गुरुवार, 6 दिसंबर 2018

👉 आत्मचिंतन के क्षण 6 Dec 2018


कहते हैं कि शनिश्चर और राहू की दशा सबसे खराब होती है और जब वे आती हैं तो बर्बाद कर देती हैं। इस कथन में कितनी सचाई है यह कहना कठिन है, पर यह नितान्त सत्य है कि आलस्य को शनिश्चर और प्रमाद को-समय की बर्बादी को-राहू माना जाय तो इनकी छाया पड़ने मात्र से मनुष्य की बर्बादी का पूरा-पूरा सरंजाम बन जाता है।

दुःख और कठिनाइयेां में ही सच्चे हृदय से परमात्मा की याद आती है। सुख-सुविधाओं में तो भोग और तृप्ति की ही भावना बनी रहती है। इसलिए उचित यही है कि विपत्तियों का सच्चे हृदय से स्वागत करें। परमात्मा से माँगने लायक एक ही वरदान है कि वह कष्ट दे, मुसीबतें दें, ताकि मनुष्य अपने लक्ष्य के प्रति सावधान व सजग बना रहे।

निराशा वह मानवीय दुर्गुण है, जो बुद्धि को भ्रमित कर देती है। मानसिक शक्तियों को लुंज-पुंज कर देती है। ऐसा व्यक्ति आधे मन से डरा-डरा सा कार्य करेगा। ऐसी अवस्था में सफलता प्राप्त कर सकना संभव ही कहाँ होगा? जहाँ आशा नहीं वहाँ प्रयत्न नहीं। बिना प्रयत्न के ध्येय की प्राप्ति न आज तक कोई कर सका है, न आगे संभव है।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 यही माया है (Kahani)

एक दिन नारद ने भगवान से पूछा- “माया कैसी है?” भगवान मुस्करा दिये और बोले- “किसी दिन प्रत्यक्ष दिखा देंगे।"

अवसर मिलने पर भगवान नारद को साथ लेकर मृत्युलोक को चल दिये। रास्ते में एक लम्बा रेगिस्तान पड़ा। भगवान ने कहा- “नारद! बहुत जोर की प्यास लगी है। कहीं से थोड़ा पानी लाओ।”

नारद कमंडल लेकर चल दिये। थोड़ा आगे चलने पर नींद आ गई और एक खजूर के झुरमुट में सो गये। पानी लाने की याद ही न रही।

सोते ही एक मीठा सपना देखा किसी वनवासी के दरवाजे पर पहुँचे हैं। द्वार खटखटाया तो एक सुन्दर युवती निकली। नारद को सुहावनी लगी सो घर में चले गये और इधर उधर की वार्ता में निमग्न हो गये। नारद ने अपना परिचय दिया और भील कन्या से विवाह का प्रस्ताव किया। उसका परिवार सहमत हो गया और तुरन्त साज सामान इकट्ठा करके विवाह कर दिया। नारद सुन्दर पत्नी के साथ बड़े आनन्दपूर्वक दिन बिताने लगे। कुछ ही दिनों में क्रमशः उनके तीन पुत्र भी हो गये।

एक दिन भयंकर वर्षा हुई झोंपड़ी के पास रहने वाली नदी में बाढ़ आ गई। नारद अपने परिवार को लेकर बचने के लिए भागे। पीठ और कंधे पर लदे हुए तीनों बच्चे उस भयंकर बाढ़ में बह गये। यहाँ तक कि पत्नी का हाथ पकड़ने पर भी वह रुक न सकी और उसी बाढ़ में बह गई जिसमें उसके बच्चे बह गये थे।

नारद किनारे पर निकले तो आए पर सारा परिवार गँवा बैठने पर फूट-फूट कर रोने लगे। सोने और सपने में एक घण्टा बीत चुका था। उनके मुख से रुदन की आवाज अब भी निकल रही थी। पर झुरमुट में औंधे मुँह ही उनींदे पड़े हुए थे।

भगवान सब समझ रहे थे। वे नारद को ढूँढ़ते हुए खजूर के झुरमुट में पहुँचे उन्हें सोते से जगाया। आँसू पोंछे और रुदन रुकवाया। नारद हड़बड़ा कर बैठ गये।

भगवान ने पूछा- ‘‘हमारे लिए पानी लाने गये थे सो क्या हुआ?” नारद ने सपने में परिवार बसने और बाढ़ में बहने के दृश्य में समय चला जाने के कारण क्षमा माँगी।

भगवान ने कहा- ‘‘देखा नारद! यही माया है।”

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 December 2018

👉 आज का सद्चिंतन 6 December 2018


बुधवार, 5 दिसंबर 2018

जीवन की सबसे बड़ी सिख

एक समय की बात है, एक जंगल में सेब का एक बड़ा पेड़ था. एक बच्चा रोज उस पेड़ पर खेलने आया करता था. वह कभी पेड़ की डाली से लटकता, कभी फल तोड़ता, कभी उछल कूद करता था, सेब का पेड़ भी उस बच्चे से काफ़ी खुश रहता था.कई साल इस तरह बीत गये. अचानक एक दिन बच्चा कहीं चला गया और फिर लौट के नहीं आया, पेड़ ने उसका काफ़ी इंतज़ार किया पर वह नहीं आया. अब तो पेड़ उदास हो गया था.

काफ़ी साल बाद वह बच्चा फिर से पेड़के पास आया पर वह अब कुछ बड़ा हो गया था. पेड़ उसे देखकर काफ़ी खुश हुआ और उसे अपने साथ खेलने के लिए कहा.

पर बच्चा उदास होते हुए बोला कि अब वह बड़ा हो गया है अब वह उसके साथ नहीं खेल सकता. बच्चा बोला की, “अब मुझे खिलोने से खेलना अच्छा लगता है, पर मेरे पास खिलोने खरीदने के लिए पैसे नहीं है”
पेड़ बोला, “उदास ना हो तुम मेरे फल (सेब) तोड़ लो और उन्हें बेच कर खिलोने खरीद लो. बच्चा खुशी खुशी फल (सेब) तोड़के ले गया लेकिन वह फिर बहुत दिनों तक वापस नहीं आया. पेड़ बहुत दुखी हुआ.

अचानक बहुत दिनों बाद बच्चा जो अब जवान हो गया था वापस आया, पेड़ बहुत खुश हुआ और उसे अपने साथ खेलने के लिए कहा.
पर लड़के ने कहा कि, “वह पेड़ के साथ नहीं खेल सकता अब मुझे कुछ पैसे चाहिए क्यूंकी मुझे अपने बच्चों के लिए घर बनाना है.”
पेड़ बोला, “मेरी शाखाएँ बहुत मजबूत हैं तुम इन्हें काट कर ले जाओ और अपना घर बना लो. अब लड़के ने खुशी-खुशी सारी शाखाएँ काट डालीं और लेकर चला गया. 

उस समय पेड़ उसे देखकर बहोत खुश हुआ लेकिन वह फिर कभी वापस नहीं आया. और फिर से वह पेड़ अकेला और उदास हो गया था.

अंत में वह काफी दिनों बाद थका हुआ वहा आया.
तभी पेड़ उदास होते हुए बोला की, “अब मेरे पास ना फल हैं और ना ही लकड़ी अब में तुम्हारी मदद भी नहीं कर सकता.

बूढ़ा बोला की, “अब उसे कोई सहायता नहीं चाहिए बस एक जगह चाहिए जहाँ वह बाकी जिंदगी आराम से गुजार सके.” पेड़ ने उसे अपनी जड़ो मे पनाह दी और बूढ़ा हमेशा वहीं रहने लगा.

यही कहानी आज हम सब की भी है. मित्रों इसी पेड़ की तरह हमारे माता-पिता भी होते हैं, जब हम छोटे होते हैं तो उनके साथ खेलकर बड़े होते हैं और बड़े होकर उन्हें छोड़ कर चले जाते हैं और तभी वापस आते हैं जब हमें कोई ज़रूरत होती है. धीरे-धीरे ऐसे ही जीवन बीत जाता है. हमें पेड़ रूपी माता-पिता की सेवा करनी चाहिए ना की सिर्फ़ उनसे फ़ायदा लेना चाहिए.

इस कहानी में हमें दिखाई देता है की उस पेड़ के लिए वह बच्चा बहुत महत्वपूर्ण था, और वह बच्चा बार-बार जरुरत के अनुसार उस सेब के पेड़ का उपयोग करता था, ये सब जानते हुए भी की वह उसका केवल उपयोग ही कर रहा है. इसी तरह आज-कल हम भी हमारे माता-पिता का जरुरत के अनुसार उपयोग करते है. 

और बड़े होने पर उन्हें भूल जाते है. हमें हमेशा हमारे माता-पिता की सेवा करनी चाहिये, उनका सम्मान करना चाहिये. और हमेशा, भले ही हम कितने भी व्यस्त क्यू ना हो उनके लिए थोडा समय तो भी निकलते रहना चाहिये.

👉 सत्य पथ तुमको बुलाता है (Kavita)


प्रतिष्ठा पा गई मूर्ति मन्दिर में अमंगल की।
कल्पना चीखती है, छटपटाती है मधुर फल की॥ 

हृदय का रक्त करे दान यह मन्दिर गढ़ा हमने, 
अनेकों शीश हँस-हँस कर दिये इस पर चढ़ा हमने, 

गिरा गौरव युगों से था किया फिर से खड़ा हमने, 
कठिनता से किया था प्राप्त अमृत का घड़ा हमने, 

सुधा का घट हमारे पास तक आ ही नहीं पाया- कि होने लग गई वर्षा प्रतीक्षा पर हलाहल की।

प्रतिष्ठा पा गई है मूर्ति मन्दिर में अमंगल की॥

जहाँ देखो- वही पद के लिये पागल पिपासा है,
 घृणा, छल, द्वेष, हिंसा का भयंकरतम कुहासा है, 

इन्हीं सबको समझ हमने लिया आधार जीवन का,
 न यह देखा कि है कितना बड़ा संसार जीवन का, 

सुयश सौंदर्य मैला हो रहा है मान-सरवर का- उगलने लग गये है हंस के दल राशि कजल की।

 प्रतिष्ठा पा गई मूर्ति मन्दिर में अमंगल की॥ 

चलो! लौटो कुपथ से- सत्य पथ तुमको बुलाता है, 
कुपथ देता नहीं कुछ- स्त्रोत जीवन के सुखाता हे, 

समय की घोषणा सुनकर जो अपना पथ बदलते है- वही उत्कर्ष के तरु फूलते हैं और फलते हैं, 

फंसा है संकटों में राष्ट्र देखो! आँख मत मूँदो,
 चिरन्तन सत्य के सिर पर न लाठी मारिये छल की। 
प्रतिष्ठा पा गई मूर्ति मन्दिर में अमंगल की॥

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 December 2018


👉 आज का सद्चिंतन 5 December 2018


मंगलवार, 4 दिसंबर 2018

👉 दुनियां क्या कहेगी...

एक साधू किसी नदी के पनघट पर गया और पानी पीकर पत्थर पर सिर रखकर सो गया।

पनघट पर पनिहारिन आती-जाती रहती हैं तो तीन-चार पनिहारिनें पानी के लिए आईं तो एक पनिहारिन ने कहा- "आहा! साधु हो गया, फिर भी तकिए का मोह नहीं गया...
पत्थर का ही सही, लेकिन रखा तो है।"

पनिहारिन की बात साधु ने सुन ली... उसने तुरंत पत्थर फेंक दिया... दूसरी बोली,"साधु हुआ, लेकिन खीज नहीं गई.. अभी रोष नहीं गया, तकिया फेंक दिया।" तब साधु सोचने लगा, अब वह क्या करें ?

तब तीसरी पनिहारिन बोली,"बाबा! यह तो पनघट है, यहां तो हमारी जैसी पनिहारिनें आती ही रहेंगी, बोलती ही रहेंगी, उनके कहने पर तुम बार-बार परिवर्तन करोगे तो साधना कब करोगे?"

लेकिन एक चौथी पनिहारिन ने बहुत ही सुन्दर और एक बड़ी अद्भुत बात कह दी- "साधु, क्षमा करना, लेकिन हमको लगता है, तूमने सब कुछ छोड़ा लेकिन अपना चित्त नहीं छोड़ा है, अभी तक वहीं का वहीं बने हुए है। दुनिया पाखण्डी कहे तो कहे, तूम जैसे भी हो, हरिनाम लेते रहो।" सच तो यही है, दुनिया का तो काम ही है कहना...

आप ऊपर देखकर चलोगे तो कहेंगे... "अभिमानी हो गए।"
नीचे देखकर चलोगे तो कहेंगे... "बस किसी के सामने देखते ही नहीं।"
आंखे बंद कर दोगे तो कहेंगे कि... "ध्यान का नाटक कर रहा है।"
चारो ओर देखोगे तो कहेंगे कि... "निगाह का ठिकाना नहीं। निगाह घूमती ही रहती है।"

और परेशान होकर आंख फोड़ लोगे तो यही दुनिया कहेगी कि... "किया हुआ भोगना ही पड़ता है।"

ईश्वर को राजी करना आसान है, लेकिन संसार को राजी करना असंभव है।
दुनिया क्या कहेगी, उस पर ध्यान दोगे तो आप अपना ध्यान नहीं लगा पाओगे...

👉 आज का सद्चिंतन 4 December 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 December 2018


👉 The Roots of Fulfillment

Most thinkers, philosophers of the world opine that self-evolution is a natural desire, and tendency of every living being. In fact this is what lies behind one’s quest for progress and joy… All efforts, all competitions and struggles for worldly possessions, sensual pleasures, ego-satisfaction emanate from this rootcause in the deepest depth, though we don’t realize it because of our extrovert attitude and illusions of letting the worldly substances and circumstances as the keys to a treasure of joy.

One earns money with hard work and keeps saving it to get more and more. Why? Because, he ‘feels’ it like a source of joy. But the same fellow might spend his savings in gorgeous arrangements of his child’s marriage? Why? Because that might give him a ‘feeling’ of greater pleasure of making his child happy or gaining prestige in the society or what not…! A dacoit risks his life in bringing huge wealth in loot, but what does he do of it? He might just throw it in drinking liquor; because for him that might appear to be a greater source of pleasure than saving the money or using it some other ways. If the savings are consumed in religious alms or treatment of a disease, one does not feel as bad as one would, if the same amount was lost due to burglary.

So what we see common in all these examples and perhaps in every action of our life is that one opts for what he or she feels or thinks as more satisfying, although this satisfaction or joy might be just circumstan tial, illusory and short-lived. Deeper thinking would indicate that the root of this quest for joy or fulfillment lies beneath the sublime core of eternal quest of the self for ascent, for betterment, for unbounded evolution… Then we would then attempt for the absolute unalloyed bliss, ultimate fulfillment.

📖 Akhand Jyoti, June 1940

👉 आत्मिक तृप्ति का आधार

संसार के प्रमुख दार्शनिकों का मत है कि जीव की स्वाभाविक इच्छा और अभिलाषा आत्मिक उन्नति की है। भौतिक सुविधाओं को लोग इकट्ठा करते हैं, इंद्रियों के विषय भोगते हैं, पर बारीक दृष्टि से देखने पर पता चलता है कि ये सब कार्य भी आत्मिक तृप्ति के लिए किये जाते हैं। यह दूसरी बात है कि धुँधली दृष्टि होने के कारण लोग नकल को ही असल समझ बैठें। आपने बड़े परिश्रम से धन इकट्ठा किया है, किंतु विवाह में उसे बड़ी उदारता के साथ खर्च कर देते हैं।

उस दिन एक पैसे के लिए प्राण दिये करते थे, आज आप अशर्फियाँ क्यों लुटा रहे हैं? इसलिए कि आज आप धन संचित रखने की अपेक्षा उसे खर्च कर डालने में अधिक सुख का अनुभव करते हैं। डाकू जिस धन को जान हथेली पर रखकर लाया थ, उसे मदिरा पीने में इस तरह क्यों उड़ा रहा है? इसलिए कि वह मदिरा पीने के आनंद को धन जोड़ने की अपेक्षा अधिक महत्त्व देता है।

बीमारी में, धर्म-कार्यों में, या अन्य बातों में काफी पैसा खर्च हो जाता है, किन्तु मनुष्य कुछ भी रंज नहीं करता। यही पैसा यदि चोरी में चला गया होता तो उसे बड़ा दु:ख होता। इन उदाहरणों में आप देखते हैं कि जिनका अमूल्य जीवन धन-संचय में खर्च हुआ जा रहा है, वे अपने उस जीवनरस को भी एक समय बड़ी लापरवाही के साथ उड़ा देते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि उन खर्चीले कामों में आदमी अधिक आनंद का अनुभव करता है।

📖 अखण्ड ज्योति- जून 1940

सोमवार, 3 दिसंबर 2018

👉 एक वेश्या ने कराया था विवेकानंद को संन्यासी होने का अहसास

स्वामी जी ने शिकागो की धर्म संसद में भाषण देकर दुनिया को ये एहसास कराया कि भारत विश्व गुरु है। अमेरिका जाने से पहले स्वामी विवेकानंद जयपुर के एक महाराजा के महल में रुके थे। महाराजा राजा विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस का भक्त था। विवेकानंद के स्वागत के लिए राजा ने एक भव्य आयोजन किया। इसमें वेश्याओं को भी बुलाया गया। शायद राजा यह भूल गया कि वेश्याओं के जरिए एक संन्यासी का स्वागत करना ठीक नहीं है। विवेकानंद उस वक्त अपरिपक्‍व थे। वे अभी पूरे संन्‍यासी नहीं बने थे। वह अपनी कामवासना और हर चीज दबा रहे थे। जब उन्‍होंने वेश्‍याओं को देखा तो अपना कमरा बंद कर लिया। जब महाराजा को गलती का अहसास हुआ तो उन्होंने विवेकानंद से माफी मांगी।

महाराजा ने कहा कि उन्होंने वेश्या को इसके पैसे दे दिए हैं, लेकिन ये देश की सबसे बड़ी वेश्या है, अगर इसे ऐसे चले जाने को कहेंगे तो उसका अपमान होगा। आप कृपा करके बाहर आएं। विवेकानंद कमरे से बाहर आने में डर रहे थे। इतने में वेश्या ने गाना गाना शुरू किया, फिर उसने एक सन्यासी गीत गाया। गीत बहुत सुंदर था। गीत का अर्थ था- ''मुझे मालूम है कि मैं तुम्‍हारे योग्‍य नहीं, तो भी तुम तो जरा ज्‍यादा करूणामय हो सकते थे। मैं राह की धूल सही, यह मालूम मुझे। लेकिन तुम्‍हें तो मेरे प्रति इतना विरोधात्‍मक नहीं होना चाहिए। मैं कुछ नहीं हूं। मैं कुछ नहीं हूं। मैं अज्ञानी हूं। एक पापी हूं। पर तुम तो पवित्र आत्‍मा हो। तो क्‍यों मुझसे भयभीत हो तुम?''

विवेकानंद ने अपने कमरे इस गीत को सुना, वेश्‍या रोते हुए गा रही थी। उन्होंने उसकी स्थिति का अनुभव किया और सोचा कि वो क्या कर रहे हैं। विवेकानंद से रहा नहीं गया और उन्होंने कमरे का गेट खोल दिया। विवेकानंद एक वेश्या से पराजित हो गए। वो बाहर आकर बैठ गए। फिर उन्होंने डायरी में लिखा, ''ईश्‍वर से एक नया प्रकाश मिला है मुझे। डरा हुआ था मैं। जरूर कोई लालसा रही होगी मेरे भीतर। इसीलिए डर गया मैं। किंतु उस औरत ने मुझे पूरी तरह हरा दिया। मैंने कभी नहीं देखी ऐसी विशुद्ध आत्‍मा।'' उस रात उन्‍होंने अपनी डायरी में लिखा, ''अब मैं उस औरत के साथ बिस्‍तर में सो भी सकता था और कोई डर नहीं होता।''

सीख- इस घटना से विवेकानंद को तटस्थ रहने का ज्ञान मिला, आपका मन दुर्बल और निसहाय है। इसलिए कोई दृष्‍टि कोण पहले से तय मत करो।

👉 आज का सद्चिंतन 3 December 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 December 2018


👉 Quest for Joy

Man wanders all the time, throughout his life, in search of joy, blissful peace, but remains dismayed and astray…. Acquisition of hoards of wealth, worldly comforts, good health, delicious food, palatial house, vehicles, servants, gorgeous cloths, beauty, beloved family, faithful friends, supporters all around, powers, prestige, name and fame, security…., and what not he looks for? People who lack in any of these strive for their possession; those, who already have, try to possess more with new passions…

This scenario is like that of the tale of the swan (flamingo), which is hunting for the pearl since Ages, but finds nothing but a drop of dew… Why? Because, it did not really search for the pearl; did not even turn his face in the direction of the grand Ocean “Mansarovar” where the pearl is hidden in the depths… It did not gather the courage and strength to fly so long… Short-sighted intellect and pleasure-hungry mind advised it – “what is the guarantee that you will find that unseen “Mansarovar”; and who knows whether there will really be any pearl and you would trace it” so it satisfied itself with the shining drops of dew; licked it and thought it has quenched the thirst…; it flew for sometime and the thirst recurred with greater intensity.

The cycle continued… This is what happens with most of us who keep searching for ‘immortal’ joy in the mirage of perishable world, keep accumulating more of what gives only a momentary pleasure but keeps us away from the sight of real bliss…

📖 Akhand Jyoti, March. 1940

👉 आनंद की खोज

आनंद की खोज में भटकता हुआ इंसान, दरवाजे-दरवाजे पर टकराता फिरता है। बहुत-सा रुपया जमा करें, उत्तम स्वास्थ्य रहे, सुस्वाद भोजन करे, सुंदर वस्त्र पहने, बढ़िया मकान और सवारियाँ हों, नौकर-चाकर हों, पुत्र, पुत्रियों, बंधुओं से घर भरा हो, उच्च अधिकार प्राप्त हों, समाज में प्रतिष्ठा हो, कीर्ति हो। ये चीजें आदमी प्राप्त करता है। जिन्हें ये चीजें उपलब्ध नहीं होतीं, वे प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। जिनके पास हैं, वे उससे अधिक लेने का प्रयत्न करते हैं।

इन सब तस्वीरों में आनंद की खोज करते-करते चिरकाल बीत गया, पर राजहंस को ओस ही मिली। मोती! उसकी तो खोज ही नहीं की, मानसरोवर की ओर तो मुँह ही नहीं किया, लंबी उड़ान भरने की तो हिम्मत ही नहीं बाँधी। मन ने कहा-जरा इसे और देख लूँ। आँखों से न दीख पड़ने वाले मानसरोवर में मोती मिल ही जाएंगे, इसकी क्या गारंटी है। फिर ओस चाटी और फड़फड़ाया, फिर यही पहिया चलता रहता है। आपने उनमें खोजा, कुछ क्षण पाया भी, परंतु ओस की बूंदें ठहरीं, वे दूसरे ही क्षण जमीन पर गिर पड़ीं और धूल में समा गईं।
यही नष्ट होने की आशंका अधिक संचय के लिए प्रेरित करती रहती है, फिर भी नाशवान चीजों का नाश होता ही है।

📖 अखण्ड ज्योति- मार्च 1940

रविवार, 2 दिसंबर 2018

👉 मां की शिक्षा

बात उन दिनों की है जब अमेरिका में दास प्रथा चरम पर थी। एक धनाढ्य ने बेंगर नामक दास को खरीदा। बेंगर न केवल परिश्रमी था बल्कि गुणवान भी था। वह धनी व्यक्ति बेंगर से पूर्ण रूपेण संतुष्ट था और उस पर विश्वास भी किया करता था।

एक दिन वह बेंगर को लेकर दासमंडी गया, जहां लोगों का जानवरों की भांति कारोबार होता था। उस धनी ने एक और दास खरीदने की इच्छा जाहिर की तो बेंगर ने एक बूढ़े की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘मालिक! उस बूढ़े को खरीद लीजिए।’

बेंगर के साथ उस बूढ़े को खरीदकर धनी घर चला गया। बूढ़े के साथ बेंगर बहुत खुश था। वह उसकी भलीभांति सेवा किया करता था।

एक दिन उस धनी ने बेंगर को उस बूढ़े की सेवा करते देखा तो इसका कारण पूछा। बेंगर ने बताया, ‘मालिक! बूढ़ा मेरा कुछ भी नहीं लगता बल्कि यह मेरा सबसे बड़ा शत्रु है। इसी ने मुझे बचपन में गुलाम के रूप में बेच डाला था। बाद में यह खुद भी पकड़ा गया और दास बन गया। उस दिन मैंने इस बूढ़े को दासमंडी में पहचान लिया था। मैं इसकी सेवा इसलिए करता हूं कि मेरी मां ने मुझे शिक्षा दी थी कि शत्रु यदि निर्वस्त्र हो तो उसे वस्त्र दो, भूखा हो तो रोटी हो, प्यासा हो तो पानी पिलाओ। इसलिए मैं इसकी सेवा करता हूं।’

इतना सुनकर वह धनाढ्य व्यक्ति बड़ा प्रसन्न हुआ और उसने उसी दिन से बेंगर को स्वतंत्र कर दिया।

👉 आज का सद्चिंतन 2 December 2018


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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