मंगलवार, 11 सितंबर 2018

👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 9)

👉 भौतिकवाद की उलटबाँसियाँ  
 
🔷 अवांछनीयता अपनाकर कमाई हुई सफलता तत्काल न सही थोड़ी ही देर में थोड़ा ही आगे बढ़कर ऐसे संकट सामने ला खड़े करती है, जिनसे उबरना कठिन हो जाता है। पर उनके लिए क्या कहा और क्या किया जाए जिनकी मन्द दृष्टि मात्र कुछ ही इंच-फुट तक का देख सकने में साथ देती है। आगे चलकर कितने बड़े खाईं-खन्दक हैं। जिनमें एक बार गिर पड़ने पर कोई सहायता के लिए भी आगे नहीं आता है और जिस-तिस को कोसते हुए भयावह अंत का सामना करना पड़ता है। इन दिनों ऐसी ही कुछ गजब की गाज गिरी है। विज्ञान के आधार पर मिली, नीतिमत्ता से सर्वथा विलग सफलताओं ने कुछ ऐसा व्यामोह उत्पन्न कर दिया है कि लोग कुमार्ग पर चलते और दुर्गति के भाजन बनते देखे जाते हैं। प्रचलन यही बना रहा तो उसका दुष्परिणाम व्यक्ति और समाज के सम्मुख इस स्तर की विभीषिका बनकर सामने आएगा, जिससे बाद में उबर सकना शायद सम्भव ही न रहेगा। तथाकथित प्रगति अवगति से भी अधिक महँगी पड़ेगी।

🔶 इन दिनों हर क्षेत्र में प्रवेश किए हुए समस्याओं, अवांछनीयताओं, विडम्बनाओं के लिए दोष किसे दिया जाए? और उसका समाधान कहाँ ढूँढ़ा जाए? इस सन्दर्भ में मोटे तौर से एक ही बात कही जा सकती है कि प्रत्यक्षवाद की पृष्ठभूमि पर जन्मे भौतिकवाद ने लगभग सभी नैतिक मूल्यों की उपयोगिता, आवश्यकता मानने से इंकार कर दिया है। उसी प्रत्यक्षवादिता को प्रामाणिकता का एक स्वरूप मानने वाले जन-समुदाय ने हर प्रसंग में यही नीति अपना ली है कि प्रत्यक्ष एवं तात्कालिक लाभ को ही सब कुछ माना जाए।

🔷 जिसमें हाथों-हाथ भौतिक लाभ मिलने की बात बनती हो, उसी को स्वीकारा जाए। इस कसौटी पर नीति, सदाचार, उदारता, संयम जैसे उच्च आदर्शों के लिए कोई जगह नहीं रह जाती है। इस प्रत्यक्षवादी तत्त्वदर्शन ने ही मनुष्य को स्वेच्छाचारी बनने के लिए प्रोत्साहित किया है। उन परम्पराओं को छिन्न-भिन्न करके रख दिया है, जो मानवी गरिमा के अनुरूप मर्यादाओं के परिपालन एवं वर्जनाओं का परित्याग करने के लिए दबाव डालती और सहायता करती थीं।
      
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 11

👉 How to Stay Happy? (Part 2)

🔷 It is not true that everything is going perfectly well in the life of a happy person. Everybody has to go through his/her share of difficult and challenging situations in life. All of us desire to have a better life, but we should not waste away whatever good things we already have in pursuit for something better. Instead we should utilize what we have to obtain what we desire further.

🔶 One might find happiness in the pages of an old book kept in one’s shelf or in something simple that a person cooked, while that recipe may not even be found in the menu of a 5-star restaurant. There could be times when a person might feel happy after keeping a vessel of water for birds to drink on a hot summer day, while he might not be satisfied with Rs. 500/- offering at a temple. In this way, one will realize that happiness is related to the emotions which make the mind happy and contented. Emotions which are disturbing, annoying and unpleasant can never give happiness.

🔷 In fact, most of our worries are centered on what others will think or say to what we do. If we want to lead a happy life, psychologists recommend that we stay connected to a goal instead of people and things. Another suggestion is that one should do what one’s conscience propels him to pursue instead of worrying about what others will say or think. It will be his great loss if he does not pursue his dream frightened of what others will think about it. Any worthy step that a person executes in a planned manner not only gives him/her happiness but also contentment. Positive thinking and diligent efforts are the keys to happiness.

To be continued...

👉 मन को उद्विग्न न कीजिए (भाग 2)

🔷 सन्तुलित मन में एकाग्रता सबसे बड़ी शक्ति है। सन्तुलित व्यक्ति एक−विचार पर की सम्पूर्ण शक्ति केन्द्रित कर पाता है। उसकी विचार शक्ति विकेन्द्रित होकर व्यर्थ ही नष्ट नहीं होती। अकारण ही वह भय तथा काल्पनिक दुःखों से ग्रसित नहीं होता।

🔶 मानसिक सन्तुलन पर स्वास्थ्य का बड़ा प्रभाव पड़ता है। जब स्वास्थ्य अच्छा होता है और शरीर रोग मुक्त होता है, तो मानसिक सन्तुलन ठीक रहता है। रोगी शरीर होने पर प्रायः सन्तुलन बिगड़ जाता है। कभी कभी मानसिक सन्तुलन के भंग होने का कारण बुरा स्वास्थ्य होता है। स्वयं अपने मानसिक सन्तुलन का निरीक्षण कीजिए और उसके नष्ट होने के कारण मालूम कीजिए। यदि आपका मानसिक सन्तुलन भंग है, तो उसका दूषित प्रभाव उसके शरीर पर प्रकट हुए बिना नहीं रह सकता। पाचन विकार से शिथिलता, चिड़चिड़ापन, निराशा उत्पन्न होती है। यदि शरीर में कोई कष्ट हो, तो मनुष्य दुःखी, अतृप्त एवं अशान्त बना रहता है। प्रायः देखने में आता है कि जीर्ण रोगियों को क्रोध एवं आवेश अधिक आता है, उनका स्वभाव नैराश्य पूर्ण होता है दुःख पूर्ण मनःस्थिति अधिक रहती है।

🔷 भोजन का मानसिक सन्तुलन पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। आप जैसा भोजन लेते हैं, वैसा ही सन्तुलन स्थिर रहता है। खराब, दूषित, बासी, या अभक्ष्य पदार्थों के भोजन से मानसिक सन्तुलन भंग हो जाता है। मद्य, तमाकू , पान, सिगरेट से वासना उद्दीप्त होती है। इनका प्रयोग करने वालों में कामोत्तेजना बनी रहती है। माँस के साथ क्रूरता का अटूट सम्बन्ध है। मांस खाने वाले तुनकमिज़ाज, उत्तेजक स्वभाव, क्रुद्ध होने वाले, क्रूर हिंसामय प्रवृत्ति के होते हैं। मिर्च के साथ उत्तेजना का निकट साहचर्य है। राजसी भोजन, अधिक भोजन और अभक्ष पदार्थों के भोजन सन्तुलन को नष्ट करने वाले हैं। इनके विपरीत शाक भाजी दूध इत्यादि के साथ सात्विक भावनाएँ संयुक्त हैं। शाकाहार करने वाले ऋषि मुनि गण सरलता से मानसिक सन्तुलन स्थिर रख सके हैं। सात्विक भोजन सुख शान्ति की अभिवृद्धि करने वाला है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति, फरवरी 1955 पृष्ठ 12

👉 आज का सद्चिंतन 11 September 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 September 2018

👉 नदी का पानी

🔶 पुराने समय की बात है किसी नगर में एक भोला नाम का व्यक्ति रहता था। भोला दिन भर खेतों में काम करता और खेत में उगाये अन्न से ही उसके परिवार का गुजारा चलता था। भोला ने बचपन से ही गरीबी का सामना किया था। उसके माता पिता बेहद ही गरीब थे।

🔷 अब बच्चे बड़े हो गये, स्कूल जाने लगे, उनकी फ़ीस का खर्चा और ऊपर से महंगाई। भोला अक्सर सोचता कि जीवन कितना कठिन है। एक समस्या खत्म नहीं होती तो दूसरी शुरू हो जाती है। पूरा जीवन इन समस्याओं को हल करने में ही निकलता जा रहा है।

🔶 ऐसे ही एक दिन भोला एक साधु के पास पंहुचा, और उन्हें सारी परेशानी बताई – कि कैसे मैं अपनी जिंदगी की कठिनाइयों का सामना करूँ? एक परेशानी खत्म होती है तो दूसरी शुरू हो जाती है।

🔷 साधु महाराज हंसकर बोले- तुम मेरे साथ चलो मैं तुम्हारी परेशानी का हल बताता हूँ, साधु भोला को लेकर एक नदी के किनारे पहुंचे और बोले – मैं नदी के दूसरी पार जाकर तुमको परेशानी का हल बताऊंगा। यह कहकर साधु नदी के किनारे खड़े हो गए।

🔶 नदी के किनारे खड़े खड़े जब बहुत देर हो गयी, भोला बड़ा आश्चर्यचकित होकर बोला – महाराज हमें तो नदी पार करनी है तो हम इतनी देर से किनारे पर क्यों खड़े हैं। साधु महाराज – बेटा मैं इस नदी के पानी के सूखने का इंतजार कर रहा हूँ, जब ये सूख जायेगा फिर आराम से नदी पार कर लेंगे।

🔷 भोला को साधु की बातें मूखर्तापूर्ण लगीं, वो बोला – महाराज नदी का पानी कैसे सूख सकता है आप कैसी मूखर्तापूर्ण बातें कर रहे हैं।

🔶 साधु हंसकर बोले – बेटा यही तो मैं तुमको समझाना चाह रहा हूँ, ये जीवन एक नदी है और समस्या पानी की तरह हैं। जब तुमको पता है कि नदी का पानी नहीं सूखेगा, तो तुमको खुद प्रयास करके नदी को पार करना होगा। वैसे ही जीवन में समस्याएं तो चलती रहेंगी, तुमको अपने प्रयासों से इन परेशानियों से पार पाना है। अगर किनारे बैठ कर नदी का पानी सूखने का इंतजार करोगे तो जीवन भर कुछ नहीं पा सकोगे। पानी तो बहता रहेगा, समस्या तो आती रहेंगी लेकिन आपको नदी की धार को चीरते हुए आगे जाना होगा, हर समस्या को धराशायी करना होगा। तभी जीवन में आगे बढ़ सकोगे।

🔷 भोला की समझ में सारी बातें आ चुकी थीं।

🔶 मित्रो हमारी जिंदगी में भी कुछ ऐसा ही होता है, हम हमेशा सोचते हैं कि ये परेशानी खत्म हो जाये तब जीवन सुखी होगा, कभी वो परेशानी सुलझ जाये तब जीवन सुखी होगा। लेकिन ये समस्या ही नदी का पानी है, नदी तो बहती रहेगी तुमको पार जाना है धारा चीर कर आगे बढ़ते जाइये।

सोमवार, 10 सितंबर 2018

👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 8)

👉 भौतिकवाद की उलटबाँसियाँ  
 
🔶 जब विष को अमृत की मान्यता मिल जाए और उसे प्राप्त करने के लिए हर किसी को लालायित पाया जाए, तब परिवर्तन अति कठिन पड़ता है। हानि को लाभ समझा जाने लगे और लाभ को गहराई तक समझने में कठिनाई पड़े, उसे हानि समझा जाने लगे तो उल्टी समझ को सीधी करना बहुत कठिन पड़ता है। प्राचीन काल में कम से कम मान्यताएँ तो सही थीं। उठते कदम राजमार्ग को अपनाते थे पर अब तो स्थिति ही कुछ दूसरी बन गई है। भटका हुआ अपने आपको सही मानता और सबको अपने साथ ले चलने का आग्रह करता है। तात्कालिक लाभ सब कुछ बन गया है।

🔷 उसका परिणाम कल या परसों क्या हो सकता है, यह सोचने की किसी को फुरसत नहीं। कुकर्म करने में भी समय, श्रम, साहस और पुरुषार्थ नियोजित करना पड़ता है। बिना हिम्मत के तो चोरी-डकैती करते भी नहीं बन पड़ता। खतरा तो व्यभिचार-अनाचार के लिए उद्यत होने वालों के सामने भी रहता है। उस अनाचार में लगे हुए व्यक्ति भी कम जोखिम नहीं उठाते, फिर भी न जाने क्यों मान्यता यह बन गई है कि सच्चाई का, अच्छाई का रास्ता अपनाने वाले घाटे में रहते हैं। फायदा सिर्फ अनाचारियों को होता है। इस मान्यता के पक्ष में उन्हें अपने इर्द-गिर्द ही ऐसे लोग मिल जाते हैं जो कुकर्म करके हाथों-हाथ नफा कमा लेते हैं।

🔶 इतने दूर तक सोचने की उन्हें आवश्यकता ही प्रतीत नहीं होती कि अनुचित रीति से उठाया हुआ लाभ किस प्रकार दुर्व्यसनों में फँसाता, अपयश का भारी वजन लादता और अन्त में ऐसे दुष्परिणाम उत्पन्न करता है जिससे न केवल अपनों को वरन् साथियों समेत समूचे समुदाय को पतन एवं पराभव के गर्त में गिरना पड़ता है। लगता है कि मृगतृष्णा में भटकने वाले, कस्तूरी की तलाश में दौड़ लगाते रहने वाले हिरन खीज, थकान, निराशा और असमंजस के कारण बेमौत मर रहे हैं।
      
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 10

👉 How to Stay Happy? (Part1)

🔶 Why is it that some people are happy while some others are not? - This question has been eluding even the psychologists of the modern day. According to a recent survey, it has been found that people of Finland are the happiest people in the world. Countries like Denmark, Iceland, Switzerland and Norway are among the Top-5, while India’s position is 133rd in the list of 155 countries. In this survey, every year about 1000 people from each country are asked a few questions and based on their responses, the results are declared on World Happiness Day (20th March).

🔷 Being happy is a state of mind. It is not necessary to be rich to be happy. Practically every survey ever done has shown that those who are happy stay in families. Such people get along very well with their friends and family. According to Daniel Gilbert, the Happiness Expert at Harvard University, we are happy when we are with our family. If we have friends, then it is even better. In some way or the other, everything that contributes to our happiness comes through either family or friends. The biggest factor for one’s happiness and fulfillment in life is, basically, love. A scientific study has shown that having someone to rely on helps a person’s nervous system relax, helps his brain stay healthier for a longer time, and reduces both emotional as well as physical pain.

🔶 A long-time researcher on this topic, George Vaillant says – ‘What influences life the most is the quality of our relationships with others’. It is these precious relationships that bind us together and hence influence our happiness to a large extent.
It is also evident that material prosperity has made man hollow from within. In fact, man spends his entire life earning money and realizes at the end that the desire for money is never-ending and the joys of life cannot be bought with money. So, to whatever extent possible, we should spend our time in lovingly strengthening our social life and thus making it prosperous.

To be continued...

👉 मन को उद्विग्न न कीजिए (भाग 1)

🔶 मानसिक सन्तुलित अवस्था मन की स्थिर बुद्धि सम्पन्न शान्तिमय स्थिति है, जिसमें विवेक पूर्णरूप से जाग्रत रहता है। जैसे तराजू के दोनों पलड़े समान रूप से भारी होने के कारण डण्डी को सन्तुलित रखते हैं, वैसे ही मन की पूर्ण सन्तुलित अवस्था में मानसिक उत्तेजना, वितर्क व्यर्थ की उथल−पुथल चिन्ता वासना आदि से मुक्त रहती है। इस अवस्था में मनुष्य अच्छी तरह विवेक को जाग्रत रख कर सोच विचार कर सकता है।

🔷 यह पूर्ण आनन्द की स्थिति है। इस अवस्था में मनुष्य अपने भले बुरे को अच्छी तरह समझता है। वह अपने शुभ संकल्पों का निर्माण करता है, कर्त्तव्य बुद्धि से उसे अपने भले बुरे का ज्ञान रहता है। उसका आत्म विश्वास बढ़ जाता है। स्थिरता एवं शान्ति के कारण उसकी मानसिक शक्ति में भी अभिवृद्धि होती है। व्यर्थ चिन्ताएँ नष्ट हो जाती हैं। मिथ्या दुःखों से मुक्ति प्राप्त होती है। हम अनुचित माया−मोह के विकारों से बचे रहते हैं।

🔶 पूर्ण सन्तुलित व्यक्ति मानसिक उद्वेगों से मुक्त रहता है। उद्वेग एक प्रकार का उफान है, मन में उठने वाला विद्रोह है। यह मन की असाधारण अशान्त स्थिति है। उद्वेग में मनुष्य का शरीर एक प्रकार की कम्पनों से परिपूर्ण हो उठता है और वह थरथराहट से भरा रहता है। उद्वेग में धैर्य नष्ट हो जाता है, क्रोध ऊँचा उठ आता है और व्यर्थ की शंकाएँ बुद्धि को भ्रष्ट कर देती हैं। भय, चिन्ता, ईर्ष्या, लोभ, वासना के ताण्डव विवेक को अपना कार्य नहीं करने देते। वही मन सन्तुलित हो जाने पर स्थिर बुद्धि ग्रहण करता है, प्रसन्न और उदार बनता है, सन्तुष्ट और शान्त बनता है। उसे भविष्य से बड़ी बड़ी आशाएँ होती हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति, फरवरी 1955 पृष्ठ 12

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1955/February/v1.12

👉 आज का सद्चिंतन 10 September 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 September 2018


रविवार, 9 सितंबर 2018

👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 7)

👉 नीतिरहित भौतिकवाद से उपजी दुर्गति  
    
🔶 रासायनिक खाद और कीटनाशक मिलकर पृथ्वी की उर्वरता को विषाक्तता में बदलकर रखे दे रहे हैं। खनिजों का उत्खनन जिस तेजी से हो रहा है, उसे देखते हुए लगता है कि कुछ ही दशाब्दियों में धातुओं का, खनिज तेलों का भण्डार समाप्त हो जाएगा। बढ़ते हुए कोलाहल से तो व्यक्ति और पगलाने लगेंगे। शिक्षा का उद्देश्य उदरपूर्ति भर रहेगा, उसका शालीनता के तत्त्वदर्शन से कोई वास्ता न रहेगा। आहार में समाविष्ट होती हुई स्वादिष्टता प्रकारान्तर से रोग-विषाणुओं की तरह धराशायी बनाकर रहेगी। कामुक उत्तेजनाओं को जिस तेजी से बढ़ाया जा रहा है, उसके फलस्वरूप न मनुष्य में जीवनी शक्ति का भण्डार बचेगा, न बौद्धिक प्रखरता और शील-सदाचार का कोई निशान बाकी रहेगा। पशु-पक्षियों और पेड़ों का जिस दर से कत्लेआम हो रहा है, उसे देखते हुए यह प्रकृति छूँछ होकर रहेगी।

🔷 नीरसता, निष्ठुरता, नृशंसता, निकृष्टता के अतिरिक्त और कुछ पारस्परिक व्यवहार में कोई ऊँचाई शायद ही दीख पड़े। मूर्धन्यों का यह निष्कर्ष गलत नहीं है कि मनुष्य सामूहिक आत्म-हत्या की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। नशेबाजी जैसी दुष्प्रवृत्तियों की बढ़ोत्तरी देखते हुए कथन कुछ असम्भव नहीं लगता। स्नेह सौजन्य और सहयोग के अभाव में मनुष्य पागल कुत्तों की तरह एक-दूसरे पर आक्रमण करने के अतिरिक्त और कुछ कदाचित ही कर सके।
  
🔶 मनुष्य जाति आज जिस दिशा में चल पड़ी है, उससे उसकी महत्ता ही नहीं, सत्ता का भी समापन होते दीखता है। संचित बारूद के ढेर में यदि कोई पागल एक माचिस की तीली फेंक दे, तो समझना चाहिए कि यह अपना स्वर्गोपम धरालोक धूलि बनकर आकाश में न छितरा जाए। विज्ञान की बढ़ोत्तरी और ज्ञान की घटोत्तरी ऐसी ही विषम परिस्थितियाँ उत्पन्न करने में बहुत विलम्ब भी नहीं लगने देंगी। ऐसा दीखता है।
      
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 9

👉 आज का सद्चिंतन 9 September 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 September 2018

शनिवार, 8 सितंबर 2018

👉 आत्मिक प्रगति के तीन अवरोध (भाग 1)

🔷 आत्मिक प्रगति के पथ पर अवरोध उत्पन्न करने वाली दुष्प्रवृत्तियों में तीन प्रधान हैं। इन्हें ताड़का, सूर्पणखा और सुरसा की उपमा दी जाती है। इन्हें निरस्त किये बिना असुरता के चंगुल में फँसी हुई सीता का-आत्मा का-उद्धार नहीं हो सकता। इन्हें पुत्रेषणा-वित्तेषणा और लोकेषणा कहा जाता है। वासना-तृष्णा और अहंता की प्रवृत्तियाँ ही सबल होने पर इन एषणाओं के रूप में परिलक्षित होती हैं।

🔶 इंद्रिय वासनाओं में यों सभी अपने-अपने ढंग की खींचतान करती हैं। पर उनमें रसना और कामुकता को प्रमुख माना गया है। चटोरपन के कुचक्र में पेट पर अभक्ष्य पदार्थों का अनावश्यक भार लदता है। अपच के फलस्वरूप शरीर में अगणित रोग उत्पन्न होते हैं। दुर्बलता और रुग्णता ग्रसित होकर अकाल मृत्यु का ग्रास बनना पड़ता है। अस्वस्थता की विपत्ति ढाने में जिह्वा का चटोरापन भयंकर शत्रु से भी अधिक आक्रमणकारी और विघातक सिद्ध होता है। वासना की दूसरी प्रवृत्ति है- कामुकता। यौनाचार की कल्पना और क्रिया में उलझा हुआ मस्तिष्क अपनी अति महत्त्वपूर्ण क्षमता को ऐसे जंजाल में फँसा देता है जिसमें, पाना रत्तीभर और गँवाना पहाड़ भर पड़ता है।

🔷 प्रकृति की चतुरता ही कहिए कि उसने प्राणियों की संख्या बनाये रहने के लिए कष्ट साध्य भार उठाने के लिए यौनाचार की सरसता उत्पन्न कर दी। यदि यह उन्माद न चढ़ता तो कदाचित ही कोई प्राणी प्रजनन की अति कठिन और अतीव बोझिल प्रक्रिया को अपने कंधों पर लादने के लिए तैयार होता। वासनाओं में जीभ के चटोरेपन पर रोकथाम करना आवश्यक है। पेट में कोई वस्तु तभी पहुँचने दी जाय जब कड़ाके की भूख उसके लिए तीव्रतापूर्वक माँग करती हो। सात्विक सुपाच्य पदार्थ स्वेच्छापूर्वक शान्त चित्त से सीमित मात्रा में ग्रहण किये जायें। जो खाया जाय औषधि रूप हो। स्वाद की उत्तेजना तो नशेबाजी की तरह है, जिसमें हर दृष्टि से हानि ही हानि उठानी पड़ती है।

🔶 दूसरे यौनाचार लिप्सा के सम्बन्ध में और भी गम्भीरता पूर्वक विचार करने की आवश्यकता है। जो जीवन रस, हमारे ओजस्-तेजस् और ब्रह्म वर्चस् का आधार हैं उसे क्षणिक आवेश में ऐसे ही गँवाते रहने की गलती को सुधारना ही समझदारी है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1977 पृष्ठ 17
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1977/October/v1.17

👉 सँस्कार.................

🔷 "बहू !!!!!!!!!!🤨🤨
घर के काम निपटाने के बाद,अम्मा जी और मेरे पैरों की मालिश कर दिया करो"🤨

🔶 "मम्मी जी मुझसे इतना काम नहीं हो पायेगा, बहुत थक जाती हूँ।"...............😔

🔷 अरे !!!!!!😳😳😳
अभी महीना भर हुआ नहीं तुम्हें आये हुए और तुम जवाब देने लगी हमें, अम्माजी बुजुर्ग हैं, तुम उनके पैर की मालिश करने से मना कर रही हो 🤭🤭

🔶 "आप कर दिया करें उनकी मालिश, आप तो अभी एकदम ठीक हैं।"

🔷 शर्म नहीं आती तुम्हें जवाब देते हुए। यही संस्कार दिए हैं तुम्हारी माँ ने 🤨🤨

संस्कार !! लेकिन वो आपने माँगे कहाँ थे ??

🔷 शादी के पाँच दिन पहले आपने जिन सामानों की लिस्ट भिजवाई थी उसमें संस्कार तो कहीं नहीं लिखे थे 😓😓

🔶 "आपकी माँग को पूरा करने के लिए जब माँ ने अपने गहने और जमीन गिरवी रखे तो मैंने उनके दिए हुए संस्कार भी गिरवी रख दिये।"😭😭

👉 जटायु व गिलहरी चुप नहीं बैठे

🔷 पंख कटे जटायु को गोद में लेकर भगवान् राम ने उसका अभिषेक आँसुओं से किया। स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए भगवान् राम ने कहा- तात्। तुम जानते थे रावण दुर्द्धर्ष और महाबलवान है, फिर उससे तुमने युद्ध क्यों किया ?

🔶 अपनी आँखों से मोती ढुलकाते हुए जटायु ने गर्वोन्नत वाणी में कहा- 'प्रभो! मुझे मृत्यु का भय नहीं है, भय तो तब था जब अन्याय के प्रतिकार की शक्ति नहीं जागती?

🔷 भगवान् राम ने कहा- तात्! तुम धन्य हो! तुम्हारी जैसी संस्कारवान् आत्माओं से संसार को कल्याण का मार्गदर्शन मिलेगा।

🔶 गिलहरी पूँछ में धूल लाती और समुद्र में डाल आती। वानरों ने पूछा- देवि! तुम्हारी पूँछ की मिट्टी से समुद्र का क्या बिगडे़गा। तभी वहाँ पहुँचे भगवान् राम ने उसे अपनी गोद में उठाकर कहा 'एक- एक कण धूल एक- एक बूँद पानी सुखा देने के मर्म को समझो वानरो। यह गिलहरी चिरकाल तक सत्कर्म में सहयोग के प्रतीक रूप में सुपूजित रहेगी।'

🔷 जो सोये रहते हैं वे तो प्रत्यक्ष सौभाग्य सामने आने पर भी उसका लाभ नहीं उठा पाते। जागृतात्माओं की तुलना में उनका जीवन जीवित- मृतकों के समान ही होता है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग 1 पृष्ठ 19

👉 आज का सद्चिंतन 8 September 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 September 2018


👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 6)

👉 नीतिरहित भौतिकवाद से उपजी दुर्गति  
    
🔷 विज्ञान ने जहाँ एक से एक अद्भुत चमत्कारी साधन उत्पन्न किए वहाँ दूसरे हाथ से उन्हें छीन भी लिया। कुछ समर्थ लोग जन्नत का मजा लूटते और शेष सभी दोषारोपण की सड़न में सड़ते हुए न पाए जाते। विज्ञान के साथ सद्ज्ञान का समावेश भी यदि रह सका होता तो भौतिक और आत्मिक सिद्धान्तों पर आधारित प्रगति सामने होती और उसका लाभ हर किसी को समान रूप से मिल सका होता। पर किया क्या जाए? भौतिक विज्ञान जहाँ शक्ति और सुविधा प्रदान करता है, वहीं प्रत्यक्षवादी मान्यताएँ नीति, धर्म, संयम, स्नेह, कर्तव्य आदि को झुठला भी देता है। ऐसी दशा में उद्दण्डता अपनाए हुए समर्थ का दैत्य-दानव बन जाना स्वाभाविक है। उनका बढ़ता वर्चस्व उन दुर्बलों का शोषण करेगा ही जिन्हें प्रगति ने बहुलता से पैदा करके समर्थों को उदार बनने एवं ऊँचा उठाने का श्रेय देने के लिए पैदा किया है। तथाकथित प्रगति ने इसी नीतिमत्ता का बोलबाला होते देखने की स्थिति पैदा कर दी है।
  
🔶 उदाहरण के लिए प्रगति के नाम पर हस्तगत हुई उपलब्धियों को चकाचौंध में नहीं उनकी वस्तुस्थिति में खुली आँखों से देखा जा सकता है। औद्योगीकरण के नाम पर बने कारखानों ने संसार भर में वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण भर दिया है। अणु शक्ति की बढ़ोत्तरी ने विकिरण से वातावरण को इस कदर भर दिया है कि तीसरा युद्ध न हो तो भी भावी पीढ़ियों को अपंग स्तर की पैदा होना पड़ेगा। ऊर्जा के अत्यधिक उपयोग ने संसार का तापमान इतना बढ़ा दिया है कि हिम प्रदेश पिघल जाने पर समुद्रों में बाढ़ आने और ओजोन नाम से जानी जाने वाली पृथ्वी की कवच फट जाने पर ब्रह्माण्डीय किरणें धरती की समृद्धि को भूनकर रख सकती हैं।
      
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 8

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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