मंगलवार, 1 जनवरी 2019

👉 Darkness to Light

Truth! Truth!! Truth!!! What a force and impact this word carries that even uttering this word seems to sooth the tongue, thought of it itself gives some light to the mind and feeling of it rejuvenates the heart. The transition from falsehood to truth is an ascent from filthy mire to pious skies, a transmutation from beastly instincts, devilish darkness to divine virtues and eternal light.

Truth is absolute, eternal. God is Truth, the Soul is Truth, God’s creation of Nature is Truth; Truth is Omnipresent. It is the ultimate goal of life; truth is the ceaseless perennial quest of the individual self, for which it takes birth, life after life, Age after Age… This life is bestowed upon us as yet another opportunity to realize the ultimate truth and savor the nectar of infinite bliss.

It is pitiable that we remain ignorant of this fact that – what we think of the world around (and die hunting for the mirage of joy in it) is not true; it is nothing but the image of our own perception. Once you understand this fact, you will turn towards truth. You will become a follower of Truth; it will be your ideal; an integral part of your character. “Truth” will then show you the divine radiance of your inner self.

If every word, every deed of yours is truthful, the world will truthfully honor you and you will inspire many others towards its noble path. The Vedic teaching reminds all of us to follows the path of truth – “Asato Ma Sadgamaya”, as this is the only source of auspicious welfare of all…

📖 Akhand Jyoti, Jan. 1942

👉 असत्य की ओर नहीं, सत्य की ओर

सत्य! सत्य!! सत्य!!! अहा, कितना सुंदर शब्द है। उच्चारण करते ही जिह्वा को शांति मिलती है, विचार करते ही मस्तिष्क शीतल हो जाता है, हृदयंगम करने से कलेजा ठंडक अनुभव करता है। झूठ के मायावी प्रपंचों में उलझ कर ईश्वर का राजकुमार-मनुष्य मानवता से पतित होकर पशु बन गया है। सत्य की अवहेलना करने का अभिशाप वह भुगत रहा है।

ईश्वर सत्य है, आत्मा सत्य है, प्रभु की त्रिगुणमयी लीला सत्य है, सर्वत्र सत्य ही सत्य व्याप्त हो रहा है। जीवन के कण-कण की एक ही प्यास है-`सत्य’। हमारा जीवन इसलिए है कि अखिल सत्य तत्त्व में विचरण करते हुए अमृत का पान करें। प्रभु ने कृपा करके हमें अपने संसार की सत्यरूपी वाटिका में भ्रमण करके आनंद लाभ करने के लिए भेजा है, परंतु हाय, हम तो अपने को बिलकुल ही भूले जा रहे हैं। वास्तव में दुनिया कुछ नहीं है। अपनी छाया ही संसार के दर्पण में प्रतिबिंबित हो रही है।

`सत्य’ मनुष्यों को प्रेरणा देता है कि अंतर में दृष्टि डालो, अपना दृष्टिकोण बदलो, अपना और दुनिया का स्वरूप समझो, अपने को अच्छा बना डालो, बस सारी दुनिया तुम्हारे लिए अच्छी बन जाएगी। तुम सत्यनिष्ठ बनो, दुनिया तुम्हारे साथ सत्य का आचरण करेगी। श्रुति कहती है `असतो मा सद्गमय’ असत्य की ओर नहीं, सत्य की ओर गमन कीजिए। आपका इसी में कल्याण है।

📖 अखण्ड ज्योति -जनवरी 1942 पृष्ठ 19

👉 पिशाच प्रेमी या पागल (अन्तिम भाग)

इन सब दृश्यों को जब हम देखेंगे तो अनुभव करेंगे कि ईश्वर का वेष बनाकर शैतान आ बैठा है, धर्म की आड़ में पाप बोल रहा है, गाय का चमड़ा ओढ़ कर भेड़िया विचरण कर रहा है। इन्द्रिय लिप्सा, व्यभिचार, पतन प्रोत्साहन, अन्याय वर्धन को यदि प्रेम कहा जायगा तो हम नहीं समझते तो पाप नाम की कौन सी चिड़िया इस दुनिया में शेष रहेगी।

प्रेम का अर्थ है त्याग और सेवा। सच्चा प्रेमी अपने सुखों की तनिक भी इच्छा नहीं करता वरन् जिस पर प्रेम करता है उसके सुख पर अपने को उत्सर्ग कर देता है। लेने का उसे ध्यान भी नहीं आता, देना ही एकमात्र उसका कर्तव्य हो जाता है। जिसके हृदय में प्रेम की ज्योति जलेगी वह गोरे चमड़े पर फिसल कर अपने चमारपन का परिचय न देगा और न व्यभिचार की कुदृष्टि रखकर अपनी आत्मा को पाप पंक में घसीटेगा। वह किसी स्त्री के रूप, रंग, चमक, दमक, हाव, भाव या स्वर कंठ पर मुग्ध नहीं होगा, वरन् किसी देवी में उज्ज्वल कर्तव्य का दर्शन करेगा तो उसके चरणों पर झुककर प्रणाम करेगा। स्त्रियों से प्रेम करने वाले के कमरे में अभिनेत्रियों के अधनंग चित्र नहीं होंगे वरन् सीता और सावित्री की प्रतिमायें विराजेंगीं। प्रेमी कमर लचकाकर गलियों में छैल चिकनियाँ बना हुआ न फिरेगा, वह माँ बहिनों को सती साध्वी बनाने के लिए उनमें धर्म प्रेरणा करेगा।

उसकी जिह्वा पर आशिक-माशकों के गन्दे अफसाने न होंगे वरन् राम-भरत के प्रेम की चर्चा करता हुआ गदगद हो जायेगा। प्रेमी का दिल तो बेकाबू हो सकता है पर दिमाग मुट्ठी में रहेगा, वह दूसरों के सुख के लिए आत्मत्याग करने में अपने को बेकाबू करेगा, किन्तु किसी को पतन के मार्ग पर घसीटने का स्मरण आते ही उसकी आत्मा काँप जायगी। इस दिशा में उसका एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। अपने प्रेमपात्र को बदनामी, पतन, दुख, भ्रम और नरक में घसीटने वाला व्यक्ति किसी भी प्रकार प्रेमी नहीं कहा सकता, वह तो नरक का कीड़ा है जो अपनी विषय ज्वाला में जलाने के लिए दूसरे पक्ष को घसीटता है।

स्मरण रखिए प्रेम का लक्षण त्याग है। जब आप अपने सुख को दूसरों के ऊपर निछावर करते हैं तब आप प्रेमी हैं। जब आप अपने सुख के लिए दूसरे को पतन के मार्ग में खींचते हैं तब आप पिशाच हैं। जब आप दूसरों के सुधार के लिए स्वयं कष्ट सहते हैं, बुराइयाँ ओढ़ते हैं, तप करते हैं तब आप प्रेमी हैं। जब दूसरों के कुकर्म को यों ही अनियंत्रित गति से बढ़ने देते हैं, न तो उनको रोकते हैं, न विरोध करते हैं तब आप पागल बन जाते हैं। क्योंकि भविष्य की हानि-लाभ न सोचकर केवल आज पर ही ध्यान देने वाला पागल कहा जाता है। सन्निपात ग्रस्त को मिठाई खिलाकर उसकी बीमारी बढ़ा देने वाला पागल ही कहा जायगा। प्रेमी का धर्म है त्याग और सेवा। त्यागी और सेवक ही प्रेमी कहला सकता है। जो भोगेच्छा में जलता फिरता है वह पिशाच है और जो सुधार के लिए किसी को कष्ट देना नहीं चाहता एवं सेवा के लिए उद्यत नहीं होता वह पागल है।

प्रेमियों को अपना अन्तःकरण टटोलकर निर्णय करना चाहिए कि वे पिशाच हैं? प्रेमी हैं? या पागल हैं?

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1942 पृष्ठ 12
http://literature.awgp.in/magazine/AkhandjyotiHindi/1942/May.12

👉 तनाव से मुक्ति

एक बार मुल्ला नसीरुद्दीन के साथ दुर्घटना हुई और वे अस्पताल में थे। शरीर के हरेक अंग की कोई न कोई हड्डी टूटी थी।

उनके सारे चेहरे पर पट्टियाँ बँधी हुई थीं। केवल उनकी ऑंखें दिख रही थीं। उनके एक मित्र उन्हें मिलने आए और उनसे पूछा,"कैसे हो, मुल्ला?"उन्होंने कहा," मैं ठीक हूँ सिवाय इसके कि जब मैं हँसता हूँ तो दर्द होता है।" तब उनके मित्र ने उनसे पुछा, "भला, इस हालत में आप हँस कैसे सकते हैं?" मुल्ला ने जवाब दिया,"अगर मैं अब न हँसु तो मैं ज़िन्दगी में कभी हँस नहीं पाउँगा।"

ये अविरत उत्साह सम्पूर्ण स्वास्थ्य में रहने का आयाम है। संस्कृत में स्वास्थ्य के लिए शब्द है 'स्वस्ति' माने प्रबुद्ध व्यक्ति, जो स्व में स्थित है। स्व में बने रहने की पहली निशानी है उत्साह - जो हँस कर ये कह सके कि, " आज कोई काम नहीं बना।" ये कह सकने के लिए तुम्हें ऐसी मानसिक स्थिति चाहिए जो कि तनाव-मुक्त और दबाव--सिद्ध हो।

जब तुम तनाव में होते हो, तब तुम्हारो भौहें चढ़ जातीं हैं। जब तुम इस तरह त्योरी चढाते हो, तब तुम चेहरे की ७२ नसें और माँस-पेश्यियाँ उपयोग में लाते हो। लेकिन जब तुम मुस्कुराते हो तब उन में से केवल ४ का उपयोग करते हो। अधिक कार्य का अर्थ है अधिक तनाव। तनाव तुम्हारी मुस्कान को भी गायब कर देता है। तुम्हारी बॉडी लेंग्वेज तुम्हारी मानसिक स्थिति और शारीरिक तंत्र की उर्जा का संकेत दे देती है।

हम एक उर्जा के बादल में संपुटित हैं, जिसे चेतना कहते हैं। ये एक मोम बत्ती और बाती जैसा है। जब तुम मोम बत्ती पर माचिस की तीली लगाते हो, तो बाती पर ज्योत प्रकट होती है। मोम बत्ती में भी वही हाईड्रोकार्बन है। लेकिन जब उसे प्रज्वलित किया जाता है, तब ज्योति केवल उसकी चोटी पर टिमटिमाती है। इसी तरह हमारा शरीर मोम बत्ती की बाती की तरह है और इसके आसपास जो है वह चेतना है, जो हमें जीवित रखती है। तो हमें अपने मन और आत्मा का ध्यान रखना है।

हमारे अस्तित्व के ७ स्तर हैं - शरीर, श्वास, मन, बुद्धि, स्मृति, अहम् और आत्मा। मन तुम्हारी चेतना में विचार और अनुभूति की समझ है जो निरंतर बदलते रहते हैं। आत्मा हमारी अवस्था और अस्तित्व का सूक्ष्मतम पहलू है। और मन और शरीर को जो जोडती है वह हमारी साँस है। सब कुछ बदलता रहता है, हमारा शरीर बदलाव से गुज़रता है, वैसे ही मन, बुद्धि, समझ, धारणाएँ, स्मृति, अहम् भी। लेकिन ऐसा कुछ है तुम्हारे भीतर जो नहीं बदलता। और उसे आत्मा कहते हैं, जो कि सब बदलावों का सन्दर्भ बिंदु है। जब तक तुम इस सूक्ष्मतम पहलू से नाता नहीं जोड़ोगे, आयुर्वेद की प्राचीन पद्धति के अनुसार तुम एक स्वस्थ व्यक्ति नहीं माने जाओगे।

स्वास्थ्य की दूसरी निशानी है, सचेतता, सतर्क और जागरूक रहना। मन की २ स्थितियां होतीं हैं। एक तो शरीर और मन साथ में। और दूसरा शरीर और मन भिन्न दिशाओं की ओर देखते हुए। कभी जब तुम तनाव में हो, तब भी तुम सतर्क रहते हो, लेकिन ये ठीक नहीं है। तुम सतर्क और साथ ही तनाव-मुक्त भी होने चाहिए, इसी को ज्ञानोदय कहते हैं।

भावनात्मक अस्थिरता तनाव होने के कारणों में से एक है। हरेक भावना के लिए हमारी श्वास में एक विशेष लय है। धीमे और लंबे श्वास आनंद और उग्र श्वास तनाव का संकेत देते हैं। जिस तरह से एक शिशु श्वास लेता है वह एक वयस्क के श्वास लेने के तरीके से भिन्न है। यह तनाव ही है जो एक वयस्क की श्वसन पद्धति को भिन्न बनाती है।

हम अपना आधा स्वास्थ्य संपत्ति कमाने में खर्च कर देते हैं और फिर हम वह संपत्ति स्वास्थ्य को वापिस सुधारने में खर्च कर देते हैं। यह किफायती नहीं है। अगर कोई छोटी-मोटी असफलता आ जाए तो फ़िक्र मत करना, तो क्या हुआ? हरेक असफलता एक नई सफलता की ओर बड़ा कदम है। अपना उत्साह बढ़ाओ। अगर तुम में कुशलता है तो तुम किसी भी परिस्थिति में व्यंग को डाल कर उसे पूरी तरह से बदल सकते हो। तनाव - युक्त होना टालो। पशु जब गीले हो जाते हैं या धुल में खेलते हैं, तो बाहर आ कर वे क्या करते हैं? वे अपना सारा शरीर झकझोरते हैं और अपने आप से सब कुछ बाहर निकाल फेंकते हैं। लेकिन हम मनुष्य सारा कुछ, सारा तनाव पकड़ के रखते हैं। किसी कुत्ते, पिल्ले या बिल्ली को देख कर हमें सब कुछ झकझोरना आना चाहिए। जब तुम ऑफिस में आते हो, तो घर को झकझोर दो। जब तुम घर वापिस जाओ, अपनी पीठ से ऑफिस को झकझोर दो।

तनाव से मुक्त होने और हमारी उर्जा को पुनः प्राप्त करने के लिए, प्रकृति ने एक अन्तर्निहित व्यवस्था बनाई है, जो है निद्रा। किसी हद तक, निद्रा तुम्हारी थकान मिटाती है। लेकिन प्रायः शरीर प्रणाली में तनाव रह जाता है। उस प्रकार के तनावों को काबू में रखने के लिए प्राणायाम और ध्यान के तरीके हैं। ये तनाव और थकान से मुक्ति देते हैं, क्षमता बढ़ाते हैं, तुम्हारे तंत्रिका तंत्र और मन को मज़बूत बनाते हैं। ध्यान केन्द्रीकरण नहीं है। ये एक गहरा विश्राम है और जीवन को एक अधिक विशाल दृष्टि से देखना है, जिस के ३ स्वर्णिम नियम हैं - मुझे कुछ नहीं चाहिए, मैं कुछ नहीं करता हूँ और मैं कुछ नहीं हूँ।

👉 जीना इसी का नाम है

श्री आलोक सागर....IIT दिल्ली से इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग में डिग्री, ह्यूस्टन से पी एच डी, टैक्सास से पोस्ट डाक्टरेट, पूर्व आर बी आई गवर्नर श्री रघुराम राजन के प्रोफेसर.... विगत 32 वर्षों से किसी भी तरह के लालच को दरकिनार कर.... मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में आदिवासियों के बीच रहते हुए उनके सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक उत्थान और उनके अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं।

निजी जीवन में दिल्ली में करोड़ों की सम्पत्ति के मालिक श्री आलोक सागर की मां दिल्ली के मिरांडा हाउस में फिजिक्स की प्रोफेसर, पिता भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी थे, छोटा भाई आज भी आई आई टी में प्रोफेसर है।

सब कुछ त्याग कर आदिवासियों के उत्थान के लिये समर्पित, आदिवासियों के साथ सादगी भरा जीवन जी रहे है... रहने को घासफूस की एक झोपड़ी ,पहनने को तीन कुर्ते, आवागमन के लिए एक साइकिल-ताकि प्रकृति को नुकसान न हो।

कई भाषाओं के जानकार श्री सागर आदिवासियों से उन्हीं की भाषा में संवाद करते हैं... उनको पढ़ना लिखना सिखाने के साथ-साथ आसपास के जंगलों में उनसे लाखों फलदार पौधौं का रोपण करवा चुके हैं... फलदार पौधौं का रोपण करवाकर आदिवासियों में गरीबी से लड़ने की उम्मीद जगा रहे हैं... साइकिल से आते जाते बीज इकट्ठा कर आदिवासियों को बोने के लिए देते हैं।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 Jan 2019


👉 आज का सद्चिंतन 1 Jan 2019


शनिवार, 29 दिसंबर 2018

👉 शिकंजी का स्वाद

एक कालेज का छात्र था जिसका नाम था रवि। वह बहुत चुपचाप सा रहता था। किसी से ज्यादा बात नहीं करता था इसलिए उसका कोई दोस्त भी नहीं था। वह हमेशा कुछ परेशान सा रहता था। पर लोग उस पर ज्यादा ध्यान नहीं देते थे।

एक दिन वह क्लास में पढ़ रहा था। उसे गुमसुम बैठे देख कर अध्यापक मोहदय उसके पास आये और क्लास के बाद मिलने को कहा। क्लास खत्म होते ही रवि अध्यापक मोहदय के कमरे में पहुंचा। रवि मैं देखता हूँ कि तुम अक्सर बड़े गुमसुम और शांत बैठे रहते हो, ना किसी से बात करते हो और ना ही किसी चीज में रूचि दिखाते हो! इसका क्या कारण है ?” अध्यापक मोहदय ने पुछा।

रवि बोला, मेरा भूतकाल का जीवन बहुत ही खराब रहा है, मेरी जिन्दगी में कुछ बड़ी ही दुखदायी घटनाएं हुई हैं, मैं उन्ही के बारे में सोच कर परेशान रहता हूँ….. अध्यापक मोहदय ने ध्यान से रवि की बातें सुनी और उसे रविवार को घर पे बुलाया। रवि नियत समय पर अध्यापक मोहदय के घर पहुँच गया। रवि क्या तुम शिकंजी पीना पसंद करोगे? अध्यापक ने पुछा। जी।  रवि ने कहा।

अध्यापक मोहदय ने शिकंजी बनाते वक्त जानबूझ कर नमक अधिक डाल दिया और चीनी की मात्रा  कम ही रखी। शिकंजी का एक घूँट पीते ही रवि ने अजीब सा मुंह बना लिया। अध्यापक मोहदय ने पुछा,  क्या हुआ, तुम्हे ये पसंद नहीं आया क्या? जी, वो इसमे नमक थोड़ा अधिक पड़ गया है…. रवि अपनी बात कह ही रहा था की अध्यापक मोहदय ने उसे बीच में ही रोकते हुए कहा, ओफ़-ओ, कोई बात नहीं मैं इसे फेंक देता हूँ, अब ये किसी काम की नहीं…

ऐसा कह कर अध्यापक मोहदय गिलास उठा ही रहे थे कि रवि ने उन्हें रोकते हुए कहा, नमक थोड़ा सा अधिक हो गया है तो क्या, हम इसमें थोड़ी और चीनी मिला दें तो ये बिलकुल ठीक हो जाएगा। बिलकुल ठीक रवि यही तो मैं तुमसे सुनना चाहता था….अब इस स्थिति की तुम अपनी जिन्दगी से तुलना करो, शिकंजी में नमक का ज्यादा होना जिन्दगी में हमारे साथ हुए बुरे अनुभव की तरह है…. और अब इस बात को समझो, शिकंजी का स्वाद ठीक करने के लिए हम उसमे में से नमक नहीं निकाल सकते, इसी तरह हम अपने साथ हो चुकी दुखद घटनाओं को अपने जीवन से अलग नहीं कर सकते, पर जिस तरह हम चीनी डाल कर शिकंजी का स्वाद ठीक कर सकते हैं उसी तरह पुरानी कड़वाहट मिटाने के लिए जिन्दगी में भी अच्छे अनुभवों की मिठास घोलनी पड़ती है।

यदि तुम अपने भूत का ही रोना रोते रहोगे तो ना तुम्हारा वर्तमान सही होगा और ना ही भविष्य उज्जवल हो पायेगा। अध्यापक मोहदय ने अपनी बात पूरी की। रवि को अब अपनी गलती का एहसास हो चुका था, उसने मन ही मन एक बार फिर अपने जीवन को सही दिशा देने का प्रण लिया।

👉 सदाचार का महान धन

सदाचार-श्रेष्ठ आचरण-अच्छा चालन चलन, यह मानव जीवन का बहुमूल्य खजाना है। सृष्टि के आदि काल से ऋषि मुनियों से लेकर आधुनिक विद्वानों तक यह बात स्वीकार होती आई है कि मनुष्य का गौरव इसमें हैं कि उसका आचरण श्रेष्ठ हो। भलाई, नेकी, उदारता, सेवा, सहायता, सहानुभूति से परिपूर्ण हृदय वाला व्यक्ति सदाचारी कहा जाता है, उसके बाह्य आचरण ऐसे होते हैं, जो दूसरों को स्थूल या सूक्ष्म रीति से निरन्तर लाभ ही पहुँचाते रहते हैं। वह एक भी कार्य ऐसा नहीं करता, जिससे उसकी आत्मा को लज्जित होना पड़े, पश्चाताप करना पड़े या समाज के सामने आँखें नीची झुकानी पड़ें।

मनुष्य चाहे जितना विद्वान् चतुर धनवान, स्वरूप वान, यशस्वी तथा उच्च आसन पर आसीन हो, परन्तु यदि उसका व्यवहार उत्तम नहीं तो वह सब व्यर्थ है, धूलि के बराबर है। खजूर का पेड़ बहुत ऊँचा है, उस पर मीठे फल भी लगते हैं पर उससे दूसरों को क्या लाभ या धूप में तपा हुआ पथिक न तो उसकी छाया में शान्ति लाभ कर सकता है और न भूख से व्याकुल को उसका एक फल प्राप्त हो सकता है। जिसका आचरण श्रेष्ठ है वह किसी की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक एवं धार्मिक उन्नति में जरा भी बाधा पहुँचाने वाला कार्य न करेगा वरन् उससे सहायता ही देगा।

आप अपने आचरणों को ऐसा रखिये, जिससे आपके माता पिता की कीर्ति में वृद्धि हो। आपको अपना मित्र कहते हुए दूसरे लोग गर्व अनुभव करें। छोटे लोग आपका उदाहरण सामने रख कर अपने आचरण को उसी साँचे में ढालने का प्रयत्न करें। स्मरण रखिए, सदाचार मानव जीवन का महान धन है। जो सदाचारी है, असल में वही सच्चा धनी है।

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1943 पृष्ठ 14

👉 Look Introvert for Peace

If you are looking for introvert peace, you must follow the path to spirituality. For this you must turn your extrovert sight inwardly. A bewildered fellow deluded and tired of wandering in the hazy mist of external world, finds immense peace and light in the inner world.

When we understand the illusory nature of the gamut of things and activities in the world around and get introvert, ponder over our inner self, only then we realize that we had lost our way all these days; our cravings, materialistic needs and passions were driving our life and we were running behind the mirage of happiness. But nor we know that nothing can ever satisfy the passions, no one can ever fulfill his ambitions. Attempting to do so is like pouring petrol in fire. Thus, instead of running behind the shadow to catch it, we must turn our back to it. Having a glimpse of the inner treasure detaches us from the perishable pennies for which we had been wasting all our potentials and time. Introvert search takes us near the God and shows the key to infinite joy and peace.

Once we know our real self, grasp the reality of the world, and see the inner light, the nectar-spring of unprecedented peace erupts from within and extinguishes the flames of discontent, desperations and tensions forever. With the rise of the feeling of true fulfillment, there hardly remains any worldly need or desire; every thing in hand or gifted by Nature for survival suffices and every circumstance becomes a source of expanding you.

📖 Akhand Jyoti, March 1941

👉 अंतर्मुखी होने पर ही शांति

अपनी दृष्टि को बाहर से हटाकर अंदर डालना चाहिए, अध्यात्म-पथ का अवलंबन लेना चाहिए। जगत् में इधर-उधर भटकने वाला प्राणी इसी शीतल वृक्ष के नीचे शांति प्राप्त कर सकता है।

जब बाहर की माया रूपी वस्तुओं के भ्रम से विमुख होकर हम अंतर्मुखी होते हैं, आत्मचिंतन करते हैं, तो प्रतीत होता है कि हम अपने स्थान से बहुत दूर भटक गए थे। आवश्यकताएँ कभी पूर्ण नहीं हो सकती हैं, उन्हें जितना ही तृप्त करने का प्रयत्न किया जाएगा, उतना ही वे अग्नि में घृत डालने की तरह और अधिक बढ़ती जाएँगी। इसलिए इस छाया के पीछे दौड़ने की अपेक्षा उसकी ओर से पीठ फेरनी चाहिए और सोचना चाहिए कि हम कौड़ियों के लिए क्यों मारे-मारे फिर रहे हैं, जब कि हमारे अपने घर में भंडार भरा हुआ है। अंतर में मुँह देखने पर, परमात्मा के निकट उपस्थित होने पर, वह ताली मिल जाती है, जिससे सुख और शांति के अक्षय भंडार का दरवाजा खुलता है।

अपनी वास्तविक स्थिति को जानने से, आत्मस्वरूप को पहचानने से, संसार के स्वरूप का सच्चा ज्ञान होने से, शांति की शीतल धारा प्रवाहित होती है, जिसके तट पर असंतोष की ज्वाला जलती हुई नहीं रह सकती। सच्चा संतोष उपलब्ध होे पर उसकी बाह्य आवश्यकताएँ बहुत ही थोड़ी रह जाती हैं और जब थोड़ा चाहने वाले को बहुत मिलता है, तो उसे बड़ा आनन्द प्राप्त होता है।

📖 अखण्ड ज्योति -मार्च 1941 पृष्ठ 19

👉 आत्मचिंतन के क्षण 29 Dec 2018

◾ जो अपनी समीक्षा करने और अपना सुधार कर सकने की आवश्यकता को समझता है और उसके लिए ईमानदारी से तत्पर रहता है, वह गिरी हुई स्थिति में नहीं पड़ा रह सकता। उसके जीवन का विकास होने ही वाला है। उसे प्रगति के पथ पर चलते हुए एक दिन महापुरुषों की श्रेणी में अपनी गणना कराने का अवसर मिलने ही वाला है।

◾ उतावले और जल्दबाज, असंतुष्ट और उद्विग्न व्यक्ति एक प्रकार के अधपगले कहे जा सकते हैं। वे जो कुछ चाहते हैं उसे तुरन्त ही प्राप्त हो जाने की कल्पना किया करते हैं। यदि जरा भी देर लगती है तो अपना मानसिक संतुलन खो बैठते है और प्रगति के लिए अत्यन्त आवश्यक गुण मानसिक स्थिरता को खोकर असंतोष रूपी उस भारी विपत्ति को कंधे पर ओढ़े लेते हैं, जिसका भार लेकर उन्नति की दिशा में कोई आदमी देर तक नहीं चल सकता।

◾ स्वतंत्र बुद्धि की कसौटी पर आप जिस निष्कष्र पर पहुँचते हैं उसे साहस के साथ प्रकट कीजिए, दूसरों को सिखाइए। चाहे आपको कितने ही विरोध-अवरोधों का सामना करना पड़े, आपकी बुद्धि जो निर्णय देती है, उसका गला न घोटें। आप देखेंगे कि इससे आपकी बौद्धिक तेजस्विता, विचारों की प्रखरता बढ़ेगी और आपकी बुद्धि अधिक कार्य कुशल और समर्थ बनेगी।

◾ आनंद का सबसे बड़ा शत्रु है-असंतोष। हम प्रगति के पथ पर उत्साहपूर्वक बढ़ें, परिपूर्ण पुरुषार्थ करें। आशापूर्ण सुंदर भविष्य की रचना के लिए संलग्न रहें, पर साथ ही यह भी ध्यान रखें कि असंतोष की आग में जलना छोड़ें। इस दावानल में आनंद ही नहीं, मानसिक संतुलन और सामर्थ का स्रोत भी समाप्त हो जाता है। असंतोष से प्रगति का पथ प्रशस्त नहीं, अवरुद्ध ही होता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पिशाच प्रेमी या पागल (भाग 2)

देखते हैं कि अबोध किशोर बालकों को लालच या बहकावे में डालकर उन्हें अपनी लिप्सा का साधन बनाने वाले मुहब्बत का दम भरते हैं। उन लड़कों को अपने ही जैसा पतित जीवन बिताने की शिक्षा देने वाले एवं उनका शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य नष्ट कर देने वाले यह कुकर्मी अपने कार्य में प्रेम की गन्ध ढूँढ़ते फिरते हैं!

देखते हैं कि रूप रंग की चटक-मटक पर लोभित होकर स्त्री-पुरुष इन्द्रिय-प्रेरणा से व्याकुल होते हैं, और एक दूसरे को पाने के लिए बेचैन रहते हैं, पत्र व्यवहार चलता है, गुप्त संदेश दौड़ते हैं, और न जाने क्या क्या होता है, प्रेम रस चखने में उनकी बड़ी व्याकुलता होती है और सोचते हैं कि हमारे यह कार्य प्रेम के परिणाम है।

देखते हैं कि बालकों को अमर्यादित भोजन करके उन्हें बीमार बनाने वाली माता बेटे के फोड़े को सड़ने देकर हड्डी गल जाने तक डॉक्टर के पास न ले जाने वाला पिता, भाई के अन्याय में सहायता करने वाला भाई, मित्र को पाप पंक में पड़ने से न रोकने वाला मित्र, बीमार को मनचाहा भोजन देने वाला अविवेकी परिचारक समझता है कि मैं प्रेमी हूँ, मैं दूसरे पक्ष के साथ प्रेम का व्यवहार कर रहा हूँ।

देखते हैं कि साँप को छोड़ देने वाले, चोर को सजा कराने का विरोध कराने वाले, अत्याचारी को क्षमा करने वाले, पाजी की हरकतें चुपचाप सह लेने वाले समझते हैं कि हमने बड़ी दया की है, पुण्य कमा रहे हैं, प्रेम का प्रदर्शन कर रहे हैं।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1942 पृष्ठ 11

http://literature.awgp.in/magazine/AkhandjyotiHindi/1942/May.11

👉 आज का सद्चिंतन 29 Dec 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 Dec 2018


शुक्रवार, 28 दिसंबर 2018

👉 मूर्ख कौन?

किसी गांव में एक सेठ रहता था. उसका एक ही बेटा था, जो व्यापार के काम से परदेस गया हुआ था. सेठ की बहू एक दिन कुएँ पर पानी भरने गई. घड़ा जब भर गया तो उसे उठाकर कुएँ के मुंडेर पर रख दिया और अपना हाथ-मुँह धोने लगी. तभी कहीं से चार राहगीर वहाँ आ पहुँचे. एक राहगीर बोला, "बहन, मैं बहुत प्यासा हूँ. क्या मुझे पानी पिला दोगी?"

सेठ की बहू को पानी पिलाने में थोड़ी झिझक महसूस हुई, क्योंकि वह उस समय कम कपड़े पहने हुए थी. उसके पास लोटा या गिलास भी नहीं था जिससे वह पानी पिला देती. इसी कारण वहाँ उन राहगीरों को पानी पिलाना उसे ठीक नहीं लगा.

बहू ने उससे पूछा, "आप कौन हैं?"

राहगीर ने कहा, "मैं एक यात्री हूँ"

बहू बोली, "यात्री तो संसार में केवल दो ही होते हैं, आप उन दोनों में से कौन हैं? अगर आपने मेरे इस सवाल का सही जवाब दे दिया तो मैं आपको पानी पिला दूंगी. नहीं तो मैं पानी नहीं पिलाऊंगी."

बेचारा राहगीर उसकी बात का कोई जवाब नहीं दे पाया.

तभी दूसरे राहगीर ने पानी पिलाने की विनती की.

बहू ने दूसरे राहगीर से पूछा, "अच्छा तो आप बताइए कि आप कौन हैं?"

दूसरा राहगीर तुरंत बोल उठा, "मैं तो एक गरीब आदमी हूँ."

सेठ की बहू बोली, "भइया, गरीब तो केवल दो ही होते हैं. आप उनमें से कौन हैं?"

प्रश्न सुनकर दूसरा राहगीर चकरा गया. उसको कोई जवाब नहीं सूझा तो वह चुपचाप हट गया.

तीसरा राहगीर बोला, "बहन, मुझे बहुत प्यास लगी है. ईश्वर के लिए तुम मुझे पानी पिला दो"

बहू ने पूछा, "अब आप कौन हैं?"

तीसरा राहगीर बोला, "बहन, मैं तो एक अनपढ़ गंवार हूँ."

यह सुनकर बहू बोली, "अरे भई, अनपढ़ गंवार तो इस संसार में बस दो ही होते हैं. आप उनमें से कौन हैं?'

बेचारा तीसरा राहगीर भी कुछ बोल नहीं पाया.

अंत में चौथा राहगीह आगे आया और बोला, "बहन, मेहरबानी करके मुझे पानी पिला दें. प्यासे को पानी पिलाना तो बड़े पुण्य का काम होता है."

सेठ की बहू बड़ी ही चतुर और होशियार थी, उसने चौथे राहगीर से पूछा, "आप कौन हैं?"

वह राहगीर अपनी खीज छिपाते हुए बोला, "मैं तो..बहन बड़ा ही मूर्ख हूँ."

बहू ने कहा, "मूर्ख तो संसार में केवल दो ही होते हैं. आप उनमें से कौन हैं?"

वह बेचारा भी उसके प्रश्न का उत्तर नहीं दे सका. चारों पानी पिए बगैर ही वहाँ से जाने लगे तो बहू बोली, "यहाँ से थोड़ी ही दूर पर मेरा घर है. आप लोग कृपया वहीं चलिए. मैं आप लोगों को पानी पिला दूंगी"

चारों राहगीर उसके घर की तरफ चल पड़े. बहू ने इसी बीच पानी का घड़ा उठाया और छोटे रास्ते से अपने घर पहुँच गई. उसने घड़ा रख दिया और अपने कपड़े ठीक तरह से पहन लिए.

इतने में वे चारों राहगीर उसके घर पहुँच गए. बहू ने उन सभी को गुड़ दिया और पानी पिलाया. पानी पीने के बाद वे राहगीर अपनी राह पर चल पड़े.

सेठ उस समय घर में एक तरफ बैठा यह सब देख रहा था. उसे बड़ा दुःख हुआ. वह सोचने लगा, इसका पति तो व्यापार करने के लिए परदेस गया है, और यह उसकी गैर हाजिरी में पराए मर्दों को घर बुलाती है. उनके साथ हँसती बोलती है. इसे तो मेरा भी लिहाज नहीं है. यह सब देख अगर मैं चुप रह गया तो आगे से इसकी हिम्मत और बढ़ जाएगी. मेरे सामने इसे किसी से बोलते बतियाते शर्म नहीं आती तो मेरे पीछे न जाने क्या-क्या करती होगी. फिर एक बात यह भी है कि बीमारी कोई अपने आप ठीक नहीं होती. उसके लिए वैद्य के पास जाना पड़ता है. क्यों न इसका फैसला राजा पर ही छोड़ दूं. यही सोचता वह सीधा राजा के पास जा पहुँचा और अपनी परेशानी बताई. सेठ की सारी बातें सुनकर राजा ने उसी वक्त बहू को बुलाने के लिए सिपाही बुलवा भेजे और उनसे कहा, "तुरंत सेठ की बहू को राज सभा में उपस्थित किया जाए."

राजा के सिपाहियों को अपने घर पर आया देख उस सेठ की पत्नी ने अपनी बहू से पूछा, "क्या बात है बहू रानी? क्या तुम्हारी किसी से कहा-सुनी हो गई थी जो उसकी शिकायत पर राजा ने तुम्हें बुलाने के लिए सिपाही भेज दिए?"

बहू ने सास की चिंता को दूर करते हुए कहा, "नहीं सासू मां, मेरी किसी से कोई कहा-सुनी नहीं हुई है. आप जरा भी फिक्र न करें."

सास को आश्वस्त कर वह सिपाहियों से बोली, "तुम पहले अपने राजा से यह पूछकर आओ कि उन्होंने मुझे किस रूप में बुलाया है. बहन, बेटी या फिर बहू के रुप में? किस रूप में में उनकी राजसभा में मैं आऊँ?"

बहू की बात सुन सिपाही वापस चले गए. उन्होंने राजा को सारी बातें बताई. राजा ने तुरंत आदेश दिया कि पालकी लेकर जाओ और कहना कि उसे बहू के रूप में बुलाया गया है.

सिपाहियों ने राजा की आज्ञा के अनुसार जाकर सेठ की बहू से कहा, "राजा ने आपको बहू के रूप में आने के ले पालकी भेजी है."

बहू उसी समय पालकी में बैठकर राज सभा में जा पहुँची.

राजा ने बहू से पूछा, "तुम दूसरे पुरूषों को घर क्यों बुला लाईं, जबकि तुम्हारा पति घर पर नहीं है?"

बहू बोली, "महाराज, मैंने तो केवल कर्तव्य का पालन किया. प्यासे पथिकों को पानी पिलाना कोई अपराध नहीं है. यह हर गृहिणी का कर्तव्य है. जब मैं कुएँ पर पानी भरने गई थी, तब तन पर मेरे कपड़े अजनबियों के सम्मुख उपस्थित होने के अनुरूप नहीं थे. इसी कारण उन राहगीरों को कुएँ पर पानी नहीं पिलाया. उन्हें बड़ी प्यास लगी थी और मैं उन्हें पानी पिलाना चाहती थी. इसीलिए उनसे मैंने मुश्किल प्रश्न पूछे और जब वे उनका उत्तर नहीं दे पाए तो उन्हें घर बुला लाई. घर पहुँचकर ही उन्हें पानी पिलाना उचित था."

राजा को बहू की बात ठीक लगी. राजा को उन प्रश्नों के बारे में जानने की बड़ी उत्सुकता हुई जो बहू ने चारों राहगीरों से पूछे थे.

राजा ने सेठ की बहू से कहा, "भला मैं भी तो सुनूं कि वे कौन से प्रश्न थे जिनका उत्तर वे लोग नहीं दे पाए?"

बहू ने तब वे सभी प्रश्न दुहरा दिए. बहू के प्रश्न सुन राजा और सभासद चकित रह गए. फिर राजा ने उससे कहा, "तुम खुद ही इन प्रश्नों के उत्तर दो. हम अब तुमसे यह जानना चाहते हैं."

बहू बोली, "महाराज, मेरी दृष्टि में पहले प्रश्न का उत्तर है कि संसार में सिर्फ दो ही यात्री हैं– सूर्य और चंद्रमा. मेरे दूसरे प्रश्न का उत्तर है कि बहू और गाय इस पृथ्वी पर ऐसे दो प्राणी हैं जो गरीब हैं. अब मैं तीसरे प्रश्न का उत्तर सुनाती हूं. महाराज, हर इंसान के साथ हमेशा अनपढ़ गंवारों की तरह जो हमेशा चलते रहते हैं वे हैं– भोजन और पानी. चौथे आदमी ने कहा था कि वह मूर्ख है, और जब मैंने उससे पूछा कि मूर्ख तो दो ही होते हैं, तुम उनमें से कौन से मूर्ख हो तो वह उत्तर नहीं दे पाया." इतना कहकर वह चुप हो गई.

राजा ने बड़े आश्चर्य से पूछा, "क्या तुम्हारी नजर में इस संसार में सिर्फ दो ही मूर्ख हैं?"

"हाँ, महाराज, इस घड़ी, इस समय मेरी नजर में सिर्फ दो ही मूर्ख हैं."

राजा ने कहा, "तुरंत बतलाओ कि वे दो मूर्ख कौन हैं."

इस पर बहू बोली, "महाराज, मेरी जान बख्श दी जाए तो मैं इसका उत्तर दूं."

राजा को बड़ी उत्सुकता थी यह जानने की कि वे दो मूर्ख कौन हैं. सो, उसने तुरंत बहू से कह दिया, "तुम निःसंकोच होकर कहो. हम वचन देते हैं तुम्हें कोई सज़ा नहीं दी जाएगी."

बहू बोली, "महाराज, मेरे सामने इस वक्त बस दो ही मूर्ख हैं." फिर अपने ससुर की ओर हाथ जोड़कर कहने लगी, "पहले मूर्ख तो मेरे ससुर जी हैं जो पूरी बात जाने बिना ही अपनी बहू की शिकायत राजदरबार में की. अगर इन्हें शक हुआ ही था तो यह पहले मुझसे पूछ तो लेते, मैं खुद ही इन्हें सारी बातें बता देती. इस तरह घर-परिवार की बेइज्जती तो नहीं होती."

ससुर को अपनी गलती का अहसास हुआ. उसने बहू से माफ़ी मांगी. बहू चुप रही.

राजा ने तब पूछा, "और दूसरा मूर्ख कौन है?"

बहू ने कहा, "दूसरा मूर्ख खुद इस राज्य का राजा है जिसने अपनी बहू की मान-मर्यादा का जरा भी खयाल नहीं किया और सोचे-समझे बिना ही बहू को भरी राजसभा में बुलवा लिया."

बहू की बात सुनकर राजा पहले तो क्रोध से आग बबूला हो गया, परंतु तभी सारी बातें उसकी समझ में आ गईं. समझ में आने पर राजा ने बहू को उसकी समझदारी और चतुराई की सराहना करते हुए उसे ढेर सारे पुरस्कार देकर सम्मान सहित विदा किया.

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