बुधवार, 3 अक्टूबर 2018

👉 रिक्शे वाला:-

🔶 एक बार एक अमीर आदमी कहीं जा रहा होता है तो उसकी कार ख़राब हो जाती है। उसका कहीं पहुँचना बहुत जरुरी होता है। उसको दूर एक पेड़ के नीचे एक रिक्शा दिखाई देता है। वो उस रिक्शा वाले पास जाता है। वहा जाकर देखता है कि रिक्शा वाले ने अपने पैर हैंडल के ऊपर रखे होते है। पीठ उसकी अपनी सीट पर होती है और सिर जहा सवारी बैठती है उस सीट पर होती है ।

🔷 और वो मज़े से लेट कर गाना गुन-गुना रहा होता है। वो अमीर व्यक्ति रिक्शा वाले को ऐसे बैठे हुए देख कर बहुत हैरान होता है कि एक व्यक्ति ऐसे बेआराम जगह में कैसे रह सकता है, कैसे खुश रह सकता है। कैसे गुन-गुना सकता है।

🔶 वो उसको चलने के लिए बोलता है। रिक्शा वाला झट से उठता है और उसे 20 रूपए देने के लिए बोलता है। रास्ते में वो रिक्शा वाला वही गाना गुन-गुनाते हुए मज़े से रिक्शा खींचता है। वो अमीर व्यक्ति एक बार फिर हैरान कि एक व्यक्ति 20 रूपए लेकर इतना खुश कैसे हो सकता है। इतने मज़े से कैसे गुन-गुना सकता है। वो थोडा इर्ष्यापूर्ण  हो जाता है और रिक्शा वाले को समझने के लिए उसको अपने बंगले में रात को खाने के लिए बुला लेता है। रिक्शा वाला उसके बुलावे को स्वीकार कर देता है।

🔷 वो अपने हर नौकर को बोल देता है कि इस रिक्शा वाले को सबसे अच्छे खाने की सुविधा दी जाए। अलग अलग तरह के खाने की सेवा हो जाती है। सूप्स, आइस क्रीम, गुलाब जामुन सब्जियां यानि हर चीज वहाँ मौजूद थी।

🔶 वो रिक्शा वाला खाना शुरू कर देता है, कोई प्रतिक्रिया, कोई घबराहट बयान नहीं करता। बस वही गाना गुन-गुनाते हुए मजे से वो खाना खाता है। सभी लोगो को ऐसे लगता है जैसे रिक्शा वाला ऐसा खाना पहली बार नहीं खा रहा है। पहले भी कई बार खा चुका है। वो अमीर आदमी एक बार फिर हैरान एक बार फिर इर्ष्यापूर्ण कि कोई आम आदमी इतने ज्यादा तरह के व्यंजन देख के भी कोई हैरानी वाली प्रतिक्रिया क्यों नहीं देता और वैसे कैसे गुन-गुना रहा है जैसे रिक्शे में गुन-गुना रहा था।

🔷 यह सब कुछ देखकर अमीर आदमी की इर्ष्या और बढती है। अब वह रिक्शे वाले को अपने बंगले में कुछ दिन रुकने के लिए बोलता है। रिक्शा वाला हाँ कर देता है।

🔶 उसको बहुत ज्यादा इज्जत दी जाती है। कोई उसको जूते पहना रहा होता है, तो कोई कोट। एक बेल बजाने से तीन-तीन नौकर सामने आ जाते है। एक बड़ी साइज़ की टेलीविज़न स्क्रीन पर उसको प्रोग्राम दिखाए जाते है। और एयर-कंडीशन कमरे में सोने के लिए बोला जाता है।

🔷 अमीर आदमी नोट करता है कि वो रिक्शा वाला इतना कुछ देख कर भी कुछ प्रतिक्रिया नहीं दे रहा। वो वैसे ही साधारण चल रहा है। जैसे वो रिक्शा में था वैसे ही है। वैसे ही गाना गुन-गुना रहा है जैसे वो रिक्शा में गुन-गुना रहा था।

🔶 अमीर आदमी के इर्ष्या बढ़ती चली जाती है और वह सोचता है कि अब तो हद ही हो गई। इसको तो कोई हैरानी नहीं हो रही, इसको कोई फरक ही नहीं पढ़ रहा। ये वैसे ही खुश है, कोई प्रतिक्रिया ही नहीं दे रहा।

🔷 अब अमीर आदमी पूछता है: आप खुश हैं ना? वो रिक्शा वाला कहते है: जी साहेब बिलकुल खुश हूँ। अमीर आदमी फिर पूछता है: आप आराम में  हैं ना? रिक्शा वाला कहता है: जी बिलकुल आरामदायक हूँ।

🔶 अब अमीर आदमी तय करता है कि इसको उसी रिक्शा पर वापस छोड़ दिया जाये। वहाँ जाकर ही इसको इन बेहतरीन चीजो का एहसास होगा। क्योंकि वहाँ जाकर ये इन सब बेहतरीन चीजो को याद करेगा।

🔷 अमीर आदमी अपने सेक्रेटरी को बोलता है की इसको कह दो कि आपने दिखावे के लिए कह दिया कि आप खुश हो, आप आरामदायक हो। लेकिन साहब समझ गये है कि आप खुश नहीं हो आराम में नहीं हो। इसलिए आपको उसी रिक्शा के पास छोड़ दिया जाएगा।”

🔶 सेक्रेटरी के ऐसा कहने पर रिक्शा वाला कहता है: ठीक है सर, जैसे आप चाहे, जब आप चाहे। उसे वापस उसी जगह पर छोड़ दिया जाता है जहाँ पर उसका रिक्शा था।  अब वो अमीर आदमी अपने गाड़ी के काले शीशे ऊँचे करके उसे देखता है।

🔷 रिक्शे वाले ने अपनी सीट उठाई बैग में से काला सा, गन्दा सा, मेला सा कपड़ा निकाला, रिक्शा को साफ़ किया, मज़े में बैठ गया और वही गाना गुन-गुनाने लगा। अमीर आदमी अपने सेक्रेटरी से पूछता है: “कि चक्कर क्या है। इसको कोई फरक ही नहीं पड रहा इतनी आरामदायक वाली, इतनी बेहतरीन जिंदगी को ठुकरा के वापस इस कठिन जिंदगी में आना और फिर वैसे ही खुश होना, वैसे ही गुन-गुनाना।”

🔶 फिर वो सेक्रेटरी उस अमीर आदमी को कहता है: “सर यह एक कामियाब इन्सान की पहचान है। एक कामियाब इन्सान वर्तमान में जीता है, उसको मनोरंजन (Enjoy) करता है और बढ़िया जिंदगी की उम्मीद में अपना वर्तमान खराब नहीं करता। अगर उससे भी बढ़िया जिंदगी मिल गई तो उसे भी वेलकम करता है उसको भी मनोरंजन (enjoy) करता है उसे भी भोगता है और उस वर्तमान को भी ख़राब नहीं करता। और अगर जिंदगी में दुबारा कोई बुरा दिन देखना पड़े तो वो भी उस वर्तमान को उतने ही ख़ुशी से, उतने ही आनंद से, उतने ही मज़े से, भोगता है मनोरंजन करता है और उसी में आनंद लेता है।”

🔷 बहनों और भाइयों, कामयाबी आपके ख़ुशी में छुपी है, और अच्छे दिनों की उम्मीद में अपने वर्तमान को ख़राब नहीं करें। और न ही कम अच्छे दिनों में ज्यादा अच्छे दिनों को याद करके अपने वर्तमान को ख़राब करना है।

👉 आज का सद्चिंतन 3 October 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 October 2018


👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 19)

👉 त्रिधा भक्ति एवं उसकी अद्भुत सिद्धि 
 
🔶 युग साहित्य का सृजन इतनी बड़ी मात्रा में बन पड़ा। उसका इतनी भाषाओं में अनुवाद हुआ कि उस सारे संग्रह को किसी एक मनुष्य के शरीर जितना भारी तोला जा सकता है। इसी लेखन की हर पंक्ति ऐसी है जिसके सम्बन्ध में यही कहा जा सकता है कि किसी ने भारी खोज, गहन मन्थन एवं व्यक्तिगत अनुभव की छत्रछाया में ही लिखा है। सामान्य बुद्धि यही कह सकती है कि एक व्यक्ति कम से कम पाँच जन्मों में अथवा पाँच शरीर से ही इतना साहित्य-सृजन कर सकता है। इस प्रयास को भी यदि कोई चाहे तो सिद्ध स्तर का गिन सकता है।
  
🔷 दूसरा कार्य है— नव सृजन में कुछ कारगर भूमिका निभा सकने योग्य साथी-सहयोगियों के विशालकाय परिकर का एकत्रीकरण। इन दिनों उन सभी की संख्या जो कुछ समय पूर्व पाँच लाख भर थी, अब बढ़कर पच्चीस लाख हो गई है। यह क्रम एक से पाँच, पाँच से पच्चीस, पच्चीस से एक सौ पच्चीस, वाली गुणन-प्रक्रिया के आधार पर द्रुतगति से आगे बढ़ रहा है और आश्वासन दे रहा है कि प्रगति रुकेगी नहीं, क्षेत्रों और देशों की परिधि लाँघते हुए विश्वभर में सज्जनों के संवर्धन की प्रक्रिया पूरी करेगी।
  
🔶 तीसरी सिद्धि है— दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष की असाधारण रणनीति वाली मोर्चा बन्दी। साथ ही सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए हजारों प्रज्ञा केन्द्रों की स्थापना और उनकी गतिविधियों में नवसृजन की, सत्प्रवृत्ति संवर्धन की रचनात्मक प्रवृत्तियों की अनवरत अभिवृद्धि।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 22

👉 Lotus flower

🔶 The lotus is the most beautiful flower, whose petals open one by one. But it will only grow in the mud. In order to grow and gain wisdom, first you must have the mud --- the obstacles of life and its suffering. ... The mud speaks of the common ground that humans share, no matter what our stations in life. ... Whether we have it all or we have nothing, we are all faced with the same obstacles: sadness, loss, illness, dying and death. If we are to strive as human beings to gain more wisdom, more kindness and more compassion, we must have the intention to grow as a lot, open each petal one by one.

~ Goldie Hawn

👉 शबरी की महत्ता

🔶 शबरी यद्यपि जाति की भीलनी थी किन्तु उसके हृदय में भगवान की सच्ची भक्ति भरी हुई थी। बाहर से वह जितनी गन्दी दीख पड़ती थी, अन्दर से उसका अन्तःकरण उतना ही पवित्र और स्वच्छ था। वह जो कुछ करती भगवान के नाम पर करती भगवान् के दर्शनों की उसे बड़ी लालसा थी और उसे विश्वास भी था कि एक दिन उसे भगवान् के दर्शन अवश्य होंगे। शबरी जहाँ रहती थी उस वन में अनेक ऋषियों के आश्रम थे। उसकी उन ऋषियों की सेवा करने और उनसे भगवान की कथा सुनने की बड़ी इच्छा रहती थी। अनेक ऋषियों ने उसे नीच जाति की होने के कारण कथा सुनाना स्वीकार नहीं किया और श्वान की भाँति दुत्कार दिया। किन्तु इससे उसके हृदय में न कोई क्षोभ उत्पन्न हुआ और न निराशा। उसने ऋषियों की सेवा करने की एक युक्ति निकाल ली।

🔷 वह प्रतिदिन ऋषियों के आश्रम से सरिता तक का पथ बुहारकर कुश-कंटकों से रहित कर देती और उनके उपयोग के लिये जंगल से लकड़ियाँ काटकर आश्रम के सामने रख देती। शबरी का यह क्रम महीनों चलता रहा किन्तु किसी ऋषि को यह पता न चला कि उनकी यह परोक्ष सेवा करने वाला है कौन? इस गोपनीयता का कारण यह था कि शबरी आधी रात रहे ही जाकर अपना काम पूरा कर आया करती थी। जब यह कार्यक्रम बहुत समय तक अविरल रूप से चलता रहा तो ऋषियों को अपने परोक्ष सेवक का पता लगाने की अतीव जिज्ञासा हो उठी । निदान उन्होंने एक रात जागकर पता लगा ही लिया कि यह वही भीलनी है जिसे अनेक  बार दुत्कार कर द्वार से भगाया जा चुका था।

🔶 तपस्वियों ने अन्त्यज महिजा की सेवा स्वीकार करने में परम्पराओं पर आघात होते देखा और उसे उनके धर्म-कर्मों में किसी प्रकार भाग न लेने के लिये धमकाने लगे। मातंग ऋषि से यह न देखा गया। वे शबरी को अपनी कुटी के समीप ठहराने के लिये ले गये। भगवान राम जब वनवास गये तो उन्होंने मातंग ऋषि को सर्वोपरि मानकर उन्हें सबसे पहले छाती से लगाया और शबरी के झूठे बेर प्रेमपूर्वक चख-चखकर खाये।

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1967 पृष्ठ 7
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/April/v1.7

👉 फैशन का कलंक धो डालिये (भाग 2)

🔶 ट्रांजिस्टर रेडियो तो आज के भारतीय नौजवानों का ‘बगल-बच्चा’ बन गया है। जिसे देखो, बैग की तरह लटकाये, झोले की तरह कन्धे पर डाले, पुस्तक की तरह हाथ में लिए अथवा किसी बड़े पूजा-पात्र की तरह दोनों हाथों में संभाले घूम रहा है, जब कि उनके पास उसका कोई उपयोग नहीं है। महज एक फैशन तथा दिखावा भर है। अन्य नागरिकों को तो छोड़ दीजिए न जाने कितने रिक्शे, तांगे वाले, ट्रांजिस्टर सेटों को अपने तांगों तथा रिक्शों में लटकाये दीखते हैं। इस प्रकार के बचकाने फैशन बनाने अथवा प्रदर्शनों में लोग कौन सा सौन्दर्य और कौन-सी विशेषता समझते हैं? उन्हें अपने तथा अपनी इन क्रियाओं के बीच असंगति का भी तो बोध होता नजर नहीं आता। वे यह बात तनिक भी तो अनुभव नहीं कर पाते कि उनका यह मूर्खतापूर्ण प्रदर्शन उनको उपहासास्पद बना देता है।

🔷 पहनावों तथा कपड़ों का फैशन तो आज पराकाष्ठा से भी आगे निकल गया है। कपड़ों की किस्मों की यदि आज सूची बनाई जाये तो वह एक बड़े पुराण से भी मोटा ग्रन्थ बन जायेगा और इससे भी मोटी वस्त्रों की सिलाई के प्रकारों की सूची बनेगी। आज शायद ही कोई ऐसा बदकिस्मत फूल अथवा फिल्म ऐक्टर-ऐक्ट्रैस हो। इतना ही नहीं साधु-सन्तों के रामनामी दुपट्टों की तरह अभिनेताओं के नामांकित कपड़े पहनने में लोग गौरव अनुभव करते हैं। फिल्मों के दृश्य तक आज नौजवानों के वस्त्रों पर अंकित देखे जा सकते हैं। जहां कभी अधिक से अधिक कपड़ों पर फूल-पत्तियां हंस, मयूरों अथवा पेड़ पौधों की छाप हुआ करती थी और जिनको भी भद्र लोग पसन्द नहीं करते थे, वहां आज अश्लील फिल्मों के अश्लील चित्र छपे दिखलाई देते हैं और नौजवान नागरिक उन्हें शौक से पहनते और शान समझते हैं। न जाने क्या हो गया है इस भारत को—भारत के नौजवान वर्ग को?

🔶 आज का भारतीय नौजवान यह क्यों नहीं सोच पाता कि उसका देश गरीब है, आज उसे उसकी फैशनपरस्ती की आवश्यकता नहीं है, उसे जरूरत है उसकी मेहनत, मशक्कत और परिश्रम-परिश्तिस की! उसे इस बात से आत्मग्लानि क्यों नहीं होती कि आज उसका अर्धनंगा भूखा राष्ट्र अन्य राष्ट्रों से अन्न की भीख मांग रहा है और वह इस प्रकार के फिजूलखर्च फैशन प्रदर्शन में अन्धा बना हुआ है! वह यह जानने समझने की कोशिश क्यों नहीं करता कि वह जिस देश का नागरिक है और जिसके उत्थान पतन का कुछ दायित्व उसके कन्धों पर भी है, उसकी औसत आय पांच-छः आना प्रति-दिन से अधिक नहीं है। आज उसके टूटी सड़कों और फूटे मकानों वाले देश में टेरालीन, डेकरौन और नाइलौन जैसे कपड़ों की क्या शोभा है? धूल उड़ाती गलियों और दुर्गन्धित बस्तियों के बीच उसके इन वस्त्रों की क्या संगति है?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 110

मंगलवार, 2 अक्टूबर 2018

👉 माँ की ममता

🔷 75 साल की उस बुढ़िया माँ का वजन लगभग 40 किलो होगा! आज जब तबियत बिगड़ने पर वो डॉक्टर को दिखाने गयी!

🔶 डॉक्टर ने कहा ‘ माताजी आप हेल्थ का ख्याल रखिये! आप का वजन जरूरत से ज्यादा कम है! आप खाने में जूस, सलाद, दूध, फल, घी, मेवा और हेल्थी फ़ूड लिजियें! नहीं तो आपकी सेहत दिनों दिन गिरती जायेगी और हालत नाजुक हो जायेंगे! ‘

🔷 उसने भारी मन से डॉक्टर की बात को सुना और बाहर निकल कर सोचने लगी, इतनी महंगाई में ये सब कहाँ से आएगा……??? और पिछले पचास सालों में, फ्रूट, घी, मेवा घर में लाया कौन है….???

🔶 बहुत ही मामूली पेंशन से जो थोडा बहुत पैसा मिलता है उससे घर के जरुरी सामान तो पति ले आतें है, लेकिन फल, जूस, हरी सब्जी, ये सब पति ने कभी ला कर नहीं दिया,….और खुद भी कभी ये सब खरीदने की हिम्मत नहीं कर सकी….क्यूंकि जब भी मन करता कुछ खाने का, खाली पर्स हमेशा मुंह चिढाने लगता….

🔷 शहर में … मामूली सी नौकरी में और जिंदगी की गहमागहमी में सारी जमा पूंजी, पति का PF, घर की सारी अमानत, संपदा, गहने जेवर सब एक बेटे और दो बेटियों की परवरिश, पढाई लिखाई शादी में में सब कुछ खत्म हो गया…

🔶 दूर दिल्ली में रह रहा एक बहुत बड़ी कंपनी में मैनेजर और मोटी तनख्वाह उठा रहा बेटा भी तो खर्चे के नाम पर सिर्फ पांच सौ रुपये देता है…वो भी महीने के….. बेटियों से अपने दुःख माँ ने सदा छुपाये है…उन्हें कभी अपने गमो में शामिल नहीं किया…आखिर ससुराल वाले क्या सोचेंगे…..???

🔷 अब बेटे के भेजे इन पांच सौं रुपये में बूढ़े माँ बाप तन ढके या मन की करें ????? उसने सोचा चलो एक बार बेटे को डॉक्टर की रिपोर्ट बता दी जाए..

🔶 उसने बेटे को फ़ोन किया और कहा – बेटा डॉक्टर ने बताया है की विटामिन, खून की की कमी, कमजोरी से से चक्कर आये थे….इसी लिए खाने में सलाद, जूस, फ्रूट, दूध, फल, घी, मेवा लेना शुरू करो!

🔷 बेटा – “माँ आप को जो खाना है खाओ, डॉक्टर की बात ना मानों….!” माँ ने कहा – बेटा, थोड़े पैसे अगर भेज देता तो ठीक रहता…..!

🔶 बेटा – ” माँ इस माह मेरा बहुत खर्चा हो रहा है, कल ही तेरी पोती को मैंने फिटनेस जिम जोईन कराया है, तुझे तो पता ही है, वो कितनी मोटी हो रही है, इसी लिए जिम जोईन कराया है…….उसके महीने के सात हजार रुपये लगेंगे…………..जिसमे उसका वजन, चार किलो हर माह कम कराया जाएगा….. और कम से कम पांच माह तो उसे भेजना ही होगा…….पैंतीस हजार का ये खर्चा बैठे बिठाये आ गया….अब जरुरी भी तो है ये खर्चा…!!

🔷 आखिर दो तीन साल में इसकी शादी करनी है और आज कल मोटी लड़कियां, पसंद कोई करता नहीं…..!! ”

🔶 माँ ने कहा – ” हाँ बेटा ये तो जरुरी था…..कोई बात नहीं वैसे भी डॉक्टर लोग तो ऐसे ही कुछ भी कहतें रहते है…..चक्कर तो गर्मी की वजह से आ गयें होंगे, वरना इतने सालों में तो कभी ऐसा नहीं हुआ…..खाना तो हमेशा से यही खा रही हूँ मैं…!!!”

🔷 बेटा – “हाँ माँ…..अच्छा माँ अभी मैं फोन रखता हूँ ….बेटी के लिए डाइट चार्ट ले जाना है और कुछ जूस, फ्रूट और डायट फ़ूड भी ….आप अपना ख्याल रखना!”
फोन कट गया….

🔶 माँ ने एक ग्लास पानी पिया… और साडी पर फोल लगाने मे लग गयी…. एक साड़ी में फोल लगाने के माँ को पन्द्रह रुपये मिलेंगे….....

🔷 माँ के पास आज साड़ी में फोल लगाने के तीन आर्डर है…माँ ने मन ही मन श्री गणेश का शुक्रिया अदा किया क्यूंकि आज वो आधा किलो लड्डू खरीद ही लेंगी गणेश जी की पूजा के लिए इन पैसो से…और मन ही मन अपने बेटे की सुखी और समृद्ध जिंदगी के लिए प्रभु श्री गणेश से प्रार्थना भी की!!

👉 आज का सद्चिंतन 2 October 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 October 2018


👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 18)

👉 त्रिधा भक्ति एवं उसकी अद्भुत सिद्धि 
 
🔷 इस प्रयोग के अन्तर्गत अपना आहार-विहार वस्त्र-विन्यास रहन-सहन व्यवहार, अभ्यास ऐसा रखा गया जो न्यूनतम था। आहार इतना सस्ता जितना कि देश के गरीब से गरीब व्यक्ति को मिलता है। वस्त्र ऐसे जैसे कि श्रमिक स्तर के लोग पहनते हैं। महत्त्वाकांक्षा न्यूनतम। आत्म प्रदर्शन ऐसा जिसमें किसी सम्मान, प्रदर्शन और अखबारों में नाम छपने जैसी ललक के लिए कोई गुंजायश न रहे। व्यवहार ऐसा जैसा बालकों का होता है। यह पृष्ठभूमि बना लेने के उपरान्त शारीरिक और मानसिक श्रम इतना जितना कि कोई पुरुषार्थ परायण कर सकता है, इसे पूजा उपासना तो नहीं पर जीवन साधना अवश्य कहा जा सकता है।    
  
🔶 इसके उपरान्त उपासना की निर्धारित पद्धति की बारी आई। उसमें श्रद्धा-विश्वास का गहरा पुट रहा और ध्यान रहा कि किसी भी अधिक आवश्यक काम के बहाने उसे किसी भी प्रकार चुकाए जाने का अवसर न मिलने पाए। चिन्तन निजी लाभ का नहीं, परमार्थ सम्पादन का ही रहा। यही कारण है कि अपने पास निजी कहे जाने योग्य एक कानी-कौड़ी की भी कोई संचित सम्पदा नहीं है। पैतृक सम्पदा बड़ी थी पर उसका भी एक-एक पैसा उपयोगी परमार्थिक इमारतों में लगा दिया। यह सारा जंजाल सिर पर से उतर जाने के उपरान्त व्यामोह से विरक्त मन इतना खाली हो गया जिसका ‘‘वैक्यूम’’ एक सशक्त चुम्बक की तरह ईश्वरीय अनुकम्पा की अजस्र वर्षा करने लगा। सामर्थ्य भी इतनी आ धमकी जिसके लिए अपनी ओर से नगण्य जितना ही प्रयत्न बन पड़ा।
  
🔷 अध्यात्म सिद्धियों के साथ जुड़ा हुआ माना जाता है। क्या वे हमें हस्तगत हुईं? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है ‘‘हाँ’’। उनमें से यहाँ कुछ ऐसे प्रसंगों की ही चर्चा की जा सकती है जो सर्वविदित हैं, जिनके लिए हर किसी को अपनी आँखें और अपनी निज की जानकारी ही साक्षी रूप में पर्याप्त हो सकती है। उसके लिए किसी प्रकार की खोजबीन करने की कदाचित ही किसी को आवश्यकता पड़े।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 21

👉 Life will give you back....

A son and his father were walking on the mountains.
Suddenly, his son falls, hurts himself and screams.
To his surprise, he hears the voice repeating,
somewhere in the mountain.
Curious, he yells: ‘‘Who are you?’’
He receives the answer: ‘‘Who are you?’’
And then he screams to the mountain: ‘‘I admire you!’’
The voice answers: ‘‘I admire you!’’
Angered at the response, he screams: ‘‘Coward!’’
He receives the answer: ‘‘Coward!’’
He looks to his father and asks: ‘‘What’s going on?’’
The father smiles and says: ‘‘My son, pay attention.’’
Again the man screams: ‘‘You are a champion!’’
The voice answers: ‘‘You are a champion!’’
The boy is surprised, but does not understand.
Then the father explains: ‘‘People call this ECHO, but really this is LIFE.
It gives you back everything you say or do.
Our life is simply a reflection of our actions.
If you want more love in the world, create more love in your heart.
If you want more competence in your team, improve your competence.
This relationship applies to everything, in all aspects of life;
Life will give you back everything you have given to it.

👉 फैशन का कलंक धो डालिये (भाग 1)

🔷 यह बात सही है कि कोई भी मनुष्य नहीं चाहता है कि वह किसी दूसरे की दृष्टि में भद्दा, कुरूप अथवा अनाकर्षक लगे। प्रत्येक व्यक्ति की यही इच्छा रहती है कि वह देखने वालों की नजरों में समाये। लोग उसे देख कर अनुभव करें कि यह कायदे-करीने का विशेष व्यक्ति है। यथा-शक्य दर्शनीय बनने का लोग प्रयत्न भी करते हैं।

🔶 आकर्षक दिखाई देने की इच्छा अपने आप में कोई बुरी बात नहीं है। हर प्रबुद्ध प्राणी सौन्दर्य-प्रेमी होता है। जब हम या आप ऐसी वेश-भूषा में दीखते हैं जो आकर्षक हो तो एक प्रकार से लोगों की सौन्दर्य दृष्टि को सन्तुष्ट करते हैं, उन्हें प्रसन्न करते हैं, जिससे सद्भाव एवं सौहार्द का वातावरण उत्पन्न होता है। समाज में स्वच्छता, सुन्दरता और समीचीनता की प्रवृत्तियां बढ़ती हैं। इसलिए भली प्रकार का रहन-सहन किसी प्रकार से आलोचना का विषय नहीं माना जाता।

🔷 किन्तु जब यही अच्छी बात अपनी अपेक्षित सीमा के बाहर चली जाती है, तब बुराई की संज्ञा पाकर आक्षेप का विषय बन जाती है।

🔶 आज ढंग से रहने-सहने का अर्थ फैशन मान लिया गया है। अधिक से अधिक प्रदर्शन के साथ सजे बजे रहने में ही सुन्दरता, सुरूपता तथा आकर्षण का निवास समझना आज की एक विशेष अल्पज्ञता है। अंग्रेजी का ज्ञान तो दूर—भाषा का भी एक अक्षर न जानने वाले निरक्षर व्यक्ति तक कोट-पैंट, टाई और हैट-बूट में देखे जाते हैं। जाने कितने लोग बेजरूरत सैर-सपाटे और दिखावे के ही लिए मोटरें, बघ्घियां, हाथी, घोड़े आदि सवारियों को रखा करते हैं। अनेक बड़े आदमी अपनी मोटरकारों में रेडियो, ट्रांजिस्टर लगाये हुये शहर की सड़कों पर बजाते हुए चले जाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 109
 

सोमवार, 1 अक्टूबर 2018

👉 एहसान

🔶 एक बहेलिया था। एक बार जंगल में उसने चिड़िया फंसाने के लिए अपना जाल फैलाया। थोड़ी देर बाद ही एक उकाब उसके जाल में फंस गया। वह उसे घर लाया और उसके पंख काट दिए। अब उकाब उड़ नहीं सकता था, बस उछल उछलकर घर के आस-पास ही घूमता रहता।

🔷 उस बहेलिए के घर के पास ही एक शिकारी रहता था। उकाब की यह हालत देखकर उससे सहन नहीं हुआ। वह बहेलिए के पास गया और कहा- ”मित्र, जहां तक मुझे मालूम है, तुम्हारे पास एक उकाब है, जिसके तुमने पंख काट दिए हैं। उकाब तो शिकारी पक्षी है। छोटे-छोटे जानवर खा कर अपना भरण-पोषण करता है। इसके लिए उसका उड़ना जरूरी है। मगर उसके पंख काटकर तुमने उसे अपंग बना दिया है। फिर भी क्या तुम उसे मुझे बेच दोगे?

🔶 बहेलिए के लिए उकाब कोई काम का पक्षी तो था नहीं, अतः उसने उस शिकारी की बात मान ली और कुछ पैसों के बदले उकाब उसे दे दिया। शिकारी उकाब को अपने घर ले आया और उसकी दवा-दारू करने लगा। दो माह में उकाब के नए पंख निकल आए। वे पहले जैसे ही बड़े थे। अब वह उड़ सकता था।

🔷 जब शिकारी को यह बात समझ में आ गई तो उसने उकाब को खुले आकाश में छोड़ दिया। उकाब ऊंचे आकाश में उड़ गया। शिकारी यह सब देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। उकाब भी बहुत प्रसन्न था और शिकारी का बहुत कृतज्ञ था।

🔶 अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए उकाब एक खरगोश मारकर शिकारी के पास लाया। एक लोमड़ी, जो यह सब देख रही थी, उकाब से बोली- ”मित्र! जो तुम्हें हानि नहीं पहुंचा सकता उसे प्रसन्न करने से क्या लाभ?“

🔷 इसके उत्तर में उकाब ने कहा- ”व्यक्ति को हर उस व्यक्ति का एहसान मानना चाहिए, जिसने उसकी सहायता की हो और ऐेसे व्यक्तियों से सावधान रहना चाहिए जो हानि पहुंचा सकते हों।“

🔶 निष्कर्ष- व्यक्ति को सदा सहायता करने वाले का कृतज्ञ रहना चाहिए।

👉 आज का सद्चिंतन 1 October 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 October 2018


👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 17)

👉 त्रिधा भक्ति एवं उसकी अद्भुत सिद्धि   
 
🔶 उपासना का अपना प्रयोगक्रम चला और उसे अनेकानेक परीक्षणों की कसौटियों पर कसे जाने के उपरान्त सही एवं सशक्त पाया गया। इसी आधार पर अब यह सोचने, कहने और करने की व्यवस्था बन गई है कि संसार को एक नया सन्देश दिया जा सके कि उपेक्षित, तिरस्कृत, विडम्बनाग्रस्त अध्यात्म को यदि पुनर्जीवित किया जा सके तो विश्व चेतना के साथ एक उच्चस्तरीय माहौल जुड़ सकता है। तब भौतिक विज्ञान के लिए भी यह न सोचना पड़ेगा कि वह लाभ देने की तुलना में हानि, विनाश के सरंजाम अधिक जुटाता है। इसलिए उसके उपयोग को आशंका एवं भयानकता के साथ जुड़ा हुआ सोचा जाए। वस्तुत: बढ़े हुए विज्ञान के चरणों को आध्यात्मिक प्रगति के साथ जोड़ा जा सके तो हम भूतकाल के सतयुग की अपेक्षा और भी अच्छी स्थिति में पहुँच सकते हैं। यों जिस तरह नया आधार सँजोया गया है, उसे देखते हुए यह भी कहा जा सकता है कि हम और भी अधिक ऊँचे स्तर का ‘‘महासतयुग’’ अगले दिनों अपनी इसी धरती पर उतारकर रहेंगे।
  
🔷 अपने समय का मनुष्य बहुत बौना है। इस बौनेपन को संकीर्ण स्वार्थपरता के रूप में भी लिया जा सकता है, होता यही रहा कि वैज्ञानिक उपलब्धियों को भी संकीर्ण-स्वार्थों के लिए तथाकथित समर्थ लोगों ने प्रयुक्त किया और असंख्य समस्याएँ उत्पन्न कीं। ठीक इसी प्रकार प्रपंचों से बचकर जो अध्यात्म किसी लँगड़े-लूले रूप में शेष रह गया था उसे भी अपने अथवा अपनों की सम्पन्नता, यशलिप्सा, असाधारण सफलता आदि के लिए ही प्रयुक्त किया जाता रहा। तथाकथित सिद्ध पुरुष भी अपने को वरिष्ठ सिद्ध करने और जिन कुपात्रों ने उन्हें जिस तिस प्रकार प्रसन्न कर लिया, उन्हें उस अध्यात्म द्वारा अधिकाधिक सम्पन्न बनाने में लगे रहे। उस अनुदान का उपयोग निजी विलासिता एवं महत्त्वाकांक्षा को पूरा करने के अतिरिक्त किसी लोकोपयोगी काम में न हो पाया।
  
🔶 अपने प्रयोग में आरम्भ से ही यह व्रतशीलता धारण की गई कि परम सत्ता के अनुग्रह से जो भी मिलेगा उसे उसी के विश्व उद्यान को अधिक श्रेष्ठ, समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने के लिए ही खर्च किया जाता रहेगा। अपना निजी जीवन मात्र ब्राह्मणोचित निर्वाह भर से काम चला लेगा। औसत नागरिक स्तर से बढ़कर अधिक सुविधा, प्रतिष्ठा आदि की किसी ललक को पास में न फटकने दिया जाएगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 20

👉 The Paradoxical Commandments

🔶 People are illogical, unreasonable, and self-centered. Love them anyway. If you do good, people will accuse you of selfish ulterior motives. Do good anyway. If you are successful, you will win false friends and true enemies. Succeed anyway. The good you do today will be forgotten tomorrow. Do good anyway. Honesty and frankness make you vulnerable. Be honest and frank anyway.

🔷 The biggest men and women with the biggest ideas can be shot down by the smallest men and women with the smallest minds. Think big anyway. What you spend years building may be destroyed overnight. Build anyway. People really need help but may attack you if you do help them. Help people anyway. Give the world the best you have and you’ll get kicked in the teeth. Give the world the best you have anyway.

📖 Kent M. Keith

👉 चित्रों का भला और बुरा प्रभाव (भाग 4)

🔶 बहुत से धार्मिक कहे जाने वाले चित्र भी इसी श्रेणी में आते हैं। सीता-राम, कृष्ण-राधा, शिव-पार्वती, लक्ष्मी-विष्णु आदि युगल देवों के चित्र बहुधा बड़े ही अश्लील रूप में, अर्धनग्न या गन्दे हाव भावों के साथ मिलते हैं। चित्रकार एवं प्रकाशक का इनके पीछे क्या उद्देश्य रहता है इसकी हम चर्चा नहीं करना चाहते लेकिन साफ रूप से इतना अवश्य कहा जा सकता है कि अन्य भद्दे चित्रों की तरह ये चित्र भी मनुष्य को भद्दी प्रेरणा देते हैं। बहुत से मन्दिर में देव मूर्तियां भी अश्लील स्थिति में बनी रहती हैं, वे भी इसी श्रेणी में आती हैं।

🔷 कोई भी चित्र, दृश्य चाहे वह धार्मिक हो या सामाजिक कलाकृति हो या किसी चलचित्र का अंश यदि वह अश्लील, भद्दा और फूहड़ है तो उससे बचने का पूरा-पूरा प्रयत्न करना चाहिए क्योंकि इनसे मनुष्य में पाशविक प्रवृत्तियों को ही प्रोत्साहन मिलता, जागृत होती हैं। दूषित कामनायें भड़क उठती हैं, गन्दी प्रेरणायें मिलती हैं जो मनुष्य के चरित्र-आचरण, स्वभाव, प्रकृति को दूषित बना देते हैं।

🔶 अपने निवास स्थान, अध्ययन कक्ष, दुकान कहीं के भी लिए आदर्श चित्रों का चुनाव करें। जिन पर उठते बैठते, चलते फिरते हर समय आपकी नजर पड़ती रहे। इनसे आप को उत्कृष्ट प्रेरणा मिलेगी। अच्छे चित्र, अच्छी पुस्तक का प्रभाव तो उसे पढ़ने उस पर मनन चिन्तन करने पर ही पड़ता है लेकिन चित्र तो देखने पर ही मनुष्य को प्रभावित करता है। गन्दे-अश्लील चित्र देखने से बचें। गांधीजी के बन्दर की तरह बुराई की ओर से आंख मीच लें और अच्छाई को देखें।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 139

शनिवार, 29 सितंबर 2018

👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 16)

👉 लेखक का निजी अनुभव  
 
🔷 साधारण स्तर के नर वानर कोल्हू के बैल की तरह पिसते और पीसते रहकर जिन्दगी के दिन गुजार देते हैं। पर जब भीतर से उत्कृष्टता का पक्षधर उल्लास उभरता है तो अन्तराल में बीज रूप में विद्यमान दैवी क्षमताएँ, जागृत, सक्रिय होकर अपनी महत्ता का ऐसा परिचय देने लगती हैं जिसे अध्यात्म का वह चमत्कार कहा जा सकता है, जो भौतिक शक्तियों की तुलना में कहीं अधिक समर्थ है।
  
🔶 उपासना प्रकरण में श्रद्धा-विश्वास की शक्ति ही प्रधान है। वही उस स्तर की बन्दूक है जिस पर किसी भी फैक्टरी में विनिर्मित कारतूस चलाए जा सकते हैं। उस दृष्टि से मात्र गायत्री मंत्र ही नहीं, साधक की आस्था के अनुरूप अन्यान्य मंत्र एवं उपासना विधान भी अपनी सामर्थ्य का वैसा ही परिचय दे सकते हैं। श्रद्धा और विश्वास के अभाव में उपेक्षापूर्वक अस्त-व्यस्त मन से कोई भी उपासना क्रम अपनाया जाए, असफलता ही हाथ लगेगी।
  
🔷 परीक्षण के लिए प्रयोगशाला की तथा उसके लिए आवश्यक यन्त्र उपकरणों की जरूरत पड़ती है। इस सन्दर्भ में अच्छाई एक ही है कि मानव शरीर में विद्यमान चेतना ही उन सभी आवश्यकताओं की पूर्ति कर देती है, जो अत्यन्त सशक्त प्रयोग परीक्षणों के लिए भौतिक विज्ञानियों को मूल्यवान यन्त्र उपकरणों से सुसज्जित प्रयोगशाला को जुटाने पर सम्भव होते हैं।
  
🔶 इन दिनों विज्ञान के प्रतिपादन पत्थर की लकीर बनकर जन-जन की मान्यताओं को अपने प्रभाव क्षेत्र में समेट चुके हैं। आज की मान्यताएँ और गतिविधियाँ उसी से आच्छादित हैं और तदनुरूप प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न कर रही हैं। अध्यात्म का स्वरूप विडम्बना स्तर का बनकर रह गया है, फलस्वरूप उसका न किसी साधनारत पर प्रभाव पड़ता है और न वातावरण को उच्चस्तरीय बनाने में कोई सहायता ही मिल पाती है। इस दुर्गति के दिनों से यही उपयुक्त लगा है कि यदि विज्ञान के प्रत्यक्षवाद को, यथार्थता को जिस प्रकार अनुभव कर लिया गया है, उसी प्रकार अध्यात्म को भी यदि सशक्त एवं प्रत्यक्ष फल देने वाला माना जा सकने का सुयोग बन सके तो समझना चाहिए कि सोना और सुगन्ध के मिल जाने जैसा सुयोग बन गया। विज्ञान शरीर और अध्यात्म प्राणचेतना मिलकर काम कर सकें तो समझना चाहिए कि सब कुछ जीवन्त हो गया। एक प्राणवान दुनियाँ समग्र शक्ति के साथ नए सिरे से नए कलेवर में उद्भूत हो गई। न विज्ञान झगड़ालू रहा और अध्यात्म के साथ जो कुरूपता जुड़ गई है, उसके लिए कोई गुंजाइश ही शेष रह गई है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 19

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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