बुधवार, 7 नवंबर 2018

👉 साधना की अनुकूलता

🔶 साधना के समय साधक को साहस और धैर्य रखने की आवश्यकता है। सिद्धि मिलने में कितना भी समय क्यों ना लगे साधक को घबराना नहीं चाहिए। यहाँ तक कि यदि सिद्धि मिलने के पहले कोई अनर्थकारी घटना भी घट जावे तब भी घबराकर अपनी साधना नहीं छोड़ देनी चाहिए। भगवान सर्वशक्ति मान हैं, इसलिए वे कितने ही भयंकर गड्ढे में चाहे क्यों न फेंक दें फिर भी किसी न किसी दिन वे हमारा वहाँ से अवश्य उद्धार करेंगे यह निश्चित है।

🔷 साधक के लिए उत्तेजना और व्याकुलता भी छोड़ने जैसी है। कभी कभी साधक को दिखाई देता है। जैसे कि वह सिद्धि के क्षेत्र में बहुत दूर पहुँच गया है और कभी भी पीछे मालूम होने लगता है कि वह जहाँ का तहीं है, तिलमात्र भी आगे नहीं बढ़ा ऐसे ही अवसरों पर उत्तेजना या घबराहट आ जाती है। लेकिन जिन लोगों का आत्मसमर्पण का व्रत सम्पन्न हो चुका होता है वे इन सबसे मुक्त रहते हुए निश्चित और संतुष्ट रहते हैं। और इसीलिए उन्हें सिद्धि भी शीघ्र ही प्राप्त होती है।

🔶 यद्यपि साधना का काम अत्यन्त कठिन है। पर जो आरंभ में दृढ़ विश्वास के साथ अग्रसर होते हैं उनके लिए यह मार्ग अत्यन्त सरल हो जाता है। क्योंकि दृढ़ता होने पर मनुष्य की प्रकृति साधना के अनुकूल हो जाती है और साधना की अनुकूलता ही सिद्धि प्राप्ति का साधन है।

✍🏻 श्री अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति – नवम्बर 1948 पृष्ठ 5

👉 दीया धरती का, ज्योति आकाश की

🔶 दीपावली पर दीये जलाते समय दीये के सच को समझना निहायत जरूरी है। अन्यथा दीपावली की प्रकाशपूर्ण रात्रि के बाद केवल बुझे हुए मिट्टी के दीये हाथों में रह जाएँगे। आकाशीय-अमृत ज्योति खो जाएगी। अन्धेरा फिर से सघन होकर घेर लेगा। जिन्दगी की घुटन और छटपटाहट फिर से तीव्र और घनी हो जाएगी। दीये के सच की अनुभूति को पाए बिना जीवन के अवसाद और अन्धेरे को सदा-सर्वदा के लिए दूर कर पाना कठिन ही नहीं नामुमकिन भी है।
  
🔷 दीये का सच दीये के स्वरूप में है। दीया भले ही मरणशील मिट्टी का हो, परन्तु ज्येाति तो अमृतमय आकाश की है। जो धरती का है, वह धरती पर ठहरा है, लेकिन ज्योति तो निरन्तर आकाश की ओर भागी जा रही है। ठीक दीये की ही भाँति मनुष्य की देह भी मिट्टी ही है, किन्तु उसकी आत्मा मिट्टी की नहीं है। वह तो इस मिट्टी के दीये में जलने वाली अमृत ज्योति है। हालांकि अहंकार के कारण वह इस मिट्टी की देह से ऊपर नहीं उठ पाती है।
  
🔶 मिट्टी के दीये में मनुष्य की जिन्दगी का बुनियादी सच समाया है। ‘अप्प दीपो भव’ कहकर भगवान् बुद्ध ने इसी को उजागर किया है। दीये की माटी अस्तित्त्व की प्रतीक है, तो ज्योति चेतना की। परम चेतना परमात्मा की करूणा ही स्नेह बनकर वाणी की बातों को सिक्त किए रहती है। चैतन्य ही प्रकाश है, जो समूचे अस्तित्त्व को प्रभु की करूणा के सहारे सार्थक करता है।
  
🔷 मिट्टी सब जगह सहज सुलभ और सबकी है, किन्तु ज्योति हर एक की अपनी और निजी है। केवल मिट्टी भर होने से कुछ नहीं होता। इसे कुम्भकार गुरु के चाक पर घूमना पड़ता है। उसके अनुशासन के आँवे में तपना पड़ता है। तब जाकर कहीं वह सद्गुरु की कृपा से परमात्मा की स्नेह रूपी करुणा का पात्र बनकर दीये का रूप ले लेती है। ऐसा दीया, जिसमें आत्म ज्योति प्रकाशित होती है। दीपावली पर दीये तो हजारों-लाखों जलाये जाते हैं, पर इस एक दीये के बिना अन्धेरा हटता तो है, पर मिटता नहीं। अच्छा हो कि इस दीपावली में दीये के सच की इस अनुभूति के साथ यह एक दीया और जलाएँ, ताकि इस मिट्टी के देह दीप में आत्मा की ज्योति मुस्करा सके।

✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप

👉 दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं























जब मन में हो मौज बहारों की
चमकाएँ चमक सितारों की,
जब ख़ुशियों के शुभ घेरे हों
तन्हाई  में  भी  मेले  हों,
आनंद की आभा होती है
उस रोज़ 'दिवाली' होती है ।

       जब प्रेम के दीपक जलते हों
       सपने जब सच में बदलते हों,
       मन में हो मधुरता भावों की
       जब लहके फ़सलें चावों की,
       उत्साह की आभा होती है
       उस रोज़ दिवाली होती है ।

जब प्रेम से मीत बुलाते हों
दुश्मन भी गले लगाते हों,
जब कहींं किसी से वैर न हो
सब अपने हों, कोई ग़ैर न हो,
अपनत्व की आभा होती है
उस रोज़ दिवाली होती है ।

       जब तन-मन-जीवन सज जाएं
       सद्-भाव  के बाजे बज जाएं,
       महकाए ख़ुशबू ख़ुशियों की
      मुस्काएं चंदनिया सुधियों की,
      तृप्ति  की  आभा होती  है
      उस रोज़ 'दिवाली' होती है .।               

आदरणीय अटल बिहारी वाजपेयी जी
आपको सादर सपरिवार दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏🙏

💐💐 जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनायें ।💐💐

युवाओं के पथ प्रदर्शक,जन्मदिवस पर तुम्हें बधाई ।।
नए युग के हे मार्गदर्शक, जन्म दिवस पर तुम्हें बधाई ।।

वैज्ञानिक अध्यात्म वाद को, आपसे संबल मिला है ।
अध्यात्म से उज्जवल भविष्यत औ सुनहरा कल मिला है।।
आप से ही इस धरा ने, धर्म की वैज्ञानिकता पाई।
युवाओं के पथ प्रदर्शक,जन्मदिवस पर तुम्हें बधाई।।

धर्म आडंबर नहीं, सत्कर्म है, सब सीख रहे हैं।
राजनीति से धर्म ऊपर, आप से सब सीख रहे हैं।।
 आप ने ही देश में, त्याग की गरिमा बताई ।
युवाओं के पथ प्रदर्शक,जन्मदिवस पर तुम्हें बधाई।।

युग गीता से युवाओं को, एक नया आयाम मिला है।
नवधा भक्ति से जन-जन को, नए युग का राम मिला है ।।
स्वयं को ऊंचा उठाने, ध्यान की विद्या बताई।
युवाओं के पथ प्रदर्शक,जन्मदिवस पर तुम्हें बधाई।।

उमेश यादव शांतिकुंज हरिद्वार

👉 आज का सद्चिंतन 7 November 2018


👉 आज का सद्चिंतन 7 November 2018


👉 आज का सद्चिंतन 7 November 2018


👉 आज का सद्चिंतन 7 November 2018


👉 आज का सद्चिंतन 7 November 2018


सोमवार, 5 नवंबर 2018

👉 ये_हमारी_आपकी_जिम्मेदारी_है।

🔶 दूर सीमा पर चीन जब कुछ किलोमीटर अंदर घुसता है तो हम आप सब तमतमा जाते हैं।

🔷 किन्तु इन गरीबों की होली दीवाली ही नहीं बल्कि इनके भोजन की थाली तक पर चीन कब्ज़ा कर रहा है। इस चीनी आक्रमण से जूझने में इन्हें हमारी आपकी सहायता और सहयोग की आवश्यकता है।

🔶 आइये इस दीपावली पर इन मेहनतकश किन्तु गरीब कुम्हारों से भी कुछ न कुछ जरूर खरीदें वह भी बिना किसी तोलमोल के।

🔷 कुल 50 पैसे मूल्य और 2-3 रु की लागत वाली पैकिंग/मार्केटिंग/एडवरटाइज़िंग वाला बोतलबंद पानी हम 20 रु में खरीदते हैं, वो भी तोलमोल का एक शब्द बिना बोले हुए।
अतः हमारी श्रेष्ट प्राचीन परम्पराओं को विषम परिस्थितियों में भी जीवन दे रहे ये मेहनतकश गरीब कुम्हार भी अपने घरों में सुख और संतोष के साथ दीपावली का दीप जला सकें, क्या ये हमारा आपका दायित्व नहीं है.?

🔶 ये हम से कुछ विशेष अपेक्षा भी नहीं कर रहे हैं। बस अपनी मेहनत को मान्यता और उसका मूल्य हमसे चाह रहे हैं।

🔷 अतः आइये इस दीपावली पर इन मेहनतकश किन्तु गरीब कुम्हारों से भी हम कुछ न कुछ जरूर खरीदें वह भी बिना किसी तोलमोल के...

👉 अपनों का साथ

🔷 मेरी पत्नी ने कुछ दिनों पहले घर की छत पर कुछ गमले रखवा दिए और एक छोटा सा गार्डन बना लिया। पिछले दिनों मैं छत पर गया तो ये देख कर हैरान रह गया कि कई गमलों में फूल खिल गए हैं, नींबू के पौधे में दो नींबू  🍋🍋भी लटके हुए हैं और दो चार हरी मिर्च भी लटकी हुई नज़र आई।

🔶 मैंने देखा कि पिछले हफ्ते उसने बांस 🎋का जो पौधा गमले में लगाया था, उस गमले को घसीट कर दूसरे गमले के पास कर रही थी। मैंने कहा तुम इस भारी गमले को क्यों घसीट रही हो?

🔷 पत्नी ने मुझसे कहा कि यहां ये बांस का पौधा सूख रहा है, इसे खिसका कर इस पौधे के पास कर देते हैं। मैं हंस पड़ा और कहा अरे पौधा सूख रहा है तो खाद डालो, पानी डालो। 💦

🔶 इसे खिसका कर किसी और पौधे के पास कर देने से क्या होगा?" 😕 _पत्नी ने मुस्कुराते हुए कहा ये पौधा यहां अकेला है इसलिए मुर्झा रहा है। इसे इस पौधे के पास कर देंगे तो ये फिर लहलहा उठेगा। ☺

🔷 पौधे अकेले में सूख जाते हैं, लेकिन उन्हें अगर किसी और पौधे का साथ मिल जाए तो जी उठते हैं।" यह बहुत अजीब सी बात थी। एक-एक कर कई तस्वीरें आखों के आगे बनती चली गईं।

🔶 मां की मौत के बाद पिताजी कैसे एक ही रात में बूढ़े, बहुत बूढ़े हो गए थे। हालांकि मां के जाने के बाद सोलह साल तक वो रहे, लेकिन सूखते हुए पौधे की तरह। 😞 मां के रहते हुए जिस पिताजी को मैंने कभी उदास नहीं देखा था, वो मां के जाने के बाद खामोश से हो गए थे।😔

🔷 मुझे पत्नी के विश्वास पर पूरा विश्वास हो रहा था। लग रहा था कि सचमुच पौधे अकेले में सूख जाते होंगे। बचपन में मैं एक बार बाज़ार से एक छोटी सी रंगीन मछली 🐠खरीद कर लाया था और उसे शीशे के जार में पानी भर कर रख दिया था।

मछली सारा दिन गुमसुम रही।  मैंने उसके लिए खाना भी डाला, लेकिन वो चुपचाप इधर-उधर पानी में अनमना सा घूमती रही। सारा खाना जार की तलहटी में जाकर बैठ गया, मछली ने कुछ नहीं खाया। दो दिनों तक वो ऐसे ही रही, और एक सुबह मैंने देखा कि वो पानी की सतह पर उल्टी पड़ी थी। 😞😞

🔷 आज मुझे घर में पाली वो छोटी सी मछली याद आ रही थी। बचपन में किसी ने मुझे ये नहीं बताया था, अगर मालूम होता तो कम से कम दो, तीन या ढ़ेर सारी मछलियां खरीद लाता और मेरी वो प्यारी मछली यूं तन्हा न मर जाती। 😢

🔶 बचपन में मेरी माँ से सुना था कि लोग मकान बनवाते थे और रौशनी के लिए कमरे में दीपक🔥 रखने के लिए दीवार में इसलिए दो मोखे बनवाते थे क्योंकि माँ का
कहना था कि बेचारा अकेला मोखा गुमसुम और उदास हो जाता है।

🔷 मुझे लगता है कि संसार में किसी को अकेलापन पसंद नहीं। आदमी हो या पौधा, हर किसी को किसी न किसी के साथ की ज़रुरत होती है।

🔶 आप अपने आसपास झांकिए, अगर कहीं कोई अकेला दिखे तो उसे अपना साथ दीजिए, उसे मुरझाने से बचाइए। अगर आप अकेले हों, तो आप भी किसी का साथ लीजिए, आप खुद को भी मुरझाने से रोकिए।

🔷 अकेलापन संसार में सबसे बड़ी सजा है। गमले के पौधे को तो हाथ से खींच कर एक दूसरे पौधे के पास किया जा सकता है, लेकिन आदमी को करीब लाने के लिए जरुरत होती है रिश्तों को समझने की, सहेजने की और समेटने की।😊

🔶 अगर मन के किसी कोने में आपको लगे कि ज़िंदगी का रस सूख रहा है, जीवन मुरझा रहा है तो उस पर रिश्तों के प्यार का रस डालिए। 💧☺

🔷 खुश रहिए और मुस्कुराइए।☺ कोई यूं ही किसी और की गलती से आपसे दूर हो गया हो तो उसे अपने करीब लाने की कोशिश कीजिए और हो जाइए हरा-भरा।

👉 आज का सद्चिंतन 5 November 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 November 2018


👉 साधना- अपने आपे को साधना (भाग 3)

🔷 अपनी जन्म−जात ईश्वर प्रदत्त अनेकानेक अद्भुत किन्तु प्रसुप्त विशेषताओं और विभूतियों को जागृत करना भी अध्यात्म साधनाओं का लक्ष्य है। उसमें लगता भर ऐसा है मानो बाहर के किसी देवी−देवता को प्रसन्न करने के लिए अनुनय विनय की, भेंट उपहार की, गिड़गिड़ाहट भरी दीनता की, अभिव्यक्ति की जा रही है और साधक उसी का ताना−बाना बुनता है। पर वस्तुतः ऐसा कुछ होता नहीं। देवी−देवताओं को अपने निजी कार्य उत्तरदायित्व और झंझट भी तो कम नहीं होंगे। हमारी ही तरह वे भी अपने निजी गोरख−धन्धे में लगे होंगे। जब हमें अपने थोड़े से सगे−संबंधियों की सहायता ठीक तरह करते नहीं बन पड़ती तो असंख्य भक्त उपासकों की चित्र−विचित्र मनोकामनाओं को पूरा करने के लिए दौड़े−दौड़े फिरना उनके लिए भी कठिन ही पड़ेगा और वे सम्भवतः उतना कर भी न पायेंगे जितनी कि अपेक्षा की जाती है।

🔶 साधना का क्षेत्र अन्तःजगत है। अपने ही भीतर इतने खजाने दबे पड़े हैं कि उन्हें उखाड़ लेने पर ही कुबेर जितना सुसंपन्न बना जा सकता है। फिर किसी बाहर वाले से माँगने जाँचने की दीनता दिखाकर आत्म−सम्मान क्यों गँवाया जाय? भीतरी विशिष्ट क्षमताओं को ही तत्वदर्शियों ने देवी−देवता माना है और बाह्योपचारों के माध्यम से अन्तः संस्थान के भांडागार को करतलगत करने का विधि−विधान बताया है। शारीरिक बल वृद्धि के लिए डम्बल, मुद्गर उठाने घुमाने जैसे कर्मकाण्ड करने पड़ते हैं। बल इन उपकरणों में कहाँ होता है? वह तो शरीर की मांस पेशियों से ही उभरता है। उस उभार में व्यायामशाला के साधन−प्रसाधन सहायता भर करते हैं। उनसे मिलना कुछ नहीं। जो मिलना है वह भीतर से ही मिलना है। ठीक यही बात आत्म−साधना के संबंध में भी कही जा सकती है। इस सन्दर्भ में प्रयुक्त होने वाले देवी−देवता एवं विधि−विधान अपनी जेब से कुछ नहीं देते। साधक की निष्ठा भर पकाते हैं उसे कार्य−पद्धति भर सिखाते हैं। इतने का अभ्यस्त बनना ही साधनात्मक कर्मकाण्डों का प्रयोजन है। इतने भर से बात बन जाती है और राह मिल जाती है। साधक अपनी मूर्छना जगाकर उज्ज्वल भविष्य की असीम सम्भावनाएं स्वयं जगा लेता है।

🔷 आत्म−चेतना की जागृति ही साधना विज्ञान का लक्ष्य है। इसके लिए अपने चिन्तन एवं कर्तव्य का बिखराव रोककर अभीष्ट प्रयोजन के केन्द्र बिन्दु पर केन्द्रीभूत करना पड़ता है। इसके लिए अपनी गति विधियाँ लगभग उसी स्तर की रखनी पड़ती हैं जैसे कि भौतिक क्षेत्र में सफलताएँ पाने वाले लोगों को अपनानी होती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 12

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1976/January/v1.12

👉 अध्यात्मवादी चिन्तन

🔷 वास्तव में न तो नीत्शे का व्यक्तिवाद ही व्यावहारिक है और न ही मार्क्स का समाजवाद। उनमें से प्रथम व्यक्ति को ही सब कुछ मानता है। द्वितीय समाज को, किन्तु व्यावहारिकता की कसौटी दोनों को ही असफल सिद्ध करती है।

🔶 एकमात्र अध्यात्मवादी चिन्तन ही ऐसा है जो इन दोनों के मध्य सुरुचिपूर्ण ढंग से सामंजस्य का संस्थापन करता है, जहाँ वैयक्तिक उन्नति की ऊँचाईयों को आत्मा के शीर्षस्थल पर ले जाता है, वहीं यह भी उपदिष्ट करता है कि व्यक्ति और कुछ नहीं समष्टि का एक अभिन्न अंश है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 धर्म तत्त्व का धर्षण और मर्म वांग्मय 53 पृष्ठ 6.7

👉 Spiritually thinking.....

🔷 Both Nietzsche’s individualism and Marx’s socialism are impractical.

🔶 One of them regards an individual to be the "be all and end all" of all creation. Second one thinks of society as being the most important one.

🔷 But both fail when we evaluate them practically.

🔶 Only spiritual thinking can elegantly bridge the divide between these two viewpoints.

🔷 Spiritual thinking gives an individual the right to be free and achieve perfection, in the image of a most pious, holy and perfect soul. At the same time thinks of an individual as being an indivisible part of the society.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Dharma tattwa ka darana aura marma Vangmay 53 Page 6.7

शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

👉 आज का सद्चिंतन 2 November 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 November 2018

👉 साधना- अपने आपे को साधना (भाग 2)

🔶 साधना आत्मिक क्षेत्र में भी होती है और भौतिक क्षेत्र में भी। कदम जिस भी दिशा में बढ़ते हैं प्रगति उसी ओर होती है। अपनी सतर्कता पूर्ण सुव्यवस्था जिस भी मार्ग पर गतिशील कर दी जाय उसी में एक के बाद एक सफलता के मील पत्थर मिलते चले जायेंगे।

🔷 साधना का महत्व किसान जानता है। पूरे वर्ष अपने खेत की मिट्टी के साथ अनवरत गति से लिपटा रहता है और फसल को स्वेद कणों से नित्य ही सींचता रहता है। सर्दी−गर्मी की परवाह नहीं—जुकाम−खाँसी की चिन्ता नहीं। शरीर की तरह ही खेत उसका कर्म क्षेत्र होता है। एक−एक पौधे पर नजर रहती है। खाद−पानी, निराई, गुड़ाई से लेकर रखवाली तक के अनेकों कार्य करने से पूर्व वह उनकी आवश्यकता समझता है और किसी के निर्देश से नहीं अपनी गति से ही निर्णय करता है कि कब, क्या और कैसे किया जाना चाहिए। किसी के दबाव से नहीं—अपनी इच्छा और प्रेरणा से ही उसे खेत की, उसे संभालने वाले बैलों की, हल, कुदाल आदि संबंधी उपकरणों की व्यवस्था जुटाये रहने की सूझ−बूझ सहज ही उठती और स्वसंचालित रूप से गतिशील होती रहती है। यह सब होता है बिना थके, बिना ऊबे, बिना अधीर हुए।

🔶 आज का श्रम कल ही फलप्रद होना चाहिए इसका आग्रह उसे तनिक भी नहीं होता। फसल अपने समय पर पकेगी—तब तक उसे धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा ही करनी होगी यह जानने के कारण अनाज की ढेरी कोठे में भरने की आतुरता भी उसे नहीं होती। इतने मन अनाज निश्चित रूप से होना ही चाहिए, इसके लंबे−चौड़े मनसूबे बाँधना भी उसे अनावश्यक प्रतीत होता है। मनोयोग पूर्वक सतत् श्रम की साधना चलती ही रहती है, विघ्न अवरोध न आते हों सो बात भी नहीं—उनसे भी जैसे बनता है निपटता रहता है, पर उपेक्षा कभी भी खेत की नहीं होती। उसकी आवश्यकता पूरी किये बिना चैन ही नहीं पड़ता। समयानुसार फसल पकती भी है। अनाज भी पैदा होता है। उसे ईश्वर को धन्यवाद देता हुआ घर ले जाता है। कितने मन अनाज पैदा होना है यह कभी सोचा ही नहीं तो फिर असन्तोष का कोई कारण भी नहीं। जो मिला उसे ईश्वरीय उपहार समझा गया। यही है किसान की साधना जिसे वह होश संभालने के दिन से लेकर मरणपर्यन्त सतत् निष्ठा के साथ चलाता ही रहता है। न विश्राम, न थकान, न ऊब, न अन्यमनस्कता। साधना कैसे की जाती है और साधक को कैसा होना चाहिए यह किसान से सीखा जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 12
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1976/January/v1.12

गुरुवार, 1 नवंबर 2018

👉 दुःखी होने की क्या आवश्यकता

🔶 एक नहीं, अनेक सामाजिक कुरीतियाँ अपने देश में नागफनी की तरह फैल रही हैं। इनके काँटों से रोज अनेक मासूम जिंदगियाँ तार-तार हो जाती है। उनके मस्तिष्क की यह हलचल एक निश्चय में बदल गई-वह सामाजिक कुरीतियों की नागफनी को साफ करेंगे, ताकि फिर किसी मासूम चंपा की खिलखिलाहट न छिने।

🔷 एक सेठ था। उसके पास बहुत धन था, पर स्वभाव से वह था कंजूस। न स्वयं खा-पी सके और न किसी को दे सके। घर में अपने धन को इसलिए नहीं रखता था कि कोई चोर-डाकू न चुरा ले, अतः गाँव के बाहर एक जंगल में गड्ढा करके अपना सारा धन गाड़ आया। दूसरे-तीसरे दिन जाता और उस स्थान को चुपचाप देख आता। उसे अपने पर बड़ा गर्व था।

🔶 एक बार एक चोर को शक हुआ, वह कंजूस के पीछे-पीछे चुपचाप गया और छिपकर देख आया। उसे समझते देर न लगी कि इस स्थान पर अवश्य कोई मूल्यवान वस्तु दबी है। जब कंजूस चक्कर लगाकर घर चला गया, तो उस चोर ने खुदाई करके सारा धन प्राप्त कर लिया और वहाँ से रफूचक्कर हो गया।

🔷 दूसरे दिन जब वह कंजूस फिर अपने छिपे धन को देखने गया, तो उसे जमीन खुदी हुई दिखाई दी। आसपास मिट्टी का ढेर लग रहा था और बीच में एक खाली गड्ढा था। उसका सारा धन जा चुका था। इतनी बड़ी हानि वह सहन नहीं कर सका। माथा पकड़कर जोर से रोने-चिल्लाने लगा-”हाय! मैं तो लुट गया, मेरे सारे जीवन की कमाई चोर ले गए।”

🔶 रोना चिल्लाना सुनकर जंगल में रहने वाले आस-पास के कई आदमी आ गए। उन्होंने पूछकर स्थिति जानी। एक आदमी ने समझाते हुए कहा- “सेठ जी ! धन तो आपके काम पहले भी न आया था और न आपके जीवन में आ सकता था। हाँ उस पर आपका अधिकार अवश्य था और उसे यहाँ छिपाकर रख छोड़ा वह बेकार ही था। ऐसी स्थिति में दुःखी होने की क्या आवश्यकता है?

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/2000/April/v2.20

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 2 Sep 2026

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