बुधवार, 12 सितंबर 2018

👉 एक कहानी

🔶 पत्नी बार बार मां पर इल्जाम लगाए जा रही थी और पति बार बार उसको अपनी हद में रहने की कह रहा था. लेकिन पत्नी चुप होने का नाम ही नही ले रही थी व् जोर जोर से चीख चीखकर कह रही थी कि "उसने अंगूठी टेबल पर ही रखी थी और तुम्हारे और मेरे अलावा इस कमरें मे कोई नही आया अंगूठी हो ना हो मां जी ने ही उठाई है।

🔷 बात जब पति की बर्दाश्त के बाहर हो गई तो उसने पत्नी के गाल पर एक जोरदार तमाचा दे मारा अभी तीन महीने पहले ही तो शादी हुई थी।

🔶 पत्नी से तमाचा सहन नही हुआ। वह घर छोड़कर जाने लगी और जाते जाते पति से एक सवाल पूछा कि तुमको अपनी मां पर इतना विश्वास क्यूं है..??

🔷 तब पति ने जो जवाब दिया उस जवाब को सुनकर दरवाजे के पीछे खड़ी मां ने सुना तो उसका मन भर आया पति ने पत्नी को बताया कि "जब वह छोटा था तब उसके पिताजी गुजर गए मां मोहल्ले के घरों मे झाडू पोछा लगाकर जो कमा पाती थी उससे एक वक्त का खाना आता था मां एक थाली में मुझे परोसा देती थी और खाली डिब्बे को ढककर रख देती थी और कहती थी मेरी रोटियां इस डिब्बे में है बेटा तू खा ले मैं भी हमेशा आधी रोटी खाकर कह देता था कि मां मेरा पेट भर गया है मुझे और नही खाना है।

🔶 मां ने मुझे मेरी झूठी आधी रोटी खाकर मुझे पाला पोसा और बड़ा किया है आज मैं दो रोटी कमाने लायक हो गया हूं लेकिन यह कैसे भूल सकता हूं कि मां ने उम्र के उस पड़ाव पर अपनी इच्छाओं को मारा है, वह मां आज उम्र के इस पड़ाव पर किसी अंगूठी की भूखी होगी.... यह मैं सोच भी नही सकता।

🔷 तुम तो तीन महीने से मेरे साथ हो मैंने तो मां की तपस्या को पिछले पच्चीस वर्षों से देखा है...

🔶 यह सुनकर मां की आंखों से आँसू छलक उठे वह समझ नही पा रही थी कि बेटा उसकी आधी रोटी का कर्ज चुका रहा है या वह बेटे की आधी रोटी का कर्ज...

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 September 2018


👉 आज का सद्चिंतन 12 September 2018


👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 10)

👉 असमंजस की स्थिति और समाधान  
 
🔶 सुविधाएँ सुहावनी लग सकती हैं। उनकी समय-समय पर आवश्यकता भी हो सकती है। पर यह तथ्य भी ध्यान में रखने, गाँठ में बाँध लेने योग्य है कि पारस्परिक श्रद्धा, सद्भावना, सहकारिता, नीति-निष्ठा अपनाए बिना पारस्परिक सद्भाव एवं स्नेह संवेदना नहीं उभर सकती और इसके बिना उस आचरण को पनपने की कोई सम्भावना नहीं बनती, जिसमें मनुष्य अपना ही नहीं दूसरों का भी हित सोचता है। न्याय को प्रश्रय देता है और अनीति के आधार पर उद्भूत सुविधाओं को स्वीकारने से इंकार कर देता है। सर्वजनीन सुख, शान्ति के लिए इससे कम में काम चलता नहीं और इससे अधिक की कुछ और आवश्यकता नहीं।
  
🔷 यह संसार, विश्व ब्रह्माण्ड जड़ और चेतन दोनों के ही सम्मिश्रण से बना है। यहाँ प्रकृति और प्राण का ही सामंजस्य है। चेतन को परिष्कृत करने पर जो उपलब्धियाँ हस्तगत होती हैं, उन्हें ऋषि युग में, सतयुग में लम्बी अवधि तक जाना परखा जा चुका है। इस देश की गौरव-गरिमा का इतिहास उसी वर्चस्व से ऐतिहासिक बना और प्रख्यात रहा है। अब बीसवीं शताब्दी में प्रधानतया भौतिकता की सत्ता को प्रमुखता मिली है। इस अवधि में दो विश्व युद्ध और १०० से अधिक क्षेत्रीय युद्ध हो चुके हैं। भौतिकवादी ललक की यह संरचना है, जिसके कारण अपार धन-जन की हानि हुई है। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार सभी कुछ लड़खड़ा गया है। प्रगति युग के अगले चरण कितने भयावह हो सकते हैं, इसकी कल्पनामात्र से दिल दहल जाता है।
  
🔶 यह विचारने के लिए नए सिरे से बाधित होना पड़ रहा है कि भौतिक मान्यताओं के आधार पर संसार को क्या इसी गति से चलने दिया जाना है या अतीत में बरते गए उन सिद्धान्तों को फिर से अपनाया जाना है, जिनके आधार पर मनुष्यों में देवत्व और धरती पर स्वर्ग जैसा वातावरण बना रहा।
      
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 12

👉 How to Stay Happy? (Part 3)

🔶 When we identify our core strengths and put in 100% effort, success is guaranteed in any field of work. However, it should be remembered that the path to success is not a bed of roses. There will be many challenges that will come our way. Whoever has reached the pinnacle of success has gone through excruciating circumstances. That is why, whatever task we take up, must be done with complete dedication. Majority of us put in half-hearted efforts to do something and fall into depths of disappointment when we fail. In order to ensure that happiness stays for long, we must express our sincere gratitude to all those who have helped us in one way or the other.

🔷 It is said that we can receive only two things from any incident or a person in our life - happiness or learning. It is good to learn a lesson because it gives us a chance to start afresh. It is extremely important that we don’t harbor any anger. It is best to resolve it with the concerned person. We should express clearly and always be ready to receive criticism and feedback. If we have any issues against someone, approach him/her in a proper manner and resolve them amicably. Try not to let negativity and complaints breed for long.

🔶 According to Robert Waldinger, director of the Harvard Study of Adult Development, ‘‘The clearest message that we get from this 75-year study is this: Good relationships keep us happier and healthier.... It’s not just the number of friends you have, and it’s not whether or not you’re in a committed relationship. It’s the quality of your close relationships that matters.’’
Yugrishi Pandit Shriram Sharma Acharya says – ‘Expanding the horizons of love and affection is the only way for never-ending happiness. You cannot be happy by hoarding; you can multiply your happiness only by giving and sharing.’

To be continued...

👉 मन को उद्विग्न न कीजिए (भाग 3)

🔶 संगति और वातावरण मानसिक संतुलन को सुधारते बिगाड़ते रहते हैं। जिसकी संगति सदाचारी विद्वान, त्यागी, निस्पृह, उदार व्यक्तियों की हैं, जो अच्छे विचारों वाले व्यक्तियों के संपर्क में रहते हैं, वे व्यक्ति शान्त रहते हैं। प्राचीन ऋषि मुनि संसार के कोलाहल से दूर प्रकृति के उन्मुक्त प्रशान्त वातावरण में कल कल झरते हुए झरनों के किनारे विचार तथा ब्रह्म चिन्तन किया करते हैं। उस स्थिति में उनका सन्तुलन स्थिर रहता था। यदि हम सन्तुलित मनः अवस्था के इच्छुक हैं, तो हमें भोजन, संगति और वातावरण तीनों ओर से आत्म−सुधार करना चाहिये।

🔷 सहिष्णुता की वृद्धि करें। सहिष्णुता का तात्पर्य न केवल कष्ट और विरोध सहन शक्ति है, प्रत्युत आने वाले संकट में शान्त और सन्तुलित रहने का गुण भी है। सहिष्णु व्यक्ति गहन गम्भीर समुद्र की तरह है जिसके अनन्त गहराई पर मामूली तूफानों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वह अनायास ही आए हुए कष्टों से घबराता या पथ−च्युत नहीं होता। शान्ति से कठिनाइयों को अपने ऊपर झेलता है। खतरे में ठण्डे दिमाग से काम करता है। यह शान्त और नित्य साथ करने वाला गुप्त साहस है।

🔶 सहिष्णुता निष्क्रिय साहस और वीरत्व है। ऐसा व्यक्ति अन्तःकरण से एक गुप्त सामर्थ्य पाता रहता है, जिसके कारण वह शत्रुओं के सम्मुख अजेय, स्थिर, साहसपूर्ण हृदय से खड़ा रहता है सहिष्णुता कुछ तो शारीरिक होती है, किन्तु मुख्यतः यह मानसिक दृढ़ता पर निर्भर है। सहिष्णु व्यक्ति मान−अपमान, हानि−लाभ, हर्ष−विषाद में विचलित नहीं होता। वह प्रलोभन, क्षुधा, सर्दी, गर्मी, वासना, उत्तेजना पर काबू पा लेता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति, फरवरी 1955 पृष्ठ 13

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1955/February/v1.13

👉 परिवर्तन चिह्न है प्रगति का

🔶 स्थिरता जड़ता का चिन्ह है और परिवर्तन प्रगति का। स्थिरता में नीरसता एवं निष्क्रियता है। किन्तु परिवर्तन नये चिन्तन और नये अनुभव का पथ प्रशस्त करता रहता है। जीवन प्रगतिशील है, अस्तु इसमें परिवर्तन आवश्यक होता है और अनिवार्य भी।

🔷 प्रगतिशील परिवर्तन से डरते नहीं, उसका समर्थन करते हैं और स्वागत भी। आकाश में सभी ग्रह गोलक गतिशील हैं। इससे उनका चुम्बकत्व स्थिर रहता और उसके सहारे उनका मध्यवर्ती सहकार बना रहता है। यदि वे निक्रिय रहे होते, तो अपनी ऊर्जा गँवा बैठते ।। जो आगे नहीं बढ़ता वह स्थिर भी नहीं रह सकता। स्थिरता पर संकट आते ही, विकल्प विनाश ही रह जाता है। अस्तु जीवन को गतिशील रहना पड़ता है। जो निर्जीव है- वह भी गतिहीन नहीं है।

🔶 युग बदलते हैं। परिवर्तन क्रम में आशा और निराशा के अवसर आते हैं और चले जाते हैं। रात्रि और दिन, स्वप्न और जागृति, जीवन और मरण, शीत और ग्रीष्म, हानि और लाभ, संयोग और वियोग का अनुभव लगता तो परस्पर विरोधी हैं, अन्ततः वे एक दूसरे के साथ गुँथे रहते हैं और दुहरे रसास्वादन का आनन्द देते हैं। ऋण और धन धाराओं का मिलन ही बिजली की सामर्थ्य भरे प्रभाव को जन्म देता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 11 सितंबर 2018

👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 9)

👉 भौतिकवाद की उलटबाँसियाँ  
 
🔷 अवांछनीयता अपनाकर कमाई हुई सफलता तत्काल न सही थोड़ी ही देर में थोड़ा ही आगे बढ़कर ऐसे संकट सामने ला खड़े करती है, जिनसे उबरना कठिन हो जाता है। पर उनके लिए क्या कहा और क्या किया जाए जिनकी मन्द दृष्टि मात्र कुछ ही इंच-फुट तक का देख सकने में साथ देती है। आगे चलकर कितने बड़े खाईं-खन्दक हैं। जिनमें एक बार गिर पड़ने पर कोई सहायता के लिए भी आगे नहीं आता है और जिस-तिस को कोसते हुए भयावह अंत का सामना करना पड़ता है। इन दिनों ऐसी ही कुछ गजब की गाज गिरी है। विज्ञान के आधार पर मिली, नीतिमत्ता से सर्वथा विलग सफलताओं ने कुछ ऐसा व्यामोह उत्पन्न कर दिया है कि लोग कुमार्ग पर चलते और दुर्गति के भाजन बनते देखे जाते हैं। प्रचलन यही बना रहा तो उसका दुष्परिणाम व्यक्ति और समाज के सम्मुख इस स्तर की विभीषिका बनकर सामने आएगा, जिससे बाद में उबर सकना शायद सम्भव ही न रहेगा। तथाकथित प्रगति अवगति से भी अधिक महँगी पड़ेगी।

🔶 इन दिनों हर क्षेत्र में प्रवेश किए हुए समस्याओं, अवांछनीयताओं, विडम्बनाओं के लिए दोष किसे दिया जाए? और उसका समाधान कहाँ ढूँढ़ा जाए? इस सन्दर्भ में मोटे तौर से एक ही बात कही जा सकती है कि प्रत्यक्षवाद की पृष्ठभूमि पर जन्मे भौतिकवाद ने लगभग सभी नैतिक मूल्यों की उपयोगिता, आवश्यकता मानने से इंकार कर दिया है। उसी प्रत्यक्षवादिता को प्रामाणिकता का एक स्वरूप मानने वाले जन-समुदाय ने हर प्रसंग में यही नीति अपना ली है कि प्रत्यक्ष एवं तात्कालिक लाभ को ही सब कुछ माना जाए।

🔷 जिसमें हाथों-हाथ भौतिक लाभ मिलने की बात बनती हो, उसी को स्वीकारा जाए। इस कसौटी पर नीति, सदाचार, उदारता, संयम जैसे उच्च आदर्शों के लिए कोई जगह नहीं रह जाती है। इस प्रत्यक्षवादी तत्त्वदर्शन ने ही मनुष्य को स्वेच्छाचारी बनने के लिए प्रोत्साहित किया है। उन परम्पराओं को छिन्न-भिन्न करके रख दिया है, जो मानवी गरिमा के अनुरूप मर्यादाओं के परिपालन एवं वर्जनाओं का परित्याग करने के लिए दबाव डालती और सहायता करती थीं।
      
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 11

👉 How to Stay Happy? (Part 2)

🔷 It is not true that everything is going perfectly well in the life of a happy person. Everybody has to go through his/her share of difficult and challenging situations in life. All of us desire to have a better life, but we should not waste away whatever good things we already have in pursuit for something better. Instead we should utilize what we have to obtain what we desire further.

🔶 One might find happiness in the pages of an old book kept in one’s shelf or in something simple that a person cooked, while that recipe may not even be found in the menu of a 5-star restaurant. There could be times when a person might feel happy after keeping a vessel of water for birds to drink on a hot summer day, while he might not be satisfied with Rs. 500/- offering at a temple. In this way, one will realize that happiness is related to the emotions which make the mind happy and contented. Emotions which are disturbing, annoying and unpleasant can never give happiness.

🔷 In fact, most of our worries are centered on what others will think or say to what we do. If we want to lead a happy life, psychologists recommend that we stay connected to a goal instead of people and things. Another suggestion is that one should do what one’s conscience propels him to pursue instead of worrying about what others will say or think. It will be his great loss if he does not pursue his dream frightened of what others will think about it. Any worthy step that a person executes in a planned manner not only gives him/her happiness but also contentment. Positive thinking and diligent efforts are the keys to happiness.

To be continued...

👉 मन को उद्विग्न न कीजिए (भाग 2)

🔷 सन्तुलित मन में एकाग्रता सबसे बड़ी शक्ति है। सन्तुलित व्यक्ति एक−विचार पर की सम्पूर्ण शक्ति केन्द्रित कर पाता है। उसकी विचार शक्ति विकेन्द्रित होकर व्यर्थ ही नष्ट नहीं होती। अकारण ही वह भय तथा काल्पनिक दुःखों से ग्रसित नहीं होता।

🔶 मानसिक सन्तुलन पर स्वास्थ्य का बड़ा प्रभाव पड़ता है। जब स्वास्थ्य अच्छा होता है और शरीर रोग मुक्त होता है, तो मानसिक सन्तुलन ठीक रहता है। रोगी शरीर होने पर प्रायः सन्तुलन बिगड़ जाता है। कभी कभी मानसिक सन्तुलन के भंग होने का कारण बुरा स्वास्थ्य होता है। स्वयं अपने मानसिक सन्तुलन का निरीक्षण कीजिए और उसके नष्ट होने के कारण मालूम कीजिए। यदि आपका मानसिक सन्तुलन भंग है, तो उसका दूषित प्रभाव उसके शरीर पर प्रकट हुए बिना नहीं रह सकता। पाचन विकार से शिथिलता, चिड़चिड़ापन, निराशा उत्पन्न होती है। यदि शरीर में कोई कष्ट हो, तो मनुष्य दुःखी, अतृप्त एवं अशान्त बना रहता है। प्रायः देखने में आता है कि जीर्ण रोगियों को क्रोध एवं आवेश अधिक आता है, उनका स्वभाव नैराश्य पूर्ण होता है दुःख पूर्ण मनःस्थिति अधिक रहती है।

🔷 भोजन का मानसिक सन्तुलन पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। आप जैसा भोजन लेते हैं, वैसा ही सन्तुलन स्थिर रहता है। खराब, दूषित, बासी, या अभक्ष्य पदार्थों के भोजन से मानसिक सन्तुलन भंग हो जाता है। मद्य, तमाकू , पान, सिगरेट से वासना उद्दीप्त होती है। इनका प्रयोग करने वालों में कामोत्तेजना बनी रहती है। माँस के साथ क्रूरता का अटूट सम्बन्ध है। मांस खाने वाले तुनकमिज़ाज, उत्तेजक स्वभाव, क्रुद्ध होने वाले, क्रूर हिंसामय प्रवृत्ति के होते हैं। मिर्च के साथ उत्तेजना का निकट साहचर्य है। राजसी भोजन, अधिक भोजन और अभक्ष पदार्थों के भोजन सन्तुलन को नष्ट करने वाले हैं। इनके विपरीत शाक भाजी दूध इत्यादि के साथ सात्विक भावनाएँ संयुक्त हैं। शाकाहार करने वाले ऋषि मुनि गण सरलता से मानसिक सन्तुलन स्थिर रख सके हैं। सात्विक भोजन सुख शान्ति की अभिवृद्धि करने वाला है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति, फरवरी 1955 पृष्ठ 12

👉 आज का सद्चिंतन 11 September 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 September 2018

👉 नदी का पानी

🔶 पुराने समय की बात है किसी नगर में एक भोला नाम का व्यक्ति रहता था। भोला दिन भर खेतों में काम करता और खेत में उगाये अन्न से ही उसके परिवार का गुजारा चलता था। भोला ने बचपन से ही गरीबी का सामना किया था। उसके माता पिता बेहद ही गरीब थे।

🔷 अब बच्चे बड़े हो गये, स्कूल जाने लगे, उनकी फ़ीस का खर्चा और ऊपर से महंगाई। भोला अक्सर सोचता कि जीवन कितना कठिन है। एक समस्या खत्म नहीं होती तो दूसरी शुरू हो जाती है। पूरा जीवन इन समस्याओं को हल करने में ही निकलता जा रहा है।

🔶 ऐसे ही एक दिन भोला एक साधु के पास पंहुचा, और उन्हें सारी परेशानी बताई – कि कैसे मैं अपनी जिंदगी की कठिनाइयों का सामना करूँ? एक परेशानी खत्म होती है तो दूसरी शुरू हो जाती है।

🔷 साधु महाराज हंसकर बोले- तुम मेरे साथ चलो मैं तुम्हारी परेशानी का हल बताता हूँ, साधु भोला को लेकर एक नदी के किनारे पहुंचे और बोले – मैं नदी के दूसरी पार जाकर तुमको परेशानी का हल बताऊंगा। यह कहकर साधु नदी के किनारे खड़े हो गए।

🔶 नदी के किनारे खड़े खड़े जब बहुत देर हो गयी, भोला बड़ा आश्चर्यचकित होकर बोला – महाराज हमें तो नदी पार करनी है तो हम इतनी देर से किनारे पर क्यों खड़े हैं। साधु महाराज – बेटा मैं इस नदी के पानी के सूखने का इंतजार कर रहा हूँ, जब ये सूख जायेगा फिर आराम से नदी पार कर लेंगे।

🔷 भोला को साधु की बातें मूखर्तापूर्ण लगीं, वो बोला – महाराज नदी का पानी कैसे सूख सकता है आप कैसी मूखर्तापूर्ण बातें कर रहे हैं।

🔶 साधु हंसकर बोले – बेटा यही तो मैं तुमको समझाना चाह रहा हूँ, ये जीवन एक नदी है और समस्या पानी की तरह हैं। जब तुमको पता है कि नदी का पानी नहीं सूखेगा, तो तुमको खुद प्रयास करके नदी को पार करना होगा। वैसे ही जीवन में समस्याएं तो चलती रहेंगी, तुमको अपने प्रयासों से इन परेशानियों से पार पाना है। अगर किनारे बैठ कर नदी का पानी सूखने का इंतजार करोगे तो जीवन भर कुछ नहीं पा सकोगे। पानी तो बहता रहेगा, समस्या तो आती रहेंगी लेकिन आपको नदी की धार को चीरते हुए आगे जाना होगा, हर समस्या को धराशायी करना होगा। तभी जीवन में आगे बढ़ सकोगे।

🔷 भोला की समझ में सारी बातें आ चुकी थीं।

🔶 मित्रो हमारी जिंदगी में भी कुछ ऐसा ही होता है, हम हमेशा सोचते हैं कि ये परेशानी खत्म हो जाये तब जीवन सुखी होगा, कभी वो परेशानी सुलझ जाये तब जीवन सुखी होगा। लेकिन ये समस्या ही नदी का पानी है, नदी तो बहती रहेगी तुमको पार जाना है धारा चीर कर आगे बढ़ते जाइये।

सोमवार, 10 सितंबर 2018

👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 8)

👉 भौतिकवाद की उलटबाँसियाँ  
 
🔶 जब विष को अमृत की मान्यता मिल जाए और उसे प्राप्त करने के लिए हर किसी को लालायित पाया जाए, तब परिवर्तन अति कठिन पड़ता है। हानि को लाभ समझा जाने लगे और लाभ को गहराई तक समझने में कठिनाई पड़े, उसे हानि समझा जाने लगे तो उल्टी समझ को सीधी करना बहुत कठिन पड़ता है। प्राचीन काल में कम से कम मान्यताएँ तो सही थीं। उठते कदम राजमार्ग को अपनाते थे पर अब तो स्थिति ही कुछ दूसरी बन गई है। भटका हुआ अपने आपको सही मानता और सबको अपने साथ ले चलने का आग्रह करता है। तात्कालिक लाभ सब कुछ बन गया है।

🔷 उसका परिणाम कल या परसों क्या हो सकता है, यह सोचने की किसी को फुरसत नहीं। कुकर्म करने में भी समय, श्रम, साहस और पुरुषार्थ नियोजित करना पड़ता है। बिना हिम्मत के तो चोरी-डकैती करते भी नहीं बन पड़ता। खतरा तो व्यभिचार-अनाचार के लिए उद्यत होने वालों के सामने भी रहता है। उस अनाचार में लगे हुए व्यक्ति भी कम जोखिम नहीं उठाते, फिर भी न जाने क्यों मान्यता यह बन गई है कि सच्चाई का, अच्छाई का रास्ता अपनाने वाले घाटे में रहते हैं। फायदा सिर्फ अनाचारियों को होता है। इस मान्यता के पक्ष में उन्हें अपने इर्द-गिर्द ही ऐसे लोग मिल जाते हैं जो कुकर्म करके हाथों-हाथ नफा कमा लेते हैं।

🔶 इतने दूर तक सोचने की उन्हें आवश्यकता ही प्रतीत नहीं होती कि अनुचित रीति से उठाया हुआ लाभ किस प्रकार दुर्व्यसनों में फँसाता, अपयश का भारी वजन लादता और अन्त में ऐसे दुष्परिणाम उत्पन्न करता है जिससे न केवल अपनों को वरन् साथियों समेत समूचे समुदाय को पतन एवं पराभव के गर्त में गिरना पड़ता है। लगता है कि मृगतृष्णा में भटकने वाले, कस्तूरी की तलाश में दौड़ लगाते रहने वाले हिरन खीज, थकान, निराशा और असमंजस के कारण बेमौत मर रहे हैं।
      
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 10

👉 How to Stay Happy? (Part1)

🔶 Why is it that some people are happy while some others are not? - This question has been eluding even the psychologists of the modern day. According to a recent survey, it has been found that people of Finland are the happiest people in the world. Countries like Denmark, Iceland, Switzerland and Norway are among the Top-5, while India’s position is 133rd in the list of 155 countries. In this survey, every year about 1000 people from each country are asked a few questions and based on their responses, the results are declared on World Happiness Day (20th March).

🔷 Being happy is a state of mind. It is not necessary to be rich to be happy. Practically every survey ever done has shown that those who are happy stay in families. Such people get along very well with their friends and family. According to Daniel Gilbert, the Happiness Expert at Harvard University, we are happy when we are with our family. If we have friends, then it is even better. In some way or the other, everything that contributes to our happiness comes through either family or friends. The biggest factor for one’s happiness and fulfillment in life is, basically, love. A scientific study has shown that having someone to rely on helps a person’s nervous system relax, helps his brain stay healthier for a longer time, and reduces both emotional as well as physical pain.

🔶 A long-time researcher on this topic, George Vaillant says – ‘What influences life the most is the quality of our relationships with others’. It is these precious relationships that bind us together and hence influence our happiness to a large extent.
It is also evident that material prosperity has made man hollow from within. In fact, man spends his entire life earning money and realizes at the end that the desire for money is never-ending and the joys of life cannot be bought with money. So, to whatever extent possible, we should spend our time in lovingly strengthening our social life and thus making it prosperous.

To be continued...

👉 मन को उद्विग्न न कीजिए (भाग 1)

🔶 मानसिक सन्तुलित अवस्था मन की स्थिर बुद्धि सम्पन्न शान्तिमय स्थिति है, जिसमें विवेक पूर्णरूप से जाग्रत रहता है। जैसे तराजू के दोनों पलड़े समान रूप से भारी होने के कारण डण्डी को सन्तुलित रखते हैं, वैसे ही मन की पूर्ण सन्तुलित अवस्था में मानसिक उत्तेजना, वितर्क व्यर्थ की उथल−पुथल चिन्ता वासना आदि से मुक्त रहती है। इस अवस्था में मनुष्य अच्छी तरह विवेक को जाग्रत रख कर सोच विचार कर सकता है।

🔷 यह पूर्ण आनन्द की स्थिति है। इस अवस्था में मनुष्य अपने भले बुरे को अच्छी तरह समझता है। वह अपने शुभ संकल्पों का निर्माण करता है, कर्त्तव्य बुद्धि से उसे अपने भले बुरे का ज्ञान रहता है। उसका आत्म विश्वास बढ़ जाता है। स्थिरता एवं शान्ति के कारण उसकी मानसिक शक्ति में भी अभिवृद्धि होती है। व्यर्थ चिन्ताएँ नष्ट हो जाती हैं। मिथ्या दुःखों से मुक्ति प्राप्त होती है। हम अनुचित माया−मोह के विकारों से बचे रहते हैं।

🔶 पूर्ण सन्तुलित व्यक्ति मानसिक उद्वेगों से मुक्त रहता है। उद्वेग एक प्रकार का उफान है, मन में उठने वाला विद्रोह है। यह मन की असाधारण अशान्त स्थिति है। उद्वेग में मनुष्य का शरीर एक प्रकार की कम्पनों से परिपूर्ण हो उठता है और वह थरथराहट से भरा रहता है। उद्वेग में धैर्य नष्ट हो जाता है, क्रोध ऊँचा उठ आता है और व्यर्थ की शंकाएँ बुद्धि को भ्रष्ट कर देती हैं। भय, चिन्ता, ईर्ष्या, लोभ, वासना के ताण्डव विवेक को अपना कार्य नहीं करने देते। वही मन सन्तुलित हो जाने पर स्थिर बुद्धि ग्रहण करता है, प्रसन्न और उदार बनता है, सन्तुष्ट और शान्त बनता है। उसे भविष्य से बड़ी बड़ी आशाएँ होती हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति, फरवरी 1955 पृष्ठ 12

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1955/February/v1.12

👉 आज का सद्चिंतन 10 September 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 September 2018


रविवार, 9 सितंबर 2018

👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 7)

👉 नीतिरहित भौतिकवाद से उपजी दुर्गति  
    
🔶 रासायनिक खाद और कीटनाशक मिलकर पृथ्वी की उर्वरता को विषाक्तता में बदलकर रखे दे रहे हैं। खनिजों का उत्खनन जिस तेजी से हो रहा है, उसे देखते हुए लगता है कि कुछ ही दशाब्दियों में धातुओं का, खनिज तेलों का भण्डार समाप्त हो जाएगा। बढ़ते हुए कोलाहल से तो व्यक्ति और पगलाने लगेंगे। शिक्षा का उद्देश्य उदरपूर्ति भर रहेगा, उसका शालीनता के तत्त्वदर्शन से कोई वास्ता न रहेगा। आहार में समाविष्ट होती हुई स्वादिष्टता प्रकारान्तर से रोग-विषाणुओं की तरह धराशायी बनाकर रहेगी। कामुक उत्तेजनाओं को जिस तेजी से बढ़ाया जा रहा है, उसके फलस्वरूप न मनुष्य में जीवनी शक्ति का भण्डार बचेगा, न बौद्धिक प्रखरता और शील-सदाचार का कोई निशान बाकी रहेगा। पशु-पक्षियों और पेड़ों का जिस दर से कत्लेआम हो रहा है, उसे देखते हुए यह प्रकृति छूँछ होकर रहेगी।

🔷 नीरसता, निष्ठुरता, नृशंसता, निकृष्टता के अतिरिक्त और कुछ पारस्परिक व्यवहार में कोई ऊँचाई शायद ही दीख पड़े। मूर्धन्यों का यह निष्कर्ष गलत नहीं है कि मनुष्य सामूहिक आत्म-हत्या की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। नशेबाजी जैसी दुष्प्रवृत्तियों की बढ़ोत्तरी देखते हुए कथन कुछ असम्भव नहीं लगता। स्नेह सौजन्य और सहयोग के अभाव में मनुष्य पागल कुत्तों की तरह एक-दूसरे पर आक्रमण करने के अतिरिक्त और कुछ कदाचित ही कर सके।
  
🔶 मनुष्य जाति आज जिस दिशा में चल पड़ी है, उससे उसकी महत्ता ही नहीं, सत्ता का भी समापन होते दीखता है। संचित बारूद के ढेर में यदि कोई पागल एक माचिस की तीली फेंक दे, तो समझना चाहिए कि यह अपना स्वर्गोपम धरालोक धूलि बनकर आकाश में न छितरा जाए। विज्ञान की बढ़ोत्तरी और ज्ञान की घटोत्तरी ऐसी ही विषम परिस्थितियाँ उत्पन्न करने में बहुत विलम्ब भी नहीं लगने देंगी। ऐसा दीखता है।
      
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 9

👉 आज का सद्चिंतन 9 September 2018


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...