शनिवार, 1 सितंबर 2018

👉 अविचल धैर्य की महिमा

🔷 एक बार एक तपस्वी जंगल में तप कर रहा था। नारद जी उधर से निकले तो उसने साष्टांग प्रणाम किया और पूछा-मुनिवर कहाँ जा रहे हैं? नारदजी ने कहा-विष्णुलोक को भगवान के दर्शन करने जा रहे हैं। तपस्वी ने कहा-एक प्रश्न मेरा भी पूछते आइए कि-मुझे उनके दर्शन कब तक होंगे?

🔶 नारद जी विष्णुलोक पहुँचे तो उनने उस तपस्वी का भी प्रश्न पूछा-भगवान ने कहा-84 लाख योनियों में अभी 18 बार उसे और चक्कर लगाने पड़ेंगे तब कही मेरे दर्शन होंगे। वापिस लौटने पर नारदजी ने यही उत्तर उस तपस्वी को सुना दिया।

🔷 तपस्वी अधीर नहीं हुआ। समय की उसे जल्दी न थी। इतना आश्वासन उसे पर्याप्त लगा कि भगवान के दर्शन देर सबेर में उसे होंगे अवश्य! इससे उसे बड़ी प्रसन्नता हुईं और दूने उत्साह के साथ अपनी तपस्या में लग गया। उसकी इस अविचल निष्ठा और धैर्य को देखकर भगवान बड़े प्रसन्न हुये और उनने तुरन्त ही उस तपस्वी को दर्शन दे दिये।
कुछ दिन बाद नारद जी उधर से फिर निकले तो भक्त ने कहा-मुझे तो आपके जाने के दूसरे दिन ही दर्शन हो गये थे। इस पर नारद जी बहुत दुखी हुये और विष्णु भगवान के पास जाकर शिकायत की कि आपने मुझसे कहा इनको लंबी अवधि में दर्शन होंगे और आपने तुरन्त ही दर्शन देकर मुझे झूठा बनाया।

🔶 भगवान ने कहा-नारद जिसकी निष्ठा अविचल है जिसमें असीम धैर्य है उसके तो मैं सदा ही समीप हूँ। देर तो उन्हें लगती है तो सघन पल में उतावली करते है। उस भक्त के प्रश्न में उतावली का आभास देखकर मैंने लंबी अवधि बताई थी पर जब देखा कि वह तो बहुत ही धैर्य वान है तो उतना विलंब लगाने की आवश्यकता न समझ और तुरन्त दर्शन दे दिये।

📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1961

👉 सत्य के तीन पहलू

🔷 भगवान बुद्ध के पास एक व्यक्ति पहुँचा। बिहार के श्रावस्ती नगर में उन दिनों उनका उपदेश चल रहा था। शंका समाधान के लिए- उचित मार्ग-दर्शन  के लिए लोगों की भीड़ उनके पास प्रतिदिन लगी रहती थी।

🔶 आगन्तुक ने पूछा- क्या ईश्वर है? बुद्ध ने एक टक उस युवक को देखा- बोले, “नहीं है।” थोड़ी देर बाद एक दूसरा व्यक्ति पहुँचा। उसने भी उसी प्रश्न को दुहराया- क्या ईश्वर हैं? इस बार भगवान बुद्ध का उत्तर भिन्न था। उन्होंने बड़ी दृढ़ता के साथ कहा- “हाँ ईश्वर है।” संयोग से उसी दिन एक तीसरे आदमी ने भी आकर प्रश्न किया- क्या ईश्वर है? बुद्ध मुस्कराये और चुप रहे- कुछ भी नहीं बोले। अन्य दोनों की तरह तीसरा भी जिस रास्ते आया था उसी मार्ग से वापस चला गया।

🔷 आनन्द उस दिन भगवान बुद्ध के साथ ही था। संयोग से तीनों ही व्यक्तियों के प्रश्न एवं बुद्ध द्वारा दिए गये उत्तर को वह सुन चुका था। एक ही प्रश्न के तीन उत्तर और तीनों ही सर्वथा एक-दूसरे से भिन्न, यह बात उसके गले नहीं उतरी। बुद्ध के प्रति उसकी अगाध श्रद्धा- अविचल निष्ठा थी पर तार्किक बुद्ध ने अपना राग अलापना शुरू किया, आशंका बढ़ी। सोचा, व्यर्थ आशंका-कुशंका करने की अपेक्षा तो पूछ लेना अधिक उचित है।”

🔶 आनन्द ने पूछा- “भगवन्! धृष्टता के लिए क्षमा करें। मेरी अल्प बुद्धि बारम्बार यह प्रश्न कर रही है कि एक ही प्रश्न के तीन व्यक्तियों के लिए भिन्न-भिन्न उत्तर क्यों? क्या इससे सत्य के ऊपर आँच नहीं आती?

🔷 बुद्ध बोले- “आनन्द! महत्व प्रश्न का नहीं है और न ही सत्य का सम्बन्ध शब्दों की अभिव्यक्तियों से है। महत्वपूर्ण वह मनःस्थिति है जिससे प्रश्न पैदा होते हैं। उसे ध्यान में न रखा गया- आत्मिक प्रगति के लिए क्या उपयुक्त है, इस बात की उपेक्षा की गयी तो सचमुच  ही सत्य के प्रति अन्याय होगा। पूछने वाला और भी भ्रमित हुआ तो इससे उसकी प्रगति में बाधा उत्पन्न होगी।

🔶 उस सत्य को और भी स्पष्ट करते हुए भगवान बुद्ध बोले- प्रातःकाल सर्वप्रथम जो व्यक्ति आया था, वह था तो आस्तिक पर उसकी निष्ठा कमजोर थी। आस्तिकता उसके आचरण में नहीं, बातों तक सीमित थी। वह मात्र अपने कमजोर विश्वास का समर्थन मुझसे चाहता था। अनुभूतियों की गहराई में उतरने का साहस उसमें न था। उसको हिलाना आवश्यक था ताकि ईश्वर को जानने की सचमुच ही उसमें कोई जिज्ञासा है तो उसे वह मजबूत कर सके इसलिए उसे कहना पड़ा- “ईश्वर नहीं है।”

🔷 दूसरा व्यक्ति नास्तिक था। नास्तिकता एक प्रकार की छूत की बीमारी है जिसका उपचार न किया गया तो दूसरों को भी संक्रमित करेगी। उसे अपनी मान्यता पर अहंकार और थोड़ा अधिक ही विश्वास था। उसे भी समय पर तोड़ना जरूरी था। इसलिए कहना पड़ा- “ईश्वर है।” इस उत्तर से उसके भीतर आस्तिकता के भावों का जागरण होगा। परमात्मा की खोज के लिए आस्था उत्पन्न होगी। उसकी निष्ठा प्रगाढ़ है। अतः उसे दिया गया उत्तर उसके आत्म विकास में सहायक ही होगा।

🔶 तीसरा व्यक्ति सीधा-साधा, भोला था। उसके निर्मल मन पर किसी मत को थोपना उसके ऊपर अन्याय होता। मेरा मौन रहना ही उसके लिए उचित था। मेरा आचरण ही उसकी सत्य की खोज के लिए प्रेरित करेगा तथा सत्य तक पहुँचायेगा।”

🔷 आनन्द का असमंजस दूर हुआ। साथ ही इस सत्य का अनावरण भी कि महापुरुषों द्वारा एक ही प्रश्न का उत्तर भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के लिए भिन्न-भिन्न क्यों होता है? साथ ही यह भी ज्ञात हुआ कि सत्य को शब्दों में बाँधने की भूल कभी भी नहीं की जानी चाहिए।

👉 आज का सद्चिंतन 1 September 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 September 2018


👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 1)

🔷 बीसवीं सदी का अंत आते-आते समय सचमुच बदल गया है। कभी संवेदनाएँ इतनी समर्थता प्रकट करती थीं कि मिट्टी के द्रोणाचार्य एकलव्य को धनुष विद्या में प्रवीण-पारंगत कर दिया करते थे। मीरा के कृष्ण उसके बुलाते ही साथ नृत्य करने के लिए आ पहुँचते थे। गान्धारी ने पतिव्रत भावना से प्रेरित होकर आँखों में पट्टी बाँध ली थी और आँखों में इतना प्रभाव भर लिया था कि दृष्टिपात करते ही दुर्योधन का शरीर अष्ट-धातु का हो गया था। तब शाप-वरदान भी शस्त्र प्रहारों और बहुमूल्य उपहारों जैसा काम करते थे। वह भाव-संवेदनाओं का चमत्कार था। उसे एक सच्चाई के रूप में देखा और हर कसौटी पर सही पाया जाता था।
  
🔶 अब भौतिक जगत ही सब कुछ रह गया है। आत्मा तिरोहित हो गई। शरीर और विलास-वैभव ही सब कुछ बनकर रह गए हैं। यह प्रत्यक्षवाद है। जो बाजीगरों की तरह हाथों में देखा और दिखाया जा सके वही सच और जिसके लिए गहराई में उतरना पड़े, परिणाम के लिए प्रतीक्षा करनी पड़े, वह झूठ। आत्मा दिखाई नहीं देती। परमात्मा को भी अमुक शरीर धारण किए, अमुक स्थान पर बैठा हुआ और अमुक हलचलें करते नहीं देखा जाता इसलिए उन दोनों की ही मान्यता समाप्त कर दी गई।
  
🔷 भौतिक विज्ञान चूँकि प्रत्यक्ष पर अवलम्बित है। उतने को ही सच मानता है जो प्रत्यक्ष देखा जाता है। चेतना और श्रद्धा में कभी शक्ति की मान्यता रही होगी, पर वह अब इसलिए अविश्वस्त हो गई कि उन्हें बटन दबाते ही बिजली जल जाने या पंखा चलने लगने की तरह प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता। जो प्रत्यक्ष नहीं वह अमान्य, भौतिक विज्ञान और दर्शन की यह कसौटी है। इस आधार पर परिवर्तन का लाभ तो यह हुआ कि अन्ध-विश्वास जैसी मूढ़-मान्यताओं के लिए गुंजायश नहीं रही और हानि यह हुई कि नीतिमत्ता, आदर्शवादिता, धर्म-धारणाओं को भी अस्वीकार कर दिया गया। इसलिए मानवी गरिमा के अनुरूप अनुशासन भी लगभग समाप्त होने जा रहा है।
  
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 3

👉 Not only Self-introspection but also Self-refinement

🔷 Mutual sharing and caring is a common human trait. It is by this process of 'give and take' that the entire universe is sustained. This process is seen to be working incessantly among matter, vegetation and other sentient creatures. Contributing towards the sustenance of this process is essential. However, it should be remembered that it is self-reliance that is the prime factor in worldly success and in self - growth of human soul. Those who are dependent on others can neither sustain their lives nor move forward on the path of self-growth.

🔶 Everyone is familiar with the gravitational force of the Earth. This force attracts everything towards the Earth. A human being too has a magnetic field of his own. This not only holds together similar people, objects and favorable circumstances but also pulls them towards itself forcibly. A person instinctively searches a like - minded friend. The water of rivers ultimately reaches the ocean. The ocean again returns this water to the source of rivers through its messengers the clouds.

🔷 One should develop worthiness in tune with one's aspirations. There is a natural law which rewards according to one's worthiness. Therefore, instead of knocking at other's door for help and succor, we should not only introspect ourselves but also try to uplift and refine ourselves according to the light given to us during introspection. This is the highway to success in all fields.

📖 Akhand Jyoti, May June 2003

👉 ईश्वर-भक्ति और जीवन-विकास (अन्तिम भाग)

🔷 प्राचीन काल में एक साधारण गृहस्थ से लेकर राजे-महाराजे सभी ईश्वरनिष्ठ हुआ करते थे। इतिहास साक्षी है कि उस समय इस देश में आर्थिक या भौतिक सम्पत्ति की संकीर्णता नाम मात्र को भी न थी। ईश्वर-भक्ति के साथ उन लोगों ने परमात्मा की क्रिया-शक्ति को भी धारण किया हुआ था फलस्वरूप अभाव का कहीं नामोनिशान नहीं था। एक राजा जितना सुखी और सन्तुष्ट हो सकता था प्रजा भी उतनी सुखी और सम्पन्न होती थी। आत्म-कल्याण के लिये उन लोगों ने एक अवधि आयु निर्धारित कर ली थी तभी उसके लिये प्रस्थान करते थे। इसके पूर्व तक साँसारिक सम्पदाओं, सुख और ऐश्वर्य का पूर्ण उपभोग भी किया करते थे। यह स्थिति रहने तक हमारे देश में किसी भी तरह की सम्पन्नता में कमी नहीं रही।

🔶 जीव या मनुष्य परमात्मा का ही दुर्बल और विकृत भाव है। दरअसल जीव कोई वस्तु नहीं परमात्मा ही अनेक रूपों में प्रतिभासित हो रहा है। जब तक हमारी कल्पना जीव भाव में रहती है तब तक अपनी शक्ति और सामर्थ्य भी वैसी ही तुच्छ और कमजोर दिखाई देती है। ईश्वर भक्ति से कीट के अंग परिवर्तन जैसा प्रारम्भिक कष्ट तो अवश्यम्भावी है किन्तु जीव का विकास सुनिश्चित है। प्रारम्भ में वह स्वार्थ, परमार्थ, माया, ब्रह्म, लोक और परलोक की मोह ममता में परेशान रहता है। कीट जिस तरह भ्रमर का गुँजन पसन्द तो करता है किन्तु वह अहंभाव छोड़ने के लिये तैयार नहीं होता, उसी प्रकार जीव का अहंभाव में बने रहना प्रारम्भिक स्थिति है, उसके लिये जिद करना मचलना साधना की प्रारम्भिक अवस्था है। उसे पार कर लेने पर जब वह नितान्त ब्राह्मी स्थिति अर्थात् तदाकार में बदल जाता है तो उसका अहंभाव एक विशाल शक्तिमान् रूप में परिणत हो जाता है । वह अपने को ही ब्रह्म के रूप में देखने लगता है। “मैं ही ब्रह्म हूं” यह स्थिति ऐसी है जिस में जीव की शक्तियाँ विस्तीर्ण होकर ईश्वरीय शक्तियों में बदल जाती हैं।

🔷 और संसार में सुख स्वामित्व और विकास के लिये तीसरी वस्तु जो आवश्यक है वह शक्ति भी उसे मिलती है। शक्ति बुद्धि और साधन पाकर जीव दिनों दिन उन्नति की ओर बढ़ता जाता है। यह सही है कि परमात्मा-भाव अपने निश्चित समय में पकता है इसलिये फल देखने के लिये मनुष्य को भी निर्धारित नियमों और समय की प्रतीक्षा करनी पड़े किन्तु यह निश्चित है कि मनोवाँछित सफलता और जीवन विकास का अधिष्ठाता परमात्मा ही है । उसकी भक्ति के बिना वह सब उपलब्ध नहीं हो सकता जिसकी हम इस जीवन में कामना करते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1967 अगस्त पृष्ठ 4

👉 गहरे उतरें, विभूतियाँ हस्तगत करें

🔷 दृश्यमान व पदार्थ सम्पदा ही सबकुछ नहीें है। जो गहराई में विद्यमान है, उसका भी महत्व है। पेड़ की छाया ऊपर दीखती है, पर जड़ें जमीन की गहराई में ही पाई जा सकती हैं। समुद्र तट पर सीप और घोंघे बटोरे जा सकते हैं, पर मोती प्राप्त करने के लिए गहराई में उतरने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं। भूमि के ऊपर रेत और चट्टानें भी बिखरी पड़ी हैं, पर बहुमूल्य धातुओं के लिए जमीन खोदकर गहरी पर्तों तक प्रवेश करना पड़ता है। पराक्रम के बलबूते वैभव हस्तगत किया जा सकता है, किन्तु मानवी गरिमा विकसित करने के लिए अन्तर्मुखी बनना और पैनी दृष्टि से दोष- दुर्गुणें को बुहारना पड़ता है। दैवी विभूतियाँ तो अन्तराल में विद्यमान हैं। गहन चिन्तन का समुद्र मन्थन करने पर ही वह हस्तगत हो सकती हैं। वैभव की तृष्णा एक लुभावनी चमक मात्र है। पर आन्तरिक सत्प्रवृत्तियों का परिपोषण रत्नों को खोद निकालने के समान है।

🔶 सौन्दर्य बाहर दीखता है, पर वह वस्तुतः नेत्रों की ज्योति, अभिरुचि एवं आत्मीयता का समुच्चय मात्र है। अच्छा हो हम अपने अन्तर का खजाना खोंजें और उन विभूतियों को प्राप्त करें, जो अपने कल्याण तथा समष्टि के कल्याण के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

👉 जीव ईश्वर का ही अंश है

🔶 जीव ईश्वर का अंश है तो ईश्वर के समान शक्ति उसमें क्यों नहीं हैं? यह प्रश्न एक शिष्य ने गुरु से पूछा। गुरु ने विस्तार पूर्वक उत्तर दिया पर शिष्य की समझ में न आया शंका बनी ही रही।

🔷 एक दिन गुरु और शिष्य गंगा स्नान के लिये गये। शिष्य से कहा-एक लोटा गंगा जल भर लो। उसने भर लिया। घर आकर गुरु ने कहा-बेटा इस गंगा जल में नाव चलाओ। शिष्य ने कहा-नाव तो गंगाजी के बहुत जल में चलती हैं, इतने थोड़े जल में कैसे चल सकती हैं? गुरु ने कहा-यही बात जीव और ईश्वर के संबंध में है। जीव अल्प है। इसलिये उसमें शक्ति भी थोड़ी है। ईश्वर विभु है उसमें अनन्त शक्ति है। इसलिये दोनों की शक्ति और कार्य क्षमता न्यूनाधिक है। वैसे लोटे का जल भी गंगाजल ही था, इसी प्रकार जीव अल्प होते हुये भी ईश्वर का अंश ही है।

🔶 जीव अपने को जब ईश्वर का सान्निध्य प्राप्त कर उसी में निमग्न हो जाता है तो उसमें भी ईश्वर जैसी शक्ति आ जाती है।

📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1961

👉 सफलता के लिए संलग्नता जरुरी है

🔶 एक आश्रम में एक शिष्य शिक्षा ले रहा था। जब उसकी शिक्षा पूरी हो गयी तो विदा लेने के समय उसके गुरु ने उससे कहा – वत्स, यहां रहकर तुमने शास्त्रो का समुचित ज्ञान प्राप्त कर लिया है, किंतु कुछ उपयोगी शिक्षा अभी शेष रह गई है। इसके लिए तुम मेरे साथ चलो।

🔷 शिष्य गुरु के साथ चल पड़ा। गुरु उसे आश्रम से दूर एक खेत के पास ले गए। वहां एक किसान अपने खेतों को पानी दे रहा था। गुरु और शिष्य उसे गौर से देखते रहे। पर किसान ने एक बार भी उनकी ओर आँख उठाकर नहीं देखा। जैसे उसे इस बात का अहसास ही ना हुआ हो कि उसके पास में कोई खड़ा भी है। कुछ देर बाद गुरु और शिष्य वहां से चल दिए।

🔶 वहाँ से आगे बढ़ते हुए उन्होंने देखा कि एक लुहार भट्ठी में कोयला डाले उसमें लोहे को गर्म कर रहा था। लोहा लाल होता जा रहा था। लुहार अपने काम में इस कदर मगन था कि उसने गुरु शिष्य की ओर जरा भी ध्यान नहीं दिया। कुछ देर बाद गुरु और शिष्य वहां से भी चल दिए।

🔷 फिर दोनों आगे बढ़े। आगे थोड़ी दूर पर एक व्यक्ति जूता बना रहा था। चमड़े को काटने, छीलने और सिलने में उसके हाथ काफी सफाई के साथ चल रहे थे। कुछ देर बाद गुरु ने शिष्य को वापस चलने को कहा।

🔶 शिष्य को कुछ समझ में नहीं आया | उसके मन में प्रश्न उठने लगे कि आखिर गुरु चाहते क्या हैं ? शिष्य के मन कि बात को भाँपते हुए गुरु ने उससे कहा – वत्स, मेरे पास रहकर तुमने शास्त्रों का अध्ययन किया लेकिन व्यवहारिक ज्ञान की शिक्षा बाकी थी। तुमने इन तीनों को देखा। ये अपने काम में संलग्न थे। अपने काम में ऐसी ही तल्लीनता आवश्यक है, तभी व्यक्ति को सफलता मिलेगी।

🔷 मित्रों इस कहानी से हमें ये शिक्षा मिलती है कि हमें अपने काम को इतनी ही तल्लीनता, संलग्नता, और एकाग्रता के साथ करना चाहिए।जब हम किसी काम को करे तो हमारे दिमाग में उस काम के अलावा कुछ नहीं होना चाहिए। तभी हमें सफलता मिल सकती है।

👉 आज का सद्चिंतन 31 August 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 31 August 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (अन्तिम भाग)

👉 उत्कृष्टता के साथ जुड़ें, प्रतिभा के अनुदान पाएँ

🔶 लक्ष्य और उपक्रम निर्धारित कर लेने के उपरांत यह निर्णय करना अति सरल पड़ता है कि कौन अपनी मन:स्थिति और परिस्थिति के अनुसार, संपर्क परिकर की आवश्यकताओं को देखते हुए, किन क्रियाकलापों में हाथ डाले और प्रगति का एक-एक चरण उठाते हुए, अंतत: बड़े-से-बड़े स्तर का क्या कुछ कर गुजरे? यहाँ यह ध्यान रखने योग्य है कि व्यक्ति अपने प्रभामंडल संपन्न क्षेत्र के साथ जुड़कर ही पूर्ण बनता है। अकेला चना तो कभी भी भाड़ फोड़ सकने में समर्थ नहीं होता। अपने जैसे विचारों के अनेक घनिष्टों को साथ लेकर और सहयोगपूर्वक बड़े कदम उठाना ही वह रीति-नीति है, जिसके सहारे अपनी और साथियों की प्रतिभा को साथ-साथ चार चाँद लगते हैं।
  
🔷 सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय परब्रह्म-परमात्मा प्रतिभाओं का पुंज है। उसके साथ संबंध जोड़ने पर संकीर्ण स्वार्थपरता में तो कटौती करनी पड़ती है पर साथ ही यह भी सत्य है कि अग्नि के साथ संबंध जोड़ने वाला ईंधन का ढेर, ज्योतिर्मय ज्वाल माल की तरह दमकने लगता है। उत्कृष्टता के साथ जुड़ने वालों में से किसी को भी यह नहीं कहना पड़ता कि उसे प्रतिभा परिकर के भाण्डागार में से किसी प्रकार की कुछ कम उपलब्धि हस्तगत हुई।
  
🔶 दिशा निर्धारित कर लेने पर मार्गदर्शक तो पग-पग पर मिल जाते हैं। कोई न भी मिले तो अपनी ही अंतरात्मा उस आवश्यकता की पूर्ति कर देती हो। प्रतिभा का धनी न कभी हारता है और न अभावग्रस्त रहने की शिकायत करता है। उसे किसी पर दोषारोपण करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती कि उन्हें अमुक ने सहयोग नहीं दिया या प्रगति पथ को रोके रहने वाला अवरोध अटकाया। प्रतिभा ही तो शालीनता और प्रगतिशीलता की आधारशिला है।
          
.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 55

👉 Scientific Basis of Gayatri Mantra Japa (Last Part)

🔶 Any one who sincerely and rightly performs the japa-sadhana of the Gayatri Mantra begins to gradually progress through the aforesaid four stages of psychological and spiritual refinement and attains the ultimate goal. His mind and intellect are transformed and illuminated with divine love, light and wisdom and he awakens to the supreme reality of truth, consciousness, bliss (sat-chita-anand) beyond the limits of time and space.

🔷 Material well-being and elimination of worldly problems accrue to the sadhak, but these are mere byproducts of the spiritual illumination. Nothing remains to be gained or aspired for thereafter. Everyone, without any constraint of caste, creed, gender or social status, is entitled to undertake this scientific experiment of japa-sadhana of Gayatri Mantra and be the recipient of divine grace. Notes:

1. Japa: Repeated rhythmic enunciation or chanting (of a mantra).
2. Sadhana: Devout spiritual endeavor aimed at self-realization.
3. Japa-sadhana: Japa accompanied by meditation and specific religious practices.

📖 Akhand Jyoti, Mar Apr 2003

👉 ईश्वर-भक्ति और जीवन-विकास (भाग 3)

🔶 ईश्वर-मुखी आत्माओं में जहाँ सूक्ष्म बुद्धि का विकास होता है और वे साँसारिक परिस्थितियों को साफ-साफ देखने लगते हैं वहाँ उनमें सर्वात्म-भाव भी जागृत होता है। इन्द्रियों से प्रतिक्षण उठने वाले विषयों के आकर्षणों में आनन्द की क्षणिक अनुभूति निरर्थक साबित हो जाती है जिससे शारीरिक शक्तियों का अपव्यय रुक जाता है। रुकी हुई शक्ति को आत्म कल्याण के किसी भी प्रयोजन में लगाकर उससे मनोवाँछित सफलतायें पाई जा सकती हैं। जिन लोगों ने संसार में बड़ी सफलतायें पाई हैं विश्वास के रूप में परमात्मा ने ही उन्हें वह मार्ग दिखाया और सुझाया है।

🔷 निष्काम कर्म में प्रत्येक कर्म परमात्मा को समर्पित करना बताया जाता है उसमें भी यही तथ्य काम करता है कि मनुष्य प्रतिक्षण प्रत्येक कार्य में परमात्मा का अनुग्रह और अनुकम्पा प्राप्त करे। ईश्वर निष्ठ व्यक्ति के अन्तःकरण में उसकी सफलता का विश्वास अपने आप पर बनता है और इस तरह वैभव-विकास की परिस्थितियाँ भी अपने आप बनती चली जाती हैं। भूल दर असल यह हुई कि कुछ लोगों ने साँसारिक कर्तव्य पालन को तिलाँजलि देकर आत्म-कल्याण के लिये पलायनवाद का एक नया रास्ता खड़ा कर दिया। इससे लोगों में मतिभ्रम हुआ अन्यथा परमात्मा स्वयं अनन्य ऐश्वर्य से सम्पन्न है वह भला अपने उपासक को क्यों उस से विमुख करने लगा?

🔶 ईश्वर उपासना से बौद्धिक सूक्ष्मदर्शिता की तरह अनवरत क्रिया-शीलता का भी उदय होता है। परिश्रम की आदत पड़ती है। पुरुषार्थ जगता है। इन वीरोचित गुणों के रहते हुये अभाव का नाम भी नहीं रह सकता । परमात्मा अपने भक्त को क्रियाशील बनाकर उसे संसार के अनेक सुख ऐश्वर्य और भोग प्रदान करता है। मनुष्य स्वयं बेवकूफी न करे तो वह चिरकाल तक उनका सुखोपभोग करता हुआ भी आत्म-कल्याण का लक्ष्य पूरा कर सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1967 अगस्त पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/August/v1.3

गुरुवार, 30 अगस्त 2018

👉 हिम्मत से काम करो

🔷 तूफान में जब नाव डगमगाने लगी तो मल्लाह घबराये। उसमें सवार सीजर ने कहा-घबराओ मत, हिम्मत से काम करो। तुम्हारी नाव के साथ सीजर और उसका भाग्य भी सवार है, वह आसानी से नहीं डूब सकती।

👉 गरजो मत-बरसो

🔷 विद्वान् कार्लाइल ने अपने आत्म चरित्र में लिखा है वर्षा के दिनों में एक दिन अचानक हमारे पड़ोस में दुर्घटना पूर्ण मृत्यु हुई। लोग उस मौसम को कोस रहे थे। मैंने अनुमान लगाया कि उस आदमी की मौत बादलों के गर्जन से हुई। पर जब मैं बड़ा हुआ तब समझा कि मौत गर्जन से नहीं बिजली गिरने से होती है। तब से मैंने गरजना बन्द कर दिया और चमकने की तरकीब ढूँढ़ने लगा।

👉 सारी दुनियाँ ही स्कूल है



🔷 स्वामी रामतीर्थ जब छोटे थे, पड़ोस के गाँव के स्कूल में पढ़ने जाया करते थे। वे रास्ते में भी पुस्तकें पड़ते जाते थे। एक दिन एक किसान ने कहा-बेटा यहाँ खेतों में कोई स्कूल थोड़े ही है जो यहाँ भी पढ़ते हो। रामतीर्थ ने उत्तर दिया-काका जी मेरे लिये तो सारी दुनियाँ ही स्कूल है।

👉 साधना की शक्ति:-

🔷 वर्षों पुरानी बात है। एक राज्य में महान योद्धा रहता था। कभी किसी से नहीं हारा था। बूढ़ा हो चला था, लेकिन तब भी किसी को भी हराने का माद्दा रखता था। चारों दिशाओं में उसकी ख्याति थी। उससे देश-विदेश के कई युवा युद्ध कौशल का प्रशिक्षण लेने आते थे।

🔶 एक दिन एक कुख्यात युवा लड़ाका उसके गांव आया। वह उस महान योद्धा को हराने का संकल्प लेकर आया था, ताकि ऐसा करने वाला पहला व्यक्ति बन सके। बेमिसाल ताकतवर होने के साथ ही उसकी खूबी दुश्मन की कमजोरी पहचानने और उसका फायदा उठाने में महारत थी। वह दुश्मन के पहले वार का इंतजार करता। इससे वह उसकी कमजोरी का पता लगाता। फिर पूरी निर्ममता, शेर की ताकत और बिजली की गति से उस पर पलटवार करता। यानी, पहला वार तो उसका दुश्मन करता लेकिन आखिरी वार इस युवा लड़ाके का ही होता था।

🔷 अपने शुभचिंतकों और शिष्यों की चिंता और सलाह को नजरअंदाज करते हुए बूढ़े योद्धा ने युवा लड़ाके की चुनौती कबूल की। जब दोनों आमने-सामने आए तो युवा लड़ाके ने महान योद्धा को अपमानित करना शुरू किया। उसने बूढ़े योद्धा के ऊपर रेत-मिट्टी फेंकी। चेहरे पर थूका भी। बूढ़े योद्धा को गालियां देता रहा। जितने तरीके से संभव था, उतने तरीके से उसे अपमानित किया। लेकिन बूढ़ा योद्धा शांतचित्त, एकाग्र और अडिग रहा और उसके प्रत्येक क्रियाकलाप को पैनी नज़रों से देखता रहा।

🔶 युवा लड़ाका थकने लगा। अंतत: अपनी हार सामने देखकर वह शर्मिंदगी के मारे भाग खड़ा हुआ।

🔷 बूढ़े योद्धा के कुछ शिष्य इस बात से नाराज और निराश हुए कि उनके गुरु ने गुस्ताख युवा लड़ाके से युद्ध नहीं किया। उसे सबक नहीं सिखाया। इन शिष्यों ने गुरु को घेर लिया और सवाल किया, 'आप इतना अपमान कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं? आपने उसे भाग जाने का मौका कैसे दे दिया?’

🔶 महान योद्धा ने जवाब दिया, ‘यदि कोई व्यक्ति आपके लिए कुछ उपहार लाए, लेकिन आप लेने से इनकार कर दें। तब यह उपहार किसके पास रह गया?’देने वाले के पास ही न।

🔷 इसी प्रकार साधना में भी कई प्रकार की बाधाएं आएँगी उनसे लड़ने में अपनी शक्ति न गवाएं बल्कि कुछ समय मौन रहें साधना में निरन्तरता रखें सहज होने की कोशिश रखें । थोड़े ही समय बाद आप उन परिस्तिथियों से आगे निकल जायेंगे। और हमेशा विजयी ही रहेंगे। साधना से जो बड़ी बात अंदर पैदा होती है वो है असीम शांति जिसके सम्पर्क में आते ही बड़ी से बड़ी आसुरी शक्ति भी अपनी कोशिशें कर के थक जाती हैं और भाग जाती हैं या साधक के शरणागत हो जाती है बस जरूरत है धैर्य की और असीम शांति की।

🔶 अगर परिस्तिथिवश कभी लड़ना भी पड़े तो अंदर शांत रहते हुए पूरी परिस्तिथियों को देखते हुए लड़ो बिना क्रोध किये कोई भी शक्ति होगी आपके ऊपर प्रभाव न डाल सकेगी।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 August 2018

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...