रविवार, 13 जनवरी 2019

👉 मौन उपदेश

उपदेश किस प्रकार दिया जाता है, शिक्षा पैसे की जाती है? क्या मंच पर से श्रोताओं को व्याख्यान पर व्याख्यान सुनाकर उन्हें ज्ञान दिया जा सकता है? उपदेश का अर्थ है ज्ञान का सामाजिक विवरण। वास्तव में यह तो केवल एकान्त में ही हो सकता है। जो मनुष्य घंटे तक व्याख्यान सुनता है, पर जिसे उसके द्वारा अपने दैनिक जीवन को बदलने की कोई प्रेरणा नहीं मिलती उसके लिए सचमुच व्याख्यान का क्या मूल्य है?

इसकी उस मनुष्य से तुलना करो जो घड़ी भर के लिए ही किसी महात्मा की शरण में बैठता है, किन्तु इतने ही से उसके जीवन का सारा दृष्टिकोण बदल जाता है। कौन सी शिक्षा उत्तम है? प्रभावहीन होकर जोर से व्याख्यान देना या चुपचाप शान्तिपूर्वक आध्यात्म ज्ञान का प्रसार करना।

अच्छा, भाषण का उद्गम क्या है? मूल, सब का मूल है शुद्ध ज्ञान। उससे अहंकार ही उत्पत्ति होती है, फिर अहंकार से विचार प्रकट होते है और अन्त में ये शब्दों का रूप धारण करते हैं। इस प्रकार शब्द उस आदि स्रोत के प्रपोत्र के भी पुत्र हैं। यदि शब्दों का कोई मूल्य हो सकता है तो स्वयं निर्णय करो कि मौन उपदेश का प्रभाव कितना शक्तिशाली न होता होगा।

श्री रमन महर्षि,
अखण्ड ज्योति सितम्बर 1942

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शनिवार, 12 जनवरी 2019

👉 विवेकानंद जयंती विशेष : राष्ट्रीय युवा दिवस

'उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाए' का संदेश देने वाले युवाओं के प्रेरणास्त्रो‍त, समाज सुधारक युवा युग-पुरुष 'स्वामी विवेकानंद' का जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता (वर्तमान में में कोलकाता) में हुआ। इनके जन्मदिन को ही राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

🌹 स्वामी विवेकानंद का जन्म परिचय

स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी 1863 को गौड़ मोहन मुखर्जी स्ट्रीट,कोलकाता में हुआ था. उस दिन हिन्दू कालदर्शक के अनुसार संवत् १९२० की मकर सक्रांति का दिन था. आज हम स्वामी जी के जन्मदिवस को केरियर डे के रूप में मनाते हैं, स्वामी विवेकानन्द आज की युवा पीढ़ी के सच्चे मार्गदर्शक हैं उनके कार्यो और शिक्षाओ पर चलकर जीवन में हर असंभव सफलता के द्वार खोले जा सकते हैं, स्वामी विवेकानंद जी के बचपन का नाम नरेन्द्र था, जो बचपन से ओजस्वी वाणी और ज्ञानवान थे स्वामी जी १८९३ के विश्व सर्व घर्म सम्मलेन में भारत का प्रतिनिधित्व किया था. और अपने विचारो और सोच से पूरी दुनिया के गुरू कहलाये।

एक कालीन परिवार में जन्मे नरेन्द्र घर्म और आद्यात्मिक की तरफ बचपन से ही उनका झुकाव था. स्वामी जी के गुरू श्री रामकृष्ण परमहंस थे. उनकी शिक्षाए और बातो से नरेन्द्र बहुत प्रभावित हुए, विवेकानंद ने परमहंस से ही सिखा कि हर एक आत्मा में परमात्मा का वास होता हैं इसी सोच ने नरेन्द्र के नजरिये और सोच में बड़ा बदलाव आया।

आज हमारे देश में स्वामी विवेकानंद को एक महान संत, और राष्ट्र सुधारक समझे जाते हैं इसी कारण 12 जनवरी को उनके जन्मदिन को राष्ट्रिय युवा दिवस के रूप में मनाते हैं।

🌹 स्वामी विवेकानन्द का बचपन
स्वामी जी के पिता जी का नाम विश्वनाथ दत्त था जो कलकत्ता हाई कोर्ट के जाने-माने वकील थे.और दादा दुर्गा चरण जी फारसी और संस्कर्त के ज्ञाता थे.माँ भुवनेश्वरी देवी स्वामी जी की माता जी का नाम था. जो कि एक धार्मिक स्वभाव की महिला थी. उनका अधिकतर समय महादेव की पूजा में ही व्यतीत होता था. उनकी सोच और विचारो का बालक नरेन्द्र पर गहरा प्रभाव पड़ा बालपन में ही स्वामी जी तेज बुद्दी और ओजस्वी होने के साथ-साथ बड़े नटकट थे. वो अध्यापको और किसी का मजाक उड़ाने में पीछे नहीं हटते थे. बचपन में ही उन्हें माता से धार्मिक पाठ और रामायण सुनना बहुत पसंद था उनके घर में हमेशा भजन कीर्तन हुआ करते थे. इस प्रकार के वातावरण में उनमे गहरी घार्मिक आस्था का जन्म हुआ और भगवान् को जानने का रहस्य उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बना दिया जब भी उन्हें कोई ज्ञानी पंडित मिलते उन्हें ईश्वर के स्वरूप के बारे में जरुर पूछते. स्वामी विवेकानंद ने 25 वर्ष की उम्रः में ही घर छोड़ सन्यासी बन गये थे।

🌹 स्वामी विवेकानंद की शिक्षा  

मात्र आठ वर्ष की उम्रः में नरेन्द्र ने कलकता के प्रसिद्ध शिक्षा संस्थान ईश्वर चंद्र विद्यासागर में दाखिला लिया. फिर उनका परिवार रायपुर आ बसा फिर से कलकता लोटे और प्रेसीडेंसी कॉलेज में पढाई की और इस कॉलेज से फस्ट डिविजन से उत्तीर्ण करने वाले नरेन्द्र पहले छात्र थे।

नरेन्द्र बचपन से ही घार्मिक, इतिहास, समाज, कला और साहित्य के किताबो और ग्रंथो को पढने में अधिक रूचि रखते थे. साथ ही रामायण, महाभारत और गीता व् वेदों को गहन अध्ययन किया करते थे. स्वामी जी ने बचपन में भारतीय शास्त्रीय सगीत की भी शिक्षा ली. और नित्य शारीरिक खेलो और व्यायामों में भाग लेते थे. इसके साथ ही नरेन्द्र ने स्कॉटिश चर्च कॉलेज पिश्चमी सभ्यता और संस्कर्ती का गहन अध्ययन किया. नरेन्द्र ने वर्ष 1881 में ललित कला की परीक्षा पार की और वर्ष 1884 में कला वर्ग में  स्नातक पास की।।

नरेन्द्र ने सभी वैज्ञानिकों और शिक्षा शास्त्रियों के ग्रंथो का अध्ययन किया जिनमे डेविड ह्यूम, इमैनुएल कांट, जोहान गोटलिब फिच, बारूक स्पिनोज़ा, जोर्ज डब्लू एच हेजेल, आर्थर स्कूपइन्हार, ऑगस्ट कॉम्टे, जॉन स्टुअर्ट मिल और चार्ल्स डार्विन की रचनाये शामिल थी. नरेन्द्र ने कई विदेशी भाषा की पुस्तको का हिन्दी और स्थानीय भाषा बंगाली में अनुवाद भी किया..

नरेन्द्र की कुशाग्र बुद्दी के बारे में हेस्टी नाम के प्रोफ़ेसर ने नरेन्द्र के बारे में कहा की -नरेंद्र वास्तव में एक जीनियस है। मैंने काफी विस्तृत और बड़े इलाकों में यात्रा की है लेकिन उनकी जैसी प्रतिभा वाला का एक भी बालक कहीं नहीं देखा यहाँ तक की जर्मन विश्वविद्यालयों के दार्शनिक छात्रों में भी नहीं।

👉 स्वामी विवेकानन्द के जन्म के सम्बन्ध में

स्वामी विवेकानन्द के जन्म के सम्बन्ध में श्रीरामकृष्ण देव को एक अद्भूत दर्शन हुआ था।

श्रीरामकृष्ण देव के ही शब्दों में "एक दिन देखा, मन समाधि के मार्ग से ज्योतिर्मय पथ में ऊपर उठता जा रहा है। चन्द्र, सूर्य, नक्षत्रयुक्त स्थूल जगत का सहज में ही अतिक्रमण कर वह पहले सूक्ष्म भाव-जगत में प्रविष्ठ हुआ। उस राज्य के ऊँचे स्तरों में वह जितना ही उठने लगा, उतना ही अनेक देवी- देवताओं की मूर्तियाँ पथ के दोनों ओर दिखाई पड़ने लगीं। क्रमश: उस राज्य की अन्तिम सीमा पर वह आ पहुँचा। वहाँ देखा, एक ज्योतिर्मय परदे के द्वारा खण्ड और अखण्ड राज्यों का विभाग किया गया है। उस परदे को लाँघकर वह क्रमश: अखण्ड राज्य में प्रविष्ट हुआ। वहाँ देखा कि मूर्तरूपधारी कुछ भी नहीं है।

...किन्तु दूसरे ही क्षण दिखाई पड़ा कि दिव्य ज्योतिर्घन -तनु सात प्राचीन ऋषि वहाँ समाधिस्थ होकर बैठे है इसी समय देखता हूँ कि अखण्ड भेदरहित समरस, ज्योतिर्मण्डल का एक अंश घनीभूत होकर एक दिव्य शिशु के रुप में परिणत हो गया। वह देवशिशु उनमें से एक के पास जाकर अपने कोमल हाथों से आलिंगन करके अपनी अमृतमयी वाणी से '' उन्हें समाधि से जगाने के लिए चेष्टा करने लगा।

शिशु के कोमल प्रेम- स्पर्श से ऋषि समाधि से जागृत और अधखुले नेत्रों से उस अपूर्व बालक को देखने लगे वह अद्भूत देवशिशु अति आनन्दित होकर उनसे कहने लगा, 'मैं जा रहा तुम्हें भी आना होगा,... उस समय आश्चर्यचकित होकर मैंने देखा कि उन्हीं ऋषि के शरीर- मन का एक अंश उज्ज्वल के रूप में परिणत होकर विलोम मार्ग से पृथ्वी पर अवतीर्ण हो रहा है।

नरेन्द्र (स्वामी विवेकानन्द) को देखते ही मैं जान गया था कि यही वह है।'' बाद में भक्तों द्वारा पूछने पर उन्हें यह ज्ञात हुआ कि श्रीरामकृष्ण देव ने स्वयं ही उस शिशु का रूप धारण किया था।

👉 भगवान में विश्वास

स्वामी विवेकानंद का सम्पूर्ण जीवन एक दीपक के समान है जो हमेशा अपने प्रकाश से इस संसार को जगमगाता रहेगा और उनका जीवन सदा हम लोगों के लिए एक प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।

एक बार स्वामी विवेकानंद ट्रेन से यात्रा कर रहे थे और हमेशा की तरह भगवा कपडे और पगड़ी पहनी हुई थी। ट्रेन में यात्रा कर रहे एक अन्य यात्री को उनका ये रूप बहुत अजीब लगा और वो स्वामी जी को कुछ अपशब्द कहने लगा बोला – तुम सन्यासी बनकर घूमते रहते हो कुछ कमाते धमाते क्यों नहीं हो, तुम लोग बहुत आलसी हो, लेकिन स्वामी जी दयावान थे उन्होंने उसकी तरफ बिलकुल भी ध्यान नहीं दिया और हमेशा की तरह चेहरे पे तेज लिए मुस्कुराते रहे।

उस समय स्वामी जी को बहुत भूख लगी हुई थी क्यूंकि उन्होंने सुबह से कुछ खाया पिया नहीं था। स्वामी जी हमेशा दूसरों के कल्याण के बारे में सोचते थे अपने खाने का उन्हें ध्यान ही कहाँ रहता था । एक तरफ स्वामी जी भूख से व्याकुल थे वहीँ वो दूसरा यात्री उनको अप्शब्द और बुरा भला कहने में कोई कमी नहीं छोड़ रहा था । इसी बीच स्टेशन आ गया और स्वामी जी और वो यात्री दोनों उतर गए। उस यात्री ने अपने बैग से अपना खाना निकाला और खाने लगा और स्वामी जी से बोला – अगर कुछ कमाते तो तुम भी खा रहे होते।

स्वामी जी बिना कुछ बोले चुपचाप थकेहारे एक पेड़ के नीचे बैठ गए और बोले मैं अपने ईश्वर पे विश्वास करता हूँ जो वो चाहेंगे वही होगा । अचानक ही कहीं से एक आदमी खाना लिए हुए स्वामी जी के पास आया और बोला क्या आप ही स्वामी विवेकानंद हैं और इतना कहकर को स्वामी जी के कदमों में गिर पड़ा और बोला कि मैंने एक सपना देखा था जिसमें खुद भगवान ने मुझसे कहा कि मेरा परम भक्त विवेकानंद भूखा है तुम जल्दी जाओ और उसे भोजन देकर आओ।

बस इतना सुनना था कि वो यात्री जो स्वामी जी की आलोचना कर रहा था भाग कर आया और स्वामी जी के कदमों में गिर पड़ा, बोला – महाराज मुझे क्षमा कर दीजिये मुझसे बहुत बड़ी भूल हुई है मैंने भगवान को देखा नहीं है लेकिन आज जो चमत्कार मैंने देखा उसने मेरे भगवान में विश्वास को बहुत ज्यादा बड़ा दिया है। स्वामी जी ने दया भाव से व्यक्ति को उठाया और गले से लगा लिया।

स्वामी जी के जीवन से जुडी ये सत्य घटना बहुत अधिक प्रभावित करती है और बताती है कि किस तरह भगवान अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और पालन पोषण करते हैं।

👉 आज का सद्चिंतन 12 Jan 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 Jan 2019


👉 देने का आनंद पाने के आनंद से बड़ा होता है

भ्रमण एवं भाषणों से थके हुए स्वामी विवेकानंद अपने निवास स्थान पर लौटे। उन दिनों वे अमेरिका में एक महिला के यहां ठहरे हुए थे। वे अपने हाथों से भोजन बनाते थे। एक दिन वे भोजन की तैयारी कर रहे थे कि कुछ बच्चे पास आकर खड़े हो गए।

उनके पास सामान्यतया बच्चों का आना-जाना लगा ही रहता था। बच्चे भूखे थे। स्वामीजी ने अपनी सारी रोटियां एक-एक कर बच्चों में बांट दी। महिला वहीं बैठी सब देख रही थी। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। आखिर उससे रहा नहीं गया और उसने स्वामीजी से पूछ ही लिया- 'आपने सारी रोटियां उन बच्चों को दे डाली, अब आप क्या खाएंगे?'

स्वामीजी के अधरों पर मुस्कान दौड़ गई। उन्होंने प्रसन्न होकर कहा- 'मां, रोटी तो पेट की ज्वाला शांत करने वाली वस्तु है। इस पेट में न सही, उस पेट में ही सही।' देने का आनंद पाने के आनंद से बड़ा होता है।

👉 स्वामी विवेकानन्द जैसा पुत्र

एक बार जब स्वामी विवेकानंद अमेरिका गए थे, एक महिला ने उनसे शादी करने की इच्छा जताई. जब स्वामी विवेकानंद ने उस महिला से ये पुछा कि आप ने ऐसा प्रश्न क्यूँ किया?

उस महिला का उत्तर था कि वो उनकी बुद्धि से बहुत मोहित है.और उसे एक ऐसे ही बुद्धिमान बच्चे कि कामना है. इसीलिए उसने स्वामी से ये प्रश्न किया कि क्या वो उससे शादी कर सकते है और उसे अपने जैसा एक बच्चा दे सकते हैं?

उन्होंने महिला से कहा कि चूँकि वो सिर्फ उनकी बुद्धि पर मोहित हैं इसलिए कोई समस्या नहीं है. उन्होंने कहा “मैं आपकी इच्छा को समझता हूँ. शादी करना और इस दुनिया में एक बच्चा लाना और फिर जानना कि वो बुद्धिमान है कि नहीं, इसमें बहुत समय लगेगा. इसके अलावा ऐसा हो इसकी गारंटी भी नहीं है. इसके बजाय, आपकी इच्छा को तुरंत पूरा करने हेतु मैं आपको एक सुझाव दे सकता हूँ. मुझे अपने बच्चे के रूप में स्वीकार कर लें .इस प्रकार आप मेरी माँ बन जाएँगी. और इस प्रकार मेरे जैसे बुद्धिमान बच्चा पाने की आपकी इच्छा भी पूर्ण हो जाएगी।“

👉 माँ की महिमा

स्वामी विवेकानंद जी से एक जिज्ञासु ने प्रश्न किया," माँ की महिमा संसार में किस कारण से गायी जाती है? स्वामी जी मुस्कराए, उस व्यक्ति से बोले, पांच सेर वजन का एक पत्थर ले आओ। जब व्यक्ति पत्थर ले आया तो स्वामी जी ने उससे कहा, " अब इस पत्थर को किसी कपडे में लपेटकर अपने पेट पर बाँध लो और चौबीस घंटे बाद मेरे पास आओ तो मई तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दूंगा।"

स्वामी जी के आदेशानुसार उस व्यक्ति ने पत्थर को अपने पेट पर बाँध लिया और चला गया। पत्थर बंधे हुए दिनभर वो अपना कम करता रहा, किन्तु हर छण उसे परेशानी और थकान महसूस हुई। शाम होते-होते पत्थर का बोझ संभाले हुए चलना फिरना उसके लिए असह्य हो उठा। थका मांदा वह स्वामी जी के पास पंहुचा और बोला , " मै इस पत्थर को अब और अधिक देर तक बांधे नहीं रख सकूँगा। एक प्रश्न का उत्तर पाने क लिए मै इतनी कड़ी सजा नहीं भुगत सकता।"

स्वामी जी मुस्कुराते हुए बोले, " पेट पर इस पत्थर का बोझ तुमसे कुछ घंटे भी नहीं उठाया गया और माँ अपने गर्भ में पलने वाले शिशु को पूरे नौ माह तक ढ़ोती है और ग्रहस्थी का सारा काम करती है। संसार में माँ के सिवा कोई इतना धैर्यवान और सहनशील नहीं है इसलिए माँ से बढ़ कर इस संसार में कोई और नहीं।

शुक्रवार, 11 जनवरी 2019

👉 प्रशंसा से बहका मनुष्य.......

एक दिन एक आदमी एक ज्योतिषी से मिला ज्योतिषी ने उसे बताया की तुम्हारी जिन्दगी थोड़ी सी हैं केवल महीने भर की आयु बाकी हैं, वह आदमी बहुत चिंतित हुआ वह चिंता में डूब गया उसने एक संत ये यहाँ दस्तक दी, संत के चरणों में खूब रोया और मृत्यु से बचा लेने की प्रार्थना की।

संत ने पूछा तुम क्या करते हो? उसने जबाब दिया मूर्तिकार हूँ, मुर्तिया बनाता हूँ। संत ने उसे उपाय सुझाया तुम अपनी जैसी शक्ल की आठ मुर्तिया बनाओ।

मुर्तिया हू- ब- हू तुम्हारे जैसी ही होनी चाहिए, सो जिस दिन मृत्यु का बात आये, उस दिन सब को एक से वस्त्र पहना कर लाइन में खड़ा कर देना और इनके बीचो बीच में तुम स्वयं खड़े हो जाना तथा जैसे ही यमदूत तुमको लेने आये तो तुम एक मिनट के लिए अपनी साँस रोक लेना।

यमदूत तुमको पहचान नहीं पायेंगे, और इस तरह वे तुम्हे छोड़ कर चले जायेगे तथा तुम्हरी मृत्यु की घडी टल जायेगी। मूर्तिकार ने ऐसा ही किया मृत्यु के दिन यमदूत उसे लेने आए यमदूतो ने देखा कि एक जैसे नौ आदमी खड़े हैं। मुश्किल में पड़ गए इसमें असली कौन हैं और नकली कौन हैं, मालूम ही नहीं पड़ रहा और बेचारे यमदूत खाली हाथ ही लौट गए।

यमलोक जाकर यमराज से शिकायत की वहां नौ लोग खड़े हैं समझ में नहीं आता किसको लाना हैं। यमराज ने भी सुना तो उसे भी आश्चर्य हुआ क्यों कि पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ यमराज ने सोचा, मृत्युलोक में कोई नया ब्रह्मा पैदा हो गया हैं, जो एक जैसे अनेक व्यक्ति बनाने लगा हैं। यमराज जी ने ब्रह्मा जी को बुलवाया और पूछा ये क्या मामला हैं ? एक जैसी शक्ल के नौ- नौ आदमी ?

यमदूत पेशोपेश में हैं कि कौन असली हैं और कौन नकली, लेकर किसको जाना हैं यह कैसा तमाशा हैं ? ब्रह्मा जी ने देखा तो उनका भी सर चकराया, ब्रह्मा जी बोले मैंने तो पूरी पृथ्वी पर एक जैसे दो आदमी नहीं बनाये, लगता हैं सचमुच में कोई नया ब्रह्मा पैदा हो गया हैं, जिसने एक जैसे दो नहीं बल्कि नौ- नौ आदमीं बना दिए हैं। ब्रह्मा जी बोले मामला जटिल हैं इसका निपटारा विष्णु जी कर सकते हैं।

विष्णु जी को बुलवाया गया विष्णु जी ने सभी मूर्तियों की परिक्रमा की, उन्हें ध्यान से देखा तो असली बात समझ में आ गई। विष्णु जी ने ब्रह्मा जी से कहा - प्रभु क्या कमाल की कला हैं क्या सुन्दर और सजीव मुर्तिया बनायीं हैं जिसने यह मुर्तिया बनायीं हैं अगर मुझे मिल जाए तो में स्वयं उसका अभिनन्दन करूँगा, मैं स्वयं उसकी कला को पुरस्कृत करूँगा।

विष्णु द्वारा इतनी प्रशंसा सुननी थी कि बीच की मूर्ति (जिसमे स्वयं मूर्तिकार था) बोल पड़ी - प्रभु मैंने ही बनायीं हैं, मैं ही मूर्तिकार हूँ । विष्णु जी ने उसका कान पकड़ा और कहा - चल निकल बाहर हम तुझे ही खोज रहे थे और यमदूत पकड़कर उसे अपने साथ ले गए।

इसलिए कहते हे न यहाँ इस धरती पर हर आदमी अपनी जरा सी प्रशंसा भर से बहक जाता हैं। प्रशंसा में फूल जाना और अपनी औकात को भूल जाना ही मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी हैं, कोई आपकी कितनी भी तारीफ करे तो आपको जरा सावधान रहना चाहिए क्योंकि हो सकता है वह ही आपके लिए कोई जाल तैयार कर रहा हो। जीवन में हमेशा संयम बरते और ध्यान रखे ।

👉 मन मन्दिर को निर्मल बनाओ!

प्यारे प्रभु के दर्शन करने हैं तो मन मन्दिर की सफाई करो। तब देव अपनी सर्व शक्तियों से उसमें पधारेंगे। मन को निर्मल बनाने के लिए अपने में मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा आदि भावनाओं को जगाओ। अर्थात् सुखी पुरुषों में मित्रता, दुखियों पर करुणा-पुण्य आत्माओं पर हर्ष और पापियों पर उपेक्षा की भावना से चित्त निर्मल हो जाता है। मैत्री, करुणा और हर्ष से चित में उत्साह और शान्ति रहती है और पापियों की उपेक्षा करने से मनुष्य क्रोध से बच जाता है। इसके अलावा छल, कपट और स्वार्थादि दोषों को छोड़ दो, दोनों में स्वार्थ मुख्य है।

इसके उदय होने से शेष सब अवगुण अपना बल बढ़ाते हैं। गुणों में मैत्री सबसे अधिक मूल्यवान है। इसके आने पर शेष सब गुण इसकी छाया मैं आ जाते हैं प्रेम प्रकाश है, स्वार्थ अन्धकार है, प्रेम उदार है स्वार्थ धोखे का बाजार है। प्रेम ने संसार को सुधारा स्वार्थ ने संसार को बिगाड़ा- प्रेम परमेश्वर से मिलाता है। स्वार्थ संसार के बंधन में गिराता है।

इसलिए प्रेम सत्संग, स्वाध्याय द्वारा निष्कपट, सरल स्वभाव से अपने अन्तःकरण को पवित्र बनाओ अनेक जन्मों की परम्परा से जो बुरी वासनायें दृढ़ हो गई हैं उनको दूर करो, स्वार्थ को छोड़कर सच्ची प्रभु भक्ति साधारणतया, प्राणी मात्र की सेवा और विशेषतया मनुष्य मात्र की सेवा करो। इस प्रकार जो मल बुरे खोटे कर्मों के करने से बढ़ता है, विक्षेप जो पुरुषार्थ न करके केवल इच्छा करते रहने से मन को चंचल बनाता है और आवरण जो स्वाध्याय सत्संग के बिना बढ़ता है को दूर करके भगवान की कृपा को प्राप्त करो। यही एक सरल मार्ग है।

✍🏻 स्वामी सर्वदानन्द जी महाराज
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1943

👉 आज का सद्चिंतन 11 Jan 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 Jan 2019

👉 The Second Tenet of Self-refinement: Mastering Our Feelings

Continual self refinement needs us to suppress unwanted urges while simultaneously cultivating divine virtues. Anger, hatred, pride, greed, cruelty, and despair etc are just a few amongst the negative emotional urges. All of them should be uprooted slowly and steadily. One of the ways of getting rid of them is to develop the opposite tendencies in the form of patience, love, affection, encouragement, humility, compassion, and truthfulness etc. As we continue to develop these positive attributes, the unwanted patterns and impressions will disappear on their own.

Love one and all. Your enemies will disappear and your circle of friend will get bigger. Similarly, practicing patience, humility, and compassion will slowly and naturally eradicate all unwanted patterns and feelings.

Pt. Shriram Sharma Aacharya
Aatmagyaan aur Atmakalyaan  (Self-realization and Self-benefit) Page 9

👉 आत्मचिंतन के क्षण 11 Jan 2019

◾  बद्ध जीव का एक और लक्षण है। यदि उसको संसार से हटाकर किसी अच्छी जगह पर ले जाओ, तो वह तड़प-तड़पकर मर जाएगा। विष्ठा के कीट को विष्ठा ही में आनन्द मिलता है। उसी से वह हृष्टपुष्ट होता है। उस कीट को अगर अन्न की हण्डी में रख दो तो वह मर जाएगा।

◾  यह माया या 'अहं' मेघ की तरह है। मेघ का एक छोटासा ही टुकडा़ क्यों न हो, पर उसके कारण सूर्य नहीं दीख पड़ते। उसके हट जाने से ही सूर्य दीख पड़ते हैं। यदि श्रीगुरू की कृपा से एक बार अहंबुद्धि  दूर हो जाय तो फिर ईश्वर के दर्शन होते हैं।

◾  किसी मेढ़क के पास एक रुपया था। वह एक बिल में रखा रहता था। एक हाथी उस बिल को लाँघ गया। तब मेढ़क बिल से निकलकर बडे़ गुस्से में आकर लगा हाथी को लात दिखाने! और बोला, तुझे इतनी हिम्मत कि मुझे लाँघ जाय!' रुपये का इतना अहंकार होता है!

◾  विषयबुद्धि का लेशमात्र रहते उनके दर्शन नहीं हो सकते। दियासलाई अगर भीगी हो तो चाहे जितना रगडो़ वह जलती ही नहीं - बीसों दियासलाई व्यर्थ ही बरबाद हो जाती हैं। विषयासक्त मन भीगी दियासलाई है।

✍🏻 श्रीरामकृष्ण परमहंस

गुरुवार, 10 जनवरी 2019

👉 पुण्य की जड़ें

एक बड़ा व्यापारी नदी में स्नान करने गया। उस दिन वहां काफी भीड़ थी। व्यापारी की नजर नदी में डूबते हुए एक व्यक्ति पर पड़ी। वह तुरंत नदी में कूद गया। व्यक्ति को बाहर निकालने पर देखा कि वह उनका अकाउंटेंट था। कुछ देर बाद अकाउंटेंट को होश आया। व्यापारी ने उससे इस हालत में पहुंचने का कारण पूछा। अकाउंटेंट ने बात बनाते हुए कहा, ‘मैंने अपना सारा पैसा सट्टा बाजार में खो दिया है। लोगों का काफी उधार है मुझ पर। उन्हीं लोगों के डर से मैंने यह कदम उठाया है।’

व्यापारी ने अकाउंटेंट को सांत्वना दी व कहा, ‘अब चिंता छोड़ो, भविष्य में कभी ऐसा काम मत करना। ईमानदारी से नौकरी करते रहो।’  अकाउंटेंट को नौकरी करते हुए एक साल बीत गया। इस बीच व्यापारी को काफी लाभ हुआ। अकाउंटेंट की नीयत फिर खराब हो गयी।

एक दिन उसके बेटे का जन्मदिन था। उसने सबको खीर खिलाई। व्यापारी के लिए भी एक कटोरा खीर लेकर वह उनके घर पहुंचा। व्यापारी व्यस्त था तो उसे कटोरा मेज पर रखने को कह दिया। काम करते हुए देर हो गयी। थोड़ी देर बाद देखा तो खीर का कटोरा बिल्ली खा रही थी, जिसे खाते ही उसकी तबीयत बिगड़ गयी। व्यापारी को समझ आ गया, पर उसने किसी के सामने जिक्र नहीं किया। सोचा कि जब तक मेरा पुण्य है, मेरा कुछ नहीं हो सकता। अगले दिन अकाउंटेंट ने जब व्यापारी को देखा तो सकपका गया। व्यापारी ने फिर भी कुछ जाहिर नहीं किया। अकाउंटेंट को लगा कि व्यापारी को कुछ पता नहीं चला।

वह फिर व्यापारी का धन हड़पने के बारे में सोचने लगा। एक दिन व्यापारी को कहीं जाना था। उसने अकाउंटेंट को भी मोटी रकम साथ लेकर चलने को कहा। अकाउंटेंट ने व्यापारी को नुकसान पहुंचाने के लिए कुछ गुंडों को साथ रख लिया। एक मंदिर आया। व्यापारी उस ओर जाने लगा। वह जैसे ही झुका, गुंडों ने हमला कर दिया। व्यापारी वहीं बेहोश होकर गिर गया। अकाउंटेंट जैसे ही धन लेकर भागने लगा तो गुंडों की नीयत बिगड़ गयी। उन्होंने धन छीनकर उसे नदी में धकेल दिया।

व्यापारी को होश आया तो सामने अकाउंटेंट को डूबते हुए देखा। अपने दयालु स्वभाव के अनुसार सेठ ने फिर अकाउंटेंट को बचा लिया। होश में आने के बाद अकाउंटेंट ने व्यापारी के पैर पकड़े और माफी मांगने लगा। व्यापारी ने उसे मन ही मन माफी दी और इतना ही कहा- जब तक किसी के पुण्य की जड़ें हरी हैं, तब तक कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

👉 आज का सद्चिंतन 10 Jan 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 Jan 2019


बुधवार, 9 जनवरी 2019

👉 हमारी फितरत

एक घर में गृह प्रवेश की पूजा हो रही थी। पंडित जी पूजा करा रहे थे। पंडित जी ने सबको हवन में शामिल होने के लिए बुलाया। सबके सामने हवन सामग्री रख दी गई। पंडित जी मंत्र पढ़ते और कहते, “स्वाहा।” लोग चुटकियों से हवन सामग्री लेकर अग्नि में डाल देते। गृह मालिक को स्वाहा कहते ही अग्नि में घी डालने की ज़िम्मेदीरी सौंपी गई।

हर व्यक्ति थोड़ी सामग्री डालता, इस आशंका में कि कहीं हवन खत्म होने से पहले ही सामग्री खत्म न हो जाए। गृह मालिक भी बूंद-बूंद घी डाल रहे थे। उनके मन में भी डर था कि घी खत्म न हो जाए। मंत्रोच्चार चलता रहा, स्वाहा होता रहा और पूजा पूरी हो गई। सबके पास बहुत सी हवन सामग्री बची रह गई। घी तो आधा से भी कम इस्तेमाल हुआ था।

हवन पूरा होने के बाद पंडित जी ने कहा कि आप लोगों के पास जितनी सामग्री बची है, उसे  अग्नि में डाल दें। गृह स्वामी से भी उन्होंने कहा कि आप इस घी को भी कुंड में डाल दें। एक साथ बहुत सी हवन सामग्री अग्नि में डाल दी गई। सारा घी भी अग्नि के हवाले कर दिया गया। पूरा घर धुंए से भर गया। वहां बैठना मुश्किल हो गया। एक-एक कर सभी कमरे से बाहर निकल गए।

अब जब तक सब कुछ जल नहीं जाता, कमरे में जाना संभव नहीं था। काफी देर तक इंतज़ार करना पडा, सब कुछ स्वाहा होने के इंतज़ार में।

👉 ये कहानी तो यहीं रुक जाती है। परन्तु.......

उस पूजा में मौजूद हर व्यक्ति जानता था कि जितनी हवन सामग्री उसके पास है, उसे हवन कुंड में ही डालना है। पर सबने उसे बचाए रखा। सबने बचाए रखा कि आख़िर में सामग्री काम आएगी। ऐसा ही हम करते हैं। यही हमारी फितरत है। हम अंत के लिए बहुत कुछ बचाए रखते हैं।

ज़िंदगी की पूजा खत्म हो जाती है और हवन सामग्री बची रह जाती है। हम बचाने में इतने खो जाते हैं कि जब सब कुछ होना हवन कुंड के हवाले है, उसे बचा कर क्या करना। बाद में तो वो सिर्फ धुंआ ही देगा।

संसार हवन कुंड है और जीवन पूजा। एक दिन सब कुछ हवन कुंड में समाहित होना है। अच्छी पूजा वही है, जिसमें हवन सामग्री का सही अनुपात में इस्तेमाल हो l

👉 आज का सद्चिंतन 9 Jan 2019


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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