु संन्यासी के लिए प्रेम करने को मृत्यु है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम आत्महत्या कर लें। आत्महत्या करने वालों को तो कभी मृत्यु प्यारी नहीं होती है। संन्यासी का धर्म है समस्त संसार के हित के लिए निरंतर आत्मत्याग करते हुए धीरे-धीरे मृत्यु को प्राप्त हो जाना।

◾  बडे-बडे दिग्गज बह जायेंगे। छोटे-मोटे की तो बात ही क्या है! तुम लोग कमर कसकर कार्य में जुट जाओ, हुंकार मात्र से हम दुनिया को पलट देंगे। अभी तो केवल मात्र प्रारम्भ ही है। किसी के साथ विवाद न कर हिल-मिलकर अग्रसर हो -- यह दुनिया भयानक है, किसी पर विश्वास नहीं है। डरने का कोई कारण नहीं है, माँ मेरे साथ हैं -- इस बार ऐसे कार्य होंगे कि तुम चकित हो जाओगे। भय किस बात का? किसका भय? वज्र जैसा हृदय बनाकर कार्य में जुट जाओ।

◾  वीरता से आगे बढो। एक दिन या एक साल में सिध्दि की आशा न रखो। उच्चतम आदर्श पर दृढ रहो। स्थिर रहो। स्वार्थपरता और ईर्ष्या से बचो। आज्ञा-पालन करो। सत्य, मनुष्य -- जाति और अपने देश के पक्ष पर सदा के लिए अटल रहो, और तुम संसार को हिला दोगे। याद रखो -- व्यक्ति और उसका जीवन ही शक्ति का स्रोत है, इसके सिवाय अन्य कुछ भी नहीं।

✍🏻 स्वामी विवेकानन्द
 
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👉 अपने दोषों को भी देखा कीजिए! (भाग 4)

जल्दबाजी करने से भी गलती हो जाती है। इसलिये कोई समस्या आये उस पर पूर्णरूप से विचार कर लेने के बाद ही कोई कदम उठाना अच्छा होता है। आप ढूंढ़ें तो हर परेशानी का आधा कारण तो अपने में ही मिल सकता है। यहाँ यह नहीं कहा जा रहा कि गलती हर बार आप ही करते हैं, अनुचित रूप से किसी को अकारण दण्ड न मिले, इसलिए प्रत्येक अव्यवस्था में अपनी भूल ढूंढ़नी चाहिए। यह सम्भव है कि दूसरा व्यक्ति किसी भूल, भ्रम या परिस्थितिवश आपकी इच्छा पूरी न कर सका हो। ऐसी दशा में उस पर दुर्भाव का आरोपण कर बैठना अन्याय ही कहा जायगा। किसी के प्रति अन्यायपूर्ण धारण बना लेने से बुरी प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है। इसलिए किसी पर दोषारोपण करने के पूर्व शान्त चित्त से यह देखना चाहिये कि आपकी भूल या दूसरे की विवशता के कारण ही तो ऐसा अप्रिय प्रसंग नहीं बन पड़ा जो आपको क्षुब्ध बनाये हुए है।

जो लोग प्रत्येक कार्य में अपने को ही सर्वथा सही मानकर दूसरों को भ्रान्त मानते हैं वे भूल करते हैं। इससे सचाई दब जाती है और मनोमालिन्य तथा झंझट बढ़ने लगते हैं। संसार के सभी व्यक्ति भिन्न-भिन्न स्वभाव, रुचि व प्रकृति के होते हैं। दो सगे भाइयों तक की आदतों में बड़ा अन्तर देखा जा सकता है, फिर सभी आपकी प्रकृति मान्यता का अभिरुचि का अनुकरण करें ऐसा सम्भव नहीं। किसी को चावल खाना पसन्द है, किसी को रोटी प्रिय है। इतना अन्तर तो प्रायः रहता ही है। इस तथ्य को समझते हुए, दूसरों को दोषी ठहराने, न ठहराने की समस्या का समाधान करने में अपने को ही पिछली पंक्ति में खड़ा करना पड़ेगा।

समन्वय से काम चल जाय तो अच्छी बात है किन्तु कदाचित ऐसा नहीं होता तो भी अपनी रुचि भिन्नता को ध्यान में रखते हुए दूसरों की इच्छा सहन करनी चाहिए। दूसरों की इच्छा के लिए यदि अपनी अभिरुचि का दमन कर देते हैं तो प्रत्याशी पर आपकी इस सद्भावना का असर जरूर पड़ेगा। दूसरे क्षण वह आपकी इच्छाओं को प्राथमिकता देगा। घरेलू वातावरण में सद्भावना का वातावरण बनाये रखने के लिये यह अत्यावश्यक है कि प्रत्येक वस्तु का चुनाव करते समय आप यह मान लीजिए कि इसके दोषी आप भी हो सकते हैं तो आये दिन होने वाले झगड़ों में से बहुत से तो स्वतः ही मिट जायेंगे।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1964 पृष्ठ 41

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/July/v1.4

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👉 सुन्दर और असुन्दर

बुद्ध एक वृक्ष के नीचे विश्राम कर रहे हैं। रात है पूर्णिमा की। गांव से कुछ मनचले युवक एक वेश्या को लेकर पूर्णिमा की रात मनाने आ गए हैं।

उन्होंने वेश्या को नग्न कर लिया है, उसके वस्त्र छीन लिए हैं। वे सब शराब में मदहोश हो गए हैं, वे सब नाच-कूद रहे हैं। उनको बेहोश हुआ देखकर वेश्या भाग निकली।

थोड़ा होश आया, तो देखा, जिसके लिए नाचते थे, वह बीच में नहीं है। खोजने निकले। जंगल है, किससे पूछें? आधी रात है। फिर उस वृक्ष के पास आए, जहां बुद्ध बैठे हैं। तो उन्होंने कहा, यह भिक्षु यहां बैठा है, यही तो रास्ता है एक जाने का। अभी तक कोई दोराहा भी नहीं आया।

वह स्त्री जरूर यहीं से गुजरी होगी। तो उन्होंने बुद्ध को कहा कि सुनो भिक्षु, यहां से कोई एक नग्न सुंदर युवती भागती हुई निकली है? देखी है?

बुद्ध ने कहा, कोई निकला जरूर, लेकिन युवती थी या युवक, कहना मुश्किल है। क्योंकि व्याख्या करने की मेरी कोई इच्छा नहीं। कोई निकला है जरूर, सुंदर था या असुंदर, कहना मुश्किल है। क्योंकि जब अपनी चाह न रही, तो किसे सुंदर कहें, किसे असुंदर कहें!


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👉 “क्षण भंगुर जीवन का दुरुपयोग न हो”

कई जन्मों पूर्व बोधिसत्व का जन्म काशी नरेश ब्रह्मभद्र के यहाँ छोटे पुत्र के रूप में हुआ। वे राष्ट्राध्यक्ष बनना चाहते थे। कनिष्ठ पुत्र होने के नाते वैसा अवसर उन्हें मिलने वाला नहीं था। उन्होंने ताँत्रिक महासिद्ध प्रत्यंग से अपनी मनोकामना की पूर्ति का उपाय पूछा। महासिद्ध ने बताया कि आगामी मास में तक्षशिला का सिंहासन रिक्त होने वाला है यदि वे तुरन्त चल पड़ें तो अभीष्ट प्राप्ति में सफल हो सकते हैं। पूर्णिमा के दिन प्रभातकाल में राजद्वार पर खड़े व्यक्ति को ही सिंहासन मिलेगा, यह नियति की व्यवस्था है।

आकाँक्षा तीव्र होने के कारण वे चल पड़े। उनके पाँच घनिष्ठ मित्र भी साथ चलने पर तुल गए। चलते समय वे महासिद्ध प्रत्यंग का आशीष लेने पहुँचे सो उन्होंने सफलता का आशीर्वाद तो दिया, साथ ही यह भी बता दिया कि “मार्ग में यक्ष वन पड़ता है। उसमें रूपसी यक्षिणियों का ही अधिकार है। वे रूप, शब्द, गन्ध, रस, स्पर्श जैसे साधनों से ही राहगीरों को लुभाती, भोगती और अन्त में मारकर खा जाती है। इस विपत्ति से बचकर चलने में ही तुम्हारी भलाई है।”

बोधिसत्व साथियों सहित चल पड़े। जल्दी की आतुरतावश विराम पर कम और यात्रा पर अधिक ध्यान था। समय पर यक्ष वन आया। राजकुमार तो सतर्क थे, पर साथी उन कसौटियों पर खरे नहीं उतरे। एक ने पैर की मोच का बहाना लिया व एक रूपसी के यहाँ विराम हेतु रुक गया। दूसरे दिन दूसरा शब्द जाल में बँधा, तीसरे-चौथे-पाँचवें मित्र भी एक-एक करके इन क्षणिक आकर्षणों में मोहित हो बँधते चले गए। एक दिन छूंछ होकर प्राण गँवा बैठे।

धुन के धनी बोधिसत्व किसी प्रलोभन में रुके नहीं, आगे बढ़ते ही चले गए। यक्ष समुदाय के लिये यह प्रतिष्ठा का प्रश्न था कि कोई उनके जाल में फँसे बिना निकल जाये। एक चतुर यक्षिणी उनके पीछे लगा दी गयी। उपेक्षा करते हुए बोधिसत्व बढ़ते रहे, वह पीछे चलती रही। राहगीरों के पूछने पर वह बताती- “ये मेरे जीवन प्राण हैं। उपेक्षिता होने पर भी छाया की तरह साथ चलूँगी।” राहगीरों के समझाने पर राजकुमार वस्तुस्थिति बताते तो भी कोई उनका विश्वास न करता। यक्षिणी जब स्वयं को गर्भिणी, असहाय कहती विलाप करती तो उसका पक्ष और भी प्रबल हो जाता।

ज्यों-त्यों करके बोधिसत्व तक्षशिला समय पर पहुँच गए एवं मुहूर्त की प्रतीक्षा में एक कुँज में निवास करने लगे। किन्तु उस सुन्दरी की चर्चा सर्वत्र दावानल की तरह फैल गयी। ऐसा सौंदर्य किसी ने देखा न था। खबर राजमहल तक पहुँची। राजा ने देखा तो होशो-हवास गँवा बैठे। यक्षिणी को पटरानी बनाने का प्रस्ताव रखा एवं उसकी यह शर्त भी मान ली कि महल के भीतर रहने वाली सभी अन्तःवासियों पर उसका अधिकार होगा।

अब यक्षिणी ने बोधिसत्व को भुला दिया और नए अधिकार क्षेत्र में अभीष्ट लाभ उठाने में जुट गयी। उसने यक्ष वन में अपने सभी सहेलियों को बुलावा भेज दिया। सभी एक-एक करके महल के घरों में रहने वालों के साथ लग गईं व एक-एक करके सभी को छूंछ बनाती चलती गयी एवं अन्ततः उदरस्थ कर गईं। नियत मुहूर्त से एक दिन पहले ही राजमहल का घेरा अस्थि पिंजरों से भर गया। राजा-प्रजा में से कोई न बचा। बाहर स्थित नगरवासियों द्वारा जब किले का फाटक तोड़ने और भीतर की स्थिति देखने की तैयारी हुई तो वहाँ बोधिसत्व खड़े हुए थे। उन्होंने स्तम्भित प्रजा जनों को आदि से अन्त तक सारी कथा कह सुनाई।

नगर को यक्षिणी के त्रास से मुक्ति दिला सकने योग्य बोधिसत्व ही लगे सो उन्हें राज सिंहासन पर आरुढ़ कर दिया गया। प्रचण्ड पुरुषार्थ- मनोबल सम्पन्न राजा के कारण यक्षिणियों की मण्डली को भी पलायन करना पड़ा।

सिंहासनारूढ़ बोधिसत्व ने कुछ समय उपरान्त प्रबुद्ध प्रजाजनों की एक संसद बुलाई और कहा- “शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श की पाँच यक्षिणियों इन्द्रिय लिप्साओं के रूप में जहाँ भी आधिपत्य करेंगी, वहाँ के नागरिकों का सर्वनाश होकर रहेगा। जो भी इतना मनोबल जुटा ले कि इन दुष्प्रवृत्तियों से जूझ सके, वह जीवन संग्राम में निश्चित ही विजय पाता है।”

अखण्ड ज्योति 1984 अक्टूबर

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सोमवार, 21 जनवरी 2019

👉 अपने दोषों को भी देखा कीजिए! (भाग 3)

यह भी देखिये कि ऐसी ही अपेक्षा दूसरे भी आपसे रखते हैं। जिस प्रकार आपको प्रशंसा प्रिय है। वैसे ही दूसरों को भी। आप दूसरों से सहयोग और सहानुभूति चाहते हैं वैसे ही आपके मित्र-बन्धु पड़ौसी भी आपसे ऐसी ही अपेक्षा रखते हैं। स्वयं औरों से सेवा लेकर दूसरों को अँगूठा दिखाने का संकीर्ण दृष्टिकोण अपनाने से आप औरों की नजरों से गिर जायेंगे। यदि चाहते हैं आड़े वक्त आपकी कोई मदद करे तो औरों के दुःख में हाथ बंटाइये, और सहानुभूति प्रकट कीजिये। औरों के साथ उदारतापूर्वक व्यवहार करने से ही उनका हृदय जीत सकते हैं। सहयोग और सहानुभूति प्राप्त कर सकते हैं। इस संसार में सर्वत्र क्रिया की प्रतिक्रिया चलती है। “दो तो मिलेगा” की ही नीति सच्ची और व्यवहारिक है।

कई बार ऐसा होता है कि कोई बात आप भूल जाते हैं। कोई बात आपकी स्मरण शक्ति से उतर जाती है। इसका दण्ड आप अपने घर वालों, बच्चों और प्रियजनों को देने लगते हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि आप यह मान बैठते हैं कि मैंने बच्चे को अमुक वस्तु लाने के लिए कह दिया था, वस्तुतः आपने कहा नहीं था। कभी-कभी अस्पष्ट या अधूरे आदेशों को दूसरा ठीक प्रकार समझ नहीं पाता और आप यह समझ बैठते हैं कि हमारी अवज्ञा की गई है।

जिसे आदेश दिया था यह अपनी असमर्थता, प्रकट करता है तो इसे आप उसकी अवज्ञा मान कर दण्ड देते हैं, झिड़कते और भला-बुरा कहते हैं। भूल जाने की बात मानवीय है। आपकी ही तरह दूसरा भी मानसिक कमजोरी के कारण भूल कर सकता है। आप यहीं मान लें कि भूल हमसे या दूसरों से हो सकती है तो क्यों किसी को दण्ड देंगे, क्यों दुर्भाव पैदा करेंगे? मानसिक सन्तुलन बनाये रखने के लिए इस प्रकार करना ही अच्छा होता है।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1964 पृष्ठ 41

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/July/v1.41
 

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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